Thursday, April 30, 2026

बतकाव बिन्ना की | जबे भैयाजी खों बेताल मिलो | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की  
जबे भैयाजी खों बेताल मिलो  
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
‘‘देख तो बिन्ना का हो गओ तुमाए भैयाजी खों?’’ भौजी घबड़ानी सी मोसे बोलीं।
मैंने देखी के भैयाजी को मों पीलो सो दिखा रओ तो औ बे कोनऊं सोंस-फिकर में डूबे हते। उनकी दसा देख के मोए सोई चिंता भई।
‘‘का हो गओ भैयाजी? तबीयत तो ठीक आए?’’ मैंने पूछी। भैयाजी ने मोरे तरफी देखी, मनो मों ने बोले।
‘‘आपको मों पीलो सो पड़ो दिखा रओ, कऊं पीलिया तो नई हो गओ? जांच के लाने बा पैथलाजी वारे खों फोन कर रई।’’ मैंने भैयाजी से कई औ अपनो मोबाईल पे पैथलाजी वारे को नंबर टूंकने लगी। 
‘‘अरे नईं, ऊको ने बुलाओ। मोरी तबीयत ठीक आए।’’ भैयाजी हड़बड़ा के तुरतईं बोले।
‘‘जो तबीयत ठीक आए, सो फेर गड़बड़ का आए? आपको मों पीलो पड़ो काए दिखा रओ?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘हम सोई तुमाए भैयाजी से पूंछ-पूंछ के हार गए मनो जे तो अपनो मोंई नईं खोल लए। अरे, जो कछू दरद पीरा होए सो बताओ तो ऊको कछू इलाज करो जाए।’’ भौजी बोलीं।
‘‘सई कै रईं भौजी!’’ मैंने भौजी की बात पे हामी भरी औ फेर भैयाजी से पूछी,‘‘देखों भैयाजी, भौजी कित्ती परेसान हो रईं तनक इनकी सोचो औ बताओ के का पीरा आए?
‘‘हम कोनऊं खो परेसान नई करो चात आएं मनो अब हम का करें हमें खुदई समझ नई पर रई।’’ भौयाजी भैराने से बोले।
‘‘अरे कछू तो कओ!’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘का आए बिन्ना के कल रात हमें बेताल मिलो रओ।’’ भैयाजी तनक धीमें से बोले।
‘‘कोन बेताल? अपने इते को आए?’’ मैंने पूछी। 
‘‘बोई राजा बिक्रमादित्य वारो बेताल।’’ भैयाजी तनक संकोच करत भए बोले।
‘‘राजा बिक्रमादित्य वारो बेताल? का कै रए आप? आपकी तबीयत ठीक नई लग रई मोए। मनो जड़कारो होतो तो मोए लगतो के आपको सन्निपात हो गओ आए औ बोई में आप बर्राया रए। बाकी जा तो भरी गरमी आए। कऊं आपकी खपड़िया में गरमी तो नईं भर गई?’’ अब मोए सोए चिन्ता होन लगी।
‘‘अरे, गरमी नोईं भरी। सई बता रए के रात खों हमें राजा बिक्रमादित्य को बेताल मिलो रओ।’’ भैयाजी बोले। अबकी उनकी आवाज तनक तेज हती। मनो बे पूरे कांफिडेंस में बोले।
‘‘सो कां मिलो बो आपको? औ आपने ऊको कैसे चीन्हों? ऊने का कई आपसे?’’ मैंने सोई बंदूक की गोलियन घांई सवाल दाग दए। 
‘‘बा हमाए सपना में मिलो हमसे। बा बी भुनसारे के सपना में। कओ जात आए के भुनसारे को सपना सच होत आए।’’ भैयाजी डरात से बोले।
‘‘अरे, सपना की बात खों ले के ने डराओ आप। सपना सो सपनाई होत आए।’’ मैंने कई।
‘‘अरे नईं बा डराए वारी बात आए।’’ भैयाजी गंभीर होत भए बोले।
