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Tuesday, April 21, 2026

पुस्तक समीक्षा | जीवंत कहानियों का संग्रह है “उस बहार का इंतज़ार” | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
जीवंत कहानियों का संग्रह है  “उस बहार का इंतज़ार”
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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कहानी संग्रह - उस बहार का इंतज़ार
लेखिका - उर्मिला शिरीष
प्रकाशक - वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नयी दिल्ली-110002
मूल्य - 400/-
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उर्मिला शिरीष हिंदी कथा जगत की वे वरिष्ठ कथाकार है जिन्हें लंबी कहानियों में तारतम्य बनाए रखने की महारत हासिल है। मैंने उनके अधिकांश उपन्यास और कहानियां पढ़ी हैं। उनकी हर कहानी का कथानक अपने आसपास का होता हुआ महसूस होकर भी चौंकाता है, अनूठा लगता है। कम पात्रों के होते हुए कहानी को हजारों शब्दों में साधना आसान काम नहीं है। कई बार कहानी के प्रवाह में ढीलापन आने की संभावना रहती है और जहां ढीलापन आ जाए वहां कथानक का तारतम्य में टूट जाता है। किन्तु उर्मिला शिरीष की हर कहानी कसी हुई रहती है। कहीं कोई भटकाव नहीं, कहीं कोई शिथिलता नहीं। हर पात्र इतना जीवंत कि अपने आसपास उनकी मौजूदगी महसूस की जा सकती है। उर्मिला जी अपनी कहानियों में मनोवैज्ञानिक विश्लेषण जिस खूबसूरती से करती हैं वह किसी कशीदाकारी से काम नहीं है। ये सारी खूबियां उनके कहानी संग्रह ‘‘उस बहार का इंतजार’’ की कहानियों में देखी जा सकती है।
उर्मिला शिरीष के रचना कर्म में शामिल हैं उनके चौदह कहानी संग्रह, पाँच कहानी संग्रहों तथा सात अन्य पुस्तकों का सम्पादन। तीन उपन्यास। एक साक्षात्कार, एक आलोचना तथा एक जीवनी (गोविन्द मिश्र) की पुस्तक। उर्मिला शिरीष की श्रेष्ठ कहानियाँ, लोकप्रिय कहानियाँ, ग्यारह लम्बी कहानियाँ, चयनित कहानियाँ, दस प्रतिनिधि कहानियाँ आदि संकलित। मेरे साक्षात्कार । देश के विभिन्न भाषाओं में उनकी कहानियों और उपन्यासों का अनुवाद प्रकाशित हो चुका है। वे हिंदी की प्रतिष्ठित कथाकार हैं।
आधुनिक हिंदी कहानियां  यथार्थवाद, मनोवैज्ञानिक गहराई, महानगरीय बोध, और बदलते सामाजिक मूल्यों को प्रमुखता से दर्शाती हैं। ये कहानियां आम जनजीवन, महानगरीय एकाकीपन, स्त्री-पुरुष संबंधों में जटिलता, भ्रष्टाचार और मध्यवर्गीय चेतना को यथार्थवादी दृष्टिकोण से प्रस्तुत करती हैं। उर्मिला शिरीष की कहानी आधुनिक हिंदी कहानी की प्रवृत्तियां का बखूबी पोषण करती हैं। उनकी कहानियों में पात्रों के आंतरिक द्वंद्व, अवचेतन मन और मानसिक उलझनों का सूक्ष्म चित्रण मिलता है। संयुक्त परिवार का टूटना, पीढ़ीगत संघर्ष (जेनरेशन गैप) और उपभोगवादी संस्कृति का प्रभाव का विश्लेषणात्मक पक्ष उनकी कहानियों में देखा जा सकता है। सरल, सहज आम बोलचाल की भाषा उनकी कहानियां को और अधिक आकर्षक बना देती है।
‘‘उस बहार का इंतजार’’ कहानी संग्रह में कुल ग्यारह कहानियां हैं। हर कहानी का शेड अलग है। संग्रह की पहली कहानी ‘‘चींटियों की रेस’’ उस भ्रम को तोड़ती है कि जहां धन-दौलत है वहां खुशियां और सुकून हैं। सुकून पाने के लिए कुछ कठोर निर्णय लेने जरूरी होते हंै। कहानी की नायिका सुजाता ऐसे ही कठोर निर्णय के दौर से गुजरती है जिसके आगे उसकी सुख शांति का घर हो सकता है लेकिन अब तक वह जहां थी वहां उपेक्षा की अतिरिक्त और कुछ नहीं था। यह कहानी एक तलाकशुदा स्त्री की कहानी है जो यथार्थ की कई परतें खोलती है। परिस्थितियों का खुलासा, परिवार के सदस्यों का असंतुलित व्यवहार और मानसिक अंतर्द्वंद का प्रभावी चित्रण इस कहानी की विशेषता है।
दूसरी कहानी है ‘‘बिंजो माय फ्रेंड’’। ये कहानी आज के यथार्थ को पूरी मार्मिकता से बयान करती है। इस कहानी में लगभग हर दूसरे या तीसरे घर की त्रासदी मौजूद है जहां गहरे अंधेरे की भांति अकेलापन है। बच्चों के पास जाकर न बसने की ज़िद और फिर अलगाव की सीमा तक टूटती संबंधों की डोर बेजुबान पशुओं में अपनापा ढूंढने लगती है। एक निर्मम, कठोर, कड़वा सच। किसी के भी अंतर्मन को झकझोरने में सक्षम है यह कहानी।
तीसरी कहानी है ‘‘नाच, कठपुतली’’। ‘कठपुतली’ शब्द अपने आप में विवशता का प्रतीक है। न चाहते हुए भी दूसरों के अनुसार जिंदगी जीने का प्रतीक है। कभी जीवन कठपुतली की तरह नचाने लगता है तो कभी लोगों का व्यवहार, उनकी मंशा, उनकी लालसाएं दूसरों को कठपुतली बनाने के लिए प्रेरित करने लगती है, अब यह उस दूसरे व्यक्ति पर निर्भर रहता है कि वह कठपुतली बनना चाहता है या अपने स्वाभिमान के साथ अडिग खड़ा रहना चाहता है। कहते हैं न कि मन के हारे हार है। यह कहानी अदिति नाम की स्त्री के जीवन संघर्ष की कहानी है जिसे परिस्थितियां कठपुतली की तरह नाचना चाहती हैं लेकिन उसके भीतर की जिजीविषा उसे न झुकने का हौसला देती है।
चौथी कहानी है ‘‘हरा पत्ता’’। यह कहानी विदेश में बस गए बेटे-बेटियों के पास जाने के लिए ग्रीन कार्ड हासिल करने की जद्दोजहद का खुलासा करती है। एक मायावी संजाल ही तो है ग्रीन कार्ड, जिसके मोह से बाहर निकलना कठिन है, लेकिन जिसकी वास्तविकता समझने के बाद धुंधला पड़ने लगता है मोह और तब शुरू होता है एक गाढ़ा अंतर्द्वंद। विदेश में बसी संतानों के पास जाने के लिए स्वर्ग द्वार के समान ग्रीन कार्ड पाने का मोह छोड़ना क्या संभव है? यह कहानी मनष्चेतना की आंखें खोलती है और एक नई संभावना सामने रखती है।
संग्रह की पांचवी कहानी है ‘‘मंदिर और कुआं’’ जिसका कथानक ग्रामीण परिवेश में पंच, सरपंच, पंचायत, मंदिर, कुआं आदि से सरोकार रखता हुआ गांव में आते जा रहे परिवर्तन को भी रेखांकित करता है। परंपराओं में होने वाला परिवर्तन मनुष्य के स्वभाव को भी परिवर्तित करने लगता है। परंपरा और आधुनिकता के बीच का द्वंद एक धुनकी की भांति मनुष्य को धुनने लगता है।
‘‘पराजय का समीकरण’’, ‘पीपल का पेड़‘‘, ‘‘विदा होती बेटियों की माँ‘‘, ‘‘लड़कियों की हँसी‘‘ और ‘‘ऑनस्क्रीन‘‘ कथन को की विविधता और पात्रों की मनोदशा को सामने रखने वाली कहानी है, जिनमें संवेदना, संवेग, सौजन्यता, परंपराएं, आधुनिकता एवं मूल्य बोध के विभिन्न रंग समय हुए हैं। यह सभी कहानियां मनुष्य के चरित्र विश्लेषण का रोचक आख्यान गढ़ती हैं।
संग्रह की अंतिम कहानी है ‘‘उस बहार का इन्तज़ार’’। दो संस्कृतियों के बीच उसे अंतर को व्यक्त करती है जो पारस्परिक संवेदनाओं एवं पारिवारिक गठन पर आधारित है। भारतीय संस्कृति में रिश्ते बहुत मायने रखते हैं, वही पाश्चात्य संस्कृति में रिश्तों का अर्थ व्यक्तिगत इच्छाएं मात्र होती हैं। जब वही पाश्चात्य भारतीय संस्कृति के संपर्क में आता है तो उसे संबंधों की महत्ता का भान होने लगता है। स्मिथ और संहिता के रूप में लेखिका ने तो विविध संस्कृतियों के जीवन पर प्रभाव को अपने कथानक में बखूबी पिरोया है। यह कहानी मानवीय मूल्यों को स्थापित करती हुई भारतीय संस्कृति एवं परंपराओं को भी पुनर्स्थापना देती है।
‘‘उस बहार का इंतज़ार’’ उर्मिला शिरीष
की कहानियों का वह संग्रह है जो पाठकों को उनके कथा- कौशल के और अधिक निकट ले जाने में सक्षम है। इस संग्रह की प्रत्येक कहानी पठनीय हैं तथा रोचकता के साथ आत्म मंथन को विवश करती हैं।
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Tuesday, April 14, 2026

