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Thursday, June 29, 2017

चर्चा प्लस ... स्मार्ट सिटी की चुनौतियां ... डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
" दरअसल, #स्मार्ट_सिटी_प्रोजेक्ट एक महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट है और इसमें नेता, अधिकारी, समाजसेवी, पत्रकार और आमजनता सभी के लिए अपनी जिम्मेदारी को समझना होगा।" ... #स्मार्टसिटी की चुनौतियां ... मेरा कॉलम #चर्चा_प्लस में "दैनिक सागर दिनकर" में ( 28.06. 2017) ..My Column #Charcha_Plus in "Sagar Dinkar" news paper....
 
चर्चा प्लस
स्मार्ट सिटी की चुनौतियां
- डॉ. शरद सिंह


जितने भी शहर स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट की दौड़ में उत्तीर्ण हो गए उनके लिए खुशियां मनाने का समय नहीं बल्कि उन चुनौतियों पर चिन्तन करने का है जो उनके सामने खड़ी हैं। क्या ये चुनौतियां निर्धारित समय सीमा में पूरी हो सकती है? क्या इन शहरों में माद्दा है कि वास्तविक स्मार्ट सिटी बन कर दिखाएं? कहीं स्मार्टनेस का महल उस सीसी रोड की तरह हो कर न रह जाए जो पहली बरसात में ही बह जाती है। दरअसल, स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट एक महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट है और इसमें नेता, अधिकारी, समाजसेवी, पत्रकार और आमजनता सभी के लिए अपनी जिम्मेदारी को समझना होगा। 

जब स्मार्ट सिटी की चर्चा आती है तो पहला प्रश्न मन में कौंधता है कि यह ’स्मार्ट सिटी’ है क्या? स्मार्ट सिटी की संकल्पना, हर शहर और हर देश के लिए भिन्न होती है जो विकास के स्तर, परिवर्तन और सुधार की इच्छा, शहर के निवासियों के संसाधनों और उनकी आकांक्षाओं पर निर्भर करता है। ऐसे में, स्मार्ट सिटी का भारत में यूरोप से अलग अर्थ होगा। इतना ही नहीं, खुद भारत में प्रत्येक शहर की दशा के अनुसार स्मार्ट सिटी के मायने अलग होंगे। भारत में किसी भी शहर निवासी की कल्पना में, स्मार्ट शहर तस्वीर में ऐसे परिदृश्य और सेवाओं की सूची होती है जो उसकी आकांक्षा के अनुरूप हो। नागरिकों की आकांक्षाओं और जरूरतों को पूरा करने के लिए, शहरी योजनाकार को बुनियादीतौर पर पूरे शहरी पारिस्थितिकी तंत्र का इस प्रकार विकास करना होता है, जो व्यापक विकास के चार स्तंभों-संस्थागत, भौतिक, सामाजिक और आर्थिक अवसंरचना में दिखाई देता है। किसी भी शहर की स्मार्टनेस उसकी बुनियादी जरूरतों की पूर्ति पर निर्भर होती है। यदि शहर में सड़कें उखड़ी हुई हैं, ड्रेनेज की व्यवस्था चौपट है और हर साल बारिश में नागरिकों को सड़क पर बहती नालियों का समाना करना पड़ता है, यदि कचरा उठाने और कचरा प्रबंधन का काम लचर है या फिर शासकीय स्तर पर चिकित्सकीय सुविधाएं गड़बड़ी से भरी पड़ी हैं तो मान कर चलना होगा कि आसान नहीं है डगर स्मार्टसिटी की।
Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper

