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Tuesday, August 4, 2026

पुस्तक समीक्षा | पाठकों से गहन संवाद करती कहानियों का रोचक संग्रह | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा

पाठकों से गहन संवाद करती कहानियों का रोचक संग्रह 

समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

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कहानी संग्रह - पिछली घास

लेखिका      - दीपक शर्मा

प्रकाशक     - रश्मि प्रकाशन, महाराज पुरम, कृष्णा नगर, लखनऊ-226023 (उप्र)

मूल्य        - 200/-

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‘‘पिछली घास’’ लेखिका दीपक शर्मा की सोलह कहानियों का संग्रह है। हिन्दी कथाजगत में दीपक शर्मा एक जाना-पहचाना नाम है। 30 नवम्बर 1946 में अविभाजित भारत के लाहौर में जन्मीं दीपक भुल्लर जो विवाह के बाद दीपक शर्मा के नाम से चर्चित हुईं लखनऊ क्रिश्चियन कॉलेज के स्नातकोत्तर अंग्रेजी विभाग में लम्बे समय तक अध्यक्ष एवं रीडर के पद पर रहीं। अब तक उनके बीस से अधिक कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं।  दीपक शर्मा ने अपने कहानी लेखन की शुरुआत पंजाबी में की। सन् 1979 में इनकी पहली हिन्दी कहानी ‘‘कोलम्बस अलविदा’’ पत्रिका ‘‘धर्मयुग’’ में प्रकाशित हुई। इसके बाद दीपक शर्मा ने हिन्दी कहानी का जो दामन पकड़ा आज भी उसे मज़बूती से थामे रहीं।  

इस कहानी संग्रह में गगन गिल की संक्षिप्त तथा मधु बी. जोशी की विस्तृत भूमिका पढ़ने के बाद इसमें संग्रहीत कहानियों के प्रति जिज्ञासा का विस्फोट होना स्वाभाविक है। एक आतुरता जाग उठती है इन सोलह कहानियों की सोलह दुनियाओं से गुज़रने की। संग्रह में मौजूद सोलह कहानियों में पहली कहानी है-‘‘चमड़े का अहाता’’। यह एक मानवीय विमर्श की कहानी है। इसमें एक ऐसा अहाता है जो हमारे आस-पास उपस्थित है एक ‘अंडरवर्ल्ड’ की तरह। लेकिन यह किसी माफिया अंडरवर्ल्ड नहीं है बल्कि हमारे कथित सम्य समाज के राजमार्ग के ठीक बीचो-बीच बने सीवेज़ के मेनहोल के ठीक नीचे है। एक सुगबुगाती, बजबजाती हुई दुनिया। चमड़े के शोधन कार्य की दुर्गन्धयुक्त दुनिया। जहां जानवरों की खालें खरीदी जाती हैं और उन्हें ‘चमड़ा’ बना कर बेचा जाता है। इस दुनिया में चर्मशोधन से भी अधिक दुर्गन्ध उस अपराध की है जो कि घृणित सामाजिक अपराध है, कन्या-वध का। चर्मशोधन की रासायनिक द्रव से भरी टंकियां चमड़ा शोधने के चुनौती भरे काम की गवाही होने के साथ ही उस अपराध की भी गवाह हैं जो कभी नहीं होना चाहिए था। एक चुभता हुआ पारस्परिक संवाद ही इस अपराध को एक झटके में बेनक़ाब कर देता है -

‘‘मैं सब जानता हूं’’ भाई फिर हंसा, ‘‘मैं किसी से नहीं डरता। मैंने एक बाघिनी का दूध पिया है, किसी चमगीदड़ी का नहीं।’’

‘‘तुमने चमगीदड़ी किसे कहा?’’ सौतेली मां फिर भड़कीं।

‘‘चमगीदड़ी को चमगीदड़ी कहा है।’’ भाई ने सौतेली मां की दिशा में थूका,‘‘तुम्हारी एक नहीं दो बेटियां टंकी में फेंकी गईं, पर तुम्हारी रंगत एक बार नहीं बदली। मेरी बाघिनी मां ने जान दे दी, मगर जीते जी किसी को अपनी बेटी का गला घोंटने नहीं दिया।’’ 

दीपक शर्मा की कहानियों को पढ़ते समय हिन्दी कहानी के उस इतिहास पर भी संक्षिप्त दृष्टिपात कर लेना चाहिए जहां से हिन्दी कहानी ने नई कहानी का स्वरूप ग्रहण किया। वह नई कहानी विधा जिसकी छाप दीपक शर्मा की कहानियों में स्पष्ट दिखाई देती है। उन्नीसवीं शताब्दी के अंत और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ की कड़ी में हिन्दी भाषा के उन्नयन और गद्य-विधाओं के सूत्रपात ने जिस भाषाई जनतांत्रिक का निर्वाह करते हुए साहित्य रचना की नींव रखी, उसका स्वर आज की रचनाओं में भी सुनाई देता है। 

सन् 1954 के ‘कहानी विशेषांक’ ने नई कहानी की वैचारिक भूमि पहले ही स्थापित कर दी थी। अमरकांत की कहानी ‘डिप्टी कलक्टरी’ और कमलेश्वर की कहानी ‘राजा निरबंसिया’ लिखी जा चुकी थीं। इसी क्रम में मोहन राकेश का कहानी संग्रह ‘नए बादल’ सन् 1956 में आया। इसी दौर में निर्मल वर्मा की कहानी ‘परिंदे’ और भुवनेश्वर की कहानी ‘भेड़िये’ और उषा प्रियंवदा की कहानी ‘वापसी’ पर चर्चाएं शुरू हो चुकी थीं। इन्हीं कहानियों को नई कहानी की प्रारंभिक कहानियों में गिना जाता है। इनके अलावा ‘कहानी’ और ‘नई कहानियां’ पत्रिकाओं ने इस आंदोलन की अधिकारिक रूप से घोषित पत्रिका थी। 

नई कहानी के मूल बिन्दुओं को अपने अवचेतन में ग्रहण करते हुए दीपक शर्मा ने अपना कथा संसार रचा उसमें सच के उद्घाटन का तीव्र आग्रह दिखाई देता है। उदाहरण के लिए इसी संग्रह की दूसरी कहानी ‘‘प्रेत छाया’’ अतीत में सन् 1928 में ले जाती है जब देश में साईमन कमीशन का लागू किए जाने का जम कर विरोध हो रहा था। लोग खुली सड़कों पर भीड़ की शक़्ल में निकल कर अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर रहे थे। मगर भीड़ हमेशा अनेक चेहरे लिए होती है। ‘‘गो साईमन गो’’ की नारे लगाती भीड में एक लड़के ने अपनी जाई और बहन को खो दिया था। अब जब वह लड़का चेचक की बीमारी से ग्रस्त हो कर आईसोलेशन के दिन काट रहा होता है तो उसे महसूस होता है कि उसकी जाई उससे मिलने आई है, एक प्रेतछाया की भांति। अपनों को खोने की पीड़ा और एक उद्देश्यपूर्ण देशव्यापी विरोध के बीच की अंतर्कथा। यह कहानी अपने छोटे से आकार में बड़ी-सी कथा समेटे हुए है, गोया यह कहानी नहीं अपितु एक ‘मेमोरी चिप’ हो। 

संग्रह में एक कहानी है ‘‘मां का दमा’’। यह सूत और सूती कपड़ा डाई करने वाले कारखाने में काम करने वाली स्त्रियों में से एक मंा की कहानी है। अस्वस्थकर वातावरण में काम करती महिलाएं चौतरफा मुसीबतें झेलती हैं। बेटे की ओर से कही गई इस कहानी में बेटा बताता है कि उसकी मां को दमा हो गया था जिस पर उसके पिता मां को ‘‘घोंघी’’ कह कर पुकारते थे। मां की पीड़ा का अपमान करता सम्बोधन। जबकि इसमें भला मां का क्या दोष था? लड़के ने स्वयं अपनी आंखों से कारखाने की दशा देखी थी-‘‘मां के कारखाने में काम चालू है। गेट पर मां का पता पूछने पर मुझे बताया जाता है, वे दूसरे हॉल में मिलेंगी, जहां केवल स्त्रियां काम करती हैं। जिज्ञासावश मैं पहले हॉल में जा टपकता हूं। यह दो भागों में बंटा है। एक भाग में गट्ठों में कस कर लिपटाई गई ओटी हुई कपास मशीनों में चढ़ कर तेजी से सूत में बदल रही है, तो दूसरे भाग में बंधे सूत के गट्ठर करघों में सवार हो कर सूती कपड़ों का रूप धारण कर रहे हैं। यहां सभी कारीगर पुरुष हैं। ...दूसरे हॉल का दरवाज़ा पार करते ही क्लोरीन की तीखी बू मुझसे आन टकराती है। भाप की कई-कई ताप तरंगों के संग मेरी नाक और आंखें बहने लगती हैं। थोड़ा प्रकृतिस्थ हो कर देखता हूं, भाप एक चौकोर हौज से मेरी ओर लपक रही है। हौज में बल्लों के सहारे सूती कपड़े की अट्टियां नीचे भेजी जा रही हैं। हॉल में स्त्रियां ही स्त्रियां हैं। उन्हीं में से कुछ ने अपने चेहरों पर मास्क पहन रखे हैं, ऑपरेशन करते समय डॉक्टरों और नर्सों जैसे।’’

स्वास्थ्य के लिए ऐसे घातक वातावरण में काम करने वाली स्त्रियों की पीड़ा को उनके निकट जा कर महसूस करने के बाद लिखी गई कहानी स्त्रीविमर्श का एक अलग ककहरा रचती है। 

दीपक शर्मा की संवेदनशीलता अपनी हर कहानी की भांति इस कहानी में भी बखूबी उभर की सामने आई है। कहानी ‘‘बापवाली’’ स्त्री के प्रति होने वाले घरेलू अत्याचारों का लेखा-जोखा सामने रखती है तो कहानी ‘‘ऊंट की पीठ’’ दहेज-लोलुपता और इस कुप्रथा को सवीकार करने वाले एक आम से पिता की मन को आलोड़ित करने वाली कहानी है।

कहानी ‘‘पुरानी फांक’’ संबंधों के जटिल समीकरण की अनूठी कहानी है। इस कहानी का एक संवाद देखिए जो अपने-आप में बहुत कुछ उद्घाटित करने में सक्षम है-

‘‘तुम्हें अपने वर्तमान को अनुभवों से भर लेना चाहिए।‘‘ सुहास मेरी ओर देख कर मुस्कुराता है,‘‘चूंकि तुम्हारे पास नए अनुभवों की कमी है, इसलिए तुम आने वाले अनुभवों को मनगढ़ंतपूर्वक धरण करती हो या फिर बीत चुके अनुभवों का पुनर्धारण। तुम्हें केवल अपने वर्तमान को भरना चाहिए।’’

‘‘वर्तमान?’’ घबराकर मैं अपनी आंखें मंजू दीदी के चेहरे पर गड़ा लेती हूं। मेरा वर्तमान? खिड़की के उस तरफ का एक भीषण रणक्षेत्र? और इस तरफ एक तलाक़शुदा छब्बीस वर्षीय रईसज़ादे के साथ एक कच्चा रिश्ता? दोनों तरफ एक ठीठ अंधेरा।’’

लेखिका ने मानवीय संबंधों के ज्यामितीय समीकरणों को ‘‘माना कि’’ की कल्पना से परे हट कर यथार्थ के पैमाने से नापते हुए प्रस्तुत किया है। कहानी ‘‘पिछली घास’’ इसका एक बेहतरीन उदाहरण है। पांच संतानों वाला परिवार। जिसमें पिता की देहलोलुपता एक विध्वंस रचती है। पिता एक रिश्तेदार लड़की से बलात संबंध बनाता है जिसके परिणामस्वरूप छठीं संतान का जन्म होता है। उस लड़की और छठी संतान को पिता अपनी पत्नी और बेटी के रूप में अपना लेता है किन्तु बेटे के लिए यह सब सहज नहीं है। वह विद्रोही हो उठता है। पिता की धौंस से त्रस्त हो कर पिता को पुलिस की धमकी देता है, लिहाज़ा पिता अपनी वास्तविक पत्नी और पांचों बच्चों को छोड़ कर अपनी अवैध पत्नी और छठी संतान को ले कर फरार हो जाता है। इसके बाद वह परिवार संकटों के किस मुहाने पर जा खड़ा होता है और कैसे उनके सपनों की पर्तें उधड़ती चली जाती हैं, इसे कहानी को पढ़ कर ही अनुभव किया जा सकता है। 

संग्रह की कहानियों में लेखिका का एक काल्पनिक स्थान है-कस्बापुर। यह स्थान गांव है, कस्बा, है शहर है और यहां तक कि देश का प्रतिबिम्ब भी है। कस्बापुर एक ऐसा गह्वर है जिसमें समाज की सारी समस्याएं और विडम्बनाएं समाई हुई हैं। एक जाना-पहचाना संसार रचता है कस्बापुर, जो संग्रह की कई कहानियों में मौजूद है। दीपक शर्मा भाषाई मायाजाल नहीं रचती हैं, वे सरल, बोलचाल के शब्दों में अपनी कहानियां लिखती हैं। हिन्दी, उर्दू, अंग्रेजी, अवधी, पंजाबी के शब्द बिना किसी विशेष आग्रह के स्वाभाविक रूप से अपनी जगह लेते जाते हैं। यही उनकी कहानियों का भाषाई सौंदर्य है जो कहानियों को एक प्रवाह में पठनीय बना देता है। कुल मिला कर ‘‘पिछली घास’’ को एक मूल्यावत्तापूर्ण कहानी संग्रह कहा जा सकता है।            

