बतकाव बिन्ना की
ब्याओ की दावतें, माई को दिवारा औ लाड़लो बन्नू
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
‘‘रामधई! अब कछू नई हो सकत। बे ओरें मोरी काय सुनहें? उने तो अपनी परी है। बस, कहत भर के लाने हैं नोने भैया, बाकी नोने भैया की परवा कोनऊ को नईयां।’’ नोने भैया बड़बड़ात भए मोरे दरवाजे के आगूं ठाड़े हते। बड़बड़ा काए मनो चिचियां रये हते। तभई तो उनकी आवाज मोरे कान लों पोंच गई। मों पे हुन्ना बंधो हतो, फेर भी उनको चिचियानो मोये समझ में आ गओ। मोसे न रही गई सो मैंने तो पूछई लई, ‘‘काय नोने भैया, का हो गए? काय के लाने बमकत फिर रए?’’
‘‘अरे हम काय बमकें बिन्ना? बमके हमारे दुस्मन।’’ नोने भैया ठसक के बोले।
‘‘सो फेर काए चिचियां रये?’’ मैंने पूछी।
‘‘हम कहां चिचिया रये?’’ नोने भैया फेर के मुकर गये।
‘‘सो, जे को आ बोल रओ के अब कछू नई हो सकत? अब कछु बता बी देओ, भैया! मन की मन में नईं रखी जात। मोरे लाने कछु काम होय तो बताओ।’’ मैंने नोने भैया से कही।
‘‘अब का बताऊं बिन्ना! बड़े बुरै दिन आ गए। हमाई तो कोऊ सुनतई नईयां।’’ नोने भैया बोले।
‘‘ऐं? ऐसो का हो गओ? तुमाई तो सबई सुनत आएं? जे ऐसई काय कै रै?’’ नोने भैया बुझउव्वल-सी बुझा रए हते, सो मोए झुंझलाहट हो लगी, ‘‘अब कछु तो बोलो नोने भैया, जे ऐसई पहेलियां न बुझाओ। बाकी न बताना होय सो, न बताओ, मोय सोई टेम नइयां तुमई फालतू की बातें सुनबे के लाने।’’ मैने सोई नोने भैया खों तनक हड़काओ।
‘‘जे का बात भई बिन्ना? पैले तो पूछ रई हतीं, ओ अब कै रईं के तुमाये लाने टेम नइयां। जे तो गल्त बात आए।’’ नोने भैया ने बुरऔ सो मों बनाओ।
‘‘अब तुमई तो मों नई खोल रये। कछु बताओ तो सुनी जाये।’’ मैंने कही।
‘‘अरे, सुनाबे के लाने का है बिन्ना, भौतई बुरै दिन आ गए हैं। सोच-सोच के कलेजो फटत आए। जी तो करत आये के उन सबई जने को मार-मार के मुर्गा बना दओ जाए। चले हैं ब्याओ करने।’’ नोने भैया बोले।
‘‘कोन को मारबे को जी रओ तुमाओ? और कोन को ब्याओ करा रये?’’ मोए नोने भैया की बातें कछु समझ ने आईं।
‘‘हम काये करा रये ब्याओ? बे ओरे करा रये। हमाओ बस चले तो कोनऊ को ब्याओ न होन देवे।’’ नोने भैया बोले।
‘‘कोन के ब्याओ की कै रये, भैया? कछु साफ तो बोलो।’’
‘‘अरे, बे रहली वारी फुआ की बिटिया को ब्याओ होने वारो है।’’ नोने भैया कसमसात भए बोले।
‘‘काय, बोई वारी बिटिया, जोन के लाने तुमने फुआ की खूब सेवा करी हती?’’ मोये हंसी आ गई।
‘‘हओ तो, बोई वारी। बाकी हमें अब ऊसे कोनऊ लेबो-देबो नइयां। ऊने जब लों हमाए लाने मना कर दओ, तभई से हमने ऊके घरे ढूंको लो नइयां।’’ नोने भैया बोले।
‘‘सो, अब परेसानी का आए?’’ मैंने पूछी।
‘‘परेसानी तो भौतई बड़ी कहानी। मोये तो जे नई समझ में आ रओ के मोय ठुकरा दओ, कोनऊं गिला नइयां। पर कोन ने कई के ब्याओ कराओ औ मोए न्योतो ने भेजो।’’ नोने भैया चिढ़त भये बोले।
‘‘कछू बात हुइये।’’ मैंने कहीं।