उदाहरण के लिए सागर को ही लीजिए। भौगोलिक दृष्टि से एक अत्यंत सुंदर शहर है। यहां का विश्वविद्यालय डॉ. हरीसिंह गौर केन्द्रीय विश्वविद्यालय के छात्र दुनिया के कोने-कोने में जा कर नाम कमा रहे हैं। शहर की अपनी एक झील है। एक पुराना शहर है जो चारो ओर से नई कॉलोनियों के रूप् में विस्तार पाता जा रहा है। इस शहर की अपनी एक बोली है, अपनी है संस्कृति है और अपनी एक पहचान है। इस तरह की खूबियां लगभग हर उस शहर की है जो स्मार्टसिटी की दौड़ में विजयी मुद्रा में खड़े हैं। इसलिए इन सभी चुनौतियां भी लगभग एक समान हैं। इसीलिए यहां मैं सागर शहर के संदर्भ में बात करूंगी।
निसंदेह सागर शहर के मध्य में एक पुराना शहर है। इस पुराने शहर के बसाने वालों ने शहर के लिए उत्तम कोटि की पेयजल व्यवस्था एवं जल निकासी व्यवस्था की थी। लेकिन धीरे-धीरे वे सारी व्यवस्थाएं सिकुड़ गईं। आज ड्रेनेज़ और सफाई की व्यवस्था चरमरा चुकी है। जब पुराना शहर बसाया गया था तब उसकी सड़कें चौड़ी हुआ करती थीं (जैसेकि साक्ष्य मिले हैं) लेकिन अब सड़कें अतिक्रमण की चपेट में हैं। नगरनिगम की सीमा में आने वाले शहर के अधिकांश हिस्से अतिक्रमण के शिकार हैं। सिकुड़ी हुई सड़कों के गड्ढे अपनी अलग ही कहानी कहते हैं। उस पर डेयरी विस्थापन का मुद्दा तो कई पंचवर्षीय योजनाएं पार कर चुका है और जस का तस है। शहर को एक अदद मेडिकल कॉलेज का गौरव प्राप्त हुआ लेकिन वहां भी अव्यवस्थाओं और मुन्ना भाइयों के कारण मरीज त्राहि-त्राहि करते दिखाई पड़ते हैं। शहर का पर्यावरण इस कदर दूषित हो चुका है कि उसे संवारने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ेगी।
ऐसा पहली बार हुआ है, शहरी विकास मंत्रालय कार्यक्रम में निधियन के लिए शहरों के चयन करने के लिए ‘चुनौती’ अथवा प्रतिस्पर्धा विधि का उपयोग किया गया। राज्य और शहरी स्थानीय निकाय स्मार्ट शहरों के विकास में महत्वपूर्ण सहायक भूमिका निभाएंगे। इस स्तर पर स्मार्ट नेतृत्व एवं दूरदृष्टि और निर्णायक कार्रवाई करने की क्षमता महत्वंपूर्ण कारक होंगे जो मिशन की सफलता निर्धारित करेंगे। स्मार्टसिटी के रास्ते में अनेकानेक चुनौतियां हैं जिनमें कुछ बुनियादी चुनौतियां हैं- आईटी, वाई-फाई, बिजली, जलजमाव, ठोस कचरा प्रबंधन, सीवरेज की सफाई, जलापूर्ति और यातायात आदि।
शहर के सरकारी अस्पतालों में चिकित्सकों और संरचना दोनों में लगभग 50 प्रतिशत की कमी है। निजी अस्पताल और नर्सिंगहोम तो हैं, पर गरीब उसकी सुविधाएं प्राप्त नहीं कर सकते हैं। जबकि शहरी नियमानुसार 30 मिनट की इमरजेंसी सेवा के साथ सभी घरों तक पहुंच। लगभग 1500 की आबादी पर कम से कम एक डिस्पेंसरी और 1 लाख की आबादी पर 25 से 30 बेडों का नर्सिंग होम होना चाहिए। प्रति एक लाख की आबादी पर क्रमशः 80, 200 और 500 बेड का कैटेगरी ए, कैटेगरी बी और सामान्य हॉस्पिटल होना चाहिए।
आईटीके मामले में दूसरे शहरों की अपेक्षा हम पीछे हैं। नेट कनेक्टिविटी के चुस्त-दुरूस्त संजाल की जरूरत है। पूरे शहर में 100 एमबीपीएस की स्पीड के साथ वाई-फाई की सुविधा मिलनी चाहिए, ताकि लोग कभी भी नेट इस्तेमाल कर सकें। यूं भी दैनिक जीवन में हर काम के लिए इंटरनेट पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। अतः इंटरनेट व्यवस्था सुचारू होना जरूरी है।
आवश्यकता के अनुरूप बिजली की उपलब्धता भी जरूरी है। इस दिशा पर भी ध्यान देना होगा। सभी घरों में बिजली का कनेक्शन और 24 घंटे बिजली आपूर्ति को सुनिश्चित करने और बिजली की बर्बादी से बचने के लिए टैरिफ स्लैब्स का निर्धारण करना होगा।
बरसाती पानी की निकासी के लिए सभी सड़कों तक का बेहतरीन नेटवर्क तैयार करना होगा। शत-प्रतिशत रेन वाटर हार्वेस्टिंग पर जोर देना होगा। जरा-सी बारिश हुई और निचली बस्तियों तथा कॉलोनियों में पानी भरने लगता है। शहर के पुराने नालों का रख-रखाव जरूरी है।