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Tuesday, July 28, 2026

पुस्तक समीक्षा | बुंदेली की समृद्धि का परिचायक है समय के पन्नों में दबा ‘मंगा’ | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा 
बुंदेली की समृद्धि का परिचायक है समय के पन्नों में दबा ‘मंगा’
- समीक्षक डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
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खंडकाव्य    - मंगा (बुंदेली बोली का हास्य प्रधान प्रथम खण्ड काव्य)
लेखक      - श्री बाबू लाल खरे
प्रकाशक    - स्क्राईब पब्लिकेशन्स 303, कुबेर हाउस 162, कंचनबाग, इन्दौर (म.प्र.)
मूल्य       - 150/-
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बुंदेली में वर्षों से प्रचुर मात्रा में साहित्य लिखा जा रहा है विशेष रूप से पद्य साहित्य। किंतु बहुत सा साहित्य ऐसा रहा जो प्रकाश में नहीं आ सका। डॉ बहादुर सिंह परमार जैसे मनीषी जो बुंदेली संस्कृति और भाषा के उत्थान में निरंतर लगे हुए हैं, उन्होंने बहुत से ऐसी  पांडुलिपियां ढूंढ निकालीं जो अप्रकाशित अवस्था में साहित्यकारों के वंशजों के पास मौजूद थीं। उनके वंशज नहीं जानते थे कि उस कृति को किस तरह से प्रकाशित किया जाए अथवा कई वंशजों को इस बात की जानकारी नहीं थी कि वह साहित्य कितना महत्वपूर्ण है। इसी प्रकार बुंदेली में लिखी गई कई पुस्तक ऐसी हैं जो प्रकाशित तो हुई किंतु जिन पर पर्याप्त चर्चा होनी चाहिए थी अथवा वे पाठकों के हाथ में पहुंचनी चाहिए थी किंतु नहीं पहुंच सकीं। ऐसी ही एक पुस्तक की जानकारी मुझे पिछले दिनों प्राप्त हुई। अनायास शशी खरे जी जोकि रायपुर में निवासरत हैं और  स्वयं साहित्यकार हैं, उनसे मेरा संपर्क हुआ। चर्चा के दौरान उन्होंने मुझे बताया कि उनके पिताश्री ने बुंदेली में प्रथम हास्य खंडकाव्य लिखा था जो प्रकाशित भी हुआ। उसके कुछ अंश आकाशवाणी भोपाल से प्रसारित हुए। डॉ हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर के प्राध्यापक डॉ बलभद्र तिवारी ने अपने ग्रंथ में उसका उल्लेख भी किया। फिर भी यह खंडकाव्य उतना चर्चित नहीं हो सका कितना कि उसे होना चाहिए था। दुर्भाग्य से पुस्तक प्रकाशित होने से पूर्व उसके रचनाकार दिवंगत हो गए, किंतु सुधि परिजन ने उस खंड काव्य को सुरुचि पूर्वक प्रकाशित कराया। खंडकाव्य का नाम है “मंगा”। 
 इस खंडकाव्य की विशेष बात यह भी है कि इसमें सागर की बुंदेली बोली का प्रयोग हुआ है क्योंकि रचयिता डॉ खरे सागर जिले के निवासी थे। श्री बाबू लाल खरे का जन्म मध्यप्रदेश के सागर जिले की रहली तहसील में स्थित चरगुवां नामक एक छोटे से ग्राम में 11 नवम्बर 1917 को हुआ। पिता का नाम श्री भगवानदास तथा माता श्रीमती लक्ष्मीबाई था। धनाभाव तथा उस समय आसपास कोई उच्च शिक्षा की सुविधा वाले शिक्षालय के अभाव के कारण इन्हे ग्राम से दो मील दूर स्थित गौरझामर के मिडिल स्कूल में केवल सातवीं (हिन्दी) तक ही शिक्षा प्राप्त करने का सुयोग प्राप्त हो सका। शिक्षाकाल में ये प्रायमरी से लेकर अन्त तक अपनी कक्षा में सदा प्रथम स्थान और प्रथम श्रेणी प्राप्त करते रहे। सन् 1933 ई. में नार्मल स्कूल बिलासपुर की प्रवेश परीक्षा में सागर जिले से केवल दो छात्र चुने गए, जिनमें से एक बाबू लाल थे। प्रायमरी टीचर्स ट्रेनिंग परीक्षा में पूरे मध्यप्रदेश व बरार में प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान प्राप्त कर उन्होंने ‘‘स्पेन्स मैडल’’ प्राप्त किया। जून 1935 में थोड़े दिनों तक  मिडिल स्कूल तखतपूर (बिलासपुर) में, अगस्त 1936 से म्युनिसिपल प्राथमिक शाला देवालानाका सागर में और दिसम्बर 1936 में गवर्नमेन्ट केन्टोन्मेन्ट स्कूल नं. 1, सदर बाजार सागर में अध्यापक रहने के पश्चात् ये सन् 1948 में नार्मल स्कूल सागर के प्रेक्टिसिंग स्कूल में अधिपाठक के रूप में स्थानान्तरित हुए। सन् 1940 में पिता के स्वर्गवासी होने से एक बड़े परिवार के पालन और शिक्षण का भार इन पर आ जाने के कारण इन्हें अत्यधिक अर्थाभाव रूग्णता और चिन्ताओं से अत्यधिक कष्ट झेलना पड़े। तीन छोटे भाईयों और दो बहनों की शिक्षा तथा विवाह के उत्तरदायित्व से निवृत हो कर बाबू लाल खरे ने सन् 1949 से स्वध्यायी छात्र के रूप में विशारद तथा मैट्रिक परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। फलतः नार्मल स्कूल में अध्यापक के पद पर पदोन्नति मिली। इसके पश्चात् उन्होंने साहित्य रत्न तथा सागर विश्वविद्यालय से इन्टर, बी.ए. तथा एम.ए. की परीक्षाएं प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। इन्टर तथा एम.ए. में इन्होंने विश्वविद्यालय में प्रथम तथा बी.ए. में चतुर्थ स्थान प्राप्त किया। सन् 1956 में एम.ए. करने के पश्चात् इन्होंने पी.जी.बी.टी. कालेज जबलपुर से वी.टी. (बेसिक) परीक्षा (सन् 1957) में सिद्धान्त तथा प्रयोग दोनों में प्रथम श्रेणी तथा विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान प्राप्त करते हुए उत्तीर्ण की तथा विश्वविद्यालय स्वर्ण पदक प्राप्त किया। अगस्त 1957 में म.प्र. लोक सेवा आयोग द्वारा चयन के उपरांत शासकीय महाविद्यालय में व्याख्याता के पद पर चयन हुआ। इसके उपरांत विभिन्न शासकीय महाविद्यालयों में असि. प्रोफेसर एवं अध्यक्ष हिन्दी विभाग के पद पर कार्य किया। कुछ अवधि के लिए शासकीय महाविद्यालय में प्रभारी प्राचार्य के रूप में कार्य भी किया। बाबू लाल खरे ने ‘‘रस सिद्धान्त की परम्परा तथा शुक्लोत्तर हिन्दी समीक्षा’’ विषय पर विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन के तत्कालीन उप-कुलपति डॉ. शिव मंगल सिंह सुमन के मार्ग-दर्शन में शोध कार्य प्रारंभ किया। दुर्भाग्यवश जिसके पूर्ण होने के पूर्व ही बाबू लाल खरे का निधन हो गया।  बाबू लाल खरे  का खंड काव्य “मंगा”  हास्यरस का होते हुए भी सामाजिक यथार्थ  कुछ चुटीले अंदाज में सामने रखता है।  इस खंडकाव्य में मुहावरेदार भाषा का स्वरूप और सहज भावभिव्यंजना  अपना गहरा प्रभाव छोड़ती है। सन् 1946 में आरम्भ हुआ खंडकाव्य ‘‘मंगा’’ में 1972 तक कई और अध्याय जुड़ने के बाद पूर्ण हुआ। करीब साठ दशक पहले रचा गया यह हास्य खण्ड काव्य आज भी समसामयिक व सटीक लगता है। इसमें खांटी व्यंजनात्मकता है, शिष्ट हास्य है तथा बुंदेली रीति-रिवाज की आकर्षक झलक है। 
‘‘मंगा’’ कथा है, बुंदेलखंड के सीधे-साधे, ग्रामीण परिवेश में पले बढ़े, आलसी, अनपढ़ इंसान मंगा की। मंगा मेहनत नहीं करना चाहता है लेकिन ज़िन्दगी आराम से गुजारना चाहता है। इसीलिए दो स्त्रियों का पति बन कर उनकी मेहनत व कमाई के बूते चैन की जिंदगी गुजारने की उसकी इच्छा उस पर भारी पड़ती है। अपनी दुर्दशा से उबर कर, सही राह पर, मंगा किस तरह आता है, यही इस काव्य का मूल कथानक है। इस काव्य में संवाद भी हैं जो हास्य रस उत्पन्न करने में सक्षम हैं। व्यंग भी है और छिपा संदेश भी। कई स्थानों पर तो पढ़ कर हंसी रोके नहीं रुकती है। बानगी देखिए -
काट कूट कें गऔ सपरबे 
नरवा में जब बौ बूड़ौ, 
हाँत पाँव गये ठिठुर
काए कै पानी तौ बिकटई जूड़ौं।
सपरखोर कें मंगा नें, 
चाही कै बजाएँ हम बाजौ,
ठिठुरे हाँ ता बजी नें चुटकी,
अरे राम, हो गऔ का जौ!
पानी में गिर गऔ-जान कें 
झार चुटैया सें छूटी, 
इत्ती महँगी चीज हिरानी 
अरे बाप! किस्मत फूटी।
(पृ 9)
अनाज समाप्त हो जाने पर आलसी मंगा से उसकी पत्नी मुलिया अनाज लाने को कहती है लेकिन मंगा उसकी अनसुनी कर देता है तब मुलिया उसे खरी-खोटी सुनाती है। इस दृश्य में एक स्त्री के सहज भाव हैं जो अलसी पति से तंग आ चुकी है-
मुलिया बोली, का कएं तुमसें, कैसें हम जे दिन काटें।
कौन करम के है, तुमखों का हम बैठे-बैठे चाटें।
पुरुष प्रधान समाज की इस विडम्बना को कवि ने बड़ी बारीकी से प्रस्तुत कर दिया है कि पुरुष चाहे काम करे या न करे, दोष स्त्री के सिर पर ही मढ़ा जाता है। इसीलिए मुलिया की बात सुन कर मंगा अकड़ दिखाते हुए कहता है-
मंगा बोलौ - इतै पेट में कूँदत खूब बिलैयें हैं।
तें बैठी है सास्तर पड़बे कैसीं बरै लुगैयें हैं!
पहर भरे सें चल रइ तोरे थूथर की पैनी कैंची।
भाजी सी पौलबे खंगी है सोचत नइँ ऊँची-नैंची ।।
मुलिया की गुस्साँ बड़ बैठी जो मंगा नें दै डाँटौ ।
रोउन लगी, कही मंगा नें-पटा डार तें तौ भाटौं ।।
गोरा नोंनें भलाँ लुगाईं उनकीं रोउत तौ नइयाँ ।
जब देखौ घूमत बजार में डारें बइँयाँ में बइँयाँ ।।
चुवन लगत हैं तोरे नैनाँ तनक-तनक सी बातों में।
अब जानी कै लातों की देवी नें मान है बातों में।।
(पृ 34)
यानी चित भी मेरी, पट भी मेरी। जब मुलिया के पास दाल नहीं गलती है तो मंगा गंगिया के आगे हाथ फैलाता लेकिन सीधे-सीधे नहीं, वरन प्रेम जताने का नाटक करते हुए-
अरे, प्रेम के भूके हैं हम तौ, सुन ले मोरी गंगा!
छोड़ौ बातें, खाबे दे जो हो बै सो, - बोलौ मंगा ।।
पानी-पानी भई गंगिया सुन कें बातें भोरी-सीं ।
खुवा खूब पकवान, मिठाई बचत हती जो थोरी सी ।।
रहे कछू दिन इतै मजे में फ़िर आ गई फाँके-मस्ती ।
मंगा नें सोची कै- जा तौ जुगत मिली अच्छी सस्ती ।।
थोरौ-भौत कछू तौ मुलिया नें जोरौ हुइऐ अब लौं ।
उतै कछू दिन रहौ, गंगिया लैहै जोर कछू जब लौं ।।
सो गंगा सें लड़े और मुलिया के घर फिर कें आये।
ऐंसई पारी-पारी सें दोई के खूब प्रान खाये ।।
(पृ 60)
‘‘मंगा’’ एक ऐसा खंडकाव्य है जो प्रकाशित हो कर भी पर्याप्त चर्चा में नहीं आ पाया। किन्तु अच्छी कृति पानी की भांति देर-सबेर अपना रास्ता ढूंढ ही लेती है। प्रकाशन के बाद नेपथ्य में अर्थात समय के पन्नों में दब जाने के बाद एक बार फिर ‘‘मंगा’’ ने पाठकों के घर के दरवाजे पर दस्तक दी है। बुंदेली को समृद्ध करने वाली यह कृति बुंदेली के हर पाठक के लिए रोचक एवं हास्य से भरपूर है। इसमें बुंदेली की सोधी महक है और मिठास के साथ मिलनसारिता भी है। इस खंड काव्य की सबसे बड़ी विशेषता यह भी है कि इसमें हर पन्ने पर फुटनोट्स में बुंदेली के हिन्दी शब्दार्थ दिए गए हैं। बुंदेली साहित्य की समृद्धि को जानने के लिए स्व. बाबू लाल खरे की इस कृति को अवश्य पढ़ा जाना चाहिए। 
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आचरण,  28.07.2026
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Tuesday, July 21, 2026

पुस्तक समीक्षा | छोटी बड़ी इबारतें : साहित्य की इबारतें भी इतिहास रचती हैं | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा 
छोटी बड़ी इबारतें : साहित्य की इबारतें भी इतिहास रचती हैं
- समीक्षक डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक      - छोटी बड़ी इबारतें
लेखक      - हरजिंदर सिंह सेठी
प्रकाशक  - न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, सी-515, बुद्ध नगर, इंद्रपुरी, नई दिल्ली -110012
मूल्य        - 399/-
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साहित्य की इबारतें भी इतिहास रचती हैं, समय का इतिहास, संवेदनाओं का इतिहास, भावनाओं का इतिहास। शैली कोई भी हो सकती है गद्य या पद्य, या दोनों। जो साहित्यिक कृति मन को छू लेती है विचारों को आंदोलन कर देती है, वही इतिहास की तरह मानस के दस्तावेज में ढल जाती है। ‘‘इबारत’’ का शाब्दिक अर्थ है लिखावट, लेख, या गद्यांश। यह अरबी मूल का शब्द है जिसका प्रयोग अक्सर किसी दस्तावेज़, पुस्तक, या आलेख में लिखे गए शब्दों या वाक्यों की संरचना को दर्शाने के लिए किया जाता है। चर्चित वरिष्ठ लेखक हरजिंदर सिंह सेठी ने ऐसी ही इतिहास रचने वाली कृतियों एवं मुंबई की साहित्यिक उपलब्धियों पर अपने विचारों को संग्रह का रूप दे कर अपने आप में एक दस्तावेज रच दिया है। इसमें उनके द्वारा की गई समीक्षाएं, लेख एवं अनुशीलन भी है। साथ उन महत्वपूर्ण बिन्दुओं का विवरण है जिन्होंने मुंबई को निरंतर साहित्यिक वातावरण दिया। हरजिंदर सिंह सेठी की इस पुस्तक का नाम है- ‘‘छोटी बड़ी इबारतें’’। 
      इस पुस्तक में विचारों का एक सुरुचि पूर्ण संवाद है जो साहित्य के विविध व्यक्तित्व एवं उनकी सृजनधर्मिता से परिचित कराने के साथ ही तत्संबंधी वातावरण तैयार करने वाले कारकों की ओर भी ध्यान आकर्षित करता है। इस दृष्टि से ‘‘छोटी बड़ी इबारतें’’ मायानगरी मुंबई और आर्थिक केन्द्र मुंबई के साहित्यिक पक्ष से गहराई से परिचित कराती है।
      22 जुलाई 1947 को गाजियाबाद (उ.प्र.) में जन्मे हरजिंदर सिंह सेठी की शिक्षा मुंबई में हुई और उनका कार्यक्षेत्र भी मुम्बई रहा। उनकी पहचान एक प्रगतिशील चेतना के लेखक एवं कवि के रूप में है। उनके लेखन में विषय की बहुत विविधता है। उनकी प्रकाशित पुस्तकें हैं- गुरु तेग बहादुर एक युग व्यक्तित्व (जीवनी) 1995, यह चुप रहने का समय नहीं (कविता संग्रह) 2000, सौ सवाल सौ जवाब (इतिहास) 2003, कुछ किताबें कुछ लोग (समीक्षा संस्मरण) 2011, नामदेव वाणी: व्याख्या विवेचन (अध्ययन) 2015, बादशाह दरवेश (जीवन गाथा) 2017, मेरी धरती के लोग (कविता संग्रह) 2025। कुछ रचनाओं का प्रकाशन पंजाबी एवं गुजराती में भी। इनमें से गुरु तेग बहादुर एक युग व्यक्तित्व (जीवनी) तथा मेरी धरती के लोग (कविता संग्रह) मैंने पढ़ा है तथा कविताओं की समीक्षा भी की है। उनका लेखन प्रभावी है। लेखन के साथ ही कुछ महत्वपूर्ण सम्पादन भी किए हैं जिनमें हैं- ‘‘पानी के ताप में’’ भगवत लाल उत्पल की कविताओं का सम्पादन (1996), ‘‘मेरे मन सांझ हुई’’ डॉ. रविनाथ सिंह की कविताओं का सम्पादन (2007) एवं ‘‘एन.बी. सिंह नादान की चुनिंदा गजलें’’ (2025)। हरजिंदर सिंह सेठी को संपादन एवं साहित्य सृजन के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार मिले हैं जिनमें महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी द्वारा काका कालेलकर पुरस्कार-1997 तथा महाराष्ट्र राज्य हिंदी अकादमी द्वारा आचार्य नंद दुलारे बाजपेयी पुरस्कार-
2013 शामिल हैं।
     ‘‘आ से आरम्भ’’ शीर्षक से पुस्तक की भूमिका में उन्होंने लिखा है कि ‘‘सन् 2011 में मेरी पुस्तक ‘‘कुछ किताबें कुछ लोग’’ प्रकाशित हुई थी जिसमें विभिन्न विधाओं की 28 पुस्तकें एवं साहित्य के क्षेत्र से जुड़े पांच व्यक्तियों पर लिखे गये आलेख शामिल थे, जिसे पाठकों और समीक्षकों से भरपूर सराहना मिली थी। उस किताब की चर्चा-गोष्ठी में कवि-समीक्षक विजय बहादुर सिंह, उपन्यासकार-कवि विनोद कुमार श्रीवास्तव, कवि-आलोचक विजय कुमार, कहानीकार हरियश राय, कवि-समीक्षक हृदयेश मयंक, राधेश्याम उपाध्याय, शैलेश सिंह, रमेश राजहंस जैसे दिग्गज साहित्यकारों एवं विद्वतजनों ने अपना सकारात्मक मत व्यक्त कर मुझे संबल प्रदान किया। ‘‘छोटी बड़ी इबारतें’’ उसी क्रम की अगली कड़ी है। मुम्बई के साहित्यिक जगत में उठते-बैठते जो प्राप्त हुआ, उसे ही किताब के रूप में प्रस्तुत करने का उपक्रम है यह। कुछ कृतियों और कुछ स्मृतियों के बहाने समीक्षा, संस्मरण, निबंध, आलेख, टिप्पणियों के अतिरिक्त बीते समय की कुछ महत्वपूर्ण संस्थाओं, पत्रिकाओं और व्यक्तियों की चर्चा के साथ मुम्बई में लिखी जा रही कविता के इतिहास को सहेजने की कोशिश की गई है इसमें।’’
     पुस्तक में कुल 37 लेख हैं-आ से आरम्भ, ललद्यदःगाथा अद्भुत प्रेम की विश्वसनीय कवितायें, अंधेरे में रोशन चिराग, मुस्तहसन अज्.म की ग़ज़लें: एक नई उम्मीद की आहट, डॉ. बंसीधर पंडा - समय, समाज और परिवेश, विजय कुमार की कवितायें: प्रकृति, प्रेम और सौंदर्य का नियोजन स्वर्ग को जमीन पर उतार लाने की चाहत जीवन और समय को देखने की दृष्टि, ‘‘निर्वासिनी’’: नारी अस्मिता का आख्यान, पत्तों पर लिखी कवितायें: विजुअल पोएट्री का सर्जक, वैचारिक व्यंग्य की खुली किताब, अतीत के कुछ यादगार पन्ने, खामोशी की जुबां, ख्वाब ही बस देखते रह जायें क्या?, अक्षय जैन: सतत सक्रिय साहित्यिक सफर, आदमी को चाहिए एक मुट्ठी आसमान, अंधेरे में उजाले की उम्मीद भरी आश्वस्ति, नवगीत के उन्नायक: वीरेंद्र मिश्र, हृदयेश मयंक की कहानियां: स्मृतियों का आख्यान, गाथा एक निरासक्त कर्मयोगी की, पहाड़ की चिंता - चिंता का पहाड़, अपने समय का लेखा-जोखा, सपने, स्मृतियां, संघर्ष और प्रेम से रची कवितायें, दोहों में सिमटा कालखंड, इंसान और इंसानियत की पैरवी करती ग़ज़लें, डॉ. धर्मवीर भारती के साथ कुछ पल, तबले पर उंगलियों की जादुई थाप, एक यादगार शाम, मेघबिंदु, साहित्य सहकार, तथापि, मुम्बई की पंजाबी साहित्यिक संस्थायें, कविता मुम्बई: एक पुनरावलोकन, दो कदम हम भी चले एवं मुम्बई की लघु साहित्यिक पत्रिकायें।
पुस्तक के सभी लेखों पर यदि बारीकी से दृष्टिपात किया जाए तो उनके विषय की विविधा, जानकारी की सम्पन्नता और समय की लिपिबद्धता को स्पष्ट रूप से महसूस किया जा सकता है। जैसे पहला ही लेख ‘‘ललद्यद: गाथा अद्भुत प्रेम की’’ कश्मीरी कवयित्री कवयित्री ललद्यद के व्यक्तित्व और कृतित्व से परिचित कराता है। इस लेख में हरजिंदर सिंह सेठी लिखते हैं कि -‘‘कश्मीर में लगभग मिथक बन चुकी, सात सौ वर्ष पूर्व जन्मी, कश्मीरी भाषा की आद्य संत कवयित्री ललद्यद को कुछ लोग कवयित्री कहते हैं, कुछ विदुषी एवं ज्ञानवती, कुछ दैवी शक्ति, कुछ योगिनी, कुछ तपस्विनी, कुछ सूफी फकीर, तो कुछ लोग उसे शिव भक्त मानते हैं। पर यह तो स्वयं सिद्ध है कि उसके द्वारा रचित ‘‘वाख’’ (पद) कश्मीरी भाषा की प्रारंभिक रचनायें हैं, एवं वर्तमान कश्मीरी साहित्य की महत्वपूर्ण धरोहर। आध्यात्मिक स्वर से मुखरित ये गीत जीवन, योग, सहजोपासना, ईश्वर, धर्म, दर्शन एवं आत्मा के संदर्भ में कहे गये हैं। इनमें भक्ति और ज्ञान से अखंड-अव्यक्त स्वरूप का साक्षात्कार किया गया है। लल अद्वैतवादी और पूर्ण रूप से एक ब्रह्म में विश्वास रखने वाली कवयित्री रही है। वर्षों से उनके वाख लोगों की जुबान पर चढ़े हैं, अपितु उनके जीवन में, उनके दिलों में रच-बस गये हैं। आम कश्मीरी नागरिक की मानसिकता पर उनका गहरा प्रभाव है। वस्तुतः यह एक समीक्षा लेख है जिसमें वेदराही के उपन्यास ‘‘ललद्यद’’ की समीक्षा की गई है। लेखक ने उपन्यास के बारे में लिखा है कि ‘‘हिंदी में उनके बारे में कोई विशेष जानकारी उपलब्ध नहीं है। इस कमी को पूरा करता है वेद राही का उपन्यास ‘‘ललद्यद’’ जो उसके जीवन, रहन-सहन, उसके समय, सामाजिक दशा, राजनीतिक परिस्थितियों एवं उसकी कविताओं को आधार बना कर बड़ी शोध, मेहनत, निष्ठा और ईमानदारी से लिखा गया है। अपनी अनूठी लेखन शैली, रवानी एवं पठनीयता के कारण यह उपन्यास बड़ा अद्भुत बन पड़ा है।’’
      एक समीक्षात्मक लेख हृदयेश मयंक की कविताओं पर है। इसमें हजजिंदर सिंह लिखते हैं कि ‘‘लगभग आधी शताब्दी बीत गई, हृदयेश मयंक को कविता के साथ विचरण करते हुए। जनधर्मी प्रतिबद्धता और जन जीवन से गहरा सरोकार रखने वाले कवि मयंक की काव्य यात्रा मैं शहर और सूरज, सायरन से सन्नाटे तक, युद्ध में शामिल नहीं थीं चिड़ियां, ठहराव के विरुद्ध, अभी भी बचा हुआ है बहुत कुछ, हम ये जो मिट्टी के बने हैं, अपने हिस्से की धूप, दिल से निकली दिल की बात, एक महक सोंधी माटी की के पड़ाव पार करती हुई अनवरत जारी है। इधर उनकी ‘‘चयनित कविताओं’’ का संकलन प्रकाशित होकर आया है, जो उनकी पूरी यात्रा के विकास क्रम को दर्शाता है। ’’
कविताओं के साथ ही ग़ज़ल संग्रह पर भी हरजिंदर सिंह सेठी ने अपनी समीक्षात्मक कलम चलाई है। ‘‘मुस्तहसन अज़्म की ग़ज़लेंः एक नई उम्मीद की आहट’’ शीर्षक लेख में मुस्तहसन अज़्म की ग़ज़लों के बारे में वे लिखते हैं कि ‘‘मुस्तहसन अज़्म अपने रचनाकर्म के लिए निजी मुहावरे की तलाश करते हुए ग़ज़ल की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए नजर आते हैं और ‘हमवार नहीं है कुछ भी’ नाम से अपना ग़ज़ल संग्रह लेकर आते हैं। आज के माहौल में यह शीर्षक बड़ा उचित जान पड़ता है। वर्तमान के पूरे परिदृश्य पर दृष्टि डालें, तो देखेंगे कि कुछ भी ठीक ठाक नहीं है।’’ वे आगे लिखते हैं-‘‘ऐसी स्थिति में मुस्तहसन अज़्म अपनी ग़ज़लों के माध्यम से बिगड़े वातावरण को संवारने की ख्वाहिश रखते हैं और सभी समस्याओं से निपटने के लिए जमीनी कार्यवाही की जरूरत पर बल देते हैं। शायर का हौसला इतना कि वह अकेला ही इस स्थिति से टकराने की जुर्रत करता है -
कदम जो बढ़ गये आगे तो रुक नहीं सकते 
सफर में साथ मेरे काफिला रहे न रहे।

