Showing posts with label श्रीराम. Show all posts
Showing posts with label श्रीराम. Show all posts

Friday, September 5, 2025

शून्यकाल | श्री राम के प्रथम औपचारिक गुरु थे ऋषि वशिष्ठ थे | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

शून्यकाल | श्री राम के प्रथम औपचारिक गुरु थे ऋषि वशिष्ठ थे | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर
 ----------------------------

शून्यकाल | श्री राम के प्रथम औपचारिक गुरु थे ऋषि वशिष्ठ थे
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                 
       यह माना जाता है कि ईश्वर सर्वज्ञता होता है ईश्वर ही नियंता होता है और ईश्वर ही ज्ञान की संरचना करता है किंतु वही ईश्वर जब मनुष्य के रूप में अवतार लेता है तो उसे भी शिक्षक अर्थात गुरु की आवश्यकता होती है। मनुष्य जीवन को सुचारू रूप से निर्धारित करने के लिए तथा कर्तव्यों को भली भांति संपादित करने के लिए जी शिक्षा की आवश्यकता होती है वह एक गुरु ही दे सकता है इसीलिए जब भगवान विष्णु ने श्री राम के रूप में अवतार लिया तो उन्हें भी गुरुओं की आवश्यकता पड़ी उनके प्रथम औपचारिक गुरु थे ऋषि वशिष्ठ।

