Showing posts with label बघेली अंजोर. Show all posts
Showing posts with label बघेली अंजोर. Show all posts

Tuesday, October 6, 2026

पुस्तक समीक्षा | पांच बोलियों के संयुक्त साहित्यिक प्रकाश से प्रकाशित ‘बघेली अंजोर’ का वार्षिकांक | समीक्षक डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
पांच बोलियों के संयुक्त साहित्यिक प्रकाश से प्रकाशित ‘बघेली अंजोर’ का वार्षिकांक   
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
---------------------------
वार्षिकांक    - बघेली अंजोर
संपादक     - डाॅ. राम गरीब पाण्डेय ‘‘विकल’’
प्रकाशक    - बोली विकास मंच, गीतायन, प्लाट नं. 685/19, वाटर फिल्टर प्लांट के सामने, तुलसीनगर नौढ़िया, सीधी - 486661 (म.प्र.)
मूल्य       - 100/-
---------------------------


मध्य प्रदेश के सीधी से प्रकाशित होने वाली त्रैमासिक पत्रिका ‘‘बघेली अँजोर’’ का यह दूसरा वर्ष है तथा इसका पांचवा अंक (जुलाई- सितम्बर, 2026) वार्षिक अंक के रूप में प्रकाशित हुआ है। पत्रिका के संपादक हैं डॉ. राम गरीब पाण्डेय ‘‘विकल’’ तथा उप सम्पादक गीता शुक्ला ‘‘गीत’’। प्रधान सह सम्पादक रामलाल मिश्र और शिवी शुक्ला हैं। यह पत्रिका उत्तर भारत की बोलियां के उत्थान के उद्देश्य से प्रकाशित की जा रही है जिसमें वर्तमान में पांच बोलियां शामिल हैं - बघेली, अवधी, बुंदेली, छत्तीसगढ़ी और भोजपुरी। पत्रिका में इसके उद्देश्य के संबंध में टीप लिखी गई है- ‘‘बघेली एवं समीपवर्ती बोलियों के साहित्य संस्कृति की पूर्णतया अव्यावसायिक त्रैमासिक पत्रिका।’’
आज जब भारतीय भाषाओं को संकट के दौर से गुजरना पड़ रहा है ऐसे समय में बोलियां के पक्ष में खड़े होना संस्कृति को संरक्षित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। हिंदी और उर्दू धीरे-धीरे हिंग्लिश और एंग्लो-उर्दू के हवाले होती जा रही है। बोलियों पर भी इसका प्रभाव पड़ रहा है। किंतु यह अच्छी बात है कि बोलियां लोक का प्रतिनिधित्व करती हैं। बोलियों में लचीलापन होता है। वे विभिन्न भाषाओं एवं बोलियों के शब्द ग्रहण करके भी अपनी मौलिकता बनाए रखती हैं। बोलियां इस कठिन दौर में भी अपनी यथावत पकड़ बनाए हुए हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यह भी है कि व्यक्ति चाहे जितना भी पढ़ लिख जाए, अनेक भाषाओं का ज्ञाता बन जाए लेकिन जब उसे अपनी मूल संस्कृति से जुड़ना या उसे अभिव्यक्त करना होता है तो वह अपनी बोलियांे का ही सहारा लेता है। यानी बोलियां उसकी मूल अस्मिता, मूल क्षेत्रियता की पहचान होती हैं। अमेरिका या कनाडा में बसा हुआ व्यक्ति भी जब गर्व से कहता है कि मैं भारत के बुंदेलखंड का हूं, बघेलखंड का हूं या फिर भोजपुरी हूं तो इस उद्घोष में उसके क्षेत्र की बोली भी समाई रहती है।