‘‘ऐसी का बात आए, तनक बताओ? ऊंसई भी जा कओ जात आए के जो अपने सपना कोऊं खों बता देओ तो बा सई नईं होत आए।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘हऔ बिन्ना जा तो सई आए। हमने बी सुनी आए के जो अपनो भुनसारे को सपना के बारे में को को ऊं खों बता देओ तो बा सच नई होत।’’ भौजी बोलीं।
‘‘हम नईं डरात बेताल-मेताल से, मनो बा दो-तीन दिनां से रोजीना भुनसारे हमाए सपना में आ टपकत आए। औ आज तो ऊने गजबई कर दओ।’’ भैयाजी बोले।
‘‘का करो ऊने?’’ मैं औ भौजी दोई ने संगे पूछी।
‘‘का आए के परों बा हमाए सपना में आए रओ। ऊके पांव ने हते औ बा हवा में उड़त भओ आओ औ हमाए कंधा पे बैठ गओ। हमने पूछी के तुम को आ? सो बा बोलो के हम राजा बिक्रमादित्य को जमाना को बेताल आएं। सो हमने पूछी के तुम अपने राजा खों छोर के इते हमाए कंधा पे काए आ बिराजे? सो बा बोलो के हमें तुमसे कछू सवाल पूछने। सो हमने कई के जो सवाल पूछने बा अपने राजा जू से पूछो। सवाल पूछ पूछ के उनईं की तो तुम खपड़िया खात रैत हो, सो उनईं से पूछो। ई पे बेताल बोलो के हमने उनसे पूछी रई तो बे बोले के हमें तुमाओ सवालई गलत लग रओ सो हम से जे ने पूछो। हमने राजा जू से कई के हमाओ सवाल गलत नोंई, जो कछू हो रओ ओई के बारे में हमाओ सवाल आए। सो राजानू बोले के भला ऐसो कां होत आए? हमाए समै में तो ऐसो कभ ऊं नईं भओ, सो हम का जानें? जोन बता सकत होए ऊके कंधा पे बैठो जा के। सो हम रात भरे भटकत रए फेर भुनसारे हमें तुमाओ सपनों दिखानों सो हम तुमाए सपना में घुस आए। अब तो तुमें हमाए सवाल को जवाब देनई परहे। जा कई ऊ बेताल ने हमसे।’’ कैत भए भैयाजू तनक सांस लेबे खों ठैरे।
‘‘सो का पूछ ऊने?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘ ऊने हमसे पूछी के आज के तुमाए जमाना में जो का होत रैत आए? कोनऊं एक जांगा टिकत आए के नईं? हमने बेताल से पूछी के तुम काए के बारे में कै रए? तो बा बोलो के हम कई बरस से देख रए के तुमाए इते कऊं को चुनाव होए जत्था के जत्था अपनी पार्टी खों छोर-दार के दूसरे की पार्टी में चले जात आएं? उने जो जेई करने होत आए तो बे चुनाव के भौतई पैले काए नईं कर लेत आए? सो हमने कई के आज के हमाए जमाना में जे सब चलत रैत आए। जेई तो राजनीति आए। सो बा बिगरत भओ बोलो के हमें ने बताओ के राजनीति का आए। हमने सोई खूब राजनीति देखी, मनो ई टाईप की नईं देखी। पैले तो राजा हरें आपस में मरत-कटत रैत्ते मनो एक-दूसरे की पाली में ने जाउत्ते। औ अब तो जुट्ट बना के इते से उते के हो जात आएं। जो कोन सी राजनीति आए? जेई हमाओ सवाल आए, जवाब देओ ने तो तुमाए मुंडा के टुकड़ा हो जाहें। हमने कई के ऐसे कैसे हो जाहें? तुमने का अपने राजा जू को जमाना समझ रखो आए? ई जमाना में टीवी न्यूज पे डिबेट करबे वारे ई अपनी पकर-पकर से कोऊ के मुंडा के टुकड़ा कर सकत आएं। तुमसे हम नई डरा रए। हमने इत्ती ऊसे कई के बा कछू बोल पातो, मनो तुमाई भौजी ने महें हला-हला के जगा दओ। सो हमाओ सपनो खतम हो गओ औ बा बेताल बी चलो गओ।’’ भैयाजी बोले।
