Showing posts with label नेशनल दुनिया. Show all posts
Showing posts with label नेशनल दुनिया. Show all posts

Sunday, November 4, 2012

‘लिव इन रिलेशन’ यानी प्रेम और अधिकार का द्वन्द्व

लेख
  
- डॉ. शरद सिंह

 ‘ये किसने कहा कि मैं तुमसे शादी करना चाहती हूं? कि तुमसे बच्चे पैदा करना चाहती हूं? तुम्हें पसंद करती हूं.....बस, इसीलिए तुम्हारा साथ चाहती हूं।’ मैंने कहा था।
‘फिर पसंद? प्रेम नहीं?’
ां-हां, वहीं...प्रेम....प्रेम करती हूं तुमसे।’
‘मेरे साथ रहोगी...बिना शादी किए? लिव इन रिलेशन?’ रितिक ने चुनौती-सी देते हुए पूछा था और मैं रितिक के जाल में फंस गई थी। कारण कि मैं अपने जीवन को अपने ढंग से जीना चाहती थी और ‘लिव इन रिलेशन’ वाला फंडा मुझे अपने ढंग जैसा लगा था। बिना विवाह किए किसी पुरुष के साथ पति-पत्नी के रूप में रहने की कल्पना ने मुझे रोमांचित कर दिया था। इसमें मुझे अपनी स्वतंत्रता दिखाई दी। मैं जब चाहे तब मुक्त हो सकती थी....वस्तुतः मुझे तो मुक्त ही रहना था....बंधन तो व
ां होता जहां किसी नियम का पालन किया जाता।
बंधन!...... बंधन के जो रूप मैंने अब तक देखे थे उनमें स्त्र को ही बंधे हुए पाया था। पुरुष तो बंध कर भी उन्मुक्त था...पूर्ण उन्मुक्त। वह पत्नी के होते हुए भी एक से अधिक प्रेमिकाएं रख सकता था, रखैलें रख सकता था, यहां-वहां फ्लर्ट कर सकता था...फिर भी समाज की दृष्टि में वह क्षमा योग्य ही बना रहता। सच तो यह है कि मैंने अपने बचपन में ही बंधन को तार-तार होते देखा था। वैवाहिक बंधन का विकृत रूप ही तो था वह जो किसी फसिल के समान मेरे मन की चट्टानों के बीच दबा हुआ था, एकदम सुरक्षित।
- यह एक छोटा-सा अंश है ‘कस्बाई सिमोन’ उपन्यास का। जो अनेक प्रश्न सामने रख जाता है। 


                         
‘लिव इन रिलेशन’ महानगरों में एक नई जीवनचर्या के रूप में अपनाया जा रहा है। यह माना जाता है कि स्त्र इसमें रहती हुई अपनी स्वतंत्राता को सुरक्षित अनुभव करती है। उसे जीवनसाथी द्वारा दी जाने वाली प्रताड़ना सहने को विवश नहीं होना पड़ता है। वह स्वयं को स्वतंत्रा पाती है। लेकिन महानगरों में अपरिचय का वह वातावरण होता है जिसमें पड़ोसी परस्पर एक-दूसरे को नहीं पहचानते हैं। कस्बों में सामाजिक स्थिति अभी धुर पारंपरागत है। ऐसे वातावरण में एक
स्त्र यदि ‘लिव इन रिलेशन’ को अपनाती है तो उसे क्या मिलता है?... और वह क्या खोती है?....क्या एक कस्बाई औरत ‘लिव इन रिलेशन’ में मानसिक सुकून पा सकती है? उस किन-किन स्तरों पर समझौते करने पड़ते हैं? बड़ा ही कठिन विमर्श है यह।
यह माना जाता है कि
स्त्र को आर्थिक अधिकार पुरुषों के बराबर न होने के कारण विवाहिताएं अपने पति द्वारा छोड़ दिए जाने से भयभीत रहती हैं। वे जानती हैं कि परितक्त्या स्त्र को समाज सम्मान की दृष्टि से नहीं देखता है। लेकिन यदि वह आर्थिक रूप से समर्थ हो, स्वयं कमाती हो तो क्या उसे समाज में सम्मान मिल सकता है? यदि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद महिलाओं की एक पीढ़ी का बहुमुखी विकास हो चुका होता तो आज देश में महिलाओं की दशा का परिदृश्य कुछ और ही होता। उस स्थिति में न तो दहेज हत्याएं होतीं, न मादा-भ्रूण हत्या और न महिलाओं के विरुद्ध अपराध का ग्राफ इतना ऊपर जा पाता। उस स्थिति में झारखण्ड या बस्तर में स्त्रियों को न तो ‘डायन’ घोषित किया जाता और न तमाम राज्यों में बलात्कार की घटनाओं में बढ़ोत्तरी हो पाती। महिलाओं को कानूनी सहायता लेने का साहस तो रहता।
 