सभी घरों तक डोर-टू-डोर कचरा उठाने की व्यवस्था करनी होगी। ठोस कचरे की शत-प्रतिशत रिसाइक्लिंग करने से ही समस्या का समाधान होगा। सभी घरों में शौचालय, स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग से शौचालय की व्यवस्था। सीवरेज और गंदे पानी के प्रबंधन के लिए नेटवर्क का संपूर्ण विस्तार। पुरानी सीवरेज सिस्टम पूरी तहर से ध्वस्थ हो चुका है।
सभी घरों में कनेक्शन देकर 24 घंटे जलापूर्ति करनी होगी। प्रत्येक व्यक्ति पर लगभग 135 लीटर की आपूर्ति करनी होगी। जिससे लोगों को सहूलियत हो। वाटर ट्रीटमेंट पर ध्यान देना होगा।
400 मीटर की पैदल दूरी पर खुदरा दुकानें, पार्क, प्राथमिक विद्यालय जैसी 95 फीसदी दैनिक आवश्यकताओं की पहुंच घरों तक होनी चाहिए। कई इलाके ऐसे हैं, जहां बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। मैपिंग के बिना स्थानिक नियोजन करना काफी मुश्किल है। शहर के एक से दूसरे छोर तक पहुंचने के लिए अधिकतम 30 से 45 मिनट लगने चाहिए। सड़क के दोनों किनारे फुटपाथ और आवासीय क्षेत्र में 10-15 मिनट की पैदल दूरी पर यातायात का प्रबंध होना चाहिए।
स्मार्टसिटी प्रोजेक्ट के अंतर्गत कुछ व्यवस्थाएं अनिवार्यरूप से तय की गई हैं जैसे - सभी प्रोजेक्ट का ऑनलाइन और टाइमबाउंड निपटारा, जन सेवाओं की ऑनलाइन डिलीवरी, नागरिकों के साथ प्रभावी संचार व्यवस्था, गरीबों को रियायती दर पर सुविधाएं उपलब्ध कराना, ओपन डाटा प्लेटफॉर्म जहां नागरिकों को सूचनाएं मुफ्त मिलें, सभी जनोपयोगी सेवाओं के लिए एक नियंत्रक संस्था का गठन, सभी प्रोजेक्ट्स के लिए सबसे पहले प्राइवेट सेक्टर को आमंत्रण आदि।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्मार्ट सिटी बनाने की महत्वाकांक्षी परियोजना में ताज़ा-ताज़ा शामिल हुए सागर शहर सहित तमाम प्रतियोगी शहरों को स्मार्ट बनाने के लिए नागरिकों के भी कुछ दायित्व हैं जैसे, शहर की स्वच्छता बनाए रखना, नागरिकों की सुरक्षा और संरक्षा, विशेष रूप से महिलाओं, बच्चों एवं बुजुर्गों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और शिक्षा पेयजल को व्यर्थ बहने से रोकना, रेन वाटर हार्वेस्टिंग को अपनाना, सौदर्याकरण के लिए लगाए जाने वाले पेड़-पौधों की रक्षा करना क्यों कि ये न केवल सुन्दरता बढ़ाते हैं बल्कि पर्यावरण में संतुलन भी बनाए रखते हैं। इसके साथ ही पशुपालकों को डेयरी विस्थापन में सहयोगी बनना होगा। इन सबके अतिरिक्त सबसे बड़ा दायित्व जो नागरिकों को निभाना होगा, वह है ‘व्हिसिल ब्लोअर’’ बनने का। यदि किसी भी नागरिक को किसी भी स्तर पर कोई भी चूक होती दिखाई दे अथवा किसी गड़बड़ी का अंदेशा हो तो उसे तत्काल जागरूकता का परिचय देना होगा। उल्लेखनीय है कि सरकार ने ‘‘व्हिसिल ब्लोअर्स’’ के लिए यह प्रावधान रखा है कि यदि वे चाहें तो उनका नाम उजागर नहीं किया जाएगा ताकि उनकी सुरक्षा बनी रहे।
सच तो यह है कि हर नागरिक चाहता तो बहुत कुछ है लेकिन उसे पाने के लिए शासन अथवा राजनीतिक दलों का मुंह ताकता रहता है। बुनियादी जरूरतों को पूरा कराने में भी उसे हिचक होती है। इसलिए यह तय है कि यदि अपने शहर को सचमुच ‘स्मार्ट सिटी’ बनाना है तो नागरिक सहयोग एवं जागरूकता की अहम भूमिका को स्वीकार करना होगा। स्मार्ट सिटी बनाने के लिए सरकार तो आर्थिक सहायता उपलब्ध कराएगी ही किन्तु नगरनिगमों को भी अपनी आय बढ़ानी होगी जिसके अंतर्गत नागरिकों पर विभिन्न प्रकार के टैक्स बढ़ेंगे। राह कठिन है, इस अर्थ में भी कि किसी स्कैम पर चर्चा करना आसान होता है लेकिन समय रहते उस स्कैम को होने से ही रोकना साहस का काम होता है। लेकिन यदि आमजनता अधिक टैक्स चुकाते हुए अधिक सुविधाएं पाने की चाहत रखती है तो उसे ‘‘व्हिसिल ब्लोअर्स’’ बन कर अपने टैक्स के पैसों की निगरानी भी करनी होगी।
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#स्मार्टसिटी #चुनौतियां, #व्हिसिल_ब्लोअर #टैक्स