‘‘फेर काए डरा रए?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘कल रात भुनसारे बा फेर के हमाए सपना में घुस आओ। औ कैन लगो के कल तो हम तुमसे जवाब ने ले पाए मनो आज बताओ हमें ने तो तुमाए मुंडा के टुकड़ा हो जाहें। जा सुन के हमें गुस्सा सो आ गओ औ हमने ऊको दुत्कारो के चल भग, तैं बड़ो आओ सवाल पूछबे वारो। अरे इते तो सरकाई सवाल पूंछ-पूंछ के पगला देत आए। कऊं जा जानकारी देओ, क ऊं बा जानकारी देओ। अबई बे सबई कछू पूछन वारे आहें जोन खों जा बी बताने परहे के कोन सो नाज खात आएं औ टाईप के गुसल में फारिग होत आएं। का तुमाए जमाने में ई टाईप के सवाल पब्लिक से पूछे जात्ते? हमने उल्टे ऊ बेताल से सवाल करी। तो बा अपनो सो मों ले के बोलो के ऐसे सवाल तो ऊ टेम पे कोन ऊं ने पूछत्तो। सो हमने कई के जेई से हम कै रए के हमाओ दिमाग ने खाओ औ हमसे कछू ने पूछो। पर बो न मानो, बोलो के जा तो तुमें बताने ई परहे के ई जमाना में ऐसो पाली बदल काए होत रैत आए? सो हमने कई मालक! जे तो खुद भगवान जू बी नईं बता सकत सो हम का बताबी। मनो बा तो अड़ो हतो। बोलो के जे सई जबाव ने भओ। तुम तो हमें सई जवाब बताओ। हम कछू कै पाते के तुमाई भौजी ने हमें जगा दओ औ ऊ बेताल से हमाओ पीछो छूटो।’’ भैयाजी बोले।
‘‘जो ऊसे कलई पीछो छूट गओ सो अब आज आप काए डरा रए?’’ मैंने पूछी।
‘‘का भओ के आज बा फेर हमाए भुनसारे के सपना में घुस आओ औ पूछन लगो के, बो दिल्ली को झाडू वारो सोई फूल वारे के इते पौंच जाहे का? ईको तो जवाब देनई परहे ने तो तुमाओ मुंडा कल को भुनसारो ने देख पाहे। अब तुमई बताओ बिन्ना के हम ऊको का जवाब देते? जे तो कोन ऊं खों नई पतो के चोखरवा को बिल से निकरहे औ को बिल में जाहे? हम ऊको का बताऊते। सो हमने कई मालक! जे जाके कोनऊं टीवी न्यूज वारे से पूछो बोई बताहे। हमाओ पीछो छोरो। जा सुन के ऊने हमें आंखें दिखाई औ चलो गओ। मनो अब हमें लग रओ के कईं सई में हम कल को भुनसारो देख पाहें के नईं? बा कल हमाओ मूंड़ तो ने फोर डारहे?’’ भैयाजी डरात भए बोले।
‘‘ने घबराओ आप। आपने ऊको सई जांगा भेजो। अब बो कभऊं पलट के ई जमाना में ने आहे। आप निष्फिकर रओ।’’ मैंने भैयाजी खों सहूरी बंधाई।
बाकी बतकाव हती सो बढ़ी गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के का बे झाडू वारे भैया सोई फूल सूंघत भए ओई दूसरी तरफी चले जाहें, के अपना जांगा पे डटे रैहें? 
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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