स्त्र की शिक्षा पर उसका परिवार उसका दस प्रतिशत भी व्यय नहीं करता है जितना वह उस स्त्र के विवाह में दिखावे और दहेज के रूप में व्यय कर देता है। परिवार के लिए पुत्र का महत्व पुत्र की अपेक्षा आज भी अधिक है। स्त्र का दैहिक शोषण आज भी आम बात है।  घर, कार्यस्थल, सड़क, परिवहन, चिकित्सालय, मनोरंजन स्थल आदि कहीं भी स्त्र स्वयं को पूर्ण सुरक्षित अनुभव नहीं कर पाती है। अभी स्त्रियों को अपना भविष्य संवारने के लिए बहुत संघर्ष करना है। उन्हें अभी पूरी तरह सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक, राजनीतिक एवं मातृत्व का अधिकार प्राप्त करना है जिस दिन उसे अपने सारे अधिकार मिल जाएंगे जो कि देश की नागरिक एवं मनुष्य होने के नाते उसे मिलने चाहिए, उस दिन एक स्वस्थ समाज की कल्पना भी साकार हो सकेगी। जिसमें स्त्र और पुरुष सच्चे अर्थों में बराबरी का दर्जा रखेंगे।
                          

हर औरत अपने अस्तित्व को जीना चाहती है, पुरुष के साथ किन्तु अपने अधिकारों के साथ। पुरुष से अधिक नहीं तो पुरुष से कम भी नहीं। क्योंकि कम होने की पीड़ा सदियों से झेलती आ रही है और अब बराबर होने का सुख पाना चाहती है। यही ललक उसे ‘लिव इन रिलेशन’ के प्रति आकर्षित करती है। किन्तु यह तो जांचना आवश्यक है कि इसमें भी स्त्र क्या-क्या खोती है और क्या-क्या पाती है?  ‘लिव इन रिलेशन’ वस्तुतः प्रेम और अधिकार का द्वन्द्व है जिसकी तह तक पहुंचना हर स्त्र के लिए आवश्यक है।    
 -------------------------------------------------------------
 

(साभार- दैनिक नेशनल दुनियामें 04.11.2012 को प्रकाशित मेरा लेख) 

Sunday, September 30, 2012

ज़रूरत है गांधी के स्त्रीविमर्श को समझने की


- डॉ. शरद सिंह

इसमें कोई दो मत नहीं कि महात्मा गांधी के विचार कालजयी हैं। दुख तो तब होता है कि गांधी के देश में कोई डी आई जी पद का अधिकारी कहता है कि यदि मेरी बहन अपने प्रेमी के साथ घर से भागती तो मैं उसे गोली मार देता। उस समय पीड़ा होती है जब न्यायाधीश की कुर्सी पर बैठा व्यक्ति कहता है कि पत्नी को पति के हाथों मार खाने से मना नहीं करना चाहिए। कई बार यह हुआ है कि जब महात्मा गांधी के स्त्रियों के प्रति दृष्टिकोण का विषय उठता है तो कस्तूरबा के प्रति उनके कठोर व्यवहार पर जा ठहरा है। चूंकि ऐसे समय में गांधी के व्यक्तिगत जीवन के समक्ष उनके सर्ववादी विचारों को अनदेखा किया गया। महिलाओं को सशक्त बनाने की कोशिश ही गांधी के नारी आंदोलन की बुनियाद थी। गांधी मानते थे कि स्त्रियों को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पुरुषों के समकक्ष सशक्त होना चाहिए। वे राजनीति में महिलाओं की सहभागिता के पक्षधर थे। वस्तुतः गांधी का अहिंसावादी आंदोलन स्त्रियों की उपस्थिति के कारण अधिक सार्थक परिणाम दे सका। इस तथ्य को गांधी जी ने स्वीकार करते हुए एक बार कहा था कि ‘‘स्त्रियां प्रकृति से ही अहिंसावादी होती हैं। स्त्रियां पुरुषों की तुलना में अधिक संवेदनशील और सहृदय होती हैं अतः स्त्रियों की उपस्थिति से अहिंसावादी आन्दोलन एवं सत्याग्रह अधिक कारगर हो सकते हैं।’’

