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Friday, March 15, 2024

शून्यकाल | ऐजेंडा में सबसे ऊपर हो बलात्कार-मुक्त समाज | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

दैनिक नयादौर में मेरा कॉलम...      
शून्यकाल
ऐजेंडा में सबसे ऊपर हो बलात्कार-मुक्त समाज
      - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
       सन् 2024 का चुनावी महासमर सामने है और सभी महारथी अपनी- अपनी कमर कस रहे हैं। सभी के अपने ऐजेंडा तैयार हो रहे हैं। बेशक सभी का ध्यान जनता की जरूरतों की ओर अटका रहेगा। आश्वासनों की थैलियां खुलती रहेंगी। किन्तु एक मुद्दा ऐसा है जिसे झूठे आश्वासन नहीं बल्कि एक शपथ के रूप में राजनीतिक दलों को अपने ऐजेंडा में सबसे ऊपर रखना ही होगा, वह है - बलात्कार-मुक्त समाज। क्योंकि, हर पंद्रह मिनट में बलात्कार की एक घटना आंकड़े के साथ कोई भी राजनीतिक दल अच्छे शासन का दम भर सकता है?
   माना जाता है कि राजनीति में कुछ भी संभव है। अपने ही भ्रम में जीने वाला राजनीतिक दल कब जड़ से उखड़ जाए इसका ठिकाना नहीं है। लेकिन इस भ्रम को तोड़ने वाली सबसे बड़ी शक्ति है जनता की इच्छाशक्ति। जनता क्या चाहती है इसका ध्यान रखना हर राजनीतिक दल के लिए जरूरी है। जो यह ध्यान नहीं रखता है, जनता भी उसका ध्यान नहीं रखती है। यही तो लोकतंत्र है। सन् 2024 का चुनावी महासमर सामने है और सभी महारथी अपनी-अपनी कमर कस रहे हैं। सभी के अपने ऐजेंडा तैयार हो रहे हैं। बेशक सभी का ध्यान जनता की जरूरतों की ओर अटका रहेगा। आश्वासनों की थैलियां खुलती रहेंगी। किन्तु एक मुद्दा ऐसा है जिसे झूठे आश्वासन नहीं बल्कि एक शपथ के रूप में राजनीतिक दलों को अपने ऐजेंडा में रखना ही होगा, वह है - बलात्कार-मुक्त समाज। 
 मध्यप्रदेश सरकार ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ के मुद्दे को ले कर बड़ी जागरूक रही है किन्तु इसी मध्यप्रदेश में लगभग हर दूसरे दिन बलात्कार की एक घटना घटित होने लगी है। ऐसा नहीं है कि यह अपराध सिर्फ़ मध्यप्रदेश में नहीं वरन् समूचे देश को कलंकित कर रहा है। लेकिन मध्यप्रदेश प्रदेश के पुलिस मुख्यालय ने  मार्च 2018 में एक चौंकाने वाला खुलासा किया था कि मध्यप्रदेश देश का पहला ऐसा राज्य बन गया है, जहां साल भर में पांच हजार से अधिक महिलाओं और नाबालिगों से बलात्कार और छेड़छाड़ के मामले सामने आये हैं। वर्ष 2022 में जारी नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार महिलाओं से अपराध के मामले में राजस्थान पहले नंबर पर रहा है तो तीसरा नंबर मध्य प्रदेश का रहा। शारीरिक शोषण के 1445 मामले प्रदेश में दर्ज हुए। महाराष्ट्र में 2796 केस इस मामले में दर्ज हुए तो मध्य प्रदेश में 3049 महिलाएं छेड़खानी की शिकार हुई। महिला दुष्कर्म के मामले भी प्रदेश में बढ़े। देश में मध्य प्रदेश इस मामले में तीसरे स्थान पर रहा। पूरे देश में वर्ष 2022 में दुष्कर्म के 31 हजार से ज्यादा केस दर्ज हुए हैं। उनमें से राजस्थान में 5399, उत्तर प्रदेश में 3690 और मध्य प्रदेश में 3039 केस दर्ज हुए। बुंदेलखंड में भी कुछ ऐसे ही आंकड़े हैं। 
