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Wednesday, November 11, 2020

चर्चा प्लस | सतर्कता से दीपावली मनाना है, कोरोना को हराना है | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस
सतर्कता से दीपावली मनाना है, कोरोना को हराना है
   - डाॅ शरद सिंह
  दीपावली वह त्यौहार है जिसका नाम लेते ही दीपकों की जगमग करती कतारों की तस्वीर आंखों के आगे घूम जाती है। लाई, बताशे, पटाखे, फुलझड़ी आदि इसे और अधिक रोचक बना देते हैं। लेकिन इस बार की दीपावली वैसी नहीं होगी जैसी हम हमेशा मनाते आए हैं। कारण कि कोरोना आपदा से अभी छुटकारा नहीं मिला है। इस बार की दीपावली सतर्क दीपावली के रूप में मनाने में ही सुरक्षा और खुशियां दोनों निहित है। साथ ही इसे हम परमार्थ रूप दे कर सार्थक दीपावली यानी एक स्पेशल दीपावली में बदल सकते हैं। 

दीपावली का उत्साह कोरोना के भय पर भारी पड़ रहा है। बाज़ार में दूकानें सज गई हैं और भीड़ उमड़ने लगी है। फिर भी हर व्यक्ति दुविधा की स्थिति से गुज़र रहा है। इतने बड़े त्यौहार को वह फीका भी नहीं जाने देना चाहता है और वहीं उसके भीतर कोरोना संक्रमण कर भय भी समाया हुआ है। कोरोना के भय के प्रति देश में हर स्तर पर प्रशासन भी सतर्क है। इसी लिए दीपावली पर एनजीटी यानी नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने सतर्कता नोटिस जारी करते हुए देश के 23 राज्यों में पटाखों की बिक्री और उपयोग पर अस्थायी प्रतिबंध लगाने पर अपना आदेश सुनाया है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी राष्ट्रीय हरित अधिकरण की स्थापना 18 अक्तूबर 2010 को एनजीटी अधिनियम, 2010 के तहत पर्यावरण संरक्षण, वन संरक्षण, प्राकृतिक संसाधनों सहित पर्यावरण से संबंधित किसी भी कानूनी अधिकार के प्रवर्तन, दुष्प्रभावित व्यक्ति अथवा संपत्ति के लिये क्षतिपूर्ति प्रदान करने एवं इससे जुड़े हुए मामलों के प्रभावशाली और त्वरित निपटारे के लिये की गई थी। दूसरे शब्दों में इसे पर्यावरण अदालत कहा जा सकता है, जिसे हाई कोर्ट के समान शक्तियां प्राप्त हैं। एनजीटी ने 30 नवंबर की रात तक दिल्ली एनसीआर सहित देश के उन शहरों और कस्बों में पटाखों पर पूरी तरह बैन लगा दिया है जहां पिछले साल नवंबर में हवा की गुणवत्ता खराब रही। आतिशबाजी पर भी पाबंदी लगाई गई है। वहीं मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने पटाखों पर पाबंदी तो नहीं लगाई है लेकिन चाईनीज़ पटाखे बेचने और चलाने पर रोक लगाई है।

दीपावली मानने को ले कर एनजीटी ने गाईडलाईन भी जारी की है जिसके अनुसार जिन शहरों में वायु प्रदूषण इंडेक्स 200 से ज्यादा है, वहां पर पटाखों की बिक्री और पटाखे जलाने पर रोक लगाई गई है। जिन शहरों में वायु प्रदूषण खतरे के बिन्दु से नीचे होगा, वहां पर पटाखे बेचे जा सकेंगे और उन्हें जलाने के लिए दो घंटे का समय निर्धारित रहेगा। यह पटाखे त्यौहारों यथा - दीपावली, छठ, न्यू ईयर और क्रिसमस जैसे त्यौहारों पर जलाए जा सकेंगे। पश्चिम बंगाल, ओडिशा, राजस्थान और हरयाणा समेत एनजीटी ने 23 राज्यों में पटाखों की बिक्री और उपयोग पर अस्थायी प्रतिबंध लगाने पर अपना आदेश सुनाया है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने कहा, ‘वैसे शहर या कस्बे जहां वायु गणवत्ता ‘मध्यम’ या उसके नीचे दर्ज की गई, वहां सिर्फ हरित पटाखों की बिक्री हो सकती है और दीपावली, छठ, नया साल, क्रिसमस की पूर्व संध्या जैसे अन्य मौकों पर पटाखों के इस्तेमाल और उन्हें फोड़ने की समय सीमा को दो घंटे तक ही सीमित रखी जा सकती है, जैसा कि संबंधित राज्य इसको तय कर सकते हैं।’ इसके साथ ही नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने कहा कि ‘वहीं अन्य स्थानों पर प्रतिबंधरोक अधिकारियों के लिए वैकल्पिक है और अगर अधिकारियों के आदेश में इस संबंध में कड़े कदम हैं, तो वे लागू होंगे।’ यह गाईडलाईन इसलिए जारी की गई है क्योंकि वायु प्रदूषण से कोविड-19 के मामले बढ़ सकते हैं।  इसके अलावा जिन शहरों में वायु प्रदूषण प्रतिशत अपेक्षाकृत कम है, वहां सिर्फ ग्रीन पटाखे ही छोड़े जा सकते हैं, वह भी मात्र दो घंटे की निर्धारित अवधि में। यह याद रखना जरूरी है कि इस बार तो कोरोना आपदा का दौर है। कोरोना हवा में ही तेजी से फैलता है। अगर पर्यावरण प्रदूषित होगा तो कोरोना भी उतनी तेजी से ही फैलेगा। इसलिए प्रदेश सरकार के द्वारा दी गई छूट रूपी विश्वास का सम्मान करते हुए मध्यप्रदेश में भी पटाखे कम से कम चलाए जाएं तो इससे हवा को प्रदूषित होने से बचाए रख सकेंगे और कोरोना संक्रमण को फैलाने के अपराध के मानवीय अपराध के भागीदार भी नहीं बनेंगे। इस बार अध्योध्या में अभूतपूर्व दीपोत्सव मानाया जाना है। उस दीपोत्सव की संकल्पना का अनुसरण करते हुए हम भी दीपोत्सव मना सकते हैं। दीपक पटाखों की तरह वायु को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं, वहीं जगमग रोशनी की सुंदरता से सराबोर कर देते हैं। प्रकाश का त्यौहार है दीपावली तो सही मायने में प्रकाश पर ही आधारित दीपावली हम मनाएं, व्यर्थ ही पटाखें के बारूद से धन और वायु का अपव्यय क्यों करें? कुछ पल की खुशी के लिए ध्वनि और वायु प्रदूषण बढ़ा कर कोरोना को न्योता देने से बेहतर है कि हम पटाखों में व्यय होने वाले पैसों से उन लोगों की मदद करें जो कोरोना आपदा के चलते बेरोजगार हो गए हैं अथवा महानगरों से अपने घर-गांव लौट कर आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं।

