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Monday, May 22, 2023

पौराणिक किताबें मात्र धार्मिक महत्व की नहीं है वरन् उनमें उस जीवनशैली, दर्शन और विचारों का ज्ञान मिलता है जिन्हें हमारे पूर्वजों ने जिया है - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

जी हां, बड़े काम की चीजें मिलती हैं ऐसी चलित दूकानों में... तुलसी, रुद्राक्ष, चंदन आदि हर तरह की मालाएं, पूजा की रेशमी मालाएं, घिसकर तिलक लगाने वाला चंदन, राशि के पत्थर, अंगूठियां आदि आदि... और मैं ऐसी दुकानों में तलाशती हूं पौराणिक पुस्तकें ... फिर यह तो गीता प्रेस (गोरखपुर) की  व्हीलर शॉप थी अतः मुझे कुछ न कुछ तो पढ़ने लायक मिलना ही था... बाकी जो नहीं मिला उसके लिए मैं उनसे कैटलॉग ले आई ताकि उसमें देख कर मंगा सकूं...
     🚩इस समय जब अन्य किताबें आसमान छूती कीमतों वाली होती हैं ऐसे समय में मोटी-मोटी किताबें बहुत कम कीमत में उपलब्ध कराना, वास्तव में पठनीयता की दिशा में गीता प्रेस का एक बहुत ही सराहनीय योगदान है....
     🚩वस्तुतः पौराणिक किताबें मात्र धार्मिक महत्व की नहीं है वरन् उनमें उस जीवनशैली, दर्शन और विचारों का ज्ञान मिलता है जिन्हें हमारे पूर्वजों ने जिया है... यदि हम इन्हें इतिहास की कथात्मक पुस्तकें माने तो इन में बहुत सारे तथ्य मिल जाते हैं जो यह साबित करते हैं कि इनमें सभी कुछ कपोल कल्पित नहीं है बल्कि इनमें अतीत के जीवन का यथार्थ हैं... वैसे, ये मेरे व्यक्तिगत विचार हैं क्योंकि मैं इन्हें एक इतिहास के विद्यार्थी के रूप में पढ़ती हूं और इनमें अतीत की जीवन शैली को तलाशती हूं ...
    🚩वस्तुतः इसी प्रक्रिया में मुझे शिखंडी का यथार्थ भी मिला था जिसे मैंने अपने उपन्यास का आधार बनाया। दिलचस्प बात यह है कि शिखंडी का वह यथार्थ आज के वैज्ञानिक मानकों पर एकदम खरा उतरता है।
      🙄 अभी मैंने कौन सी पुस्तक खरीदी, फिलहाल यह सीक्रेट है...🤫
... फिर कभी बताऊंगी 💁😀
#डॉसुश्रीशरदसिंह 
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Wednesday, November 22, 2017

चर्चा प्लस ... इतिहास, सिनेमा और (कु)संवाद के साए में ‘पद्मावती’ - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh

चर्चा प्लस  (दैनिक सागर दिनकर, 22.11.2017)



इतिहास, सिनेमा और (कु)संवाद के साए में ‘पद्मावती’
  - डॉ. शरद सिंह
यूं आजकल चलन-सा हो गया है विवाद खड़ा कर के फिल्म को चर्चित बनाने का लेकिन संजय लीला भंसाली ने भी फिल्म बनाते समय यह नहीं सोचा होगा कि उनकी फिल्म को ले कर वाद-संवाद इस तरह अपना स्तर गवां बैठेंगे। जिस धैर्य और संयम के परिचय की अपेक्षा विरोध कर रहे राजपूतों से की जा रही है, वही अपेक्षा संजय लीला भंसाली से भी है। जावेद अख़्तर जैसे व्यक्ति से ऐसे वक्तव्य की आशा नहीं थी जो उन्होंने इस विवाद के तारतम्य में दिया है। समय रहते संयम नहीं बरता गया तो विवाद के बीच में कूद पड़ने वाले कुसंवादी वातावरण को और बिगाड़ सकते हैं।