     एक अन्य लेख में हरजिंदर सिंह सेठी ‘‘जीवन और समय को देखने की दृष्टि: डॉ. दलजीत सिंह की कवितायें’’ शीर्षक से उस कवि की कविताओं को प्रकाश में लाते हैं जो ‘‘डॉ. दलजीत सिंह नेत्र रोग विशेषज्ञ के रूप में संसार भर में विख्यात रहे हैं। सफेद मोतियाबिंद के आपरेशन के पश्चात आंखों में इंट्राओकुलर लेंस का प्रत्यारोपण करने वाले पहले भारतीय थे। उन्होंने मोतिया बिंद के एक लाख से अधिक आपरेशन कर और उनमें लेंस बिठा कर विश्व रिकार्ड बनाया। वे भारत के राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के मानद सर्जन रहे।’’ ऐसे चिकित्सक के मन में सामाजिक विषमताओं, अभाव और अन्याय को लेकर कवि के भीतर एक गहरा असंतोष रहा है। -
बहुत जी करता है, 
सभी सोयों को जगा जाऊं, 
मकड़ी के जो जाले, पूरे देश को लगे हैं, 
एक तेज आंधी के साथ, 
जड़ों से उखाड़ ले जाऊं।

एक लेख संगीत मनीषी पर भी है। ‘‘तबले पर उंगलियों की जादुई थाप’’ में वे लिखते हैं कि सन् 1989 में अन्नु कपूर के ‘‘अंत्याक्षरी’’ कार्यक्रम के साथ टीवी पर शुरुवात करने के पश्चात उन्होंने ‘‘मेरी आवाज सुनो’’ में तबला वादन किया, पर उन्हें पहचान मिली शेखर सुमन के शो ‘शेकर एंड मूवर्स’ से। उसके बाद तो वे ग्रेट इंडियन लाफ्टर चौलेंज, नानसेंस अनलिमिटेड, कामेडी सर्कस, कपिल शर्मा शो आदि दर्जनों सीरियल्स में अपनी कला का जौहर दखाते हुए लगभग पैंतीस वर्षों से तबले की थाप के साथ लोगों के दिलों पर अपनी छाप छोड़ रहे हैं।’’

‘‘कविता मुम्बई: एक पुनरावलोकन’’ और ‘‘मुंबई की लघु साहित्यिक पत्रिकाएं’’ मुंबई के साहित्यिक इतिहास को सहेजते लेख हैं। दरअसल हरजिंदर सिंह सेठी की यह पुस्तक इस तथ्य को गाढ़ी स्याही से रेखांकित करती है कि साहित्य की इबारतें भी इतिहास रचती हैं। इसलिए इस पुस्तक की उपादेयता निर्विवाद है। यह कहना गलत नहीं होगा कि यदि मुंबई की साहित्यिक धारा को जानना और समझना है तो यह पुस्तक अपनी पूरी रोचकता के साथ नितांत उपयोगी ठहरती है।
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आचरण,  21.07.2026
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Tuesday, July 7, 2026

पुस्तक समीक्षा | लोक मिथक के मूल्य और सौंदर्य पर एक रोचक मीमांसा | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा     
लोक मिथक के मूल्य और सौंदर्य पर एक रोचक मीमांसा
- समीक्षक डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक  - लोक मिथक : मूल्य और सौंदर्य दृष्टि
लेखक    - श्यामसुंदर दुबे
प्रकाशक - विजया बुक्स, 1/10753 सुभाष पार्क, गली नं. 3, नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032
मूल्य        - 450/-
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आज लोक संस्कृति संग्रहालयों की वस्तु बनती जा रही है। वर्तमान भौतिकवाद के लिए लोक संस्कृति भी एक बाज़ार की एक वस्तु है। वस्तुतः बाजार की संस्कृति ने लोक संस्कृति को भी बाजार की वस्तु बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। घर की बैठक में वर्ली आर्ट या मधुबनी कलम की पेंटिग लगा लेना ही संस्कृति को सहेजना नहीं होता है। लोक संस्कृति को सहेजने के लिए सबसे पहले जरूरी है लोक संस्कृति के स्वरूप को समझना। यह समझना आवश्यक है कि लोक संस्कृति मात्र एक शब्द नहीं है, यह एक समृद्ध परम्परा है जो विचार, शिल्प कथा, आस्था आदि विविध रूपों में उस समय से प्रवाहित है जब दुनिया में संस्कृतियों का विधिवत उद्भव ही नहीं हुआ था। लोक संस्कृति वस्तुतः मौलिक चेष्टाएं हैं जो कभी अभिव्यक्ति के माध्यम से तो कभी कला, कल्पना और आस्था के माध्यम से व्यक्त होती रही हैं। लोक संस्कृति पर एक बहुत महत्वपूर्ण पुस्तक है ‘‘लोक मिथक - मूल्य और सौंदर्य दृष्टि’’। इसके लेखक है प्रतिष्ठित संस्कृतिविद डॉ. श्यामसुंदर दुबे।


लोक संस्कृति में मिथक की उपस्थिति के संबंध में डॉ. श्यामसुंदर दुबे ने लिखा है कि ‘‘लोक-संस्कृति, मानवीय सौंदर्य चेतना का अक्षय स्रोत है। निःसर्ग और मनुष्य के सह समायोजन से अभिव्यक्त होने वाली लोक संस्कृति अपनी सामाजिकता में उदार आशयों वाली है। उसकी नैतिकता वैश्विक परिदृश्य में सृष्टि के समुचित संरक्षण से आविर्भूत है। लोक संस्कृति जितना मनुष्य को संरक्षणीय मानती है, उतना ही संरक्षणीय वह प्रकृति के प्रत्येक अंग को संरक्षणीय मानती है उसकी अभेद दृष्टि सर्वत्र सभी संदर्भों में एक ही चैतन्य को तलाशती है। यही वजह है कि उसमें मानवीय अंतर्दृष्टि के आलोक को हम प्रत्येक रचना-विधान में प्राप्त करते हैं।’’


लोक संस्कृति की अपनी अलग पहचान एवं विशेषता होती है इसका संबंध किसी देश व क्षेत्र विशेष के सामान्य जन समुदाय से होता है समाज में प्रचलित विभिन्न क्रियाकलाप परंपराएं अचार-विचार, संस्कार, प्रथाएं कर्मकांड, आस्था एवं विश्वास - लोक संस्कृति के आधारभूत तत्व हैं। संस्कृति व्यक्ति एवं समाज के विकास का परिचायक होती है। लोक जीवन इसी संस्कृति का अक्षय भंडार है। लोक संस्कृति समाज के सांस्कृतिक मूल्यों को आकार देती है। लोक संस्कृति विविधरूपों में आकार लेती रहती है। जैसे- लोक भाषा, लोक परंपरा, लोकनाट्य, लोकगीत, लोककला आदि। लोक परंपराओं के अंतर्गत विभिन्न प्रकार के व्रत, त्यौहार, प्रथाएं, मेले, रूढ़िया एवं संस्कार आते हैं, जिनके द्वारा समाज में उत्साह एवं विश्वास बना रहता है। लोक साहित्य लोक मानस की सहज एवं स्वाभाविक अभिव्यक्ति है यह प्राय अलिखित रहता है तथा वाचक परंपरा के द्वारा एक पीढ़ी से दूसरे पीढ़ी तक प्रवाहित होता है। लोक साहित्य परिभाषित भाषा शास्त्रीय रचना पद्धति एवं व्याकरणिक नियमों से रहित होता है, इसकी भाषा लोक भाषा होती है लोक साहित्य के अंतर्गत लोक गाथा, लोकगीत, लोक कथाएं, सुभाषित, पहेलियां, लोकोक्तियां, लोकनाट्य आदि आते हैं।


लेखक श्यामसुंदर दुबे ने अपनी पुस्तक ‘‘लोक मिथक - मूल्य और सौंदर्य दृष्टि’’ में लोक मिथक के मूल्य और सौंदर्य दृष्टि को व्याख्यायित करते हुए विस्तार से लोक के स्वरूप को सामने रखा है। उन्होंने अपनी पुस्तक के कलेवर को मुख्य तीन शीर्षकों एवं 25 लेखों में विभक्त किया है। ‘‘लोक-संस्कृति: विमर्श के नए आयाम’’ शीर्षक से दी गई भूमिका के उपरांत तीन मुख्य शीर्षक हैं- मिथकीय संरचना का संसार, जीवन-मूल्यों के आधार तथा कला-दृष्टियों का समाहार। इन तीन मुख्य शीर्षकों अथवा खंडों के अंतर्गत जो पच्चीस लेख हैं उनके मिथकीय संरचना का संसार के अंतर्गत हैं- लोक आख्यान और मिथक के अंतर्संबंध, भाषिक संरचना और लोक आख्यान, लोक आख्यान और आज का लेखन-कर्म, मिथक संरचना के आधारभूत बिंदु, लोक चित्र परंपरा के मिथकीय आधार, लोक-संस्कृति की भूमि पर लोक-विश्वासों की हरी दूब, लोक-प्रतीकों की अवधारणा, लोक-परंपरा और लोक-संस्कार, आदिम चित्रकला अभिप्रायों का संसार।
जीवन-मूल्यों के आधार के अंतर्गत हैं- लोक संस्कृति: मानव संसाधन का आधार, मानवीय मूल्य और लोक-साहित्य, लोक-साहित्य की मूल्य-चेतना, लोक-साहित्य: जीवन-मूल्य और भारतीयता,  लोक-संस्कृति में माधुर्य-बोध, लोक की सौंदर्यशास्त्रीय भूमिका।
कला-दृष्टियों का समाहार के अंर्तगत हैं- बोलियों और लोकगीतों का अंतर्संवादी स्वर, प्रदर्शनकारी लोक-कलाएं और जन-संचार माध्यम, लोक-लय के प्रयोग, लोक गायिकी: रंगतों का वर्णपट, लोक नृत्य ‘राई’, आल्हा परंपरा की उखड़ती सांसें, मिट्टी तेरे रूप अनेक: मृदा कला, लोक में बाजार और बाजार में लोक, हिंदी साहित्य की लोकधर्मिता, लोक-गाथा में निहित समकालीनता।