     बलात्कार हत्या से भी जघन्य अपराध है। हत्यारा हत्या कर के एक जीवन का अंत कर देता है किन्तु बलात्कारी बलात्कार कर के एक जीवन को एक झटके में सारे समाज से काट देता है और एकाकी , भयभीत जीवन जीने को विवश कर देता है। मध्य प्रदेश सरकार ने 12 साल या उससे कम उम्र की लड़कियों के साथ बलात्कार के दोषियों को फांसी की सजा देने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। दण्ड संहिता की धारा 376ए और 376 डीए के रूप में संशोधन किया गया और सजा में वृद्धि के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई है। इसके अलावा लोक अभियोजन की सुनवाई का अवसर दिए बिना जमानत नहीं होगी। इस विधेयक को विधानसभा में पारित कर केंद्र सरकार को भेजा जाएगा। मृत्युदंड को अमल में लाने के लिए दुष्कर्म की धारा 376 में ए और एडी को जोड़ा जाएगा, जिसमें मृत्युदंड का प्रावधान होगा। सरकार ने बलात्कार मामले में सख्त फैसला लेते हुए आरोपियों के जमानत की राशि बढ़ाकर एक लाख रुपये कर दी। इस तरह मध्य प्रदेश देश का पहला राज्य बन गया, जहां बलात्कार के मामले में इस तरह के कानून के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई। साथ ही शादी का प्रलोभन देकर शारीरिक शोषण करने के आरोपी को सजा के लिए 493 क में संशोधन करके संज्ञेय अपराध बनाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई। महिलाओं के खिलाफ आदतन अपराधी को धारा 110 के तहत गैर जमानती अपराध और जुर्माने की सजा का प्रावधान किया गया। महिलाओं का पीछा करने, छेड़छाड़, निर्वस्त्र करने, हमला करने और बलात्कार का आरोप साबित होने पर न्यूनतम जुर्माना एक लाख रुपए लगाया जाएगा। भाजपा ने 12 वर्ष से कम आयु की बच्ची से बलात्कार के मामले में दोषी पाए जाने पर मृत्युदंड सहित कठोर दंड वाले प्रावधान संबंधी इस अध्यादेश को ऐतिहासिक करार दिया था तब वहीं विपक्षी दलों ने सवाल किया था कि सरकार को यह कदम उठाने में इतना समय क्यों लग गया? दूसरी ओर देश भर के बाल अधिकार कार्यकर्ताओं ने 12 साल से कम उम्र की बच्चियों से बलात्कार के मामले में मौत की सजा का प्रावधान करने के लिए पॉक्सो कानून में संशोधन के सरकार के फैसले का विरोध किया। केंद्रीय कैबिनेट ने 12 साल से कम उम्र की बच्चियों से बलात्कार के दोषियों को मौत की सजा देने की अनुमति देने वाले एक अध्यादेश को मंजूरी दी। इसके साथ ही देश की राजनीति गरमा उठी। पक्ष अपनी पीठ ठोंकता रहा तो विपक्ष खामियां गिनाता रहा। इसी दौरान राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) के पूर्व सदस्य विनोद टिक्कू ने कहा कि ‘‘मुझे आशंका है कि मौत की सजा का प्रावधान हो जाने पर ज्यादातर लोग बच्चियों से बलात्कार के मामले दर्ज नहीं कराएंगे क्योंकि ज्यादातर मामलों में परिवार के सदस्य ही आरोपी होते हैं। दोषसिद्धि दर भी और कम हो जाएगी।’’ 
वहीं कुल 86 प्रतिशत मामले लंबित रहे। संक्षेप में कहा जाए तो इन आंकड़ों के अनुसार देश में हर घंटे में चार बलात्कार हुए, अर्थात हर पंद्रह मिनट में एक बलात्कार। निर्भया बलात्कार (16 दिसंबर 2012) केस के बाद कानूनों में बदलाव किये गये, कानूनों को पहले से ज्यादा सख्त बनाया गया इस उम्मीद में कि शायद महिलाओं के साथ होने वाली आपराधिक वारदात कुछ कम होंगी लेकिन ऐसा हुआ नहीं। जितने कानून बन रहे हैं उससे दोगुनी गति से अपराध कारित हो रहे हैं। क्या कानून को लागू करने में कहीं कोई चूक हो रही है या फिर कोई और कारण है? इस कारण का पता लगाना और इसे दूर कर महिलाओं के लिए स्वच्छ, निर्भय समाज बनाना अब जरूरी हो चला है।  