महात्मा गांधी स्त्रियों को अबला कहने के विरोधी थे। वे मानते थे कि स्त्री पुरुषों की भांति सबल और शक्ति सम्पन्न है। जिस प्रकार एक सशस्त्र पुरुष के सामने निःशस्त्र पुरुष कमजोर प्रतीत होता है, ठीक उसी तरह सर्वअधिकार प्राप्त पुरुषों के सामने स्त्री अबला प्रतीत होती है जो कि वस्तुतः अबला नहीं है। उनका कहना था कि उन्हें अबला पुकारना महिलाओं की आंतरिक शक्ति को दुत्कारना है। यदि हम इतिहास पर नजर डालें तो हमें उनकी वीरता की कई मिसालें मिलेंगी। यदि महिलाएं देश की गरिमा बढ़ाने का संकल्प कर लें तो कुछ ही महीनों में वे अपनी आध्यात्मिक अनुभूति के बल पर देश का रूप बदल सकती हैं।’’

गांधी जी मानते थे कि स्त्रियों की उपस्थिति पुरुषों को भी आचरण की सीमाओं में बांधे रखती है। यही कारण है कि उन्होंने कांग्रेस में महिलाओं को नेतृत्व का पूरा अवसर दिया। विभिन्न आंदोलनों में स्त्रियों को भरपूर अवसर दिया। उन्होंने कांग्रेस के अंतर्गत स्त्रियों के सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक और राजनीतिक उत्थान के कार्यक्रम भी चलाए। वे स्त्रियों को एक स्त्री के रूप में न देख कर एक पूर्ण व्यक्ति के रूप में देखते थे। वे स्त्रियों को सम्पत्ति पर पुरुषों के बराबर स्वामित्व दिए जाने के भी पक्षधर थे।
इससे भी बढ़ कर गांधी ने उस विचार का समर्थन किया जिस पर आज भी वाद-विवाद चलता रहता है। गांधी का मानना था कि विवाह के बाद भी स्त्री को अपने शरीर पर पूरा अधिकार रहता है। इसलिए उसकी अनुमति के बिना उसकी देह को स्पर्श करने का किसी भी पुरुष को अधिकार नहीं है, वह पुरुष भले ही उसका पति ही क्यों न हो। यह एक ऐसा विचार था जो स्त्री को एक व्यक्ति का दर्जा देने के साथ ही उसके अधिकारों की पूर्णता पर भी मुहर लगाता है। पुरुषसत्तात्मक सामंती सामाजिक व्यवस्था ने गांधी के इस विचार को गहरे दबा दिया और सोलहवीं शताब्दी की उसी परिपाटी को जिलाए रखा कि मां, बहन, पत्नी के रूप में स्त्री पुरुष की सम्पत्ति होती है। वह न अपनी इच्छा से जीवन साथी चुन सकती है, न तो अपने ढंग से अपना जीवन जी सकती है और अब तो एक बार फिर यह तय किया जाने लगा है कि स्त्रियां क्या पहनें, क्या नहीं या फिर वे बाज़ार-हाट जाएं या नहीं। उस पर एक विज्ञापन ने तो हद कर दी है कि छेड़छाड़ से बचना है तो फोन कर के घर पर सामान मंगवा लें।  