      कौन थे ऋषि वशिष्ठ जो रामलाल के प्रथम शिक्षक बने ? ऋषि वशिष्ठ वैदिक काल के सबसे प्रसिद्ध राजगुरु थे, भगवान राम के गुरु बने, और योग-वशिष्ठ नामक ग्रंथ में उनके विचारों का संकलन है। उनकी पत्नी अरुंधति थीं और उन्हें आकाश के सप्तर्षि तारामंडल में एक स्थान पर माना जाता है। ऋषि वशिष्ठ महान सप्तऋषियों में से एक हैं। महर्षि वशिष्ठ सातवें और अंतिम ऋषि थे। वे श्री राम के गुरु भी थे और सूर्यवंश के राजपुरोहित भी थे। उन्हें ब्रह्माजी का मानस पुत्र भी कहा जाता है। उनके पास कामधेनु गाय और नंदिनी नाम की बेटी थी। ये दोनों ही मायावी थी। कामधेनु और नंदिनी उन्हें सब कुछ दे सकती थी। महर्षि वशिष्ठ की पत्नी का नाम अरुंधती था।
       ऋषि वशिष्ठ शांति प्रिय, महान और परमज्ञानी थे। ऋषि वशिष्ठ ने सरस्वती नदी के किनारे गुरुकुल की स्थापना की थी. गुरुकुल में हजारों राजकुमार और अन्य सामान्य छात्र गुरु वशिष्ठ से शिक्षा लेते थे। यहाँ पर महर्षि वशिष्ठ और उनकी पत्नी अरुंधती विद्यार्थियों को शिक्षा देते थे। विद्यार्थी गुरुकुल में ही रहते थे। ऋषि वशिष्ठ गुरुकुल के प्रधानाचार्य थे। गुरुकुल में वे शिष्यों को 20 से अधिक कलाओं का ज्ञान देते थे। ऋषि वशिष्ठ के पास पूरे ब्रह्माण्ड और भगवानों से जुड़ा सारा ज्ञान था। वशिष्ठ ब्रह्मा के मानस पुत्र थे । वे त्रिकालदर्शी ऋषि और परम ज्ञानी थे। विश्वामित्र ने उनके 100 पुत्रों का वध कर दिया था, फिर भी उन्होंने विश्वामित्र को क्षमा कर दिया। सूर्यवंशी राजा उनकी अनुमति के बिना कोई भी धार्मिक कार्य नहीं करते थे। त्रेता के अंत में वे ब्रह्मलोक चले गए थे। माना जाता है कि वशिष्ठ आकाश में चमकते सात तारों के समूह में एक पंक्ति में एक स्थान पर स्थित हैं।
महाऋषि वशिष्ठ की उत्पत्ति का वर्णन पुराणों की विभिन्न कथाओं में अनेक रूपों में मिलता है। कहीं उन्हें ब्रह्मा जी के मानस पुत्र, कहीं अग्रीय पुत्र, तो कहीं मित्रावरुण का पुत्र कहा गया है। एक अन्य कथा के अनुसार महर्षि वशिष्ठ के दीर्घकालीन अस्तित्व के संदर्भ में पौराणिक साहित्य के विद्वानों का एक मत यह भी है कि ब्रह्मा के पुत्र ऋषि वशिष्ठ के नाम पर उनके वंशजों को भी "वशिष्ठ" कहा जाना चाहिए। इस प्रकार 'वशिष्ठ' केवल एक व्यक्ति न होकर एक पद बन गए और विभिन्न युगों में अनेक प्रसिद्ध वशिष्ठ हुए। वशिष्ठ की दो पत्नियाँ थीं। एक ऋषि कर्दम की पुत्री "अरुंधति" और दूसरी प्रजापति दक्ष की पुत्री "ऊर्जा"।
     आदि वशिष्ठ भगवान शिव के साढू थे, जिन्होंने दक्ष की एक अन्य पुत्री, देवी सती से विवाह किया था। इस आद्य वशिष्ठ के बाद, दूसरे इक्ष्वाकुचंशी राजा त्रिशंक के काल में हुए, जिन्हें वशिष्ठ देवराज कहा गया। तीसरे कार्तवीर्य सहस्रबाहु के काल में हुए, जिन्हें वशिष्ठ अपव कहा गया। चौथे अयोध्या के राजा बाहु के काल में हुए, जिन्हें वशिष्ठ अथर्वनिधि (प्रथम) कहा गया। सौदास या सुदास (कल्मषपाद) के काल में एक पाँचवें राजा हुए, जिनका नाम वशिष्ठ श्रेष्ठभज था।
       छठे वशिष्ठ राजा दिलीप के काल में हुए, जिन्हें वशिष्ठ अथर्वनिधि (द्वितीय) कहा जाता था। इसके बाद सातवें वशिष्ठ भगवान राम के काल में हुए, जिन्हें महर्षि वशिष्ठ कहा जाता था, और आठवें वशिष्ठ महाभारत काल में हुए, जिनके पुत्र का नाम "शक्ति" था। इनके अलावा, वशिष्ठ मैत्रावरुण, वशिष्ठ शक्ति और वशिष्ठ सुवर्चस सहित कुल 12 वशिष्ठों का उल्लेख पुराणों में मिलता है। वशिष्ठ के बारे में संपूर्ण जानकारी वायु, ब्रह्मांड और लिंग पुराण में मिलती है, जबकि वशिष्ठ वंश के ऋषियों और गोत्रकारों के नाम मत्स्य पुराण में दर्ज हैं।
      पौराणिक संदर्भों के अनुसार, ब्रह्मा के आदेश पर ऋषि वशिष्ठ ने सूर्यवंशी राजाओं का पुरोहिताई स्वीकार किया था । वे पहले इससे सहमत नहीं थे और राजाओं के पुरोहिताई को तपस्या के अतिरिक्त एक निन्दनीय कार्य मानते थे। परन्तु ब्रह्मा द्वारा यह बताए जाने पर कि इसी वंश में आगे चलकर श्रीराम अवतार लेंगे, ऋषि वशिष्ठ ने पुरोहिताई स्वीकार कर ली।
     आदि वशिष्ठ भगवान शिव के साढू थे, जिन्होंने दक्ष की एक अन्य पुत्री, देवी सती से विवाह किया था। इस आद्य वशिष्ठ के बाद, दूसरे इक्ष्वाकुचंशी राजा त्रिशंक के काल में हुए, जिन्हें वशिष्ठ देवराज कहा गया। तीसरे कार्तवीर्य सहस्रबाहु के काल में हुए, जिन्हें वशिष्ठ अपव कहा गया। चौथे अयोध्या के राजा बाहु के काल में हुए, जिन्हें वशिष्ठ अथर्वनिधि (प्रथम) कहा गया। सौदास या सुदास (कल्मषपाद) के काल में एक पाँचवें राजा हुए, जिनका नाम वशिष्ठ श्रेष्ठभज था।
       छठे वशिष्ठ राजा दिलीप के काल में हुए, जिन्हें वशिष्ठ अथर्वनिधि (द्वितीय) कहा जाता था। इसके बाद सातवें वशिष्ठ भगवान राम के काल में हुए, जिन्हें महर्षि वशिष्ठ कहा जाता था, और आठवें वशिष्ठ महाभारत काल में हुए, जिनके पुत्र का नाम "शक्ति" था। इनके अलावा, वशिष्ठ मैत्रावरुण, वशिष्ठ शक्ति और वशिष्ठ सुवर्चस सहित कुल 12 वशिष्ठों का उल्लेख पुराणों में मिलता है। वशिष्ठ के बारे में संपूर्ण जानकारी वायु, ब्रह्मांड और लिंग पुराण में मिलती है, जबकि वशिष्ठ वंश के ऋषियों और गोत्रकारों के नाम मत्स्य पुराण में दर्ज हैं।