कोरोना के मामलों की गिनती में भले ही आधिकारिक रूप से कमी दिखाई दे रही हो लेकिन इससे चिन्तामुक्त नहीं हुआ जा सकता हैं। चिकित्सकों एवं विशेषज्ञों का भी मानना है कि बढ़ती सर्दी में कोरोना संक्रमण का दूसरा दौर आ सकता है। इस घातक वायरस का अभी भी कोई टीका विकसित नहीं हुआ है। इसलिए इस दीवाली हमें अपने और अपने परिवार को सुरक्षित रखने के लिए पहले की तरह सतर्क रहना होगा। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं है कि दीपावली के जोश को कम होने दें। थोड़ी-सी समझदारी और सतर्कता के साथ खुशियों भरी सुरक्षित दीपावली मनाई जा सकती है। सतर्कता सिर्फ़ इतनी रखनी है कि बड़े और भीड़-भाड़ वाले दीपावली के समारोहों में जाने से बचें। कोरोनावायरस के फैलने का जोखिम सबसे ज्यादा उन स्थानों पर है जहां छोटे स्थान में अधिक लोग इकट्ठा होते हैं। विस्तार वाली जगह में जहां सोशल डिस्टेंसिंग संभव है वहां भी कई बार डिस्टेंसिंग बनाए रखना कठिन हो जाता है। आप हर व्यक्ति से सतर्कता भरी बुद्धिमानी की उम्मींद नहीं कर सकते हैं। कई लोग जान की परवाह किए बिना ढिठाई की हद तक बेपरवाह हो जाते हैं और बिना मास्क के लपक कर मिलने के लिए निकट चले आते हैं। ऐसे समय आप सभ्यता एवं संकोचवश ‘‘दूर रहिए-दूर रहिए’’ भी नहीं कह पाते हैं और मन ही मन डरते रहते हैं। इसलिए बेहतर है कि ऐसी कठिनाई वाली स्थिति में ही क्यों फंसा जाए। 

जब बात भीड़ से बचने की हो तो त्यौहारी खरीददारी के लिए बाज़ार जाने से भी परहेज करना जरूरी है। त्यौहार के समय बाज़ार में भीड़ जुटना स्वाभाविक है। ऐसे में कोरोना से खुद का बचाव करना बेहद कठिन है। सभी जानते हैं कि भीड़ में संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। इस कोरोनाकाल में बिना किसी अतिरिक्त खर्च के स्थानीय दूकानदार ‘‘एट डोर सर्विस’’ देने लगे हैं। तो इस घर बैठी सेवा का लाभ उठाते हुए त्यौहारी खरीददारी की जा सकती है। इसलिए कोरोना के डर से मन मारने के बजाए कोरोना काल में ऑनलाइन शॉपिंग सबसे बेहतर विकल्प है।
जहां तक आर्थिक संकट से जूझ रहे लोगों की मदद का प्रश्न है तो कोरोना काल में रोजी रोटी के संकट से जूझ रहे कुम्हारों के लिए स्थानीय प्रशासन ने ‘‘बाज़ार बैठकी’’ से उन्हें मुक्त रख कर उनकी बहुत बड़ी सहायता की है। कोरोना और आर्थिक संकट दोनों से जूझते हुए भी कुम्हारों ने अपनी उम्मींद का दिया जलाए रखा है और वे उत्साहपूर्वक दिए बना रहे हैं। दीपावली के अवसर पर मिट्टी से बने हुए दीपकों के साथ ही लक्ष्मी, गणेश, कुबेर, अन्न का कूडा, ग्वालिन आदि की भी जरूरत पड़ती है। कुम्हार भी कोरोना आपदा की गंभीरता को समझते हैं। उन्हें मजबूरी में बाज़ार की भीड़ के बीच अपनी दूकानें लगानी पड़ रही हैं, फिर भी वे घर-घर घूमते हुए भी दीपक तथा मिट्टी की अन्य वस्तुएं बेचते घूम रहे हैं। यदि घर के दरवाज़े आए कुम्हारों से हम बिना अधिक मोलभाव किए दीपक आदि खरीदेंगे तो इससे हम भीड़ भरे बाज़ार में जाने से भी बचेंगे और उन कुम्हारों से सामग्री खरीद कर उनकी आर्थिक मदद भी कर सकेंगे। आखिर जो वस्तुएं वे हमारे घर के दरवाज़े पर ला रहे हैं वही वस्तुएं तो बाज़ार में मौजूद है।  

ये छोटी-छोटी लेकिन महत्वपूर्ण सतर्कता दीपावली की खुशियों पर कोरोना का ग्रहण लगने से बचाए रखेगी। फिर यह भी संभव है कि इस तरह की संकट वाली यह इकलौती दीपावली हो। दुनिया भर में चल रहे अनुसंधानों को देखते हुए हम आशा कर सकते हैं कि अगली दीपावली के पहले तक हर व्यक्ति के पास वैक्सीन पहुंच जाएगा और अगली दीपावली हम कोरोना आपदा से मुक्त हो कर मनाएंगे। तो इस बार की दीपावली में कुछ अलग हट कर, कुछ सुरक्षित, कुछ सतर्क, कुछ दूरियों के साथ दीपावली का आनंद लें और कोरोना के भय पर विजय पाएं। आखिर पटाखों के बिना भी दीपावली हो सकती है दमदार।
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(दैनिक सागर दिनकर में 11.11.2020 को प्रकाशित)
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Thursday, May 28, 2020

इम्तिहां और भी हैं ....कोरोना की कबड्डी उस पर टिड्डी - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह


Dr (Miss) Sharad Singh
इम्तिहां और भी हैं ....
कोरोना की कबड्डी उस पर टिड्डी
         - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
 #दैनिक_जागरण में प्रकाशित मेरा यह लेख बढ़ते संकटों पर ... आप भी पढ़िए...
हार्दिक आभार "दैनिक जागरण"🙏
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इम्तिहां और भी हैं ....
कोरोना की कबड्डी उस पर टिड्डी
  - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
           जब भी लगता है कि हालात से समझौता करना हमें आ गया है उसी दौरान एक न एक नया संकट खड़ा हो जाता है। कोरोना वायरस की कबड्डी चल ही रही थी कि टिड्डी दल आ धमका। खेत के खेत चट कर जाने वाले टिड्डी दल के कहर से बुंदेलखंड भी नहीं बचा। वह तो गनीमत है कि ग्रामीण और किसान अपने स्तर पर पहले से ही तैयार थे इस संकट से जूझने के लिए। इसलिए फिलहाल उतने बड़े पैमाने पर नुकसान नहीं हुआ जितने की आशंका थी। ग्रामीणों और किसानों ने शोर मचा कर, धुंआ कर टिड्डी दल को अपने इलाके से निकालने में सफलता पाई। यद्यपि यह कहा जा रहा है कि पाकिस्तान भारत के सीमाक्षेत्र में टिड्डियों की ब्रीडिंग कर रहा है। अर्थात् यह संकट फिर आएगा। उधर बुहान की ‘बेटलेडी’ कहलाने वाली वैज्ञानिक का कहना है कोरोना से भी अधिक भयानक वायरस का सामना करना पड़ सकता है। ऐसा लगता है कि देश के दोनों पड़ोसियों ने तय कर लिया है कि भारतीयों को चैन से नहीं रहने देना है। एक कोरोना भेज रहा है तो दूसरा टिड्डियां। और हमारे यहां दशा यह है कि लगभग चार माह से सैनेटाईज़र का उपयोग करते रहने के बाद अनुसंधान का कथित परिणाम बताया जाता है कि चालीस दिन तक लगातार सैनेटाईज़र उपयोग करने से शरीर को नुकसान पहुंचता है। इतना ही नहीं इस कोरोनाकाल में अनेक घटनाएं ऐसी हुईं जिनमें सीधे मनुष्यों पर सैनेटाईज़र का छिड़काव कर दिया गया। अभी हाल ही में एक कंटेनमेंट एरिया में स्त्रियों और बच्चों पर सैनेटाईज़र का स्प्रे कर दिया गया जिससे उन्हें आंखों और शरीर में जलन होने लगी। गोया टिड्डियों से निपटने के लिए स्प्रे नहीं है लेकिन मनुष्यों पर इस्तेमाल करने के लिए हानिकारक स्प्रे है।
Dainik Jagaran, Article of Dr (Miss) Sharad Singh, 28.05.2020
.     इसी वर्ष जनवरी के अंतिम सप्ताह में यह सूचना जारी की गई थी कि भारत में केरल में कोरोना वायरस का पहला मरीज मिला है। वह मरीज चीन के वुहान प्रांत में मेडिकल स्टूडेंट था और वहां से अन्य भारतीयों के साथ वापस भारत लाया गया था। पहले मरीज पाए जाने की यह घटना वर्षों पुरानी प्रतीत होती है क्योंकि तब से अब तक लगभग चार माह में कोरोना के आतंक के अनेक रंग सभी लोग देख चुके हैं। कोरोना ने बीमार किया, कोरोना ने क्वारंटाईन कराया, कोरोना ने लाॅकडाउन कराया, कोरोना ने मौत दी और कोरोना ने हजारों मजदूरों को बेघर, बेरोजगार बना दिया। कोरोना ने अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी। बुंदेलखंड ने भी यह सब झेला है और आज भी झेल रहा है। बुंदेलखंड देश का वह इलाका है जो हमेशा विकास की बाट जोहता रहता है। यहां बड़े उद्योगों का अभाव है। यहां बड़ी मंडी का अभाव है। यहां शिक्षा का स्तर अभी भी पिछड़ा हुआ है। यहां जलप्रबंधन की समुचित व्यवस्था नहीं है। यहां के मजदूर किसान पलायन के लिए विवश रहते हैं। विगत वर्षों में सैंकड़ों छोटे किसानों ने अपनी खेती गंवाई और मजदूरी करने के लिए मजबूर हो गए। अपने क्षेत्र में काम की कमी के कारण उन्होंने महानगरों का रूख किया। मगर कोरोना संकट ने उनके लिए वह संकट खड़ा किया जिसके बारे में उन्होंने सोचा भी नहीं होगा। वे सारे प्रतिष्ठान, मिल, कारखाने आदि बंद हो गए जहां वे काम करते थे, वे सड़कें आॅटो, टैक्सी से खाली करा ली गईं जहां वे आॅटो, टैक्सी चला कर आजीविका कमाते थे। काम नहीं तो दाम नहीं। और दाम नहीं तो सिर पर छत नहीं। एक झटके में वे सारे श्रमिक मजदूर, कामगार हर चीज से बेदखल हो गए जो प्रवासी थे। जी हां, वे प्रवासी ही थे क्यों कि वे काम के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान भटकते थे। वे उन शहरों के निवासी नहीं थे। वहां उनका अपना घर नहीं था, अपनी पक्की रोज़ी नहीं थी। इसीलिए जब उन्हें महानगरों से बाहर धकेला गया तो वे अपने गांवों की ओर वापस चल पड़े। पैदल, सायकिल में, आॅटो में, पशुओं की भांति ट्रकों में। कहीं तो ठिकाना चाहिए था उन्हें।

बुंदेलखंड में भी सैंकड़ों मजदूर, कामगार वापस लौट आए हैं। निजी संस्थाओं और जनसेवकों ने उन्हें जिन्दा रहने के लिए दाना-पानी दिया, सहारा दिया। सरकार उन्हें मनरेगा के अंतर्गत काम दे रही है। 45 डिग्री की तपती धूप में सड़क बनाने, तालाब खोदने जैसा जीवट काम। पेट सब कुछ करा देता है। अपना और अपने परिवार का पेट भरने के लिए जी तोड़ मेहनत करने में 45 डिग्री की धूप उन्हें डरा नहीं सकती है। बुंदेलखंड का हरेक प्रवासी मज़दूर अपने कटु अनुभवों के आधार पर यही कहता है कि वह अब कभी उन महानगरों में काम करने वापस नहीं जाएगा। उनका यह निश्चय उन्हें हौसला दे रहा है 45 डिग्री की जलती गरमी में। उस पर एक फूहड़ मैसेज व्हाट्सएप्प पर वायरल किया गया था जिसमें कुछ इस तरह की बातें थीं कि ‘अब मज़दूर मज़दूर बहुत हो गया। मजदूर तो अपने घर पहुंच ही जाएंगे और उन्हें मनरेगा के पैसे मिलेंगे और वे आराम से रहेंगे।’ आदि-आदि इसी तरह की ऊटपटांग शब्दावली थी। इस मैसेज को जिसने बनाया और जिन्होंने मुस्तैदी से फार्वर्ड किया उन्हें मानसिक बीमार ही कहा जा सकता है। वरना ऐसे मैसेज के पक्षधरों को 45 डिग्री के तापमान में काम कराना तो दूर, मात्र दिन भर खड़ा रख कर मनरेगा से दूने पैसे भी दिए जाएं तो वे मनरेगा और मैसेज सब कुछ भूल जाएंगे। 

जब स्थिति संकटों से घिरी हुई हो यानी पहले कोरोना और अब टिड्डी दल, तो हौसला ही उबार सकता है सारे संकट से। यह हौसला विवेक और आपसी सद्भावनापूर्ण विचार तथा व्यवहार से ही पैदा होगा। यह भ्रमित होने का समय नहीं वरन् हर तरह की परीक्षाओं में पास होने का समय है। अगर शायर अल्लामा इकबाल इस दौर में भारत में होते तो यही कहते- 
मुसीबत से आगे जहां और भी हैं 
अभी तो कई  इम्तिहां और भी हैं 
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(दैनिक जागरण में 28.05.2020 को प्रकाशित)
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Wednesday, April 29, 2020

