चर्चा प्लस
मतदाता सूची की शुद्धता का विवाद और लोकतंत्र का भविष्य
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
मतदाता सूची (इलेक्टोरल रोल) का शुद्ध और त्रुटिहीन होना फर्जी और दोहरे मतदान पर रोक लगाने के लिए आवश्यक है। यदि मतदाता सूची शुद्ध नहीं होगी, तो एक ही व्यक्ति का नाम कई निर्वाचन क्षेत्रों या एक ही क्षेत्र में एक से अधिक बार (डुप्लीकेट एंट्रीज) दर्ज हो सकता है। शुद्धीकरण से ऐसे दोहरे नामों को हटाया जाता है जिससे बोगस या फर्जी वोटिंग की संभावना खत्म होती है। वस्तुतः लोकतंत्र की वास्तविकता उसकी संवाद क्षमता, सहमति और कानून के सम्मान में है। विरोध और असहमति लोकतंत्र का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन जब विरोव अराजकता और भीड के दबाव में बदलता है, तब वह लोकतांत्रिक ढांचे के लिए चुनौती बन जाता है। लेकिन मतदाता सूची शुद्धता पर उंगली उठ रही है। आरोप लग रहे हैं। चूक कहां हो रही है?
मतदाता सूची की शुद्धता से भला किसका और क्यों विरोध हो सकता है? लेकिन विरोध हो रहा है और विरोध करने वालों पास अपने ठोस तर्क हैं। उनका कहना है कि नई सूचियों में कई पुराने योग्य मतदाताओं के नाम गायब है और नए फर्जी मतदाताओं के नाम जोड़े गए हैं। निसंदेह यह प्रशासनिक अक्षमता का मसला है। ऐसा नहीं होना चाहिए। शुद्धता का अर्थ शुद्धता ही होता है। उसका और कोई अर्थ हो ही नहीं सकता। इस ओर सरकार और प्रशासन का ध्यान देना आवश्यक है। अन्यथा मतदाता सूची की शुद्धता का दावा खोखला हो कर रह जाएगा।
भारतीय लोकतंत्र एक ऐसी संसदीय और प्रतिनिधि लोकतांत्रिक प्रणाली है जहां जनता वोट के माध्यम से अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करती है। यह दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है जो देश के सर्वोच्च संविधान के नियमों पर चलता है। दुर्भाग्यवश वर्तमान परिदृश्य में भीड़तंत्र सर उठाने का निरंतर प्रयास कर रहा है। यह लोकतंत्र को दूषित कर नागरिक अधिकारों का हनन करना चाहता है। इसीलिए भारतीय राजनीति में वर्तमान समय में लोकतंत्र बचाओ, भीड़तंत्र हटाओ एक प्रमुख विषय और अभियान के रूप में उभरा है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने इस समस्या को गंभीरता से संज्ञान में होते हुए अक्टूबर 2026 में विशेष गहन पुनरीक्षण और मतदाता सूची की शुद्धता जैसे मुद्दे पर विपक्ष के विरोध प्रदर्शनों के प्रत्युत्तर में इस एक देशव्यापी अभियान की शुरुआत की है।
लोकतंत्र की रक्षा के लिए मतदाता सूची की शुद्धता सबसे प्राथमिक एवं आवश्यक कनम है। उस अभियान के तहत मतगाता सूचियों के पुनरीक्षण (एसआईआर), अवैध घुसपैठ के मुद्दों और संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा को लेकर जन-जागरूकता बढ़ाई जा रही है। एक सशक्त, पारदर्शी और विश्वसनीय लोकतंत्र की आधारशिला निपक्ष निर्वाचन प्रक्रिया है, और निष्पक्ष चुनाव के लिए मतदाता सूची की शुद्धता बेहद जरूरी है। भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त के अनुसार शुद्ध मतदाता सूची ही लोकतंत्र का असली आधार है। इसके लिए चुनाव आयोग समय-समय पर विशेष गठन पुनरीक्षण जैसे अभियान चलाता है।
मतदाता सूची (इलेक्टोरल रोल) का शुद्ध और त्रुटिहीन होना फर्जी और दोहरे मतदान पर रोक लगाने के लिए आवश्यक है। यदि मतदाता सूची शुद्ध नहीं होगी, तो एक ही व्यक्ति का नाम कई निर्वाचन क्षेत्रों या एक ही क्षेत्र में एक से अधिक बार (डुप्लीकेट एंट्रीज) दर्ज हो सकता है। शुद्धीकरण से ऐसे दोहरे नामों को हटाया जाता है जिससे बोगस या फर्जी वोटिंग की संभावना खत्म होती है।