‘‘बघेली अंजोर’’ के संपादकीय ‘‘कहब जरूरी है’’ में संपादक डॉ. ‘विकल’ ने “अक्षराणामकारोऽस्मि” शीर्षक से लिखा है कि ‘‘अक्षराणामकारोऽस्मि’’ के सबसे बड़े जानकार औ समझै खातिर सबसे जादा जिम्मेदार हमरे साहित्यकारन क कहा जाय सकत है। दुइ-चारि लाइन से लै के कुछ किताबन तक के लिखड्या-पढ़ड्या अपने आप क सबसे बड़ा मानै लागत हैं। ओतनी दार उँ इया बिसरि जात हैं, के जउने अच्छर के साधना-आराधना उँ कै रहे हैं, उहे ब्रम्ह आय, उहे परम सत्ता आय, उहै भगमान आय। त फेर ओके सामने अहंकार काहे के? हँसी आबति है, दुक्खी लागत है इया देखि के, जब दुसरे बोली-भाखा के नाम पर, सहर, जिला, प्रदेस के नाम पर दुसरे क छोट बताय के ओकर हँसी उड़ायी जाति है। एतनै नहीं, ओकर जरि काटै म सगली ताकत झोंकि दीन जाति है। जउन हम कै रहेन है, उहै उत्तम है औ बाँकी सब घटिया। माने हमरे मन्दिर बाले भगमान असली औ बाँकी सब मन्दिरन के भगमान नकली?”
डॉ. विकल ने अपने संपादकीय में बहुत अच्छा मुद्दा उठाया है। सचमुच, बोलियों को बहनों की तरह मिलकर रहना चाहिए। कोई भी बोली न तो बड़ी है और न छोटी। प्रत्येक की अपनी स्वतंत्र अस्मिता है लेकिन साथ ही शब्दों का बहानापा भी है, यह भूलना नहीं चाहिए। संपादकीय बघेली में लिखा गया है बघेली सरल बोली है, समझ में आ जाने वाली। किंतु संपूर्ण पत्रिका वर्तमान में पांच बोलियों का प्रतिनिधित्व कर रही है इसलिए यदि संपादकीय खड़ी बोली में होता तो अधिक उत्तम रहता विशेषरूप से वार्षिकांक का। वैसे, पांचों बोलियां आपस में इतनी घुली-मिली हैं कि इनमें से सभी को संपादकीय में कही गई बातें भलीभांती समझ में आ जाएंगी। किन्तु यह बघेली और उसकी निकटवर्ती बोलियों के अतिरिक्त भी अन्य बोली बोलने वाले पाठकों के हाथों में भी जाएगी और वे उत्सुकतावश इसे पढ़ने का प्रयास करेंगे।
वार्षिकांक के लिए रचनाओं का सटीक चयन किया गया है। इसका प्रथम आलेख लोकोक्तियों पर है। लोकोक्ति अर्थात लोक की उक्ति। लोक की वही उक्ति स्थायित्व पाती है जिसमें कम शब्दों में बहुत कुछ कह दिया गया हो। जिसमें संदेश हो, शिक्षा हो, चुटीलापन हो और जो स्मृति में अपना स्थान बना कर जबान पर चढ़ जाए और बार-बार बोली जाए। डॉ. चन्द्रिका प्रसाद ‘‘चन्द्र’’ ने ‘‘लोकोक्तियाँ: हमारी सांस्कृतिक चेतना की मूलाधार’’ शीर्षक से लिखे गए लेख में लिखा है कि ‘‘लोकोक्तियाँ समय के अनुसार ढलती और बदलती भी रहती हैं। जिन्हें कल तक कोई भी नहीं पूछता था, जो चलन में नहीं थीं, वे भी कभी-कभी अपने को पाव-सेर से आगे पसेरी के भाव से स्थापित होने का दावा करती हैं। शायद इसीलिए कहा गया हो, कि ‘जेऊ रोड चलै न पाबै ओऊ रोड पसेरी तामैं’।’’
दूसरा आलेख अवधी की काव्यात्मक विशेषता के रूप में बरवै छंद पर लिखा गया है। आलेख “बरवै काव्य-परम्परा” में डॉ. रमेश मंगल बाजपेयी ने अवधी काव्य में बरवै छंद के व्यापक प्रयोग पर प्रकाश डालते हुए लिखा है कि “अवधी काव्य के व्यवहृत छन्दों में बरवै का स्थान विशेष है। वह अवधी का दुलारा छन्द है।’’