चर्चा प्लस ... वे सबक जो हमें याद रखने होंगे कोरोना के बाद भी - डाॅ शरद सिंह


Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस  
वे सबक जो हमें याद रखने होंगे कोरोना के बाद भी
- डाॅ शरद सिंह
      कोरोना लाॅकडाउन अभी ख़त्म नहीं हुआ है और कोरोना संकट भी। लेकिन एक न एक दिन इसपर विजय जरूर मिलेगी। तब हमें उन सारे सबक पर अमल करना होगा जो हमें इस दौरान मिले हैं। प्रकृति ने हमारे जैसे इंसानों द्वारा ही हम इंसानों को सबक सिखाया है। यदि हम ऐसी आपदा दुबारा देखना नहीं चाहते हैं तो इनमें से कुछ सबक तो हमें याद रखने ही होंगे ।
       कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाव व सुरक्षा के लिए पहले लाॅकडाउन-एक, फिर लॉकडाउन-टू और अब लॉकडाउन- थ्री की बारी है। यदि आरम्भिक ग़लतियों से ही हम सीख ले लेते तो टू और थ्री की बारी नहीं आती। एक बार फिर सागर नगर का ही उदाहरण लें तो यह शहर 10 अप्रैल के पहले तक कोरोना से मुक्त था लेकिन 10 अप्रैल के बाद पूरा शहर सकते में आ गया जब पहला कोरोना पाॅजिटिव पाया गया। मरीज की काॅन्टेक्ट हिस्ट्री भी खंगाली गई जिससे उसके ऐसे दोस्त का भी पता चला जो संक्रमित था। यह जानते हुए भी कि कोरोना संक्रमण की श्रृंखला से फैलता है, लाॅकडाउन लागू होने पर भी उन युवकों द्वारा लापरवाही बरती गई और अनेक लोगों के जान से खिलवाड़ की गई। समाचारों की मानें तो अभी पी-1 अपने नागरिक  कर्तव्य नहीं बल्कि दोस्ती निभा रहा है और अपने उन दोस्तों के नाम नहीं बता रहा है जिनमें से कुछ संक्रमित भी निकल सकते हैं। वह शादीशुदा युवक कोई बच्चा नहीं है कि वह स्थिति की गंभीरता को न समझे। कहीं कोई भ्रम की स्थिति अभी भी शेष है। बहरहाल, हमें उन सबकों के बारे में सोचना चाहिए जो लाॅकडाउन के दौरान हमें मिले हैं और अत्यंत बुनियादी हैं।
Charcha Plus Column of Dr (Miss) Sharad Singh, 29.04.2020

सबक 1-खांसने और छींकने के दौरान मुंह पर कपड़ा या हाथ रखना जरूरी होता है जो हम अधिकांश भारतियों के लिए अब तक गैरजरूरी रहा है।

सबक 2-खांसने या छींकने के बाद अपने हाथ अच्छे से धोंए, उसके बाद ही किसी से हाथ मिलाने की सोचें।

सबक 3-साफ़-सफ़ाई से रहने की आदत डालें, चाहे घर पर हों, दफ़्तर पर हों या शहर में हों। उस हवा को साफ़ रखना हमारी अपनी जिम्मेदारी है जिसमें हम सांस लेते हैं।

सबक 4-बड़े रोचक तरीके से यह बात सामने आ रही है कि दिल्ली वालों ने बरसों बाद आसमान में तारे देखे। ज़ाहिर है कि जहां शाम के चार बजते-बजते प्रदूषण का धुंधलका फैल जाता हो वहां आसमान में तारे नज़र ही कहां आएंगे? इस मामले में एक बात और भी है कि दिल्ली वालों को लाॅकडाउन से पहले आसमान देखने की फ़ुर्सत भी कहां मिली? लाॅकडाउन ने उन्हें शाम के बाद की होटलिंग, पब और पार्टियों से दूर जो कर दिया। अब फ़ुर्सत मिली तो अपने परिवार के सभी सदस्यों के साथ उन्होंने आसमान में चांद-तारों की ओर देखा। यानी सबक की बात यह कि दिल्ली के साथ ही सभी शहर प्रदूषणमुक्त रहें और लोग पैसों या चमक-दमक के पीछे भागने के बजाए अपने परिवार को समय देने की आदत बनाए रखें, कोरोनाबंदी के बाद भी।

सबक 5- अकारण गाड़ियां दौड़ाना भी बंद रखें। गाड़ियों की अनावश्यक दौड़ से ध्वनि और वायु का प्रदूषण-स्तर बढ़ता है, ट्रैफिक व्यवस्था जटिल हो जाती है और कीमती डीज़ल-पेट्रोल की क्षति होती है। सरकारें कभी कार-पूल का आग्रह करती हैं तो कभी ऑड-ईवेन की व्यवस्था लागू करती हैं। वे पब्लिक ट्रांसपोर्ट को भी बढ़ावा देती हैं लेकिन हमारी दिखावा पसंद फितरत हमें घर के हर सदस्य के लिए दो पहिया या चार पहिया गाड़ी लेने को उकसाती है। जिस युवा उम्र में सायकिल चलाना सेहत को दुरुस्त रख सकता है, उस उम्र में चार पहिया या नए माॅडल की धांसू दो पहिया पर चढ़ कर हम जिम के चक्कर लगाते नज़र आते हैं। कोरोनाबंदी के बाद हमें चुनना होगा अपनी सेहत और दिखावे में से किसी एक को।

सबक 6- कोरोनाबंदी यानी लाॅकडाउन ने हमें सिखाया कि बताया कि हम अपने बुजुर्गों के लिए कितने जरूरी हैं या यूं कहा जाए कि कोरोनाबंदी ने हमें हमारे बुजुर्गों से एक बार फिर जोड़ दिया है। इस जुड़ाव को कोरोना के बाद भी हमें यूं ही बनाए रखना है। हमें याद रखना होगा कि बुजुर्गों को युवाओं की और युवाओं को बुजुर्गों की जरूरत है।

सबक 7- हमें अपनी लपरवाहियों और ढिठाई पर काबू पाना होगा। कोरोनाबंदी के बीच मिली छूटों का बेजा लाभ उठाते हुए नियमों की धज्जियां उड़ाने की अनेक घटनाएं देश भर में सामने आईं। तो कोरोना के बाद भी हमें जरूरी नियमों का पालन करने की आदत को मजबूत करना होगा। यह हमारी हर प्रकार की सुरक्षा के लिए जरूरी है।

सबक 8- भीड़ के बजाए कतार के अनुशासन को अपनाए रखना होगा कोरोनाकाल के बाद भी। जीवन में अनुशासन ही संवेदनाओं को भी बढ़ाता है और हम संवेदनशील संस्कृति का अहम हिस्सा हैं।

सबक 9- कोरोना आपदा ने उस भावना को पुनः जगा दिया जो धीरे-धीरे कम सोती जा रही थी, परस्पर एक-दूसरे की मदद की भावना। स्थिति यहां तक जा पहुंची थी कि लोग घायल को सम्हालने के बजाए मोबाईल पर उसके कष्टों की वीडियो बनाने को पागल हो उठते थे। यह घातक प्रवृत्ति समाज से संवेदना को तेजी से घटा रही थी। कोरोना आपदा के दौरान लोग जिस प्रकार विस्थापित मजदूरों, बुजंर्गों और बच्चों की मदद के लिए आगे आए वह एक सुखद अहसास है। परेशान लोगों की मदद की यह भावना कोरोना संकट के बाद भी बनाए रखनी है।