पात्र नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा स्वस्थ लोकतंत्र में ही हो सकती है। देश के हर उस नागरिक को वोट देने का आकार है जिसने 18 वर्ष की आयु पूरी कर ली है। मतदाता सूची की शुद्धता यह सुनिश्चित करती है कि कोई भी वास्तविक और योग्य मतदाता (एलिजिबल वोटर) अपने इस संवैधानिक अधिकार से वंचित न रह जाए।
अपात्र और मृत व्यक्तियों के नाम हटाना अति आवश्यक है। समय के साथ कई मतदाताओं की मृत्यु हो जाती है या वे उस स्थान को छोड़कर कहीं और चले जाते हैं। यदि उनके (शिफ्टेड वोटर्स के) नाम सूची में बने रहेंगे, तो उनके नाम पर फर्जी मतदान का खतरा रहता है। शुद्धता प्रक्रिया के तहत ऐसे नामों को नियमानुसार हटा दिया जाता है।
चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और जनता का विश्वास हमेशा बने रहना चाहिए। जब मतदाता सूची पारदर्शी और त्रुटिहीन होती है, तो राजनीतिक दलों और आम जनता का चुनाव प्रणाली तथा उसके परिणामों पर अटूट विश्वास बना रहता है। इससे चुनाव के बाद गाली के आरोपों और विवादों की संभावना स्वतः समाप्त हो जाती है। संवैधानिक मूल्यों का पालन आवश्यक है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 326 "वयस्क मताधिकार की गारंटी देता है। मतदाता सूची का शुद्धीकरण इस संवैधानिक भावना को जमीन पर उतारने का एकमात्र माध्यम है, जिससे हर एक वोट का सही मूल्य सुनिश्चित हो सके।
सरल शब्दों में करें तो, गलत मतदाता सूची से गलत जनप्रतिनिधि चुना जा सकता है, जो पूरे लोकतंत्र को कमजोर करता है। इसीलिए मतदाता सूची को पूरी तरह साफ, सटीक और अत्गतन (अपडेट) रखना देश के भविष्य के लिए अनिवार्य है।
गलत मतदाता भीड़ की शक़्ल में लोकतंत्र को हानि पहुंचाते है। इस विषय की गहराई को समझने के लिए सबसे पहले लोकतंत्र और भीड़तंत्र के बुनियादी अंतर को समझना आवश्यक है।
लोकतंत्र नियमों, संविधान, और कानून के शासन पर आधारित होता है। इसमें हर नागरिक को वोट देने का अधिकार होता है और सरकारें तथा प्रतिनिधि एक तय लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चुने जाते हैं। वहीं, जब फैसले या दबाव सड़कों की भीड़, उत्तेजना, या बल के जरिए थोपने की कोशिश की जाती है, तो यह व्यवस्था भीड़तंत्र का रूप ले लेती है। इससे संविधान, अदालतें और लोकतांत्रिक संस्थाएं कमजोर होती हैं।
लोकतंत्र में सर्वोपरि संविधान और कानून की स्थापित प्रक्रिया होती है। यहां हर नागरिक, चाहे वह कितना भी शक्तिशाली वयों न हो, कानून के दायरे में आता है। लोकतंत्र अदालतों, पुलिस, और प्रशासनिक व्यवस्था के माध्यम से न्याय सुनिश्चित करता है। इसमें "दोषी साबित होने तक निर्दोष मानने का सिद्धांत लागू होता है।
लोकतांत्रिक प्रक्रिया में फैसलों के लिए विचार-विमर्श, बहस, और बहुमत का सहारा लिया जाता है। इसमें अल्पसंख्यकों और विरोधियों के विचारों का भी सम्मान किया जाता है।
भीड़तंत्र उस स्थिति को कहते हैं जब कानून और व्यवस्था को ताक पर रखकर एक अनियंत्रित भीड़ अपने हिसाब से न्याय करने या फैसले लागू करने लगती है। इतिहास से लेकर आधुनिक काल तक, विश्व में भीड़तंत्र के कई विनाशकारी उदाहरण देखने को मिले हैं।
प्राचीन रोम में भोजन की कमी या राजनीतिक फैसलों के खिलाफ भीड़ अक्सर हिंसक हो जाती थी। 'ब्रेड एंड सर्कस' (रोटी और मनोरंजन) की नीति भीड़ को शांत रखने के लिए ही बनाई गई थी, लेकिन जब यह विफल होती, तो भीड़ महलों को फूंक देती थी।
