बतकाव बिन्ना की
उनें कुंआ चाउने, इनें फुआ चाउने
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
जब से ऊने लड़ाई छेड़ी आए, बस तभई से मोरो मुंडा खराब चल रओ। काए से के अपने ओरें लड़ाई-झगड़ा वारे जो नोंईं। राजी-खुसी बनी रए ओई अच्छो लगत आए। मनो बा पगलेट खों तो कछू औ सूझई नईं रओ। सबई खों लड़ाई के चूला में झोकबे खों उधारो खाओ फिर रओ। बाकी अपने इते होली के हुरियाने कोसिस तो करत रए के इते सबको जी अच्छो सो बने रए। काए से के अपन तो ठैरे व्रत-त्योहरन में अपनो जी लगा के अपनो दुख-पीरा से ध्यान बांटबे वारे। जेई से तो अपने बुंदेलखंड में मुतके टाईप के होरी गीत गाए जात आएं। तनक ध्यान करो ईसुरी को। उन्ने सोई फागें लिखीं, मनो जब लुगाइयन की होरी खोलबे की बात आई सो उन्ने राधा रानी के बहाने लुगाइयन को पावर दिखा दओ। बुंदेलखंड की राधारानी किसन भगवान जू से डरबे वारी नोंईं। जेई से ईसुरी ने लिखो के-
फागु की भीर, अभीरिन ने गहि गोविंद लै गई भीतर गोरी
भाय करी मन की पद्माकर उपर नाई अबीर की झोरी
छीने पीतांबर कम्मर तें सु बिदा कई दई मीड़ि कपोलन रोरी
नैन नचाय कही मुसकाय -लला फिर आइयो खेलन होरी
अब दम हो सो आएं गोविंद फेर के होरी खेलबे खों। ऊंसई तो गोविंद जू गोपियन के चीर के के दुपा देत्ते औ उने परेसान करत्ते, मनो होरी के टेम पे गोपियन ने उनसे बदला ले लओ। बे उने घरे भीतरे लिवा ले गईं औ अपने मन की कर डारी। गोविंद जू को पितांबर छीन लओ, गालन पे गुलाल मल दओ औ फेर अंखियां मटकात भईं बोली के ‘‘लला फेर आइयो खेलन होरी’’।
आप ओरन ने बरसाने की लट्ठमार होरी के बारे में तो सुनो हुइए मनो अपने बुंदेलखंड में सोई लट्ठमार होरी होत आए। हऔ, झांसी जिला के पुनावली कलां गांव में होरी के टेम पे लुगाइयां गुड़ को डगला एक पुटरिया में बांध के पेड़ की डगरिया पे टांग देती आएं। फेर बे लुगाइयां लट्ठ ले के खुदई। ऊकी रखवारी करत आएं। जो बी लुगवा बा पुटरिया लेबे की कोसिस करत आए, ऊकी लट्ठ से कुटाई करी जात आए। जे खेल होबे के बादई होलिका को बारो जात आए औ रंग खेलो जात आए। जे जो रिवाज आए, ईके बारे में एक किसां कई जात आए के जबें होलिका बालक प्रहलाद को अपनी गोदी में ले के आगी में बैठीं तो जा देख के उते ठाड़ी लुगाइयन से रई नई गई औ उन ओरन ने होलिका माई के राक्षसन से लट्ठ घुमा-घुमा के लड़ाई करी। संगे भगवान बिष्णु से प्रार्थना करी के बे बालक प्रहलाद खों बचा लें। भगवान ने देखी के बे लुगाइयां अपनी जान पे खोल के राक्षसन से लड़ रई आएं सो भगवान आए औ उन्ने प्रहलाद खों बचा लओ। मनो ईके बाद जे रिवाज सो चल परो के होरी जलाए के पैले उते लुगाइयां लठ्ठ चलाउत आएं फेर कऊं होरी जलत आए औ फेर रंग खोलो जात आए।