रानी पद्मिनी अथवा रानी पद्मावती की कथा हम सभी ने सुनी है, पढ़ी है। हम उस संस्कृति के नागरिक हैं जहां पशु, पक्षी, वनस्पति और यहां तक कि पाषाण में भी देवता के होने का विश्वास रखते हैं। वहीं हम मिलजुल कर रहने में विश्वास रखते हैं। लेकिन विगत कुछ सप्ताह से फिल्म ‘पद्मावती’ को ले कर जिस तरह का विवाद खड़ा हो गया है वह हमारी सांस्कृतिक मान्यताओं एवं भावनाओं को आहत करने वाला है। मसला सिर्फ़ यह नहीं है कि इससे राजपूतों की भावना को ठेस पहुंची, मसला यह भी है कि इससे भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को ठेस पहुंची है। यह सच है कि कुछ राजपूतों को अतिआवेश में आ कर अभिनेत्री दीपिका पादुकोण के विरुद्ध अपशब्द नहीं कहने चाहिए थे किन्तु वहीं दूसरी ओर संजय लीला भंसाली को भी राजपूतों की भावनाओं का सम्मान करते हुए विरोध कर रहे राजपूतों के प्रतिनिधियों को फिल्म की स्क्रीनिंग दिखा देनी चाहिए थी, इससे मामला उस सीमा तक नहीं बिगड़ता जितना कि बिगड़ता चला गया। संजय लीला भंसाली ने जिस हठ का परिचय दिया वह भी चकित कर देने वाला है। उन्होंने अपनी फिल्म को विवाद के बहुत बाद सेंसर बोर्ड के पास भेजा।
Column Charcha Plus, Dainik Sagar Dinkar, Dr (Miss) Sharad Singh

सिनेमा मनोरंजन का वह सशक्त माध्यम है जिसके द्वारा यदि फिल्मकार चाहे तो सामाजिक, धार्मिक, ऐतिहासिक और राजनीतिक मूल्यों का शानदार ताना-बाना बुन सकता है। यहां शानदार होने का अर्थ करोड़ों के बजट से भव्य सेट लगाने से नहीं है, यहां शानदार होने का अर्थ है आम जनता के साथ सीधा संवाद स्थापित करना। अनेक ऐसी फिल्में बन चुकी हैं जिन्होंने जनमानस पर गहरा प्रभाव डाला है। ऐसा नहीं है कि उनमें विरोधात्मक बातें नहीं थीं लेकिन उस विरोध में भी सार्थकता थी। जैसे ‘जाने भी दो यारो’ ने जैसा राजनीतिक कटाक्ष किया वह अद्वितीय था। इतिहास की बात करें तो मेहताब की ‘झांसी की रानी’ (1953) अथवा हेमामालिनी अभिनीत ‘मीरा’ (1979) को सभी ने खुले दिल से स्वीकार किया। फिल्म ‘लेकिन’ और ‘रूदाली’ में उन दूषित व्यवस्थाओं को सामने रखा गया जिनके कारण राजस्थानी समाज में स्त्रियों को कष्ट सहने पड़ते थे। इन दोनों फिल्मों का किसी ने भी विरोध नहीं किया। क्योंकि भले ही यह समाज का काला पक्ष था लेकिन सच था। लेकिन ‘पद्मावती’ को विरोध का सामना करना पड़ रहा है। राजस्थानी राजपूत समाज का कहना है कि रानी पद्मावती को जिस प्रकार सबके सामने घूमर नृत्य करते हुए दिखाया गया है, वह उचित नहीं है साथ ही अपमानजनक है। यदि मध्यकालीन राजपूत समाज की परम्पराओं पर ध्यान दिया जाए तो यह सच है कि उस समय स्त्रियों में पर्दाप्रथा का कठोरता से पालन किया जाता था। इस प्रकार के नियम राजपरिवार की स्त्रियों पर भी लागू होते थे। ऐसे वातावरण में किसी रानी के द्वारा अपनी ससुराल में नृत्य किया जाना भला कैसे संभव हो सकता है? जबकि पीढ़ियों बाद राजस्थान की ही कृष्ण भक्त राजपूत रानी मीराबाई ने जब कृष्ण की भक्ति में झूमते हुए भजन गाए उस समय उन्हें ‘कुलनाशी’ कहा गया। मीरा ने स्वयं लिखा है- ‘‘लोग कहे मीरा बाबरी, सासु कहे कुलनासी री। विष रो प्यालो राणा भेज्या, पीवां मीरा हांसी री।।’’