पुस्तक समीक्षा | जेंडर डिस्कोर्स की रोशनाई वाला विशेषांक और नए कानूनों की रोशनी | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
जेंडर डिस्कोर्स की रोशनाई वाला विशेषांक और नए कानूनों की रोशनी
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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विशेषांक - समय के साखी (जेंडर डिस्कोर्स पर केंद्रित)
संपादक - आरतीे
प्रकाशक - संपादकीय कार्यालय, 701, अन्नपूर्णा परिसर, पीएण्डटी चौराहा के पास, भोपाल (म.प्र.) 462003
मूल्य - 300/-
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         आरती जी के संपादन में प्रकाशित होने वाली पत्रिका “समय के साखी” का 57 वां अंक सागर के वरिष्ठ कवि वीरेंद्र प्रधान जी के सौजन्य से मुझे प्राप्त हुआ। वस्तुतः यह अंक सामान्य अंक न होकर विशेषांक है और वह भी जेंडर डिस्कोर्स पर। यह एक ऐसा विषय है जिस पर सभी को गंभीरता से चिंतन करने की आवश्यकता है। विशेष रूप से अब, जब जेंडर को लेकर नए अधिनियम आकार ले रहे हैं। वीरेंद्र प्रधान जी ने “समय के साखी” पत्रिका का जेंडर डिस्कोर्स विशेषांक इस आग्रह के साथ दिया कि मैं इस विशेषांक के संबंध में कुछ समीक्षात्मक लिखूं। चूंकि जब मैं सामयिक प्रकाशन की साहित्यिक पत्रिका “साहित्य सरस्वती’’ (नई दिल्ली) की कार्यकारी संपादक थी तब पत्रिका के संपादक महेश भारद्वाज जी के निर्देशन में थर्ड जेंडर विमर्श विशेषांक प्रकाशित किया गया था। बाद में विशेषांक की सामग्री के अलावा कुछ और विद्वानों से लेख आमंत्रित करके कलेवर को “थर्ड जेंडर विमर्श” पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया गया। ताकि शोधार्थियों एवं जेंडर डिस्कोर्स में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए विशेष एवं तार्किक जानकारी एक ही ज़िल्द में उपलब्ध हो सके। जहां तक स्त्री विमर्श का सवाल है तो मेरा लेखन एवं सामयिक प्रकाशन का मुख्य प्रकाशन स्त्री विमर्श पर ही केंद्रित रहा है। इसलिए ‘‘समय के साखी’’ पत्रिका का जेंडर डिस्कोर्स विशेषांक मेरे लिए दिलचस्प का विषय था। फिर भाई वीरेंद्र प्रधान जी का आग्रह भी था। परिणामतः मैंने विशेषांक को एकाग्रचित्त हो कर आद्योपांत पढ़ा। विशेषांक में स्त्री विमर्श और ट्रांसजेंडर विमर्श दोनों मौजूद हैं। मुझे भी लगा कि इस पर अवश्य लिखा जाना चाहिए।
   दिलचस्प बात यह है की ट्रांसजेंडर को लेकर विगत दिनों अधिनियम 2026 पर बड़ा बवाल मचा। ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026, 2019 के कानून को बदलकर पहचान के लिए स्व-घोषणा की जगह मेडिकल सर्टिफिकेट अनिवार्य किय गया है। इस प्रस्तावित बदलाव का ट्रांसजेंडर समुदाय विरोध कर रहा है क्योंकि उनका मानना है कि यह आत्म-निर्णय के अधिकार को सीमित करता है। यह बिल 13 मार्च 2026 को पेश किया गया था। यह कानून 2014 के ‘‘नालसा’’ (नेशनल लीगल सर्विसेस अथरिटी) फैसले का उल्लंघन माना जा रहा है, जिसने पहचान के स्व-निर्धारण को मान्यता दी थी। समुदाय द्वारा ‘‘काला कानून’’ कह कर इसे आत्म-सम्मान के खिलाफ भी कहा गया। वही दूसरा विषय है स्त्रियों के अधिकारों का ‘‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’’ (106वां संवैधानिक संशोधन) के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में लागू किया जाना है। प्रधानमंत्री मोदी के अनुसार, इस कानून का लाभ 2029 के लोकसभा चुनाव से मिलना शुरू हो सकता है। यह कितने प्रतिशत महिलाओं को सशक्त बना सकेगा यह तो भविष्य ही बताएगा किंतु इससे महिलाओं की सभी सहभागिता राजनीति में बढ़ेगी।
    स्त्री विमर्श और ट्रांसजेंडर विमर्श यह दोनों विषय विशेषांक में शामिल हैं। इन पर विद्वानों ने अपनी अपनी राय दी है। देखा जाए तो 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में महिला जनसंख्या लगभग 58.64 करोड़ (कुल जनसंख्या का 48.5 प्रतिशत) थी। 2021 में 1000 पुरुषों पर 1020 महिलाएं थीं, जबकि शहरी क्षेत्रों 985 पाया गया है। वहीं, सन 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की आधिकारिक संख्या 4.88 लाख थी। हालांकि, कार्यकर्ता और विभिन्न अनुमान बताते हैं कि सामाजिक कलंक और पहचान के मुद्दों के कारण वास्तविक संख्या इससे 6-7 गुना अधिक हो सकती है। सटीक सरकारी आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं।
विशेषांक में समाज में जेंडर के अनुपात, उनकी स्थितियों एवं उनके जीवन की प्रगति की संभावनाओं पर विचार किया गया है। जो आलेख इसमें शामिल किए गए हैं वे हैं- बंदीगृह की औरतें और खामोशी का विमर्श- प्रज्ञा जोशी, जिंदा कौमों की मुर्दा दास्तान- नाइश हसन, वे बहादुर स्त्रियाँ- हिन्दी कहानी में घुमंतू समुदाय, स्त्री और पुलिस- रमाशंकर सिंह,  ट्रांसजेंडर और समाज मनोवैज्ञानिक समझ की जरूरत- अब्दुल रहीम ‘‘चंदा’’, दलित स्त्री का ‘अन्य’ आत्मकथा-संदर्भ- डॉ. बजरंग बिहारी तिवारी, इकोफेमिनिज्म: स्त्री और प्रकृति का पक्षधर-सुरेश तोमर, राष्ट्रवादी उन्माद के दौर में मुस्लिम स्त्री - समीना खान, संघर्ष से कामयाबी तक का लंबा सफर- सुमित पी.वी., पितृसत्ता: विचारधारा-आलोचना के नए आयाम- ईश्वर सिंह दोस्त, समकालीन भारतीय स्त्री आंदोलन- अवंतिका शुक्ला।
आलेखों के साथ ही दो वर्ताएं -‘‘बातचीत-एक’’ तथा ‘‘बातचीत-दो’’ हैं। जिनमें ‘‘बातचीत-एक’’ में सविता सिंह, सीमा आजाद, रेखा सेठी, रेखा कस्तवार, संजीव चंदन के विचार हैं तथा ‘‘बातचीत-दो’’ में वंदना चौबे, जितेन्द्र विसारिया, अनुपम सिंह एवं नेहा नरूका के विचार हैं। 
‘‘लेखा-जोखा’’ के अंतर्गत ‘‘कुछ पहाड़ लाँधे हैं, अभी बाकी हैं बहुत....’’ शीर्षक से सुधा अरोड़ा के ज़मीनी विचार हैं। इसके साथ ही ‘‘प्रसंग: आलोचना’’ के अंतर्गत माया मिश्र ने लिखा है ‘‘स्त्री रचनात्मकता: किताबों के आलोक में’’।
लेखक रामशंकर सिंह का यह कथन ध्यान देने योग्य है-‘‘पितृसत्तात्मक परिवारों में महिलाओं को अपना ताबेदार बनाया और इस ताबेदारी को लिखने की प्रक्रिया से और ताकत मिली। सब कुछ लिख दिया गया- कौन स्वामी, कौन सेवक, किसको किस जगह पर रखा जाना है- यह सब लिखा गया। उन समाजों में जहाँ लेखन कला नहीं थी, वहाँ ‘परम्परा के भीतर’ स्त्रियों की ताबेदारी को सुरक्षित रखा गया। यह अनायास नहीं था कि मानवविज्ञानी लेवी स्ट्रॉस को कहना पड़ा कि एक केंद्रीकृत, पदानुक्रमित राज्य अपने आपको पुनरुत्पादित करने के लिए लेखन कला का प्रयोग करता है...। लेखन एक अजीब चीज है...। एकमात्र घटना जो इसके साथ हमेशा जुड़ी रही है, वह है शहरों और साम्राज्यों का निर्माण राजनीतिक व्यवस्था में एकीकरण, अर्थात् बड़ी संख्या में व्यक्तियों का जातियों और वर्गों के पदानुक्रम में एकीकरण। यह मानवजाति के ज्ञानोदय की अपेक्षा शोषण को ही बढ़ावा देने के लिए प्रतीत होता है।’ वास्तव में पहले परम्परा और बाद में लिखित संहिताओं में स्त्रियों के लिए ताबेदारी की इबारतें तैयार की गई। इसे आप अनुभवमूलक तरीके से उस समय लक्षित कर सकते हैं, जब कहा जाता है कि ‘ऐसा हमारे ग्रंथों में कहा गया है’ ‘हमारी परम्परा में ऐसा है’ या ‘हमारे यहाँ तो ऐसा था।’ इन सारे तर्कों में लेखन कला, समाज का वर्चस्वशाली सांस्कृतिक तंत्र और राज्य भूमिका निभाते हैं।’’
सक्रिय समाजसेवी, लेखिका एवं स्त्री अधिकारों की पैरोकार सुधा आरोड़ा ने स्त्रीमुक्ति - ‘‘कुछ भ्रांतियाँ और सुझाव’’ शीर्षक से स्त्री विमर्श के स्वरूप की बारीकी से व्याख्या की है। उन्होंने लिखा है कि ‘‘स्त्री विमर्श दरअसल पितृसत्ता, सम्पत्ति में भागीदारी और राजनीतिक तथा सांस्कृतिक रूप से स्त्रियों की बराबरी और सम्मान का मुद्दा है। भारत में स्त्री का अस्तित्ववादी संघर्ष बहुत पुराना है। बौद्धकाल से लेकर वैदिक काल और मध्यकाल तक इसके अनेक उदाहरण भरे पड़े हैं। गार्गी, मैत्रेयी, अपाला, घोषा, लोपा, अनेक थेरियों सहित सारन्धा, अहिल्याबाई से लेकर रजिया सुल्तान तक हम एक परंपरा देख सकते हैं कि स्त्रियों ने सोच और सत्ता दोनों ही स्तरों पर संघर्ष किया। मीराबाई, अक्क महादेवी, ललद्यद, जनाबाई और बहिणा बाई दर्जनों नाम हैं। लेकिन दुर्भाग्य से भारत में इन सबके द्वारा उठाए गए प्रश्नों को जोड़कर स्त्री मुक्ति का एक वृहद पाठ तैयार नहीं किया जा सका इसलिये लिंगभेद के खिलाफ भारत में संघर्ष की परंपरा को बल न मिल सका।’’  सुधा आरोड़ा ने आगे लिखा है कि ‘‘स्त्रियों में बदलाव आया पर इस बदलाव के लिये हमारा समाज तैयार नहीं है। उन्होंने घर की चहारदीवारी के साथ अर्थ उपार्जन में भी हाथ बंटाया पर यह दोहरी जिम्मेदारी भी उसे अपना सम्मान दिलाने में नाकाम रही। दिक्कत यह है कि स्त्री की दशा में सुधार, समाज और पुरुषों की मानसिकता को बदले बिना नहीं हो सकता और समाज पुरुषसत्तात्मक है और आंदोलनकारी स्त्रियों की जमात को पीछे धकेलने में पुरुषों का ही नहीं, पुरुष सोच वाली महिलाओं का भी बहुत बड़ा हाथ है। यह एक अलग मुद्दा है।’’
ट्रांसजेंडर की जब बात आती है तो भारत के प्ररिप्रेक्ष्य में वह और अधिक जटिल हो जाती है। सच तो ये है कि आज भी यहां लोग ट्रांसजेंडर की जैविक विविधता को नहीं जानते और समझते हैं। उनके लिए एक ट्रांसजेंडर मात्र ट्रांसजेंडर होता है, नाच-गा कर नेग के पैसे मांगने वाला समुदाय। इस संदर्भ में अब्दुल रहीम ‘‘चंदा’’ का लेख ‘‘ट्रांसजेंडर और समाज: मनोवैज्ञानिक समझ की जरूरत’’ बहुत महत्वपूर्ण है। उन्होंने लिखा है कि ‘‘ट्रांस जेंडर शब्द को लेकर समाज के आम लोग अक्सर भ्रम की स्तिथि में होते हैं। वे ट्रांस जेंडर केवल उन्हें समझते हैं जो किन्नर के रूप में नाच-गाकर बधाई माँगने का काम करते हैं। जबकि ऐसा नहीं है। ट्रांस जेंडर में वे सभी व्यक्ति आते हैं जिनका जन्म से प्राप्त लिंग उनके मनोवैज्ञानिक लिंग अर्थात जेंडर से मेल नहीं खाता। उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति का जन्म एक पुरुष के रूप में हुआ लेकिन वह व्यक्ति जेंडर से खुद को एक स्त्री महसूस करता है या एक स्त्री शरीर में जन्मा व्यक्ति खुद को पुरुष अनुभव करता है। अर्थात जिन व्यक्तियों की लैंगिक पहचान जन्म के समय निर्धारित लिंग से मेल नहीं खाती ऐसे सभी व्यक्ति ट्रांस जेंडर होते हैं। ट्रांस जेंडर में अलग अलग श्रेणियों के लोग सम्मिलित हैं।’’ उन्होंने ट्रांस महिला, ट्रांस पुरुष, इंटर सेक्स, ट्रांस सेक्सुअल  में बायोलाॅजिकल अंतर बताते हुए ‘‘हिजड़ा या किन्नर’’ को भी स्पष्ट किया है। उन्होंने लिखा है कि ‘‘हिजड़ा शब्द अरबी भाषा के हिज से बना है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है विछोह, विरह या छोड़ देना। वैसे हिजड़ा या किन्नर अपने आप मे कोई जेंडर नहीं। यह एक गुरु-शिष्य आधारित परम्परा है। जो परंपरा सदियों पुरानी है। वर्तमान में यह परम्परा भारत, पाकिस्तान, नेपाल और बंग्लादेश में है, इस परम्परा को केवल ट्रांस महिलाएँ ही आगे बढ़ाती हैं।’’
यहां उल्लेखनीय है कि अब्दुल रहीम ‘‘चंदा’’ स्वयं ट्रांसजेंडर समुदाय से हैं। उन्होंने एमकॉम, एमए (भारतीय शास्त्रीय संगीत में) जबलपुर से किया है। वे कई वर्षों तक किन्नर डेरे में रहीं। 2007 में डेरा छोड़ कर ट्रांस जेंडर अधिकारों पर एक कार्यकर्ता के रूप में में काम की शुरुआत की। 2011 में ‘‘अस्मान फाउंडेशन’’ नाम से समुदाय आधारित संगठन की स्थापना की जो वर्तमान में ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों पर कार्य कर रहा है। वे सामाजिक न्याय विभाग द्वारा गठित जिला किन्नर कल्याण बोर्ड में समुदाय की प्रतिनिधि सदस्य भी हैं। उन्होंने कविताएं एवं ग़ज़लें भी लिखी हैं। देखा जाए तो वे अपने समुदाय की एक बौद्धिक प्रतिनिधि हैं। इस विशेषांक में उनका लेख ट्रांसजेंडर समुदाय की स्थिति को आधिकारिक रूप से सामने रखता है।
जैसाकि ‘‘समय के साखी’’ की संपादक आरती ने लिखा है-‘‘विशेषांक में बातचीत के दो भाग वरिष्ठ और युवा साथियों के साथ अलग-अलग रखकर, खासतौर पर चार दशक के स्त्री चिंतन, चुनौतियों और अभी तक के हासिल को समझने की कोशिश की गई है। उससे भी ज्यादा जरूरी है कि जो लोग लगातार जेंडर जस्टिस पर काम करते आए हैं, उनके विचारों की समानता और विभिन्नता को जाना जा सके।’’ इस दृष्टि से ‘‘समय के साखी’’ का यह ट्रांसजेंडर डिस्कोर्स विशेषांक पठनीय होने के साथ-साथ संग्रहणीय भी है तथा शोधार्थियों के लिए तो बेहद उपयोगी है।    
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Tuesday, April 7, 2026

पुस्तक समीक्षा | पुरानी किताबों की भी प्रासंगिकता होती है जैसे ‘तिल के फूल तिली के दाने’ | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा
पुरानी किताबों की भी प्रासंगिकता होती है जैसे ‘तिल के फूल तिली के दाने’
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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बाल गीत संग्रह - तिल के फूल तिली के दाने
कवि - रमेशदत्त दुबे
प्रकाशक - प्रमाण कम्प्यूटर्स, कटरा बाज़ार, सागर
मूल्य - 25/- 
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      रचनाकार पुराना हो जाता है। कालकवलित हो जाता है। वह अपनी अर्थवत्ता भी खो सकता है। किन्तु, उसका सृजन कभी अपना महत्व नहीं खोता है। पुरातन साहित्य की श्रेणी में गिना जाने वाला पंचतंत्र, जातक कथाएं, सिंहासन बत्तीसी, अरब की कहानियां, नाविक सिंदबाद की यात्राएं आदि आज भी उतनी ही रोचक लगती हैं जितनी उस समय के बाल श्रोताओं, पाठकों एवं उनके बड़ों को लगती रही होंगी। उनमें मौजूद शिक्षा आज भी प्रासंगिक है। पुरातन साहित्य अपने सृजन की तिथि के आधार पर पुरातन की श्रेणी में भले ही गिना जाए किन्तु उसकी अर्थवत्ता कभी पुरानी नहीं पड़ती है। जी हां, पुरानी किताबों की भी अर्थवत्ता होती है जैसे ‘‘तिल के फूल, तिली के दाने’’। यह बाल गीत संग्रह है। इसके रचयिता रमेशदत्त दुबे अब स्वर्गीय हो चुके हैं किन्तु उनकी अन्य कृतियों की भांति उनके बाल गीतों का यह संग्रह आज भी जब हाथों में आता है तो इसका महत्व स्वतः जागृत हो जाता है। फिर कई वर्षों से आधुनिक बाल साहित्य की कमी को शिद्दत से महसूस किया जा रहा है, विशेषरूप से हिन्दी में। अंग्रेजी में राईम्स के रूप में आयातित बाल काव्य अथवा उन पर आधारित देसी अंग्रेजी बाल काव्य तो उपलब्ध होता रहा है किन्तु हिन्दी का बाल साहित्य सिकुड़ता गया। इसका एक कारण यह है कि आज अधिकांश बच्चे अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ रहे हैं और दूसरा कारण कि बहुत-सी बाल पत्रिकाओं का प्रकाशन बंद हो गया। बाल साहित्य से संस्कारित करने वानी पत्रिकाएं जैसे नंदन, पराग आदि ने कम से कम दो पीढ़ियों को बाल साहित्य से जोड़े रखा था किन्तु अब उस स्तर की पत्रिकाएं नहीं के बराबर हैं। 

रमेश दत्त दुबे सागर शहर के एक ऐसे साहित्यकार हुए जिन्होंने फक्कड़पन से जीवन व्यतीत करते हुए महत्वपूर्ण साहित्य रचा। उन्होंने उपन्यास, कहानियां, कविताएं एवं लेख भी लिखे। ‘‘तिल के फूल, तिली के दाने’’ बाल गीत संग्रह है जिसमें उनके 27 गीत संग्रहीत हैं। इन गीतों की विशेषता यह है कि इनमें मनोरंजन के साथ शिक्षा एवं सांस्कृतिक मूल्य समाहित हैं। इनमें से कुछ गीतों की ध्वनि खेल गीत की है जो बालमन को ऊर्जा का संचार करने में सक्षम हैं। यूं तो मैंने इस संग्रह को उनके जीवनकाल में पढ़ा था किन्तु विगत दिनों मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी के अंतर्गत बाल साहित्य अकादमी द्वारा बाल साहित्य पर शहर में चर्चा संगोष्ठी के दौरान रमेशदत्त दुबे जी के सुपुत्र ने इस बाल गीत संग्रह की प्रतियां आयोजन में वितरित कीं, जिससे एक बार फिर यह पुस्तक दृष्टि से गुज़री। एक बार फिर संग्रह की कविताओं को पढ़ने का सुअवसर मिला। वस्तुतः होता क्या है कि हम अपने जीवन में इतने व्यस्त होते जाते हैं कि पुस्तक का स्वरूप और नाम तो स्मृति में रहता है किन्तु कई बार उसका कलेवर धुंधला पड़ता जाता है। पुस्तक भी अन्य नवीन पुस्तकों के नीचे दबती चली जाती है। किन्तु जब कभी वह पुस्तक पुनः सामने आती है तो उसके स्वरूप और नाम की स्मृति के साथ उसका कलेवर भी पुनः ताज़ा हो जाता है। तब हमें लगता है कि यह तो अत्यंत महत्वपूर्ण पुस्तक है तथा इसकी प्रासंगिकता आज भी ज्यों की त्यों है। इसका कारण यह है कि इसके गीतों को समय की नब्ज़ पर उंगली रख कर लिखा गया है।

        इस संग्रह का प्रथम गीत है ‘‘मुनिया’’। यह गीत उस परिस्थिति पर आधारित है जिसमें माता-पिता दोनों कामकाजी हैं और नन्हीं मुनिया जैसी बेटी घर में अकेली अपनी कल्पनाओं के अनुरुप खेल रचाा कर मन लगा रही है। इस गीत को पढ़ कर जहां बड़े एकाकी बालमन की दशा को समझ सकते हैं वहीं बच्चे अपना समय खेल-खेल में व्यतीत करने का गुर सीख सकते हैं। इस गीत की कुछ पंक्तियां देखिए -
मुनिया ने देखा, आज पापा नहीं हैं 
मुनिया ने पाया, आज माँ भी नहीं हैं
मुनिया ने पाया, घर बिल्कुल सूना छुआ 
उसने वह सब, मना जिसको छूना
औरत की फोटो में मूंछें लगाई 
राजा की फोटो में पूंछें लगाई
कहा उसने वह सब, जो था उसको कहना 
सुना उसने सब कुछ, जो था उसको सुनना
गाना भी गाया, नची, कूदी-फांदी 
गुड्डा और गुड़िया की, कर डाली शादी
छोटी सी मुनिया को बहुत सा काम है 
दिन हो या रात, चैन न आराम है
़़़़़़़हाथी-घोड़ा-पालकी
हाथी, घोडा, पालकी 
बातें हैं उस काल की 
मोटर, साइकिल, प्लेन की 
बातें हैं इस काल की
बच्चों की कल्पना में आज शेर, भालू से कहीं अधिक मोटर, साइकिल, प्लेन कौंधते हैं। यही टीवी आदि के चलित दृश्यों में उनकी नन्हीं आखों के आगे होते हैं तथा यही खिलौनों के रूप में उन्हें मिलते हैं। अतः गुड़िया के विवाह जैसे पारंपरिक खेल के साथ आधुनिक वस्तुओं को जोड़ कर गीत लिखने से गीत की समसामयिकता बढ़ गई है। 
संग्रह में ‘‘कहानी’’ शीर्ष से भी एक गीत है जिसमें छोटी-छोटी तुकबंदी और सहज शब्दों के साथ मनोरंजन है। यह गीत सहज ही बच्चों की जुबान पर चढ़ जाने का गुण रखता है। गीत का एक अंश-
आमोती - दामोती रानी
अंधी भूरी कहे कहानी
एक कहानी दादी कहती
एक कहानी नानी
एक कहानी हरबोलों की, 
खूब लड़ी मरदानी
अमोती-दामौती रानी

बुंदेलखंड का एक पुराना खेल गीत है जो आज भी सुदूर ग्रामीण अंचलों में गाया जाता है, जहां पारंपरिक ग्रामीण खेल खेले जाते हैं। यह खेल गीत है ‘‘पो संपा भई पो संपा’’। यह गीत संवादनात्मक है। एक बच्चा उसे प्रश्न के रूप में गाता है तो शेष बच्चे उसका उत्तर देते हैं। इस पारंपरिक गीत को आधार बना कर राजा-रानी के स्थान पर रेलगाड़ी और रेलमपेल जैसे उपमान रखे गए हैं जिससे यह बच्चों के लिए अधिक दृश्यात्मक हो जाता है। उदाहरण देखिए- 
पो संपा भई पो संपा 
पो संपा ने क्या किया ?
पो संपा ने रेल बनाई 
रेल बनाकर खूब चलाई 
अब तो रेल में जाना पड़ेगा 
लटके, बैठे, खड़े-खड़े 
साथ चलेंगे पेड़ खड़े 
छुक-छुक करती चलती 
रेल डिब्बों में है रेलमपेल 