लोक आख्यान और मिथक के अंतर्संबंध की विवेचना करते हुए लेखक ने लिखा है कि -‘‘ प्रारंभिक मिथक रचनाओं में आदिम मनुष्य का भय उसकी प्रसन्नता, उसकी घृणा, उसका बैर आदि मनोभावों के प्रबल प्रवेग ने मानवीय और अतिमानवीय चरित्रों के साथ मानवेतर प्राणियों और वस्तु संदर्भों के बीच संबंधों का चक्र निर्मित किया।यह चक्र आख्यान के सूत्रों के रेशों की सघन बुनावट से बना था। इन रेशों की चमक से जो झकर-मकर करता स्पेस निर्मित हो रहा था उसकी उर्वर क्षमता को इस रूप में अनुभव किया जा सकता है कि हमारे निकट अतीत के अनेक घटना प्रसंग जब आख्यान बनने हेतु समुद्यत होते हैं, तब मिथक के आदिम अनुभव से वे उद्रेकित होने लगते हैं। मिथक रहस्य भावना की उपज भी माने जा सकते हैं।’’
भाषिक संरचना और लोक आख्यान के अंतर्संबंध के बारे में लेखक श्यामसुंदर दुबे का कहना है कि- ‘‘भाषिक संप्राप्ति के तत्काल बाद ही मनुष्य आख्यानपरकता की ओर उन्मुख हुआ होगा। भाषा की वृत्ति अपने-आपको अभिव्यक्त करने की चेष्टाओं का भले ही ध्वन्यात्मक परिणाम हो, किंतु भाषिक संरचना की लंबी जद्दोजहद में मनुष्य की आख्यान व्याकुलता ही क्रियाशील रही है। मनुष्य केवल इच्छित विषय की संकेतधर्मी परंपरा से संबंधित ध्वनि-पर्यायों से संतुष्ट नहीं रहा- ये पर्याय वस्तु-बिंब और उससे जुड़े तमाम क्रिया- व्यापारों की आख्यान केंद्रित इकाई की तरह निर्मित हुए हैं। इसलिए प्रत्येक शब्द एक आख्यायिका को अपने भीतर छिपाए हुए है।’’ इसी लेख में लोकबोलियों के संबंध में लेखक ने सोदाहरण लिखा है कि- ‘‘कम-से-कम संस्कृत भाषा की शब्द- संरचनाओं में धातु आधार तो हमारे अभिज्ञान में है ही। इसी क्रम में लोक-बोलियों का विकास हुआ और इन बोलियों के शब्दों का मूल, क्रिया-जन्य ही है। क्रिया मात्र ध्वनि नहीं है वह एक पूरा दृश्याख्यान है। मैं यहाँ एक शब्द ‘पत्र’ लेता हूँ- यह शब्द प्रारंभ में वृक्ष के पत्ते के पर्याय को व्यक्त करने वाला रहा है-फिर चिट्ठी, पन्ना आदि का अर्थ देने वाला बना। लोक बोली के पत्ते को आधार बनाकर एक रूपक रचा ‘पत्ता टूटा डाल से-उड़कर गया अकास’ डाल से पत्ता टूटा और हवा के झोंके के साथ उड़कर आकाशचारी बना। पत्र के मूल में पत् क्रिया है। डाल से पत्र टूटा और पृथ्वी की सतह पर गिरा गिरने से पत् की आवाज आई। इस क्रिया के पूर्व पत्ता-पत्ता नहीं था-एक क्रिया ने उसका नामकरण किया। क्रिया संपूर्ण इंद्रिय-संवेदी व्यापार है, टूटते हुए पत्ते के शेड्स की झलमलाहट, पत् ध्वनि का परिस्पंदन, पत्ते के ताजे डंठल से निर्गत गंध, पत्ते की कोमलता को छूने का भाव, पत्ते की ओक बनाकर तरल पदार्थ पीने का अनुभव - ये संपूर्ण संवेदनाएँ एक ध्वनि-बिंब’ में सिमट आईं।’’


लोक-परंपरा और लोक-संस्कार के पारस्परिक संबंध को स्पष्ट करते हुए लेखक ने लिखा है कि -‘‘लोक एक परंपरा है। परंपरा सतत विकसित मूल्य-बोध है। इसके सातत्य में सृजनमूलक समस्त अनुष्ठान अगली पीढ़ी के लिए हस्तांतरित होते रहते हैं और पीढ़ी-दर-पीढ़ी इसमें कुछ नया जुड़ता रहता है। परंपरा का विकास लगभग एक रैखिक होता है। चूँकि यह विकास है, इसलिए यह ऊर्ध्वगामी भी होता है। लोक में परंपरा का विकास एक तरह से सांस्कृतिक समुन्नयन भी है, इसलिए यह एक क्रियाशील जीवित प्रणाली है, जो सामाजिक प्रकार्यों को गति देती है। परंपरा का नाभिकेंद्र लोक है, अतः लोक के परिवृत्तों में जो परिवर्तन की ऊर्जा समाहित है, वह लोक की अभ्युदयमूलक सिसृक्षा है।’’


यह पुस्तक लोक मिथक को बीरीकी से समझाती है। डॉ. श्यामसुंदर दुबे स्वयं एक लोक संस्कृतिविद हैं अतः बुंदेली लोक संस्कृति के साथ ही उन्होंने देश की विभिन्न लोक संस्कृतियों का अध्ययन तथा उन पर लेखन किया है। सबसे अच्छी बात है कि जब वे लोक संस्कृति की चर्चा करते हैं अथवा उस पर कुछ लिखते हैं तो तथ्यात्मकरूप से लिखते हैं। अपनी इस पुस्तक में भी उन्होंने वैचारिक तर्कों के साथ लोकगीतों, लोककथाओं, लोकोक्तियों आदि के उदाहरण देकर विषय की व्याख्या की है। पुस्तक के प्रथम दो मुख्य शीर्षकों के अंतर्गत प्रस्तुत लेख समग्रता लिए हुए हैं। तीसरे कला-दृष्टियों का समाहार के अंर्तगत हैं रखे गए लेखों में मृदा कला,  हिंदी साहित्य की लोकधर्मिता आदि पर।
श्यामसुंदर दुबे के पास भाषाई समृद्धि है। संस्कृतनिष्ठ शब्दों से सुसम्पन्न उनकी भाषा उन लोगों को पर्याप्त भाषिक आनन्द देती है जो हिन्दी के श्रेष्ठ स्वरूप का रसास्वादन करना चाहते हैं किन्तु लोक एक ऐसा विषय है जिसमें हर तरह के पाठक वर्ग की रुचि हो सकती है। अतः पुस्तक की संस्कृतनिष्ठ भाषा उन पाठकों के लिए तनिक असुविधा पैदा कर सकती है जो संस्कृतनिष्ठ हिन्दी से दूर हैं। चूंकि यह पुस्तक लोक संस्कृति के लोक मिथक पर है अतः इसकी भाषा थोड़ी सरलीकृत होती तो और अधिक पाठकों के लिए सुविधाजनक होती। किन्तु इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह पुस्तक सुधि पाठकों को लोक मिथक के सौंदर्य एवं स्वरूप से गहराई से भली-भांति परिचित कराने में सक्षम है। लोक संस्कृति अथवा संस्कृति में रुचि रखने वालों तथा उत्तम भाषा का रसास्वादन करने की इच्छा रखने वालों को इस पुस्तक को अवश्य ही पढ़ना चाहिए।   
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Tuesday, June 30, 2026

पुस्तक समीक्षा | स्त्री का असली घर तलाशती कहानियां | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
स्त्री का असली घर तलाशती कहानियां
समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
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कहानी संग्रह  - बीते लम्हे
लेखिका - श्रीमती संगीता चौबे
प्रकाशक - श्री नर्मदा प्रकाशन, शॉप नं. 16, आधारशिला कॉम्पलेस, अवधपुरी, भोपाल (म.प्र.) 462022
मूल्य   - 200/-
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   हिंदी कहानी का इतिहास बहुत लंबा नहीं है लेकिन जितना भी है वह बहुत परिपक्व और सधा हुआ है। बात आती है कहानी को लिखे जाने की कि एक कहानीकार कहानी क्यों लिखता है? क्या ज़रूरत है उसे कहानी लिखने की? तो इसका उत्तर यही है की एक कहानीकार अपने अनुभव, अपने आसपास के वातावरण- सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक आदि परिदृश्यों में से उन घटनाओं को चुनता है जो उसके मन को  किसी न किसी कारण छू जाती हैं। फिर वह उन्हें रोचक ढंग से अपनी कहानी में इस तरह से पिरोता है कि एक जिज्ञासा से कहानी आरंभ हो और क्लाइमेक्स पर जाकर समाप्त हो। यही तो मूल कहानी कला है।

      श्रीमती संगीता चौबे की कहानी संग्रह "बीते लम्हें" में उनकी 12 कहानियां  हैं। वे एक नवोदित कथाकार हैं। फिर भी संग्रह की पहली कहानी ही एक बहुत बड़ा प्रश्न उछालती है, एक ऐसा शाश्वत प्रश्न जो हर स्त्री अपने आप से पूछती है और साथ ही समाज से पूछना चाहती है कि एक बेटी का घर कौन-सा होता है मायका या ससुराल या दोनों नहीं? कहां होता है एक स्त्री का असली घर? मायके में निरंतर उसे स्मरण कराया जाता है कि वह पराए घर जाने वाली इंसान है, मायके में उसका कुछ भी नहीं है, जो कुछ है वह ससुराल में मिलेगा। फिर वही लड़की जब ससुराल पहुंचती है तो वहां उसे एहसास होता है कि वहां जो कुछ है वह सास, ससुर, ननद, देवर आदि का है। और तो और, उसके पति का भी है किंतु उसका अपना कुछ भी नहीं है। अपनी ससुराल में अपनी जगह तलाश करते-करते उम्र निकल जाती है और जब वह स्वयं सास बनने की उम्र में आती है तब कहीं जाकर उसे लगता है कि यह घर तो उसका अपना है जिसे छीनने उसकी बहू आ गई है। द्वंद यही से शुरू होता है किंतु संगीता चौबे ने अपनी कहानी में नायिका को सास की उम्र तक पहुंचने से पहले ही अपना घर ढूंढ लेने में सफलता दिला दी है। अर्थात यह कहानी एक रास्ता सुझाती है। कठिन ही सही लेकिन रास्ता तो है जो एक स्त्री को  अपने अस्तित्व को पहचानने में मदद करता है और उसे उसके वास्तविक घर तक पहुंचता है।

पुस्तक की प्रस्तावना में लेखिका संगीता चौबे ने अपनी कहानियों में स्त्री की उपस्थिति पर अपने विचार कुछ इस प्रकार रखे हैं - “नारी केवल सृष्टि की आधारशिला ही नहीं बल्कि संस्कार, शक्ति और संवेदना की जीवंत प्रतिमूर्ति है। जब एक महिला शिक्षित, आत्मवियश्वासी और आत्मनिर्भर बनती है, तब वह केवल स्वयं का ही नहीं परिवार, समाज और राष्ट्र का भी भविष्य संवारती है। ये कहानियां स्त्री के केवल संघर्ष को नहीं दर्शातीं, उसके आत्मबोध को भी जाग्रत करती हैं। जहां वह अपनी आत्म शक्ति को पहचान कर स्वयं अपना मार्ग प्रशस्त करती है।”

वही नर्मदा प्रकाशन के प्रकाशक सत्यम सिंह बघेल ने संगीता चौबे की कहानियों पर भूमिका के रूप में टिप्पणी की है कि “लेखिका ने इन कहानियों में न तो नाटकीय अतिरंजना की है, न ही उपदेशात्मकता का सहारा लिया। उन्होंने सरल, सहज और हृदयस्पर्शी भाषा में उन क्षणों को जीवंत किया है, जहाँ एक लड़की अपनी माँ से पूछती है, 'मेरा घर कहाँ है?', जहाँ एक शिक्षिका अपने अतीत के पेड़ के नीचे खड़ी होकर भविष्य की राह तलाशती है, और जहाँ स्वाभिमान की छोटी-छोटी चोटें स्त्री को नई ऊँचाई देते हैं। ये कहानियाँ "बीते लम्हे" हैं, परंतु इनमें भविष्य की दिशा भी छिपी है।”

दूसरी कहानी है “वह पलाश का पेड़”। यह एक प्रेम कथा है जो अपूर्ण होकर भी एक पूर्णता तक पहुंचती है। यह सुंदर कोमल कथा है।
       संग्रह की तीसरी कहानी है “स्वाभिमान” । इस कहानी में भी लेखिका ने स्त्री के अस्तित्व और उसका असली घर तलाशने में उसकी मदद की है। एक स्त्री अपने पारिवारिक दायित्वों में इस तरह डूब जाती है कि उसका अस्तित्व ही विलीन हो जाता है। फलां की मां, फलां की पत्नी, फलां की सास आदि-आदि संबोधन ही उसकी पहचान बन कर रह जाता है। ऐसी ही एक स्त्री की कथा है “स्वाभिमान” जो पूरी दृढ़ता के साथ अपने स्वाभिमान की ओर बढ़ती है।

चौथी कहानी है “हजारों में एक”। मैट्रिमोनियल कॉलम में अक्सर यह फरमाइश रहती है कि वधू चाहिए सुंदर, सुशील, गौरवर्ण, गृह कार्य में दक्ष। नौकरी पेशा भी चलेगी। यानी एक कंपलीट पैकेज बहू। लोग क्या सोचते हैं कि आज की महंगाई में पति-पत्नी दोनों कमाए तो घर अच्छे से चलता है लेकिन पत्नी के कमाने को महत्व के रूप में नहीं लिया जाता है। गोया वह कमा रही है तो अपनी मर्जी से और उसे कमाने दिया जा रहा है तो यह उसके ससुराल पक्ष की दयानयदारी है। सांवली या गहरे रंग की त्वचा वाली वधू किसी को नहीं चाहिए। यदि कोई गहरी रंगत वाली लड़की को अपने घर की बहू बनने के लिए राजी हो भी जाता है तो साथ में वह मोटा दहेज चाहता है। लेकिन हजारों में कोई एक ऐसा भी होता है जो त्वचा की रंगत नहीं बल्कि लड़की का मन और उसकी प्रतिभा देखता है।  यदि दहेज लोभियों के चक्कर में न पड़ा जाए और  प्रतीक्षा की जाए तो एक न एक दिन वह हज़ारों में एक मिल ही जाता है। यह एक आशावादी कहानी है।

संग्रह की पांचवी कहानी है “कैरी का अचार”। यदि स्वाद की भाषा में कहा जाए तो यह एक स्वादिष्ट कहानी है जिसमें खट्टा मीठा तीखा हर स्वाद मौजूद है। बिल्कुल कैरी के अचार की तरह।
छठीं कहानी है “अजनबी मित्र”। हम मनुष्य परस्पर एक दूसरे से बहुत कुछ सीखते रहते हैं। कुछ जानबूझकर, कुछ अनजाने में हम उनके विचारों के अनुरूप सोचने लगते हैं और उनके विचारों को आत्मसात कर लेते हैं। यह जरूरी नहीं है कि वे हमारे परिचित ही हों। कई बार हम अजनबियों से भी बहुत कुछ सीख लेते हैं। अक्सर ऐसा होता है यात्राओं के दौरान। जब हम किसी के साथ यात्रा कर रहे होते हैं जो नितांत अपरिचित है, बातचीत शुरू होती है। उसके विचारों का पता चलता है हम अपने विचार उसे साझा करते हैं फिर जाने अनजाने एक दूसरे के विचारों को हम प्रभावित कर बैठते हैं कुछ ऐसी ही कहानी है “अजनबी मित्र”।

सातवीं कहानी “संपूर्ण व्यक्तित्व” व्यक्ति की पूर्णता और अपूर्णता को रेखांकित करती है। यह कहा भी जाता है कि इंसान की सूरत इतनी मायने नहीं रखती जितनी सीरत मायने रखती है। साधारण सा दिखने वाला एक इंसान बहुत अच्छा व्यक्ति साबित हो सकता है जबकि वहीं एक बहुत सजधज के साथ रहने वाला हीरो जैसा इंसान वास्तविक चरित्र और व्यवहार में जीरो निकल सकता है। इस कहानी की नायिका का विवाह जिस व्यक्ति से तय किया जा रहा था और जिसने अपने आप को नायिका से श्रेष्ठ समझते हुए उसे लगभग ठुकरा दिया था कालांतर में वही व्यक्ति निम्न कोटि का साबित होता है। तब नायिका को लगता है की माता-पिता ने जिसे उसके लिए चुनकर उसका विवाह कराया वह देखने में भले ही साधारण है किंतु विशाल व्यक्तित्व का बल्कि संपूर्ण व्यक्तित्व का मालिक है क्योंकि उसके अंदर मानवता मौजूद है। यूं भी, यदि किसी मानव के भीतर मानवता नहीं है तो वह किसी भी कौन से मानवीय व्यक्तित्व का धनी हो ही नहीं सकता है यह कहानी यही संदेश देती है।

संग्रह की आठवीं कहानी है “फैसला”। एक गलत फैसला अगर जिंदगी बर्बाद कर सकता है तो एक सही फैसला जिंदगी को अर्थ प्रदान कर सकता है। सार्थक बन सकता है। यूं भी शादी का फैसला बहुत महत्वपूर्ण होता है और हमारे भारतीय समाज में अधिकतर यह फैसला माता-पिता के हाथों में ही होता है। कई बार माता पिता परिस्थितियों से प्रभावित होकर गलत फैसला ले लेते हैं और तब ऐसे में घर की बड़ी बेटी अगर वह कमाऊ है तो विवाह के मामले में सबसे अधिक अवहेलना का शिकार बनती है।  जो दायित्व माता-पिता को उठाना चाहिए वह बड़ी बेटी के कंधों पर लाद दिया जाता है और उस बड़ी बेटी को अपनी शादी की बारी आने की तब तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है जब तक कि वह अपने छोटे भाई बहनों के विवाह के दायित्व से निवृत्ति न हो जाए भले ही इस विलंब में विवाह के प्रति उसकी रुचि ही क्यों न खत्म हो जाए। इसके बाद भी माता-पिता यदि उसे अपनी इच्छा के अनुरूप डालने का प्रयास करें और अपने स्वार्थ के लिए विवाह करने को विवश करें तो वह घड़ी आ जाती है, जब उस बड़ी बेटी को स्वयं आगे बढ़कर फैसला ले लेना चाहिए कि उसे क्या करना है और कौन सा रास्ता चुनना है।  यह एक आम कथानक है जिस पर कई कहानियां लिखी जा चुकी है, फिल्मी भी बनी हैं, फिर भी संगीता चौबे ने अपनी कहानी में नवीनता लाने का प्रयास किया है तथा रोचकता बनाए रखी है।
इसी प्रकार नवीं कहानी “इंतज़ार” और दसवीं कहानी “सफ़र”। यह दोनों कहानियां स्त्री के अंतरद्वंद और जीवन के कठोर उतार-चढ़ाव की कहानी हैं। इन दोनों कहानियों के कथानक में भी नयापन नहीं है किंतु लेखिका ने नायिकाओं के निर्णय को उचित स्थापना देते हुए कहानी को विशिष्ट बना दिया है।