         वशिष्ठ से किसी निश्चित व्यक्ति को समझना संभव नहीं है, लेकिन एक ऐतिहासिक वशिष्ठ अवश्य थे, जिनका स्पष्ट बोध ऋग्वेद के सातवें मंडल के सूक्त से होता है, जिसमें उन्होंने दस राजाओं के विरुद्ध सुदास की सहायता की थी। इन विलक्षण वशिष्ठ के जीवन की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक महर्षि विश्वामित्र के साथ उनकी प्रतिद्वंद्विता है। ऋग्वेद में इन दोनों ऋषियों के बीच संघर्ष का विवरण नहीं मिलता, लेकिन वशिष्ठ के पुत्र "शक्ति" और विश्वामित्र के बीच शत्रुता के प्रमाण यहाँ मिलते हैं।
विश्वामित्र ने वाणी में विशेष निपुणता प्राप्त कर सुदास के सेवकों द्वारा "शक्ति" का वध करवाया। इस घटना का संक्षिप्त उल्लेख तैत्तिरीय संहिता में मिलता है। पमविषा ब्राह्मण में वशिष्ठ के पुत्र की मृत्यु और सौदास पर विश्वामित्र की विजय का भी उल्लेख है। वैदिक साहित्य के ऋषि के रूप में वशिष्ठ के अनेक उद्धरण सूत्र, रामायण और महाभारत में मिलते हैं, जिनमें ऋषि वशिष्ठ और विश्वामित्र के संघर्ष का वर्णन है।
           किंवदंतियों के अनुसार, जब विश्वामित्र राजा थे, एक बार वे वशिष्ठ के आश्रम पहुँचे और कामधेनु गाय पाकर प्रसन्न हुए। इसी गाय के लोभ में उनका वशिष्ठ ऋषि से युद्ध हुआ और विश्वामित्र ब्रह्मबल को बाहुबल से अधिक सामर्थ्यवान मानकर तपस्वी बन गए। वैदिक काल का यह संघर्ष रामायण काल ​​में मित्रता में बदल गया। रामकथा में, जब विश्वामित्र यज्ञ की रक्षा के लिए राम और लक्ष्मण को मांगने दशरथ के पास आए, तो वशिष्ठ के कहने पर दशरथ ने अपने पुत्रों को उनके साथ भेज दिया।
 "योग वशिष्ठ" में श्रीराम और ऋषि वशिष्ठ के बीच वह संवाद मिलता है। जिसमें कुछ अनमोल शिक्षाएं हैं। संक्षेप में वे शिक्षाएं इस प्रकार हैं कि जब अहंकार नहीं होता, तो दुःख नहीं होता। इन्द्रियों के धोखे के बारे में पूरी तरह से जानते हुए भी, उनके अनुचर बने रहना मूर्खता है।  जिस प्रकार आंखें होते हुए भी अंधेरे में अपने चरण देखने के लिए प्रकाश की आवश्यकता होती है। उसी तरह, अगर आपके पास पर्याप्त ज्ञान भी है, तो भी आपको सही रास्ता देखने के लिए ईश्वर के प्रति समर्पण की आवश्यकता होती है। केवल अज्ञानी ही सोचते हैं कि वे अलग हैं। अभिमान, अहंकार, दुष्टता और कुटिलता का त्याग करना चाहिए। आत्मज्ञान ही वह अग्नि है जो कामना रूपी सूखी घास को जला देती है। इसे ही समाधि कहते हैं, न कि केवल वाणी का त्याग।
       श्री राम और गुरु वशिष्ठ का संवाद यह बताता है कि जीवन को किस तरह से जीना चाहिए। जीवन की आरंभिक अवस्था में श्री राम गुरु वशिष्ठ से शिक्षा प्राप्त करके अपने पूर्ण जीवन को सही दिशा में निर्धारित कर सके। श्री राम ने 12 वर्ष की उम्र तक गुरु वशिष्ट से शिक्षा प्राप्त की थी जिसमें वैदिक शास्त्रों और दर्शन का अध्ययन शामिल था। यहां इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि गुरुकुल प्रणाली आज की शिक्षा प्रणाली से एकदम भिन्न थी। प्राचीन भारतीय गुरुकुल प्रणाली सिर्फ़ अकादमिक शिक्षा के लिए जगह से कहीं ज़्यादा थी - यह जीवन शिक्षा की एक पवित्र, गहन यात्रा थी। सादगी और प्रकृति में निहित, युवा छात्र या शिष्य वे अपने गुरु के साथ, अक्सर शांत वन आश्रमों में, सांसारिक विकर्षणों से दूर रहते थे। शिक्षा की इस अनूठी पद्धति ने गुरु और शिष्य के बीच एक व्यक्तिगत बंधन को बढ़ावा दिया, जहाँ अनुशासित जीवन, अवलोकन और मार्गदर्शन के माध्यम से ज्ञान का संचार किया जाता था।
        वर्तमान स्कूली शिक्षा के विपरीत, गुरुकुल में बौद्धिक विकास के साथ-साथ चरित्र निर्माण, विनम्रता और आध्यात्मिक आधार पर भी जोर दिया जाता था। ब्रह्मचारी, शास्त्रों, दर्शन, मार्शल आर्ट, गणित, संगीत और नैतिकता का अध्ययन किया, साथ ही संयम, सहानुभूति और शक्ति जैसे मूल्यों को अपनाया। यह केवल आजीविका कमाने के बारे में नहीं था - यह एक धार्मिक और संतुलित जीवन जीने के बारे में था। वस्तुतः यह माना जाता है कि ईश्वर सर्वज्ञता होता है ईश्वर ही नियंता होता है और ईश्वर ही ज्ञान की संरचना करता है किंतु वही ईश्वर जब मनुष्य के रूप में अवतार लेता है तो उसे भी शिक्षक अर्थात गुरु की आवश्यकता होती है। मनुष्य जीवन को सुचारू रूप से निर्धारित करने के लिए तथा कर्तव्यों को भली भांति संपादित करने के लिए जी शिक्षा की आवश्यकता होती है वह एक गुरु ही दे सकता है इसीलिए जब भगवान विष्णु ने श्री राम के रूप में अवतार लिया तो उन्हें भी गुरुओं की आवश्यकता पड़ी उनके प्रथम औपचारिक गुरु थे ऋषि वशिष्ठ।    
   ----------------------------
#DrMissSharadSingh #columnist #डॉसुश्रीशरदसिंह  #स्तम्भकार #शून्यकाल #कॉलम #shoonyakaal #column  #नयादौर

