Saturday, August 17, 2024
शून्यकाल | स्वतंत्रता मात्र एक शब्द नहीं, पर्याय है हमारे अस्तित्व का | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर
Wednesday, August 26, 2020
चर्चा प्लस | अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम ट्रोलिंग ट्रेंड | डॉ शरद सिंह
- डॉ शरद सिंह
अधिवक्ता प्रशांत भूषण के ट्वीट बनाम अदालत की अवमानना केस ने इन दिनों अभिव्यक्ति की आजादी को ले कर एक बहस छेड़ दी है। वहीं इंटरनेट पर ट्रोलिंग एक ऐसा ट्रेंड बन चुका है जिसका शिकार कई सेलिब्रेटी हो चुके है। हमारे लोकतंत्र ने हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी है जो हमारी सबसे बड़ी शक्ति है। हम अपनी बात रखने के लिए स्वतंत्र है। इंटरनेट और सोशल मीडिया ने वह प्लेटफॉर्म दिया जहां लोग अपने विचार रख सकते हैं लेकिन आजकल लोग इसे हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। इसी स्वतंत्रता के नाम पर महिलाओं के बारे में अभद्र टिप्पणी करना, लोगों को गालियां देना, उन पर फिकरे कसना, उन का माखौल उड़ाना, ये सब आम हो गया है।
इन दिनों अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर सबसे ताज़ा चर्चा अधिवक्ता प्रशांत भूषण के ट्वीट बनाम अदालत की अवमानना की है। प्रशांत भूषण के ट्वीट को अदालत की अवमानना मान कर उन्हें क्षमा मांगने को कहा गया। क्षमा नहीं मांगने पर सज़ा दिए जाने की बात से भी आगाह किया गया। वहीं प्रशांत भूषण ने अपनी स्टेटमेंट में माफी मांगने से इनकार कर दिया। प्रशांत भूषण ने कहा कि वह अदालत का बहुत सम्मान करते हैं लेकिन माफी मांगना उनकी अंतरात्मा की अवमानना होगी। 20 अगस्त को हुई सुनवाई के दौरान प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट में महात्मा गांधी के बयान का हवाला देते हुए कहा कि न मुझे दया चाहिए, न मैं इसकी मांग कर रहा हूं। मैं कोई उदारता भी नहीं चाह रहा हूं, कोर्ट जो भी सजा देगी मैं उसे सहर्ष लेने को तैयार हूं। प्रशांत भूषण के इस प्रकरण के साथ ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बहस छिड़ गई है।
किसी सूचना या विचार को बोलकर, लिखकर या किसी अन्य रूप में बिना किसी रोकटोक के अभिव्यक्त करने की स्वतंत्रता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कहलाती है। अतः अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की हमेशा कुछ न कुछ सीमा अवश्य होती है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 (1) के तहत सभी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी गयी है। वहीं, भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 संविधान के मौलिक अधिकार का एक हिस्सा है, जिसमे यह कहा गया है कि भारत में कानून द्वारा स्थापित किसी भी प्रक्रिया के आलावा कोई भी व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति को उसके जीवित रहने के अधिकार और निजी स्वतंत्रता से वंचित नहीं कर सकता है। इसके तहत सीधे सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का अधिकार होता है।प्रश्न उठता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आज के समय में क्या कोई सीमा सुनिश्चित की जा सकती है जब सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति का एक विस्तृत प्लेटफॉर्म दे रखा है। इस प्लेटफॉर्म के अच्छे और बूरे पहलू दोनों हैं। अच्छा पहलू यह है लिए इसने अनेक बार लोगों का जीवन बचाने और न्याय दिलाने में महती भूमिका निभाई है। किसी बच्चे के गुम हो जाने अथवा किसी गुमें हुए बच्चे के परिवार का पता लगाने में व्हाट्सएप्प जैसे माध्यमों ने सकारात्मक परिणाम दिए हैं। इसी