कई बार इस बात पर भी उंगली उठाई गई कि गांधी जी युवतियों के कंधे पर हाथ रख कर चलते थे। इस तथ्य का दूसरा पहलू देखें तो कि गांधी स्त्रियों और पुरुषों के आपसी व्यवहार को सहज भाव से ले कर चलने का संदेश देना चाहते थे। आज तो स्थिति इसके ठीक विपरीत है। आज भाई भी अपनी बहन को अपने साथ ले कर चलने में हिचकता है कि कहीं लोग भाई-बहन को प्रेमी-प्रेमिका न समझ बैठें। यही तो सोच का अन्तर है। गांधी इसी सोच को बदलना चाहते थे। वे स्वयं ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते थे। इतना कठोर पालन कि उन्होंने कस्तूरबा से भी संतानोत्पत्ति तक ही दैहिक संबंध रखा। वे संभवतः सिद्ध करना चाहते थे कि पुरुषों में भी इच्छाओं पर लगाम लगाने की क्षमता होती है, वह भी स्त्रियों के स्पर्श एवं उपस्थिति होते हुए भी। वे योगियों अथवा साधुओं वाले ब्रह्मचर्य को नहीं अपितु एक सामान्य पुरुष के आत्म संयम के ब्रह्मचर्य को सामने रखना चाहते थे। यदि गांधी के ब्रह्मचर्य की सही व्याख्या समाज के सामने समय रहते आई होती आज सामाजिक परिदृश्य कुछ और होता। आज स्त्रियों को खाप-पंचायतों के तानाशाही फरमान नहीं सुनने पड़ते और न ही महानगरों के भीड़ भरे चौराहे पर आवारा शोहदों के हाथों प्रताडि़त होना पड़ता।
महात्मा गांधी मानते थे कि सामाजिक व्यवस्था ने स्त्रियों को संयमित रहने का पाठ हमेशा पढ़ाया है किन्तु पुरुषों को भी इस संयम के पाठ की आवश्यकता है। वस्तुतः महात्मा गांधी के स्त्री विमर्श को गहराई से समझने आवश्यकता आज भी है।  
(साभार- दैनिक नेशनल दुनियामें 30.09.2012 को प्रकाशित मेरा लेख)   

Tuesday, June 19, 2012

‘क्रांति की मां’ तवक्कुल करमान

– डॉ. शरद सिंह

यमन एक इस्लामिक देश है जहां पर्दा प्रथा का कड़ाई से पालन कराया जाता है। स्त्रियों को घर से बाहर निकलने की मनाही है। विवशता में ही वे घर से बाहर निकलें, यही उनसे अपेक्षा की जाती है। एक तो कठोर पुरुषवादी सामाजिक व्यवस्था और उस पर सत्ता पर कोई तानाशाह हो तो इसे करेला और नीम चढ़ा ही कहा जा सकता है। यमन की स्त्रियां इसी विषाक्त कड़वाहट को झेलने के लिए विवश हैं। किन्तु कहा जाता है कि अतिवाद से ही उदारवाद और परिवर्तन का अंकुर फूटता है। यही यमन में भी हुआ। सन् 2011 से पहले किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि स्त्री-स्वातंत्रय विरोधी, कट्टरपंथी समाज वाले यमन की किसी 32 वर्ष की युवा स्त्री शांति का नोबल पुरस्कार दिया जाएगा। स्वयं यमन के लोग भी चौंक उठे थे जब उन्हें पता चला कि उनके देश की एक युवती जिसका नाम तवक्कुल कारमान है, उसे शांति के लिए नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।

तवक्कुल कारमान मूल रूप से राजनीतिज्ञ नहीं पत्रकार हैं। संभवतः इसीलिए अपने देश की स्त्रियों की समस्याओं को देखने का उनका दृष्टिकोण राजनेताओं से भिन्न है। निश्चत रूप से उन्होंने समस्याओं की जड़ों तक जा कर हल ढूंढने का प्रयास किया होगा। इसीलिए उनका ध्यान सबसे पहले इस ओर गया कि उनके देश में आमतौर पर लड़कियों का विवाह सत्रह वर्ष की आयु पूरी होने के पहले ही कर दिया जाता है अर्थात् बालविवाह। इससे लड़कियों के स्वास्थ्य और समूचे जीवन पर बुरा असर होता है। अपना भला-बुरा सोचने की समझ पैदा होने से पहले ही उन्हें विवाह के बंधन में बांध कर शिक्षा पाने और देश के विकास में सहयोगी बनने से रोक दिया जाता है। तवक्कुल को यह विसंगति रास नहीं आई।  किन्तु रास्ता बहुत कठिन था। जो पुरुष सहयोगी घर से बाहर उनकी गतिविधियों को सहन कर रहे थे वे भी तवक्कुल के विरोध में जा खड़े हुए जब उन्हें लगा कि इससे उनके घर की औरतें कुछ अधिकार पा जाएंगी। उनकी बेटियां सत्राह वर्ष की आयु होने तक उनके घर पर ही रहेंगी। यह नया पर तवक्कुल के सहयोगी पुरुषों को आपत्तिजनक लगा। इसीलिए जब तवक्कुल ने एक कानून बनवाने की कोशिश की जिसके बाद 17 साल से कम उम्र की लड़कियों की शादी पर पाबंदी लग जाती तो उनकी पार्टी वालों ने ही उसका विरोध किया। तवक्क्कुल कारमान समझ गईं कि अतिवादी पुरुषों का विरोध उन्हें झेलना ही होगा। तवक्कुल के अपने ही साथी उन्हें इस्लाम विरोधी मानने लगे और उन पर आरोप लगाने लगे कि तवक्कुल की चले तो वे उनके घरों से औरतों को बाहर कर दें। तवक्कुल इस विरोध से डरी नहीं। वे जानती थीं कि यह तो होगा ही। क्यों कि यमन जैसे देश में जहां लड़कियों की कहीं भी आवाज सुनायी नहीं देती और पर्दा प्रथा के कारण चेहरे भी दिखाई नहीं देते वहां स्त्रियों के अधिकार की बात करने पर विरोध तो होगा ही। 