विवाद को हवा देने वाले कुछ प्रतिष्ठित व्यक्तियों द्वारा यहां तक कहा जा रहा है कि रानी पद्मावती थी ही नहीं। इसे सिद्ध करने के लिए वे मलिक मोहम्मद जायसी के ‘पद्मावत’ का उदाहरण देते हैं और कहते हैं कि जायसी ने अपने काव्य में काल्पनिक पात्र को पिरोया है। किन्तु इस पद्मावती के द्वारा जौहर किए जाने के संदर्भ अन्य कई ग्रंथों में मिलते हैं। जौहर के बारे में अमीर खुसरों ने अपने ग्रन्थ “तारीख-ए-अलाई’ में लिखा है कि जब अलाउद्दीन ने 1301 ई. में रणथम्भौर पर आक्रमण किया व दुर्ग को बचाने का विकल्प न रहा तो दुर्ग का राजा अपने वीर योद्धाओं के साथ किले का द्वार खोलकर शत्रुदल पर टूट पड़ा। इसके पूर्व ही वहां की वीरांगनाएं सामूहिक रुप से अग्नि में कूदकर स्वाहा हो गईं।
उल्लेखनीय है कि कर्नल जेम्स टॉड द्वारा राजस्थान का विशद इतिहास लिखा गया है जो दो खण्डों में प्रकाशित है। कर्नल टॉड ने ‘राजस्थान का इतिहास’ में लिखा है कि सन 1275 ई. में चित्तौड़ के सिंहासन पर लक्ष्मण सिंह बैठा, राजा की अवस्था उस समय छोटी थी, इसलिए उसका संरक्षक राजा के चाचा भीमसिंह को बनाया गया। राजा भीमसिंह का विवाह उस समय की अद्वितीय सुंदरी रानी पद्मिनी के साथ हुआ था, रानी की सुंदरता का जब अलाउद्दीन खिलजी को पता चला तो उसने रानी को प्राप्त करने के लिए चित्तौड़ पर आक्रमण कर दिया। अलाउद्दीन ने राजा के पास एक संदेश भेजा कि यदि रानी पद्मिनी को उसे दर्पण में भी दिखा देगा तो भी वह इतने से ही प्रसन्न और संतुष्ट होकर दिल्ली लौट जाएगा। राजा ने प्रजाहित में अलाउद्दीन की यह शर्त स्वीकार कर ली। रानी की एक झलक दर्पण में से अलाउद्दीन को दिखा दिया गया। रानी को दर्पण में देखने के पश्चात उसे प्राप्त करने की इच्छा से अलाउद्दीन व्याकुल हो उठा। राणा को शिविर में कैद करके अलाउद्दीन ने किले के भीतर सूचना भिजवाई कि यदि राणा को जीवित देखना चाहते हो तो पद्मिनी को मुझको सौंप दो। यह असंभव शर्त थी। स्थिति की गंभीरता देखते हुए रानी ने अपने दो सेनापतियों गोरा और बादल के साथ योजना बनाई कि शर्त मानने का दिखावा किया जाएगा और रानी तथा उसकी सहेलियों की पालकियों में सशस्त्र राजपूत सैनिक शत्रुओं के पास जाएंगे। अवसर मिलते ही सैनिक राजा को अपनी पालकी में बैठाकर वहां से चल देंगे और पालकियों के भीतर छिपे सैनिक और कहारों के रूप में चल रहे योद्धा मिलकर शत्रुओं के प्रतिरोध का सामना करेंगे। भेद खुलते ही भीषण युद्ध हुआ और जब यह स्पष्ट हो गया कि किला अब शत्रुओं के हाथों में जा सकता है तो रानी पद्मिनी ने अनेक महिलाओं सहित जौहर कर लिया। कर्नल टॉड ने लिखा है कि -‘‘शिविर और सिंह द्वार पर जो कुछ हुआ, उसे देखकर अलाउद्दीन का साहस टूट गया। पद्मिनी को पाने के स्थान पर उसने जो कुछ पाया, उससे वह युद्ध को रोककर अपनी सेना के साथ दिल्ली की ओर रवाना हो गया।’’ आज भी चित्तौड़ के किले में वह कुण्ड मौजूद है जिसमें रानी पद्मावती ने जौहर किया था। राजपूत आज भी उन्हें सती माता के रूप में याद करते हैं।