11वीं कहानी “उपहार” और 12वीं कहानी “पश्चाताप” है। यह दोनों कहानी पारिवारिक रिश्तों की कहानियां हैं। मां बेटों के रिश्ते की मां और बेटी के रिश्ते की और सबसे बढ़कर संवेदनात्मक रिश्ते की कहानियां हैं।

कहानी संग्रह “बीते लम्हें” की बारहों कहानियां रोचक हैं, पठनीय हैं। कहानीकार श्रीमती संगीता चौबे ने अपनी हर कहानी के साथ न्याय करने का पूरा-पूरा प्रयास किया है। संगीता चौबे में कहानी लिखने की भरपूर प्रतिभा है बस उन्हें शिल्प में कसाव और परिवेश में विविधता लानी होगी तो उनकी अगली कहानियां और भी अधिक रोचक बन सकेंगी। यानी उन्हें कथा लेखन की चुनौतियों को स्वीकार करते हुए अपने कंफर्ट जोन से बाहर निकलना होगा। इसमें कोई संदेह नहीं की उनके लेखन में संवाद क्षमता और विषय की पकड़ बहुत गहरी है जिसके कारण ये सभी 12 कहानियां उनके लेखन के प्रति आश्वस्त करती हैं और गहरी संभावनाएं जागती हैं ।
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Tuesday, June 23, 2026

पुस्तक समीक्षा | आदि-अनादि प्रश्नों को उठाती संवेदनशील कविताएं | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
आदि-अनादि प्रश्नों को उठाती संवेदनशील कविताएं
समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह  - तुम से शुरू तुम तक
कवयित्री - श्रीमती विमल बुंदेला
प्रकाशक - जे.टी.एस. प्रकाशन, वी-508, गली नं. 17, विजय पार्क, दिल्ली-110053
मूल्य  - 500/-
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कविता वह माध्यम है जो संवेदनाओं को विचारों के साथ जोड़कर एक ऐसी अभिव्यक्ति प्रदान करती है जो मन को गहरे तक छू जाती है। कई बार जब व्यक्ति अपने मन के प्रश्नों को गद्यात्मक सामने नहीं रखना चाहता है तब काव्यात्मक रूप में उन्हें पिरोकर सहजता से सामने रख देता है, यही काव्य कला की बुनियादी विशेषता होती है। श्रीमती विमल बुंदेला का यह काव्य संग्रह “तुम से शुरू तुम तक” जितना मन की कोमल भावनाओं से गहन सरोकार रखता है उतना ही वैचारिक उद्वेलन भी रखता है। श्रीमती विमल बुंदेला प्रखर विचारों की कवयित्री हैं। वे ऐसे आदि-अनादि प्रश्न अपनी कविताओं के माध्यम से उठाती हैं जिन्हें पढ़ने के बाद प्रत्येक व्यक्ति उन पर विचार करने के लिए विवश हो जाता है और पढ़ने वाले को यह भी अनुभव होता है कि यह सारे प्रश्न तो उसके अंतःस्थल में भी कहीं न कहीं मौज़ूद थे।

भारतीय संस्कृति कि यह विशेषता है कि वह संस्कारों के रूप में प्रत्येक व्यक्ति की आत्मा में बसी है। इसीलिए जब कोई रचनाकार अपना कविता संग्रह तैयार करता है तो उसका आरंभ सरस्वती वंदना से ही होता है। देवी सरस्वती विद्या की देवी हैं। प्रत्येक रचनाकार यह मानता है कि यदि वह कोई सृजन कर पा रहा है तो देवी सरस्वती की कृपा से संभव ही है। विमल बुंदेला भी अपनी प्रथम कविता “मां वाणी का प्रसाद” में यह पंक्तियां लिखती हैं कि-
अहं नहीं शब्दों में मेरे,
जो सच है वह लिखती हूँ,
ये प्रसाद माँ वाणी का है,
जो विनय भाव जगाते हैं।
श्रद्धा से नतमस्तक हूँ मैं,
दिया बहुत, माँगा कम था,
एक बूँद को तृषित हृदय था,
भरे कलश मिल जाते हैं।
संग्रह की दूसरी कविता मां शारदा को अर्पित है। वहीं तीसरी और चौथी  कविताएं “जन्मभूमि मां भारती” तथा “भारत देश”अपने देश के प्रति समर्पित है। कवयित्री विमल बुंदेला ने भी इसी प्रकार जन्मभूमि भारत को नमन किया है-
ननी-जन्मभूमि हमारी,
सुंदर और मनोहारी,
जन्म दिया प्रभु इस धरती पर,
करूँ नमन, हूँ आभारी।
देखा जाए तो ये आरंभिक कविताएं पुस्तक का मंगलाचरण हैं। उसके बाद पांचवी कविता में ही वे अपने मूल प्रश्नों पर आती हैं। पांचवी कविता का शीर्षक ही है “सीधा प्रश्न”। यहां से नौंवी कविता तक वे शाश्वत प्रश्न उठाए गए हैं जो राम कथा से उपजे हैं और प्रत्येक व्यक्ति के मानस में यदाकदा उमड़ते-घुमड़ते रहते हैं। ये कविताएं कवयित्री के सामाजिक एवं स्त्री स्वाभिमान से सरोकारों को भी प्रतिबिंबित करती हैं।
“सीधा प्रश्न” कविता में कवयित्री ने मर्यादा पुरुषोत्तम राम से प्रश्न किया है-
हे मर्यादापुरुषोत्तम राम आपको,
अब उत्तर देना होगा,
क्या गलती थी माँ सीता की,
यह विश्लेषण करना होगा।
यह प्रश्न उठाया है इस बात पर की गर्भवती सीता माता को श्रीराम ने वन में कैसे भेज दिया और उनका कैसे त्याग कर दिया जबकि वे स्वयं सीता माता की अग्नि परीक्षा ले चुके थे। इसीलिए कवयित्री कहती हैं कि-
हर नारी के मन के अंदर का,
यह दबा हुआ अंगारा है,
चुपचाप क्यों त्यागा सीता को,
यह सीधा प्रश्न हमारा है।

यह प्रश्न उस समय से मानव मन में अपनी जगह बनाए हुए हैं जब से राम कथा आरंभ हुई। स्त्री पर लांछन लगाना और उस लांछन को सही मान लेना क्या इतना सरल है? क्या यह स्त्री की प्रतिष्ठा, गरिमा एवं अस्मिता के अनुरूप है? यही प्रश्न उठाया है विमल बुंदेला जी ने। कविता “कर्तव्य सबसे बड़ा” में कैकई प्रसंग के तारतम्य में प्रश्नों को खंगाला गया है। कैकई ने पुत्र मोह में पड़कर श्री राम को 14 वर्ष का वनवास दिला दिया। जबकि इसी कारण उसका पुत्र भरत उससे रुष्ट हो गया। समूची अयोध्या धिक्कार कर उठी। एक स्त्री दूसरी स्त्री की बातों में आकर गलत कदम उठा ले तो उसके हिस्से में धिक्कार ही आता है। इस बात को विमल बुंदेला जी ने बहुत सुंदर सहज ढंग से रेखांकित किया है-
तब कैकई-सी रानी दो,
जब आई उसकी बातों में,
स्याही-सा काला नाम हुआ,
ममता की सरल किताबों में।

यह कविता स्पष्ट करती है कि विमल बुंदेला जी सही को सही और गलत को गलत कहने का साहस रखती हैं। रामकथा के संदर्भ में ही एक और अनादि प्रश्न उठाती कविता है “उर्मिला का मौन त्याग” । इस कविता में उन्होंने लिखा है कि किस तरह उत्साह पूर्वक लक्ष्मण की अर्धांगिनी बनकर उर्मिला राज भवन में आई थी लेकिन श्री राम के साथ लक्ष्मण के वनवास गमन करने पर उर्मिला  ने भी राजभवन में रहते हुए वनवास सामान जीवन व्यतीत किया, जो आसान नहीं था -
चौदह वर्ष जो तुमने बिताए,
और रिश्ते सभी निभाए थे,
हमको कुछ भी ज्ञात नहीं,
कैसे सब आँसू छुपाए थे।
स्त्री मन यूं भी अधिक संवेदनशील होता है और जब कोई स्त्री दूसरी स्त्री की दशा एवं स्थिति पर विचार करती है तो वह विचार बिंदु सटीक होता है।

“अपमान की अग्नि” कविता वह अनादि प्रश्न उठाती है जिसमें लक्ष्मण के द्वारा शूर्पणखा की नाक काट दी जाती है, क्या यह दंड उचित था? शूर्पणखा भले ही राक्षस समुदाय की थी किंतु थी तो स्त्री ही, उस पर शस्त्र उठाना क्या उचित था? एक स्त्री को सदा के लिए उसके नैसर्गिक सौंदर्य से वंचित कर देना क्या उचित था? इससे भी पहले क्या मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम का सूर्पणखा को विवाह प्रस्ताव हेतु अनुज लक्ष्मण के पास भेजना क्या उचित था? इन प्रश्नों को उठाने का साहस किया है कवयित्री विमल बुंदेला ने-
लक्ष्मण के सम्मुख सुंदरी आई,
किया प्रणय निवेदन मुस्काई,
लक्ष्मण ने हँसी उड़ाई थी,
शूर्पणखा नाक कटवाई थी।
इस प्रकार के शाश्वत प्रश्न हमारे अतीत से उठकर वर्तमान तक हमें विचलित करते रहते हैं।कविता “प्रतीक्षा का फल” में शबरी की कठोर तपस्या समान प्रतीक्षा का हृदयस्पर्शी वर्णन है। संग्रह की अन्य कविताएं जैसे “अनंत स्पर्श” “हम सब एक हैं”, “बिन बाती का दीपक”, “अंतर्मन की तलाश” आदि विविध भाव भूमि की कविताएं हैं। एक और कविता है जिसका उल्लेख करना आवश्यक है। यह कविता है “उसकी ख़ामोशी”। इस कविता में कवयित्री ने कामवाली बाई की पीड़ा को शब्दांकित किया है-
गहराती शाम-सी आँखें,
उनकी नमी वह छुपाए थी,
और कोई नहीं, वह मेरी
कामवाली कम उम्र बाई थी।
संग्रह की प्रस्तावना डॉ. बहादुर सिंह परमार ने, भूमिका डॉ. शरद सिंह ने, आशिर्वचन मालती श्रीवास्तव, छतरपुर ने लिखा है। इसके साथ ही पद्मश्री डॉ अवध किशोर जड़िया का विशेष संदेश एवं डॉक्टर गायत्री जी का विशेष संदेश एवं शब्दों की कविताओं एवं कवयित्री के व्यक्तित्व पर दो शब्द आभा श्रीवास्तव के हैं।  विमल बुन्देला ने अपने आत्मकथ्य में अपनी सृजनात्मक मनोदशा का संक्षेप में उल्लेख किया है।

कवयित्री विमल बुंदेला की कविताओं की भाव भूमि बहुत गहरी है। उन्होंने अपनी हर बात को सीधे, सरल और स्पष्ट शब्दों में पिरोया है। यह कविताएं अलंकारिकता एवं छंदबद्धता की सभी शर्तों को पूरा भले ही न करती हों किंतु इनमें एक सहज प्राकृतिक लयबद्धता है जो इन कविताओं को न केवल पठनीय बनाती है, अपितु स्मरणीय भी बनाती है। इस कविता संग्रह के पेपर बैक संस्करण की कीमत रु.500/-  साहित्य प्रेमियों की बटुआ फ्रेंडली नहीं है। वैसे संग्रह की सभी कविताएं पाठक के हृदय से संवाद करने में सक्षम हैं। कविताओं का भाव सौंदर्य ही नहीं अभी तो भाषा सौंदर्य भी प्रभावित करने वाला है। लिहाज़ा कवयित्री श्रीमती विमल बुंदेला का यह संग्रह सभी को बहुत पसंद आएगा तथा विशेष रूप से वे कविताएं जिनमें उन्होंने आदि-अनादि प्रश्न उठाए हैं, वैचारिक भाव भूमि पर लंबे समय तक अपनी उपस्थिति दर्ज कराएंगी।
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Tuesday, June 16, 2026