तवक्कुल उस ‘इस्लाह पार्टी’ की सदस्य हैं जो यमन के तानाशाह अली अब्दुल्ला सालेह की कठोरता के कारण मुख्यधारा से कटते चले गए किन्तु उनके मन में परिवर्तन की लौ जलती रही। यह पार्टी मूलतः इस्लामी पार्टी है लेकिन तवक्कुल ने उस पार्टी में भी कुछ उदारवादी रुझान शामिल किया। भले ही उनकी पार्टी के लोग उनके प्रभाव के कारण उनसे डरते हैं लेकिन वे कारमान के उदार रवैये एक विरोध भी करते हैं। वहीं दूसरी यमन में तीस साल से चली आ रही तानाशाही को खत्म करने के लिए शुरू हुए आन्दोलन की नेता तवक्कुल को यमन के लोग ‘क्रांति की मां’ कह कर पुकारते हैं। इसी लिए तवक्कुल को विरोध में भी आशा की किरण दिखाई देती है। वे मानती हैं कि एक दिन अवश्य ऐसा आएगा जब उनके उदार विचारों विशेष रूप से स्त्रियों के हित में सामने रखे जाने वाले विचारों का उनके विरोधी भी सहृदयता से स्वागत करेंगे और आत्मसात करेंगे। तवक्कुल को विश्वास है कि उनके देश के कट्टर विचारों वाले पुरुष एक दिन इस तथ्य को समझ जाएंगे कि किसी भी देश का सर्वांगीण विकास तभी संभव है जब उस देश की स्त्रियों को बराबरी का अधिकार दिया जाए।
     
यमन में स्त्री शिक्षा की दर न्यूनतम है, स्त्री-स्वास्थ्य के मामले में भी पर्याप्त जागरूकता नहीं है, वस्तुतः वहां की स्त्रियां स्वयं को परम्परागत सामाजिक बंधनों के आगे विवश पाती हैं। कट्टरवादी पुरुषप्रधान समाज में आम स्त्री को यह अधिकार नहीं होता है कि वह परिवार के पुरुषों की अनुमति के बिना अपने जीवन को कोई दिशा दे सकें या अपनी बेटियों के लिए स्वतंत्राता के सपने देख सकें। तवक्कुल ने इस लगभग असंभव को संभव बनाने की दिशा में पहल करते हुए हर तरह का जोखिम उठाया। क्रांति और परिवर्तन के प्रयास के दौरान उन्होंने महिलाओं के अधिकारों के संरक्षण और सशक्तिकरण की मांग को छोड़ा नहीं वरन् प्रत्येक अवसर पर इन मांगों को सामने रखती रहीं। उनकी इसी दृढ़ता और सामाजिक शांति तथा विकास के प्रयासों के कारण उन्हें नोबल सम्मान दिया गया। अपनी भारत यात्रा के दौरान तवक्कुल भारतीय स्त्रियों की प्रगति से अत्यंत प्रभावित हुईं। उन्होंने ने माना कि ऐसे ही बहुमुखी विकास की आकांक्षा वे अपने देश की स्त्रियों के लिए भी रखती हैं।
(साभार- दैनिकनेशनल दुनियामें 16.06.2012 को प्रकाशित मेरा लेख)