संग्रह का शीर्षक गीत ‘‘तिल के फूल, तिली के दाने’’ प्रकृति और जीवों से मिलाता है। इस गीत का अपना अलग ही सौंदर्य है तथा अलग ही रसात्मकता है। 
तिल के फूल, तिली के दाने 
खिलते फूल लगे मुरझाने 
सूरज घबराया-घबराया 
चिड़ियों ने गाना न गाया
बिल्ली बोली-न खेलूंगी 
चुहिया बोली-न दौडूंगी 
घोड़ा बैठ गया था थककर 
मछली बैठी जल में छुपकर 
चिडियों ने गाना न गाया
शेर न था बिल्कुल गुर्राया 
- अर्थात एक नन्हा-सा तिल का फूल यदि मुरझा जाए तो पूरी प्रकृति और जीव-जन्तु उदास हो जाते हैं। इसलिए फूलों और पौधों की देखभाल करना चाहिए, उन्हें मुाझाने नहीं देना चाहिए। यही तो वह शिक्षा है जो खेल-खेल में, पांव के पंजो पर बिठा कर झूला झूलाते हुए, गीत गाते हुए एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को दे दी जाती थी। आज माता-पिता भौतिकता की दौड़ में इस तरह उलझ गए हैं कि उन्हें न तो स्वयं इस प्रकार के गीत याद हैं और न वे स्वयं गीत रच पाते हैं। वे अपने बच्चों को डिजिटल मीडिया के हवाले छोड़ कर उनके प्राकृतिक बचपन की आकांक्षा करते हैं जो पूरी तरह संभव नहीं है। दरअसल इस प्रकार के गीत ही है जो पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी के बीच संवेदना, आत्मीयता एवं ज्ञान के तार जोड़ते हैं। इसीलिए स्वर्गीय रमेशदत्त दुबे जी का यह बाल गीत संग्रह ‘‘तिल के फूल, तिली के दाने’’ आज भी गहरी अर्थवत्ता रखता है। आज के युवा माता-पिता को स्वयं ऐसे गीत पढ़ने चाहिए तथा अपने बच्चों को स्वयं सुनाने चाहिए। इस दृष्टि से यह पुस्तक सदा प्रासंगिक बनी रहेगी।  
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Tuesday, March 31, 2026

पुस्तक समीक्षा | दादू का पिटारा : बालमन के लिए एक जरूरी सृजन | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
दादू का पिटारा : बालमन के लिए एक जरूरी सृजन
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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बाल कहानी संग्रह - दादू का पिटारा
लेखक - गोकुल सोनी
प्रकाशक - इंद्रा पब्लिशिंग हाउस, ई-5/21,अरेरा कॉलोनी, हबीबगंज पुलिस स्टेशन रोड, भोपाल 462016
मूल्य -199/-
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    बाल कहानियों का प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में बहुत महत्व होता है। बचपन में सुनी हुई कहानियां व्यक्ति के व्यक्तित्व के निर्माण में सहायक होती हैं। ये मात्र मनोरंजन नहीं, वरन जीवन से जुड़ी शिक्षाओं का अनौपचारिक माध्यम होती हैं। बाल कहानियाँ बच्चों के सर्वांगीण विकास में एक आधारभूत भूमिका निभाती हैं। ये न केवल मनोरंजन का साधन हैं, बल्कि ज्ञान, नैतिकता और भाषा सीखने का सबसे प्रभावी माध्यम भी हैं। बचपन में कहानी सुनाना बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बच्चों को व्यस्त रखता है, भाषा के विकास को बढ़ावा देता है और उनकी कल्पनाशीलता को बढ़ाता है। कहानियों के माध्यम से बच्चे अपनी भावनाओं को व्यक्त कर सकते हैं, नई दुनिया और विचारों से परिचित हो सकते हैं और सीखने के प्रति रुचि विकसित कर सकते हैं। कहानियाँ बच्चों की कल्पना शक्ति  और तर्कशक्ति को बढ़ाती हैं। यह उन्हें नए विचारों और रचनात्मक तरीके से सोचने के लिए प्रेरित करती हैं। कहानियाँ सुनने या पढ़ने से बच्चों के शब्दकोश  में वृद्धि होती है और उनकी भाषा शैली बेहतर होती है। यह उनमें सुनने, बोलने, पढ़ने और लिखने  के कौशल को विकसित करती हैं। अधिकांश बाल कहानियाँ, विशेष रूप से पंचतंत्र की कहानियाँ, ईमानदारी, दया, साहस, और मित्रता जैसे नैतिक गुण सिखाती हैं। भावनात्मक और सामाजिक समझरू कहानियों के पात्रों के माध्यम से बच्चे भावनाओं (जैसे खुशी, दुख, डर, सहानुभूति) को समझते हैं। यह उन्हें सामाजिक परिस्थितियों को समझने और दूसरों के प्रति संवेदनशीलता विकसित करने में मदद करती हैं। पौराणिक और लोककथाएँ बच्चों को अपनी संस्कृति, इतिहास और परंपराओं से परिचित कराती हैं। कहानी सुनना बच्चों में ध्यान केंद्रित करने  की क्षमता बढ़ाता है और उनके मन में जिज्ञासा पैदा करता है।यह बच्चों के लिए मनोरंजक होने के साथ-साथ तनावमुक्त होने का एक स्वस्थ साधन भी है। बाल कहानियाँ बच्चों को आदर्श नागरिक बनने, उनके व्यक्तित्व को निखारने और उन्हें जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
कई बार संवाद में यह सामने आता है कि एक तो बाल साहित्य को हमंशा हाशिए पर खड़ा रखा गया, उस पर बाल साहित्य के स्वरूप को ही कई साहित्यकार समझ नहीं पाते हैं। जबकि हमारे देश में प्राचीनकाल से बाल साहित्य रचा जा रहा है। विष्णु शर्मा ने चार उद्दंड राजकुमारों को शिक्षित करने तथा जीवन की नीतियों का ज्ञान देने के लिए वे कहानियां सुनाईं जिनके पात्र पशु, पक्षी थे। हम उन कहानियों के संग्रह को ‘‘पंचतंत्र’’ के नाम से जानते हैं। प्रश्न आता है सबसे नवीनतम टैक्नोलाजिकल स्थिति का, जिसे हम ‘‘एआई’’ यानी आर्टीफीशियल इंटेलीजेंस के नाम से जान रहे हैं। उसने तूफान की तरह बड़ी तरंगे उठानी शुरू कर दी हैं। कहा तो ये जाता है कि इन दिनों कई किताबें भी एआई के द्वारा लिखी जा रही हैं। क्या यह छल बाल साहित्य के मर्म को समझ सकेगा? जबकि बाल साहित्य से अपेक्षा की जाती है कि वह टेक्नाॅलाजी के साथ परिवर्तित होते युग में बच्चों के लिए मानवीय मूल्यों, राष्ट्रीय मूल्यों और आदर्श पूर्ण मूल्यों को बनाए रखे। यह एक चुनौती है। शासकीय इकाइयां मात्र सहायता कर सकती हैं, अन्यथा इस चुनौती से स्वयं साहित्यकारों को निपटना होगा। इसके लिए आवश्यक है कि वे साहित्य सृजन करने में एआई के छल का सहारा न लें, वर्तमान बाल मनोविज्ञान को समझें और पारंपरिक मूल्यों व संस्कारों को आधुनिक प्रवृतियों के साथ इस प्रकार समायोजित करें कि वह बच्चों को मनोरंजन और शिक्षा एक साथ मिल सके तथा उनमें पुस्तक पढ़ने के प्रति रुचि जाग सके।
कथाकार गोकुल सोनी ने पांपरिक कलेवर की कथाओं को बड़ी रोचकता से आधुनिक वैज्ञानिकता से जोड़ दिया है जिससे वे ज्ञानवर्द्धन तथा समसामयिकता की शर्तों को अच्छी तरह से पूरा करती हैं। इस संदर्भ में “आश्वति” के अंतर्गत मनीष गुप्ता, निदेशक, इंद्रा पब्लिशिंग हाउस, भोपाल ने संग्रह की विशेषताओं को बखूबी रेखांकित किया है। उन्होंने लिखा है कि “श्री गोकुल सोनी साहित्य जगत में एक जाना पहचाना नाम है। मैं उनके सदैव कुछ नया सोचने और कुछ नया करते रहने की विलक्षण क्षमता का कायल हूं। वे चाहे व्यंग्य लिखें, गीत, कविता, लघुकथा या कहानी लिखें उसमें रोचकता और पठनीयता तो होती ही है, उनके विषय अक्सर ऐसे होते हैं जो दूसरों की दृष्टि से छूट गए होते हैं। प्रस्तुत पुस्तक ष्दादू का पिटाराष् जिसको ‘जादू का पिटारा’ भी कहें तो अतिशयोक्ति न होगी, क्योंकि इस बाल कहानी संग्रह की कहानियों में जहां आज के समय की नवीनतम टेक्नालॉजी से खेल खेल में परिचित कराती कहानियां, जैसे ड्रोन, साइबर फ्रॉड, भौतिक शास्त्र, रसायन शास्त्र, के सिद्धांतों पर आधारित जादू की कहानियां हैं तो वहीं मिट्टी की उपजाऊ शक्ति कैसे बढ़ाएं, बीमारियों से बचाव कैसे करें, हमारा स्वस्थ आहार कैसा हो, ग्रामीण परिवेश, संस्कृति, तीज त्यौहार, भी हैं। छोटे बच्चों की मन को लुभाने वाली शैतानियां हैं, तो किशोर वय के बच्चों को ऐसी कहानियां भी हैं जो उनको अपने कैरियर को चुनने में मार्गदर्शक सिद्ध होंगी।”

संग्रह में कुल 24 कहानियां हैं जिनमें अन्वय और जूते, अन्वय मंदिर में, अर्जुन और केंचुआ, मकर संक्रांति, चलें गांव की ओर, ज्न्म दिन, गुलेल, ड्र्ोन दीदी, गुमशुदा तारे, लालच की सजा, सावधानी हटी दुर्घटना घटी जैसी विविधतापूर्ण कहानियां हैं। “ग्राम्य-जीवन-परिदृश्य की कहानियाँ वैज्ञानिक सोच के साथ” शीर्षक से महेश सक्सेना निदेशक,बाल कल्याण एवम बाल साहित्य शोध केंद्र,भोपाल ने लिखा है कि “यूँ साधारण से दिखने वाले श्री गोकुल सोनी मध्यप्रदेश के प्रतिभावान, प्रभावशाली, साहित्यिक प्रतिभा के असाधारण व्यक्ति है। वे एक कवि, लेखक, लोकभाषा बुन्देली के अध्येता, कथाकार, पैनी लघुकथा के सर्जक तो हैं ही, लेकिन एक उत्कृष्ट व्यंग्यकार तथा समीक्षक की उनकी विशिष्ट पहचान है। प्रायः वे छोटे-बड़े आयोजनों में किसी भी विधा की पुस्तक पर समीक्षात्मक आलेख पढ़ते हुये नजर आते हैं। उनके हर समीक्षात्मक आलेख से रचना और रचनाकार का कद बढ़ता है तथा समुचित मार्गदर्शन भी मिलता है।”

  डॉ. विकास दवे, निदेशक, साहित्य अकादमी, मध्यप्रदेश शासन, भोपाल ने संग्रह की कहानियों को “बालमन से सरोकार रखती, चिंतन से उपजी कहानियां” कहते हुए लिखा है कि “इस पुस्तक की सबसे अच्छी बात है, रचनाओं का बालमन से सरोकार। उस पर ‘सोने पर सुहागा’ यह कि वे आत्यंतिक मानवीय चिंतन प्रक्रिया से उपजी हैं। ये इस पुस्तक की दो सशक्त भुजाएं हैं। गोकुल जी लंबे समय से लेखन के क्षेत्र में सक्रिय हैं। विविध विधाओं में लेखन करते हैं। आपके परिश्रम की यह सुंदर परिणीति बाल साहित्य विधा में प्रथम प्रयास है जो अप्रतिम बन पड़ेगी इसमें कोई संशय नहीं।”

    गोकुल सोनी ने अपने इस बाल कहानी संग्रह के स्वरुप में आने के परिप्रेक्ष्य में लिखा है कि “बच्चों के लिए कहानियां और कविताएं में काफी समय से लिखता आ रहा हूं, कुछ प्रकाशित भी हुई हैं परंतु ऐसा कभी कभार ही होता था। सदैव मुझे भ्रातावत स्नेह देने वाले आदरणीय श्री महेश सक्सेना जी ने मुझसे पिछले वर्ष एक आग्रह किया कि सोनी जी, जब आप प्रत्येक विधा में लिखते हैं तो बाल साहित्य की भी कोई पुस्तक आपकी आना चाहिए। मैंने उनके आग्रह को आदेश मानते हुए उनसे वायदा किया कि मेरा पूर्ण प्रयास होगा कि एक वर्ष में कम से कम एक बाल साहित्य की पुस्तक आपको अवश्य भेंट करूँगा। उसी प्रेमाग्रह का परिणाम है यह बाल कहानी की पुस्तक। इन कहानियों के विषयों का अनुमोदन भी उनसे कराया और उनका मूल्यवान मार्गदर्शन पाकर ही मैंने ये कहानियां लिखी। सरल सहज व्यक्तित्व के धनी, आत्मीय प्रेम से परिपूर्ण, बाल साहित्य के निष्णात विद्वान श्री महेश सक्सेना जी का मार्गदर्शन पाकर मैं ही नहीं, अनेकों बाल साहित्यकार पुष्पित और पल्लवित हुए हैं। मेरे लिए दूसरे मार्गदर्शक की भूमिका का निर्वाह किया मेरे आत्मीय अनुज डा. विकास दवे जी ने। ‘बालवीर’ जैसी प्रतिष्ठित बाल-पत्रिका का बतीस वर्षों तक संपादन करने वाले डा. विकास दवे जी का अनुभव संसार भी बहुत समृद्ध है।”
गोकुल सोनी ने जहां ‘‘अन्वय के जूते’’ में प्रिय लगने वाला कोई भी सामान उठा लेने की बालमनोवृति को सामने रखा है तो वहीं ‘‘अर्जुन और केंचुआ’’ में मिट्टी की उर्वरता के लिए केंचुओं के महत्व को बड़े सरल ढंग से समझाया है। ‘‘ड्रोन दीदी’’ में कृषि कार्य एवं कृषि को हुए प्रकृतिक नुकसान के आलन में ड्रोन की भूमिका को कथात्मक ढंग से प्रस्तुत किया है। अर्थात कहानी की कहानी और ज्ञान का ज्ञान। ‘‘गुमशुदा तारे’’ में जुगनुओं के बारे में बताया गया है। वहीं, ‘‘सावधानी हटी, दुर्घटना घटी’’ में साइबर अपराधों और डिजिटल अरेस्ट के बारे में बताया गया है। यद्यपि यह कहानी भाई दृष्टि से तथा विषय के अनुसार बालमन से अधिक युवाओं तथा प्रौढों के लिए अधिक सटीक बैठती है किन्तु अन्य सभी कहानियां भाषाई स्तर पर बच्चों के लिए शिक्षाप्रद कहानियां हैं। इस प्रकार की कहानियां अधिक से अधिक लिखी जानी चाहिए। विशेषरूप से बालकथानकों को आधुनिक परिवेश से जोड़ कर बच्चों में कहानियों के प्रति रूचि जगाई जा सकती है। इस दृष्टि से गोकुल  सोनी का बाल कहानी संग्रह ‘‘दादू का पिटारा’’ एक उत्तम कृति है।
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Tuesday, March 24, 2026