इस वार्षिकांक में कुल चार आलेख हैं - ‘‘लोकोक्तियाँः हमारी सांस्कृतिक चेतना की मूलाधार’’ - डॉ. चन्द्रिका प्रसाद ‘चन्द्र’, ‘‘बरवै काव्य-परम्परा’’ - डॉ. रमेश मंगल बाजपेयी, ‘‘भारत की गोण्ड जनजाति’’ - डॉ. संजय अलंग, ‘‘समकालीन कविता बनाम नवगीत’’- डॉ. अक्षय पाण्डेय। ‘‘भारत की गोण्ड जनजाति’’ डॉ. संजय अलंग का शोधात्मक लेख है जिसमें उन्होंने गोण्ड जनजाति की उत्पत्ति, गोण्ड साम्राज्य, गोण्ड संस्कृति, रीतिरिवाज़, बोली, जीवनशैली आदि की विस्तृत जानकारी दी है।  डॉ. अक्षय पाण्डेय ने अपने लेख ‘‘समकालीन कविता बनाम नवगीत’’ में इस तथ्य को उद्धृत किया है कि ‘‘नवगीत में मिथकों और सांस्कृतिक प्रतीकों का पुनर्पाठ मिलता है।’’
वार्षिकांक में चार कहानियां हैं। जिनमें गीता शुक्ला ‘‘गीत’’ की बघेली कहानी ‘‘बुढ़ाई के गइलि’’, डॉ. शेषमणि शुक्ल की अवधी कहानी ‘‘जइसि नियति वइसि बरक्कति’’, डॉ. (सुश्री) शरद सिंह की बुंदेली कहानी ‘‘बुकरिया’’ तथा डॉ. विष्णुदेव तिवारी की भोजपुरी कहानी ‘‘सेहुँड़ आ कदम्ब’’ है।
रामनाथ साहू के छत्तीसगढ़ी उपन्यास ‘‘आमापाली के इस्कूल’’ का अंश, जो छत्तीसगढ़ी बोली का साहित्यिक समृद्धि को रेखांकित करता है। चार लघु कथाएं भी शामिल की गई हैं। बघेली में  समरजीत वर्मा ‘बारी’ की लघुकथा ‘‘गरीबी रेखा के कार्ड, बालश्रमिक’’, बुंदेली में सिद्ध नारायण दुबे की ‘‘मैंने कओ तो का, पड़ोसी धर्म’’, छत्तीसगढ़ी में डॉ. शैल चन्द्रा की लघुकथा ‘‘भगवान के नाव म, डर’’ तथा भोजपुरी में अनीता मिश्र ‘‘सिद्धि’’ की लघुकथा ‘‘माई के सपना, मोबाइल वाला मास्टर’’।
डाॅ. विकल ने साहित्य की लगभग सभी बहुप्रचलित विधाओं को इस वार्षिकांक में स्थान देते हुए व्यंग्य और रेखाचित्र को भी स्थान दिया है। अवधी में अजय प्रधान की व्यंग्य ‘‘जीजा से फूफा’’ चुटीला और रोचक व्यंग्य है। लेखिका सुधा वर्मा का छत्तीसगढ़ी रेखा चित्र ‘‘फाफी’’। यह फाफी नामक महिला पर संवेदनात्मक रेखाचित्र है।
‘‘बघेली अंजोर’’ में एक स्थाई स्तम्भ रहता है ‘‘पुरखिन के कोठार से’’। इसमें इस बार डॉ. दुर्गेश दीक्षित की बुंदेली कहानी ‘‘तीसमारखाँ’’ दी गई है। समीक्षा के स्तम्भ में डाॅ. दया दीक्षित के बुंदेली उपन्यास की समीक्षा ‘‘मेरी दृष्टि में: ओरछा की गणेशकुँवरि’’ डॉ. सुषमा त्रिपाठी द्वारा की गई है। इसी स्तम्भ में गीता शुक्ला ‘‘गीत’’ के लघुकथा संग्रह ‘‘को बनाइस’’ की समीक्षा डाॅ. सुषमा त्रिपाठी ने की है।
‘‘अड़ोस-पड़ोस’’ स्तम्भ में भगवती प्रसाद द्विवेदी का ललित निबंध ‘‘हरियरी’’ तथा ‘‘चलत-चलाबत’’ में डाॅ. सुधाकर तिवारी की रचना ‘‘अनन्या, राघव और रामायण’’ है। इसके साथ ही ‘‘रपट’’ के अंतर्गत रीवा शहर के प्रतिष्ठित कृष्णा राजकपूर आडिटोरियम में जनवरी-फरवरी 2026 में हुए पाँच दिवसीय छठवें चित्रांगन इंटरनेशनल फिल्म एवं थिएटर फेस्टिवल 2026 की रिपोर्ट प्रस्तुत की गई है।


