बतकाव बिन्ना की
बिना खबर करे धमकबे वारों को का करो जाए
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
मैं भैयाजी के इते पौंची तो मैंने देखी के भैयाजी पलकां पे बैठे अखबार बांच रए हते औ भौजी चौका में हतीं। बे दिखा ने रई हतीं मनो सुना जरूर पर रई हतीं। अब आप सोच रए हुइयो के जो दिखा ने पर रओ, बा सुना कैसे पर रओ? हो सकत के बा गाना गा रओ होए जीसें अटकल लगा लई जाए। मनो गाना गाबे वारो चौका मेंई आए, जै कैसे पतो? सो बा ऐसे पतो के हमाई भौजी चौका में बासन पटका-पटकी कर रई हतीं। मनो बे तोड़-फोड़ ने कर रई हतीं, लेकन यां से वां जोर-जोर से उठा-धर कर रई हतीं।
‘‘भौजी खों का हो गऔ जो बे बासन काए पटक रईं? उनको मूड आपने बिगारो का?’’ मैंने पूछी।
‘‘हम काए खों बिगारहें? हमने कछू नईं करो!’’ भैयाजी तुरतईं बोले।
‘‘सो का बात हो गई?’’ मैंने पूछी।
‘‘मोए तो कछू बता नई रईं, तुमई पूछ लेओ। कओ तुमें कछू बता दैवें।’’ भैयाजी बोले।
‘‘भौजी! चाय बना रईं का?’’ मैंने उतई से बैठे-बैठे भौजी खों आवाज लगाई।
‘‘बना तो नईं रए हते, मनो अब तुम आ गईं सो बना देत हैं।’’ भौजी ने उतई चौका से उत्तर दओ।
कछू देर में भौजी चाय ले के आ गईं। तब लौं हम दोई अटकल लगात रए के भौजी को का हो गओ?
‘‘का हो गओ भौजी? आपको मूड खराब सो दिखा रओ।’’ मैंने भौजी से पूछी।
‘खराब सो होई गओ आए।’’ भौजी भिनकत सी बोलीं।
‘‘का हा गओ? बताओ तो कछू।’’ मैंने भौजी से पूछी।
‘‘अरे अब का बताएं! का भओ के आज तुमाए भैयाजी खों पोस्टआॅफिस जाने रओ कछू काम से। जे निकरे सो हमने सोची के हम कछू देर झपकी मार लेंवे। काए से के रात को नींद ऊंसई ने आई हती। बा आंधी-मांधी चली रई सो लाईट चली गई रई। गरमी से नींद ने आई रई।’’ भौजी बतान लगीं।
‘‘फेर?’’ मैंने पूछी।
‘‘फेर का? हमें झपकी लगई हती के दरवाजा की घंटी कोऊ बजान लगो। हमाई नींद खुल गई। हमने सोची के को हो सकत आए? हमने अबे औन लाईन कछू मंगाओ नईयां, सो बा डिलीवरी वारो हो नईं सकत आए। कोनऊं चिठिया लिखत नईयां सो पोस्टमेन के आबे को सवालई नईं उठत आए। जब लौं हमने अटकलें लगाई, उत्ते में तो बा आबे वारे ने इत्ती बेर घंटी बजा दई के हमें लगो के बा दरवाजा की घंटी बिगार के मानहे। हमें भौतई गुस्सा आई। हमने जा के दरवाजो खोलो। देखो तो समाने तुमाए भैयाजी के एक दोस्त ठाढ़े। हमने उनसे कई के भैयाजी तो घरे नइयां। का उने पतो रओ के आप उनसे मिलबे आने वारे हैं? मैंने उनसे पूछी। सो बे बोले के नईं, हम तो सरप्राईज देबे खों चले आए। चलो कोई नईं, उनको नईं तो आपके लाने तो सरप्राइज होई गओ। कैत भए बे दांत निपोरत भए सोफा में पसर गए। भौजी एक कप चाय सो पिला देओ। ऊपर से आदेस सोई दे दओ। हमाओ तो मूड़ भिनक गओ। मनो अब बे तुमाए भैया के दोस्त हते सो हम कछू कर्रो बोल नईं सकत्ते। मनो हमने इत्तो जरूर कओ के आपको आबे से पहले इनको मोबाईल पे घंटी कर लेने रओ, बे फेर कऊं ने जाते। जा सुन के बे दांत निपोरी करन लगे। बाकी हमने उनको चाय पिलाई। मनो तब तक हमाई नींद को बेड़ा गरक हो गओ रओ।’’ भौजी ने अपनी पूरी परेसानी बताई औ फेर बोलीं,‘‘अब तुमई बताओ बिन्ना के जो का बात भई? अरे आज के जमाना में तुमाए हाथ में मोबाईल रैत आए, एक घंटी करो औ पूछ लेओ के कबे आएं? कऊं ऐसे कोनऊं के इते धमकने परत आए?’’