पुस्तक समीक्षा | बुंदेली की मिठास में डूबा काव्य संग्रह ‘‘बुंदेली बानी’’ | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा 
बुंदेली की मिठास में डूबा काव्य संग्रह ‘‘बुंदेली बानी’’
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह - बुंदेली बानी
कवयित्री - डॉ. कुंकुम गुप्ता
प्रकाशक-संदर्भ प्रकाशन,भोपाल
मूल्य -200/- 
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प्रत्येक बोली कि अपनी विशेषता और अपनी मिठास होती है। बुंदेली बोली भी इसी तरह से अपने क्षेत्रीय मिठास लिए हुए हैं जो सुनने और पढ़ने वाले के मन को सहज ही स्पर्श करती है। बोलियां जहां एक ओर संस्कृति की संवाहक होती हैं वही निज गौरव और आत्मीयता का भी बोध कराती हैं। डॉ कुंकुम गुप्ता ने बुंदेली बोली की मिठास को अपनी कविताओं में प्रस्तुत करते हुए बुंदेली संस्कृति को भी सहेजा है। उनके काव्य संग्रह का नाम है “बुंदेली बानी”। 
“बुंदेली बानी” में कुल 51 कविताएं हैं, जिनमें संस्कृतिस सामाजिकता, प्रकृति, राष्ट्रीयता तथा आध्यात्मिकता के साथ ही हास्य और प्रेम के संवेग भी समाहित हैं। हिन्दी विभागाध्यक्ष एवं वर्तमान में प्राचार्य, पं. दीनदयाल उपाध्याय शासकीय कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय सागर (म.प्र.) प्रो. सरोज गुप्ता ने संग्रह की प्रस्तावना लिखते हुए डॉ. कुंकुम गुप्ता की रचना धर्मिता के साथ उनका संक्षिप्त परिचय भी प्रस्तुत किया है। डॉ सरोज गुप्ता के शब्दों में- “डॉ कुंकुम गुप्ता साहित्य जगत में बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न रचनाकार हैं। साहित्य की विभिन्न विधाओं कविता, कहानी, निबन्ध, समीक्षा, संस्मरण, बाल साहित्य आदि में लेखनी चलाने के साथ नित नूतन प्रयोग करने की कला में दक्ष हैं। आपकी रचनाओं में बुन्देलखण्ड की माटी की सौंधी महक, सहजता, सरलता, उदारता, भावों में सम्प्रेषणीयता के साथ जन्मभूमि के प्रति समर्पण, बुन्देली और बुन्देली संस्कृति से जुड़ाव दृष्टव्य है। आप राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त परिवार में जन्मीं, बखरी में दद्दा जी, बापू जी के प्यार दुलार के साथ बचपन में अनेक वरिष्ठ साहित्यकारों से सहज संपर्क से उनके साहित्यिक संस्कारों को आत्मसात करते हुए न सिर्फ अपनी रचनाधर्मिता को जीवन्त बनाये हुए हैं वरन् अपनी रचनाओं के माध्यम से हिंदी साहित्य की श्रीवृद्धि कर रही हैं। डॉ. कुंकुम गुप्ता समाज की गतिविधियों, लोक व्यवहारों का यथार्थ पूरी ईमानदारी के साथ प्रस्तुत करती हैं।”
डॉ. कुंकुम गुप्ता सौभाग्यशाली हैं कि वे राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त की वंशज हैं। साहित्य प्रेम उनकी धमनियों में प्रवाहित होना स्वाभाविक है। डाॅ कुंकुम गुप्ता लेखिका संघ मध्यप्रदेश की प्रांतीय अध्यक्ष हैं। वे अन्य महिला रचनाकारों को अपनी संस्था के अंतर्गत निरंतर प्रोत्साहित करती रहती हैं। अपनी रचनाशीलता के बारे में डॉ. कुंकुम गुप्ता ने “आत्मकथ्य” में लिखा है- “मेरा बचपन झाँसी जिले के चिरगाँव में बीता इसलिए बुंदेली परिवेश, पर्वों, लोकगीतों, परम्पराओं आदि से लगाव रहा है। भोपाल आकर जब साहित्यकारों से बुंदेली, निमाड़ी, मालवी आदि में कविताएँ सुनीं तो मेरे मन में भी यह जिज्ञासा जागृत हुई कि मैं भी बुंदेली में रचनाएँ लिखूँ। मध्यप्रदेश लेखक संघ की लोक भाषा गोष्ठी में भी कविता सुनाने का अवसर मिला तो कुछ आत्मविश्वास जागा और हिन्दी लेखिका संघ में भी बुंदेली में कविताओं को पढ़ा जिसको सराहना मिली इससे मेरा उत्साहवर्धन हुआ।”
बोलियों की यह विशेषता होती है कि हर दस कोस में बोली के कुछ शब्द बदल जाते हैं। जैसे बुंदेलखंड में पन्ना की तरफ बेटियों को “बिन्ना” कहा जाता है जबकि ललितपुर, झांसी के तरफ उन्हें “बिन्नू” कहकर पुकारा जाता है इसीलिए कुंकुम गुप्ता जी की प्रथम कविता का शीर्षक है “बिन्नू काए रिसानी”। इस कविता में कवयित्री ने बालिका शिक्षा सहित बालिका के अधिकारों की बात बहुत सहजता से उठाई है। बानगी देखिए-
बिन्नू काय रिसानी हमसें, 
बिन्नू काय रिसानी 
बैठीं हो काय मों लटकायें, 
भर आँखन में पानी।

रोज तो तुम गैया बछियन की 
साफ-सफाई करततीं
फिर कुअलन पै पानी भरवे
सखियन संग निकरततीं
आज कछु न कर रही बिन्नू 
अब लौं करी न सानी 
बिन्नू काय रिसानी हमसें, बिन्नू काय रिसानी।

दादा भौत देख लई हमने 
बातें बड़ी तुम्हाई 
कहत कछु और करत कछु 
फिर पीछें देत सफाई
सबकी बिटियाँ आगें पढ़ रहीं 
तुमने बात न मानी 
बिन्नू काय रिसानी हमसें, बिन्नू काय रिसानी।
     जब बिन्नू अर्थात बेटियों की बात चलेगी तो सखियों की चर्चा भी होना स्वाभाविक है। बेटियों का संसार अपनी सखियों के संग से ही आरम्भ होता है। ‘‘गुइयाँ’’ शीर्षक कविता की ये पंक्तियां देखिए जिनमें सेहत की बातों के संग सखियों का विमर्श भी मौजूद है- 
ऐसी काय बैठी मोरी गुइयां
बैठी उदास औ लटकी मुंइयां
कछू न पूछौ हाल सखी री 
देर रात कैं खा लई घुइयाँ।
आज परहेज करौ थोड़ो सो 
लौकी बनाओ चाँय तुरइयाँ।
हरी सब्जिन को स्वाद न भावैं 
अबै उमर तो है लड़कैंया।
वादी की चीजें हमें भाउतीं 
सो गुस्सा होंय हमारे सइयाँ।
आज से सेहत कौ ख्याल करलो 
तन को दुख कोउ बाँटत नइया।
      वृद्धावस्था जीवन का एक शाश्वत सत्य है। किन्तु सामाजिक परिवर्तनों के कारण अनेक लोगों के लिए वृद्धावस्था कष्टप्रद साबित होने लगी है। इसका मूल कारण है कि युवा अपने बड़ों से विरत होने लगे हैं और वृद्धाश्रम पनपने लगे हैं। दूसरी ओर वे माता-पिता भी जो धनअर्जन करने की लिप्सा में पहले स्वयं को व्यस्त कर लेते हैं फिर बच्चों को अपने से दूर भेज देते हैं उन्हें भी कवयित्री ने चेताया है। वस्तुतः डाॅ. कुंकुम गुप्ता की ‘‘बुढ़ापा’’ कविता हर व्यक्ति को जीवन के सत्य का स्मरण कराती है-
बुढ़ापौ सबको आने है 
एक दिना मर जाने है।
जानत तो है जौ सब कोऊ 
फिर भी सीना ताने है।
कैसेउ प्रीत लगा लो सबसें 
बाद में रोने गाने है।
साठ साल के बाद सबई कौ 
जानै कबै बुलउआ आने है।
ताले कुची लगा लो कित्ती 
बनाओ कितेक तहखाने है।
जिनसे छिपा के जोड़ी माया 
उनई खौं सब हथियाने है।
   संग्रह में एक बहुत ही ‘स्वादिष्ट’ कविता भी है क्योंकि इसमें बुंदेलखंड के पारंपरिक व्यंजनों का विवरण दिया गया है। कविता की पंक्तियां कुछ इस प्रकार हैं-
बुंदेली व्यंजन की कर लैवें बात 
स्वाद इनकौ सबखौं भौतई सुहात 
बैगन का भर्ता और मौन दई गकइयाँ 
सब मिल कैं खावें पड़ौसी और गुंड्याँ 
आम की चटनी स्वाद है बढ़ात।
चूरमा के लड्डू दाल बाटी को स्वाद 
शुद्ध घी की खुशबू और बढ़िया पुलाव 
ऊपर से मठा पियो जल्दी पचात ।
समूदी रोटी खौं देख जिया डोले 
बरा मगौरा पापड़ मिश्री सी घोलें 
खीचला कचरियां कालोनी में मिलात।
      यह विशेषता है बोलियों में सृजन की कि जब कोई रचनाकार अपनी बोली में रचना करता है तो वह अपनी परंपराओं, संस्कृति, रीति-रिवाजों एवं माटी की सुगंध को उसमें पिरोना नहीं भूलता है। डाॅ कुंकुम गुप्ता ने भी अपनी बुंदेली कविताओं में समसामयिक समस्याओं पर कलम चलाते हुए बुंदेली मिठास को भरपूर संजोया है। इस तरह के काव्य संग्रह बहुतायत आने चाहिए क्योंकि यही बुंदेलखंड की संस्कृति को भविष्य तक पहुंचाने में सहायक होंगे। डाॅ. कुंकुम गुप्ता का यह बुंदेली काव्य संग्रह ‘‘बुंदेली बानी’’ इतनी सहज बुंदेली में है कि सुगमता से सभी को समझ में आ सकता है तथा हर क्षेत्र का पाठक इन कविताओं से जुड़ सकता है।      
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Tuesday, March 10, 2026

पुस्तक समीक्षा | बुंदेलखंड की सांस्कृति विरासत पर महत्वपूर्ण पुस्तक है यह | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
बुंदेलखंड की सांस्कृति विरासत पर महत्वपूर्ण पुस्तक है यह
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक - बुन्देलखण्ड की सांस्कृतिक विरासत
संपादक - प्रो. नागेश दुबे, डॉ. सुल्तान सलाहुद्दीन
प्रकाशक -रिसर्च इंडिया प्रेस ई-6/34 फर्स्ट फ्लोर, संगम विहार नई दिल्ली-110080
मूल्य -3500/-
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बुंदेलखंड संस्कृति का धनी है। इसके इतिहास के पन्ने इसकी संस्कृति के साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं। यहां तक कि प्रागैतिहासिक काल में भी वह संस्कृति बुंदेलखंड में मौजूद थी जिसके मनुष्यों ने आबचंद की गुफाओं में भित्ति चित्र बना कर अपने अनुभवों एवं अपनी जीवनचर्या को आने वाली पीढ़ियों के लिए अंकित कर दिया। बुंदेलखंड में अवशेषों के रूप में मिलने वाले मृदभाण्ड, औजार एवं आभूषणों से इस अंचल में सास्कृतिक विकास की सम्पूर्ण कथा पढ़ी और जानी जा सकती है। बुंदेलखंड में कला और संस्कृति के विकास का चरम बिन्दु था खजुराहो के मंदिर एवं मूर्तियां। जहां धर्म, दर्शन, आध्यात्म, जीवन आदि सभी एकाकार हो कर बोल उठते हैं तथा तत्कालीन समाज की मानसिक विशालता से परिचित कराते हैं। बुंदेलखंड में अभी भी अनेक पक्ष ऐसे हैं जिन पर सतत शोधकार्य किया जा रहा है ताकि काल के पर्दों के पीछे छिपे हुए तथ्यों को प्रकाश में लाया जा सके। इस कार्य में डाॅ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास, पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग का सबसे बड़ा योगदान है। विभाग में म्यूजियम के संस्थापक डाॅ. के.डी. बाजपेयी से ले कर वर्तमान विभागाध्यक्ष प्रो. नागेश दुबे ने गहन शोध कार्य किए हैं तथा कराए हैं। प्रो.नागेश दुबे ने समय-समय पर सेमिनार में शोध आलेख का न सिर्फ वाचन कराया अपितु उन शोध आलेखों को पुस्तक के रूप में प्रकाशित करा कर उन्हें दस्तावेज में ढाल दिया जो कि भावी शोधकर्ताओं के लिए भी जानकारी उपलब्ध कराने के साथ दिशानिर्देश देने का भी काम करते हैं। ऐसा ही एक शोध ग्रंथ प्रकाशित हुआ है जिसका नाम है ‘‘बुंदेलखंड की सांस्कृतिक विरासत’’। इस शोघ ग्रंथ का संपादन किया है प्रो. नागेश दुबे तथा डॉ. सुल्तान सलाहुद्दीन ने।

प्रो. नागेश दुबे ने डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर (म.प्र.) से ही वर्ष 1998 में पीएच.डी. की उपाधि प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व विभाग से प्राप्त की। वे इसी विभाग में नियुक्त हुए तथा अकादमिक कार्यों के साथ ही वर्ष 2014 से निरन्तर इस विभाग में विभागाध्यक्ष पद का भी निर्वहन कर रहे हैं। इनकी विषय विशेषज्ञता प्राचीन भारतीय सामाजिक एवं आर्थिक इतिहास तथा भारतीय कला एवं स्थापत्य है। इन्होंने अनेक पुरातात्त्विक सर्वेक्षणों एवं उत्खननों में भी सहभगिता की है। इनकी आठ पुस्तके प्रकाशित हैं। इन्होंने सात राष्ट्रीय संगोष्ठियों का सफल आयोजन आपके निर्देशन में करवाया है तथा सौ से अधिक राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों में सहभागिता भी की है। इनके 60 से अधिक शोध पत्र प्रकाशित हैं। इनके शोध निर्देशन में 20 शोधार्थियों ने शोधकार्य पूर्ण किया है।
वहीं, डॉ. सुल्तान सलाहुद्दीन ने प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्त्व विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय (उ.प्र.) से स्नातकोत्तर तथा प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व विभाग, डॉ. हरीसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय, सागर (म.प्र.) से पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। इन्होंने पुरातत्त्व विषय में यूजीसी नेट परीक्षा पास की है। इन्होंने संग्रहालय विज्ञान, प्रागैतिहास, शैलचित्र कला, पुरातात्त्विक उत्खनन एवं अन्वेषण में विशेषज्ञता हासिल की है। इनके द्वारा अशोकनगर जिले में विद्यमान 50 से अधिक नवीन पुरास्थलों सहित 6.6 करोड़ वर्ष पुराने जीवश्मों की भी खोज की गई। विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में इनके 15 से अधिक शोधपत्र प्रकाशित हैं। इनकी तीन संपादित पुस्तकें भी प्रकाशित हैं। उन्होंने विभिन्न राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों, सम्मेलनों में 30 से अधिक शोध पत्र भी प्रस्तुत किए हैं। डॉ. सुल्तान सलाहुद्दीन वर्तमान में शासकीय महाविद्यालय, शाढ़ौरा, जिला अशोकनगर, मध्य प्रदेश में इतिहास विभाग में सहायक प्राध्यापक (अतिथि विद्वान) के रूप में कार्यरत हैं।

‘‘बुंदेलखंड की सांस्कृतिक विरासत’’ पुस्तक के सह-सम्पादक हैं डॉ. राघवेन्द्र प्रताप सिंह, डॉ. सुरेन्द्र कुमार यादव, डॉ. मशकूर अहमद कादरी, डॉ. शिव कुमार पारोचे तथा मो. आदिल खान।
जब विषय विशेषज्ञ अपना शोधपत्र प्रस्तुत करते हैं तथा विषय विशेषज्ञों की एक पूरी टीम उसका संपादन करती है तो ऐसी शोधात्मक पुस्तक की अर्थवत्ता, गुणवत्ता एवं सामग्री विषयक विश्वसनीयता स्वयं सिद्ध रहती है। इस शोध्रगंथ रूपी पुस्तक में बुंदेलखंड की संस्कृति के विविध पक्षों पर शोघात्मक सामग्री सहेजी गई है। पुस्तक में कुल 34 आलेख हैं जिनमें कई आलेखों के साथ छायाचित्र भी प्रस्तुत किए गए हैं। इन लेखों में इतिहास एवं पुरातत्व से ले कर भूगोल तक, खानपान से ले कर आस्था एवं संगीत तक हर पक्ष को सामने रखा गया है। विशेष यह कि जब इतिहास एवं पुरात्तव बात करते हैं तो साक्ष्य सहित बात करते हैं। प्रो. नागेश दुबे ने ‘‘प्राक्कथन’’ में लिखा है कि ‘‘बुन्देलखण्ड का भू-भाग आदिकाल से ही अपने अंचल में विभिन्न युगों की सांस्कृतिक विरासत को संजोये रहा है। इस क्षेत्र में विभित्र संस्कृतियाँ पुष्पित और पल्लिवित हुई। बुन्देलखण्ड की सांस्कृतिक विरासत के विविध पक्षों को उद्घाटित करने के लिये भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद् (आईसीएसएसआर) नई दिल्ली की वित्तीय सहायता से प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरात्तत्त्व विभाग, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर द्वारा विश्वविद्यालय में स्थित पुरातत्व संग्रहालय में 17-18 फरवरी, 2022 में राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया था। जिसमें बुंदेलखंड के सांस्कृतिक विरासत के विविध पक्षों, साहित्यिक परम्परा, कला-स्थापत्य, समाज, धर्म, पर्यटन, आदि विविध पक्षों पर केन्द्रित शोध पत्र प्रस्तुत किये गये। इस ग्रंथ में बुन्देलखण्ड की सांस्कृतिक विरासत को उदघाटित करने वाले शोधपत्रों को सम्मिलित किया गया है।’’