कोई भी वार्षिकांक विशेष रूप से जो बोलियों पर केंद्रित हो, काव्य विधा के बिना हो ही नहीं सकता है। डाॅ. ‘विकल’ ने विभिन्न बोलियों में लिखे गए गीत और ग़ज़ल को पर्याप्त स्थान दिया है। गीत विधा में अनूप ‘‘अशेष’’ का ‘‘घुँघरा कस हो, पानी में’’ (बघेली), प्रदीप सारंग का ‘‘करमै पाठ पढ़ावै, बदरिया छाय रही’’ (अवधी), महेश कटारे ‘‘सुगम’’ का ‘‘हा हा दैया, का रै गी है’’ (बुन्देली), मिनेश कुमार साहू का ‘‘मुड़ी-पीरा माटी महतारी के, मुड़ी उल्हापाना (छत्तीसगढ़ी) तथा भालचन्द त्रिपाठी का ‘‘के समझावे, सुख के बिहान मंगली’’ (भोजपुरी) गीत है। ग़ज़लों के क्रम में रामसखा नामदेव की बघेली, डॉ. अशोक अज्ञानी की अवधी, राज सागरी की बुन्देली, जितेन्द्र कुमार ‘‘साहिर’’ की छत्तीसगढ़ी तथा मनोज भावुक की भोजपुरी ग़ज़ल है।
‘‘बघेली अंजोर’’ का यह वार्षिकांक एक समृद्ध विशेषांक है जिसके लिए डाॅ. राम गरीब पाण्डेय ‘‘विकल’’ तथा उनका संपादक मंडल प्रशंसा का पात्र है। बोलियों के उत्थान एवं संरक्षण की दिशा में ‘बघेली अंजोर’’ यूं भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है, उस पर इस वार्षिकांक ने उसकी महत्ता पर चार चांद लगा दिए हैं। वार्षिक अंक का मूल्य 100 रुपए है तथा पत्रिका की वार्षिक राशि मात्र 280 रुपए है। सरकारी विज्ञापन अथवा किसी प्रतिष्ठान के विज्ञापन के बिना इस प्रकार की पत्रिका प्रकाशित करना एक उच्चकोटि का मिशन ही कहा जाएगा। उस पर यह वार्षिकांक न केवल बघेली और उसकी समीपवर्ती बोलियों को नवीन पटल देता है अपतिु बोलियों में हो रहे नवीन सृजन का भी साक्ष्य प्रस्तुत करता है। यह एक संग्रहणीय वार्षिकांक है।         
-------------------------    
#पुस्तकसमीक्षा #डॉसुश्रीशरदसिंह
#DrMissSharadSingh #bookreview #bookreviewer
#पुस्तकसमीक्षक #पुस्तक #आचरण