जब किसी व्यक्ति से गहन संवेदनाएं जुड़ी हों तो उसके जीवन पर फिल्म बनाते समय सावधानियां जरूरी हो जाती हैं। फिर चित्तौड़ राजघराने के वंशज आज भी मौजूद हैं जिनसे विचार-विमर्श करना तथा पहली फिल्म स्क्रीनिंग में उन्हें शामिल करना आवश्यक था। यदि ऐसा किया गया होता तो विवाद बनने के पहले ही समस्या सुलझ गई होती।
दुख तो इस बात की है कि जावेद अख़्तर जैसे वरिष्ठ साहित्यकार रानी पद्मावती के अस्तित्व पर ऐसे अजीबोगरीब वक्तव्य दे रहे हैं। लखनऊ में एक न्यूज चैनल से बातचीत में जावेद ने कहा कि राजपूत-रजवाड़े अंग्रेजों से तो कभी लड़े नहीं और अब सड़कों पर उतर रहे हैं। ये जो राणा लोग हैं, महाराजे हैं, राजे हैं राजस्थान के, 200 साल तक अंग्रेज के दरबार में खड़े रहे पगड़ियां बांधकर, तब उनकी राजपूती कहां थी। ये तो राजा ही इसीलिए हैं, क्योंकि इन्होंने अंग्रेजों की गुलामी स्वीकार की थी।’’
इतना ही नहीं फिल्म के विरोध को लेकर जावेद अख़्तर बोले कि ’देश में सेंसर बोर्ड को ही बंद कर देना चाहिए’। उनका यह भी कहना है कि ’फिल्मों को इतिहास मत समझिए और इतिहास को भी फिल्म से मत समझिए।’ इस तरह के संवाद यदि किसी और के होते तो यह मानना पड़ता कि सस्ती लोकप्रियता के लिए आग में घी डालने का काम किया जा रहा है लेकिन जावेद अख़्तर तो स्वयं ही एक प्रसिद्ध व्यक्ति हैं अतः उन्हें तो कम से कम संयम से काम लेना चाहिए। उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारतीय इतिहास में महाकाव्यों का भी बहुत महत्व है और वे भी अतिशयोक्तियों को अलग करते हुए साक्ष्य के रूप में स्वीकार किए जाते हैं। 
यूं भी हिन्दी सिनेमा जिस दौर से गुज़र रहा है वह भी कम चिन्तनीय नहीं है। हिन्दी सिनेमा में हॉलीवुड फिल्मों की नकल के साथ ही दक्षिण भारतीय फिल्मों की नकल और रीमेक का चलन बढ़ गया है। ऐसे में मौलिक फिल्म बनाने वाले फिल्मकारों को हठ की नीति अपनाने के बजाए सावधानी रखते हुए फिल्में बनानी चाहिए। आखिर वे इतनी मेहनत आमजनता के लिए ही तो करते हैं फिर जन भावनाओं की अवहेलना क्यूं? विवाद की आंच को महसूस करते हुए कई राज्य सरकारों ने अपने राज्य में ‘पद्मावती’ के प्रदर्शन पर समस्या का समाधान होने तक के लिए रोक लगा दी है जिनमें राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और पंजाब प्रमुख हैं। यही उचित क़दम है और इसी तरह के संयमित क़दम उठाते हुए बुद्धिजीवियों को भी भड़कावे वाले संवाद करने से परहेज करना चाहिए। यह शांतिव्यवस्था एवं पारस्परिक सौहार्द्य के लिए जरूरी है।  
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Friday, September 22, 2017

चर्चा प्लस ... मोदी और मुस्लिम महिलाओं का ‘संवाद’ क्या रचेगा नया इतिहास ? - डाॅ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस 
मोदी और मुस्लिम महिलाओं का ‘संवाद’
क्या रचेगा नया इतिहास ? 