सबक 10- कोई भी आपदा जाति, धर्म अथवा सम्प्रदाय में भेद नहीं करती है, यह कोरोना आपदा ने याद दिला दिया है। अतः कोरोना आपदा के बाद भी हमें जाति, धर्म अथवा सम्प्रदाय से ऊपर उठ कर मानवीय भावनाओं को बनाए रखना होगा। उद्दंड किसी भी जाति, धर्म में हो सकते हैं। अतः ऐसे लोगों के मंसूबों को हवा देने के बजाए आपसी भाईचारे पर ही डटे रहना होगा, जैसा कि कोरोनाबंदी के दौरान हमने किया।  
          बहुत सारे सबकों में से ये कुछ सबक हैं जो कोरोना आपदा ने हमें सिखाए हैं और इन सबकों को हमें कोरोना आपदा के बाद भी याद रखना होगा। यह अच्छी बात है कि अन्य देशों की अपेक्षा हमारे हालात बहुत बेहतर रहे। इन्हें हमें और बेहतर बनाते जाना है।
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(दैनिक सागर दिनकर में 29.04.2020 को प्रकाशित)
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Wednesday, April 22, 2020

लेख - कोरोना के इस दौर में प्राणघातक हो सकता है ढीठ बनना - डाॅ शरद सिंह - हरमुद्दा.कॉम में प्रकाशित

web portal magazine हरमुद्दा. कॉम ने मेरा लेख अपने  दिनांक 22.04. 2020 के अंक में प्रकाशित किया है। 
🚩हरमुद्दा. कॉम के प्रति हार्दिक आभार 🙏
आप इस Link पर भी मेरे इस लेख को पढ़ सकते हैं ... 
https://harmudda.com/?p=17568
*लेख*
*कोरोना के इस दौर में प्राणघातक हो सकता है ढीठ बनना*
*- डाॅ शरद सिंह*
         
*‘सोशल मीडिया स्कूल’ के छात्र कानून तोड़ना ‘डेयरिंग’ यानी दुस्साहस या रोमांच का काम समझते हैं जबकि हक़ीकत में यह सिर्फ़ और सिर्फ़ अपराध होता है। कोई भी कानून नागरिकों की सुरक्षा के लिए बनाया जाता है और आपदा की स्थिति में यह और अधिक जरूरी हो जाता है कि कानून का गंभीरता से पालन किया जाए।*

         कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाव व सुरक्षा के लिए लॉकडाउन-टू लागू है। संक्रमित जिलों में कर्फ्यू की स्थिति बनी हुई है, लेकिन अनेक गांव, शहर, तहसीलें ऐसी हैं, जहां लॉकडाउन लागू होने के बाद भी लोगों की चहलकदमी थमी नहीं है। जब भी लाॅकडाउन में रियायात बरती जाती है कुछ लोग अपना आपा खो बैठते हैं और वहीं किराना, फल व अन्य दुकानों में शारीरिक दूरी के नियमों का पालन करना भूल जाते हैं। जब कि यह सभी को पता है कि कोरोना अति संक्रामक वायरस है। इसके चपेट में जो भी आएगा वह स्वयं तो मौत से टकराएगा ही, साथ ही अपने मित्र, रिश्तेदारों और परिचितों के अलावा अपना ईलाज करने वालों के प्राणों के लिए भी खतरा बन बैठेगा। लेकिन ऐसे ढीठ किस्म के लोग स्थिति की गंभीरता को गोया समझना ही नहीं चाहते हैं। गोया उन्हें दो ही बातों की प्रतीक्षा रहती है कि या तो संक्रमण लग जाए या फिर पुलिस का डंडा पड़ जाए।
            सागर नगर का ही उदाहरण लें तो यह शहर 10 अप्रैल के पहले तक कोरोना से मुक्त था लेकिन 10 अप्रैल के बाद पूरा शहर सकते में आ गया जब पहला कोरोना पाॅजिटिव पाया गया। नगर के शनिचरी क्षेत्र से पाया गया पहला कोरोना पाॅजिटिव मरीज दो दिन पहले बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज में भर्ती किया गया था। संदेह के आधार पर उसका जांच सैंपल लिया गया और जांच में वह पाॅजिटिव निकला। कोरोना पाॅजिटिव मिलने की पुष्टि होते ही उसके निवास क्षेत्र के तीन किलोमीटर के दायरे को सील कर दिया गया। उसके परिवार के कुल पांच सदस्यों को भी क्वारंटीन किया गया। उसके आस-पड़ोस के व्यक्तियों की भी जांच की गई। मरीज की काॅन्टेक्ट हिस्ट्री भी खंगाली गई जिससे उसके ऐसे दोस्त का भी पता चला जो संक्रमित था। यह जानते हुए भी कि कोरोना संक्रमण की श्रृंखला से फैलता है, लाॅकडाउन लागू होने पर भी उन युवकों द्वारा लापरवाही बरती गई और अनेक लोगों के जान से खिलवाड़ की गई। ‘सोशल मीडिया स्कूल’ के छात्र कानून तोड़ना ‘डेयरिंग’ यानी दुस्साहस या रोमांच का काम समझते हैं जबकि हकीकत में यह सिर्फ और सिर्फ अपराध होता है। कोई भी कानून नागरिकों की सुरक्षा के लिए