Tuesday, February 3, 2026

पुस्तक समीक्षा | बोलियों के बहनापे को सुदृढ़ करने वाला अव्यावसायिक त्रैमासिक "बघेली अंजोर" | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा
बोलियों के बहनापे को सुदृढ़ करने वाला अव्यावसायिक त्रैमासिक "बघेली अंजोर"
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
--------------------
त्रैमासिक (अव्यवसायिक)- बघेली अंजोर
संपादक - डॉ राम गरीब पाण्डेय ‘विकल’
प्रकाशक  - बोली विकास मंच, गीतायन, प्लाट नं. 685/19, वाटर फिल्टर प्लांट के सामने, तुलसीनगर नौढ़िया, सीधी (म.प्र.) - 486661
मूल्य - 60/- (वार्षिक रु.280/-)
---------------------


‘‘बघेली अंजोर’’ बघेली एवं समीपवर्ती बोलियों के साहित्य-संस्कृति की पूर्णतः अव्यावसायिक त्रैमासिक पत्रिका जिसके प्रधान सम्पादक हैं डॉ. राम गरीब पाण्डेय श्विकलश्।  उप सम्पादक गीता शुक्ला श्गीतश् तथा सह सम्पादक रामलाल मिश्र, शिवी शुक्ला हैं। बोलियों के विकास के लिए प्रतिबद्ध या पत्रिका प्रमुख पांच बोलियां को साथ लेकर चल रही है - बघेली, अवधी, बुन्देली, छत्तीसगढ़ी एवं भोजपुरी। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि सीधी जिले के महत्वाकांक्षी विद्वान डॉ. राम गरीब पाण्डेय श्विकल’ इस पत्रिका को एक मिशन की तरह आरंभ कर चुके हैं। समीक्ष्य अंक “बघेली अंजोर” का तीसरा अंक है। आज के डिजिटल युग में जब किसी भी प्रकार की पत्रिका प्रकाशित करना एक चुनौती भरा काम है ऐसे कठिन दौर में बोलियो के लिए समर्पित त्रैमासिक प्रकाशित करने का बीड़ा उठाना अपने आप में प्रशंसनीय कार्य है।

      विभिन्न बोलियां के लिए जो संपादन सहयोग दे रहे हैं वे हैं- बघेली में भृगुनाथ पाण्डेय श्भ्रमरश् (रीवा), अवधी में राम प्रसाद शुक्ल (प्रयागराज), भोजपुरी में प्रकाश उदय (वाराणसी), बुन्देली में डॉ. सरोज गुप्ता (सागर) तथा छत्तीसगढ़ी में डॉ. विनोद कुमार वर्मा (बिलासपुर)।
भारत में भाषाई विविधता पर भारी संकट मंडरा रहा है, एक रिपोर्ट के अनुसार लगभग 780 भाषाओं में से 400 के करीब भाषाएँ विलुप्त होने की कगार पर हैं। वैश्वीकरण, शहरीकरण और रोजगार के लिए अंग्रेजी भाषाओं के दबाव के कारण मातृभाषाएं दम तोड़ रही हैं, जिससे सांस्कृतिक और भावनात्मक धरोहर नष्ट हो रही है। भाषा विज्ञानयों के अनुमान के अनुसार अरुणाचल प्रदेश और असम में लगभग 60 जनजातीय भाषाएं 2050 तक खत्म हो सकती हैं। नई पीढ़ी पारंपरिक भाषाओं की जगह प्रमुख भाषाएँ सीख रही है, जिससे भाषा का हस्तांतरण थमता जा रहा है। बोलियों के साथ-साथ मुहावरे, लोकगीत और पारंपरिक ज्ञान भी लुप्त हो रहे हैं। ऐसी स्थिति में बोलियां को बचाना उन्हें संरक्षित एवं संबंधित करना अत्यंत आवश्यक है इस दिशा में “बघेली अंजोर” अपना दायित्व निभाती दिखाई दे रही है।
यहां प्रश्न यह भी उठना है कि अपनी भाषा या अपनी बोली को प्रमुखता दिलाने के लिए किसी तरह की हठधर्मिता या हिंसा का प्रदर्शन किया जाना क्या उचित है? जैसा कि विगत कुछ ऐसे में महाराष्ट्र में कई बार देखा गया है। ”भाषा परिवार” शब्द इसीलिए प्रयुक्त होता है कि अनेक भाषाएं एक साथ सम्मान पूर्वक उपस्थित रहें, विकास करें जैसे मानव परिवार में सभी सदस्य मिलकर रहते हैं और जब सभी मिलकर रहते हैं तभी परिवार समृद्धि शैली हो पता है और सभी सदस्यों का समुचित विकास हो पता है ठीक यही स्थिति भाषाओं और बोलियों की है ।

