चर्चा प्लस
हाशिए में खड़ा बाल साहित्य क्या एआई के साथ कदम मिला सकेगा?
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह
हाल ही में सागर में बाल साहित्य पर एक संगोष्ठी हुई जिसमें स्थानीय एवं अतिथि साहित्यकारों ने अपने विचार रखे। दूसरे सत्र में बाल कविताएं भी पढ़ी गईं। यह सेमिनार कई प्रश्न जगाने में सफल रहा जिनमें सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है कि क्या पर्याप्त बाल साहित्य लिखा जा रहा है? दूसरा प्रश्न था कि क्या एआई का युग में बाल साहित्य को प्रभावित करेगा? अर्थात हाशिए में खड़ा बाल साहित्य क्या एआई के साथ कदम मिला सकेगा? इस दृष्टि से सेमिनार सफल रहा कि वह विचारों को उद्वेलित कर सका, बशर्ते साहित्यकारों के मानस में यह उद्वेलन बना रहे।
बाल साहित्य शोध सृजनपीठ, साहित्य अकादमी मध्यप्रदेश शासन संस्कृति विभाग द्वारा मध्यप्रदेश के संभागीय मुख्यालय सागर में 06 मार्च 2026 को बाल साहित्य पर एक विमर्श एवं काव्यगोष्ठी का आयोजन किया गया। इसमें स्थानीय श्यामलम संस्था का पूर्ण सहयोग रहा। विमर्श का विषय था ‘‘लोक ध्वनि से बाल ध्वनि तक’’। बाल साहित्यकारों ने अपने-अपने विचार रखे। बाल साहित्य शोध सृजनपीठ की अध्यक्ष डाॅ मीनू पांडे ‘नयन’ ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही कि बाल साहित्य लिखने के लिए बाल मनोविज्ञान को जानना और समझना जरूरी है।
सेमिनार के बाद बाल साहित्य की दशा और दिशा को ले कर मेरे मन में भी मंथन चलता रहा। मुझे याद आने लगा वह समय जब मैं अपनी बाल्यावस्था में अपने नानाजी से कहानियां सुना करती थी। इतना ही नहीं मेरे घर खाना पकाने का काम करने वाली जिन्हें हम आदरपूर्वक ‘‘बऊ’’ यानी ‘मां’ कहते थे, वे भी चूल्हें में रोटियां सेंकने के दौरान ढेर सारी कहानियां सुनाया करती थीं। बाल्यावस्था में मैंने दो और लोगों से कहानियां सुनीं, एक अपने कमल सिंह मामाजी से और दूसरी अपनी दीदी वर्षा सिंह जी से। यानी मेरा बचपन कहानियों से सराबोर रहा। चारो के कथानक परस्पर बहुत भिन्न हुआ करते थे। नानाजी जो कहानियां सुनाते थे उनमें रामायण और महाभारत से निकले किस्से हुआ करते थे। उनमें कई क्षेपक कथाएं होती थीं। जैसे उन्होंने सुनाया था कि महाभारत काल के अंत समय में भीम को घमंड हो गया कि यदि उसने दुर्योंधन को नहीं मारा होता तो युद्ध कभी समाप्त नहीं होता। यानी युद्ध की विजय का सारा श्रेय उसी को है। श्रीकृष्ण उसके इस घमंड को ताड़ गए और उन्होंने पांडवों से कहा कि बहुत दिन से वन घूमने नहीं गए हैं, चलो चलते हैं। श्रीकृष्ण के साथ पांडव वन की ओर निकल पड़े। रास्ते में एक वृद्ध वानर अपनी पूंछ फैलाए लेटा हुआ था। यह देख कर भीम ने उस वानर से डपटते हुए कहा कि अपनी पूंछ हटा ले। वानर ने अपनी पूंछ हिलाई भी नहीं। इस पर भीम को क्रोध आ गया। उसने ललकारते हुए कहा कि यदि तू अपनी पूंछ नहीं हटाएगा तो मैं तेरी पूंछ काट दूंगा। तब उस वानर ने अपनी आंखें खोली और मंद स्वर में कहा कि मैं इतना बूढ़ा और अशक्त हो गया हूं कि अपनी पूंछ भी नहीं हिला पा रहा हूं। इसलिए तुम स्वयं मेरी पूंछ उठा कर एक ओर सरका दो और निकल जाओ। यह सुन कर भीम को और क्रोध आया किन्तु श्रीकृष्ण ने उसका कंधा दबा कर इशारा किया कि तुम्हीं पूंछ सरका दो। भीम ने पहले उंगली से पूंछ हटाने का प्रयास किया, वह नहीं हटी। फिर एक हाथ से प्रयास किया, मगर वह रंचमात्र नहीं सरकी। इसके बाद भीम ने अपने दोनों हाथों से अपनी पूरी शक्ति लगा कर पूंछ को सरकाने का प्रयास किया लेकिन पूंछ टस से मस नहीं हुई। तब भीम को लगा कि इसमें अवश्य कोई रहस्य है और उसने उस वानर के सम्मुख हाथ जोड़ कर पूछा की महानुभाव आप कौन हैं? इस पर वह वानर उठ खड़ा हुआ और अपने दिव्य रूप में आ कर उत्तर दिया कि मैं श्रीराम भक्त हनुमान हूं। यह सुनते ही भीम उनके चरणों में गिर गया और उसे अपनी भूल का अहसास हो गया कि वह गलत घमंड कर रहा था। - यह कहानी उपेदशात्मक तो थी ही साथ ही कल्पना शक्ति को बढ़ावा देने वाली भी थी। कहानी सुनते समय मैं कल्पना करती के कैसे भीम को वृद्ध वानर के रूप में हनुमान मिले होंगे? कैसे उसका घमंड चूर-चूर हुआ होगा?
