पुस्तक समीक्षा
ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक रंगों से रंगे बुंदेलखंड से परिचित कराती पुस्तक
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक - बुन्देलखण्ड: मध्यप्रदेश की अमूल्य विरासत
लेखिका - डाॅ. नीलिमा पिंपलापुरे
प्रकाशक - एन.डी. पब्लिकेशन, बहादुरपुर, साउथ ईस्ट दिल्ली- 110044
मूल्य -350/- (पेपरबैक)
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बुंदेलखंड आदि काल से इतिहास एवं परंपराओं का धनी है। यह सच है कि इस क्षेत्र का पर्यटन-विकास उतना नहीं हो हुआ, जितना होना चाहिए था किन्तु अब इस ओर मध्यप्रदेश शासन का ध्यान गया है। लेखकों एवं इतिहासकारों ने बुंदेलखंड की विरासत को बचाने के लिए सतत शोधपूर्ण कलम चलाई है तथा विरासत को सहेजा है। इसी क्रम में सागर की लेखिका डाॅ नीलिमा पिंपलापुरे ने एक पुस्तक ‘‘बुंदेलखंड: द हार्टबीट आॅफ मध्यप्रदेश’’ का लेखन किया था जिसमें विश्व प्रसिद्ध छायाकार गणेश पंगारे द्वारा खींचे गए नयनाभिराम छायाचित्र थे। यह पुस्तक अंग्रेजी में थी। आवश्यकता थी ठीक उसी प्रकार की उपयोगी पुस्तक की हिन्दी भाषा में। इस आवश्यकता को महसूस करते हुए लेखिका नीलिमा पिंपलापुरे ने हिन्दी में अपनी नवीनतम पुस्तक प्रस्तुत की है जिसका नाम है- ‘‘बुंदेलखंड: मध्यप्रदेश की अमूल्य विरासत’’। इस पुस्तक में भी छायाकार गणेश पंगारे के छायाचित्र मौजूद हैं जिनके द्वारा बुंदेली विरासत के विविध रंगों को बारीकी से देखा और समझा जा सकता है।
बुंदेलखंड देश का वह क्षेत्र है जिसकी भौगोलिकता अपने आप में अनूठी है। इसके इतिहास में प्राचीनता है और यह कला में बेजोड़ है। इस क्षेत्र के बारे में इतिहासकार राय बहादुर सिंह ने लिखा था कि ‘‘बुंदेलखंड शौर्य एवं जीवटता का धनी है।’’ इसीप्रकार ‘‘बुंदेलखंड का संक्षिप्त इतिहास’’ पुस्तक लिखने वाले इतिहासकार गोरेलाल तिवारी का कथन था कि ‘‘बुंदेलखंड को जानने के बाद इससे प्रेम हो जाना स्वाभाविक है।’’ वहीं, डाॅ नर्मदा प्रसाद गुप्त बुंदेलखंड को प्रगैतिहासिक मनुष्यों से अद्यतन मानवों की विकास यात्रा का सटीक साक्ष्यमय उदाहरण मानते थे।
प्रागैतिहासिक काल से इंसानों ने बुंदेलखंड को अपने निवास के रूप में चुना। यहां स्थित गुफाचित्र इसका साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं। मृदभाण्ड तथा तांबे के सिक्के इसकी प्राचीनता की कथा कहते हैं। बुंदेलखंड श्रीराम के वनगमन पथ का अभिन्न हिस्सा रहा है तथा प्राचीन वैश्विक व्यापार के ‘‘सिल्क रूट’’ का एक प्रमुख केन्द्र रहा है। बुंदेलखंड की वर्तमान विशेषता यह है कि यह दो राज्यों मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश में फैला हुआ है। लेखिका ने ‘‘बुंदेलखंड: मध्यप्रदेश की अमूल्य विरासत’’ में मध्यप्रदेश के हिस्से के बुंदेलखंड की विरासत को सहेजस है तथा अपनी यह पुस्तक बुंदेलखंड के निवासियों को समर्पित की है।
पुस्तक में कुल चार अध्याय हैं - बुंदेलखंड क्षेत्र, वन्य जीव पर्यटन, बुंदेलखंड के किले एवे मंदिर तथा कला एवं संस्कृति। इन चारो अध्यायों के उपरांत पांचवें अध्याय के रूप में संदर्भसूची रखी गई है।