तरह यदि किसी घायल या बीमार को रक्त की ज़रूरत हो तो सोशल मीडिया पर संदेश वायरल होते ही जल्दी से जल्दी रक्त उपलब्ध हुआ है। लेकिन सोशल मीडिया का दूसरा पहलू जो कभी-कभी एक पागलपन में ढलता दिखाई देता है, वह चिंताजनक है। यह पहलू है किसी व्यक्ति या मुद्दे को ट्रोल किए जाने का। जब बात किसी व्यक्ति की हो तो स्थिति मानहानि से भी बदतर होने लगती है। छद्मनामी ट्रोलर बेलगाम तरीके से किसी भी नामी व्यक्ति को ट्रोल करने में इस तरह जुट जाते हैं गोया इसके अलावा उन्हें अपने जीवन में और कोई काम ही न हो। इंटरनेट पर ट्रोलिंग एक ट्रेंड बन चुका है। इसका शिकार कई सेलिब्रेटी हो चुके है। हमारे लोकतंत्र ने हमें एक आज़ादी दी है वो है अभिव्यक्ति की। हम अपनी बात रखने के लिए स्वतंत्र है। इंटरनेट और सोशल मीडिया एक जरिया है जहां लोग अपने विचार रख सकते है, पर आजकल लोग इसे हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। इसी स्वतंत्रता के नाम पर महिलाओं के बारे में अभद्र टिप्पणी करना, लोगो को गालियां देना, उन पर फिकरे कसना, उन का मखौल उड़ाना, ये सब आम हो गया है। जबकि अभिव्यक्ति की आज़ादी किसी का अपमान करने की आज़ादी नहीं देती है।
देखा जाए तो सोशल मीडिया उस आम नागरिक के लिए वरदान है जिसे अपनी अभिव्यक्ति को दूसरों तक पहुंचाने के लिए कोई मंच अथवा प्रकाशन नहीं मिल पाता था। इसने अनेक ऐसे अकेले बुजुर्गों के जीवन को समाज (भले ही आभासीय) से जोड़ दिया जो अपने अकेलेपन के कारण अवसादग्रस्त जीवन जीने को विवश रहते थे। लेकिन वहीं दूसरी ओर अनियंत्रित और अमर्यादित अभिव्यक्ति ने सोशल मीडिया को क्षति पहुंचाना शुरू कर दिया है। दूसरे से असहमति होने पर गाली-गलौज करना, धमकियां देना और अश्लील व्यवहार करना आम होता जा रहा है। कहा तो यह भी जाता है कि आजकल राजनीतिक दल वेतन के आधार पर ट्रोलर नौकरी पर रखते हैं जिनका काम दिन-रात ऐसे लोगों के खिलाफ आग उगलना होता है जो विरोधी दल के हों। ट्रोलर्स की भूमिका उस समय घातक हो जाती है जब वे जजमेंट करने पर उतारू हो जाते हैं। कौन दोषी है और कौन नहीं? इसका फैसला वे व्यक्ति कैसे कर सकते हैं जिन्हें न तो कानून का ज्ञान होता है और न मामले की गहराई से जानकारी होती है। ऐसे मामलों में अकसर पक्ष और विपक्ष की संख्या प्रभावी रहती है। जिसका पलड़ा भारी हो, बाकी कमेंट्स भी उसी हैसटैग पर नत्थी होते जाते हैं।
जैसे-जैसे सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग का अमार्यादित चलन बढ़ता जा रहा है वैसे-वैसे सरकार ही नहीं बल्कि सोशल मीडिया से जुड़ा हर संवेदनशील नागरिक सोशल मीडिया के नियमन की आवश्यकता को महसूस करने लगा है। सरकारें तो अभिव्यक्ति पर नियंत्रण रखने के अवसर ढूंढती ही रहती हैं लेकिन अब सोशल मीडिया के नियमन की मांगें नागरिक समाज और न्यायपालिका की ओर से भी आने लगी हैं। सोशल मीडिया का जिस व्यापक पैमाने पर सुनियोजित रूप से दुरुपयोग किया जा रहा है और उस पर जिस प्रकार का अमर्यादित एवं उच्छृंखल व्यवहार देखने में आ रहा है, वह किसी को भी चिंतित करने के लिए पर्याप्त है। जहां एक ओर सोशल मीडिया के कारण ऐसे व्यक्ति को भी अपने विचार प्रकट करने का मंच मिल गया है जिसे पहले कोई मंच उपलब्ध नहीं था, वहीं दूसरी ओर वह निर्बाध, अनियंत्रित और अमर्यादित अभिव्यक्ति का मंच बन गया है। दूसरे से असहमति होने पर गाली-गलौज करना, धमकियां देना और अश्लील व्यवहार करना आम होता जा रहा है। महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू आदि के भी फर्जी चित्र सोशल मीडिया पर प्रसारित किए जा चुके हैं जिनमें फोटोशॉप के इस्तेमाल द्वारा परिवर्तन करके उनका चरित्र हनन किया जाता है। व्यक्ति और समुदायविशेष के खिलाफ नफरत फैलाने और दंगों की भूमिका बनाने में भी सोशल मीडिया की सक्रियता देखी गई है। इसलिए अब सुप्रीम कोर्ट ने भी सोशल मीडिया के नियमन के लिए कानून बनाए जाने की जरूरत बताई है और सरकार से इस बारे में कानून बनाने को कहा है।