- डाॅ. शरद सिंह

(मेरा कॉलम 'सागर दिनकर' में 20.09.2017)

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 22 सितम्बर को अपने संसदीय क्षेत्र बनारस पहुंचने वाले हैं। अपने इस दो दिवसीय दौरे में वे डीरेका ऑडिटोरियम में मुस्लिम महिलाओं के साथ ‘संवाद’ कार्यक्रम के अंतर्गत बातचीत करेंगे। इसमें काफी संख्या में वे मुस्लिम महिलाएं शामिल होने की संभावना हैं जो लंबे समय से तीन तलाक के खिलाफ आवाज बुलंद करती रही हैं। इस बात को नकारा नहीं जा सकता है कि तीन तलाक मामले के बाद मुस्लिम महिलाओं के बीच प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता बढ़ी है। इसीलिए आशा की जा रही है कि यह संवाद कार्यक्रम मुस्लिम महिलाओं के लिए तरक्की के कई नए रास्ते खोलेगा।
Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper

लगभग 13 राज्यों की 70 हजार मुस्लिम महिला सदस्यों वाले राष्ट्रीय गठबंधन भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन ने मुस्लिम पर्सनल लॉ में सुधार किए जाने की जरूरत जताते हुए नवम्बर, 2015 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी समेत कई नेताओं को पत्र लिखा था तथा बराबरी के हक और लैंगिक न्याय की मांग की थी। इसके बाद 24 अक्तूबर 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्रिपल तलाक़ के मुद्दे पर पहली बार अपनी राय सामने रखते हुए उत्तर प्रदेश में ’महापरिवर्तन रैली’ के दौरान बुंदेलखंड में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि - ‘‘हमें अपनी बेटियों, मांओं और बहनों को बचाना ज़रूरी है, इसमें धर्म आड़े नहीं आना चाहिए। मांओं और बहनों का सम्मान करना चाहिए। अब ये ट्रिपल तलाक़ का मुद्दा आ गया है. जैसे कोई हिंदू, कन्या भ्रूण हत्या जैसे अपराध में लिप्त होता है तो उसे जेल जाना पड़ता है उसी तरह से मेरी मुसलमान बहनों का क्या अपराध कि कोई फ़ोन पर तलाक़ कह देता है और उनकी ज़िंदगी तबाह हो जाती है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखा है कि महिलाओं पर किसी तरह की ज़्यादती नहीं होनी चाहिए और धर्म के आधार पर किसी महिला के साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए। लोकतंत्र में बातचीत होनी चाहिए। सरकार ने अपनी स्थिति साफ़ कर दी है। वो लोग जो ट्रिपल तलाक़ के मुद्दे से ध्यान भटकाना चाहते हैं, ऐसे लोग जनता को भड़का रहे हैं। हमारे देश में मुस्लिम महिलाओं की ज़िंदगी ट्रिपल तलाक़ से बर्बाद होने की इजाज़त नहीं दी जा सकती। कुछ पार्टियां वोट बैंक की ख़ातिर 21 वीं सदी में महिलाओं के प्रति अन्याय करने पर उतारू हैं। ये किस तरह का इंसाफ़ है। राजनीति और चुनाव की अपनी जगह है लेकिन मुस्लिम महिलाओं को संविधान के मुताबिक़ अधिकार देना सरकार की और देश के लोगों की ज़िम्मेदारी है। तलाक़ के मुद्दे पर बहस में मुस्लिम समुदाय के उऩ पढ़े लिखे लोगों को हिस्सा लेना चाहिए जो क़ुरान की अच्छी जानकारी रखते हों। मुस्लिम समुदाय में भी प्रगतिशील सोच रखने वाले पढ़े लिखे लोग हैं। शिक्षित मुस्लिम महिलाएं भी इस मुद्दे पर अपने विचार रख सकती हैं।’’