प्रथम अध्याय है ‘‘बुंदेलखंड क्षेत्र’’। इस अध्याय में उन्होंने बुंदेलखंड की भौगोलिक स्थिति, बुंदेलखंड का मानचित्र तथा बुंदेलखंड का संक्षिप्त इतिहास दिया है। बुंदेलखंड के इतिहास में लेखिका ने इस क्षेत्र की प्राचीनता को ध्यान में रखते हुए प्रीहिस्टोरिक अर्थात प्रागैतिहासिक काल से आरंभ किया है। फिर रामायण काल, महाभारत काल, छठीं शताब्दी ईसा पूर्व, ईसा उपरांत तीसरी शताब्दी, तीसरी से चौथी शताब्दी, वाकाटकों की चौथी शताब्दी, चैथी से छठीं शताब्दी गुप्ता राजवंश, आठवीं शती गुर्जर-प्रतिहार, नवीं से तेरहवीं शती चंदेल राजवंश, चौदह से सोलहवीं शती बुंदेल साम्राज्य तथा 1720 सं 1760 तक मराठाओं का बुंदेलखंड पर राजनैतिक प्रभाव का परिचय दिया गया है। इसी अध्याय में प्राचीन नगर एरण, खजुराहो के मंदिर, महाराज छत्रसाल, ब्रिटिश साम्राज्य के समय बुंदेलखंड के बारे में जानकारी है। रानी लक्ष्मी बाई के संदर्भ में झांसी का परिचय है। सागर के गोविंद पंत खेर के योगदान का विवरण है। सागर का परिचय देते हुए यहां की लाखा बंजारा झील से जुड़ी रोचक किंवदंती तथा सागर विश्वविद्यालय का परिचय है। अंत में देश की स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद बुंदेलखंड का स्वरूप जो विंध्यप्रदेश तथा मध्यभारत के अंग के रूप में रहा तथा वर्तमान बुंदेलखंड की जानकारी है।
दूसरे अध्याय ‘‘वन्य जीव पर्यटन ’’ में वन्य जीव पर्यटन अर्थात वाइल्ड लाईफ टूरिज्म की संक्षिप्त जानकारी है। लेखिका ने इसमें पन्ना टाइगर रिजर्व, पाण्डव गुफा एवं झरना पन्ना, किमासन जलप्रपात पन्ना, किलकिला झरना पन्ना, केन घड़ियाल सेंचुरी पन्ना, भीमकुंड तथा नौरादेही रानी दुर्गावती टाईगर सेंचुरी के बारे में जानकारी दी है। ये सभी मनोरम स्थान हैं जो पर्यटकों को आकर्षित करने की क्षमता रखते हैं।
दूसरे अध्याय में ही बुंदेलखंड की वन आधारित आजीविका की जानकारी दी गई है। इस अध्याय में बुंदेलखंड की कृषि संबंधी तथा वनोपज की जानकारी दी गई है। चूंकि बीड़ी व्यवसाय बुंदेलखंड का एक प्रमुख व्यवसाय है अतः तेंदू पत्ता जिसका उपयोग बीड़ी निर्माण में होता है तथा बीड़ी बनाने की चर्चा की गई है। वनोपज पर आधारित दूसरा बड़ा व्यवसाय है महुआ बीनने का। महुआ बीनने तथा इसके विविध उपयोग की संक्षिप्त जानकारी दी गई है।
तीसरा अध्याय है ‘‘बुंदेलखंड के किले एवं मंदिर’’। इस संबंध में लेखिका ने परिचयात्मक ढंग से अध्याय के आरंभ में ही लिखा है कि -‘‘प्राचीन संस्कृति और परंपराओं की भूमि बुंदेलखंड अपने पुरातात्विक स्मारकों और सभी धर्मों, हिंदू, मुस्लिम, जैन और बौद्धों के लिए तीर्थ स्थानों के लिए प्रसिद्ध है। शानदार किले गौरवशाली अतीत, महान राजवंशों, सम्राटों और योद्धाओं की याद दिलाते हैं।’’ इसमें कोई संदेह नहीं कि बुंदेलखंड स्थपत्य और कला का धनी है। यहां के किलों का पुराणों में उल्लेख मिलता है। डाॅ. पिंपलापुरे ने इस अध्याय में जिन किलों का उल्लेख किया है, वे हैं- कालिंजर, झांसी (यद्यपि यह वर्तमान में उत्तरप्रदेश में स्थित है), ओरछा के किले, मंदिर एवं छतरियां। साथ ही ओरछा की रानी गणेशकुंवरी, लाला हरदौल की कथा का भी उल्लेख है। इसके अतिरिक्त अजयगढ़ का किला, दतिया महल, खजुराहो, धामोनी, गढ़पहरा, सागर, रहली का किला, चंदेरी, तालबेहट, धुबेला संग्रहालय, हृदयशाह का महल तथा पन्ना के प्रसिद्ध मंदिरों का परिचय दिया गया है। वैसे खजुराहो को एक स्वतंत्र अध्याय बनाया जा सकता था तथा ‘खजुराहो और उसके आस-पास’ के रूप में उस पूरे क्षेत्र चंदला, मंड़ला, बसारी आदि को हाईलाईट किया जा सकता था।
दमोह जिले में स्थित जैन तीर्थ कुण्डलपुर, सागर के रानगिर का हरािद्धी माता मंदिर, श्रीदेव पंढरीनाथ मंदिर, रहली का सूर्य मंदिर, विनायका का विष्णु मंदिर तथा सागर के वृंदावन बाग मंदिर का विवरण भी इसी तीसरे अध्याय में है।
