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Friday, April 5, 2024

शून्यकाल | चुनावी राजनीति के प्रति पं. दीनदयाल उपाध्याय के उसूल | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

 
दैनिक नयादौर में मेरा कॉलम "शून्यकाल"-
चुनावी राजनीति के प्रति पं. दीनदयाल उपाध्याय के उसूल
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
          हर उम्मीदवार चुनाव में विजय प्राप्त करने के उद्देश्य से अपनी रणनीति बनाता है। कई उम्मीदवार ‘‘प्रेम और राजनीति में सब जायज़ है’’ केे तर्ज़ पर साम, दाम, दण्ड, भेद को अपना लेते हैं। यही राजनीति का वह दूषित आचरण है जो राजनीतिक शुचिता को ठेस पहुंचाता है। जातीय समीकरण भी इन्हीं ठेस पहुंचाने वाले तत्वों में से एक है। ‘‘वोट बैंक’’ की राजनीति इसका एक कुरूप चेहरा प्रस्तुत करता है। पं. दीनदयाल उपाध्याय इस तरह की राजनीति के कट्टर विरोधी थे। सन् 1963 के चुनाव में एक उम्मींदवार के रूप में उन्होंने यह साबित कर दिया था कि वे किसी भी मूल्य पर चुनाव और राजनीति को स्वार्थपूर्ति का साधन नहीं बना सकते हैं।
        पं. दीनदयाल उपाध्याय समझौता परस्त नहीं थे। वे राजनीति को स्वार्थपूर्ति के साधन के रूप में नहीं, वरन जनता के हितों को साधने के माध्यम के रूप में देखते थे। कई ऐसे अवसर आए जब अपने उसूलों के कट्टर राजनीतिज्ञों को भी थेड़ा लचीलापन अपनाना पड़ा लेकिन पं. दीनदयाल उपाध्याय ने ऐसे लचीलेपन को कभी स्वीकार नहीं किया जिसमें जातिगत आधार पर राजनीति की जा रही हो। सन् 1963 में लोकसभा की चार के लिए चुनाव होने थे। इन चार सीटों के लिए जिन चार बड़े़े राजनेताओं का नाम प्रस्तावित हुआ उनमें थे जौनपुर से पं.दीनदयाल उपाध्याय, फर्रूखाबाद से राममनोहर लोहिया, अमरोहा से जेबी कृपलानी, और राजकोट से मीनू मसानी। इनकी सीधी टक्कर कांग्रेस से थी। इन चारों नेताओं में पं. दीनदयाल और डा. राम मनोहर लोहिया ऐसे नेता थे जो राजनीति के जातिवादी आधार के सख़्त विरोधी थे। किन्तु फर्रूखाबाद ऐसा क्षेत्र था जहां जातिवादी समीकरण को अनदेखा नहीं किया जा सकता था। न चाहते हुए भी डाॅ लोहिया को अपने विचारों में तनिक ढील देनी पड़ी। जातिगत समीकरण के आधार पर ही डाॅ. लोहिया को फर्रुखाबाद से विजय हासिल हुई। डाॅ लोहिया के पक्ष में पं. दीनदयाल ने भी प्रचार किया यद्यपि वे जातिीय समीकरण के प्रबल विरोधी थे। फिर भी एक व्यापक उद्देश्य के लिए उन्होंने जातिगत समीकरण को नहीं लेकिन डाॅ लोहिया को समर्थन दिया। इधर कांग्रेस ‘‘वोट बैंक’’ की राजनीति पर डटी हुई थी। वहीं पं. दीनदयाल ने अपने क्षेत्र में अपनी ओर से जातिवाद को स्वयं से दूर रखा। उन्होंने खुलेआम अपनी चुनावी सभाओं में यह कहा कि- ‘‘जो जातीय आधार पर मेरी सभा में आए हैं, वे कृपया इस सभा से प्रस्थान कर जाएं। मुझे जाति के आधार पर समर्थन नही चाहिए।’’ 
परिणाम पं. दीनदयाल के लिए पराजय के रूप में सामने आया। किन्तु उन्होंने इसे प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करते हुए कहा कि-‘‘पं. दीनदयाल की पराजय हुई है लेकिन भारतीय जनसंघ को विजय मिली है।’
           वस्तुतः पं. दीनदयाल जनसंघ में राष्ट्रवादी विचारों एवं राजनीतिक स्वच्छता के संवाहक थे। राजनीति को ले कर उनके विचार स्पष्ट थे। वे अपनों विचारों को व्यक्त करने में हिचकते भी नहीं थे। पं. दीनदयाल उपाध्याय ने ‘राष्ट्रधर्म’ एवं ‘पांचजन्य’ में कई महत्वपूर्ण राजनीतिक लेख लिखे। ये लेख भारतीय राजनीति के स्वरूप पर विवेचनात्मक लेख थे। इनमें भारतीय राजनीति की विशिष्टताओं, व्यवस्थाओं एवं त्राुटियों पर विहंगम दृष्टि डाली गई थी। कुछ अति महत्वपूर्ण लेख इस प्रकार हैं-
(1) भारतीय संविधान पर एक दृष्टि
(2) राष्ट्रजीवन की समस्याएं
(3) राष्ट्रजीवन की दशा
(4) भारतीय राजनीति की मौलिक भूलें
‘राष्ट्रधर्म’ के माध्यम से पं. दीनदयाल आमजन के लिए राजनीति का विश्लेषण सामने रखना चाहते थे। उनका मानना था कि प्रत्येक नागरिक को जो राजनीतिक परिवेश से घिरा रहता है भले ही वह राजनेता न हो, उसे राजनीति के प्रत्येक पक्ष की जानकारी होनी चाहिए। इसी उद्देश्य से उन्होंने ‘राष्ट्रधर्म’ में ‘राष्ट्रजीवन की समस्याएं’ तथा ‘भारतीय राजनीति की मौलिक भूलें’ लेख लिख कर तत्कालीन भारतीय राजनीति की समुचित व्याख्या की। 