सन् 2009 में तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार द्वारा बनाए गए सूचना तकनीकी कानून के अनुच्छेद 66ए में पुलिस को कंप्यूटर या किसी भी अन्य प्रकार के साधन द्वारा भेजी गई किसी भी ऐसी चीज के लिये भेजने वाले को गिरफ्तार करने का अधिकार दे दिया गया था जो उसकी निगाह में आपत्तिजनक हो। पुलिस ने इस अनुच्छेद का इस्तेमाल करके अनेक प्रकार के मामलों में गिरफ्तारियां कीं। इसलिए इसे सुप्रीम कोर्ट ने सन् 2015 में असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया। इसके बाद केंद्र सरकार ने इस मामले की तह तक जाने के लिए एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया। इस समिति की रिपोर्ट ने भारतीय दंड संहिता, फौजदारी प्रक्रिया संहिता और सूचना तकनीकी कानून में संशोधन करके सख्त सजाओं का प्रावधान किए जाने की सिफारिश की। इनमें एक सिफारिश यह भी है कि किसी भी किस्म की सामग्री द्वारा नफरत फैलाने के अपराध के लिए दो साल की कैद या पांच हजार रुपये जुर्माना या फिर दोनों की सजा निर्धारित की जाए। भय या आशंका फैलाने या हिंसा के लिए उकसाने के लिए भी एक साल की कैद या पांच हजार रुपये या फिर दोनों की सजा की सिफारिश की गई। जांच प्रक्रिया के बारे में भी कई किस्म के संशोधन सुझाए गए।
आज स्थिति यहां तक जा पहुंची है कि फाली नरीमन और हरीश साल्वे जैसे देश के चोटी के विधिवेत्ता भी ट्रोलिंग जजमेंट के कारण सोशल मीडिया को घातक मानने लगे हैं। कहीं ऐसा न हो कि जिस प्रकार व्हाट्सएप्प के मॉबलिंचिंग में दुरुपयोग के कारण मैसेजिंग की सीमा एक साथ पांच मैसेज तक घटा दी गई। कहीं ऐसा न हो कि व्हाट्सएप्प मैसेजिंग की भांति हमें ट्रोलर्स के कारण सोशल मीडिया के कई लाभों से वंचित होना पड़े़ और हम अपनी अभिव्यक्ति की आजादी को अपने ही हाथों कम करवा डालें।
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(दैनिक सागर दिनकर में 26.08.2020 को प्रकाशित)
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Saturday, August 15, 2020
स्वतंत्रता : मात्र एक शब्द नहीं - डाॅ शरद सिंह, सागर दिनकर में प्रकाशित विशेष लेख
स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं
🌷इस अवसर पर पढ़िए मेरा विशेष लेख...
स्वतंत्रता: मात्र एक शब्द नहीं
- डाॅ शरद सिंह
स्वतंत्रता, आज़ादी, इंडेपेंडेंस - हर भाषा में अलग शब्द लेकिन भावना एक ही है जिसका अर्थ है बोलने, लिखने, पढ़ने और अपने ढंग से जीने की स्वतंत्रता। जी हां, स्वतंत्रता मात्र एक शब्द नहीं है, यह तो मानव जीवन की मूल भावना है। इसीलिए जब कोई इस मूल भावना का दुरुपयोग करने की कोशिश करता है तो वह अपने जीवन का दुरुपयोग कर रहा होता है। इसीलिए स्वतंत्रता शब्द के मूलभाव को आज समझने की बहुत ज़रूरत है।
आज यदि किसी से पूछा जाए कि स्वतंत्रता का क्या अर्थ है तो वह बेहिचक धाराप्रवाह अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बातें करने लगेगा। यदि वह युवा है और उसके माता-पिता उस पर अंकुश रखते हैं तो वह अपने माता-पिता के अंकुश से स्वतंत्र होने की बात करेगा। यदि कोई व्यक्ति पारिवारिक पेरेशानियों में फंसा हुआ है तो उन परेशानियों से मुक्ति में ही उसे अपनी स्वतंत्रता दिखाई देगी। यदि कोई आॅफिस के कामों के बोझ से लदा हुआ है तो उसके लिए उस बोझ से मुक्ति ही स्वतंत्रता