Wednesday, May 29, 2024

चर्चा प्लस | श्रीराम को छाया देने वाले वृक्ष आज कहां हैं? | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस   
श्रीराम को छाया देने वाले वृक्ष आज कहां हैं?
    - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                        
      हम श्रीराम के प्रति अगाध श्रद्धा रखने का दावा करते हैं। हम यह जानने को उत्सुक हैं कि जब श्रीराम सीता और लक्ष्मण सहित वनवास के लिए अयोध्या से निकले तो वे किन मार्गों से होकर लंका तक पहुंचे थे? इसीलिए श्रीराम के वन जाने का मार्ग खोजने का अभियान भी चलाया गया। बहुत कुछ सफलता भी मिली किन्तु एक कड़वा सच भी सामने आया कि हमने उन वृक्षों के साथ अमानवीयता बरती है जिन्होंने श्रीराम को वनगमन के दौरान शीतल छाया प्रदान की थी। आज हम गर्मी की प्रचंडता से घबराए हुए हैं, किन्तु हम सहानुभूति के पात्र नहीं हैं क्योंकि न हमने श्रीराम के वनगमन के उद्देश्य को समझा और न ‘‘रामायण’’ में उल्लेख किए गए वृक्षों का ध्यान रखा।
       ग्लोबल वार्मिंग कोई मिथक विचार नहीं है। वैज्ञानिक दशकों पहले से इसकी चेतावनी देते आ रहे हैं। ग्लोबल वार्मिंग का अर्थ है पृथ्वी का तापमान बढ़ना। पृथ्वी का तापमान बढ़ने से ग्लेशियर्स का पिघलना तेज होता जा रहा है। इससे एक ओर महासागरों का जलस्तर बढ़ रहा है तो दूसरी ओर पीने योग्य पानी के जलस्रोतों का जलस्तर घटता जा रहा है। जब अतिवृष्टि होती है, अति ठंड पड़ती है या अति गर्मी पड़ती है तो हम प्रकृति को कोसते हैं। लेकिन अपने गिरेबान में झांक कर नहीं देखते हैं कि इन सबके लिए हम मनुष्य ही जिम्मेदार हैं। वस्तुतः हम ऐसी आत्ममुग्धता से घिरे हुए प्राणी हैं जो स्वयं को सर्वश्रेष्ठ मान कर पृथ्वी पर मौजूद सभी जड़-चेतन के लिए संकट बढ़ाते जा रहे हैं। बात कहने में कठोर लग सकती है किन्तु सच्चाई यही है कि हम स्वयं को रामभक्त कहते हैं किन्तु यह क्यों नहीं समझ पाते हैं कि श्रीराम ने वनगमन को क्यों स्वीकार किया? महर्षि वाल्मीकि को क्या आवश्यकता थी कि वे वनगमन मार्ग के वृक्षों का उल्लेख अपने ग्रंथ में करते? वे तो श्रीराम की कथा लिख रहे थे, उन्हें प्रकृति-वर्णन की आवश्यकता क्या थी? यदि हम पल भर भी ठहर कर विचार करें तो हम इन प्रश्नों के उत्तर बड़ी आसानी से पा सकते हैं। हम मानते हैं कि श्रीराम एक अवतार थे। उनका जीवन एक ऐसी लीला थी जो शेष मनुष्यों को उचित ज्ञान दे सके। इसीलिए उन्होंने वनमार्ग को स्वीकार किया। वे जानते थे कि उनका वनमार्ग से गुजरना युगों-युगों तक वनसंपदा के प्रति मनुष्यों को जागरूक बनाए रखेगा।