बऊ की कहानियां राजा, रानियों, भूत, प्रेत आदि से भरी होती थीं। लेकिन सब की सब सुखांत और सत्य की विजय स्थापित करने वाली। एक मनुष्य भूत के सामने भी कैसे निडरता से डटा रह सकता है, उनकी कहानियों में यही नुस्खा रहता था। मामाजी की कहानियों में आदिवासी अंचलों की कहानियों की बहुलता होती थी। आदिवासियों के देवी, देवता, उनका जुझारूपन आदि उन कहानियों में रहता था। मेरी वर्षा दीदी की कहानियों में ‘‘अंधेर नगरी चैपट राजा’’ भी शामिल रहती थी, क्योंकि उन्हें कहानियां, नाटक आदि पढ़ने का भी बहुत शौक था। आज अगर मैं कहानियां या उपन्यास लिख पाती हूं तो उसके मूल में बचपन में सुनी वे कहानियां ही हैं जिन्होंने मुझे कल्पना और दृश्यात्मकता का पाठ पढ़ाया। मेरे समकालीन लगभग सभी साहित्यकारों के जीवन में यह दौर आया होगा जब उन्होंने अपने बचपन में जी भर-भर के कहानियां सुनी होंगी। कल्पना शक्ति को बढ़ाने और संस्कारित करने में चंदामामा, नंदन आदि की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता है। वे बाल पत्रिकाएं हमारे लिए उसी प्रकार प्रिय थीं जैसे आज छोटे बच्चों को मोबाईल पसंद है। लेकिन उन पत्रिकाओं और मोबाईल में जमीन-आसमान का अन्तर है। उनमें भटकने की गुंजाइश नहीं थी किन्तु मोबाईल में बालमन को भटकने के अनेक अवसर रहते हैं।
जब से मोबाईल ‘‘लाईफ लाइन’’ की भांति जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया है तब से एक बात मैंने गौर की है कि कई युवा माताएं अपने बच्चे के मन बहलाने तथा उन्हें उलझाए रखने के लिए उनके हाथ में मोबाईल थमा देती हैं। बच्चा अधिकतर मार-काट वाले गेम्स में उलझता चला जाता है और मां को इसका अहसास ही नहीं हो पाता है। आजकल छोटे बच्चों के जिद्दी और क्रोधी स्वभाव बढ़ने का एक कारण यह भी मुझे लगता है। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि उनके हाथों से मोबाइल दूर कर के उन्हें चित्रों वाली किताबें, और तनिक बड़े होने पर बाल साहित्य वाली किताबें दी जाएं। क्योंकि जो बच्चे को दिया जाएगा, वह उसी के प्रति आकर्षित होगा और उसे ही पहचानेगा।
आधुनिक मांए आजकल लोरी, गीत या कहानियां कम ही सुनाती हैं, यह काम ‘‘एलेक्सा’’ को सौंप दिया जाता है जिसमें साहित्य तो होता है किन्तु स्पर्श या संवेदनात्मकता नहीं होती है। लिहाज़ा यह एक कठिन दौर है जब बाल साहित्य अपनी पुनस्र्थापना की मांग कर रहा है। साहित्य अकादमी मध्यप्रदेश शासन के अध्यक्ष विकास दवे जी को इसकी चिंता है किन्तु मात्र क्या उनकी चिंता करने से सबकुछ संभव हो सकेगा? साहित्यकारों को भी बाल साहित्य लिखने में ईमानदारी बरतनी होगी। मात्र कथित बाल कविताओं की तुकबंदियां कर स्वयं को बाल साहित्यकार समझ लेने वाले रचनाकार भले ही अपनी पुस्तकों की संख्या बढ़ा लें किन्तु बच्चों के लिए उपयोगी साहित्य कभी नहीं दे सकते हैं।
कई बार संवाद में यह सामने आता है कि एक तो बाल साहित्य को हमेशा हाशिए पर खड़ा रखा गया, उस पर बाल साहित्य के स्वरूप को ही कई साहित्यकार समझ नहीं पाते हैं। जबकि हमारे देश में प्राचीनकाल से बाल साहित्य रचा जा रहा है। विष्णु शर्मा ने चार उद्दंड राजकुमारों को शिक्षित करने तथा जीवन की नीतियों का ज्ञान देने के लिए वे कहानियां सुनाईं जिनके पात्र पशु, पक्षी थे। हम उन कहानियों के संग्रह को ‘‘पंचतंत्र’’ के नाम से जानते हैं। ‘‘सिंहासन बत्तीसी’’ की कहानियां रोचक होती हुई शिक्षाप्रद हैं। ‘‘वेताल कथाओं’ को भला कैसे भुलाया जा सकता है जिसमें विक्रमादित्य वेताल को वृक्ष की शाखा से उतार कर अपने कंधे पर रखता है और वेताल अचानक सचेत हो कर राजा से कहता है कि ‘राजन, मैं तुझे एक कहानी सुना रहा हूं। इसके अंत में एक प्रश्न आएगा जिसका उत्तर यदि तूने नहीं दिया तो तेरे सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे।’ विडंबना ये कि राजा को पता है कि यदि वह बोलेगा तो वेताल फिर से पेड़ पर जा कर लटक जाएगा। अतः रोज रात को विक्रमादित्य वेताल को शाख से उतारता और उसकी कहानी के अंत के प्रश्न का उत्तर देकर उसे खो देता। इस तरह अनेक कहानियों की श्रृंखला है वह।
प्रश्न उठता है कि क्या आज बाल साहित्य का स्वरूप पहले जैसा बचा है? अथवा उसके कलेवर को समकालीन बनाए रखा जा सकता है? जब हम छोटे तो हमने जो कविताएं सुनी थीं, याद की थीं उनमें एक नन्हीं-सी कविता थी -
चल उठ,
मुंह धो,
जल भर।
आज बच्चे को इस तरह पानी भरना सिखाने की आवश्यकता लगभग नहीं है। फिर अधिकांश बच्चे अंग्रेजी स्कूलों के सुपुर्द कर दिए जाते हैं जहां वे ट्विंकल- ट्विंकल लिटिल स्टार’’ और ‘‘जैक एंड जिल’’ जैसी कविताएं सीखते हैं। यहां भी विडंबना ये कि फ्लैट्स में रहने वाले और अधिकांश समय पंखा, एसी में सोने वाले बच्चे खुले आसमान की तारों वाली रात देख ही नहीं पाते हैं। वे न तो ‘चोरखटिया’ यानी बड़ी सप्तऋषि जानते हैं और न छोटी सप्तऋषि। ध्रुव तारा आकाश में कहा स्थित होता है, उन्हें यह भी पता नहीं। न जानने के क्रम में वह कदंब का पेड़ भी है जिस पर सुभद्रा कुमारी चौहान ने अपनी प्रसिद्ध कविता लिखी थी कि-
वह कदंब का पेड़ अगर मां होता यमुना तीरे
मैं भी उस पर बैठ कन्हैया, बनता धीरे-धीरे।
आज शहरों से कंदब के पेड़ गायब हो चुके हैं, जो बचे हैं वे बच्चों के माता-पिता के भी संज्ञान में भी नहीं रहते हैं।
अब प्रश्न आता है सबसे नवीनतम टैक्नोलाजिकल स्थिति का, जिसे हम ‘‘एआई’’ यानी आर्टीफीशियल इंटेलीजेंस के नाम से जान रहे हैं। उसने तूफान की तरह बड़ी तरंगे उठानी शुरू कर दी हैं। कहा तो ये जाता है कि इन दिनों कई किताबें भी एआई के द्वारा लिखी जा रही हैं। क्या यह छल बाल साहित्य के मर्म को समझ सकेगा? जबकि बाल साहित्य से अपेक्षा की जाती है कि वह टेक्नाॅलाजी के साथ परिवर्तित होते युग में बच्चों के लिए मानवीय मूल्यों, राष्ट्रीय मूल्यों और आदर्श पूर्ण मूल्यों को बनाए रखे। यह एक चुनौती है। शासकीय इकाइयां मात्र सहायता कर सकती हैं, अन्यथा इस चुनौती से स्वयं साहित्यकारों को निपटना होगा। इसके लिए आवश्यक है कि वे साहित्य सृजन करने में एआई के छल का सहारा न लें, वर्तमान बाल मनोविज्ञान को समझें और पारंपरिक मूल्यों व संस्कारों को आधुनिक प्रवृतियों के साथ इस प्रकार समायोजित करें कि वह बच्चों को मनोरंजन और शिक्षा एक साथ मिल सके तथा उनमें पुस्तक पढ़ने के प्रति रुचि जाग सके। यहां मैं वे दो बातें कहना चाहूंगी जो मेरी मां मुझसे कहा करती थीं कि कोई भी चुनौती स्थाई नहीं होती और कोई भी चुनौती ऐसी नहीं होती जिसका कोई हल न निकाला जा सके, यदि चुनौती का सामना करने की ईमानदार मंशा हो।
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(दैनिक, सागर दिनकर में 11.03.2026 को प्रकाशित)
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