तमाम मतभेदों के बावजूद भी विरोधी भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि शायद आज भी नरेन्द्र मोदी की जगह किसी और के नेतृत्व की सरकार होती तो इस प्रकार का फैसला नहीं आ पाता क्योंकि जिस दृढ़ता के साथ केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सामने सरकार का पक्ष रखा, उससे सुप्रीम कोर्ट को फैसला सुनाने में और भी आसानी हो गई। केन्द्र की मोदी सरकार ने सुप्रीम अदालत में अपना पक्ष दृढ़ता पूर्वक रखते हुए कहा था कि सभी पर्सनल कानून संविधान के दायरे में हों। ’’शादी, तलाक, संपत्ति और उत्तराधिकारी के अधिकार को भी एक नजर से देखा जाना चाहिए। तीन तलाक इस्लाम का अभिन्न अंग नहीं है।’’
तीन तलाक के प्रकरण में हुआ फैसला इस लिए भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पक्ष को मजबूती देता है क्यों कि लोग अभी शाहबानो प्रकरण को भूले नहीं हैं। राजीव गांधी सरकार ने कट्टरपंथियों के दबाव में आकर मुस्लिम महिलाओं को गुजारा भत्ता देने संबंधी सुप्रीम कोर्ट के आदेश को कानून बनाकर पलट दिया था। मध्य प्रदेश के जिला इंदौर की शाहबानो को उनके पति मोहम्मद अहमद खान ने सन् 1978 में तलाक दे दिया था। तलाक के समय शाहबानो के पांच बच्चे थे। इनके भरण−पोषण के लिए उन्होंने निचली कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने शाहबानो के पक्ष में फैसला सुनाया, बाद में यह मामला हाईकोर्ट होता हुआ सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। सभी जगह शाहबानो के ही पक्ष में फैसले सुनाए गए। उस समय मुस्लिम समाज का कट्टरपंथी पुरुष समुदाय शाहबानो की अपील का विरोध किया। विरोध के दबाव में आकर तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने 1986 में मुस्लिम महिला अधिनियम पारित कर दिया, जिसमें शाहबानो मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय को उलट दिया गया। इस कानून में कहा गया था, ’हर वह आवेदन जो किसी तालाकशुदा महिला के द्वारा अपराध दंड संहिता 1973 की धारा 125 के अंतर्गत किसी न्यायालय में इस कानून के लागू होते समय विचाराधीन है, अब इस कानून के अंतर्गत निपटाया जायेगा, चाहे उपर्युक्त कानून में जो भी लिखा हो।’ उस समय राजीव गांधी सरकार को पूर्ण बहुमत प्राप्त था, इसीलिये उच्चतम न्यायालय के धर्म−निरपेक्ष निर्णय को उलटने वाला मुस्लिम महिला (तालाक अधिकार सरंक्षण) कानून 1986 आसानी से पास हो गया। इसके आधार पर शाहबानो के पक्ष में सुनाया गया फैसला संसद ने पलट दिया।
22 अगस्त 2017 को जब सुप्रीम कोर्ट ने ‘तीन तलाक’ की प्रथा को असंवैधानिक करार दिया तब शाहबानो के बेटे जमील अहमद ने उन दुख भरे दिनों को याद करते हुए कहा था कि ‘‘38 साल पहले जब कोर्ट ने अम्मी (शाहबानो) को भरण−पोषण के 79 रुपए अब्बा से दिलवाए थे, तो लगा था जैसे दुनिया भर की दौलत मिल गई, जो खुशी उस समय मिली थी, वही आज फिर महसूस हो रही है। जब फैसले को लेकर विवाद बढ़ने लगा तो अम्मी इतनी आहत हुईं कि उन्होंने भरण पोषण की राशि ही त्याग दी। अब ऐसा नहीं हो पायेगा। सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक को असंवैधानिक ठहरा कर मुस्लिम महिलाओं के हक में फैसला सुनाया है। जो मशाल 38 साल पहले अम्मी ने जलाई थी, उसकी रोशनी आज पूरे देश और समाज को रोशन कर रही है।’’