है। यानी आज हम स्वतंत्रता के निहायत व्यक्तिगत संस्करणों के साथ जीने लगे हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि हमने अपनी आंखों से स्वतंत्रता आंदोलन नहीं देखा है। जिन्होंने देखा है, वे हमारे बुजुर्ग हैं और हमारे पास उनके संस्मरण सुनने, उनसे अंाखों देखा हाल जानने की फुर्सत नहीं है। ऐसी दशा में हम स्वतंत्रता को स्वतंत्रता दिवस से जोड़ कर एक दिन के लिए समारोही हो जाना पसंद करते हैं, उससे आगे हमें सोचने की फुर्सत नहीं होती है। जबकि स्वतंत्रता मात्र एक शब्द नहीं है, यह अपने आप में एक ऐसी व्यवस्था है जो मनुष्य को मनुष्य होने का बोध कराती है।
यदि आज टिक-टाॅक या व्हाट्सएप्प पर नियंत्रण की बात आती है तो हमें लगता है कि हमारी स्वतंत्रता छिनी जा रही है। अभी साल-डेढ़ साल पहले यही हुआ। व्हाट्एप्प पर पांच से अधिक मैसेजे एक साथ करने पर पाबंदी लगा दी गई। जिस पर व्हाट्सएप्प यूज़र को लगा कि उनकी स्वतंत्रता को सीमित कर दिया गया है। एक बौखलाहट भरा स्वर उभरा लेकिन जल्दी ही यह स्वर शांत भी हो गया क्योंकि लोगों ने इस वास्तविकता को स्वीकार किया कि माॅबलिचिंग के कारण ऐसी पाबंदी लगाई गई थी। किसी भी घटना के होने और उसे समझने के बीच ही सारी कठिनाइयां छिपी रहती हैं जैसे ही बात समझ में आ जाती है मुश्क़िलें भी दूर होने लगती हैं। इसीलिए हमें समझना होगा कि स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ हमारी व्यक्तिगत स्वतंत्रता नहीं बल्कि देश की स्वतंत्रता है। यदि देश स्वतंत्र है तो हम स्वतंत्र हैं। इसलिए देश की स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए उस स्वतंत्रता के प्रति जो भी जरूरी है वह हमें करना होगा। जैसे-आत्मनिर्भरता, आत्मसंयम, समझदारी, अपने मतदान अधिकार का सही प्रयोग, गलत बातों का खुल कर विरोध, अच्छी बातों का मुखर हो कर समर्थन आदि।
मुखर होने का मतलब यह नहीं है कि जो जी में आए वह अनाप-शनाप बका जाए। इनदिनों टेलीविज़न के अधिकांश समाचार चैनलों में जिस तरह की डिबेट होती है उसे देख-सुन कर यही लगता है जैसे इंसान आपस में चर्चा नहीं कर रहे हैं बल्कि जानवर एक दूसरे पर चींख-चिल्ला रहे हैं। एक तो उनकी चींख-चिल्लाहट में आवाजें एक-दूसरे पर इतनी बोव्हरलेप होती हैं कि उन्हें समझना कठिन रहता है। यदि समझ में आ भी जाएं तो यह समझ में नहीं आता है कि वे डिबेटियर्स मूल मुद्दे से भटक कर कितनी दूर निकल गए हैं। यदि राजनीतिक डिबेट हुई तो एक-दूसरे के नेताओं की जन्मपत्रियां खुलने लगती हैं। भले ही उससे मूल विषय का कोई सरोकार न हो। यह आमजन को भटकाने का बड़ा सुंदर तरीका है जो बोलने की स्वतंत्रता का लाभ उठाते हुए अपना लिया गया है। एक डिबेटियर की हार्टअटैक से मौत के बाद स्थिति की गंभीरता को समझते हुए इलेक्ट्राॅनिक मीडिया को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरुपयोग करने से स्वयं को रोकना होगा, इसके पहले कि किसी कठोर कानून के शिकंजे में उन्हें जकड़ा जाए।
जब हम स्वतंत्रता की बात करते हैं तो आर्थिक स्वतंत्रता भी मायने रखती है। इसी से शुरू होता है आत्मनिर्भरता का सफर। देखा जाए तो आत्मनिर्भरता और आर्थिक स्वतंत्रता एक-दूसरे के पूरक हैं। यदि हम आत्मनिर्भर हैं तो हम स्वतंत्रतापूर्वक अपने आर्थिक संसाधनों का उपभोग कर सकते हैं। वहीं यदि हम अपने आर्थिक संसाधनों पूरा उपयोग करते हुए स्वदेशी को महत्व देंगे तो आत्मनिर्भरता बढ़ती जाएगी। यदि चीन दुनिया के बाज़ार पर पांव पसार सकता है तो हम क्यों नहीं। हमारे यहां तो चीन से अधिक स्वतंत्रता है। लेकिन एक कमी है जिसके कारण हम चीन से पिछड़ जाते हैं। वह कारण है भ्रष्टाचार। भ्रष्टाचार ने आज तक हज़ारों उद्यमियों को पनपने से पहले ही तोड़ कर मसल दिया है। जब फाइलें ही आगे नहीं सरकेंगी तो उद्योग के पहिए कैसे घूमेंगे? ऐसे भ्रष्टाचारी तत्व जिस तरह स्वतंत्रता का दुरुपयोग करते हैं उसे देख कर बड़े-बुजुर्ग यह कहने को मजबूर हो जाते हैं कि इससे तो अंग्रेजों का जमाना अच्छा थां यदि हमारे बड़े-बुजुर्गों की यह पीड़ा हमारी चेतना को झकझोर नहीं पाती है तो इसका अर्थ है कि हम स्वतंत्रता का आदर करना ही नहीं जानते हैं।