व्यक्तिगत रूप से मेरे लिए यह गर्व का विषय है कि मैं भी भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरात्तत्त्व विभाग, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर की ‘‘गोल्ड मेडलिस्ट’’ विद्यार्थी रही हूं तथा यही से मैंने ‘‘खजुराहो की मूर्तिकला के सौंदर्यात्मक तत्व’’ विषय पर पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की थी। मेरा भी एक शोधपत्र इस पुस्तक में शामिल है। यद्यपि सतत अकादमिक रूप से मैं कभी विभाग से जुड़ी नहीं रही किन्तु समय-समय पर अपने शोधपत्र वाचन करने तथा विषय विशेषज्ञ के रूप में सेमिनारों में मुझे विभाग ने शामिल किया है। इसीलिए मैं विभाग द्वारा किए जाने वाले शोध कार्यों की गंभीरता से भली-भांति परिचित भी हूं और इसीलिए इस पुस्तक पर आधिकारिक तौर पर कोई भी समीक्षात्मक टिप्पणी करने के योग्य स्वयं को अनुभव करती हूं। 

पुस्तक में जो आलेख हैं उनकी गुणवत्ता एवं श्रेष्ठता निःसंदेह स्वीकार्य है। जैसाकि मैंने पूर्व में भी लिखा कि यह पुस्तक भावी शोधकर्ताओं को एक ऐसी ज़मीन देती है जिस पर खड़े हो कर वे इन पर पुनर्शोध एवं इससे आगे का कार्य कर सकते हैं। यूं भी इतिहास एवं पुरातत्व नवीन दृष्टिकोण से बार-बार शोध कार्य की मांग करते हैं। इस पुस्तक में जो 34 लेख हैं वे इस प्रकार हैं-   1.बुन्देलखण्ड के संग्रहालयों में प्रदर्शित बुन्देलखण्ड की साँस्कृतिक विरासत - प्रो. नागेश दुबे 2. सागर की सांस्कृतिक विरासत एवं पर्यटन की संभावनायें - डॉ. बी.के. श्रीवास्तव 3. बुंदेलखण्ड की संस्कृति प्राचीन हिंदी साहित्य के आइने में - प्रो. आनन्द प्रकाश त्रिपाठी 4. बुंदेलखण्ड में प्रभु श्रीराम - डॉ. कृष्ण कुमार त्रिपाठी 5. मढ़-बमोरा के प्राचीन मंदिर परिसर से ज्ञात सदाशिव प्रतिमा - प्रो. आलोक श्रोत्रिय, डॉ. मोहनलाल चढ़ार 6. खजुराहो की मूर्तिकला में दशावतार का अंकन - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह 7. दमोह जिला. मध्य प्रदेश की विशिष्ट नटराज प्रतिमाएं प्रतिमाशास्त्रीय अवलोकन - डॉ० सुरेन्द्र कुमार यादव 8. चन्देल काल में शाक्त एवं अन्य सम्प्रदाय - डॉ. राघवेन्द्र प्रताप सिंह 9. बुन्देलखण्ड की लोक संस्कृति के विविध पक्ष (व्रत, पर्व एवं उत्सव के विशेष सन्दर्भ में) - डॉ. विश्वजीत सिंह परमार 10. सागर संभाग के संग्रहालयों में प्रदर्शित विष्णु की गरूड़ासीन प्रतिमाएँ: एक अध्ययन - डॉ. शिवकुमार पारोचे 11. खानपुर (सागर) के शैलचित्रों का सांस्कृतिक अनुक्रम - डॉ. मशकूर अहमद कादरी 12. एरण से प्राप्त नवीन सती स्तम्भ - डॉ. मोहन लाल चढ़ार 13. मध्यप्रदेशीय बुन्देलखण्ड में जैन संस्कृति की निरन्तरता के अभिलेखीय प्रमाण - डॉ. जिनेन्द्र कुमार जैन 14. सागर जिले के धार्मिक पर्यटन स्थल - डॉ. सुल्तान सलाहुद्दीन 15. रहली अंचल का प्राचीन शैव मूर्तिशिल्प एक सर्वेक्षणात्मक अध्ययन - डॉ. गोविन्द सिंह दांगी 16. सागर क्षेत्र के प्रागैतिहासिक शैलचित्र -डॉ. प्रदीप कुमार शुक्ल 17. सागर संभाग की शिव प्रतिमाओं से सम्बद्ध सांस्कृतिक तत्व - राज बहादुर क्षत्री 18. सागर एवं दमोह का संस्कृत साहित्य - डॉ. नौनिहाल गौतम 19. बुन्देलखण्ड की लोकगाथाएँ (दिमान हरदौलजी एवं कारसदेवजी के विशेष सन्दर्भ में) - श्रीमती दीपशिखा सिंह परमार 20. लोक गीतों में प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष बुंदेली लोक गीतों के विशेष संदर्भ में - डॉ. अखिल कुमार गुप्ता 21. बुन्देलखण्ड का स्थापत्य शिल्प (मन्दिर, मठ, दुर्ग एवं गढ़ी) -डॉ. अर्चना द्विवेदी 22. सागर जिला पुरातत्त्व संग्रहालय में प्रदर्शित देवी गंगा की प्रतिमाएँ - डॉ. मनीषा तिवारी 23. थूबोन (जिला अशोकनगर) की प्रमुख गणेश प्रतिमाएँ - कीरत अहिरवार 24. खजुराहो की कला में यक्ष प्रतिमाओं का अंकन एवं मान्यताएँ - डॉ आशीष कुमार चाचोंदिया 25. दोनी (जिला-छतरपुर) के प्राचीन मंदिर - डॉ. रमेश कुमार अहिरवार 26. रानी दमयंती की नगरी का पुरा वैभव - डॉ. सुरेन्द्र कुमार चैरसिया 27. बुन्देलखण्ड अंचल की सांस्कृतिक विरासत - डॉ. दीपक कुमार 28. बुन्देलखण्ड के लोकजीवन में लोकउत्सव एंव मेले - निधि सोनी 29. बुन्देलखण्ड की सांस्कृतिक विरासत में लोक नृत्य -अंजली पाण्डेय 30. बुन्देलखण्ड के संगीत में ताल वाद्य परंपरा - डॉ. राहुल स्वर्णकार 31. दमोह जिले का प्रमुख कला केन्द्र नोहटा - डॉ. वन्दना गुप्ता 32. बुंदेली कला, साहित्य, संस्कृति एवं वैभव के प्रचार प्रसार में जनमाध्यमों की भूमिका - डॉ. अलीम अहमद खान 33. बुन्देलखण्ड की पुरा सम्पदा का सर्वेक्षण एवं राजनीतिक परिदृश्य - डॉ. रणवीर सिंह ठाकुर तथा 34. सेटपीटर्स चर्च सागर: एन एक्जाम्पल ऑफ कोलोनियल आर्कीटेक्चर।

   इस प्रकार देखा जाए तो बुंदेलखंड के लगभग प्रत्येक कालखंड को तथा प्रत्येक सांस्कृतिक पक्ष को इस पुस्तक में संग्रहीत किया गया है जिससे पुस्तक का कलेवर समृद्ध एवं सुरुचिपूर्ण है। प्रो. नागेश दुबे एवं डॉ. सुल्तान सलाहुद्दीन ने इस महत्वपूर्ण प्रकाशन के लिए साधुवाद के पात्र हैं। अकादमिक प्लेटफार्म के साथ विशेषज्ञों की मुहर किसी भी पुस्तक को एथेंटिक एवं बहुउपयोगी बना देती है। उस पर विशेषता यह है कि सभी आलेख सहज एवं सरल भाषा में हैं तथा संदर्भ सूचियों से परिपूर्ण हैं। शोधकर्ताओं एवं विद्यार्थियों के साथ ही बुंदेलखंड को समग्रता से जानने के इच्छुक आम पाठकों के लिए भी यह पुस्तक पठनीय एवं संग्रहणीय है।        
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Tuesday, March 3, 2026

पुस्तक समीक्षा | ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक रंगों से रंगे बुंदेलखंड से परिचित कराती पुस्तक | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक रंगों से रंगे बुंदेलखंड से परिचित कराती पुस्तक
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक - बुन्देलखण्ड: मध्यप्रदेश की अमूल्य विरासत
लेखिका - डाॅ. नीलिमा पिंपलापुरे
प्रकाशक - एन.डी. पब्लिकेशन, बहादुरपुर, साउथ ईस्ट दिल्ली-

110044
मूल्य -350/- (पेपरबैक)
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  बुंदेलखंड आदि काल से इतिहास एवं परंपराओं का धनी है। यह सच है कि इस क्षेत्र का पर्यटन-विकास उतना नहीं हो हुआ, जितना होना चाहिए था किन्तु अब इस ओर मध्यप्रदेश शासन का ध्यान गया है। लेखकों एवं इतिहासकारों ने बुंदेलखंड की विरासत को बचाने के लिए सतत शोधपूर्ण कलम चलाई है तथा विरासत को सहेजा है। इसी क्रम में सागर की लेखिका डाॅ नीलिमा पिंपलापुरे ने एक पुस्तक ‘‘बुंदेलखंड: द हार्टबीट आॅफ मध्यप्रदेश’’ का लेखन किया था जिसमें विश्व प्रसिद्ध छायाकार गणेश पंगारे द्वारा खींचे गए नयनाभिराम छायाचित्र थे। यह पुस्तक अंग्रेजी में थी। आवश्यकता थी ठीक उसी प्रकार की उपयोगी पुस्तक की हिन्दी भाषा में। इस आवश्यकता को महसूस करते हुए लेखिका नीलिमा पिंपलापुरे ने हिन्दी में अपनी नवीनतम पुस्तक प्रस्तुत की है जिसका नाम है- ‘‘बुंदेलखंड: मध्यप्रदेश की अमूल्य विरासत’’। इस पुस्तक में भी छायाकार गणेश पंगारे के छायाचित्र मौजूद हैं जिनके द्वारा बुंदेली विरासत के विविध रंगों को बारीकी से देखा और समझा जा सकता है।

बुंदेलखंड देश का वह क्षेत्र है जिसकी भौगोलिकता अपने आप में अनूठी है। इसके इतिहास में प्राचीनता है और यह कला में बेजोड़ है। इस क्षेत्र के बारे में इतिहासकार राय बहादुर सिंह ने लिखा था कि ‘‘बुंदेलखंड शौर्य एवं जीवटता का धनी है।’’ इसीप्रकार ‘‘बुंदेलखंड का संक्षिप्त इतिहास’’ पुस्तक लिखने वाले इतिहासकार गोरेलाल तिवारी का कथन था कि ‘‘बुंदेलखंड को जानने के बाद इससे प्रेम हो जाना स्वाभाविक है।’’ वहीं, डाॅ नर्मदा प्रसाद गुप्त बुंदेलखंड को प्रगैतिहासिक मनुष्यों से अद्यतन मानवों की विकास यात्रा का सटीक साक्ष्यमय उदाहरण मानते थे।
प्रागैतिहासिक काल से इंसानों ने बुंदेलखंड को अपने निवास के रूप में चुना। यहां स्थित गुफाचित्र इसका साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं। मृदभाण्ड तथा तांबे के सिक्के इसकी प्राचीनता की कथा कहते हैं। बुंदेलखंड श्रीराम के वनगमन पथ का अभिन्न हिस्सा रहा है तथा प्राचीन वैश्विक व्यापार के ‘‘सिल्क रूट’’ का एक प्रमुख केन्द्र रहा है। बुंदेलखंड की वर्तमान विशेषता यह है कि यह दो राज्यों मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश में फैला हुआ है। लेखिका ने ‘‘बुंदेलखंड: मध्यप्रदेश की अमूल्य विरासत’’ में मध्यप्रदेश के हिस्से के बुंदेलखंड की विरासत को सहेजस है तथा अपनी यह पुस्तक बुंदेलखंड के निवासियों को समर्पित की है।

पुस्तक में कुल चार अध्याय हैं - बुंदेलखंड क्षेत्र, वन्य जीव पर्यटन, बुंदेलखंड के किले एवे मंदिर तथा कला एवं संस्कृति। इन चारो अध्यायों के उपरांत पांचवें अध्याय के रूप में संदर्भसूची रखी गई है।
प्रथम अध्याय है ‘‘बुंदेलखंड क्षेत्र’’। इस अध्याय में उन्होंने बुंदेलखंड की भौगोलिक स्थिति, बुंदेलखंड का मानचित्र तथा बुंदेलखंड का संक्षिप्त इतिहास दिया है। बुंदेलखंड के इतिहास में लेखिका ने इस क्षेत्र की प्राचीनता को ध्यान में रखते हुए प्रीहिस्टोरिक अर्थात प्रागैतिहासिक काल से आरंभ किया है। फिर रामायण काल, महाभारत काल, छठीं शताब्दी ईसा पूर्व, ईसा उपरांत तीसरी शताब्दी, तीसरी से चौथी शताब्दी, वाकाटकों की चौथी शताब्दी, चैथी से छठीं शताब्दी गुप्ता राजवंश, आठवीं शती गुर्जर-प्रतिहार, नवीं से तेरहवीं शती चंदेल राजवंश, चौदह से सोलहवीं शती बुंदेल साम्राज्य तथा 1720 सं 1760 तक मराठाओं का बुंदेलखंड पर राजनैतिक प्रभाव का परिचय दिया गया है। इसी अध्याय में प्राचीन नगर एरण, खजुराहो के मंदिर, महाराज छत्रसाल, ब्रिटिश साम्राज्य के समय बुंदेलखंड के बारे में जानकारी है। रानी लक्ष्मी बाई के संदर्भ में झांसी का परिचय है। सागर के गोविंद पंत खेर के योगदान का विवरण है। सागर का परिचय देते हुए यहां की लाखा बंजारा झील से जुड़ी रोचक किंवदंती तथा सागर विश्वविद्यालय का परिचय है। अंत में देश की स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद बुंदेलखंड का स्वरूप जो विंध्यप्रदेश तथा मध्यभारत के अंग के रूप में रहा तथा वर्तमान बुंदेलखंड की जानकारी है। 

दूसरे अध्याय ‘‘वन्य जीव पर्यटन ’’ में वन्य जीव पर्यटन अर्थात वाइल्ड लाईफ टूरिज्म की संक्षिप्त जानकारी है। लेखिका ने इसमें पन्ना टाइगर रिजर्व, पाण्डव गुफा एवं झरना पन्ना, किमासन जलप्रपात पन्ना, किलकिला झरना पन्ना, केन घड़ियाल सेंचुरी पन्ना, भीमकुंड तथा नौरादेही रानी दुर्गावती टाईगर सेंचुरी के बारे में जानकारी दी है। ये सभी मनोरम स्थान हैं जो पर्यटकों को आकर्षित करने की क्षमता रखते हैं।
दूसरे अध्याय में ही बुंदेलखंड की वन आधारित आजीविका की जानकारी दी गई है। इस अध्याय में बुंदेलखंड की कृषि संबंधी तथा वनोपज की जानकारी दी गई है। चूंकि बीड़ी व्यवसाय बुंदेलखंड का एक प्रमुख व्यवसाय है अतः तेंदू पत्ता जिसका उपयोग बीड़ी निर्माण में होता है तथा बीड़ी बनाने की चर्चा की गई है। वनोपज पर आधारित दूसरा बड़ा व्यवसाय है महुआ बीनने का। महुआ बीनने तथा इसके विविध उपयोग की संक्षिप्त जानकारी दी गई है। 
तीसरा अध्याय है ‘‘बुंदेलखंड के किले एवं मंदिर’’। इस संबंध में लेखिका ने परिचयात्मक ढंग से अध्याय के आरंभ में ही लिखा है कि -‘‘प्राचीन संस्कृति और परंपराओं की भूमि बुंदेलखंड अपने पुरातात्विक स्मारकों और सभी धर्मों, हिंदू, मुस्लिम, जैन और बौद्धों के लिए तीर्थ स्थानों के लिए प्रसिद्ध है। शानदार किले गौरवशाली अतीत, महान राजवंशों, सम्राटों और योद्धाओं की याद दिलाते हैं।’’ इसमें कोई संदेह नहीं कि बुंदेलखंड स्थपत्य और कला का धनी है। यहां के किलों का पुराणों में उल्लेख मिलता है। डाॅ. पिंपलापुरे ने इस अध्याय में जिन किलों का उल्लेख किया है, वे हैं- कालिंजर, झांसी (यद्यपि यह वर्तमान में उत्तरप्रदेश में स्थित है), ओरछा के किले, मंदिर एवं छतरियां। साथ ही ओरछा की रानी गणेशकुंवरी, लाला हरदौल की कथा का भी उल्लेख है। इसके अतिरिक्त अजयगढ़ का किला, दतिया महल, खजुराहो, धामोनी, गढ़पहरा, सागर, रहली का किला, चंदेरी, तालबेहट, धुबेला संग्रहालय, हृदयशाह का महल तथा पन्ना के प्रसिद्ध मंदिरों का परिचय दिया गया है। वैसे खजुराहो को एक स्वतंत्र अध्याय बनाया जा सकता था तथा ‘खजुराहो और उसके आस-पास’ के रूप में उस पूरे क्षेत्र चंदला, मंड़ला, बसारी आदि को हाईलाईट किया जा सकता था।