बिना किसी राजनीतिक पक्षपात के समाज हित में यह बात स्वीकार की जा सकती है कि उस समय मोदी की सरकार होती तो शायद मुस्लिम महिलाओं को 40 वर्षों तक यूं भटकना नहीं पड़ता। यह भी कहा गया कि प्रधानमंत्री ने कांग्रेस के मुस्लिम वोट के किले में सेंध लगा दी है। लेकिन यदि महिलाओं के मानवीयहित को ध्यान में रखा जाए तो इस प्रकार की राजनीति में बुरा क्या है जब इससे किसी बड़े पक्ष को बुनियादी अधिकार मिल रहा हों।
इस तारतम्य में 22 सितम्बर 2017 को बनारस में होने वाले संवाद कार्यक्रम को देखा जा रहा है। अपने इस दो दिवसीय दौरे में वे डीरेका ऑडिटोरियम में मुस्लिम महिलाओं के साथ ‘संवाद’ कार्यक्रम में भाग लेंगे। इसमें काफी संख्या में वे मुस्लिम महिलाएं शामिल होने की संभावना हैं जो लंबे समय से तीन तलाके के खिलाफ आवाज बुलंद करती रही हैं। यद्यपि वहीं दूसरी ओर देश की प्रमुख समाचार ऐजेंसियों के अनुसार मुस्लिम बाहुल शक्करतालाब इलाके में कट्टरपंथियों के सक्रिय होने से महिलाओं को धमकाने का दौर शुरू हो गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ’संवाद’ कार्यक्रम को लेकर मुस्लिम महिलाओं को धमकाए जाने का मामला सामने आया। कार्यक्रम में शामिल होने की इच्छुक महिलाओं को कट्टरपंथी घर-घर जाकर मारने-पीटने के साथ सामाजिक बहिष्कार की धमकी दे रहे हैं। यह जानकारी स्वयं मुस्लिम महिला फाउंडेशन की महिला कचहरी में सामने रखी गई। प्रशासन को भी इस बारे में जानकारी दी जा चुकी है।
वरुणापार इलाके में रविवार को मुस्लिम महिला फाउंडेशन की ओर से आयोजित महिला कचहरी में शामिल हुई शबाना ने बताया कि कट्टरपंथियों के इशारे पर युवकों की टोली घरों में बार-बार जाकर महिलाओं को पीएम कार्यक्रम में न जाने की बात कह धमका रही है। गुड़िया, रेशमा, शहनाज और आफरीन के अलावा एक दर्जन अन्य महिलाओं ने भी धमकाए जाने की जानकारी दी। महिलाओं ने बताया कि धमकी देने वाले कह रहे हैं कि मोदी कार्यक्रम के दिन घर से बाहर कदम रखते ही हाथ-पैर तोड़ दिया जाएगा। इस पर मुस्लिम महिला फाउंडेशन की नेशनल सदर नाजनीन अंसारी ने महिला कचहरी में कहा कि धमकी देने वाले कायर हैं। मुस्लिम महिलाएं जागरुक हो चुकी हैं। प्रधानमंत्री मोदी से मिलकर वे अपनी परेशानी जरूर बताएंगी। इस मसले पर सर्वसम्मति से तय किया गया ज्यादा से ज्यादा महिलाएं हर कीमत पर प्रधानमंत्री से मिलने जाएंगी। धमकी देने वालों के खिलाफ लिखित रिपोर्ट एसएसपी को दी जाएगी। मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के राष्ट्रीय सेवा प्रमुख डा. राजीव श्रीवास्तव का कहना है कि धमकी देकर मुस्लिम महिलाओं में डर पैदा करने का प्रयास किया जा रहा है।
प्रधानमंत्री के ‘‘संवाद कार्यक्रम’’ के प्रति उत्साही मुस्लिम महिलाओं का साहस देखते हुए इस बात को नकारा नहीं जा सकता है कि तीन तलाक मामले के बाद मुस्लिम महिलाओं के बीच प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता बढ़ी है। एक ओर भारतीय मुस्लिम महिलाओं का संघर्ष दूसरी ओर सरकार की महिलाओं के हित में सकारात्मक सोच और तीसरी भारतीय न्यायायिक व्यवस्था का मानवीय दृष्टिकोण - इन तीनों ने शक्तियों ने मिल कर भारतीय मुस्लिम महिलाओं के पक्ष में ‘तीन तलाक’ से मुक्ति का जो द्वार खोला है वह उन महिलाओं के सुखद और सुरक्षित भविष्य की ओर एक बड़ा और मज़बूत क़दम है। इसीलिए आशा की जा रही है कि यह संवाद कार्यक्रम मुस्लिम महिलाओं के लिए प्रगति के नए द्वार खोलेगा और रचेगा नया इतिहास।
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