महर्षि वाल्मीकि ने ‘‘रामायण’’ में ऐसे अनेक वृक्षों के नामों का उल्लेख किया है जिनके निकट से हो कर श्रीराम गुजरे थे अथवा उन्होंने उनकी छांह में विश्राम किया था अथवा जिनके बीच उन्होंने पर्णकुटी बना कर कुछ समय निवास किया था। महर्षि वाल्मिीकि भी शायद यही चाहते रहे होंगे की आने वाली पीढ़ियां उन वृक्षों से परिचित रहें और उनका संरक्षण एवं संवर्द्धन करें जिन्हें श्रीराम ने देखा था अथवा जिनकी छाया में उन्होंने विश्राम किया था। तब महर्षि वाल्मीकि को भी अनुमान नहीं रहा होगा कि कलियुग में मानव वृक्षों के प्रति इस तरह अमानवीय हो उठेगा कि उन वृक्षों को भी काटने से नहीं हिचकेगा जिनकी पूर्व पीढ़ी ने श्रीराम को साक्षात देखा था। महर्षि वाल्मिीकि नहीं जानते थे कि कलियुग में मनुष्यों में इतना दोहरापन आ जाएगा कि वह ईश्वर को मानने का धर्मांता की सीमा तक दावा तो करेंगे किन्तु उसके दिखाए मार्ग पर चलने के बारे में सोचेंगे भी नहीं, बल्कि उसके चले हुए मार्गों के चिन्ह ही मिटा देंगे।  

‘‘रामायण’’ एक ऐसा महाकाव्य है जिससे पूरा विश्व परिचित है। इस महाकाव्य में मूल कथा तो श्रीराम और सीता की है, लेकिन यह ग्रंथ उस समय के पेड़-पौधों के बारे में भी ज्ञान देता है। यह तो सभी जानते हैं कि जब श्रीराम वनवास गए तो सीता और लक्ष्मण भी उनके साथ गए थे। रास्ते में उनकी मुलाकात शबरी से हुई। शबरी ने अपने बेर तोड़े और श्रीराम को खिलाए। शबरी चाहती थीं कि जो बेर उन्होंने श्रीराम को खिलाए उनमें से कोई भी बेर खट्टा न हो। इसलिए उन्होंने चखकर बेर इकट्ठा किए और जब उनकी मुलाकात श्रीराम से हुई तो उन्होंने उन्हें अपने मीठे लेकिन झूठे बेर खिलाए। इस विवरण से पता चलता है कि उस काल में भी बेर के पेड़ पाये जाते थे। आज बेर के पेड़ कम होते जा रहे हैं। आधुनिक निर्माण के विस्तार ने बेर के पेड़ को हाशिए पर ला दिया है।

इसी तरह एक और पेड़ है जो ‘‘रामायण’’ पढ़ने वाले लगभग सभी लोगों को याद है। ये पेड़ है अशोक का वृक्ष़। जब रावण ने छल से सीता का हरण कर लिया था तो उसने सीता को अपने महल के बगीचे में अशोक के वृक्ष़ के नीचे रखा था। इसी संदर्भ में अशोक वृक्ष के आकार को लेकर भी एक रोचक घटना का उल्लेख मिलता है। जब वानर राजकुमार हनुमान सीता का पता लगाने के लिए लंका पहुंचे तो उन्होंने सीता माता को अशोक वृक्ष के नीचे बैठे देखा तो वे वृक्ष पर चढ़ गये और पत्तों में छिपकर बैठ गये। जब वे पहरेदारों से छिपकर सीता को श्रीराम का संदेश देने के लिए वृक्ष से नीचे उतर रहे थे तो उनका पैर फिसल गया, जिससे अशोक वृक्ष की एक तरफ की शाखाएं टूट गईं। किंवदंती है कि उस समय से अशोक वृक्ष की एक तरफ कोई शाखा नहीं रहती है। आज अशोक वृक्षों के लिए मंदिर परिसर के अलावा कम ही जगह बची है। कहीं-कहीं काॅलोनियों या होटल परिसर में में अशोक वृक्ष लगा भी दिए जाते हैं तो उन्हें कांट-छांट कर उनसे उनका प्राकृतिक विकास छीन लिया जाता है।  