पुस्तक समीक्षा | सॉनेट सागर - हिन्दी साहित्य में सॉनेट विधा को स्थापना और काव्यात्मक विस्तार | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
सॉनेट सागर - हिन्दी साहित्य में सॉनेट विधा को स्थापना और काव्यात्मक विस्तार  
समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह  - सॉनेट सागर
कवि        - डॉ. विनीत मोहन औदिच्य
प्रकाशक     - सर्वभाषा प्रकाशन, जे-49,गली नं.-38, राजापुरी (मेनरोड) उत्तमनगर,नई दिल्ली-110059
मूल्य       - 249/-
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सॉनेट विधा हिन्दी साहित्य के लिए हमेशा एक नूतन विधा रही है। यह माना जाता है कि सबसे पहले कवि त्रिलोचन शास्त्री ने इस विधा को हिन्दी में सम्मिलित किया। उनके समकालीन कुछ कवियों ने सॉनेट लिखे भी लेकिन फिर भी सॉनेट हिन्दी काव्य जगत में अपनी पैंठ नहीं बना सका। इधर विगत कुछ वर्षों से डॉ. विनीत मोहन औदिच्य ने सॉनेट के क्षेत्र में कड़ा महत्वपूर्ण कार्य किया है जिससे हिन्दी साहित्य में सॉनेट को स्थापना मिलने की संभावना बढ़ी है। डॉ. औदिच्य हिन्दी, अंग्रेजी एवं उर्दू के समर्थ ज्ञाता हैं। उन्होंने बेहतरीन ग़ज़लें ‘‘फ्रिक्र सागरी’’ के तख़ल्लुस से लिखी हैं। इसके साथ ही अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद कार्य में पाब्लो नरुदा के सॉनेट्स का अनुवाद कर के हिन्दी जगत को पाब्लो की काव्यात्मक विशेषताओं से परिचित कराया है। स्वयं  के मौलिक सॉनेट संग्रह तथा भारतीय सॉनेटियर्स एवं अंग्रेजी के 101 सॉनेटियर्स के सॉनेट्स के पुस्तक संपादन के बाद डॉ औदिच्य को यह महसूस होता है कि हिन्दी जगत को सॉनेट की संरचना की बारीकियों से भी अवगत होना चाहिए। हाल ही में उनका नवीनतम सॉनेट संग्रह ‘‘सॉनेट सागर प्रकाशित हुआ है जिसमें उन्होंने सॉनेट विधा के बारे में विस्तार से चर्चा की है। उन्होंने “सॉनेट काव्य विधा संरचना एवं हिन्दी साहित्य में प्रयोग” शीर्षक से लिखा है कि ‘‘काव्यात्मक एकाकी विचार की संक्षिप्त अभिव्यक्ति के लिए एक बौद्धिक या इन्द्रियजनित लहर जो भावनात्मक और लयबद्ध रूप से तीव्रता से अनुभव हो, सॉनेट एक सर्वाेत्तम माध्यम सिद्ध होगा। एक ऐसा साधन जो मधुरता और एकता के क्रांतिकारी नियमों के आधार पर निश्चित किया गया हो। उन पाठकों को जिन्हें सॉनेट साहित्य के क्षेत्र व तकनीक का ज्ञान नहीं है उन्हें इसके विकास व क्षमताओं से परिचित कराना समीचीन होगा। सॉनेट के अनेक इतिहासकार हुए हैं जिनके अपने मत व दृष्टिकोण हैं। इनमें सर्वप्रमुख कैपल लाफ्ट हैं जिन्होंने इस रोचक विधा का विशिष्ट अध्ययन किया। उन्होंने 1813-14 में मौलिक और अनूदित इटालियन सॉनेट संकलन ‘लौरा’ प्रकाशित किया। आर एच हाउसमैन ने 1833 में एक श्रेष्ठ संकलन निर्गमित किया। डाइस, लेह हंट, टामलिंसन, डी एम मेन, मिस्टर एस वैडिंगटन सहित मिस्टर डेनिस ने इंग्लिश सॉनेट्स के माध्यम से योगदान दिया। मिस्टर हाल कैन के सॉनेट्स आफ श्री सेन्चुरीज ने अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की। क्वार्टरली रिव्यू 1866, वे स्टमिनिस्टर रिव्यू 1871, द डब्लिन रिव्यू 1876-77 में सॉनेट साहित्य पर महत्वपूर्ण आलेख प्रकाशित हुए। इटली में लेंटीनी, पैट्रार्क तथा इग्लैंड में विलियम शेक्सपियर, विलियम वर्ड्सवर्थ, जान मिल्टन, स्पेंसर के अतिरिक्त अनेक देशों के कवियों ने सॉनेट काव्य विधा में लेखन कर इस विधा को लोकप्रिय बनाया। भारत में भी विभिन्न राज्यों में इस विधा को विविध स्वरूपों में लिखा जाता रहा है।’’ अपने इस लेख में डॉ. औदिच्य ने हिन्दी में सॉनेट छंद लिखे जाने के आधारभूत तत्वों को भी सामने रखा है। यह लेख सॉनेट विधा को जानने, समझने की दिशा में महत्वपूर्ण है।
‘‘सॉनेट सागर’’ में डॉ औदिच्य के कुल 51 सॉनेट संग्रहीत हैं। इस संग्रह के संबंध में ओड़िशा की सॉनेटियर व कवयित्री अनिमा दास ने “सॉनेट सागर; एक अनंत यात्रा” शीर्षक से भूमिका में लिखा है कि “प्रस्तुत नवीन संग्रह ‘सॉनेट सागर’ सॉनेटियर विनीत मोहन जी की एक अद्भुत यात्रा धारा है। इस संग्रह में लिपिबद्ध समस्त सॉनेट्स कई भाव, विचार, विषय की विस्तृत परिभाषा है। सॉनेट के मूलतः कई तत्व होते हैं जिसमें प्रमुख है मीटर, गेयता, विशिष्ट तुकांत, भाव, एक स्वतंत्र विचार, रूपक, प्रतीक, बिम्ब एवं रहस्य। 14 पंक्तियों की किसी भी कविता को सॉनेट नहीं कहा जा सकता। सॉनेट का अन्य एक रूप है जिसे अनियंत्रित रूप कहा जाता है, जिसमें उपरोक्त सभी तत्व होते हैं किंतु छंद के नियमों से मुक्त होते हैं। डॉ. विनीत मोहन जी ने सॉनेट के दोनों रूपों को सम्पूर्ण विशेषता देते हुए कई सृजन किए हैं।”
पुस्तक में अनिमा दास ने “सॉनेटियर एवं ग़ज़लकार प्रो. (डॉ.) विनीत मोहन औदिच्य उर्फ फ़िक्र सागरी: एक परिचय” शीर्षक से डॉ. विनीत मोहन औदिच्य का विस्तृत परिचय भी दिया है। डॉ औदिच्य बिना शोर मचाए नेपथ्य में रहते हुए सतत सृजनशील हैं। फिर भी उन्हें अनेक राष्ट््रीय स्तर के पुरस्कार सम्मान मिल चुके हैं। उनकी अब तक की प्रमुख कृतियां हैं- ग़ज़ल संग्रह - खुशबु-ए-सुखन (2014), कारवां-ए-सुखन (2021), अंदाज-़ए-ग़ज़ल (2022), तन्हाइयाँ आवाज़ देती हैं (2023), काव्य संग्रह काव्य प्रवाह (2015), भाव स्रोतस्विनी (2019), प्रथम सॉनेट संग्रह - 69 अंग्रेजी सॉनेटस का हिंदी अनुवाद कर ‘‘प्रतीची से प्राची पर्यंत’’ साझा संग्रह (2020), द्वितीय सॉनेट संग्रह - नोबेल पुरस्कार विजेत पाब्लो नेरुदा की ‘‘हंड्रेड लव सॉनेट्स’’ पुस्तक का हिन्दी अनुवाद ‘‘ओ प्रिया!!! (2021), तृतीय सॉनेट संग्रह ‘‘सिक्त स्वरों के सॉनेट’’ (118 सॉनेट्स) - 2022, चतुर्थ सॉनेट संग्रह ‘‘काव्य कादम्बिनी’’ - 2022 (101अंग्रेजी सॉनेट रचनाकारों के 135 सॉनेटस का हिंदी अनुवाद)। यह सुनिश्चित है कि डॉ औदिच्य द्वारा सॉनेट के लिए किया गया श्रम एवं मौलिक सॉनेट सृजन ही उन्हें हिन्दी साहित्य के इतिहास में स्थाई पहचान दिलाएगा।
डॉ. विनीत मोहन औदिच्य के सॉनेट्स में वैचारिक संवाद हैं, प्रकृति की सुंदर छटा है तथा विविध मानवीय व्यवहार हैं। संग्रह का पहला सॉनेट है “अदृश्य चक्षु” जिसमें उन्होंने लिखा है कि-
ऐसा कह दूँ कि मैं आनंद में हूँ, मिथ्या यह तथ्य नहीं
मैं ही जानता हूँ अग्नि-वन में कैसे होता श्वास रुद्ध
और दुखित मेरा जीवन है,  यह भी मेरा कथ्य नहीं
है ज्ञात मुझे कैसे काँटों की शय्या पर काया हो रही वृद्ध
इस प्रकार देखा जाए तो डॉ औदिच्य अपने सॉनेट में व्यष्टि से समष्टि की ओर बड़ी सहजता से बढ़ते चले जाते हैं। उनका अपना दुख-सुख जन-जन के दुख-सुख का प्रतिबिम्ब बन कर उभरने लगता है। इसी प्रकार उनके कुठ सॉनेट्स में नॉस्टेल्जिक शेड दिखाई देता है। जैसे एक सॉनेट है ‘‘प्रहेलिका’’। इसमें प्रकृति के लक्षणों में मानवीय भावनाओं की अद्भुत छटा का रूपक है-
कहीं दूर कानन में खिल उठा था फूल
सूखी नदी की देह से उड़ गई थी धूल
मंदार सा लाल लगा था तब आकाश
शीश झुका कर शशि बिखराया प्रकाश।
कह दिया था मेघ ने वह नहीं बरसेगा
नक्षत्रों में जलकर एक कल्प तरसेगा
आशा-अरण्य में रहेगा भौरों का गुंजार
मध्यरात्रि के स्वप्न में संभावना का नीहार।
कवि डॉ. विनीत मोहन औदिच्य प्रकृति की महत्ता को समझते हैं। उनकी संवेदनाओं में उस समय तीव्र आलोड़न उठता है जब प्रकृति को किसी भी प्रकार से चोट पहुंचाई जाती है। जैसे अपने एक सॉनेट में वे लिखते हैं कि-
रे मानव, अंधाधुंध वृक्ष काटे क्यों? चलो प्रकृति की ओर
उग आए कंक्रीट के जंगल, नहीं है जिनका कोई छोर
नंगे पर्वत, कठोर बंजर अवनि व सूखे सर नद-नदियाँ
है भूकंप का जोर भयंकर, वृक्षों पर मुरझाई कलियाँ।
कर्णकटु है प्रतिदिन बढ़ता शोर, रे कहाँ गई धरोहर?
जी रहें सभीत सारे थलचर, जलचर और नभचर
विषाक्त धुएँ में घुल रहा नवपल्लव का अमिय नीर
आ रही मृत्यु ध्वनि निकट, पीड़ित प्रकृति का वक्ष चीर।
जब हृदय व्यथित होता है तो ईश्वर की कृपा की आकांक्षा बढ़ जाती है। यूं भी भारतीय संस्कृति में ईश्वर की सत्ता को पूर्णतया स्वीकार किया गया है। श्रीराम के रूप में ईश्वर की छवि हर भारतीय के हृदय में बसती है। डॉ औदिच्य ने नया प्रयोग करते हुए सॉनेट में श्रीराम का स्मरण किया है। उनके सॉनेट ‘‘राम मेरे जीवन में’’ की कुछ पंक्तियां देखिए-
कहें राम का नाम... सुनें राम अभिराम
नित करे आराधना... हो कृतार्थ सर्वनाम
सरयु है प्राण... राम है तरणी... व निर्वाण
है आराध्य जो किया संसार का निर्माण
इस तरह देखा जाए तो संग्रह ‘‘सॉनेट सागर’’ में विषय की विविधता है तथा नूतनता है जिससे यह संग्रह रोचक बन गया है।
पुस्तक के दूसरे खंड में कवि की पूर्व प्रकाशित पुस्तकों की समीक्षाएं सहेजी गई हैं। यह समस्याएं हैं - “सिक्त स्वरों के सॉनेट”  संग्रह की समीक्षा “सॉनेट की विदेशी शैली का सुंदर भारतीय स्वरूप” - समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह, “ओ प्रिया” (पाब्लो नेरुदा की एक सौ प्रेम सॉनेट का हिंदी अनुवाद) की समीक्षा समीक्षक  प्रो. हरेराम पाठक,  प्रो. विनीत मोहन औदिच्य द्वारा अनूदित काव्य संग्रह रू अविरल बहती भाव स्रोतस्विनीश् की समीक्षा समीक्षक अनिमा दास, काव्य संग्रह “सिक्त स्वरों के सॉनेट” की समीक्षा समीक्षक डॉ. चंचला दवे, आंग्ल भाषा से हिंदी में  प्रो. विनीत मोहन औदिच्य द्वारा अनूदित सार्वकालिक श्रेष्ठ सॉनेट संग्रह “काव्य कादम्बिनी” की समीक्षा समीक्षक अनिमा दास, सॉनेट संग्रह “सिक्त स्वरों के सॉनेट” की समीक्षा समीक्षक विजय कुमार तिवारी, पाब्लो नेरुदा की एक सौ प्रेम सॉनेट का हिंदी में विनीत मोहन औदिच्य द्वारा अनूदित “ओ प्रिया” समीक्षक वीणा शर्मा वशिष्ठ, “ओ प्रिया” की समीक्षा समीक्षक मनोरमा जैन पाखी तथा ओ प्रिया” की समीक्षा समीक्षक: डॉ. शैलेष गुप्त वीर।
समीक्षाओं के उपरांत “श्री विनोद मोहन जी की लेखनी पर प्रबुद्ध साहित्यकारों की अन्य प्रतिक्रिया” शीर्षक से हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकारों की प्रतिक्रियाएं हैं यह साहित्यकार हैं अशोक बाजपेई, रामेश्वर कांबोज हिमांशु, डॉ प्रणव भारती, प्रभु दयाल मिश्र, डॉ (सुश्री) शरद सिंह, डॉ हरे राम पाठक, डॉ कविता नंदन, किशोर नायक, प्रताप नारायण सिंह, केशव मोहन पांडेय, अमरेश विश्विल, डॉ शैलेश गुप्त वीर, मनोरमा जैन पाखी, वीणा शर्मा वशिष्ठ, लिली मित्रा, डॉ छबिल कुमार मेहेर तथा अनिमा दास। पुस्तक के अंतिम परिशिष्ट में डॉ विनीत मोहन आदित्य को उनके कृतित्व के लिए दिए गए सारस्वत सम्मान की तस्वीर एवं सम्मान पत्र स्मृति चिन्ह आदि रखे गए हैं।
डॉ. विनीत मोहन औदिच्य का यह सॉनेट संग्रह ‘‘सॉनेट सागर’’ न केवल पठनीय है अपितु हिन्दी साहित्य में सॉनेट विधा को स्थापना सहित काव्यात्मक .   
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Tuesday, June 9, 2026

पुस्तक समीक्षा | उच्चशिक्षा जगत के स्याह पक्षों को उजागर करता है उपन्यास “पहाड़ का पाताल” | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा

उच्चशिक्षा जगत के स्याह पक्षों को उजागर करता है उपन्यास “पहाड़ का पाताल”

समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

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उपन्यास     - पहाड़ का पाताल

लेखक      - श्यामसुंदर दुबे

प्रकाशक    - ग्रंथलोक, 1/7342, नेहरू मार्ग, ईस्ट गोरख पार्क, शहदरा, दिल्ली-32

मूल्य       - 550/-

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पहाड़ को सभी देखते हैं लेकिन पहाड़ की जड़ों की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता है। जबकि पहाड़ जितना धरातल के ऊपर दिखाई देता है उससे कहीं अधिक धरातल के नीचे होता है। ठीक यही स्थिति व्यवस्था और मनुष्यों के चरित्र की होती है। ऊपर से जो कुछ जितना दिखाई देता है उससे कहीं अधिक अप्रत्यक्ष रहता है। अतः यदि पहाड़ है तो उसका पाताल भी होगा ही। कभी-कभी यह पाताल चौंकाता है, चमतना को झकणेर देता है। यही कहता है डॉ. श्यामसुंदर दुबे का उपन्यास ‘‘पाताल का पहाड़’’।  

जब किसी उपन्यास की चर्चा होती है तो मन-मस्तिष्क में एक विस्तृत कथानक की रूपरेखा उभरने लगती है। एक ऐसा कथानक जिसमें अनेक घटनाएं होंगी और अनेक पात्र। ये सभी जीवन से जुड़े हुए होंगे और कल्पना एवं यथार्थ के एक रोचक ताने-बाने से बुने हुए होंगे। निःसंदेह उपन्यासकार मानवजीवन से संबंधित सुखद, दुखद मर्मस्पर्शी घटनाओं को क्रमबद्धता के साथ प्रस्तुत करता है। वस्तुतः उपन्यास में एक ऐसी विस्तृत कथा होती है जो अपने भीतर अन्य गौण कथाएं समेटे रहती है। इस कथा के भीतर समाज और व्यक्ति की विविध अनुभूतियां और संवेदनाएं, अनेक प्रकार के दृश्य और घटनाएं और बहुत प्रकार के चरित्र हो सकते हैं, और यह कथा विभिन्न शैलियों में कही जा सकती है। शर्त ये है कि उपन्यासकार के पास जीवन दृष्टि होनी चाहिए। जीवन के यथार्थ का गहरा अनुभव होना चाहिए, सृजनात्मक कल्पना की अपार शक्ति होनी चाहिए, विचारों की गहनता होनी चाहिए और जीवन की विवेचना होनी चाहिए। ‘‘पहाड़ का पाताल’’ उपन्यास का जिज्ञासा जगाने वाला नाम है। उपन्यास का यह नाम एक व्यंजनात्मक नाम है जो पहाड़ की भांति ऊंचाई लिए हुए उच्चशिक्षा जगत की खोखली होती जड़ों के अंतरंग पक्षों की बात करता है। आज उच्चशिक्षा जगत से हर शिक्षित वर्ग संबंध रखता है। स्वयं नहीं तो अपने बच्चों की शिक्षा के जरिए। अतः उस उच्चशिक्षा जगत के सच को जानना भी ज़रूरी है। उच्चशिक्षा जगत के स्याह पक्षों की अपने उपन्यास के माध्यम से पड़ताल की है कथाकार,ललित निबंधकार एवं लोकविद डॉ.श्यामसुंदर दुबे ने। 

‘‘पहाड़ का पाताल’’ अपने आप में अनेक घटनाक्रम और अनेक पात्र समेटे हुए है। मूल कथानक मूलपात्र अपर्णा और आशुतोष के इर्दगिर्द ही घूमता है लेकिन इस परिक्रमा में ऐसे प्रसंग और ऐसे गोपन सामने आते हैं जो उपन्यास के उद्देश्य को बार-बार रेखांकित करते हैं तथा अन्य पात्रों को भी केन्द्र की ओर ले आते हैं। मूल कथा से कई अंतर्कथाएं जुड़ती जाती हैं लेकिन डॉ. श्यामसुंदर दुबे का लेखकीय कौशल कहीं भी क्रम-भंग नहीं होने देता है। उपन्यास लेखन की गंभीरता के संदर्भ में डॉ. रामदरश मिश्र का मानना रहा कि ‘‘उपन्यास एक हल्की-फुल्की विधा नहीं है जो संभव-असंभव घटनाओं और चटकीले-भड़कीले प्रसंगों की अवतारणा करती चलने वाली कथा के माध्यम से पाठकों का मनोरंजन करे, उपन्यास की वास्तविक शक्ति महान है। उसका उद्देश्य बड़ा है।’’

उपन्यास का आरंभ दो पुराने सहपाठी आशुतोष और अपर्णा की परस्पर पुनः भेंट से होता है। दोनों के बीच अतीत के पन्ने खुलने लगते हैं और उनमें से ऐसे चरित्र झांकने लगते हैं जो उच्चशिक्षा के श्वेत-स्याह पहलुओं को तार-तार कर के सामने रख देते हैं। शोधकार्य करने वाले विद्यार्थियों का कतिपय मार्गनिदेशकों द्वारा शोषण किए जाने की घटनाएं यदाकदा सामने आती रही हैं। विशेषरूप से महिला शोधकर्ताओं को उस समय विकट समस्या का सामना करना पड़ता है जब उनका पाला किसी देहलोलुप मार्गनिदेशक से पड़ जाता है। यदि वे अपना शोधकार्य छोड़ती हैं तो उनका भविष्य दांव पर लग जाता है और यदि वे शोधकार्य जारी रखती हैं तो उनके सामने दो विकल्प रहते हैं कि या तो वे अपना मार्गनिदेशक बदल लें या फिर परिस्थितियों से समझौता कर लें। मार्गनिदेशक बदलना सुगमकार्य नहीं होता है। इसका कारण बताना जरूरी होता है जोकि किसी भी महिला शोधार्थी को दुविधा की स्थिति में डाल देता है। निःसंदेह, यह उच्चशिक्षा जगत का एक घिनौना पक्ष है। इस दुराव्यवस्था के चलते कई बार योग्य शोधार्थी पीछे रह जाते हैं और अयोग्य शोधार्थी आगे बढ़ते चले जाते हैं। जो स्वयं योग्य नहीं है वह विद्यार्थियों को कैसे योग्य बनाएगा, यह एक विचारणीय प्रश्न है। किन्तु यही एक प्रश्न नहीं है जिस पर सोचने की आवश्यकता है। और भी प्रश्न यह उपन्यास सामने रखता है। जैसे प्रोफेसर साहब के ‘‘प्रताप’’ से आसानी से पीएच. डी. की उपाधि उनके हर ‘‘सेवक’’ को मिल जाना। इस संदर्भ में बड़ा रोचक वर्णन किया है उपन्यासकार ने -‘‘पंडित बनवारी लाल का प्रताप चतुर्दिक व्याप्त था। इस प्रताप के ताप से हिन्दी का मुख जसवंत नगर की झील में शुभ्र सरसिज-सा खिल रहा था। यहां एक बार जो आ गया फिर वह डॉक्टर ऑफ फिलासफी हो कर ही जाता था। इस उपलब्धि की व्याधि में फंसे दो-दो पंचवर्षीय योजनाओं वाले बजरबट्टू निखट्टू को सीनियर्स की चप्पलें घिसते, ज़र्दा लसियाते और किसी न किसी लड़की को गसियाते यहां के सहेट स्थलों पर बिलानागा पाया जा सकता था।’’