यदि बात हम अपने समाज की करें तो हमने सामाजिक स्वतंत्रता तो पाई है लेकिन जात-पांत, ऊंच-नीच, साम्प्रदायिकता आदि से आज भी मुक्त नहीं हुए हैं। आज भी हमारी चर्चा का विषय आरक्षण के मुद्दे पर अटका रहता है। उससे आगे सोचने की आदत हमें नहीं पड़ी है। क्योंकि राजनेता अपने निहित स्वार्थों के चलते आगे नहीं सोचने देना चाहते हैं। जहां हमें सामाजिक समानता ज़मीन पर खड़े होना चाहिए था वहां आज हम और भी छोटी-छोटी इकाइयों में बंटते जा रहे हैं। आज समाज का हर वर्ग अपने तरह का अलग-अलग वोट बैंक बन गया है। यही हाल धर्म का है। ईश्वर एक है के तथ्य को मानते हुए भी हर धर्म एक है को हम नहीं मान पाते हैं। हमारे भीतर के धार्मिक उन्माद को मिटाने के बजाए उसे बढ़ा कर हमें वोटबैंक में बदला जाता है और हम खुद को बदलने देते हैं।
देश को स्वतंत्रता मिले 73 साल हो गए लेकिन आज भी हमारे देश में आए दिन बलात्कार के नृशंस अपराध होते रहते हैं जो स्त्री-प्रगति के चित्र पर रक्त के धब्बे के समान दिखाई देते हैं। स्वतंत्रता मिले 73 साल हो गए लेकिन आज भी बेरोजगारी युवाओं को निगलती जा रही है। सच तो यह है कि स्वतंत्रता मिले 73 साल हो गए लेकिन हम स्वतंत्रता के वास्तविक अर्थ को मानो भुलाते जा रहे हैं और स्वतंत्रता के नाम पर अनाचार को बढ़ते देख रहे हैं। यह वह स्वतंत्रता नहीं है जिसके लिए महात्मा गांधी ने डंडे खाए अथवा शहीदों ने फांसी के फंदे को हंसते-हंसते अपने गले में डाला। इसीलिए स्वतंत्रता शब्द के मूलभाव को आज समझने की बहुत ज़रूरत है कि स्वतंत्रता अधिकारों को पाने और उसके सदुपयोग में निहित होती है। स्वतंत्रता स्त्री के सम्मान और आत्मनिर्भरता में मौजूद होती है। स्वतंत्रता स्वस्थ वैचारिक बहस में फलती-फूलती है। जी हां, स्वतंत्रता मात्र एक शब्द नहीं है, यह तो मनुष्य को मनुष्य बनाए रखने वाला आत्मनियंत्रित तंत्र है जिसका पालन करना और सम्मान करना हमारा कर्त्तव्य है।
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(दैनिक सागर दिनकर में 15.08.2020 को प्रकाशित)
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Saturday, August 18, 2018
चर्चा प्लस ...बुंदेलखंड की महिलाएं और सच्ची राजनीतिक भागीदारी - डॉ (सुश्री) शरद सिंह
स्वतंत्रता से बढ़ कर कोई नेमत नहीं
- डॉ. शरद सिंह
जिन्होंने गुलामी की पीड़ा नहीं झेली उनके लिए आजादी के महत्व को महसूस करना ज़रा कठिन हो सकता है लेकिन वे बुजुर्ग स्वतंत्रता का सच्ची मूल्यवत्ता जानते हैं जिन्होंने कभी परतंत्रता में सांस ली थी। वह समय था जब देश भक्ति के तराने गाना भी अपराध था। आज अभिव्यक्ति की आजादी है जो उस समय नहीं थी। इस अभिव्यक्ति आजादी का सम्मान करना भी तो हमारा कर्त्तव्य है। स्वतंत्रता एक नेमत है और इसे सम्हाल कर रखना हमारा दायित्व है।
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| बुंदेलखंड की महिलाएं और सच्ची राजनीतिक भागीदारी - डॉ (सुश्री) शरद सिंह ... चर्चा प्लस ... Column of Dr (Miss) Sharad Singh in Sagar Dinkar News Paper |