     आज के ग्लोबल युग में भारत में घटने वाली घटना विश्व के कोने-कोने तक असर डालती है। विचारणीय है कि दुनिया के लगभग हर देश में भारतीय समुदाय रहता है। वह समुदाय क्या इन घटनाओं पर विदेशियों के सामने अपना सिर उठा पाता होगा? दुनिया के सामने देश की छवि तो बिगड़ ही रही है और स्वयं देश के अंदर महिलाएं भयभीत हो कर जीने को विवश हो रही हैं। जब आंकड़े हर पंद्रह मिनट में एक बलात्कार तक जा पहुंचे हों तो क्या इस आंकड़े के साथ कोई भी राजनीतिक दल अच्छे शासन का दम भर सकता है? इस मुद्दे पर तमाम राजनीतिक दलों को आत्ममंथन करना होगा अपना चुनावी एजेंडा तय करने से पहले और इसे प्रथमिकता देनी होगी। जब तक देश की महिलाएं सुरक्षित नहीं होंगी तक तक देश सही अर्थ में ‘‘विश्व गुरु’’ नहीं कहला सकता है। यदि देश को दुनिया के पटल पर गौरव दिलाना है तो चुनावी ऐजेंडा में बलात्कार मुक्त समाज की अवधारणा को प्राथमिक रूप से रखना होगा।
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Sunday, June 3, 2018

चर्चा प्लस ... युवाशक्ति शतरंज का मोहरा नहीं ... डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस
युवाशक्ति शतरंज का मोहरा नहीं
- डॉ. शरद सिंह

कभी व्यापम घोटाला तो कभी शिक्षा जगत के एक्सपेरीमेंट्स, कभी माता-पिता की उच्चाकांक्षाओं का दबाव, कभी योग्यता और भविष्य से खिलवाड़, कभी बेरोजगारी की चक्की के पाटों में पिसना तो कभी सोशल मीडिया का संजाल और इन सबके साथ राजनीति का निशाना बनना, कभी-कभी ठीक वैसा ही प्रतीत होता है जैसे युवा किसी शतरंज की बिसात के मोहरे हों, जिन्हें चाहे तिरछी चाल चलाएं या ढाई घर कुदाएं। क्या सचमुच युवा शतरंज के मोहरे हैं? या फिर यह एक दुःस्वप्न है।
चर्चा प्लस ... युवाशक्ति शतरंज का मोहरा नहीं ... डॉ. शरद सिंह .. Article for Column - Charcha Plus by Dr Sharad Singh in Sagar Dinkar Dainik
 सभी जानते हैं कि युवा शक्ति वह धारा है जो जिधर भी मुड़ जाए, उधर का दृश्य बदल देती है। यदि निर्माणात्मक क्षेत्र में युवाओं का उपयोग किया जाए तो वह देश के विकास में चार चांद लगा सकती है, दुनिया से अपना लोहा मनवा सकती है लेकिन यदि उसे विध्वंस के कार्यों में लगा दिया जाए तो एक शांत प्रदर्शन पल भर में हिंसक बलवे में बदल सकता है। अपार शक्ति के यही युवा जब धन लोलुप भ्रष्टाचारियों के हाथों छले जाते हैं तो उनका समूचा भविष्य अंधकार की गर्त्त में समा जाता है। व्यापम घोटाला इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है।
व्यावसायिक परीक्षा मण्डल पर विभिन्न व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के लिए और सरकारी नौकरियों में भर्ती के लिए प्रवेश के लिए बड़े पैमाने पर प्रतियोगी परीक्षाओं के संचालन की जिम्मेदारी थी। व्यापम घोटाले में सरकारी अधिकारियों, नेताओं और बिचौलियों के बीच मिलीभगत से अयोग्य उम्मीदवारों को रिश्वत के बदले परीक्षा में उच्च अंक दिला कर उन्हें उत्तीर्ण कराया गया। अयोग्य परीक्षार्थियों के स्थान पर मोटी रकम के बदले अन्य योग्य छात्रों को जिनमें पूर्व चयनित मैरिट उम्मीदवारों से परीक्षा में उम्मीदवार के तौर पर परीक्षाएं दिलाई गईं। जिस के लिए परीक्षा प्रवेश कार्ड पर असली परीक्षार्थी की तस्वीर नकली परीक्षार्थी की तस्वीर से बदल दी गयी तथा परीक्षा के बाद जिसे पुनः मूल रूप में में ले आया गया। यह कारनामा व्यापम के भ्रष्ट अधिकारियों के साथ मिलीभगत में किया गया। इसके साथ ही अयोग्य उम्मीदवारों को नकली परीक्षार्थियों के साथ पूर्व निर्धारित स्थान पर इस तरह बैठाया जाता था कि नक़ल और आंसर शीट्स की अदलाबदली आसानी से की जा सके। इस के लिए बिचौलियों के माध्यम से व्यापम के भ्रष्ट अधिकारियों को मोटी रकमों का भुगतान किया जाता। इतना ही नहीं बल्कि अयोग्य उम्मीदवारों से उत्तर पुस्तिका ख़ाली छुड़वा दी जाती और परीक्षा के बाद इन उत्तर पुस्तिकाओं में उत्तर चिन्हित कर दिए जाते। कुछ मामलों में व्यापम के भ्रष्ट अधिकारियों और बिचौलियों की मिलीभगत से अयोग्य उम्मीदवारों को परीक्षा से पहले ही उत्तर कुंजी उपलब्ध कराई गई।