बनाया जाता है और आपदा की स्थिति में यह और अधिक जरूरी हो जाता है कि कानून का गंभीरता से पालन किया जाए। सरकार जानती है कि लाॅकडाउन लागू करने से किस-किस तरह के नुकसान हो सकते हैं। मिल, कारखाने, दूकानें सभी बंद हैं। उत्पादन थम-सा गया है। बिक्री के लिए सामानों की उपलब्धता लड़खडाने लगी है। कुटीर उद्योग और लघु उद्योग पूरी तरह बैठ चुके हैं। आपदा खत्म होने के बाद उन्हें उन्हें एक तगड़े स्टार्टअप की जरूरत पड़ेगी। किसान चिंतित हैं, दूकानदार चिंतित हैं, बेघर-बेरोजगार मजदूर चिंतित हैं और इन सब के लिए चिंतित है सरकार। मगर किसी भी आपदा के लिए कभी कोई पूर्व तैयारी नहीं की जा सकती है। आपदा का मतलब ही है कि अचानक कोई बड़ा संकट आ खड़ा होना। हमारा देश समूचे विश्व की भांति आपदा के दौर से गुज़र रहा है। मगर अन्य देशों की तुलना में हमारे देश में स्थिति कई गुना बेहतर है क्योंकि यहां समय रहते आपदा प्रबंधन अधिनियम लागू कर दिया गया। देश के प्रधानमंत्री ने स्वयं लगातार देश की आमजनता से संवाद बनाए रखा। इस सकारात्मकता ने ही हौसला दे रखा है कोरोना वारियर्स को। फिर भी जो ढीठ किस्म के लोग इन सब बातों को अनदेखा करते रहते हैं और लाॅकडाउन के नियमों को धता बताने की ताक में रहते हैं उन्हें आपदा प्रबंधन अधिनियम के बारे में जरूर जान लेना चाहिए यानी जो बातों से नहीं मानेंगे उनके ऊपर डंडे चलाने का अधिकार रखता है प्रत्येक स्थानीय प्रशासन। जीवन की सुरक्षा के लिए कानून के डंडे भी जरूरी होते हैं।  
               इस वर्ष मार्च महीने के आरम्भ में भारत सरकार ने 123 साल पुराने ब्रिटिश सरकार में बनाए गए एपिडेमिक डिजिज एक्ट 1897 लागू किया था। इस कानून को अंग्रेजों ने फरवरी 1897 में तब के मुंबई शहर में फैल रहे प्लेग महामारी को कंट्रोल करने के लिए बनाया था। इसमें ब्रिटिश सरकार के पास शक्ति थी कि वो देश में कहीं भी ज्यादा लोगों के जुटने पर रोक लगा सकती थी। चूंकि ये कानून राज्य सरकारों को महामारी की प्रकृति को देखते हुए नए नियम बनाने की सहूलियत देता है ऐसे में ये फैसला राज्य सरकारों को लेना होता है कि वह अपने राज्य में क्या नए नियम-कायदे महामारी के प्रकोप को रोकने के लिए बनाना चाहती है। यहां एक बात स्पष्ट रहनी चाहिए कि यह कानून किसी भी प्रकार के आपदा के लिए है जबकि इसके साथ ही एक और कानून है जो एपिडेमिक डिजिज एक्ट 1897 कहलाता है लेकिन इन दोनों कानूनों में परस्पर थोड़ा अंतर है।
            आपदा प्रबंधन अधिनियम को दिसंबर, 2005 में लागू किया गया था। ये एक राष्ट्रीय कानून है जिसका इस्तेमाल केंद्र सरकार करती है ताकि किसी आपदा से निपटने के लिए एक देशव्यापी योजना बनाई जा सके। इस एक्ट के दूसरे भाग के तहत राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के गठन का प्रवधान है. जिसका अध्यक्ष प्रधानमंत्री होता है। इसके अलावा इसके अधिकतम नौ सदस्य हो सकते हैं जिसका चुनाव प्रधानमंत्री के सुझाव पर होता हैं। इसके तहत केंद्र सरकार के पास अधिकार होता है कि वह दिए गए निर्देशों का पालन ना करने वाले पर कार्रवाई कर सकती है। इस कानून के तहत राज्य सरकारों को केंद्र की बनायी योजना का पालन करना होता है। इस कानून की सबसे विशेष बात यह है कि इसमें राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण आदेशों का पालन नहीं करने पर किसी भी राज्य के अधिकारी के साथ-साथ प्राइवेट कंपनियों के अधिकारी पर भी कार्रवाई कर सकती है। ये कानून किसी प्राकृतिक आपदा और मानव-जनित आपदा की परिस्थिति पैदा होने पर इस्तेमाल किया जा सकता है।
             लाॅकडाउन के नियमों का पालन करते हुए जिस संकट से बड़ी आसानी से निपटा जा सकता है, उसे नियमों को तोड़ कर बढ़ावा देना स्वयं को हत्यारा बनाने के समान है। धैर्य, सुरक्षा और शांति से ही टल सकता है यह संकट। यह समझना ही होगा कि ढीठ बनना कोई बुद्धिमानी नहीं है।  
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सागर, मध्यप्रदेश