‘‘का बात हुइए? हप्ता भरे पैलें ऊके बापराम मिले हते। बे बोले के हमें रासन वारी सस्ती शक्कर देवा देओ। मोड़ी के ब्याओ के लाने चाउने। जा सुन के हमाओ जी करो के हम उनसे कएं के दद्दा अपनी मोड़ी हमें देत तो बनो नईं औ शक्कर मंगात सरम नईं आ रई? मनो हमने ऐसो गओ नईं। काए से के हमें लगो के कछू बी होए मनो बे हमाए एक्स जानू के बापराम आएं सो हमें उनके लाने शक्कर को जुगाड़ करो चाइए। सो हमने जुगाड़ कर दओ। ऊ दिनां से रोज हम परखे बैठे के उनके इते से अब ब्याओ को न्योतो आहे, तब आहे, मनो काय को? बे तो हमें भूलई गए।’’ नोने भैया उदासे से बोले।
‘‘अपनों जी दोटो ने करो। हुइए कछू कारण। मनो उन्ने जो आप से मदद लई सो उने न्योतो तो भेजबो चाइए तो।’’ मैंने नोने भैया से कई।
‘‘जेई से तो हमाओ दिमा्र खराब भओ जा रओ।’’ नोने भैया बोले।
‘‘कओ उने लगो होए के आप अपनी जानू खों दूजे की दुल्हन बने ने देख पाहो, सो बे आपखों नईं न्योत रए।
‘‘बा दुल्हन बने, चाये कछू बने, मोये दुख नई होने। जी तो जे लाने मसक रओ के का जमाना आ गओ? एक जमाना हतो जब दस दिनां में बीस ब्याओ जीम लेत ते। ओ अब जे जमाना आ गओ के हमाई जानूं के ब्याओ में हमें नईं बुलाओ जा रओ। हमाओ जी तो तरसहे ब्याओ की दावत खाबे के लाने। सबई खों न्योत रए औ मोये तरसा रये।’’ ठंडी सांस भरत भए नोने भैया बोले।
‘‘ऐं? सो भैया तुम ब्याओ की दावत के लाने रो रये? ओ हमने सोसी के ऊ फुआ की बिटिया के लाने...।’’मोए अचरज भओ।
‘‘अरे, तुमने सोई भली चलाई। ऐसी तो बिटियां मुदकी फिरत मोरे आंगू-पीछूं पर ब्याओ की दावतें सबई की थेड़ी मिलत आएं। सो हम तो कै आए फूफा से के जो हमाई जानू को ब्याओ करा रए तो हमें न्योतो देओ ने तो ब्याओ ने होन देबी। बस, जेई सुन के फूफा ने जूता फेंक के मारो मोए, वो तो लगो नइयां। बाकी ई समै बयाओ करा के बे गल्त कर रये।’’ कहत भये नोने भैया सो आगे बढ़ गये और मैं सोसत रै गई के वाह रे नोने भैैया, इने प्रेमिका को ब्याओ को गम नइयां, गम आये सो ब्याओ की दावत ने मिल पाबे को। बाकी मोए नोने भैया पे दया सी आई सो मैंने उने पांछू से आवाज़ लगाई।
‘‘का आए?’’ नोने भैया ने मुंड़ के देखो औ पूछो।
‘‘बात जे आए नोने भैया, के मोसे आपको जो दुख देखो नई जा रओ। सो आपके लाने मोए एक तरीका सूझो आए। कओ तो बताएं?’’ मैंने नोने भैया से कई।
‘‘अरे बताओ, का बता रईं?’’ नोने भैया पूछन लगे
आप ऐसो करो के नवरातें तो सुरू हो गई आएं औ आपकी जानू को ब्याओ नवरातों के बाद आए। सो आप चार-छै जांगो पे माई के दिवारे दरसन कर आओ। उते कछू न कछू परसात बंअत रैत आए, तुमाओ काम बन जैसे। ब्याओ की दावत नोंई सो मई के दिवारे को परसाद तो मिलई जाहे।’’ मैंने सलाय दई।
‘‘बात तो तुमाई ठीक आए। कछू नईं से, जो कछू मिले वोई ठीक आए।’’ नोने भैया खुश होत भए बोले। फेर बे बोले के,‘‘चलो हम माई के बड़े दिवारे से सुरू कर देत आएं।’’
बे तो उते से खुस होत भए चले गए, मनो मोए लगो के जे तो सरकार की लाड़ली बिन्ना घांईं लाड़लो बन्नू आए जोन को मुफत को खाबे की ऐसी लत लग गई के अपनी जानू के ब्याओ को न्योतो खाबे खों पगला रओ। मनो अब सरकार खों सोई ‘‘लाड़लो बन्नू योजना’’ चलाई दओ चाइए। आप ओरें सोई सोचियो ई बारे में।
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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