व्यापम घोटाले में पहली एफआईआर छतरपुर जिले में सन् 2000 में दर्ज़ की गयी थी। सन् 2004 में खंडवा जिले में सात और मामले दर्ज किए गए। इसके बाद इंदौर के सामाजिक कार्यकर्ता आनंद राय ने घोटाले में जांच का अनुरोध करते हुए एक जनहित याचिका दायर की। सन् 2009 में, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आरोपों की जांच के लिए मेडिकल शिक्षा के संयुक्त निदेशक की अध्यक्षता में एक जांच समिति का गठन किया। सन् 2014 की 15 जून को एसटीएफ ने निविदा शिक्षकों की भर्ती घोटाले में कथित संलिप्तता के चलते राज्य के पूर्व तकनीकी शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा को गिरफ्तार किया। तदोपरांत, 18 और 19 जून 2014 को पुलिस ने पीएमटी घोटाले में भागीदारी के आरोप में राज्य के विभिन्न स्थानों से 100 से अधिक मेडिकल छात्रों को गिरफ्तार किया। सितम्बर 2014 में एसटीएफ ने ख़ुलासा किया कि जगदीश सागर का रैकेट भारतीय स्टेट बैंक में भर्ती और अन्य राष्ट्रीयकृत बैंकों के लिए प्रवेश परीक्षा की धांधली में भी शामिल है तथा इन प्रवेश परीक्षाओं में बैंकिंग कार्मिक चयन संस्थान परीक्षा और भारतीय स्टेट बैंक प्रोबेशनरी ऑफिसर परीक्षा में भी गड़बड़ी के तथ्य सामने आए। जांच के दौरान व्यापम से जुड़े कई लोगों की संदेहास्पद मुत्यु हुई। फिर भी इस मामले में यदि किसी का सबसे अधिक नुकसान हुआ तो वह युवाओं का। बेरोजगारी से त्रस्त युवा को यदि उसकी योग्यता से बढ़ कर रोजगार का सुनहरा सपना दिखा कर भ्रमित कर दिया जाए तो उसे जाल में फंसते देर नहीं लगेगी। यही हुआ व्यापम के अंतर्गत। भ्रष्टाचारियों ने युवाओं को अपना आसान शिकार बनाया और उन्हें ठगते चले गए।
युवा वर्ग जो अपनी शिक्षण आयु से गुजर रहा होता है उसे एक विश्वसनीय शिक्षा प्रणाली प्रदान करने के बजाए अकसर नए-नए प्रयोगों में झोंक दिया जाता है। सन् 2017 में सीबीएसई ने 2009 से चले आ रहे संबंद्ध स्कूलों की छठी से नौवीं कक्षाओं के लिए निरंतर और व्यापक मूल्यांकन (सीसीई) प्रणाली को अमान्य कर दिया था क्योंकि बोर्ड को छठी से नौवीं कक्षा के लिए यूनिफॉर्म असेसमेंट स्कीम लागू करना था। इससे एक जैसा एग्जामिनेशन सिस्टम व रिपोर्ट कार्ड होने के बाद माइग्रेशन पर दूसरे राज्य में जाने वाले स्टूडेंट्स का दाखिला आसान हो जाएगा। इरादे नेक थे लेकिन मार्च 2018 में सीबीएसई पेपर लीक ने देश के लाखों बच्चों की प्रतिभा के साथ खिलवाड़ किया। इस संबंध में कपिल सिब्बल ने टिप्पणी की कि ‘‘परीक्षा प्रणाली में बदलाव करने का सरकार का फ़ैसला उलटा पड़ गया है। पहले प्रश्नपत्रों के अलग-अलग सेट होते थे, इस बार एक ही सेट पूरे देश में चलाया गया।’’