Wednesday, June 21, 2017

चर्चा प्लस ... योग संवारता है जीवन को ... डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
International Yoga Day
 
विश्व योग दिवस (21 जून) पर विशेष :
"योग संवारता है जीवन को" ... मेरा कॉलम #चर्चा_प्लस में "दैनिक सागर दिनकर" में ( 21.06. 2017) ..My Column #Charcha_Plus in "Sagar Dinkar" news paper....

 

चर्चा प्लस
विश्व योग दिवस (21 जून) पर विशेष :
योग संवारता है जीवन को

- डॉ. शरद सिंह 

योग जीवन को संवारने की एक व्यवहारिक शैली है जो आज वैश्विक रूप् ले चुकी है। योग किसी धर्म, जाति अथवा संप्रदाय से जुड़ी क्रिया नहीं है, यह तो जीवन को शारीरिक, आध्यात्मिक और संवेदनात्मक रूप से शांत एवं समृद्ध करने की कला है और यह तथ्य इस बात से साबित भी हो चुका है कि दुनिया के अनेक देश और उनके नागरिक योग की महत्ता को स्वीकार चुके है। योग को किसी भी पूर्वाग्रह से मुक्त हो कर अपना कर अपने तनावपूर्ण जीवन को तनाव से मुक्त किया जा सकता है। दरअसल, आज के कठिन युग में योग एक लाभकारी जीवनशैली है।
Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper

इसमें कोई संदेह नहीं कि आज के उत्तरआधुनिक युग यानी इलेक्टॉनिक युग में विश्वपटल पर योग को स्थापित करने का श्रेय प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी को ही दिया जा सकता है और इस सच्चाई को स्वीकारने के लिए तमाम राजनीतिक चश्मों को परे रख कर भारतीय संस्कृति एवं मूल्यों के वैश्विक प्रसार को ध्यान में रखना होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 14 सिंतबर 2014 को पहली बार पेश किया गया यह प्रस्ताव तीन महीने से भी कम समय में संयुक्त राष्ट्रसंघ की महासभा में पास हो गया। भारतीय राजदूत अशोक मुखर्जी ने ‘अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस’ का प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्रसंघ की सभा में रखा था, जिसे दुनिया के 175 देशों ने भी सह-प्रस्तावित किया था। संयुक्त राष्ट्रसंघ की जनरल असेंबली में किसी भी प्रस्ताव को इतनी बड़ी संख्या में मिला समर्थन भी अपने आप में एक रिकॉर्ड बन गया। इससे पहले किसी भी प्रस्ताव को इतने बड़े पैमाने पर इतने देशों का समर्थन नहीं मिला था। यह भी पहली बार हुआ था कि किसी देश ने संयुक्त राष्ट्रसंघ असेंबली में कोई इस तरह का प्रस्ताव मात्र 90 दिनों में पास हो गया हो।
प्रश्न उठता है कि 21 जून का दिन नही योग दिवस के लिए क्यों चुना गया? तो इसका उत्तर भारतीय खगोलगणना में विद्यमान है। 21 जून को इस दिन ग्रीष्म संक्रांति होती है। इस दिन सूर्य पृथ्वी के परिप्रेक्ष्य में उत्तर से दक्षिण की ओर चलना शुरू करता है। योग के दृष्टि से यह समय संक्रमण काल माना जाता है, यानी रूपांतरण के लिए आदर्श समय। योगिक कथाओं के अनुसार योग का पहला प्रसार शिव द्वारा उनके सात शिष्यों के बीच किया गया। कहते हैं कि इन सप्त ऋषियों को ग्रीष्म संक्राति के बाद आने वाली पहली पूर्णिमा के दिन योग की दीक्षा दी गई थी, जिसे शिव के अवतरण के तौर पर भी मनाते हैं। इस प्रकृतिक घटना को दक्षिणायन के नाम से जाना जाता है।
योग एक प्राचीन कला है जिसकी उत्पत्ति भारत में लगभग 6000 साल पहले हुई थी। ऐसा माना जाता है कि जब से सभ्याता शुरू हुई है तभी से योग किया जा रहा है। योग के विज्ञान की उत्पात्ति हजारों साल पहले हुई थी, पहले धर्मों या आस्थाय के जन्मत लेने से काफी पहले हुई थी। योग विद्या में शिव को पहले योगी या आदि योगी तथा पहले गुरू या आदि गुरू के रूप में माना जाता है। वैदिक कथाओं के अनुसार कई हजार वर्ष पहले, हिमालय में कांति सरोवर झील के तटों पर आदि योगी ने अपने प्रबुद्ध ज्ञान को अपने प्रसिद्ध सप्तऋषि को प्रदान किया था। सप्तऋषियों ने योग के इस विशिष्ट ज्ञान को विश्व में प्रसारित किया। सिंधु घाटी सभ्यता के अनेक जीवाश्म, अवशेष एवं मुहरें भारत में योग की उपस्थिति को साबित करती हैं। देवी मां की मूर्तियों की मुहरें, लैंगिक प्रतीक तंत्र योग का सुझाव देते हैं। लोक