विश्वविद्यालय परिसर में प्रेमलीलाओं के प्रसंग न हों, यह संभव नहीं है। युवावस्था में प्रेम स्वाभाविक मनोभाव है और महाविद्यालय या विश्वविद्यालय इसके लिए सबसे ‘‘हॉट प्लेस’’ कहे जा सकते हैं। प्रस्तुत उपन्यास में कुछ दशकों पहले के विश्वविद्यालयीन प्रेमप्रसंगों का वर्णन है और यथानुसार उन स्थलों का भी दिलचस्प विवरण दिया गया है जहां छात्र-छात्राएं परस्पर प्रेमालाप कर पाते थे। डॉ दुबे लिखते हैं कि  ‘‘लायब्रेरी का अंतरंग, पहाड़ी की ढलानों के झुरमुट और कैंटीन का डार्क कॉर्नर ऐसे ही रस प्लावी अभिसार केन्द्र थे। सरेराह लड़कियां गठियाने के अवसर वर्जित थे। जमाना ज़रा दूसरे किस्म का जो था।’’

यहां मुंशी प्रेमचंद का यह कथन स्मरण हो आता है कि ‘‘मैं उपन्यास को मानव-जीवन का चित्र समझता हूं। मानव-चरित्र पर प्रकाश डालना और उसके रहस्यों को खोलना ही उपन्यास का मुख्य स्वर है।” इस स्वर को उपन्यासकार श्यामसुंदर दुबे ने बखूबी साधा है। उपन्यास में वर्णित कुछ नाम वास्तविक न हो कर भी बहुत जाने-पहचाने से लगते हैं। एक उद्धरण देखिए -‘‘विषय विशेषज्ञ के रूप में हिन्दी के जाने-माने विद्वान डॉ. हेमेन्द्र और डॉ. सियावर सिंह आए थे। इन दोनों का आतंक उन दिनों हिन्दी क्षेत्र में छाया हुआ था। इनका दबदबा ऐसा था कि किसी अदना से अदना साहित्यकार की पहली कितबिया को ये मुक्तिबोध की डायरी के समक्षक स्थापित कर देते थे। इस तरह की स्थापना सुन कर हिन्दी जगत सकते में आ जाता था। अकसर ऐसे सकते आते-जाते रहते थे और इन दोनों के कारण हिन्दी जगत अपने इतिहास विषयक अनेक अनिर्णयों में लटका रहता था। इन लटकाऊ लोगों की पैंठ कहां नहीं थी? ये पुस्तक चयन समिति, विदेश-यात्रा समिति, राजभाषा समिति, पुरस्कार समिति जैसी सैंकड़ों समितियों के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष पद सुशोभित किए हुए थे।’’

इन व्यंजनात्मक पंक्तियों में वर्णित दोनों व्यक्तियों के यथार्थ को वे पाठक सहज ही भांप सकते हैं जो हिन्दी साहित्य की आलोचनात्मक गतिविधियों से किसी न किसी रूप में जुड़े हुए हैं। जो सीधेतौर पर नहीं जुड़े हैं अथवा वास्तविक जीवन में उनसे अनभिज्ञ हैं, वे भी आसानी से समझ सकते हैं कि ऐसे ख्यातिलब्ध व्यक्ति विश्वविद्यालयों में प्राध्यापक चयन प्रक्रिया को किस तरह प्रभावित करते हैं। कुलमिला कर एक सौदा-सा होता है चयनकर्ताओं के बीच कि तुम मेरे उम्मीदवार का चयन करो और मैं तुम्हारे उम्मींदवार का चयन कर दूंगा। यहां उम्मीदवारों के पक्षधरों की योग्यता उम्मीदवारों की योग्यता पर भारी पड़ जाती है। यह भी एक स्याह पक्ष है विश्वविद्यालयीन जगत का।

उपन्यास में छात्रों की वह दुनिया भी है जो सीनियर्स का वरदहस्त मिल जाने पर हर तरह के कार्यकलाप करने को स्वतंत्र हो जाते हैं, साथ ही अपने सीनियर्स के हर काम करने को मुस्तैद रहते हैं। छात्रसंघ और छात्रसंघ के चुनाव दोनों में ‘‘शागिर्द’’ छात्रों की अहम भूमिका रहती है। इन्हीं ‘‘शागिर्द’’ छात्रों में सबसे योग्य छात्र आगे चल कर छात्रसंघ का नेतृत्व करता है। यह गांव से आने वाले छात्रों के लिए एक मायावी दुनिया होती है जहां उन्हें नए सिरे से जीना सीखना पड़ता है। कथानक में ऐसा ही एक छात्र अनिल है जिसे विश्वविद्यालय परिसिर में प्रवेश करते ही अपने सीनियर रामसुजान सिंह की ‘‘कृपा’’ प्राप्त हो गई और उसे उन तमाम परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ा जो एक नए छात्र को सीनियर्स के कारण होती है। इसी पात्र अनिल जब प्रो. अनिल बन जाता है तो वह विवाहित होते हुए भी छात्रा शुभ्रा के मोह में पड़ जाता है जो कि वस्तुतः प्रेम नहीं दैहिक आकर्षण मात्र था।

व्याख्यानों की परिपाटी की अंतर्कथा सामने रखते हुए उपन्यासकार ने करारा कटाक्ष किया है। प्रो. अक्षर मार्तंड ऐसे ही एक पात्र हैं जो दूसरे शहरों में जा कर व्याख्यान देने को ही अपना प्राध्यापकीय कर्म मनते हैं। उनका विवरण देखिए-‘‘वे हमें साकेत पढ़ाते थे लेकिन कक्षाओं में कम ही दिखते थे। दिख जाते तो अपनी फाईल में रखे ओल्ड स्टूडेंट्स के नोट्स से ही वे हमें पढ़ाते थे। वे अक्सर व्याख्यान देने के लिए बाहर जाते रहते थे। जब कोई प्रोफेसर व्याख्यान देने बाहर जाता था तब उसे कर्त्तव्य अवकाश दिया जाता था। कर्त्तव्य अवकाश की इस सुविधा ने प्रो. अक्षर मार्तंड को व्याख्यान दिग्विजयी बना दिया था। कार्यालय का लिपिक जानता था कि अब की बार प्रो. अक्षर मार्तंड कौन-सी संस्था में व्याख्यान देने का प्रमाणपत्र लाएंगे। उनके अब तक के गौशाला, मूकबधिर पाठशाला उज्जैन में गर्दभ मेले में व्याख्यान देने के प्रमाणपत्र काफी चर्चित हो चुके थे।’’

उपन्यास में दो और महत्वपूर्ण पात्र हैं जो विश्वविद्यालय परिसर से हट कर भी परिसर से जुड़े हुए हैं। ये पात्र हैं- काजू सपेरा और बेड़नी फुलमतिया। काजू सपेरा का कंट्रास्ट जीवन और फुलमतिया के जीवन की त्रासद घटनाएं उपन्यास में एक अलग ही रंग भरती हैं तथा मूल कथानक के परिवेश को और सम्पन्नता प्रदान करती हैं। फुलमतिया के साथ डकैतों का भी प्रसंग है जो तत्कालीन अपराधकथा के परिदृश्य को सामने रखता है। प्रो. प्रमोद शंकर, मेडम कस्तवार आदि कई पात्र हैं जो अपनी छोटी-बड़ी उपस्थिति से मूलकथानक को सफलतापूर्वक गतिप्रदान करते हैं।

उपन्यासकार ने शुभ्रा और काजू सपेरा के बहाने आगामी समय का भी आकलन करने से गुरेज़ नहीं किया है-‘‘इतना निश्चित है कि आगामी जो समय है, वह पुरुषार्थहीन महत्वाकांक्षाओं का समय है। यह अकर्मण्यता एक ऐसी अपसंस्कृति को जन्म दे सकती है जिसमें और तो और बच्चियों की देह के भूखे भेड़िए अनेक तरह की चालें चल कर अपना मतलब सिद्ध करते रहेंगे। भगवान बचाए ऐसे समय से।’’  

‘‘पहाड़ का पाताल’’ के लेखक श्यामसुंदर दुबे स्वयं लगभग चालीस वर्ष तक उच्चशिक्षा विभाग में प्रोफेसर एवं प्राचार्य के पद पर रहे हैं अतः उच्चशिक्षा जगत के कोनों-कतरों से भी वे बखूबी वाक़िफ़ हैं। वे सागर विश्वविद्यालय में मुक्तिबोध सृजनपीठ के डायरेक्टर भी रह चुके हैं। उनसे विश्वविद्यालयीन जगत की कमियां एवं ख़ामियां छुपी नहीं हैं। उन्होंने जिस रोचक ढंग से उच्चशिक्षा जगत की दुरावस्थाओं की बखिया उधेड़ी है वह अपने-आप में अनूठी है। उपन्यास की भाषा कथानक और पात्रों के अनुरूप  हिन्दी, उर्दू, अंग्रेजी के साथ-साथ देशज शब्दों से परिपूर्ण है। उपन्यास में सुरुचिपूर्ण विस्तार है, रोचकता है, और विचार-विमर्श के लिए अनेक ज्वलंत बिन्दु हैं। उच्चशिक्षा जगत के अंधेरे कोनों में झांकता यह उपन्यास प्रत्येक दृष्टि से दिलचस्प एवं बारम्बार पठनीय है।      

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Tuesday, June 2, 2026

पुस्तक समीक्षा | क्यों आई हो ! अब यहाँ? : मानवीय आदर्श रचती संदेशप्रद कहानियां | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा 
क्यों आई हो ! अब यहाँ? : मानवीय आदर्श रचती संदेशप्रद कहानियां 
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक - क्यों आई हो! अब यहाँ?
लेखक - आर. के. तिवारी
प्रकाशक-एन.डी.पब्लिकेशन, नई दिल्ली
मूल्य - 150/-
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कहानी समाज का सच बयान करती है, चाहे प्रेमचंद की ‘कफन‘ कहानी हो या चंद्रधर शर्मा गुलेरी की ‘उसने कहा था‘ या फिर उर्मिला शिरीष की ‘हरा पत्ता‘। हर कहानी का अपना एक सच होता है, भले ही उसे कहानी की शैली में कल्पना का मिश्रण हो, फैंटेसी हो लेकिन सच उसके मूल में समाया रहता है। कथाकार समाज से ही कथानक चुनता है और एक ऐसा मनोविज्ञान रचता है जो कहानी के पात्रों की मनोदशा से पाठकों को सीधे जोड़ा जा सके। मां की लोरी के बाद कहानियां ही वह साहित्यिक चेष्टाएं होती हैं जो बाल मन को दुनिया का पाठ पढ़ती हैं और भले-बुरे की समझ पैदा करती हैं। इसलिए कथा साहित्य के महत्व को नकारा नहीं जा सकता चाहे कहानी अपने आकार में छोटी हो या बड़ी, कठिन भाषा में लिखी गई हो या सरल भाषा में, उसमें मौजूद संदेश ही उन कहानियों की आत्मा होती है।

बैंक से सेवानिवृत्ति के बाद  अपने जीवन की दूसरी पारी में ‘‘हल्ला कन्हैया का‘‘  भजन संग्रह लिखने के बाद कथा साहित्य के क्षेत्र में धीरे-धीरे अपनी उपस्थिति दर्ज कराते गए और आज सागर साहित्य जगत में एक परिचित नाम हैं कहानीकार आर. के.  तिवारी। 74 वर्ष की आयु में उनकी दसवीं पुस्तक कहानी संग्रह के रूप में ‘‘क्यों आई हो! अब यहां?‘‘ प्रकाशित हुई है। यह उन सभी के लिए एक प्रेरणादायक उपलब्धि है जो अपने जीवन की दूसरी पारी में हताश, निराश हो जाते हैं उनके लिए आर.के. तिवारी का लेखन एवं सक्रियता एक अनुपम उदाहरण है कि जीवन को साहित्यिक उल्लास के साथ भी जिया जा सकता है। इसके पूर्व उनका एक काव्य संग्रह, तीन लघु उपन्यास, चार लघुकथा संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। 
‘‘क्यों आई हो! अब यहां?‘‘ कहानी संग्रह में कुल 21 कहानी है जो अलग-अलग शेड्स की हैं। कथन को में विषय की विविधता किसी भी कहानी संग्रह को रोचक बना देता है। यह कहानियां हैं - नसीब, कर्नल रंजीत और सिया, कोरबा थाने का सिपाही, रामरति एक आन्दोलन का नाम, मेरी बड़ी भाभी, दीपा की सहेली, कुल का बुझा हुआ दीया, गहरा जख्म, सुगना की बहू और एक शिकारी, कुरवाई वाली भाभी, चूहा पचरंगी, बेटा में तेरी माँ हूँ डायन नहीं, छोटी बहन, ट्रक ड्राइवर एवं फूलझड़ी, मेरी दादी माँ, पापी, क्यों आई हो! अब यहाँ , खोटा सिक्का, कुंवर बाई रतनगढ़, सलवार सूट वाली, पिता जी का चश्मा।
हर कहानी के पात्रों का अपना एक संघर्ष है, अपना एक मनोविज्ञान है। जैसे संग्रह की पहली कहानी जिसका शीर्षक है ‘‘नसीब‘‘ एक ऐसे युवा की कहानी है जो परिस्थितिवश अपनी भावनाओं पर नियंत्रण नहीं रख पाता है और अपने ऊपर लगाए गए झूठे आरोप के प्रतिकार में अपराध कर बैठता है। यह कहा भी जाता है कि कोई भी अपराधी जन्म से अपराधी पैदा नहीं होता है परिस्थितियां उसे अपराध में लिप्त कर देती हैं। किसी भी युवा लड़के पर छेड़छाड़ का झूठा आरोप लगाना और फिर उसे उसके सहपाठियों द्वारा निरंतर ताने मारा जाना उसकी उस मनोदशा को स्पष्ट करता है जहां एक ईमानदार सच्चरित्र युवा मानसिक रूप से हताहत होकर अपना आप खो बैठता है। उस समय उसे अच्छे या बुरे परिणाम का ख्याल भी नहीं आता है। यह कहानी एक ऐसा मनोवैज्ञानिक परिदृश्य रचती है जहां समाज का वह पक्ष उभर कर सामने आता है जिसमें सिर्फ सुनी सुनाई बात को स्वीकार करके किसी भी व्यक्ति को प्रताड़ित किया जाने लगता है। 
‘‘क्यों आई हो! अब यहां?‘‘ के आरंभिक  पृष्ठों  में ‘‘समीक्षा‘‘  शीर्षक के अंतर्गत समाजसेवी एवं लेखिका डॉ. नीलिमा पिम्पलापुरे ने संग्रह की कहानियों पर विस्तृत प्रकाश डालते हुए लिखा है- ‘‘आर. के. तिवारी जी की लेखनी न केवल भावनाओं को छूती है, बल्कि सामाजिक अन्याय, गरीबी, पारिवारिक रिश्तों के सम्बन्धों जैसे गम्भीर विषयों पर सम्पूर्ण एवं वास्तविक सच्चाई को दर्शाती है। वरिष्ठ साहित्यकार तिवारी जी की हर कहानी सरल, सहज और संवेदनशील है। प्रत्येक कहानी एक रोचक ढंग से लिखी है। जो पाठक को बाँधकर रखती है। कहानियाँ सैद्धान्तिक और समाज के नैतिक मूल्यों पर आधारित उनका संदेश बताती है।‘‘
संग्रह की दूसरी कहानी है ‘‘कर्नल रंजीत और सिया‘‘। यह कहानी पाठकों को एक अलग धरातल पर ले जाती है जहां जीवन का आदर्श अपने सुंदर रूप में प्रकट होता है तथा प्रेरणास्पद आचरण की पैरवी करता है। अति गरीब परिवार की बालिका जो मिलिट्री हेलीकॉप्टर छलांग लगाते समय पैराशूट न खुलने से हताहत हो जाता है उस कर्नल की जान बचाती है। सिया नाम की उस बालिका का गरीब पिता जो बकरियां चरा कर और महुआ बेचकर अपने परिवार का पेट पालता था, कभी कल्पना भी नहीं कर सकता था कि उसकी बेटी एक दिन पायलट बनेगी। सिया के द्वारा जान बचाने पर जख्मी कर्नल रंजीत एक दिन वापस आता है और सिया को उसके उसे भविष्य की ओर ले जाता है जहां पायलट सिया के रूप में एक दिन उसे देश सेवा करनी थी। आज जब लोग स्वार्थ में डूबे हुए हैं। एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की मदद तभी करता है जब उसे बदले में कुछ पाने की उम्मीद होती है। ऐसे शुष्क समय में यह कहानी आशा का एक नया रंग भरती है। ‘‘कोरबा थाने का सिपाही‘‘ भी इसी शेड की कहानी है जो एक मानवीय आदर्श रचती है। 
‘‘रामरति एक आन्दोलन का नाम‘‘ उस स्त्री की कहानी है जो न केवल जंगली जानवरों से अपने गांव के लोगों को बचाने का रास्ता सुझाती है बल्कि आगे चलकर वह अपने गांव में स्कूल और स्वास्थ्य केंद्र स्थापित करवाने में भी सफल रहती है। इस प्रकार वह अपने गांव वालों को एक नया जीवन जीने का अवसर प्रदान करती है। कहानी ‘‘मेरी बड़ी भाभी‘‘ की बड़ी भाभी परिवार की जड़ों को बचाए रखने और संस्कारों को बनाए रखने के लिए कटिबद्ध रहती है, भले ही इसके लिए उसे अपने परिजनों से भी वैचारिक संघर्ष करना पड़ता है। ‘‘दीपा की सहेली‘‘ कहानी वैवाहिक ठगी की घटना पर आधारित है। जिससे निकलने का रास्ता भी कहानी में सुझाया गया है। 
“कुल का बुझा हुआ दीया” एक मर्म स्पर्शी कहानी है जो मन को द्रवित  करने में सक्षम है। “गहरा जख्म”, “सुगना की बहू”, “और एक शिकारी”, “कुरवाई वाली भाभी”, “चूहा पचरंगी” आदि शेष कहानी कथानक के विविध संवाद रचती हैं। यह सभी कहानियां छोटी है किंतु रोचक एवं संदेशवाहक हैं।
संग्रह की शीर्षक कहानी “क्यों आई हो! अब यहाँ?” उस वर्तमान परिदृश्य की कहानी है जिसमें बहू-बेटे अपनी मां को बोझ समझकर अपने साथ नहीं रखना चाहते और गांव में छोड़ आते हैं। बाजारवाद की आंधी दौड़ ने व्यक्ति को इतना स्वार्थी और सुविधा भोगी बना दिया है कि उसे अपने खून के रिश्ते भी दिखाई नहीं देते हैं। मां और बेटे का अटूट संबंध भी टूटता, चटकता नजर आता है। न बेटे को अपनी बीमार बूढी मां की परवाह है और न बहू को। बस, एक पोता है जो अपनी दादी की दशा देखकर विचलित हो जाता है। वह दादी की हर संभव सहायता करना चाहता है। परंतु उसे छोटे बालक के वश में सब कुछ तो नहीं है, अपने माता-पिता के प्रति सिर्फ एक आक्रोश है जो उसके भीतर पलता, बढ़ता है और दादी की मृत्यु पर यही आक्रोश लावा बनाकर फट पड़ता है। यह कहानी इस बात के लिए प्रेरणा देती है कि अपने बुजुर्गों की अवहेलना नहीं करना चाहिए अन्यथा बाद में चाह कर भी कोई गलती सुधारी नहीं जा सकती है, कोई पश्चाताप नहीं किया जा सकता है। इस कहानी के शीर्षक पर इस कहानी संग्रह का नाम है जो कि जिज्ञासा जगाने वाला है और पाठक को अपनी और सहज ही आकर्षित करता है।
आर.के. तिवारी की कहानियों में गहरी संवेदनात्मक पकड़ है। यह कहानियां बिगड़ी हुई सामाजिक पारिवारिक स्थितियों को सुधारने का आग्रह करती हैं और मार्ग भी दिखती हैं। इप कहानियों में कथाशिल्प से उपजी व्यंजना और अलंकारिकता भले ही कम है किंतु चेतन-अवचेतन से संवाद की भरपूर क्षमता है। कथाकार आर.के. तिवारी की लेखक की सक्रियता को रेखांकित करते हुए लेखक और वक्ता डॉ. आशीष द्विवेदी  ने संग्रह की भूमिका में लिखा है कि - ‘‘करीब आधे दशक से श्रीमान राजकुमार तिवारी जी सतत लिख रहे हैं, अब तक अर्जित अपनी संपूर्ण मेधा शक्तिको उन्होंने लेखन में झोंक दिया है। जो अंगुलियां ताजिंदगी बैंक में करेंसी गिनती रहीं सेवानिवृत्त होने के उपरांत उन्होंने कलम उठा ली, सरस्वती के साधक बन गए। एक अनोखा रूपांतरण! उनकी सृजन सक्रियता अलबेली है, जिसमें कहानी, कविता के साथ तनिक व्यंग्य भी हैं।‘‘
आर. के. तिवारी की भाषा सीधी सरल और आम बोलचाल की भाषा है। ‘‘क्यों आई हो! अब यहां?‘‘ कहानी संग्रह की कहानियां रोचक एवं पठनीय होने के साथ ही मानवीय आदर्श रचती हुई संदेशप्रद हैं। वस्तुतः इन कहानियों से हो कर गुजरना आज के समाज के हर व्यक्ति के लिए स्वयं की अंर्तआत्मा का आकलन करने की भांति है। 
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Tuesday, May 26, 2026