चौथा अध्याय ‘‘कला एवं संस्कृतिक’’ का है। लेखिका डाॅ नीलिमा पिंपलापुरे के शब्दों में- ‘‘बुंदेलखंड का खूबसूरत इलाका परंपराओं का शाही इतिहास दर्ज करता है। चाहे वह विरासत हो, कला और शिल्प, हथकरघा या संस्कृति, यह अपनी विशिष्टता के लिए जाना जाता है। बुंदेलखंड का पारंपरिक संगीत और नृत्य, त्यौहार और समारोह, साहित्य और ऐतिहासिक स्मारक बुंदेलखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के कई महत्वपूर्ण पहलू हैं।’’ इस अध्याय में बुंदेलखंड में प्रचलित काष्ठ एवं धातु शिल्प, चंदेरी के वस्त्र उद्योग, ताराग्राम ओरछा के हस्त निर्मित कागज उद्योग की जानकारी है। बुंदेली वाॅल पेंटिंग्स के साथ ही नृत्य कलाओं जैसे राई, दिवारी आदि एवं बुंदेली लोग गायन दादरा, फाग, लमटेरा आदि की संक्षिप्त जानकारी है। इसके साथ ही बुंदेली पकवानों के आस्वाद का भी संक्षिप्त परिचय है।
वस्तुतः यह एक ऐसी पुस्तक है जो संक्षेप में पर्यटकों को बुंदेलखंड की विविधरंगी विरासत से परिचित कराती है। इसका मूल उद्देश्य पर्यटकों को बुंदेलखंड की ओर आकर्षित करना है, जिसमें यह पुस्तक खरी उतरती है। पुस्तक का कव्हर, मुद्रण तथा कागज बेहतरीन है। लेखिका ने पुस्तक की प्रस्तावना में लिखा है कि-‘‘यह प्रकाशन बुन्देलखण्ड के प्रति मेरे प्रेम और लगन का परिणाम है। मेरा विचार बुन्देलखण्ड के अनूठे पहलुओं को उजागर करना है और इसे एक सम्मानपूर्ण स्थान दिलाना है, जिसका यह क्षेत्र हकदार है। मैंने मुख्य रूप से मध्यप्रदेश के बुन्देलखंड वाले माग पर ध्यान केन्द्रित किया है, क्योंकि यहीं मैं पिछले पचास वर्षों से निवासरत हूँ और यही वह क्षेत्र है जो मेरे हृदय के करीब है। मुझे पूरा विश्वास है कि यह पुस्तक इस सुन्दर क्षेत्र को अग्रसर करने हेतु उपयोगी सिद्ध होगी। यह पुस्तक, बुन्देलखण्ड का एक विस्तृत या गहन अध्ययन नहीं है, बल्कि यह दुनिया को इस रहस्यमय भूमि और इसकी समृद्ध विरासत से परिचित कराने का एक प्रयास है, जिससे पर्यटन को बढ़ावा मिले और बुन्देलखण्ड के इस सुन्दर क्षेत्र का भ्रमण करने के लिए यहाँ पर्यटक आयें। अपनी यात्रा के दौरान, मैंने बुन्देलखण्ड के प्रत्येक क्षेत्र का विस्तार से अध्ययन, दौरा किया है और मैं अपना पर्यवेक्षण इस पुस्तक के द्वारा साझा करना चाहती हूँ।’’ उन्होंने आगे लिखा है कि ‘‘पिछले पाँच दशकों से सागर जैसे सुन्दर शहर में रहते हुए, मेरे मन में बुन्देलखण्ड के प्रति गहरी आत्मीयता की भावना विकसित हुई है, जो वास्तव में भारत की जीवन रेखा और दिल की धड़कन है। मैं अपने व्यक्तित्व का श्रेय इस मनमोहक भूमि के सौहार्दपूर्ण लोगों व अपने परिवार को देती हूँ, जो मेरी ताकत, मेरा जीवन और मेरी प्रेरणा रहे हैं, जो जीवन की चुनौतियों के माध्यम से लगातार मेरा मार्गदर्शन करते रहे हैं। मैंने पूरे विश्व की यात्रा की है. लेकिन मुझे केवल सागर में ही अपने घर में सुख और सुकून मिलता है।’’
निःसंदेह बुंदेलखंड के इतिहास, सांस्कृतिक परंपराओं एवं नैसर्गिक सौंदर्य में हृदय को मोह लेने की क्षमता है। लेखिका के उत्साह एवं भावनाओं को पुस्तक में अनुभव किया जा सकता है। पुस्तक में कई महत्वपूर्ण स्थान छूट गए है किन्तु इसमें कोई संदेह नहीं कि लेखिका डाॅ. नीलिमा पिंपलापुरे ने इसे लिखने में निश्चित रूप से श्रम किया है क्योंकि जानकारी भले ही संक्षेप में दी जाए किन्तु वह जानकारी जब तक समग्रता से ज्ञात न हो तब तक उसका संक्षेपीकरण भी नहीं किया जा सकता है। इस परिचयात्मक पुस्तक की भाषा सरल एवं सुगम है। छायाचित्रों ने पुस्तक की गुणवत्ता को द्विगुणित कर दिया है। यह पुस्तक हर दृष्टि से पठनीय एवं संग्रहणीय है।
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