दमोह जिले में स्थित जैन तीर्थ कुण्डलपुर, सागर के रानगिर का हरािद्धी माता मंदिर, श्रीदेव पंढरीनाथ मंदिर, रहली का सूर्य मंदिर, विनायका का विष्णु मंदिर तथा सागर के वृंदावन बाग मंदिर का विवरण भी इसी तीसरे अध्याय में है।

     चौथा अध्याय ‘‘कला एवं संस्कृतिक’’ का है। लेखिका डाॅ नीलिमा पिंपलापुरे के शब्दों में-  ‘‘बुंदेलखंड का खूबसूरत इलाका परंपराओं का शाही इतिहास दर्ज करता है। चाहे वह विरासत हो, कला और शिल्प, हथकरघा या संस्कृति, यह अपनी विशिष्टता के लिए जाना जाता है। बुंदेलखंड का पारंपरिक संगीत और नृत्य, त्यौहार और समारोह, साहित्य और ऐतिहासिक स्मारक बुंदेलखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के कई महत्वपूर्ण पहलू हैं।’’ इस अध्याय में बुंदेलखंड में प्रचलित काष्ठ एवं धातु शिल्प, चंदेरी के वस्त्र उद्योग, ताराग्राम ओरछा के हस्त निर्मित कागज उद्योग की जानकारी है। बुंदेली वाॅल पेंटिंग्स के साथ ही नृत्य कलाओं जैसे राई, दिवारी आदि एवं बुंदेली लोग गायन दादरा, फाग, लमटेरा आदि की संक्षिप्त जानकारी है। इसके साथ ही बुंदेली पकवानों के आस्वाद का भी संक्षिप्त परिचय है।

वस्तुतः यह एक ऐसी पुस्तक है जो संक्षेप में पर्यटकों को बुंदेलखंड की विविधरंगी विरासत से परिचित कराती है। इसका मूल उद्देश्य पर्यटकों को बुंदेलखंड की ओर आकर्षित करना है, जिसमें यह पुस्तक खरी उतरती है। पुस्तक का कव्हर, मुद्रण तथा कागज बेहतरीन है। लेखिका ने पुस्तक की प्रस्तावना में लिखा है कि-‘‘यह प्रकाशन बुन्देलखण्ड के प्रति मेरे प्रेम और लगन का परिणाम है। मेरा विचार बुन्देलखण्ड के अनूठे पहलुओं को उजागर करना है और इसे एक सम्मानपूर्ण स्थान दिलाना है, जिसका यह क्षेत्र हकदार है। मैंने मुख्य रूप से मध्यप्रदेश के बुन्देलखंड वाले माग पर ध्यान केन्द्रित किया है, क्योंकि यहीं मैं पिछले पचास वर्षों से निवासरत हूँ और यही वह क्षेत्र है जो मेरे हृदय के करीब है। मुझे पूरा विश्वास है कि यह पुस्तक इस सुन्दर क्षेत्र को अग्रसर करने हेतु उपयोगी सिद्ध होगी। यह पुस्तक, बुन्देलखण्ड का एक विस्तृत या गहन अध्ययन नहीं है, बल्कि यह दुनिया को इस रहस्यमय भूमि और इसकी समृद्ध विरासत से परिचित कराने का एक प्रयास है, जिससे पर्यटन को बढ़ावा मिले और बुन्देलखण्ड के इस सुन्दर क्षेत्र का भ्रमण करने के लिए यहाँ पर्यटक आयें। अपनी यात्रा के दौरान, मैंने बुन्देलखण्ड के प्रत्येक क्षेत्र का विस्तार से अध्ययन, दौरा किया है और मैं अपना पर्यवेक्षण इस पुस्तक के द्वारा साझा करना चाहती हूँ।’’ उन्होंने आगे लिखा है कि ‘‘पिछले पाँच दशकों से सागर जैसे सुन्दर शहर में रहते हुए, मेरे मन में बुन्देलखण्ड के प्रति गहरी आत्मीयता की भावना विकसित हुई है, जो वास्तव में भारत की जीवन रेखा और दिल की धड़कन है। मैं अपने व्यक्तित्व का श्रेय इस मनमोहक भूमि के सौहार्दपूर्ण लोगों व अपने परिवार को देती हूँ, जो मेरी ताकत, मेरा जीवन और मेरी प्रेरणा रहे हैं, जो जीवन की चुनौतियों के माध्यम से लगातार मेरा मार्गदर्शन करते रहे हैं। मैंने पूरे विश्व की यात्रा की है. लेकिन मुझे केवल सागर में ही अपने घर में सुख और सुकून मिलता है।’’
निःसंदेह बुंदेलखंड के इतिहास, सांस्कृतिक परंपराओं एवं नैसर्गिक सौंदर्य में हृदय को मोह लेने की क्षमता है। लेखिका के उत्साह एवं भावनाओं को पुस्तक में अनुभव किया जा सकता है। पुस्तक में कई महत्वपूर्ण स्थान छूट गए है किन्तु इसमें कोई संदेह नहीं कि लेखिका डाॅ. नीलिमा पिंपलापुरे ने इसे लिखने में निश्चित रूप से श्रम किया है क्योंकि जानकारी भले ही संक्षेप में दी जाए किन्तु वह जानकारी जब तक समग्रता से ज्ञात न हो तब तक उसका संक्षेपीकरण भी नहीं किया जा सकता है। इस परिचयात्मक पुस्तक की भाषा सरल एवं सुगम है। छायाचित्रों ने पुस्तक की गुणवत्ता को द्विगुणित कर दिया है। यह पुस्तक हर दृष्टि से पठनीय एवं संग्रहणीय है।         
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Wednesday, February 25, 2026

पुस्तक समीक्षा | परंपरागत शास्त्रीयता के परे माटी की गंध लिए सोंधे गीत | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा
परंपरागत शास्त्रीयता के परे माटी की गंध लिए सोंधे गीत
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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सांझा गीत संग्रह- बुन्देली माहुलिया
कवि - बिहारी ‘सागर’ एवं स्व.श्री बालमुकुन्द ‘नक्श’
प्रकाशक - कु. नंदिनी कोरी, जबलपुर (प्राप्ति पता- बिहारी सागर, धर्मश्री पुल के आगे, काम्प्लेक्स रोड, अम्बेडकर वार्ड, सागर, मध्यप्रदेश-4)
मूल्य - 250/-
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सागर शहर में लोक शैलीबद्ध गीत रचने वालों में बिहारी ‘सागर’ एक चिरपरिचित नाम हैं। उनके बड़े भाई स्व. बालमुकुन्द नक्श भी रचनाकार रहे। नक्श जी के जो गीत अप्रकाशित रहे, उन्हें बिहारी सागर ने अपने गीत संग्रह में शामिल करते हुए संग्रह को एक साझा संकलन का रूप दिया है। संग्रह का नाम है ‘‘बुन्देली माहुलिया’’। दरअसल, बुन्देलखंड में ‘‘माहुलिया’’ उर्फ़ ‘‘मामुलिया’’ का विशेष महत्व है। यह एक ऐसा त्योहार है जो बचपन से ही साझा जीवन का पाठ पढ़ाता है। साथ ही सिखाता है जीवन के आने वाले दुखों को खुशियों में बदलने की कला। इस त्योहार में कांटेदार डाली, आमतौर पर बबूल की डाली को धो कर, नहला कर, उसके कांटों में तरह-तरह के फूल सजाए जाते हैं और यह कार्य बालिकाओं एवे बालको द्वारा किया जाता है। फिर वे फूलों से सजी हुई डाल को ले कर जुलूस के रूप में गांव में घूमते हैं और गाते हैं-‘‘झमक चली मोरी मामुलिया’’। जी हां, समूचे बुंदेलखंड में मनाए जाने वाले इस बाल त्योहार को कहीं मामुलिया कहते हैं तो कहीं माहुलिया। माहुलिया का यही साझापन पिरोया है बिहारी सागर ने अपने इस नवीनतम गीत संग्रह में। इस संग्रह में 55 गीत बिहारी सागर के हैं तथा शेष 56 से 127 तक स्व. बालमुकुन्द नक्श की रचनाएं हैं।
“गीतऋषि” के रूप में ख्याति प्राप्त डॉ. श्याम मनोहर सीरोठिया ने संग्रह की भूमिका में लिखा है कि “इस संग्रह में संकलित स्व. बालमुकुंद नक्श के कुछ गीतों के केसिट सुप्रसिद्ध गायकों की आवाज में संगीत कंपनियों द्वारा भी बनाए गए हैं जो बुंदेलखंड में शादी-विवाह या अन्य जुलूसों में होने नृत्यों में अक्सर बजाए जाते हैं, जैसे- ‘केंन लगे मो सें बब्बा /कहाँ गव चिलम तमाखू को डब्बा’ -ऐसा ही एक गीत और जो बेदद लोकप्रिय एवं प्रचलित है। ‘बंसी में फस गई बाम, बरौनी घरे चलो’ - प्रचलित हैं। इसके अतिरिक्त इस काव्य संग्रह के अनेक गीत बुंदेलखंड क्षेत्र में कवि बिहारी श्सागरश् एवं स्व. बालमुकुंद श्नक्श ने करमा, स्वांग, ढिमरयाई, दादरा, सोहरे, रसिया आदि अनेक प्रकार के लोक गीत लिखे हैं, ये गीत भाव पूर्ण, सरल भाषा में रचित हैं जो समाज में सहज स्वीकार्य हैं, इनका अर्थबोध प्रभावी है। कवि बिहारी श्सागर का यह दसवाँ काव्य संग्रह है जो उनकी सतत रचनाधर्मिता का परिचायक है।”    
   उपन्यासकार, समीक्षक एवं स्तंभ लेखक आर के तिवारी ने लिखा है कि “मैं समझता हूँ आज 10 पुस्तकें प्रकाशन कराना छोटी बात नहीं है। जिसमें परिश्रम भी लगता है और पैसा भी खर्च होता है! यह बहुत बड़ी बात है। जब आज हमारे समाज में पैसे के लिए भाई-भाई में द्वेष पैदा हो जातें हैं भाई-भाई का बैरी हो जाता है तो वहीं बिहारी सागर ने अपने स्वर्गीय भाई के लिए अपने दिल की गहराइयों में बसाये रखा है! जिसका ही उदाहरण यह पुस्तक है जिसमें आपने अपने भाई की रचनाएं भी इसमें प्रकाशित कराई हैं। जिसके लिए आप बहुत-बहुत बधाई के पात्र हैं।” संग्रह में लोकगीत गायिका श्रीमती मालती सेन का शुभकामना संदेश भी है। 
कवि बिहारी सागर ने बड़ी ही विनम्रता से इस बात को स्वीकार किया है कि उन्होंने ‘बुंदेली शब्दों को गूंथने का प्रयास’ किया है वे लिखते हैं- “मैंने अपनी रचनाओं में बुंदेली शब्द गूंथने का प्रयास किया है। मेरी रचनाओं में त्रुटियां हो सकती हैं। फिर भी मैं अपना प्रयास जारी रखता हूं।”
     जीवन में लगन और अभ्यास यह दोनों महत्वपूर्ण तत्व है जो मनुष्य के कर्म में निरंतर निखार लाते हैं। कवि बिहारी सागर भी निरंतर रचनाशील हैं। कला पक्ष की अपेक्षा उनका भाव पक्ष सशक्त है। बिहार सागर के भजन की ये पंक्तियां देखिए जो ‘भगत’ के रूप में मां जगदंबा के लिए लिखी गईं हैं- 
टेक- जगदंबा विराजीं मोरे आंगना हो मां।
(1) कहां से ल्याऊं मैया, बेला चमेली, 
कहां से ल्याऊं रंग चुलना। जगदंबा विराजीं मोरे...
(2) बगिया से ल्याऊं मैया बेला चमेली, 
हाट से ल्याऊं रंग चुलना। जगदंबा विराजीं मोरे...
बुंदेलखंड में कार्तिक गीत गाने का विशेष चलन है। कार्तिक मास आते ही स्त्रियां कातकिया गाते हुए स्नान करने मुंहअंधेरे निकल पड़ती हैं। इसी कातकिया के तर्ज पर बिहार सागर ने यह गीत लिखा है जिसकी धुन उन्होंने कन्हैया भजन की बताई है-
टेक- कर दो दया की नजरिया, कन्हैया मोरे...
मैं दुखियारी शरण तुम्हारी, 
1-ले लो मोरी खबरिया, कन्हैया मोरे...
2-बड़े-बड़े बैठे बलधारी, हस्तनापुर की नगरिया, कन्हैया मोरे...
बिहारी सागर ने ढिमरयाई गीत भी लिखे हैं जैसे एक बानगी देखिए -
टेक- बंशी बाजी दुफरिया में, राधा जी की नगरिया में।
1. धुन गूंजत है कानों में जिनकी, 
भूले काम दुफरिया में 
राधा जी की...
2. ग्वाल बाल जे दौड़त आ रे, दौड़त बीच डगरिया में 
राधा जी की...
जिस प्रकार बिहारी सागर ने होली गीत, दिवाली गीत, सोहर, विदाई गीत, देवी गीत, हास्य गीत आदि विविध प्रकार के गीत लिखे हैं ठीक उसी प्रकार उनके भाई स्वर्गीय बालमुकुंद “नक्श” के गीतों में भी पर्याप्त विविधता है। उनके होली गीत के कुछ पंक्तियां देखिए -
टेक- रंग डारी सांवरिया ने रंग डारी । 
मोरी भींज गई चूनर सारी ।।
1. होली के दिन होली खेलें संवरिया,
भर भर मारें पिचकारी 
रंग डारी सांवरिया ने...
2.रंग-बिरंगी है मोरी चुनरिया, 
कर डारी कारी-कारी
रंग डारी सांवरिया ने...
कवि स्व. “नक्श” ने कई सोहर गीत लिखे हैं जिनमें से एक गीत की कुछ पंक्तियां देखिए जिनमें भावनाओं की कोमलता अत्यंत प्रभावी है-
टेक- झुलाय दैयो रे, लाल झूले अंगनवा।
1.चंदन के पलना हों रेशम की डोरी, 
डराय दैयो रे लाल...।
2. चंदा के गोटा हों तारों के झूमर, 
लगाय दैयो रे लाल...
    कवि स्व. “नक्श” ने चुलबुले हास्य गीत भी लिखे हैं। एक उदाहरण -
टेक - ऐसी मिली घरवाली,
भैया मोखों भरी जवानी में, 
आग लगा रई पानी में।
1- रोटी पानी कछु न जानें,
निशदिन मोसे करे बहाने, 
मोरी एकऊ बात न माने, 
कर रई छेदा छानी में।
2- अपनी का कहिये हैरानी, 
खा-खा कें जा खूब मुटानी, 
मरोजात भर-भर के पानी,
चैन नहीं जिदगानी में।
      बिहार ‘सागर’ एवं स्वर्गीय श्री बालमुकुंद ‘नक्श’ के सजा संकलन “बुंदेली महुलिया” में जो बुंदेली गीत सहज गए हैं उनमें गेयता के गुण भरपूर हैं। इनके व्याकरणीय दोषों को यदि अनदेखा कर दिया जाए तो यह सभी गीत ढोल, मंजीरे और नंगड़िया पर बखूबी गए जा सकते हैं। बुंदेली बोली के प्रति कवि बिहारी सागर का रुझान प्रशंसनीय है, और उतनी ही प्रशंसनीय है उनकी रचना कर्म के प्रति लगन। रचनाशीलता के लिए स्थानीय स्तर पर उन्हें कई सम्मानों से सम्मानित भी किया जा चुका है। लोक धुन पर आधारित गीतों में रुचि रखने वालों के लिए यह संग्रह रुचिकर साबित होगा।   
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Tuesday, February 17, 2026