        डॉ. राम गरीब पाण्डेय ‘विकल’ ने अपने संपादकीय में ‘‘कहब जरूरी है - मामकाः पाण्डवाश्चैव’’ शीर्षक से बघेली में बहुत सही लिखा है कि- “बोली-भाखा क लै के, अबै कुछ समय पहिले महारास्ट्र म बहुत बड़ा हंगामा होइ ग रहा। बिल्लाधारी बहुत दिनन से जड़ान बइठ रहें। बाताबरन म गरमी ले आबै के खातिर, उँ मराठी के समरथन म अइसन दहेंचाल मचाइन, के सगले देस म, सगली दुनिया म धू-धू होय लागि। उँ लिनकर विरोध किहिन, जिनका मारिन-पीटिन, जिनका महारास्ट्र से निकारै के एजेंडा चलाइन, इया बिसरि गें, के महारास्ट्र (बम्बई) के विकास के पहिया खींचे म इनहिन के हाँथ है। इहै मेर कुछ अति उत्साही बिल्लाधारी आपन नाव लिखावै, छपावै के खातिर कहीं न कहीं इया मेर के कसरत करत मिलिन जात है। इया देस म बाइस भासा बोली जाती है। उनहुन के सबके अलग-अलग अनेकन बोली-लोकभासा हई। इया बाति पर बहुत गम्भीरता से सोवै के जरूरति है, के हर बोली-भाखा एक दुसरे क साथ ले के जब चलति है, तब उआ भारत देस के भासा बनति है। कुछ खुराफाती बिल्लाधारी अठमीं अनुसूची के छुरघुरी छाँड़ि के आगी लगाबै के कोसिस लगातार करत रहत हैं औ बिल्ला के मोह म, कुछ जने इया घुरछुरी से बिना सोचे-समझे अपनेन घरे म आगी लगाबै खातिर तयार मिलि जात हैं। उनहीं इया बाति के सुधि नहीं रहै, के सब क साथ ले के चलब, हमरे संस्कृति के पहिचान आय। ष्सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत।। (वृहदारण्यक और तैत्तिरीय उपनिषद) हमरे देस के, हमरे संस्कृति केर सूत्र बाक्य आय।”
जनवरी-मार्च 2026 के इस अंक में जो आलेख दिए गए हैं, वे हैं- भाईलाल शर्मा का “बघेली गद्य-साहित्यरू दशा और दिशा”,   डॉ. शंकर लाल शर्मा का “ब्रज की होलीः विविध रूप-रंग”, डॉ. बिहारीलाल साहू “छत्तीसगढ़ की जनभाषा”, प्रिंस कुमार सेन का आलेख “सभ्यता की विकास-यात्राः नदियों से सड़कों तक”।

      विविध बोलियां में कहानी के अंतर्गत शिवपाल तिवारी की बघेली कहानी “अकरथी”, डॉ. रश्मिशील शुक्ला की अवधी कहानी “मन के जीते जीत”, वन्दना अवस्थी दुबे की बुंदेली कहानी “बड़ी हो गयीं ममता जी”, डॉ. विनोद कुमार वर्मा की छत्तीसगढ़ी कहानी “लँगड़ा कोन”, डॉ. दिनेश पाण्डेय की भोजपुरी कहानी “बरगद लोक” है। यह सभी कहानियां अपने-अपने बोली क्षेत्र की संस्कृतियों का प्रतिनिधित्व करती हैं।
लघुकथाओं के अंतर्गत बघेली में कृष्ण मणि मिश्र की “परबचन” अवधी में भारतेन्दु मिश्र की “कनबतिया”, बुंदेली में डॉ. शरद सिंह की “लुगाइयन की आजादी”, छत्तीसगढ़ी में चोवाराम वर्मा ‘बादल’ की “तुलसी चउरा के दिया” तथा बघेली में शंकर सिंह श्दर्शनश् की लघुकथा “गरे के पट्टा” है।
     इस अंक में कहानियों और लघुकथाओं के साथ ही रामप्रसाद शुक्ल का अवधी व्यंग्य “हमार सिच्छा- प्रायमरी” तथा बलभद्र का भोजपुरी संस्मरण “जो सुमिरत सिधि होय” प्रकाशित है।
“पुरिखन के कोठार से” के अंतर्गत डॉ. विष्णुदेव तिवारी छत्तीसगढ़ी कथा “पइयाँ परत ही चन्दा-सुरुज के” दी गई है। इसके अतिरिक्त पुस्तक समीक्षा एवं पांचों बोलियों के विविध गीत भी इस अंक में समाहित हैं, जिससे यह अंक समग्रता समेटे हुए है। गीतों में परदेसी न आये - गीता शुक्ला ‘गीत’ (बघेली), दुइ बूँद आँसु - विनय विक्रम सिंह ‘मनकही’ (अवधी), आज विदा भई मुनियां की - डॉ कृष्ण कुमार नेमा ‘निर्झर’ (बुंदेली), सुरता आथे - धनराज साहू (छत्तीसगढ़ी), माथे अंचरा जोगवलीं - डॉ कमलेश राय (भोजपुरी।
ग़ज़लों में विनय मिश्र ‘प्रांजल’ (बघेली), डॉ. अशोक ‘अज्ञानी’ (अवधी), पूरनचन्द्र गुप्ता (बुन्देली), शिव ‘निश्चिन्त’ (छत्तीसगढ़ी) सुभाष पाण्डेय ‘संगीत’ (भोजपुरी) गजलें हैं।
शिव ‘निश्चिन्त’ की छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल के ये कुछ शेर देखिए-