मार्च, 2018 में ही मध्यप्रदेश की राज्यपाल आनंदी बेन पटेल ने कहा कि मप्र के विश्वविद्यालयों की परीक्षाएं सीसीटीवी कैमरों की निगरानी में हों। आनंदी बेन राज्यपाल होने के नाते प्रदेश सरकार के सभी विश्वविद्यालयों की कुलाधिपति भी हैं। परीक्षा प्रणाली को पारदर्शी बनाने पर जोर देते हुए मध्यप्रदेश की राज्यपाल आनंदी बेन पटेल ने कहा कि राज्य सरकार के विश्वविद्यालयों की आगामी परीक्षाएं सीसीटीवी कैमरों की निगरानी में आयोजित करायी जाएं। यानी शिक्षा जगत जिसे मंदिर के समान पवित्र और निष्कलंक माना जाता रहा, वह आज किसी ख्ुली जेल में बदलता जा रहा है जिसमें गोया हर विद्यार्थी अपराधी हो और उसे सीसीटीवी के निगरानी में रहना जरूरी हो। यदि आज एक गर्वनर परिक्षार्थियों के लिए सीसीटीवी की निगरानी की इच्छा प्रकट कर रही हैं तो इसका मतलब यह नहीं है कि आज ही सारी गड़बड़ी हुई हो। यह तो वर्षों से चली आ रही शैक्षिक दुरावस्था का कुपरिणाम है आज विद्यार्थियों को शिक्षण व्यवस्था पर भरोसा नहीं रहा और शिक्षण व्यवस्था का विद्यार्थियों पर से भरोसा उठ गया है। दरअसल शिक्षण व्यवस्था की बिसात पर विद्यार्थी वे युवा हैं जो अपने माता-पिता की उच्चाकांक्षाओं को पूरा करने की दौड़ में 500 में 500 लाने की होड़ में अपनी स्वाभाविकता गवां रहे हैं और समय से पहले कठिन जिम्मेदारियों के पाले में खड़े किए जा रहे हैं।
युवाशक्ति के राजनीतिक से संबंध कोई नए नहीं हैं। छात्रसंघों को राजनीतिक जीवन की प्राथमिक पाठशाला कहा गया है। पहले डॉ. राम मनोहर लोहिया के आंदोलन और बाद में जेपी आंदोलन ने युवाओं पर बहुत व्यापक प्रभाव डाला था। लोहिया की सामाजिक-राजनीतिक सक्रियता ने जहां युवाओं को राजनीति से जोड़कर सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों पर जागरूक किया तो जेपी ने व्यवस्था की चूलें हिला दी थीं। इन्हीं आंदोलनों की प्रेरणा थी कि भारतीय राजनीति में लालू यादव, नीतीश कुमार, शरद यादव, मुलायम सिंह, सुशील मोदी जैसे समाजवादी नेताओं की एक पूरी पीढ़ी तैयार हुई। भाजपा के रविशंकर प्रसाद, अरुण जेटली, सुषमा स्वराज और विजय गोयल छात्रसंघ से आए हुए नेता हैं। कांग्रेस के सीपी जोशी, अजय माकन, भाकपा के डी. राजा, सीताराम येचुरी, तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी भी छात्रसंघ की उपज हैं। अकेले इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ से शंकरदलाय शर्मा, मदनलाल खुराना, विजय बहुगुणा, जनेश्वर मिश्र, चंद्रशेखर, वीपी सिंह, अर्जुन सिंह जैसे नेता और सुभाष कश्यप जैसे प्रशासक और संविधानविद निकले। जेएनयू का छात्रसंघ इस मामले में सबसे ज्यादा सक्रिय है और लगातार जनहित के मुद्दे उठाता रहा है। किन्तु विश्वविद्यालयों में छात्रसंघ चुनाव कराए जाएं या नहीं, इसे लेकर यूपीए सरकार ने पूर्व चुनाव आयुक्त जेएम लिंगदोह की अध्यक्षता में कमेटी का गठन किया था। सन् 2006 में लिंगदोह कमेटी ने अपनी रिपोर्ट सौंपी जिसमें कई तरह के दिशा-निर्देश और सिफारिशें थीं। कमेटी ने छात्रसंघ उम्मीदवारों की आयु, क्लास में उपस्थिति, शैक्षणिक रिकॉर्ड औैर धनबल-बाहुबल के इस्तेमाल आदि की समीक्षा करते हुए कई सिफारिशें की थीं। इस कारण तमाम योग्य छात्र न सिर्फ छात्रसंघ चुनाव लड़ने से वंचित हो गए, बल्कि एक तरह से छात्रसंघों की नकेल विश्वविद्यालय प्रशासन के हाथों में दे दी गई। लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों का देश भर में विरोध हुआ, लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने छात्रसंघ चुनावों के लिए लिंगदोह की सिफारिशों को बाध्यकारी कर दिया। वहीं इसके उलट नए वोटर के रूप में युवाशक्ति को देखते हुए आज भी प्रत्येक दिग्गज नेता विद्यार्थियों को अपनी ओर करने का प्रयास करता है। उन्हें ये विद्यार्थी उन मोहरों के की भांति दिखाई देते हैं जो उन्हें सत्ता सुंदरी से मिलवा सकते हैं।