पुस्तक समीक्षा | कहन के नए सलीकों की ग़ज़लें हैं “लम्हों की तपिश” में | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
कहन के नए सलीकों की ग़ज़लें हैं “लम्हों की तपिश” में
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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ग़ज़ल संग्रह- लम्हों की तपिश
कवि - अमन मुसाफ़िर
प्रकाशक - नीरज बुक सेन्टर 109-ए, पटपड़गंज गाँव, दिल्ली-110091
मूल्य - 250/-
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20 जुलाई 1999 को उत्तर प्रदेश की बरेली के बहरोली में जन्मे मात्र 27 वर्ष के अमन कुमार उर्फ़ अमन मुसाफ़िर की ग़ज़लों में जो गहराई और नयापन है वह उन्हें ग़ज़लकारों की आम पंक्ति से अलग खड़ा करता है।
अमन मुसाफ़िर ने बी. एससी. (ऑनर्स) भौतिकी (किरोड़ीमल कॉलेज, दिल्ली विश्व विद्यालय) से, एम.ए. हिन्दी (इग्नू), डिप्लोमा इन ट्रांसलेशन (अंग्रेजी-हिंदी), एकल विषय (संस्कृत) में द्विवर्षीय प्रमाणपत्र हासिल किया है। नेट-जेआरएफ (हिन्दी) उत्तीर्ण पीएचडी (हिन्दी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय) से।
    उनका एक ग़ज़ल संग्रह 'हवा में आग' इसके पूर्व प्रकाशित हो चुका है। राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में अनेक शोध-पत्र प्रकाशित हुए हैं।
   अमन मुसाफ़िर अपनी अभिव्यक्ति को लेकर पूर्णतया आश्वस्त हैं। जब कोई शहर अपनी शायरी को लेकर स्वयं पर भरोसा करता है तो उसकी शायरी अधिक मुखर और संवादी साबित होती है।  “अपनी बात” में वे अपने  इस नए ग़ज़ल संग्रह की ग़ज़लों के बारे में लिखते हैं कि “शायरी जब महफ़िलों की वाहवाही से निकलकर सड़क के सन्नाटों और रसोइयों के धुएँ तक पहुँचती है तब वह सिर्फ़ 'शायरी' नहीं रहती, वह समय का 'दस्तावेज़' बन जाती है। 'हवा में आग' के बाद मेरे दूसरे ग़ज़ल-संग्रह 'लम्हों की तपिश' को पाठकों के हाथों में सौंपते हुए मुझे कुछ वैसी ही अनुभूति हो रही है जैसे कोई अपने 'जले हुए पलों' की राख और 'सुलगते हुए ख़्वाबों' की चिंगारी किसी अपने के हवाले कर रहा हो।
इस संग्रह का नाम 'लम्हों की तपिश' अनायास नहीं है। जीवन साल या महीनों में नहीं बल्कि उन गिने-चुने लम्हों में जिया जाता है जो हमारे ज़हन पर अपनी छाप छोड़ जाते हैं। कभी वह छाप प्रेम के किसी बेहद नाजुक पल की 'गुनगुनी तपिश' होती है तो कभी व्यवस्था के ख़िलाफ़ उपजे आक्रोश की 'झुलसा देने वाली आँच'। यह किताब इन्हीं दोनों छोरों के बीच तनी हुई एक रस्सी है जिस पर एक शायर नंगे पाँव चल रहा है।”
     अर्थात शायर को फता है कि वह क्या लिख रहा है और क्यों लिख रहा है। अपनी अभिव्यक्ति को लेकर उसके मन में किसी तरह का भी संशय नहीं है।
     अमन मुसाफ़िर ने यह भी लिखा है कि “मैंने कोशिश की है कि मेरी ग़ज़लें झूठी तसल्लियों का झुनझुना न बनें। इसीलिए जहाँ एक ओर मैंने लिखा है कि "पत्थर को मत पूजो अब, पत्थर को औज़ार करो", वहीं दूसरी ओर मैंने उस मानवीय पीड़ा को भी जगह दी है जहाँ इंसान "भीड़ में चलकर भी तन्हा" रह जाता है। यह संग्रह उस आदमी की आवाज़ है जो प्रेम में टूटकर भी जुड़ना जानता है और जो सिस्टम से टूटकर भी लड़ना जानता है।”
      'लम्हों की तपिश' में कुल 110 ग़ज़लें हैं। इन ग़ज़लों में आमजीवन से उठाए गए बिम्ब हैं जो चौंकाते हैं गुदगुदाते हैं और मन के साथ-साथ विचारों को भी आंदोलित कर देते हैं। इसका उदाहरण संग्रह की पहली गजल में ही देखिए की किस खूबी से शायर पेड़, पौधे, फूल और पंछी की बात करते-करते दाल, चावल, साग रोटी तक जा पहुंचता है-
पेड़ पौधे फूल पंछी पत्तियों की बात कर
दाल चावल साग रोटी सब्ज़ियों की बात कर

आदमी की भूख ने बर्बाद कितने कर दिए
जंगलों को खा गयीं हैं कुर्सियों की बात कर

अब पुनः बरसात में बह जाएगी यह झोपड़ी
गर्मियाँ तो काट लेंगे सर्दियों की बात कर

धीरे-धीरे आग नफ़रत की जला देगी इन्हें
हस्तियाँ आधार इसका पीढ़ियों की बात कर
    अमन मुसाफ़िर अपनी ग़ज़लों में उस हुनर के साथ खेलते हैं जिसमें कहां जाता है कि एक ग़ज़ल का हर शेर अपने आप में मुक़म्मल होता है और दूसरा शेर बिल्कुल ही अलग मिजाज़ का हो सकता है। उदाहरण के लिए एक गजल के यह कुछ शेर देखिए-
जब सबने लगाया ही था आवास में बिस्तर
हिस्से में मेरे आया है फिर घास में बिस्तर

तकिया भी लिपट रो रहा दर्दों में हो शामिल
आकर ये सिमट बैठा मेरे पास में बिस्तर

बिस्तर को बताया कि वो आयेंगे दोबारा
शरमा रहा इस प्यार के एहसास में बिस्तर
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अमन मुसाफ़िर किसी एक बिंदु पर नहीं टिकते हैं। उनकी दृष्टि का संसार विस्तृत है। वे अंतर्मन से बाहिर्संसार तक निरंतर अवलोकन करते हैं और फिर ग़ज़ल कहते हैं। तीखी चोट करने वाली यह उनकी ग़ज़ल, इसके कुछ  शेर देखिए-
दिन में फ़सलें रात को भूख उगाता है
सब कहते वह भारत-भाग्य विधाता है

उसके चेहरे की ख़ामोशी है रोती जब मज़दूरी करके वापस आता है

'धनिया' दिन भर बैठी रहती है भूखी
'होरी' अपनों से ही धोखा खाता है
       नए छत के बिंबो को चुना और उन्हें अपनी गजलों में पिरोना अमन मुसाफिर के लिए मनु बहुत सहज कार्य है वह इतनी सहजता से नूतन बिंदुओं का प्रयोग करते हैं कि उन्हें पढ़कर यही लगता है कि इससे बढ़कर सटीक और कोई बम हो ही नहीं सकता था जैसे अपनी एक ग़ज़ल में उन्होंने “यादों का राशन” का बड़ी खूबसूरती से प्रयोग किया है। इसी गजल में “प्रमोशन” शब्द का भी बेहतरीन प्रयोग है -
मूर्छित एक ख़्वाब जीवन चाहता है
आपकी साँसों की धड़कन चाहता है

भूख से रोता हुआ मेरा हृदय ये
आपकी यादों का राशन चाहता है

तन को दफ़्तर में रखो मंजूर लेकिन
मन हमारा अब प्रमोशन चाहता है
    इस डिजिटल युग में सबसे बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है सोशल मीडिया में युवाओं का डूबे रहना। सोशल मीडिया में उलझे युवाओं के जीवन का दिलचस्प विश्लेषण किया है अमन मुसाफ़िर ने अपनी इस ग़ज़ल में-
वो गिन रहा कमेंट बचा ये ही काम है
डिजिटल सदी का एक यही तो पयाम है

प्रोफ़ाइलों में साथ दिलों में नहीं हैं साथ
एक दूसरे के प्यार का कोई न दाम है

स्क्रीन पर ही कटते हुए जाए जिंदगी
मिलती नहीं है फुर्सतें कैसी ये शाम है

मत खोज प्यार के ख़तों को रोज़-रोज़ तू
इनबॉक्स में जो आ गया वो ही इनाम है
      सच का साथ देना शायर को ज़रूरी लगता है। बल्कि वे पूरी निडरता के साथ अपनी अभिव्यक्ति के पक्ष में खड़े होते हैं, ठीक शायर अदम गोंडवी की तरह -
बात कड़वी है मगर स्वीकार है
ये ग़ज़ल मेरी नया हथियार है

सिर्फ लफ़्ज़ों का नहीं यह खेल अब
शेर में देखो 'अदम' की धार है।

देश को मिल कर यहाँ सब लूटते
चोर ही अब देश की सरकार है।

झूठ को ही सच बताता है सदा
बिक चुका पूरा यहाँ अखबार है।

आदमी की अब नहीं क़ीमत बची
हर तरफ़ बस झूठ का व्यापार है।
     दरअसल, कहन के नए सलीकों की ग़ज़लें हैं “लम्हों की तपिश” में। इस संग्रह की ग़ज़लें युवा शायर अमन मुसाफ़िर को साहित्य की दुनिया में विशेष स्थान दिलाने की पूरी संभावना व्यक्त करती हैं। संग्रह की ग़ज़लें अक्षरशः पठनीय हैं तथा चिंतन मनन के योग्य हैं।
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Tuesday, February 10, 2026

पुस्तक समीक्षा | व्यक्ति का व्यक्तित्व ही उसकी जन-स्मृतियां रचता है | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा | व्यक्ति का व्यक्तित्व ही उसकी जन-स्मृतियां रचता है | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरणपुस्तक समीक्षा

व्यक्ति का व्यक्तित्व ही उसकी जन-स्मृतियां रचता है

- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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स्मारिका  - महेन्द्र फुसकेले स्मरण अंक
संपादक   - मुकेश तिवारी
प्रकाशक  - प्रगतिशील लेखक संघ सागर इकाई
मूल्य - उल्लेख नहीं।
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यदि स्व. महेंद्र फुसकेले जी के व्यक्तित्व की व्याख्या की जाए तो भगवद्गीता (12.13-14) का यह श्लोक सटीक बैठता है कि-
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च,
निर्ममो निरहंकारः समदुखसुखः क्षमी।। 
- अर्थात जो सभी प्राणियों से द्वेष नहीं करता, दयालु है, अहंकार रहित है और सुख-दुख में समान रहता है, वही वास्तव में सुसंस्कृत है। महेंद्र फुसकेले जी में सकल मानवता के प्रति दया, ममता, करुणा, धैर्य आदि सभी गुण थे। इस पर भी सबसे बड़ा गुण उनमें था सत्य की पक्षधरता का। प्रोफेशन से वे अधिवक्ता थे। श्रमिकों के प्रबल समर्थक थे तथा स्त्रियों के अधिकार एवं स्वतंत्रता के मुखर हिमायती थे। ऐसे ही व्यक्तित्व पर केन्द्रित स्मारिका का कोई औचित्य होता है।
महेंद्र फुसकेले जी के निधन (1फरवरी 2021) के उपरांत से प्रगतिशील लेखक संघ के सौजन्य से प्रतिवर्ष एक स्मारिका का प्रकाशन किया जा रहा है। महेन्द्र फुसकेले जी का व्यक्तित्व बहुमुखी प्रतिभा का धनी रहा। उन्होंने उपन्यास के माध्यम से स्त्री जीवन को जितनी सूक्ष्मता से सामने रखा, उतनी ही बारीकी से कविताओं के द्वारा स्त्री की दशा को अभिव्यक्ति दी। ‘‘आचरण’’ के इसी काॅलम के अंतर्गत स्व. डाॅ. वर्षा सिंह ने लिखा था कि ‘‘हर दौर में मानवीय सरोकारों में स्त्री की पीड़ा प्रत्येक साहित्यकार संवेदनशीलता एवं सृजन का केन्द्र रही है। सन् 1934 को जन्मे, सकल मानवता के प्रति चिंतनशील साहित्यकार एवं उपन्यासकार महेन्द्र फुसकेले ने जब कविताओं का सृजन किया तो उन कविताओं में अपनी संपूर्णता के साथ स्त्री की उपस्थिति स्वाभाविक थी। ‘तेंदू के पत्ता में देवता’, ‘मैं तो ऊंसई अतर में भींजी’, ‘कच्ची ईंट बाबुल देरी न दइओ’ नामक अपने उपन्यासों में स्त्री पक्ष को जिस गम्भीरता से प्रस्तुत किया है, वही गम्भीरता उनकी कविताओं में भी दृष्टिगत होती है। कविता संग्रह ‘स्त्री तेरे हजार नाम ठहरे’ उनके काव्यात्मक स्त्री विमर्श का एक महत्वपूर्ण पक्ष उजागर करता है। ऐसा प्रतीत होता है मानो उपन्यासकार फुसकेले स्त्री की पीड़ा, संघर्ष और महत्ता को भावात्मक रूप से व्यक्त करने के लिए कविता का मार्ग चुनते हैं। .... महेन्द्र फुसकेले की कविताओं में स्त्री पर विमर्श नारा बन कर नहीं अपितु सहज प्रवाह बन कर बहता है। उनकी कविताओं में स्त्री चिंतन बहुत ही व्यावहारिक और सुंदर ढ़ंग से प्रकट हुआ है।’’
इस वर्ष की स्मारिका और अधिक विशिष्ट है क्योंकि इसमें महेंद्र फुसकेले जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व के साथ ही वरिष्ठ साहित्यकार नामवर सिंह और श्री लाल शुक्ल की जन्म शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में उनका भी स्मरण किया गया है तथा प्रेमचंद एवं कबीर के साहित्य पर भी लेख सहेजे गए हैं। कबीर वे कवि थे जिनके सामाजिक सरोकार अत्यंत विस्तृत थे। उनकी साखियां आज भी बेजोड़ हैं। साथ ही, उनकी ललकार की क्षमता का आज भी कोई सानी नहीं है। जहां तक प्रेमचंद का प्रश्न है तो वे हिन्दी साहित्य के वे बिन्दु थे जहां से हिन्दी कथा साहित्य ने सच्चे अर्थ में आधुनिक कथानक में प्रवेश किया तथा उस तबके से नाता जोड़ा जिसकी ओर साहित्यकारों की कलम का ध्यान कम ही जाता था।
श्रीलाल शुक्ल की पहचान उनकी स्पष्टवादिता से रही। उन्हें कालजयी बनाया उनकी रचना ‘‘राग दरबारी’’ ने। ‘‘राग दरबारी’’ हिंदी साहित्य की एक अत्यंत प्रसिद्ध व्यंग्यात्मक रचना है, जिसे श्रीलाल शुक्ल ने 1968 में लिखा था। यह उपन्यास भारत के ग्रामीण और अर्द्धदृशहरी जीवन की राजनीतिक, सामाजिक और नैतिक गिरावट का आईना है। इसकी भाषा सहज, प्रवाहमयी और तीखे व्यंग्य से परिपूर्ण है। वहीं, नामवर सिंह हिंदी साहित्यिक आलोचना के प्रकाश स्तंभ माने जाते हैं। वह प्रगतिवादी आलोचक होने के साथ-साथ नए आलोचकों में भी अपना अग्रणी स्थान रखते हैं। उन्होंने आधुनिक हिंदी साहित्य में आलोचना, संपादन, शोध, व्याख्यान और अनुवाद के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इसी कारण उन्हें हिंदी साहित्य में आलोचना के ‘रचना पुरुष’ के नाम से भी जाना जाता है। हिंदी साहित्य और आलोचना को समृद्ध करने वाले नामवर सिंह को उनकी पुस्तक ‘कविता के नए प्रतिमान’ के लिए वर्ष 1971 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया था।
चाहे कबीर या प्रेमचंद हों, नामवर सिंह या श्रीलाल शुक्ल हों या फिर महेंद्र फुसकेले जी हों, इनका स्मरण इनके गम और कृतित्व के आधार पर ही किया जाता है, वस्तुतः व्यक्ति का व्यक्तित्व ही उसकी स्मृतियां रचता है तथा उसे कालजयी बनता है। जब व्यक्ति निज की चिंता को हाशिए पर रखकर सकल मानवता तथा विशेष रूप से उन लोगों के बारे में मनन चिंतन करता है जिन्हें समाज ने ही गौण बना दिया है तथा उनकी सदा उपेक्षा की है, तब चिंतन करने वाला व्यक्ति का व्यक्तित्व स्वतः विस्तार लेने लगता है। प्रगतिशील लेखक संघ सागर इकाई की इस स्मारिका में प्रस्तुत गद्य एवं पद्य सामग्री को पढ़कर इस तथ्य का प्रमाण हासिल किया जा सकता है। स्मारिका में महेंद्र फुसकेले जी पर पंद्रह लेख हैं- एडवोकेट के.के. सिलाकारी ने फुसकेले जीक्ष के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए लिखा है “सागर के महान व्यक्तित्व श्री महेन्द्र फुसकेले”, गांधीवादी चिंतक रघु ठाकुर का लेख है  “मार्क्सवाद के प्रति सारा जीवन प्रतिबद्ध रहे कामरेड”, एडवोकेट अरविंद श्रीवास्तव ने लिखा है “कामरेड फुसकेले राजनैतिक घटनाक्रम से”। इनके साथ ही एडवोकेट ओमप्रकाश श्रीवास्तव ने “श्रद्धांजलि: एक कम्युनिस्ट योद्धा”, वीरेंद्र प्रधान ने “नव लेखकों के प्रेरणास्रोत महेंद्र फुसकेले”, डॉ. मनोज श्रीवास्तव ने “स्मृतियां जो धरोहर हैं”, प्रो. एन.के. जैन ने “संघर्षशील व्यक्तित्व के धनी-फुसकेले जी”, एडवोकेट राजेश पाण्डेय ने “सत्यता के प्रतीक श्री महेंद्र फुसकेले जी” संजय गुप्ता ने “यादगार पल”, डॉ. बहादुर सिंह परमार ने “फुसकेले जी थे सर्वहारा वर्ग के मसीहा”, शैलेंद्र शैली ने “हमारे आदर्श और प्रेरक कॉमरेड”, डॉ राजेंद्र पटोरिया ने “सिद्धान्तवादी श्री महेन्द्र फुसकेले जी”, कामरेड चंद्रकुमार ने “स्मृति दिवस”, देवेंद्र सिंघई ने “बहुमुखी प्रतिभा संपन्न श्री फुसकेले जी” तथा अजित कुमार जैन ने “कॉमरेड महेन्द्र कुमार फुसकेले” अपने लेख के रूप में महेंद्र फुसकेले जी का स्मरण किया है।
नामवर सिंह के व्यक्तित्व और कृतित्व का स्मरण करते हुए जो लेख स्मारिका में प्रकाशित किए गए हैं वे हैं - “नामवरसिंह: एक साथी, एक आलोचक”(नमृता फुसकेले), “नामवर जी को मैंने देखा है” (टीकाराम त्रिपाठी)। श्रीलाल शुक्ल जी पर केन्द्रित लेख है डॉ. नमृता फुसकेले का “श्रीलाल शुक्ल जन्म शताब्दी स्मरण”।
कबीर पर लेख हैं - “मोकूँ रोए सोई जन, जो सबद विवेकी होए” (कैलाश तिवारी ‘विकल’), “कबीर के कथित स्त्री-विरोधी दोहों का सच” (डॉ सुश्री शरद सिंह), “कबीर और वर्तमान में उनकी बढ़ती प्रासंगिकता” (सतीशचंद्र पाण्डे), “क्रान्तिकारी कवि कबीर” (टीकाराम त्रिपाठी), “कबीर का दर्शन” (पेट्रिस फुसकेले)  तथा “कबीर और किसान” (कैलाश तिवारी ‘विकल’) तथा  कबीर: एक दृष्टि निक्षेप (पी.आर. मलैया)।
प्रेमचंद पर लेख इस प्रकार हैं- “प्रेमचंद की दृष्टि में प्रेम वाया - प्रेम की वेदी’’ (डॉ सुश्री शरद सिंह), “प्रेमचंद के साहित्य में मानव प्रेम एवं राष्ट्रधर्म” (डॉ. महेंद्र खरे), “प्रेमचंद वर्तमान परिदृश्य और साहित्य में प्रासंगिक है” (एडवोकेट पेट्रिस फुसकेले), “प्रेमचंद कल आज और कल”(कैलाश तिवारी ‘विकल’)।
इन सामग्रियों के अतिरिक्त दोहे, गजल, संस्मरण, कहानी, चौकड़िया, गीत, अठवाई आदि अन्य गद्य-पद्य रचनाएं समाहित हैं।
महेंद्र फुसकेले जी की जयंती पर प्रकाशित इस स्मारिका की विशेषता यह है कि इसका प्रकाशन व्यय मुख्य रूप से  फुसकेले परिवार तथा प्रगतिशील लेखक संघ की सागर इकाई के कुछ सदस्य मिलकर वहन करते हैं। स्मारिका का मुद्रण निमिष आर्ट एंड पब्लिकेशन ने किया है जो कि नयनाभिराम है। कव्हर के अंतिम भीतरी पृष्ठ पर प्रगति लेखक संघ की सागर इकाई की गतिविधियों की तस्वीरें प्रकाशित की गई हैं। कलेवर की दृष्टि से यह स्मारिका प्रकाशित कर प्रगतिशील लेखक संघ की सागर इकाई ने एक नया प्रतिमान गढ़ा है तथा एक पठनीय एवं संग्रहणीय स्मारिका प्रकाशित की है।
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Tuesday, February 3, 2026