जियत आदमी देख जिन होगे भइया।
सुमत के ये रद्दा कठिन होगे भइया।
कुँवारा हे भिंदोल अब ले बिचारा, ये मेचका के कबछिन लगिन होगे भइया।
जे टूरी के नयना मया बान छोड़िस, त टूरा के मन ह हरिन होगे भइया।

इसी तरह कुछ शेर सुभाष पाण्डेय ‘संगीत’ की भोजपुरी के -
आजु पहिले पहिल, कुछ नफा हो गइल।
नैन मिलते, दरद सब दफा हो गइल।
न सुनाई सुनाई बताईं रहीं मनगुमे, जिंदगी के, इहे फलसफा हो गइल।
जान के जान से, जान जुड़ि के रहे, आशिकी में, इहे तोहफा हो गइल।
प्रीत के आँखि पर, जबसे चश्मा चढ़ल, जे रहे बेवफा, बावफा हो गइल।
    
ये ग़ज़लें अन्य भाषाओं की ग़ज़लों से कहीं भी काम नहीं ठहरती हैं। इनमें वही संवाद और रवानी है जो हिंदी उर्दू की ग़ज़लों में रहती है।

इस प्रकार “बघेली अंजोरा” का यह अंक पांचों बोलियों - बघेली, अवधी, बुन्देली, छत्तीसगढ़ी एवं भोजपुरी की प्रतिनिधि रचनाओं का सुंदर पिटारा है, जिसमें पांचों भौगोलिक क्षेत्रों की सोंधी मिट्टी की महक समाई हुई है जिसे उनके शब्दों के द्वारा अनुभव किया जा सकता है। यूं भी क्षेत्रीय बोलियां किसी क्षेत्र विशेष की सांस्कृतिक पहचान, समृद्ध परंपराओं और लोक-संस्कृति की संवाहक होती हैं। ये न केवल आपसी संवाद को सहज और आत्मीय बनाती हैं, बल्कि स्थानीय ज्ञान, साहित्य, और इतिहास को पीढ़ियों तक संरक्षित रखती हैं। सामाजिक एकता, अस्मिता और भाषाई विविधता के लिए इनका महत्व अत्यंत व्यापक है। इस अंक में संगीत सभी रचनाएं अपनी अपनी बोलियां से न केवल परिचय कराने में सक्षम है बल्कि दूसरी बोली बोलने वाले पाठक के लिए भी एक नई बोली से जुड़ने का अवसर प्रदान करती हैं। जब एक ही ज़िल्द में विभिन्न बोलियों की रचनाएं संग्रहित रहेंगी तो स्वाभाविक है कि अपनी बोली की रचना को पढ़ने के उपरांत दूसरी बोली की रचना पर भी ध्यान जाएगा तथा उसे पढ़ने और समझने का मन स्वाभाविक रूप से करेगा। यह कोई बलात प्रयास नहीं है अपितु सहज आग्रह है, जो रचना स्वयं ही करती है।
किसी भी बोली की अपनी एक जातीय पहचान होती है। यह जातीय पहचान ही उस बोली को अन्य बोलियों से अलग कर के स्वतंत्र अस्तित्व का स्वामी बनाती है।  प्रत्येक बोली की अपनी एक भूमि होती है जिसमें वह पलती, बढ़ती और विकसित होती है। इस जातीय पहचान को बनाए रखना साझा दायित्व होता है। बोलियों के हित में  “बघेली अंजोर” का संपादन एवं प्रकाशन करने हेतु इसके प्रधान संपादक डॉ. राम गरीब पाण्डेय ‘विकल’ बधाई के पात्र हैं। इस पत्रिका को पढ़कर उनके इस प्रयास को समर्थन दिया जाना चाहिए।
---------------------------
#पुस्तकसमीक्षा #डॉसुश्रीशरदसिंह  #bookreview #bookreviewer
#पुस्तकसमीक्षक #पुस्तक #आचरण #DrMissSharadSingh