लेख - कोरोना के इस दौर में प्राणघातक हो सकता है ढीठ बनना - डाॅ शरद सिंह - युवा प्रवर्तक में प्रकाशित

web magazine युवा प्रवर्तक ने मेरा लेख अपने  दिनांक 22.04. 2020 के अंक में प्रकाशित किया है। 
🚩युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏
आप इस Link पर भी मेरे इस लेख को पढ़ सकते हैं ... 
http://yuvapravartak.com/?p=29967

*लेख*
*कोरोना के इस दौर में प्राणघातक हो सकता है ढीठ बनना*
*- डाॅ शरद सिंह*
         
*‘सोशल मीडिया स्कूल’ के छात्र कानून तोड़ना ‘डेयरिंग’ यानी दुस्साहस या रोमांच का काम समझते हैं जबकि हक़ीकत में यह सिर्फ़ और सिर्फ़ अपराध होता है। कोई भी कानून नागरिकों की सुरक्षा के लिए बनाया जाता है और आपदा की स्थिति में यह और अधिक जरूरी हो जाता है कि कानून का गंभीरता से पालन किया जाए।*

         कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाव व सुरक्षा के लिए लॉकडाउन-टू लागू है। संक्रमित जिलों में कर्फ्यू की स्थिति बनी हुई है, लेकिन अनेक गांव, शहर, तहसीलें ऐसी हैं, जहां लॉकडाउन लागू होने के बाद भी लोगों की चहलकदमी थमी नहीं है। जब भी लाॅकडाउन में रियायात बरती जाती है कुछ लोग अपना आपा खो बैठते हैं और वहीं किराना, फल व अन्य दुकानों में शारीरिक दूरी के नियमों का पालन करना भूल जाते हैं। जब कि यह सभी को पता है कि कोरोना अति संक्रामक वायरस है। इसके चपेट में जो भी आएगा वह स्वयं तो मौत से टकराएगा ही, साथ ही अपने मित्र, रिश्तेदारों और परिचितों के अलावा अपना ईलाज करने वालों के प्राणों के लिए भी खतरा बन बैठेगा। लेकिन ऐसे ढीठ किस्म के लोग स्थिति की गंभीरता को गोया समझना ही नहीं चाहते हैं। गोया उन्हें दो ही बातों की प्रतीक्षा रहती है कि या तो संक्रमण लग जाए या फिर पुलिस का डंडा पड़ जाए।
            सागर नगर का ही उदाहरण लें तो यह शहर 10 अप्रैल के पहले तक कोरोना से मुक्त था लेकिन 10 अप्रैल के बाद पूरा शहर सकते में आ गया जब पहला कोरोना पाॅजिटिव पाया गया। नगर के शनिचरी क्षेत्र से पाया गया पहला कोरोना पाॅजिटिव मरीज दो दिन पहले बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज में भर्ती किया गया था। संदेह के आधार पर उसका जांच सैंपल लिया गया और जांच में वह पाॅजिटिव निकला। कोरोना पाॅजिटिव मिलने की पुष्टि होते ही उसके निवास क्षेत्र के तीन किलोमीटर के दायरे को सील कर दिया गया। उसके परिवार के कुल पांच सदस्यों को भी क्वारंटीन किया गया। उसके आस-पड़ोस के व्यक्तियों की भी जांच की गई। मरीज की काॅन्टेक्ट हिस्ट्री भी खंगाली गई जिससे उसके ऐसे दोस्त का भी पता चला जो संक्रमित था। यह जानते हुए भी कि कोरोना संक्रमण की श्रृंखला से फैलता है, लाॅकडाउन लागू होने पर भी उन युवकों द्वारा लापरवाही बरती गई और अनेक लोगों के जान से खिलवाड़ की गई। ‘सोशल मीडिया स्कूल’ के छात्र कानून तोड़ना ‘डेयरिंग’ यानी दुस्साहस या रोमांच का काम समझते हैं जबकि हकीकत में यह सिर्फ और सिर्फ अपराध होता है। कोई भी कानून नागरिकों की सुरक्षा के लिए बनाया जाता है और आपदा की स्थिति में यह और अधिक जरूरी हो जाता है कि कानून का गंभीरता से पालन किया जाए। सरकार जानती है कि लाॅकडाउन लागू करने से किस-किस तरह के नुकसान हो सकते हैं। मिल, कारखाने, दूकानें सभी बंद हैं। उत्पादन थम-सा गया है। बिक्री के लिए सामानों की उपलब्धता लड़खडाने लगी है। कुटीर उद्योग और लघु उद्योग पूरी तरह बैठ चुके हैं। आपदा खत्म होने के बाद उन्हें उन्हें एक तगड़े स्टार्टअप की जरूरत पड़ेगी। किसान चिंतित हैं, दूकानदार चिंतित हैं, बेघर-बेरोजगार मजदूर चिंतित हैं और इन सब के लिए चिंतित है सरकार। मगर किसी भी आपदा के लिए कभी कोई पूर्व तैयारी नहीं की जा सकती है। आपदा का मतलब ही है कि अचानक कोई बड़ा संकट आ खड़ा होना। हमारा देश समूचे विश्व की भांति आपदा के दौर से गुज़र रहा है। मगर अन्य देशों की तुलना में हमारे देश में स्थिति कई गुना बेहतर है क्योंकि यहां समय रहते आपदा प्रबंधन अधिनियम लागू कर दिया गया। देश के प्रधानमंत्री ने स्वयं लगातार देश की आमजनता से संवाद बनाए रखा। इस सकारात्मकता ने ही हौसला दे रखा है कोरोना वारियर्स को। फिर भी जो ढीठ किस्म के लोग इन सब बातों को अनदेखा करते रहते हैं और लाॅकडाउन के नियमों को धता बताने की ताक में रहते हैं उन्हें आपदा प्रबंधन अधिनियम के बारे में जरूर जान लेना चाहिए यानी जो बातों से नहीं मानेंगे उनके ऊपर डंडे चलाने का अधिकार रखता है प्रत्येक स्थानीय प्रशासन। जीवन की सुरक्षा के लिए कानून के डंडे भी जरूरी होते हैं।  
               इस वर्ष मार्च महीने के आरम्भ में भारत सरकार ने 123 साल पुराने ब्रिटिश सरकार में बनाए गए एपिडेमिक डिजिज एक्ट 1897 लागू किया था। इस कानून को अंग्रेजों ने फरवरी 1897 में तब के मुंबई शहर में फैल रहे प्लेग महामारी को कंट्रोल करने के लिए बनाया था। इसमें ब्रिटिश सरकार के पास शक्ति थी कि वो देश में कहीं भी ज्यादा लोगों के जुटने पर रोक लगा सकती थी। चूंकि ये कानून राज्य सरकारों को महामारी की प्रकृति को देखते हुए नए नियम बनाने की सहूलियत देता है ऐसे में ये फैसला राज्य सरकारों को लेना होता है कि वह अपने राज्य में क्या नए नियम-कायदे महामारी के प्रकोप को रोकने के लिए बनाना चाहती है। यहां एक बात स्पष्ट रहनी चाहिए कि यह कानून किसी भी प्रकार के आपदा के लिए है जबकि इसके साथ ही एक और कानून है जो एपिडेमिक डिजिज एक्ट 1897 कहलाता है लेकिन इन दोनों कानूनों में परस्पर थोड़ा अंतर है।
            आपदा प्रबंधन अधिनियम को दिसंबर, 2005 में लागू किया गया था। ये एक राष्ट्रीय कानून है जिसका इस्तेमाल केंद्र सरकार करती है ताकि किसी आपदा से निपटने के लिए एक देशव्यापी योजना बनाई जा सके। इस एक्ट के दूसरे भाग के तहत राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के गठन का प्रवधान है. जिसका अध्यक्ष प्रधानमंत्री होता है। इसके अलावा इसके अधिकतम नौ सदस्य हो सकते हैं जिसका चुनाव प्रधानमंत्री के सुझाव पर होता हैं। इसके तहत केंद्र सरकार के पास अधिकार होता है कि वह दिए गए निर्देशों का पालन ना करने वाले पर कार्रवाई कर सकती है। इस कानून के तहत राज्य सरकारों को केंद्र की बनायी योजना का पालन करना होता है। इस कानून की सबसे विशेष बात यह है कि इसमें राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण आदेशों का पालन नहीं करने पर किसी भी राज्य के अधिकारी के साथ-साथ प्राइवेट कंपनियों के अधिकारी पर भी कार्रवाई कर सकती है। ये कानून किसी प्राकृतिक आपदा और मानव-जनित आपदा की परिस्थिति पैदा होने पर इस्तेमाल किया जा सकता है।
             लाॅकडाउन के नियमों का पालन करते हुए जिस संकट से बड़ी आसानी से निपटा जा सकता है, उसे नियमों को तोड़ कर बढ़ावा देना स्वयं को हत्यारा बनाने के समान है। धैर्य, सुरक्षा और शांति से ही टल सकता है यह संकट। यह समझना ही होगा कि ढीठ बनना कोई बुद्धिमानी नहीं है।  
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सागर, मध्यप्रदेश

चर्चा प्लस … प्राणघातक हो सकता है ढीठ बनना - डाॅ शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस … 