‘‘सई कई भौजी। भौतई दिमाग खराब होत आए। मोरे संगे सो औरई सल्ल आए। कछू जने ऐसे आएं जो बिगैर घंटी करे आ धमकत आएं। औ होत का आए के जो मैं घर पे मिली सो चलो फेर बी ठीक, मनो जो मैं घर पे नईं औ तारो डरो मिलो तो बे उलायना देबे टिकत आएं के हम आए हते औ आप मिली नईं। अरे भैया, मोए सपनों ने आओ रओ के आप आ रए। मनो उनको का बे तो अपनी सुविदा देखत आएं। दूसरे का कां परी।’’ मैंने बी भौजी खों बताओ।
‘‘हऔ, मनो कोऊ सो रओ होए, कोऊ कछू काम करओ होए औ आप इकदम से धमक परो, सो मूंड़ सो भिन्नाहे ई।’’ भौजी बोलीं।
‘‘अरे, तुमें ऊको भगा दओ चाइए रओ।’’ भैयाजी बोल परे।
‘‘हऔ, आपई तो ऊकी तारीफें करत फिरत हो, सो हम कैसे भगा देते? फेर आपई कैते के हमाए दोस्त खों काए भगा दओ?’’ भौजी चिड़चिड़ात भई बोलीं।
‘‘सई में भौजी! ऐसो करबे वारों पे मोए सोई भौतई गुस्सा आत आए। आप खों याद हुइए के पैसे अपने मोहल्ला में एक डाॅक्टर साब रैत्ते। सो हम ओरन की चिनारी के जित्ते जने उनके इते दिखाबे के लाने आत्ते, बे सबई उते अपनो नंबर आने तक लौं मोए इते आ के बैठ जात्ते। अब उनको भगाओ बी नई जा सकत्तो औ कऊं जरूरी जाने हो तो जाते बी नईं बनत्तो। काए से के उनको लगतो के उने भगाओ जा रओ। बे ओरे बी फोन करे बिगैर आ जात्ते। मनो आ कछू क रै होओ, सबरे काम को राम नाम सत्त! अब्बी कछू जने ऐसे आएं के बिगैर घंटी मारे आ धमकत आएं। औ ने मिल पाओ सो बुरए बनो के मनो जानबूझ के घरे ने हते। उल्टो चोर कोतवाल खों डांटे।’’ मैंने कई।
‘‘ऐसई तो मोरे संगे एक दिन और भओ रओ। मैं अथानों डार रई हती के एक बाई अपने लोहरे मोड़ा के संगे चली आईं। हमने ऊसे कई बी के बाई आबे के पैले घंटी तो कर लेतीं। मनो बा बोली के हम इते से कढ़ रए हते सो हमने सोची के आप से मिलत चलें। मिलबो तो ठीक, मनो ऊको मोड़ा इत्तो ऊधमी के का बताओ जाएं। ऊनें हमाओ अथानों को मसालो बिगार दओ। अब बा तो बच्चा ठैरो। ऊसे हम का कैते, सो गम्मा खा के रै गए। मनो हमाओ पूरो अथानों खराब हो गओ। बड़ो नुकसान भओ। अब जो ऊने हमें फोन कर के बता दओ होतो के बा आ रई आए तो हम ऊ टेम पे अथानों ने डारते।’’ भौजी ने बताई।
‘‘सई में भौजी, बड़ो बुरौ लगत आए। एक तो आप कछू कै नई सकते औ अपनों सारो टाईमटेबल सोई गड़बड़ा जात आए।’’ मैंने कई।
‘‘जे तो आए बिन्ना!’’ भैयाजी बोले,‘‘पैले जबे मोबाईल ने हतो तो चलो कछू नईं, बिन बताए पौंच गए सो पौंच गए। मनो अब तो पैले पूछ लेओ चाइए तब कोनऊं के घरे जाओ चाइए। अरे, सामने वारे की बी तो तनक सोचो। मोबाईल का सिरफ सोसल मीडिया खेलबे के लाने होत आए?’’
‘‘सई में भैयाजी! ऐसे सरप्राईज़ देबे वारे कोन पुसात आएं।’’मैंने कई। मनो तब तक भौजी अपने जी की कै के हल्की हो चुकी हतीं। बे अब तनक मुस्का-मुस्का के बतकाव कर रई हतीं। जा देख के मोए अच्छो सो लगो।
बाकी बतकाव हती सो बढ़ी गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के कोनऊं के घरे जाबे के पैले फोन कर के ऊकी सुविदा जान लई चाइए के नईं, के ऊंसई धमक परने चाइए?
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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