अपने लेख ‘राष्ट्रजीवन की दशा’ में उन्होंने लिखा कि ‘‘केवल प्रारंभिक आवश्यकताओं की पूर्ति ही मानव जीवन का उद्देश्य नहीं है। भौतिक आवश्यकताओं के साथ ही मनुष्य की आधिभौतिक और आध्यात्मिक आवश्यकताएं भी होती हैं। केवल संास चलती रखने के परे मानव जीवन का एक निश्चित और सबसे निराला लक्ष्य होता है, उपनिषदों ने इस लक्ष्य का वर्णन आत्मा की आवश्यकताओं के रूप में किया है।’’ इसी लेख में उन्होंने आगे लिखा कि ‘‘किन्तु कतिपय विद्वानों को इस अदृश्य शक्ति में विश्वास नहीं। उनके मत में केवल दृश्यजगत ही एकमेव सत्य है। ये लोग भौतिक सुख-साधनों से युक्त जीवन को चरम लक्ष्य मान कर उन सुखों की प्राप्ति के लिए आवश्यक प्रयास करते रहने में ही मानव जीवन की सार्थकता मानते हैं।’’ 
‘पांचजन्य’ में ‘भारतीय संविधान पर एक दृष्टि’ शीर्षक से लेख लिख कर भारतीय राजनीति की संवैधानिक अवस्था एवं उसके संवैधानिक दायित्वों का गंभीरतापूर्वक आकलन किया। उन्होंने भारतीय संविधान में भारतीयता के तत्वों को बढ़ाए जाने की पैरवी की। वे मानते थे कि महापुरुषों के विचारों के अनुरुप राजनीतिक आचरण से राजनीति में शुचिता बनी रह सकती है। 