आज सुबह ही एक मित्र ने दुखी स्वर में कहा कि अब व्हाट्एप्प पर पांच से अधिक मैसेज एक साथ फारवर्ड नहीं किए जा सकते हैं। उन्हें दार्शनिक संदेश भेजने का शौक है। उनके संदेश किसी को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। उनके संदेशों से किसी माबलिंचिंग की भी रत्ती भर संभावना नहीं रहती है। इसीलिए वे दुखी हैं कि उनके हानिरहित संदेश भी उनके सभी मित्रो के पास एक साथ नहीं पहुंच सकेंगे। अपना यही दुख उन्होंने मेरे सामने प्रकट किया। वे सरकार के प्रति रोषित थे। मैंने उन्हें समझाया कि सरकार को पांच संदेशों की सीमा बांधने की आवश्यकता क्यों पड़ी, यह भी तो सोचिए। देश में मॉबलिंचिंग की अधिकांश घटनाओं में व्हाट्सएप्प पर थोक के भाव भेजे गए संदेशों की अहम भूमिका रही। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए सरकार को यह कदम उठाना पड़ा। देखा जाए तो यह तो एक उदाहरण है अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पाने और उसका दुरुपयोग करने का। इससे पहले मध्यप्रदेश सहित देश के विभिन्न राज्यों में हुए जातीय प्रदर्शनों के दौरान भी इसी तरह के दुरुपयोग का मामला सामने आया था। वस्तुतः हमें प्रजातंत्र के अंतर्गत जो अधिकार मिले हैं उनका सही दिशा में उपयोग करके हम मानवीय संबंधों को सुदृढ़ बना सकते हैं किन्तु उन्हीं अधिकारों का दुरुपयोग कर के अमानवीयता को बढ़ावा दे बैठते हैं। इसके बाद यदि पाबंदियों का चाबुक चलता है तो उसका प्रतिवाद करने का भी अधिकार हम खो चुके होते हैं।
अभी पिछले दिनों मेरी मां डॉ. विद्यावती ‘मालविका’ का एक संस्मरण एक दैनिक समाचारपत्र में प्रकाशित हुआ था जिसमें उन्होंने बताया था कि ‘‘ जिस रात देश की स्वतंत्रता की विधिवत घोषणा होनी थी और लाल किले पर तिरंगा फहराया जानेवाला था, उस रात हम सभी जागते रहे। उस समय टेलीविजन तो था नहीं, पूरे मोहल्ले में एक रेडियो था जिसको बीच आंगन में रख दिया गया था और हम सब उसे घेर कर बैठे रहे थे। तिरंगा फहराए जाने की घोषणा ने हमें रोमांचित कर दिया था। अद्भुत था वह पल।’’ मैंने मां से जब संस्मरण उनसे सुना और फिर प्रकसशित होने के बाद पढ़ा तो मैंने उस रोमांच को महसूस करने की कोशिश की जो मेरी मां ने उस समय अनुभव किया होगा। ईमानदारी से कहूं तो मैं उस रोमांच को शतप्रतिशत महसूस नहीं कर सकी क्योंकि मैंने भी परतंत्रता के वे काले दिन नहीं देखे हैं। फिर मैंने स्मरण किया उन बलिदानियों के जीवन का जिन्होंने देश को स्वतंत्र कराने के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी थी। भगत सिंह को जब फांसी की सजा दी गई उनकी आयु मात्र 23 वर्ष थी। लुधियाना के पास सराभा गांव के रहने वाले करतार सिंह को अंग्रेजों ने 19 साल की उम्र में ही फांसी दे दी थी। खुदीराम बोस की आयु उस मात्र 18 वर्ष थी जब उन्हें फांसी की सजा दी गई थी। इन युवाओं के आगे उनकी सारी उम्र पड़ी थी और युवावस्था के ढेर सारे सपने भी रहे होंगे लेकिन उन्होंने सबसे बड़ा स्वप्न देखा देश को आजाद कराने का और अपने इस सपने को पूरा करने के लिए अपने प्राण निछावर कर दिए। ये तो वे नाम हैं जिन्हें हमने सुन रखा है, जिनके बारे में हम जानते हैं जबकि अनेक ऐसे युवा थे जो स्वतंत्रता के समर में युद्धरत रहे और अंग्रेजों की बर्बता के तले कुचले गए। आत्मबलिदान के सागर से निकाल कर लाया गया स्वतंत्रता का मोती जब मिलने वाला रहा होगा तो रोमांचित होना स्वाभाविक था। बलिदानियों के बलिदान को याद करके मुझे उस रोमांच का अनुभव हुआ और उस पल मुझे लगा कि कितना जरूरी है युवाओं के लिए यह जानना की जो स्वतंत्रता हमें मिली है वह किसी थाली में परोस कर हमें नहीं दी गई है, उसे पाने के लिए हमारे बुजुर्गों ने असीमित कष्ट उठाया है। इसी तारतम्य में मुझे अपने नानाजी स्व. संत