पुस्तक समीक्षा | छः समीक्षात्मक वैचारिक द्वारों से गुज़रती एक कहानी “हरा पत्ता” | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
छः समीक्षात्मक वैचारिक द्वारों से गुज़रती एक कहानी “हरा पत्ता”
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक - हरा पत्ता - उर्मिला शिरीष की कहानी
सम्पादक - हरि भटनागर, बृजनारायण शर्मा
प्रकाशक - रचना समय, 197, सेक्टर-बी, सर्वधर्म कॉलोनी, कोलार रोड भोपाल - 462042 (मध्यप्रदेश)
मूल्य - 100/-
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हिंदी साहित्य जगत अथवा हिंदी साहित्य से संबंधित पत्रिकाओं में ऐसी उदारता कम ही देखने को मिलती है जब किसी रचनाकार की किसी एक रचना को केंद्र में रखकर पूरी एक पुस्तिका प्रकाशित की जाए। मेरे संज्ञान में यह किसी भी पत्रिका का पहला अवदान है कि एक पुस्तिका जिसमें सिर्फ एक कहानी पर सामग्री केंद्रित रखी गई हो, अन्यथा किसी रचनाकार के समग्र साहित्य अथवा किसी एक संग्रह पर पुस्तिकाएं प्रकाशित की जाती रही हैं। वरिष्ठ कथाकार एवं अनुभवी संपादक हरि भटनागर के संपादन में ‘‘रचना समय’’ ने वह पुस्तिका प्रकाशित की है जिसमें हिंदी साहित्य की प्रतिष्ठित कथाकार उर्मिला शिरीष की एक चर्चित कहानी ‘‘हरा पत्ता’’ पर समीक्षात्मक  लेखों सहित कहानी को प्रकाशित किया गया है। यह कहानी पूर्व में मैं उर्मिला शिरीष के कहानी संग्रह में पढ़ चुकी हूं इसीलिए जब ‘‘रचना समय’’ की यह पुस्तिका मेरे हाथों में आई तो मुझे सुखद लगा क्योंकि यह कहानी मुझे भी उस संग्रह की एक महत्वपूर्ण कहानी लगी थी। यह एक ऐसी कहानी है जो पाठक का ध्यान अपनी ओर न केवल आकर्षित करती है बल्कि देर तक सोचने को विवश करती है। “उस बहार का इंतज़ार” कहानी संग्रह की चौथी कहानी है “हरा पत्ता”। उर्मिला शिरीष के 11 कहानियों के संग्रह की समीक्षा करते समय मैंने कहानी “हरा पत्ता” के संबंध में लिखा था- “यह कहानी विदेश में बस गए बेटे-बेटियों के पास जाने के लिए ग्रीन कार्ड हासिल करने की जद्दोजहद का खुलासा करती है। एक मायावी संजाल ही तो है ग्रीन कार्ड, जिसके मोह से बाहर निकलना कठिन है, लेकिन जिसकी वास्तविकता समझने के बाद धुंधला पड़ने लगता है मोह और तब शुरू होता है एक गाढ़ा अंतर्द्वंद। विदेश में बसी संतानों के पास जाने के लिए स्वर्ग द्वार के समान ग्रीन कार्ड पाने का मोह छोड़ना क्या संभव है? यह कहानी मनष्चेतना की आंखें खोलती है और एक नई संभावना सामने रखती है।”
“यह पुस्तिका” शीर्षक से संपादक हरि भटनागर ने लिखा है तोलस्तोय की एक कहानी है “हाऊ मच लैंड डज़ ए मेन नीड” की याद दिलाई है कि किस प्रकार एक इंसान जमीन पाने के लालच में दौड़ता चला जाता है और अंत में एक बड़ी जमीन उसके हिस्से में आती है किन्तु इसके साथ ही वह थक कर मर चुका होता है। हरि भटनागर कहा है कि लालच की इस अंतहीन दौड़ में एक ठहराव आना ही चाहिए और यही तो कहानी ‘हरा पत्ता’’ का आग्रह है।
जैसा कि मैंने पहले ही उद्धृत किया कि इस पुस्तिका में एक कहानी है और उस कहानी पर छः साहित्यकारों के विचार हैं जिनसे कहानी के प्रत्येक पक्ष पर भरपूर प्रकाश पड़ता है। क्रमवार सबसे पहले कहानी है, उसके बाद उससे संबंधित 6 लेख इस प्रकार हैं- उर्मिला शिरीष की कहानी: हरे पत्ते का यथार्थ - सूरज पालीवाल, एक बहुआयामी और प्रासंगिक कहानी: हरा पत्ता - अरुण होता, हरा पत्ता: कहानी को इस तरह ‘‘देखिए’’ - सुधांशु गुप्त, ग्लोबलाइज़ेशन द्वारा रचे गये यथार्थ के, प्रतिरोध की कहानी: हरा पत्ता - हरियश राय, समृद्धि के बंजर से स्वत्व के अंकुरण तक - प्रज्ञा, घर छूटने से मुरझाया: हरा पत्ता - अंकित नरवाल।
कहानी हरा पत्ता उस बुजुर्ग दंपति की कथा है जिसने बड़ी मेहनत और आशाओं के साथ अपनी संतान को पाल-पोसकर इस योग्य बनाया कि वह विदेश में जाकर नौकरी कर सके तथा वहां सुखपूर्वक रह सके। संतान ने भी सोचा कि उसके माता-पिता उसके पास आकर रहें और उसके साथ विदेश में ही बस जाएं। यहीं से शुरू होता है हरे पत्ते का खेल। हरा पत्ता यानी “ग्रीन कार्ड” जो कि विदेश में बसने के लिए जरूरी है। लंबी-चौड़ी लिखा-पढ़ी, जांच-पड़ताल और एंबेसी के धक्के खाने के बाद आखिर वह दिन आ जाता है जब ग्रीन कार्ड पानी के लिए अंतिम औपचारिकता निभाई जाने वाली रहती है। यह औपचारिकता भी आसान नहीं है। वृद्ध पिता लंबी कतार में प्रतीक्षा करते हुए चिंतन करता है और उसके मन में प्रश्न उठता है कि वह अपना देश छोड़कर हमेशा के लिए विदेश जाने का जो कदम उठा रहा है क्या वह उचित है अथवा नहीं? एक मंथन, पत्नी द्वारा एक प्रतिरोध, बच्चों के रूठ जाने का भय इन सब से पार पाना आसान नहीं था। कहानी का अंत चौंकाता है और पढ़ने वाले के मन में अनेक विचार चस्पा करता हुआ अपने क्लाइमेक्स पर पहुंचता है। इस कहानी के पात्र मेच्योर हैं विचारशील है और  उनमें जिंदगी की गहरी समझ है। लेखिका ने जिस प्रकार एक लंबे संघर्ष और एक गहरे अंतर्द्वंद्व के बाद जिस प्रकार निर्णय तक पहुंचा है वह रोचकता से भरा हुआ है। पाठक जिज्ञास होकर सोचता है कि अब यह लोग क्या करेंगे? प्रश्न विकट है। निर्णय के लिए वह मानसिक कठोरता आवश्यक है जो एक झटके से उभरती है और बहुत कुछ कह जाती है।
सूरज पालीवाल ने अपने लेख “हरे पत्ते का यथार्थ”  लिखते हुए इस बात पर ध्यान आकर्षित किया है कि हमारी अर्थव्यवस्था पाश्चात्य अर्थव्यवस्था के मुकाबले कितनी कमजोर है। इसी कहानी से उदाहरण देते हुए स्मरण कराया है जब विदेश में बसी संतान अपने पिता के पास पैसे भेजते थे तो नोटों की गड्डियों से उनके हाथ भर जाते थे जबकि अपने देश में बेरोजगारी का अंतहीन सिलसिला है। यही कारण है कि चाहे माता-पिता हो या संतान सभी को हरे पत्ते का यानी ग्रीन कार्ड का लालच आकर्षित करता है। पूरे परिवार का सुखद भविष्य उसमें प्रतिबिंब की भांति चमकता है। सूरज पालीवाल ने कहानी की सार्थकता को रेखांकित करते हुए यह लिखा है कि यह कहानी मात्र एक पिता का उद्घोष नहीं बल्कि डॉलर की व्यर्थता के यथार्थ को भी सामने रखती है।
“एक बहुआयामी और प्रासंगिक कहानी हरा पत्ता” - यह उद्घोष करते हुए अरुण होता ने कहानी को वैचारिक स्तर पर टटोला है। उन्होंने हरा पत्ता को एक सहज और स्वाभाविक कहानी ठहराया है जिसमें संवाद धर्मिता के साथ भाषाई सौंदर्य भी है। अरुण होता ने कहानी में दो संस्कृतियों की सामाजिक, आर्थिक एवं परिवेशगत भिन्नताओं को पूरी गंभीरता से लेखबद्ध करने को कहानी की विशेषता कहा है।
“हरा पत्ता कहानी को इस तरह देखिए” - यह सुधांशु गुप्त का आग्रह है। उन्होंने एक अलग ही दृष्टि से कहानी को खंगाला है। उन्होंने उदाहरण के लिए स्मरण दिलाया है मुंबई में आकर बसने वाले उन हजारों लोगों के बारे में जो गांव से लगाव तो रखते हैं किंतु एक बार मुंबई में बसने के बाद कभी गांव लौट कर नहीं जाते। अपने गांव की यादों के साथ वह महानगर भी उनका अपना हो जाता है। इसी प्रकार विदेश में बसने वाले अपने देश लौटने की इच्छा तो रखते हैं लेकिन लौटने के नाम पर उनके पांव ठिठक जाते हैं। सुधांशु गुप्त ने कहानी के अंत को लेखिका की सदेच्छा के रूप में पाया है।
“ग्लोबलाइजेशन द्वारा रचे गए यथार्थ के प्रतिरोध की कहानी: हरा पत्ता” ठहराते हुए हरियश राय कहानी के कथानक में उभरे  द्वंद्व के लिए उस ग्लोबलाइजेशन को जिम्मेदार मानते हैं जो 1990 से पूरी दुनिया को प्रभावित कर रहा है। हमारा देश भी उससे अछूता नहीं है। डॉलर के हाथों गिरवी रखे रूपयों के समान बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पास गिरवी युवाओं का जीवन मुक्त होने के लिए छटपटाता है लेकिन साथ ही उन्हें अपने बंधन से मोह भी होने लगता है। इसी प्रकार अपने देश में छूट गए वृद्ध माता-पिता के समक्ष भी एक द्वंद्व खड़ा रहता है। जिसमें एक ओर उनकी संतान है जो विदेश में बस गई है और उन्हें अपने पास रहने को आमंत्रित कर रही है और दूसरी ओर उनका अपना देश है जहां उनकी अपनी संस्कृति, अपने लोग और अपनी चिरपरिचित समस्याएं हैं। दोनों के बीच चुनाव करने की स्थिति बहुत कठिन है। इस कठिनाई को पार करते हुए देखकर हरियश राय इस ग्लोबलाइजेशन के विरुद्ध प्रतिरोध की कहानी मानते हैं।
“समृद्धि के बंजर से स्वत्व के अंकुरण तक” शीर्षक से प्रज्ञा ने कहानी के यथार्थ को एक मजबूत धरातल ठहराया है। उन्होंने भौतिकवाद में जकड़ते जा रहे भारतीय समाज की दशा की ओर भी इंगित किया है। उन्होंने कथाकार कि उसे सचेत दृष्टि की ओर भी ध्यान आकर्षित किया है जो देसी विस्थापन और ग्लोबल विस्थापन के बीच सरकार होती घबराई हुई दुनिया का दृश्य रचती है। यही वर्तमान का यथार्थ है। प्रज्ञा के अनुसार यह कहानी विकास की अंधी दौड़ के बीच एक वैकल्पिक रास्ता सुझाती है।
“घर छूटने से मुरझाया हरा पत्ता” अंकित नरवाल इन शब्दों के साथ हमेशा के लिए देश छोड़ने और ग्रीन कार्ड धारक बनाकर विदेश में बस जाने को लेकर अपने देश के प्रति जगे हुए मुंह से उपजे वैचारिक ऊहापोह को इस कहानी का केंद्र मानते हैं। पहले बच्चे विदेश जाकर अपने लिए जमीन तलाश करते हैं और फिर उसे खाली जमीन में अपनापन भरने के लिए अपने माता-पिता को भी अपने पास बुला लेना चाहते हैं लेकिन क्या माता-पिता के लिए अपनी जड़ों से कट कर जाना इतना आसान है? इसीलिए अंकित नरवाल कहानी “हरा पत्ता” को तय शुदा अंत वाली कहानी परंपरा का अंत करने वाली कहानी निरूपित किया है।
उर्मिला शिरीष एक सशक्त कहानीकार हैं। उनकी कहानी ‘‘हरा पत्ता’’ ग्रीन कार्ड के संदर्भ में  वर्तमान सामाजिक संकट को बहुत गहराई से रेखांकित करती है और यह पुस्तिका जिसमें इस कहानी पर 6 विद्वानों के विचार संकलित किए गए हैं अपने आप में कहानी पर समग्र समीक्षात्मक कलेवर प्रस्तुत करते हैं। ‘‘रचना समय’’ तथा उसके संपादक हरि भटनागर, बृज नारायण शर्मा तथा उप संपादक सौमित्र बधाई के पात्र हैं जिन्होंने एक महत्वपूर्ण कहानी को पाठकों के चिंतन-मनन के लिए सामने रखते हुए समीक्षात्मक लेखों सहित एक पुस्तिका के रूप में प्रस्तुत किया है। यह हिंदी साहित्य में एक अच्छी पहल है जिसे सतत जारी रहना चाहिए।
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