पुनावली कलां गांव में नोईं बल्कि उत्तर प्रदेस के बुंदेलखंड में हमीरपुर के कुंडौरा गांव में सोई लट्ठमार होरी खेली जात आए। इते एक नई, बल्कि दो दिनां रंग खेले जात आएं। होलिका जलाए जाबे के बाद पैले दिन लुगाइयां होरी खेलत आएं। ऊ दिनां लुगवा घर से बायरे निकरबे में डर आएं। काए से जोन लुगवा बायरे दिखाओ ऊको खेंच के लट्ठ जमा दओ जात आए।ईके अगले दिन सबई की होरी होत आए। जा रिवाज बी ऐसोई नईं बन गओ। ईके पांछू सोई एक किसां आए। का भओ के ग्राम कुंडौरा में एक लंबरदार रओ जोन को नांव रओ मेंहर सिंह (मेंबर सिंह)। एक दफा जबे जानकी मंदिर में फागें गाई जा रई हतीं, उतई समै मेंहर सिंह ने एक जने की उतई मंदिर में हत्या कर दई औ सबईं खों धमकाओ के जो कोनऊं ने ऊके खिलाफ बोलो तो बा ऊको काट डारहे। ईके बाद वां ऐसी दहसत फैली के होरी ने मनाई गई। कई बरस हो गए मनो होरी ने मनी। जा बात उते की लुगाइयन खों ने जंची। उन्ने अच्छे लट्ठ निकारे औ निकर परीं होरी खेलने के लाने।
अब चलो आप के लाने सागर सिटी की स्पेसल होरी बता दई जाए। सागर सहर के गोपालगंज झंडा चैक में श्री नृत्यगोपाल मंदिर आए। उते होलाष्टक के टेम पे लुगाइयां राधा-कृष्ण के संगे फूलों की होरी खेलत आएं। बे फाग औ भजन सोई गात आएं। एम-दूजे पे फूल सोई बरसाए जात आएं। जेई टाईप से उत्तरप्रदेश के कुलपहाड़ में सोई फूलन की होरी खेली जात आए। जे कुलपहाड़ महोबा जिला में आए। ऊटेम पे फूल बरसाए जात आएं औ ईसुरी की फागें गाई जात आएं। ऐ फाग आप ओरें सोई देखो-
आज बिरज में होरी रे रसिया।
कौना गांव के कुंअर कन्हैया,
कौना गांव की गोरी रे रसिया। आज...
नन्दगांव के कुंअर कन्हैया,
बरसाने की गोरी रे रसिया। आज...
वैसे कई तो जे जात आए के जा होरी के त्योहार की सुरुआत अपने बुंदेलखंड से भई रई। ई के बारे में एक कहनात आए के झांसी से कोनऊं 66 कि.मी. दूर एरच गांव से में पैली होरी खेली गई रई। काए से के एरच राजा हिरयकश्यपु के राज की राजधानी हुआ करत्ती। एरच में ई होलिका प्रहलाद खों अपनी गोदी में ले के बैठी रईं। जीमें होलिका सो जल गईं औ प्रहलाद बच गओ रओ। जेई से उते पांच दिनां की होरी खेली जात आए औ गीत गाए जात आएं -
अपने-अपने महल से निकरीं सखी सब
कोऊ श्यामल कोऊ गोरी रे रसिया। आज...
उड़त गुलाल लाल भये बादर,
मारत भर-भर रोरी रे रसिया। आज...
औ जो करीला की रंगपांचे की बात ने करी तो मनो बात पूरी ने हुइए। मध्यप्रदेश के अशोक नगर से कोनऊं 75 कि.मी. दूर एक गांव आए करीला। इते सीता माता का मंदिर आए। यां बेड़िनियां पूजा करबे के लाने आऊत आएं। कओ जात आए के इतई सीता मैया ने लव औ कुश को जनम दओ रओ। करीला में रंगपांचे पे भौतई बड़ो मेला भरत आए।
अपने ई बुंदेलखंड में अकेली श्रीकृष्ण जू से नोईं श्रीराम और जानकी मैया से सोई होरी खेली जात आए-
राजकिशोरी महल बिच खेलत रे होरी।
कर झटकत घूंघट पट खोलत,
मलत कपोलन रोरी। महल...
कंचन की पिचकारी घालत,
तक मारत उर ओरी। महल...
मनो मोए कलई एक नओ बुंदेली फाग सुनबे को मिली जीमें आजकाल की लड़ाई पे तानो मारो गओ आए। दो-चार लाइनें आप ओरें सोई सुन लेओ-
उनें कुआ चाउने, इनें फुआ चाउने
बाकी जाएं चूला में, रमें हैं बे तो दूला में
उनकी तोपें उनको राज, बाकी के सब गिरे काज
उनें रुंआ चाउने, इने पुआ चाउनें....
जेई के संगे मनो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। मनो सोई सोचियो जरूर के जे लड़ाई करे से का मिलहे उने? औ जो मिलहे का बे अपने संगे ऊ पार लौं ले जाहें, जो सबको चैन बिगार रए।
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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