फ्रांसीसी क्रांति (1789) का 'आतंक का दौर': राजा लुई सोलहवां के खिलाफ शुरू हुआ आंदोलन बाद में पूरी तरह भीड़तंत्र में बदल गया। जेकोबिन शासन के दौरान, अनियंत्रित भीड़ के दबाव में 'गिलोटीन' (सिर काटने की मशीन) से हजारों निर्दोष लोगों को सरेआम मौत के घाट उतार दिया गया।
अमेरिका में लिंचिंग का दौर (19वीं-20वीं सदी): अमेरिकी गृहयुद्ध के बाद, विशेषकर दक्षिणी राज्यों में, गोरे लोगों की हिंसक भीड़ बिना किसी कानूनी मुकदमे के काले अमेरिकियों को पकड़कर सरेआम फांसी पर लटका देती थी।
आधुनिक और समकालीन उदाहरण देखें तो -
यूएस कैपिटल हिल पर हमला (6 जनवरी, 2021): संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव के नतीजों को पलटने के इरादे से तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समर्थकों की एक उग्र भीड़ ने अमेरिकी संसद (कैपिटल बिल्डिंग) पर धावा बोल दिया। यह आधुनिक लोकतंत्र में भीड़तंत्र का एक सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है।
श्रीलंका का आर्थिक और राजनीतिक संकट (2022): भारी आर्थिक तंगी से गुस्साए लाखों लोगों की भीड़ ने कोलंबो में राष्ट्रपति भवन और प्रधानमंत्री आवास पर कब्जा कर लिया। भीड़ ने कई राजनेताओं के घरों को आग लगा दी और तत्कालीन राष्ट्रपति को देश छोड़कर भागना पड़ा।
बांग्लादेश राजनीतिक संकट (2024): छात्र आंदोलन के हिंसक रूप लेने के बाद उग्र भीड़ ने प्रधानमंत्री शेख हसीना के आवास (गणभवन) पर धावा बोल दिया, जिसके बाद उन्हें इस्तीफा देकर देश छोड़ना पड़ा। इसके बाद भीड़ द्वारा देश के विभिन्न हिस्सों में तोड़फोड़, लूटपाट और चुनिंदा समुदायों व राजनीतिक कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया गया।
भीडतंत्र में कानून को ताक पर रखकर, केवल संख्या बल के आधार पर फैसले सड़कों पर किए जाते है। भीड़ न ती साक्ष्य देखती है और न ही किसी को अपनी बात रखने का मौका देती है। वह स्वयं ही जाचकर्ता, न्यायाधीश और जल्लाद की भूमिका में आ जाती है। भीड़तंत्र तार्किकता से नहीं बल्कि भावनाओं और उत्तेजना से संचालित होता है। यहां असहमति के लिए कोई स्थान नहीं होता और हिंसा को ही अंतिम उपाय मान लिया जाता है।
इसीलिए जागरूकता अभियान के आवश्यकता का अनुभव किया गया। यह अभियान अवटूबर 2026 के अंतिम सप्ताह से शुरू होकर नवंबर 2026 तक के लिए फिलहाल निर्धारित है, जिसके तहत जिला मुख्यालयों पर पदयात्राएं और बौद्धिक संवाद आयोजित किया जाना तय किया गया है।
भीडतंत्र का सबसे अधिक दुष्प्रभाव युवाओं पर पड़ता है। युवाओं से संवाद पर विशेष जोर दिया गया है। युवाओं से संवाद के लिए महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों और युवाओं के बीच जाकर लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और मतदान के महत्व पर चर्चा की जाना तय है।
वस्तुतः लोकतंत्र की वास्तविकता उसकी संवाद क्षमता, सहमति और कानून के सम्मान में है। विरोध और असहमति लोकतंत्र का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन जब विरोध अराजकता और भीड़ के दबाव में बदलता है, तब वह लोकतांत्रिक ढांचे के लिए चुनौती बन जाता है। "लोकतंत्र बचाओ, भीड़तंत्र हटाओ का संदेश यही याद दिलाता है कि देश की व्यवस्था भीड़ से नहीं, अपितु संविधान और कानून से चलनी चाहिए। -----------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 29.10.2026 को प्रकाशित)
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