परंपराओं, सिंधु घाटी सभ्येता, वैदिक एवं उपनिषद की विरासत, बौद्ध एवं जैन परंपराओं, दर्शनों, ‘महाभारत’ एवं ‘रामायण’ महाकाव्यों, शैवों, वैष्णवों की आस्तिक परंपराओं एवं तांत्रिक परंपराओं में योग का उल्लेख है। वैदिक काल के दौरान सूर्य को सबसे अधिक महत्व दिया गया। सूर्य को प्रणाम करने की विशेष पद्धति से ’सूर्य नमस्कार’ का योगिक आसन विकसित हुआ। यद्यपि पूर्व वैदिक काल में भी योग किया जाता था, महान संत महर्षि पतंजलि ने अपने योग सूत्रों के माध्यम से उस समय विद्यमान योग की प्रथाओं, उसकी क्रियाओं एवं उससे संबंधित ज्ञान को व्यवस्थित किया। पतंजलि के बाद भी अनेक योगाचार्यों ने मनुष्य के जीवन को व्यवस्थित करने के लिए योग की महत्ता को सर्वोत्तम ठहराया। कई दशकों पहले पश्चिमी दुनिया का योग से भली-भांति परिचय कराया था स्वामी विवेकानंद ने, जब उन्होंने 1893 में अमेरिका के शिकागो में विश्व धर्म संसद को संबोधित किया था। उसके बाद से पूर्व के कई गुरुओं व योगियों ने दुनियाभर में योग का प्रसार किया और दुनिया ने योग को बड़े पैमाने पर स्वीकार किया। योग पर कई अध्ययन और शोध हुए, जिन्होंने मानव कल्याण में योग के विस्तृत और दीर्घकालिक फायदों को साबित किया। किन्तु दुर्भाग्यवश अपने ही देश में योग उपेक्षित होता चला गया।
प्राचीनकाल में लोग स्वस्थ और तनावमुक्त बने रहने के लिए अपने दैनिक जीवन में योग और ध्यान के के अपनाते थे। किन्तु आज के भगमभाग और व्यस्त वातावरण में योग करना दिन प्रति दिन कम होता जा रहा है। जो व्यक्ति उत्साह के साथ योग आरम्भ कर भी देते हैं तो वे एक या दो सप्ताह में ही उससे ऊब कर पुराने ढर्रे पर आ जाते हैं। इस ऊब का सबसे बड़ा कारण यह है कि ऐसे लोग अपनी अंतःप्रेरणा से नहीं बल्कि ‘‘तथाकथित व्यवसायिक योगा’’ की चमक-दमक से प्रभावित हो कर योग को अपनाते हैं। भ्रमित हो कर आरम्भ किया गया कोई भी कार्य उसकी वास्तविक महत्ता को कभी सिद्ध नहीं कर पाता है। यदि योग की वास्तविक महत्ता को अच्छी तरह समझ लिया जाए तो पता चल जाएगा कि जीवन को बेहतर बनाने के लिए इससे अच्छा सस्ता, सुंदर और टिकाऊ उपाय औा कोई नहीं है। योग करने के लिए किसी विशेष उपकरण की आवश्यकता नहीं होती है। न ही मंहगी व्यायामशालाओं (जिम) की फीस भरने की जरूरत होती है। देश में अनेक संस्थाएं हैं जो निःशुल्क योग की शिक्षा देती हैं तथा समय-समय पर शिविर लगा कर उन क्षेत्रों में भी योग के आसनों का ज्ञान देती हैं जहां कोई भी योग-केन्द्र नहीं होते हैं।