श्यामचरण सिंह के उस संस्मरण की याद ताज़ा हो गई जो वे हमें हमारे बचपन में सुनाया करते थे। नानाजी गांधीवादी थे। वे महात्मा गांधी के आदर्शों पर चल कर देश को स्वतंत्र कराना चाहते थे। वह लगभग 1946 की घटना थी। नानाजी उन दिनों वर्धा में थे। वे किसी गुप्त बैठक से वापस घर लौट रहे थे कि अचानक कर्फ्यू की घोषणा कर दी गई। प्रत्येक व्यक्ति को घर से निकलने की मनाही थी। नानाजी को इस बारे में पता नहीं था। वे सड़क पर कुछ दूर ही चले थे कि एक सिपाही ने उन्हें ललकारते हुए रुकने को कहा। नानाजी रुक गए। सिपाही ने उन्हें डांटते हुए उनसे पूछा कि क्या तुम्हें पता नहीं है कि कर्फ्यू के दौरान घर से नहीं निकलना चाहिए। नानाजी ने निर्भीकता से उत्तर दिया कि उन्हें कर्फ्यू के नियम तो पता हैं लेकिन यह पता नहीं था कर्फ्यू लग गया है। इस पर सिपाही तनिक नरम पड़ा। उसने नानाजी को घर में ही रहने की हिदायत देते हुए वहां से जाने दिया। जब हम नानाजी से पूछते थे कि आपको सिपाही से डर नहीं लगा था तो वे उत्तर देते थे कि नहीं वह सिपाही भारतीय था लेकिन अंग्रेजों का नमक खा रहा था, ऐसे गद्दार से डरने का सवाल ही नहीं था। हम और पूछते कि यदि वह आपके साथ मारपीट करता तो? इस नानाजी हंस कर कहते कि जब गांधी जी लाठियां खा सकते थे तो मैं क्यों नहीं? गांधी जी और मेरा पवित्र लक्ष्य तो एक ही था- देश की आजादी।
‘लक्ष्य’-हां, यदि लक्ष्य पवित्र हो तो व्यक्ति निर्भीक रहता है वरना ‘फेक आई’ के पीछे छिप कर जगहर उगलता रहता है और वातावरण दूषित करता है। ऐसे छद्मवेशी महानुभावों के कारनामों का ही यह दुष्परिणाम होता है कि सरकार को लगाम कसनी पड़ती है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में कटौती करनी पड़ती है और सद्विचारों वाले व्यक्तियों को भी इस कटौती की सजा को भुगतना पड़ता है। यह समझना होगा खुराफातियों को कि स्वतंत्रता का अर्थ अधिकारों का दुरुपयोग नहीं होता है। उन अपराधी मनोवृत्तिवालों को भी समझना होगा कि स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं होता है कि किसी मासूम बच्ची या किसी महिला के साथ बलात्कार किया जाए अथवा मॉबलिंचिंग की जाए। स्वतंत्रता का अर्थ यह भी नहीं है कि इस बात पर आरोप-प्रत्यारोप किए जाएं कि किस व्यक्ति या किसी राजनीतिक दल ने देश को आजादी दिलाई। स्वतंत्रता देश की सामूहिक आकांक्षा थी, देश का सामूहिक प्रयास था और यह देश की सामूहिक थाती है, इस पर किसी एक का सील-सिक्का नहीं लगाया जा सकता है। स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और इस अधिकार का सम्मान करना हमारा कर्त्तव्य है।
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Wednesday, August 17, 2016
चर्चा प्लस ... स्वतंत्रता, स्वास्थ्य, सुरक्षा और स्त्री .... डाॅ. शरद सिंह
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| Dr Sharad Singh |
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| Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper |
नई दिल्ली लोधी रोड स्थित सभागार में 15 फरवरी, 2012 को केन्द्रीय पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय द्वारा ग्रामीण स्वच्छता प्रवर्द्धन हेतु राष्ट्रीय परामर्श का आयोजन किया गया था। इस कार्यक्रम का मुख्य मुद्दा शौचालय था। चर्चा में हिस्सा लेने वाले प्रमुख गैर-सरकारी संगठनों ने बहुत विस्तार से इस मुद्दे पर बातचीत की कि भारत की निरन्तर बढ़ती मलिन बस्तियों और ताल-तलैयों में बैक्टीरिया के बढ़ने से अनेक बीमारियां पैदा होती हैं और देशभर में ग्रामीण इलाके के लोग उससे प्रभावित होते हैं।