चाहे माता-पिता हों या राजनेता अथवा शिक्षाविद् - इन्हें युवाओं को उचित दिशानिर्देश देना चाहिए, सही रास्ता दिखाना चाहिए न कि अपनी उच्चाकांक्षाओं की शतरंज के मोहरे बना कर चलाना चाहिए। वहीं युवाओं को भी जो कि अपनी पिछली पीढ़ी के सुवाओं से कहीं अधिक समझदार और दुनियादार हैं, उन्हें भी भ्रष्टाचारियों के हाथों अपनी योग्यता का दोहन नहीं होने देना चाहिए। युवाओं को हर कदम पर यह साबित करना चाहिए कि वे योग्य हैं, संयमी हैं, शांत हैं लेकिन किसी भी शतरंज के मोहरे नहीं हैं।
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( दैनिक सागर दिनकर, 31.05.2018 )
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Tuesday, May 29, 2018

चर्चा प्लस ... ऐजेंडा में सबसे ऊपर हो बलात्कार-मुक्त समाज ... डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस
ऐजेंडा में सबसे ऊपर हो बलात्कार-मुक्त समाज
- डॉ. शरद सिंह
सन् 1919 का चुनावी महासमर सामने है और सभी महारथी अपनी-अपनी कमर कस रहे हैं। सभी के अपने ऐजेंडा तैयार हो रहे हैं। बेशक सभी का ध्यान जनता की जरूरतों की ओर अटका रहेगा। आश्वासनों की थैलियां खुलती रहेंगी। किन्तु एक मुद्दा ऐसा है जिसे झूठे आश्वासन नहीं बल्कि एक शपथ के रूप में राजनीतिक दलों को अपने ऐजेंडा में सबसे ऊपर रखना ही होगा, वह है - बलात्कार-मुक्त समाज। क्योंकि, हर पंद्रह मिनट में बलात्कार की एक घटना आंकड़े के साथ कोई भी राजनीतिक दल अच्छे शासन का दम भर सकता है?

चर्चा प्लस ... ऐजेंडा में सबसे ऊपर हो बलात्कार-मुक्त समाज ... डॉ. शरद सिंह , डाॅ. शरद सिंह ... चर्चा प्लस  Article for Column - Charcha Plus by Dr Sharad Singh in Sagar Dinkar Dainik

कर्नाटक चुनाव ने देश के राजनीति परिदृश्य में एक नए अध्याय पर अपनी मुहर लगा दी है। जो दल पिछड़ते दिखाई पड़ रहे थे वे एक बार फिर ताल ठोंक कर सामने आ खड़े हुए हैं और जो सबसे आगे नज़र आ रहे थे वे लड़खड़ा गए। इसीलिए माना जाता है कि राजनीति में कुछ भी संभव है। अपने ही भ्रम में जीने वाला राजनीतिक दल कब जड़ से उखड़ जाए इसका ठिकाना नहीं है। लेकिन इस भ्रम को तोड़ने वाली सबसे बड़ी शक्ति है जनता की इच्छाशक्ति। जनता क्या चाहती है इसका ध्यान रखना हर राजनीतिक दल के लिए जरूरी है। जो यह ध्यान नहीं रखता है, जनता भी उसका ध्यान नहीं रखती है। यही तो लोकतंत्र है। सन् 1919 का चुनावी महासमर सामने है और सभी महारथी अपनी-अपनी कमर कस रहे हैं। सभी के अपने ऐजेंडा तैयार हो रहे हैं। बेशक सभी का ध्यान जनता की जरूरतों की ओर अटका रहेगा। आश्वासनों की थैलियां खुलती रहेंगी। किन्तु एक मुद्दा ऐसा है जिसे झूठे आश्वासन नहीं बल्कि एक शपथ के रूप में राजनीतिक दलों को अपने ऐजेंडा में रखना ही होगा, वह है - बलात्कार-मुक्त समाज।
मध्यप्रदेश सरकार ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ के मुद्दे को ले कर बड़ी जागरूक रही है किन्तु इसी मध्यप्रदेश में लगभग हर दूसरे दिन बलात्कार की एक घटना घटित होने लगी है। ऐसा नहीं है कि यह अपराध सिर्फ़ मध्यप्रदेश में नहीं वरन् समूचे देश को कलंकित कर रहा है। लेकिन मध्यप्रदेश प्रदेश के पुलिस मुख्यालय ने विगत मार्च 2018 में एक चौंकाने वाला खुलासा किया कि मध्यप्रदेश देश का पहला ऐसा राज्य बन गया है, जहां साल भर में पांच हजार से अधिक महिलाओं और नाबालिगों से बलात्कार और छेड़छाड़ के मामले सामने आये हैं। आंकड़े के अनुसार वर्ष 2017 में 5310 बलात्कार की घटनाएं प्रदेशभर के थानों में दर्ज हुई हैं। यानी हर दिन लगभग 15 बलात्कार की घटनाएं। वर्ष 