वाल्मिकी रामायण में 182 प्रकार के पेड़-पौधों का वर्णन है। वाल्मिकी रामायण के प्रथम बालकाण्ड के सर्ग 24 से 27 में ‘‘ताड़का वन’’ का उल्लेख मिलता है। यह वन गंगा और सरयू नदियों के संगम के पूर्व में ताड़का नामक राक्षसी द्वारा आतंकित था और राक्षसी ताड़का के नाम से जाना जाता था। यह माना जाता है कि ताड़का वन वर्तमान बिहार के भू-भाग में था। यद्यपि कुछ लोग इसे पश्चिम बंगाल में गंगा के मैदानी इलाकों के नम पर्णपाती वनों से भी जोड़ कर देखते हैं, जहां धातकी, साल, इंद्रजौ, पाटला, बिल्व, गैब, कुटज, अर्जुन, तेंदू जैसे घने पेड़ बहुतायत में उगते थे। इसी प्रकार अरण्य कांड के 1 से 11 सर्गों में श्रीराम द्वारा दण्डकारण्य क्षेत्र में गमन के दौरान मिले विभिन्न आश्रमों एवं तीर्थों के उल्लेख में जामुन, बकुल, चम्पा के वृक्षों के साथ-साथ ऊंचे-ऊंचे साल वृक्षों वाले नम पर्णपाती वन क्षेत्र का वर्णन है। जो आज भी पूर्वी मध्य प्रदेश में पाया जाता है। यही विशेषता छत्तीसगढ़ और निकटवर्ती महाराष्ट्र, उड़ीसा और आंध्र प्रदेश के जंगलों की भी है। जिससे अनुमान लगाया जा सकता है कि श्रीराम इन वनों से हो कर गए थे।

अरण्यकांड के 15वें सर्ग में गोदावरी के तट पर सह्याद्रि पर्वत में पंचवटी वनों का उल्लेख है, जिसमें पश्चिमी घाट की ऊंची चोटियों के साथ घास के मैदानों में मिश्रित पर्णपाती वनों का उल्लेख है। जहां नदी के तट पर खजूर, ताल के वृक्ष हैं, मैदान में कुश, काश, बांस, आम, कदम्ब, कटहल, शमी, बेर हैं तथा पर्वतों में विविध पुष्पों की लताओं से लदे हुए वन का वर्णन है। साल, पाटला, चंदन, पुन्नाग, अशोक के पेड़ों का भी उल्लेख है। यह विवरण आज भी महाराष्ट्र के पश्चिमी घाट के पाश्र्व पहाड़ी ढलानों के मुख्य भौगोलिक दृश्यों ये मेल खाताहै।
रामायण में अयोध्या कांड के सर्ग 54 से 55 तथा सर्ग 95 में प्रयाग से चित्रकूट तक वन मार्ग का वर्णन मिलता है, जिसमें और भी दूर यमुना नदी के तट पर बांस तथा नरकट के वन हैं। किनारों पर बरगद, नीम, आम हैं, कटहल के पेड़ों की सघनता वाले शुष्क पर्णपाती जंगल और फिर चित्रकूट की पहाड़ियों में साल के पेड़ों के नम पर्णपाती जंगल का उल्लेख है। इसके साथ ही इन वनों में विभिन्न प्रकार की कंदीय प्रजातियों के पौधों की प्रचुरता का भी उल्लेख मिलता है, जो आज भी प्रयाग से यमुना नदी के दक्षिण में उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के विंध्याचल वनों की विशेषता है। अयोध्या काण्ड 55 के अनुसार प्रयाग से चित्रकूट के रास्ते में एक बरगद का पेड़ था, जिसका दर्शन श्रीराम ने अपने वनवास के दौरान किये था। नासिक में पांच बरगद के पेड़ों का एक समूह है जिसे पंचवटी के नाम से जाना जाता है जहाँ श्री राम, लक्ष्मण और देवी सीता अपने वन निर्वासन (नासिक पंचवटी, नासिक जिला, महाराष्ट्र) के दौरान रुके थे।

अरण्यकांड के 75वें सर्ग में ऋष्यमूक पर्वत और पंपासरोवर का वन क्षेत्र का उल्लेख है जो वर्तमान कर्नाटक में है और पश्चिमी घाट पर्वत के उष्णकटिबंधीय वर्षा वनों के साथ-साथ किनारे पर पर्णपाती वन भी हैं। जिसमें झील में मौजूद कमल, विभिन्न किस्मों के कुमुदनी, किनारों पर ताल के पेड़ के साथ-साथ कुश, काश, बांस, आम, कदंब, तिलक, केला, कटहल, बकुल, मैदानी इलाकों में चंपा और साल, पाटला, चंदन, पुन्नाग शामिल थे। पर्वतों में अशोक के वृक्षों के साथ-साथ जूही, मालती, मोगरा आदि विभिन्न पुष्पों की लताओं से लदे वन थे।
रामायण में ही एक और कथा है जिसमें श्रीराम ने साल वृक्ष की ओट ली थी। किष्किंधा राज्य में पंपा नदी के निकट वानरों का राज्य था। बाली और सुग्रीव दो भाई थे जो किष्किंधा के राजा के पुत्र थे। दोनों के बीच राज्य को लेकर विवाद हो गया। सुग्रीव बाली को परास्त करने में असमर्थ थे। उसी दौरान वन जाते समय उनकी भेंट श्रीराम से हुई। उस समय तक रावण सीता का हरण कर चुका था और श्रीराम सीता की खोज कर रहे थे। तब सुग्रीव ने श्रीराम की मदद करने का वादा इस शर्त पर किया कि राम पहले उनकी मदद करें। उन्होंने राम से बाली को मारकर राज्य देने की प्रार्थना की। तब श्रीराम ने देखा कि बाली एक अत्याचारी राजा था, इसलिए उसके मारे जाने पर प्रजा को कोई हानि नहीं होगी। इसीलिए जब बाली और सुग्रीव आपस में लड़ रहे थे तो श्रीराम ने साल वृक्ष के पीछे छुपकर बाली पर तीर चलाया और उसे मार डाला। यद्यपि श्रीराम का यह कृत्य उचित नहीं माना जाता है, लेकिन इस कथा से पता चलता है कि वहां साल वृक्षों का घना जंगल है।