पुस्तक समीक्षा | बोलियों के बहनापे को सुदृढ़ करने वाला अव्यावसायिक त्रैमासिक "बघेली अंजोर" | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा
बोलियों के बहनापे को सुदृढ़ करने वाला अव्यावसायिक त्रैमासिक "बघेली अंजोर"
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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त्रैमासिक (अव्यवसायिक)- बघेली अंजोर
संपादक - डॉ राम गरीब पाण्डेय ‘विकल’
प्रकाशक  - बोली विकास मंच, गीतायन, प्लाट नं. 685/19, वाटर फिल्टर प्लांट के सामने, तुलसीनगर नौढ़िया, सीधी (म.प्र.) - 486661
मूल्य - 60/- (वार्षिक रु.280/-)
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‘‘बघेली अंजोर’’ बघेली एवं समीपवर्ती बोलियों के साहित्य-संस्कृति की पूर्णतः अव्यावसायिक त्रैमासिक पत्रिका जिसके प्रधान सम्पादक हैं डॉ. राम गरीब पाण्डेय श्विकलश्।  उप सम्पादक गीता शुक्ला श्गीतश् तथा सह सम्पादक रामलाल मिश्र, शिवी शुक्ला हैं। बोलियों के विकास के लिए प्रतिबद्ध या पत्रिका प्रमुख पांच बोलियां को साथ लेकर चल रही है - बघेली, अवधी, बुन्देली, छत्तीसगढ़ी एवं भोजपुरी। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि सीधी जिले के महत्वाकांक्षी विद्वान डॉ. राम गरीब पाण्डेय श्विकल’ इस पत्रिका को एक मिशन की तरह आरंभ कर चुके हैं। समीक्ष्य अंक “बघेली अंजोर” का तीसरा अंक है। आज के डिजिटल युग में जब किसी भी प्रकार की पत्रिका प्रकाशित करना एक चुनौती भरा काम है ऐसे कठिन दौर में बोलियो के लिए समर्पित त्रैमासिक प्रकाशित करने का बीड़ा उठाना अपने आप में प्रशंसनीय कार्य है।

      विभिन्न बोलियां के लिए जो संपादन सहयोग दे रहे हैं वे हैं- बघेली में भृगुनाथ पाण्डेय श्भ्रमरश् (रीवा), अवधी में राम प्रसाद शुक्ल (प्रयागराज), भोजपुरी में प्रकाश उदय (वाराणसी), बुन्देली में डॉ. सरोज गुप्ता (सागर) तथा छत्तीसगढ़ी में डॉ. विनोद कुमार वर्मा (बिलासपुर)।
भारत में भाषाई विविधता पर भारी संकट मंडरा रहा है, एक रिपोर्ट के अनुसार लगभग 780 भाषाओं में से 400 के करीब भाषाएँ विलुप्त होने की कगार पर हैं। वैश्वीकरण, शहरीकरण और रोजगार के लिए अंग्रेजी भाषाओं के दबाव के कारण मातृभाषाएं दम तोड़ रही हैं, जिससे सांस्कृतिक और भावनात्मक धरोहर नष्ट हो रही है। भाषा विज्ञानयों के अनुमान के अनुसार अरुणाचल प्रदेश और असम में लगभग 60 जनजातीय भाषाएं 2050 तक खत्म हो सकती हैं। नई पीढ़ी पारंपरिक भाषाओं की जगह प्रमुख भाषाएँ सीख रही है, जिससे भाषा का हस्तांतरण थमता जा रहा है। बोलियों के साथ-साथ मुहावरे, लोकगीत और पारंपरिक ज्ञान भी लुप्त हो रहे हैं। ऐसी स्थिति में बोलियां को बचाना उन्हें संरक्षित एवं संबंधित करना अत्यंत आवश्यक है इस दिशा में “बघेली अंजोर” अपना दायित्व निभाती दिखाई दे रही है।
यहां प्रश्न यह भी उठना है कि अपनी भाषा या अपनी बोली को प्रमुखता दिलाने के लिए किसी तरह की हठधर्मिता या हिंसा का प्रदर्शन किया जाना क्या उचित है? जैसा कि विगत कुछ ऐसे में महाराष्ट्र में कई बार देखा गया है। ”भाषा परिवार” शब्द इसीलिए प्रयुक्त होता है कि अनेक भाषाएं एक साथ सम्मान पूर्वक उपस्थित रहें, विकास करें जैसे मानव परिवार में सभी सदस्य मिलकर रहते हैं और जब सभी मिलकर रहते हैं तभी परिवार समृद्धि शैली हो पता है और सभी सदस्यों का समुचित विकास हो पता है ठीक यही स्थिति भाषाओं और बोलियों की है ।

        डॉ. राम गरीब पाण्डेय ‘विकल’ ने अपने संपादकीय में ‘‘कहब जरूरी है - मामकाः पाण्डवाश्चैव’’ शीर्षक से बघेली में बहुत सही लिखा है कि- “बोली-भाखा क लै के, अबै कुछ समय पहिले महारास्ट्र म बहुत बड़ा हंगामा होइ ग रहा। बिल्लाधारी बहुत दिनन से जड़ान बइठ रहें। बाताबरन म गरमी ले आबै के खातिर, उँ मराठी के समरथन म अइसन दहेंचाल मचाइन, के सगले देस म, सगली दुनिया म धू-धू होय लागि। उँ लिनकर विरोध किहिन, जिनका मारिन-पीटिन, जिनका महारास्ट्र से निकारै के एजेंडा चलाइन, इया बिसरि गें, के महारास्ट्र (बम्बई) के विकास के पहिया खींचे म इनहिन के हाँथ है। इहै मेर कुछ अति उत्साही बिल्लाधारी आपन नाव लिखावै, छपावै के खातिर कहीं न कहीं इया मेर के कसरत करत मिलिन जात है। इया देस म बाइस भासा बोली जाती है। उनहुन के सबके अलग-अलग अनेकन बोली-लोकभासा हई। इया बाति पर बहुत गम्भीरता से सोवै के जरूरति है, के हर बोली-भाखा एक दुसरे क साथ ले के जब चलति है, तब उआ भारत देस के भासा बनति है। कुछ खुराफाती बिल्लाधारी अठमीं अनुसूची के छुरघुरी छाँड़ि के आगी लगाबै के कोसिस लगातार करत रहत हैं औ बिल्ला के मोह म, कुछ जने इया घुरछुरी से बिना सोचे-समझे अपनेन घरे म आगी लगाबै खातिर तयार मिलि जात हैं। उनहीं इया बाति के सुधि नहीं रहै, के सब क साथ ले के चलब, हमरे संस्कृति के पहिचान आय। ष्सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत।। (वृहदारण्यक और तैत्तिरीय उपनिषद) हमरे देस के, हमरे संस्कृति केर सूत्र बाक्य आय।”
जनवरी-मार्च 2026 के इस अंक में जो आलेख दिए गए हैं, वे हैं- भाईलाल शर्मा का “बघेली गद्य-साहित्यरू दशा और दिशा”,   डॉ. शंकर लाल शर्मा का “ब्रज की होलीः विविध रूप-रंग”, डॉ. बिहारीलाल साहू “छत्तीसगढ़ की जनभाषा”, प्रिंस कुमार सेन का आलेख “सभ्यता की विकास-यात्राः नदियों से सड़कों तक”।

      विविध बोलियां में कहानी के अंतर्गत शिवपाल तिवारी की बघेली कहानी “अकरथी”, डॉ. रश्मिशील शुक्ला की अवधी कहानी “मन के जीते जीत”, वन्दना अवस्थी दुबे की बुंदेली कहानी “बड़ी हो गयीं ममता जी”, डॉ. विनोद कुमार वर्मा की छत्तीसगढ़ी कहानी “लँगड़ा कोन”, डॉ. दिनेश पाण्डेय की भोजपुरी कहानी “बरगद लोक” है। यह सभी कहानियां अपने-अपने बोली क्षेत्र की संस्कृतियों का प्रतिनिधित्व करती हैं।
लघुकथाओं के अंतर्गत बघेली में कृष्ण मणि मिश्र की “परबचन” अवधी में भारतेन्दु मिश्र की “कनबतिया”, बुंदेली में डॉ. शरद सिंह की “लुगाइयन की आजादी”, छत्तीसगढ़ी में चोवाराम वर्मा ‘बादल’ की “तुलसी चउरा के दिया” तथा बघेली में शंकर सिंह श्दर्शनश् की लघुकथा “गरे के पट्टा” है।
     इस अंक में कहानियों और लघुकथाओं के साथ ही रामप्रसाद शुक्ल का अवधी व्यंग्य “हमार सिच्छा- प्रायमरी” तथा बलभद्र का भोजपुरी संस्मरण “जो सुमिरत सिधि होय” प्रकाशित है।
“पुरिखन के कोठार से” के अंतर्गत डॉ. विष्णुदेव तिवारी छत्तीसगढ़ी कथा “पइयाँ परत ही चन्दा-सुरुज के” दी गई है। इसके अतिरिक्त पुस्तक समीक्षा एवं पांचों बोलियों के विविध गीत भी इस अंक में समाहित हैं, जिससे यह अंक समग्रता समेटे हुए है। गीतों में परदेसी न आये - गीता शुक्ला ‘गीत’ (बघेली), दुइ बूँद आँसु - विनय विक्रम सिंह ‘मनकही’ (अवधी), आज विदा भई मुनियां की - डॉ कृष्ण कुमार नेमा ‘निर्झर’ (बुंदेली), सुरता आथे - धनराज साहू (छत्तीसगढ़ी), माथे अंचरा जोगवलीं - डॉ कमलेश राय (भोजपुरी।
ग़ज़लों में विनय मिश्र ‘प्रांजल’ (बघेली), डॉ. अशोक ‘अज्ञानी’ (अवधी), पूरनचन्द्र गुप्ता (बुन्देली), शिव ‘निश्चिन्त’ (छत्तीसगढ़ी) सुभाष पाण्डेय ‘संगीत’ (भोजपुरी) गजलें हैं।
शिव ‘निश्चिन्त’ की छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल के ये कुछ शेर देखिए-

जियत आदमी देख जिन होगे भइया।
सुमत के ये रद्दा कठिन होगे भइया।
कुँवारा हे भिंदोल अब ले बिचारा, ये मेचका के कबछिन लगिन होगे भइया।
जे टूरी के नयना मया बान छोड़िस, त टूरा के मन ह हरिन होगे भइया।

इसी तरह कुछ शेर सुभाष पाण्डेय ‘संगीत’ की भोजपुरी के -
आजु पहिले पहिल, कुछ नफा हो गइल।
नैन मिलते, दरद सब दफा हो गइल।
न सुनाई सुनाई बताईं रहीं मनगुमे, जिंदगी के, इहे फलसफा हो गइल।
जान के जान से, जान जुड़ि के रहे, आशिकी में, इहे तोहफा हो गइल।
प्रीत के आँखि पर, जबसे चश्मा चढ़ल, जे रहे बेवफा, बावफा हो गइल।
    
ये ग़ज़लें अन्य भाषाओं की ग़ज़लों से कहीं भी काम नहीं ठहरती हैं। इनमें वही संवाद और रवानी है जो हिंदी उर्दू की ग़ज़लों में रहती है।

इस प्रकार “बघेली अंजोरा” का यह अंक पांचों बोलियों - बघेली, अवधी, बुन्देली, छत्तीसगढ़ी एवं भोजपुरी की प्रतिनिधि रचनाओं का सुंदर पिटारा है, जिसमें पांचों भौगोलिक क्षेत्रों की सोंधी मिट्टी की महक समाई हुई है जिसे उनके शब्दों के द्वारा अनुभव किया जा सकता है। यूं भी क्षेत्रीय बोलियां किसी क्षेत्र विशेष की सांस्कृतिक पहचान, समृद्ध परंपराओं और लोक-संस्कृति की संवाहक होती हैं। ये न केवल आपसी संवाद को सहज और आत्मीय बनाती हैं, बल्कि स्थानीय ज्ञान, साहित्य, और इतिहास को पीढ़ियों तक संरक्षित रखती हैं। सामाजिक एकता, अस्मिता और भाषाई विविधता के लिए इनका महत्व अत्यंत व्यापक है। इस अंक में संगीत सभी रचनाएं अपनी अपनी बोलियां से न केवल परिचय कराने में सक्षम है बल्कि दूसरी बोली बोलने वाले पाठक के लिए भी एक नई बोली से जुड़ने का अवसर प्रदान करती हैं। जब एक ही ज़िल्द में विभिन्न बोलियों की रचनाएं संग्रहित रहेंगी तो स्वाभाविक है कि अपनी बोली की रचना को पढ़ने के उपरांत दूसरी बोली की रचना पर भी ध्यान जाएगा तथा उसे पढ़ने और समझने का मन स्वाभाविक रूप से करेगा। यह कोई बलात प्रयास नहीं है अपितु सहज आग्रह है, जो रचना स्वयं ही करती है।
किसी भी बोली की अपनी एक जातीय पहचान होती है। यह जातीय पहचान ही उस बोली को अन्य बोलियों से अलग कर के स्वतंत्र अस्तित्व का स्वामी बनाती है।  प्रत्येक बोली की अपनी एक भूमि होती है जिसमें वह पलती, बढ़ती और विकसित होती है। इस जातीय पहचान को बनाए रखना साझा दायित्व होता है। बोलियों के हित में  “बघेली अंजोर” का संपादन एवं प्रकाशन करने हेतु इसके प्रधान संपादक डॉ. राम गरीब पाण्डेय ‘विकल’ बधाई के पात्र हैं। इस पत्रिका को पढ़कर उनके इस प्रयास को समर्थन दिया जाना चाहिए।
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