02 अक्टूबर 2014 को मोदी सरकार ने ‘स्वच्छ भारत अभियान’ के अंतर्गत ख्ुाले में शौच से मुक्ति की ओर कदम बढ़ाने का खुला आह्वान किया। स्त्री-जीवन की सुऱक्षात्मक प्रगति के पक्ष में ‘‘सोच से शौचालय तक’’ का यह कदम स्वागत योग्य रहा है। किन्तु इसके लिए जनजागरूकता सबसे अधिक जरूरी है। यह तो आमजनता को ही समझना पड़ेगा न कि एक स्वस्थ औरत ही स्वस्थ पीढ़ी को जन्म दे सकती है और एक स्वस्थ औरत ही बहुमुखी प्रगति कर सकती है।
यह सभी जानते हैं कि सारे के सारे अपराध पुलिस के रोजनामचे तक नहीं पहुंच पाते हैं, कुछ पहुचते हैं तो दर्ज़ नहीं हो पाते हैं और कुछ दर्ज़ होते भी हैं तो वे या तो वापस ले लिए जाते हैं अथवा प्रताड़ित को लांछन की असीम वेदना सहते हुए दम तोड़ देना पड़ता है। एक ओर देश की आजादी का उत्सव और दूसरी ओर यह अप्रिय लगने वाला दुखद प्रसंग। लेकिन सच तो सच ही रहेगा कि जिस घड़ी कल्पना चावला अंतरिक्ष में उड़ान भर रही थी, ठीक उसी समय देष के किसी दूर-दराज़ ग्रामीण क्षेत्र में शौच के लिए जाती स्त्री बलात्कार की षिकार हो रही थी। कल्पना चावला के रूप में स्त्री की वैष्विक प्रगति को सबने देखा किन्तु उस बलत्कृत स्त्री की तो रिपोर्ट भी दर्ज़ नहीं हो पाई। भारतीय स्त्री के जीवन का यह स्याह पक्ष एक धब्बा है देश की तमाम प्रगति पर। यदि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद महिलाओं की एक पीढ़ी का बहुमुखी विकास हो चुका होता तो आज देश में महिलाओं की दशा का परिदृश्य कुछ और ही होता। उस स्थिति में न तो दहेज हत्याएं होतीं, न मादा-भ्रूण हत्या और न महिलाओं के विरुद्ध अपराध का ग्राफ इतना ऊपर जा पाता। उस स्थिति में झारखण्ड या बस्तर में स्त्रियों को न तो ‘डायन’ घोषित किया जाता और न तमाम राज्यों में बलात्कार की घटनाओं में बढ़ोत्तरी हो पाती। महिलाओं को कानूनी सहायता लेने का साहस तो रहता। लिहाजा प्रश्न उठता है कि महिला एवं बालविकास मंत्रालय कार्य कर रहा है, राष्ट्रीय महिला आयोग दायित्व निभा रहा है तथा स्वयंसेवी संस्थाएं समर्पित भाव से काम कर रही हैं तो फिर विगत 53 वर्ष में देश की समस्त महिलाओं का विकास क्यों नहीं हो पाया? कहीं कोई कमी तो है जो स्त्रियों के समुचित विकास के मार्ग में बाधा बन रही है। जाहिर है कि यह कमी स्त्री के प्रति सुरक्षा में कमी की है।
अंत में मैं उस तथ्य को एक बार फिर दोहराना चाहूंगी जिसे मैंने अपने उपन्यास ‘पिछले पन्ने की औरतें’ की भूमिका में सामने रखा था कि समाज की भांति हिन्दी व्याकरण भी पुरुष प्रधान है। अंग्रेजी में व्यक्तिवाचक संज्ञा के लिए प्रथम, द्वितीय, तृतीय के साथ ‘पर्सन’ अर्थात् ‘व्यक्ति’ जुड़ा होता है। यह ‘पर्सन’ (व्यक्ति) पुरुष भी हो सकता है और स्त्री भी किन्तु, हिन्दी भाषा के व्याकरण में मानो स्त्री न तो कोई व्यक्ति है और न व्यक्तिवाचक संज्ञा। प्रथम है तो पुरुष, द्वितीय है तो पुरुष और तृतीय है तो पुरुष, फिर स्त्री के लिए जगह कहां हैं? क्या स्त्री का अस्तित्व मात्र लिंग तक सीमित हैं? मैं न तो व्याकारण की आधिकारिक ज्ञाता हूं और न आधिकारित व्याख्याकार, लेकिन एक स्त्री होने के नाते यह बात मुझे सदैव चुभती है।’
अभी स्त्रियों को अपना भविष्य संवारने के लिए बहुत संघर्ष करना है। उन्हें अभी पूरी तरह सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक, राजनीतिक एवं मातृत्व का अधिकार प्राप्त करना है जिस दिन उसे अपने सारे अधिकार मिल जाएंगे जो कि देश की नागरिक एवं मनुष्य होने के नाते उसे मिलने चाहिए, उस दिन एक स्वस्थ समाज की कल्पना भी साकार हो सकेगी। जिसमें स्त्री और पुरुष सच्चे अर्थों में बराबरी का दर्जा रखेंगे।
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