2016 के मुकाबले वर्ष 2017 में यहां महिलाओं और नाबालिगों से बलात्कार की घटनाओं में 8.76 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। एनसीआरबी की क्राइम इन इंडिया-2016 रिपोर्ट के मुताबिक, 2016 में उत्तरप्रदेश में हत्या और महिलाओं के खिलाफ हिंसा और अपराध सबसे ज्यादा हुए थे। यहां हत्या के 4,889 (16.1 प्रतिशत ) और महिलाओं के खिलाफ हिंसा व अपराध के 49,262 मामले (14.5 प्रतिशत ) दर्ज किए गए। वहीं, बलात्कार के सबसे ज्यादा 4,882 मामले मध्य प्रदेश में दर्ज हुए, जो कुल घटनाओं का 12.5 प्रतिशत है। 2014 और 15 में भी मध्यप्रदेश में बलात्कार के सबसे ज्यादा मामले दर्ज हुए थे।
बलात्कार हत्या से भी जघन्य अपराध है। हत्यारा हत्या कर के एक जीवन का अंत कर देता है किन्तु बलात्कारी बलात्कार कर के एक जीवन को एक झटके में सारे समाज से काट देता है और एकाकी , भयभीत जीवन जीने को विवश कर देता है। मध्य प्रदेश सरकार ने 12 साल या उससे कम उम्र की लड़कियों के साथ बलात्कार के दोषियों को फांसी की सजा देने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। दण्ड संहिता की धारा 376 ।। और 376 क्। के रूप में संशोधन किया गया और सजा में वृद्धि के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई है। इसके अलावा लोक अभियोजन की सुनवाई का अवसर दिए बिना जमानत नहीं होगी। इस विधेयक को विधानसभा में पारित कर केंद्र सरकार को भेजा जाएगा। मृत्युदंड को अमल में लाने के लिए दुष्कर्म की धारा 376 में ए और एडी को जोड़ा जाएगा, जिसमें मृत्युदंड का प्रावधान होगा। सरकार ने बलात्कार मामले में सख्त फैसला लेते हुए आरोपियों के जमानत की राशि बढ़ाकर एक लाख रुपये कर दी है। इस तरह मध्य प्रदेश देश का पहला राज्य बन गया है, जहां बलात्कार के मामले में इस तरह के कानून के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई है। साथ ही शादी का प्रलोभन देकर शारीरिक शोषण करने के आरोपी को सजा के लिए 493 क में संशोधन करके संज्ञेय अपराध बनाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई है। महिलाओं के खिलाफ आदतन अपराधी को धारा 110 के तहत गैर जमानती अपराध और जुर्माने की सजा का प्रावधान किया गया है। महिलाओं का पीछा करने, छेड़छाड़, निर्वस्त्र करने, हमला करने और बलात्कार का आरोप साबित होने पर न्यूनतम जुर्माना एक लाख रुपए लगाया जाएगा। भाजपा ने 12 वर्ष से कम आयु की बच्ची से बलात्कार के मामले में दोषी पाए जाने पर मृत्युदंड सहित कठोर दंड वाले प्रावधान संबंधी इस अध्यादेश को ऐतिहासिक करार दिया था तब वहीं विपक्षी दलों ने सवाल किया था कि सरकार को यह कदम उठाने में इतना समय क्यों लग गया? दूसरी ओर देश भर के बाल अधिकार कार्यकर्ताओं ने 12 साल से कम उम्र की बच्चियों से बलात्कार के मामले में मौत की सजा का प्रावधान करने के लिए पॉक्सो कानून में संशोधन के सरकार के फैसले का विरोध किया। केंद्रीय कैबिनेट ने 12 साल से कम उम्र की बच्चियों से बलात्कार के दोषियों को मौत की सजा देने की अनुमति देने वाले एक अध्यादेश को मंजूरी दी। इसके साथ ही देश की राजनीति गरमा उठी। पक्ष अपनी पीठ ठोंकता रहा तो विपक्ष खामियां गिनाता रहा। इसी दौरान राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) के पूर्व सदस्य विनोद टिक्कू ने कहा कि ‘‘मुझे आशंका है कि मौत की सजा का प्रावधान हो जाने पर ज्यादातर लोग बच्चियों से बलात्कार के मामले दर्ज नहीं कराएंगे क्योंकि ज्यादातर मामलों में परिवार के सदस्य ही आरोपी होते हैं। दोषसिद्धि दर भी और कम हो जाएगी।’’