जब हम ‘‘रामायण’’ अथवा रामकथा का कोई भी ग्रंथ पढ़ते हैं तो क्या कभी सोचते हैं कि आज उन वृक्षों की क्या स्थिति है जिनका उल्लेख श्रीराम के काल में मिलता है? सच तो यह है कि अकसर हमारा ध्यान ही नहीं जाता है इन वृक्षों के उल्लेख के बारे में। हम श्रीरामकथा को पढ़ते समय उनकी ईश्वरीय शक्ति को ही ध्यान में रखते हैं जिससे उनकी स्तुति कर के हमें तात्कालिक व्यक्तिगत लाभ मिल सके। श्रीराम के वनगमन के मार्ग को ढूंढने में विविध भौगोलिक साक्ष्यों के साथ प्राचीन साहित्य का भी सहारा लिया गया। यदि जंगलों की अंधाधुंध कटाई न की गई होती तो अकेले ‘‘रामायण’’ में ही उल्लेख किए गए वृक्षों के ज्ञान के सहारे श्रीराम के वनगमन का मार्ग आसानी से ढूंढा जा सकता था। यह भी विचारणीय है कि श्रीराम ने एक सामान्य मनुष्य की भांति प्रकृति अर्थात वनमार्ग चुना क्योंकि वे वनसंपदा और वृक्षों की वंश परंपरा को सुरक्षित रखना चाहते थे। वे जानते थे कि वे सीता और लक्ष्मण के साथ जिस मार्ग से गुजरेंगे उस मार्ग की वनसंपदा के प्रति लोगों में स्नेह और श्रद्धा रहेगी। आज हम वंश परंपरा को तो मानते हैं किन्तु दूषित तरीके से। मात्र अपने कुल, परिवार के वंश बढ़ाने के लिए एक पुत्र की कल्पना करते हैं और इस चक्कर में पुत्रियों तक की अवहेलना कर देते हैं। ऐसी सोच के चलते वृक्षों की वंश परंपरा को बचाने के बारे में चिंता करने का तो सवाल ही नहीं उठता है। बस, जब गर्मी के मौसम में पारा 50 डिग्री को पार करने लगता है और हमें आसमान से आग बरसती हुई प्रतीत होती है, तभी हमें वृक्षों की कमी महसूस है। मौसम बदलते ही हम वृक्षों के प्रति पहले की तरह उदासीन और क्रूर हो जाते हैं। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है कि जैविक ईंधन फूंकती हुई हमारी गाड़ियों के लिए रास्ता चैड़ा करने के दौरान सौ-दो वर्षों की आयु के पुराने पेड़ काटे जाते हैं औरे हम ‘उफ!’ भी नहीं करते हैं। यदि हमने ‘‘रामायण’’ में उल्लेख किए गए वृक्षों के महत्व को ध्यान दिया होता कि वे वृक्ष ही थे जिन्होंने श्रीराम, सीता और लक्ष्मण को छाया और आश्रय प्रदान किया, तो शायद वृक्षों की बेतहाशा कटाई करते समय हमारे हाथ कांपते जरूर और हम ग्लोबल वार्मिंग से भी अपनी पृथ्वी को बचाने में अपना योगदान दे पाते।  
        --------------------------
#DrMissSharadSingh #चर्चाप्लस  #सागरदिनकर #charchaplus  #sagardinkar #डॉसुश्रीशरदसिंह 

Wednesday, April 5, 2017

सदा प्रासंगिक हैं श्रीराम ....   

Dr (Miss) Sharad Singh
Happy #RamNavmi  !
#रामनवमी पर विशेष लेख "सदा प्रासंगिक हैं श्रीराम' मेरे कॉलम #चर्चा_प्लस में "दैनिक सागर दिनकर" में ( 05.04. 2017) ..My Column #Charcha_Plus in "Sagar Dinkar" news paper
चर्चा प्लस
 रामनवमी पर विशेष:
 सदा प्रासंगिक हैं श्रीराम    
   - डाॅ. शरद सिंह                                                                                      
                                                           
श्रीराम सर्वशक्तिमान राजा दशरथ के घर भले ही जन्में थे किन्तु उन्होंने एक सामान्य व्यक्ति से भी कठिनतम जीवन जिया। वनवास काल में अपने अनुज लक्ष्मण और अपनी अद्र्धांगिनी सीता के कष्टों को देखना और उन्हें सहन करना आसान कार्य नहीं कहा जा सकता। अपनों को होने वाला कष्ट जो पीड़ा देता है, उससे बढ़ कर और कोई पीड़ा नहीं होती है। श्रीराम मानवीय चरित्र का एक ऐसा समुच्चय हैं जो आचार, व्यवहार और कत्र्तव्यों के प्रति जागरूकता का सीमाबोध कराता है। आवश्यकता है श्रीराम के चरित्र को जानने और समझने की, वह भी बिना कोई धार्मिक चश्मा लगाए। श्रीराम के चरित्र को समझने के बाद ही उनकी प्रसंगिकता को भली-भांति समझा जा सकता है।

    आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम्।
   लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम् ।।