       भारतीय इतिहास की गौरवशाली परम्पराएं पं. दीनदयाल को सदैव आंदोलित करती रहीं। वे भारतीय संस्कृति पर पड़ने वाले पाश्चात्य संस्कृति के दुष्प्रभावों को दूर करना चाहते थे। उनका मानना था कि अपने जीवन को उत्तम बनाने के लिए महापुरुषों के जीवन से बहुत कुछ सीखा और आत्मसात किया जा सकता है। अपने लेखों में पं. दीनदयाल ने भारतीय इतिहास में राष्ट्रधारा, कर्मवाद एवं स्वतंत्राता प्राप्ति के प्रयासों में तिलक जैसे महानुभावों के राजनीतिक विचारों और उनके भारतीय इतिहास में महत्व का अंाकलन करने का महती कार्य किया। इस संबंध में उनके तीन लेख विशेष उल्लेखनीय हैं- 
(1) भगवान कृष्ण
(2) भारतीय राष्ट्रधारा का पुण्यप्रवाह: गौतमबुद्ध से शंकराचार्य तक
(3) लोकमान्य तिलक की राजनीति
देश के स्वतंत्र होने के बाद लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की प्रथम जयंती के अवसर पर ‘पांचजन्य’ में ‘लोकमान्य तिलक की राजनीति’ लेख लिखा था। ‘भगवान कृष्ण’ तथा ‘भारतीय राष्ट्रधारा का पुण्यप्रवाह: गौतमबुद्ध से शंकराचार्य तक’ लेख ‘राष्ट्रधर्म’ में प्रकाशित हुए थे।
पं. दीनदयाल यह भली-भांति जानते थे कि देश की सांस्कृतिक विरासत को तभी बचाया जा सकता है, राजनीति को उसी स्थिति में दोषमुक्त रखा जा सकता है जब देश की अर्थव्यवस्था सुदृढ़ हो। चूंकि प्रत्येक अर्थव्यवस्था के मूल में राजनीतिक विचार निहित होते हैं अतः उन्हें यह आवश्यक लगता था कि राजनीतिक दलों को पहले अपने आय-व्यय पर समुचित ध्यान देना चाहिए। जहां तक संभव हो राजनीतिक स्तर पर आर्थिक मितव्ययिता बरती जानी चाहिए। इसे वे संवैधानिक आर्थिक ढांचे के लिए बुनियादी तत्व कहते थे। ‘पांचजन्य’ में ‘राजनीतिक आय-व्यय’ शीर्षक से लेख में उन्होंने लिखा था कि जो लोग मात्रा अर्थ एवं सम्पत्ति को सर्वोपरि मानते हैं और जिनका लक्ष्य मात्रा अर्थ है वे साम्यवाद तथा समाजवादी श्रेणी में आते हैं। ऐसे लोग चाहते हैं कि भारतीय राजनीति की धुरी मात्रा अर्थनीति रहे। ऐसे लोगों की दृष्टि में संस्कृति एवं जनमत का कोई महत्व नहीं होता है। उन्होंने ‘टैक्स या लूट’ शीर्षक लेख में कर प्रणाली की निंदा की।

   पं. दीनदयाल के राजनीतिक उसूलों एवं विचारों से सरसंघ चालक गोलवलकर गुरूजी अत्यंत प्रभावित थे। इसीलिए उन्होंने पं. दीनदयाल की क्षमता पर पूरा भरोसा जताते हुए दल की ओर से उन्हें सबसे बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई। सन् 1967 में जनसंघ का चौदहवां अधिवेशन कालीकट में हुआ। दल के सभी पदाधिकारियों ने एकमत से निर्णय लेते हुए पं. दीनदयाल को जनसंघ का अध्यक्ष घोषित किया। पं. दीनदयाल के जनसंघ के अध्यक्ष बनने से भारतीय राजनीति में एक नया अध्याय शुरू हुआ। जनसंघ का अध्यक्ष बनने के बाद पं. दीनदयाल का ध्यान इस ओर गया कि जनसंघ की छवि एक हिन्दू सम्प्रदायवादी संस्था के रूप में मानी जा रही है। वे अपने दल को किसी सम्प्रदायवादी शक्ति नहीं वरन् देशभक्ति की शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहते थे। देखा जाए तो आज जब हमारा देश ग्लोबल एप्रोच में शीर्ष पर है, पं. दीनदयाल उपाध्याय के राष्ट्रवादी शुचितापूर्ण राजनीति की ही आवश्यकता है।
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