यदि योग के आसनों को अपने शरीर एवं अपनी शारीरिक आवश्यकताओं के हिसाब से सीख, समझ लिया जाए तो योग एक बहुत ही सुरक्षित क्रिया है और किसी के भी द्वारा किसी भी समय की जा सकती है, यहां तक कि इससे बच्चे भी लाभ ले सकते हैं। योग वह क्रिया है, जिसके अन्तर्गत शरीर के विभिन्न भागों को एक साथ लाकर शरीर, मस्तिष्क और आत्मा को सन्तुलित करने का एक अभ्यास है। बिना किसी समस्या के जीवन भर तंदरुस्त रहने का सबसे अच्छा, सुरक्षित, आसान और स्वस्थ तरीका योग है। इसके लिए केवल शरीर के क्रियाकलापों और श्वास लेने के सही तरीकों का नियमित अभ्यास करने की आवश्यकता है। यह शरीर के तीन मुख्य तत्वों; शरीर, मस्तिष्क और आत्मा के बीच संपर्क को नियमित करना है। यह शरीर के सभी अंगों के कार्यकलाप को नियमित करता है और कुछ बुरी परिस्थितियों और अस्वास्थ्यकर जीवन-शैली के कारण शरीर और मस्तिष्क को परेशानियों से बचाव करता है। यह स्वास्थ्य, ज्ञान और आन्तरिक शान्ति को बनाए रखने में मदद करता है। अच्छे स्वास्थ्य प्रदान करने के द्वारा यह हमारी भौतिक आवश्यकताओं को पूरा करता है, ज्ञान के माध्यम से यह मानसिक आवश्यकताओं को पूरा करता है और आन्तरिक शान्ति के माध्यम से यह आत्मिक आवश्यकता को पूरा करता है, इस प्रकार यह हम सभी के बीच सामंजस्य बनाए रखने में मदद करता है।
योग का नियमित अभ्यास हमें अनगिनत शारीरिक और मानसिक तत्वों से होने वाली परेशानियों को दूर रखने के द्वारा बाहरी और आन्तरिक राहत प्रदान करता है। योग के विभिन्न आसन मानसिक और शारीरिक मजबूती के साथ ही अच्छाई की भावना का निर्माण करते हैं। यह मानव मस्तिष्क को तेज करता है, बौद्धिक स्तर को सुधारता है और भावनाओं को स्थिर रखकर उच्च स्तर की एकाग्रता में मदद करता है। अच्छाई की भावना मनुष्य में सहायता की प्रकृति के निर्माण करती है और इस प्रकार, सामाजिक भलाई को बढ़ावा देती है। एकाग्रता के स्तर में सुधार ध्यान में मदद करता है और मस्तिष्क को आन्तरिक शान्ति प्रदान करता है। योग प्रयोग किया गया दर्शन है, जो नियमित अभ्यास के माध्यम से स्व-अनुशासन और आत्म जागरुकता को विकसित करता है। योग का अभ्यास किसी के भी द्वारा किया जा सकता है, क्योंकि आयु, धर्म या स्वस्थ परिस्थितियों परे है। यह अनुशासन और शक्ति की भावना में सुधार के साथ ही जीवन को बिना किसी शारीरिक और मानसिक समस्याओं के स्वस्थ जीवन का अवसर प्रदान करता है। योग्य शिक्षक से एक बार अच्छी तरह सीख लेने के बाद योग करने से स्वास्स्थ्य संबंधी अनेक कठिनाइयां दूर हो जाती हैं। साथ ही इसके कोई साईड इफैक्ट भी नहीं होते हैं।
देखा जाए तो योग जीवन को संवारने की एक व्यवहारिक शैली है जो आज वैश्विक रूप ले चुकी है। योग किसी धर्म, जाति अथवा संप्रदाय से जुड़ी क्रिया नहीं है, यह तो जीवन को शारीरिक, आध्यात्मिक और संवेदनात्मक रूप से शांत एवं समृद्ध करने की कला है और यह तथ्य इस बात से साबित भी हो चुका है कि दुनिया के अनेक देश और उनके नागरिक योग की महत्ता को स्वीकार चुके है। योग को किसी भी पूर्वाग्रह से मुक्त हो कर अपना कर अपने तनावपूर्ण जीवन को तनाव से मुक्त किया जा सकता है। दरअसल, आज के कठिन युग में योग एक लाभकारी जीवनशैली है।
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