वहीं नोबल प्राईज से सम्मानित कैलाश सत्यार्थी के चिल्ड्रेंस फाउंडेशन ने अपने एक ताज़ा अध्ययन के अनुसार यह कहा कि बाल यौन अपराधों से जुड़े लंबित मामलों का निपटारा करने में अदालतों को दो दशक लग जाएगा। कार्यकर्ताओं का कहना था कि सरकार को मौजूदा कानूनों को मजबूत करने पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए, पीड़िताओं और गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए, मुकदमों की त्वरित सुनवाई करानी चाहिए और जागरूकता पैदा करना चाहिए।
देश में पिछले तीन साल के आंकड़े जिस भयावहता की ओर संकेत कर रहे हैं वह कंपकंपा देने वाला है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के 2014 के आंकड़ों के मुताबिक देश में हर एक घंटे में 4 बलात्कार की वारदात होती हैं। एनसीआरबी द्वारा सन् 2015 के प्रस्तुत किए गए अांकड़ों पर यदि ध्यान दिया जाए तो यह सोच कर हैरानी होगी कि देश का सामाजिक स्तर किस रसातल में जा रहा है। सन् 2015 में देश में 34651 महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया था। वहीं 2113 सामूहिक बलात्कार की घटनाएं हुईं। यानी हर चार घंटे में एक सामूहिक बलात्कार। इन आंकड़ों की तुलना में यदि कानून पर ध्यान दिया जाए तो सन् 2015 में बलात्कार के 32 प्रतिशत मामले लंबित रहे, 29 प्रतिशत को सजा मिली और पिछले सालों के मामले मिलाकर कुल 86 प्रतिशत मामले लंबित रहे। संक्षेप में कहा जाए तो इन आंकड़ों के अनुसार देश में हर घंटे में चार बलात्कार हुए, अर्थात हर पंद्रह मिनट में एक बलात्कार। निर्भया बलात्कार (16 दिसंबर 2012) केस के बाद कानूनों में बदलाव किये गये, कानूनों को पहले से ज्यादा सख्त बनाया गया इस उम्मीद में कि शायद महिलाओं के साथ होने वाली आपराधिक वारदात कुछ कम होंगी लेकिन ऐसा हुआ नहीं। देश की राजधानी दिल्ली में वर्ष 2011 से 2016 के बीच महिलाओं के साथ दुष्कर्म के मामलों में 277 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई। दिल्ली में वर्ष 2011 में जहां इस तरह के 572 मामले दर्ज किये गए थे, वहीं साल 2016 में यह आंकड़ा 2155 रहा। सन् 2017 और सन् 2018 के अब तक के आंकड़े भी इस तथ्य को लगातार रेखांकित कर रहे हैं कि बलात्कारियों को किसी भी कानून का कोई खौफ़ नहीं रह गया है। जितने कानून बन रहे हैं उससे दोगुनी गति से अपराध कारित हो रहे हैं। क्या कानून को लागू करने में कहीं कोई चूक हो रही है या फिर कोई और कारण है? इस कारण का पता लगाना और इसे दूर कर महिलाओं के लिए स्वच्छ, निर्भय समाज बनाना अब जरूरी हो चला है।
आज के ग्लोबल युग में भारत में घटने वाली घटना विश्व के कोने-कोने तक असर डालती है। विचारणीय है कि दुनिया के लगभग हर देश में भारतीय समुदाय रहता है। वह समुदाय क्या इन घटनाओं पर विदेशियों के सामने अपना सिर उठा पाता होगा? दुनिया के सामने देश की छवि तो बिगड़ ही रही है और स्वयं देश के अंदर महिलाएं भयभीत हो कर जीने को विवश हो रही हैं। जब आंकड़े हर पंद्रह मिनट में एक बलात्कार तक जा पहुंचे हों तो क्या इस आंकड़े के साथ कोई भी राजनीतिक दल अच्छे शासन का दम भर सकता है? इस मुद्दे पर तमाम राजनीतिक दलों को आत्ममंथन करना होगा अपना चुनावी एजेंडा तय करने से पहले और इसे प्रथमिकता देनी होगी।
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( दैनिक सागर दिनकर, 23.05.2018 )
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