प्राणघातक हो सकता है ढीठ बनना
- डाॅ शरद सिंह

         ‘सोशल मीडिया स्कूल’ के छात्र कानून तोड़ना ‘डेयरिंग’ यानी दुस्साहस या रोमांच का काम समझते हैं जबकि हक़ीकत में यह सिर्फ़ और सिर्फ़ अपराध होता है। कोई भी कानून नागरिकों की सुरक्षा के लिए बनाया जाता है और आपदा की स्थिति में यह और अधिक जरूरी हो जाता है कि कानून का गंभीरता से पालन किया जाए।
         कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाव व सुरक्षा के लिए लॉकडाउन-टू लागू है। संक्रमित जिलों में कर्फ्यू की स्थिति बनी हुई है, लेकिन अनेक गांव, शहर, तहसीलें ऐसी हैं, जहां लॉकडाउन लागू होने के बाद भी लोगों की चहलकदमी थमी नहीं है। जब भी लाॅकडाउन में रियायात बरती जाती है कुछ लोग अपना आपा खो बैठते हैं और वहीं किराना, फल व अन्य दुकानों में शारीरिक दूरी के नियमों का पालन करना भूल जाते हैं। जब कि यह सभी को पता है कि कोरोना अति संक्रामक वायरस है। इसके चपेट में जो भी आएगा वह स्वयं तो मौत से टकराएगा ही, साथ ही अपने मित्र, रिश्तेदारों और परिचितों के अलावा अपना ईलाज करने वालों के प्राणों के लिए भी खतरा बन बैठेगा। लेकिन ऐसे ढीठ किस्म के लोग स्थिति की गंभीरता को गोया समझना ही नहीं चाहते हैं। गोया उन्हें दो ही बातों की प्रतीक्षा रहती है कि या तो संक्रमण लग जाए या फिर पुलिस का डंडा पड़ जाए।
Charcha Plus Column of Dr (Miss) Sharad Singh Dainik Sagar Dinkar, 22.04.2020
                 सागर नगर का ही उदाहरण लें तो यह शहर 10 अप्रैल के पहले तक कोरोना से मुक्त था लेकिन 10 अप्रैल के बाद पूरा शहर सकते में आ गया जब पहला कोरोना पाॅजिटिव पाया गया। नगर के शनिचरी क्षेत्र से पाया गया पहला कोरोना पाॅजिटिव मरीज दो दिन पहले बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज में भर्ती किया गया था। संदेह के आधार पर उसका जांच सैंपल लिया गया और जांच में वह पाॅजिटिव निकला। कोरोना पाॅजिटिव मिलने की पुष्टि होते ही उसके निवास क्षेत्र के तीन किलोमीटर के दायरे को सील कर दिया गया। उसके परिवार के कुल पांच सदस्यों को भी क्वारंटीन किया गया। उसके आस-पड़ोस के व्यक्तियों की भी जांच की गई। मरीज की काॅन्टेक्ट हिस्ट्री भी खंगाली गई जिससे उसके ऐसे दोस्त का भी पता चला जो संक्रमित था। यह जानते हुए भी कि कोरोना संक्रमण की श्रृंखला से फैलता है, लाॅकडाउन लागू होने पर भी उन युवकों द्वारा लापरवाही बरती गई और अनेक लोगों के जान से खिलवाड़ की गई। ‘सोशल मीडिया स्कूल’ के छात्र कानून तोड़ना ‘डेयरिंग’ यानी दुस्साहस या रोमांच का काम समझते हैं जबकि हकीकत में यह सिर्फ और सिर्फ अपराध होता है। कोई भी कानून नागरिकों की सुरक्षा के लिए बनाया जाता है और आपदा की स्थिति में यह और अधिक जरूरी हो जाता है कि कानून का गंभीरता से पालन किया जाए। सरकार जानती है कि लाॅकडाउन लागू करने से किस-किस तरह के नुकसान हो सकते हैं। मिल, कारखाने, दूकानें सभी बंद हैं। उत्पादन थम-सा गया है। बिक्री के लिए सामानों की उपलब्धता लड़खडाने लगी है। कुटीर उद्योग और लघु उद्योग पूरी तरह बैठ चुके हैं। आपदा खत्म होने के बाद उन्हें उन्हें एक तगड़े स्टार्टअप की जरूरत पड़ेगी। किसान चिंतित हैं, दूकानदार चिंतित हैं, बेघर-बेरोजगार मजदूर चिंतित हैं और इन सब के लिए चिंतित है सरकार। मगर किसी भी आपदा के लिए कभी कोई पूर्व तैयारी नहीं की जा सकती है। आपदा का मतलब ही है कि अचानक कोई बड़ा संकट आ खड़ा होना। हमारा देश समूचे विश्व की भांति आपदा के दौर से गुज़र रहा है। मगर अन्य देशों की तुलना में हमारे देश में स्थिति कई गुना बेहतर है क्योंकि यहां समय रहते आपदा प्रबंधन अधिनियम लागू कर दिया गया। देश के प्रधानमंत्री ने स्वयं लगातार देश की आमजनता से संवाद बनाए रखा। इस सकारात्मकता ने ही हौसला दे रखा है कोरोना वारियर्स को। फिर भी जो ढीठ किस्म के लोग इन सब बातों को अनदेखा करते रहते हैं और लाॅकडाउन के नियमों को धता बताने की ताक में रहते हैं उन्हें आपदा प्रबंधन अधिनियम के बारे में जरूर जान लेना चाहिए यानी जो बातों से नहीं मानेंगे उनके ऊपर डंडे चलाने का अधिकार रखता है प्रत्येक स्थानीय प्रशासन। जीवन की सुरक्षा के लिए कानून के डंडे भी जरूरी होते हैं।  
               इस वर्ष मार्च महीने के आरम्भ में भारत सरकार ने 123 साल पुराने ब्रिटिश सरकार में बनाए गए एपिडेमिक डिजिज एक्ट 1897 लागू किया था। इस कानून को अंग्रेजों ने फरवरी 1897 में तब के मुंबई शहर में फैल रहे प्लेग महामारी को कंट्रोल करने के लिए बनाया था। इसमें ब्रिटिश सरकार के पास शक्ति थी कि वो देश में कहीं भी ज्यादा लोगों के जुटने पर रोक लगा सकती थी। चूंकि ये कानून राज्य सरकारों को महामारी की प्रकृति को देखते हुए नए नियम बनाने की सहूलियत देता है ऐसे में ये फैसला राज्य सरकारों को लेना होता है कि वह अपने राज्य में क्या नए नियम-कायदे महामारी के प्रकोप को रोकने के लिए बनाना चाहती है। यहां एक बात स्पष्ट रहनी चाहिए कि यह कानून किसी भी प्रकार के आपदा के लिए है जबकि इसके साथ ही एक और कानून है जो एपिडेमिक डिजिज एक्ट 1897 कहलाता है लेकिन इन दोनों कानूनों में परस्पर थोड़ा अंतर है।
            आपदा प्रबंधन अधिनियम को दिसंबर, 2005 में लागू किया गया था। ये एक राष्ट्रीय कानून है जिसका इस्तेमाल केंद्र सरकार करती है ताकि किसी आपदा से निपटने के लिए एक देशव्यापी योजना बनाई जा सके। इस एक्ट के दूसरे भाग के तहत राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के गठन का प्रवधान है. जिसका अध्यक्ष प्रधानमंत्री होता है। इसके अलावा इसके अधिकतम नौ सदस्य हो सकते हैं जिसका चुनाव प्रधानमंत्री के सुझाव पर होता हैं। इसके तहत केंद्र सरकार के पास अधिकार होता है कि वह दिए गए निर्देशों का पालन ना करने वाले पर कार्रवाई कर सकती है। इस कानून के तहत राज्य सरकारों को केंद्र की बनायी योजना का पालन करना होता है। इस कानून की सबसे विशेष बात यह है कि इसमें राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण आदेशों का पालन नहीं करने पर किसी भी राज्य के अधिकारी के साथ-साथ प्राइवेट कंपनियों के अधिकारी पर भी कार्रवाई कर सकती है। ये कानून किसी प्राकृतिक आपदा और मानव-जनित आपदा की परिस्थिति पैदा होने पर इस्तेमाल किया जा सकता है।
             लाॅकडाउन के नियमों का पालन करते हुए जिस संकट से बड़ी आसानी से निपटा जा सकता है, उसे नियमों को तोड़ कर बढ़ावा देना स्वयं को हत्यारा बनाने के समान है। धैर्य, सुरक्षा और शांति से ही टल सकता है यह संकट। यह समझना ही होगा कि ढीठ बनना कोई बुद्धिमानी नहीं है।  
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(दैनिक सागर दिनकर में 22.04.2020 को प्रकाशित)
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