जब कोई कथा सदियों से मान्यरूप में चली आ रही हो और उसके प्रभाव को अकाट्य रूप् से स्वीकार किया जाता हो तो यह मानना ही होगा कि उस कथा में ऐसे चरित्र विद्यमान हैं जो स्थान और काल की बाधा को पार करते हुए सम्पूर्ण विश्व और प्रत्येक युग को प्रभावित करने में सक्षम हैं। रामकथा ऐसी ही एक कथा है जो प्रत्येक मनुष्य को प्रभावित करने में सक्षम है। श्रीराम इस कथा के आधार चरित्र हैं। एक ऐसा चरित्र जो इस बात का संदेश देता है कि किसी भी संकट से जूझने का साहस प्रत्येक व्यक्ति के भीतर होता है बस, आवश्यकता होती है उस साहस को पहचानने और स्वीकार करने की। श्रीराम का चरित्र अलौकिक होते हुए भी पूर्णतया लौकिक था। उन्होंने जन्म लिया, जीवन के समस्त बंधनों को स्वीकार किया, समस्त कत्र्तव्यों का निर्वहन किया और एक मनुष्य की भांति दुख-सुख से प्रभावित होते हुए मृत्यु को वरण किया। श्रीराम सर्वशक्तिमान राजा दशरथ के घर भले ही जन्में थे किन्तु उन्होंने एक सामान्य व्यक्ति से भी कठिनतम जीवन जिया। वनवास काल में अपने अनुज लक्ष्मण और अपनी अद्र्धांगिनी सीता के कष्टों को देखना और उन्हें सहन करना आसान कार्य नहीं कहा जा सकता। अपनों को होने वाला कष्ट जो पीड़ा देता है, उससे बढ़ कर और कोई पीड़ा नहीं होती है। श्रीराम मानवीय चरित्र का एक ऐसा समुच्चय हैं जो आचार, व्यवहार और कत्र्तव्यों के प्रति जागरूकता का सीमाबोध कराता है। आवश्यकता है श्रीराम के चरित्र को जानने और समझने की, वह भी बिना कोई धार्मिक चश्मा लगाए। श्रीराम के चरित्र को समझने के बाद ही उनकी प्रसंगिकता को भली-भांति समझा जा सकता है।
भगवान विष्णु ने असुरों का संहार करने के लिए राम रूप में पृथ्वी पर अवतार लिया और जीवन में मर्यादा का पालन करते हुए मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाए। ‍तभी से लेकर आज तक मर्यादा पुरुषोत्तम राम का जन्मोत्सव तो धूमधाम से मनाया जाता है, परंतु उनके आदर्शों को अकसर ठीक से समझा ही नहीं जाता है। अयोध्या के राजकुमार होते हुए भी भगवान राम अपने पिता के वचनों को पूरा करने के लिए संपूर्ण वैभव को त्याग कर चौदह वर्षों के लिए वन चले गए। उन्होंने अपने जीवन में धर्म की रक्षा करते हुए अपने हर वचन को पूर्ण किया। हर माता-पिता चाहते हैं कि उनका पुत्र राम के समान चरित्रवान हो क्योंकि माता-पिता के प्रति श्रीराम की आज्ञाकारिता अनुपम है। लेकिन रामकथा के इस प्रसंग को दूसरी दृष्टि से भी देखा जा सकता है। वह दूसरी दृष्टि है कि गोया श्रीराम इस तथ्य को सामने लाना चाला चाहते हैं कि आज्ञाकारिता की भी सीमा होनी चाहिए। अनुचित आज्ञा को शिरोधार्य करने से न केवल परिवार बल्कि प्रजा (या परिचित, संबंधी) को भी कष्ट होता है। यदि श्रीराम ने माता कैकयी की अनुचित आज्ञा नहीं मानी होती तो उन पर कोई दोष नहीं आता क्योंकि आज्ञा ही दोषपूर्ण एवं कपटपूर्ण थी। यदि उन्होंने वनवास का आदेश नहीं माना होता तो न तो पिता दशरथ की मृत्यु होती और न ही उनके साथ सीता और लक्ष्मण को वनगमन करना पड़ता। इससे भी बढ़ कर श्रीराम के सुशासन का आनंद अयोध्या की जनता चैदह वर्ष तक नहीं उठा सकी। भरत ने श्रीराम का स्मरण कर के शासन अवश्य चलाया किन्तु श्रीराम का शासन भरत के शासन से कहीं अधिक उत्तम था, तभी तो राम का शासन काल ‘‘राम राज’’ के नाम से सदियों से ख्यातिनाम रहा।
Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper
श्रीराम के चरित्र ने दूसरा उहारण यह प्रस्तुत किया कि निर्बल कोई नहीं होता हैं, छोटा कोई नहीं होता है। हर व्यक्ति किसी न किसी विशेषता से परिपूर्ण होता है। जैसे जो पढ़ा-लिखा नहीं है और मेहनत-मलदूरी करता है वह पढ़े-लिखे तबके से किसी मायने में कमतर नहीं कहा जा सकता है। जिस बल के साथ वह फावड़ा या कुदाल चला सकता है अथवा बोझा ढो सकता है वह बल पढ़ेलिखे तबके के पास होता ही नहीं है। इसके विपरीत पढ़ालिखा व्यक्ति वह ज्ञान भी रखता है जो अनपढ़ मजदूर के पास नहीं होता है। यानी दोनों तबका अपने-अपने क्षेत्र में योग्य होता है। श्रीराम ने वानरों और भाल्लुकों से सहायता ले कर इस बात को सिद्ध कर दिया कि जीवन में हर व्यक्ति का महत्व होता है। किसी भी व्यक्ति को देश, काल अथवा उसकी सामाजिक व्यवस्थाओं के कारण कम कर के नहीं आंका जा सकता है।
श्रीराम का चरित्र यह भी संदेश देता है कि अनाचारी के विरुद्ध शस्त्र उठाना, उसे दण्डित करना जरूरी होता है अन्यथा वह अपने छल-कपट से नारीजाति सहित उन सभी को कष्ट देता रहेगा जो भोले हैं, निष्कपट हैं और परोपकारी हैं। अनाचारी चाहे कितनी भी विद्वान क्यों न हो, वह दण्ड का भागी होना ही चाहिए। रावण में पांडत्यि की कमी नहीं थी। वह इतना ज्ञानी था कि स्वयं श्रीराम ने भी उसके ज्ञान को पूरा सम्मान दिया किन्तु उसके अनाचारी आचरण ने उसे खलपात्र बना दिया। यही तो कहती है रातकथा कि ज्ञान के साथ संयम और सदाचार भी जरूरी होता है।
जब राम के चरित्र का विश्लेषण किया जाता है तो प्रायः यह बात भी उठती है कि मर्यादापुरुषोत्तम होते हुए भी श्रीराम ने एक आदमी के लांछन लगाने पर गर्भवती सीता का त्याग कर दिया और उन्हें वनवास भेज दिया। प्रथदृष्ट्या यह रामचरित्र में बहुत बड़ी कमी दिखाई देती है किन्तु कोई भी आकलन तभी सही अर्थ में पूरा होता है जब उसके सभी पक्षों पर दृष्टि डाली जाए। इस प्रसंग में श्रीराम का चरित्र यही तो कहना चाहता है कि मात्र आदर्श स्थापना के लिए उस बात को आंखमूंद कर नहीं मानो जो मानने योग्य न हो। सीता के चरित्र पर उंगली उठाने वाले व्यक्ति का अपना अनुभव अथवा उसका अपना पूर्वाग्रह रावण के पास सीता के बंदी रहने और फिर अग्निपरीक्षा दे कर तत्कालीन सामाजिक आदर्श को पूरा करने से अलग था। फिर भी श्रीराम ने मात्र इसलिए उसके उलाहने को गंभीरता से लिया क्योंकि वे आदर्श प्रस्तुत करना चाहते थे अथवा तत्कालीन आदर्श का पोषण करना चाहते थे। लेकिन इसी का दूसरा पहलू यह भी है कि आदर्श का अतिवाद सबके लिए दुखदायी होता है। श्रीराम और सीता ने तो दुख झेला ही, साथ में लव और कुश ने भी पिता का अभाव झेला। श्रीराम के इस कदम से प्रजा की वैचारिकता भी अराजक हुई। जब एक व्यक्ति की अनुचित बातें मान ली जाएं तो दूसरा व्यक्ति मुंह चलाने में देर नहीं करेगा। फिर भी श्रीराम ने सफलतापूर्वक शासन किया। लेकिन वे स्वयं इतने अधिक दुख और क्लेश का अनुभव करते रहे कि अंततः उन्होंने सरयू के जल में चिरविश्राम का मार्ग चुना। संभवतः यह अतिवादी आदर्श की स्थापना के प्रयास का दुखद अंत था। लेकिन इस विश्लेषण का अर्थ यह नहीं है श्रीराम का चरित्र दोषपूर्ण था। वस्तुतः श्रीराम का चरित्र एक ऐसा चरित्र है जो आदर्श की समुचित व्यख्या करता है। साथ ही आदर्श की सीमाओं एवं उसके अच्छे-बुरे पक्षों को खोल कर सामने रखता है। दिक्कत तब आती है जब रामकथा को पढ़ने वाला व्यक्ति अपने पूर्वाग्रह का चश्मा लगा लेता है और अपने पसंद के अनुरुप रामकथा को गढ़ने लगता है अथवा उसमें मीनमेख निकालने लगता है।
सांस्कृतिक मूल्य आर्थिक, राजनीतिक परिवर्तनों की तुलना में दीर्घकालीन रूप से अपरिवर्तित रहते हैं. आज भी राम-कथा विश्व के अनेक लोगों को प्रभावित करती है क्यों कि इस कथा में चारित्रिक विविधता के साथ ही आचरण और संवेगों का यथार्थ प्रस्तुतिकरण है। यह सत्य और असत्य की, अच्छाई और बुराई, धर्म और अधर्म के बीच चलने वाले संषर्घ की कथा है। यह संघर्ष आज भी है, मात्र उसका रूप बदला है। इसीलिए रामायण के विभिन्न प्रसंग, पात्र हमारे लोक जीवन  में आज भी प्रासंगिक होते रहते रहते हैं। क्रोध, मोह, लोभ, क्षोभ, शोक, वचन-पालन आदि के प्रसंग तथा भरत, मंथरा, हनुमान, सुग्रीव, रावण, विभीषण आदि कुछ पात्र उदाहरण हैं। स्मरण रहे कि वाल्मीकि रामायण का आरंभ ही एक शाप-प्रसंग से होता है। जिस रचना का उद्देश्य मर्यादा-पुरुषोत्तम का चरित्र प्रस्तुत करना हो, उसका ऐसा आरंभ किस उद्देश्य से किया गया यह ध्यान देने योग्य है। मर्यादा को भंग करनेवाला सदैव दंड का अधिकारी होता है। निषाद को आखेट के लिए नहीं, वरन काम-मोहित अवस्था में क्रौंच पक्षी के आखेट के लिए शाप मिला। स्वयं वाल्मीकि भी क्रोधावेश में शाप देकर मर्यादा भंग करते हैं, तो उसका मार्जन भी हुआ। इसी तरह, पूरी रामायण के विविध प्रसंग मर्यादा-भंग के कुपरिणाम और उसकी पुनप्र्रतिष्ठा का प्रयत्न है। यह एक संपूर्ण सांस्कृतिक दृष्टि प्रस्तुत करती है, धर्म के वास्तविक स्वरूप को स्थापित करने में सक्षम है।
श्रीरामचंद्र कृपालु भजु मन हरण भवभय दारुणं।
नवकंज लोचन, कंजमुख कर, कंज पद कंजारुणं।।
कंदर्प अगणित अमित छवि नव नील नीरज सुन्दरं।
पट पीत मानहु तडित रूचि-शुची नौमी, जनक सुतावरं।।
भजु दीनबंधु दिनेश दानव दैत्य वंष निकन्दनं।
रघुनंद आनंद कंद कोशल चन्द्र दशरथ नंदनम।।

--------------------------------------