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Saturday, October 2, 2021

गांधी जयंती पर प्रगतिशील लेखक संघ की मकरोनिया इकाई द्वारा आयोजन में डॉ शरद सिंह

 02 अक्टूबर 21 को गांधी जयंती के अवसर पर प्रगतिशील लेखक संघ सागर की मकरोनिया इकाई की दो सत्रों में गोष्ठी संपन्न हुई, जिसमें पहले सत्र में महात्मा गांधी के विचारों व्यक्तित्व एवं गांधी दर्शन पर महत्वपूर्ण चर्चा हुई इसके उपरांत काव्य पाठ का सत्र रहा। आज की गोष्ठी की अध्यक्षता की पूर्वकुलपति रीवा विश्वविद्यालय, डॉ उदय जैन नेभ तथा संचालन किया इकाई के अध्यक्ष डॉ सतीश पांडेय ने। मैं यानी डॉ शरद सिंह सहित सहभागी रहे सर्वश्री डॉ टीकाराम त्रिपाठी रुद्र, मलैया जी, वृंदावन राय सरल, वीरेंद्र प्रधान, प्रभात कटारे, ज.ल.राठौर आदि साहित्यकार। 
तस्वीर उसी अवसर की...

Wednesday, October 2, 2019

बुंदेलखंड में महात्मा गांधी की यात्राओं का लोक पर प्रभाव - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh

बुंदेलखंड में महात्मा गांधी की यात्राओं का लोक पर प्रभाव
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
 
(नवभारत में प्रकाशित)
   
 वह स्वतंत्रता आंदोलन का दौर था। प्रत्येक भारतीय स्वतंत्रता पाना चाहता था और एक ऐसे नेता के पीछे चलने को आतुर था जो आडंबर रहित और अहिंसावादी विचारों का था। वह नेता थे महात्मा गांधी। उन्होंने स्वयं को कभी नेता नहीं माना किन्तु सारी दुनिया ने उन्हें भारत का सर्वोच्च नेता माना। 
Navbharat -  Bundelkh Me Mahatma Gandhi Ki Yatrayen Aur Lok pr Prabhav  - Dr Sharad Singh
        राष्ट्रीयस्तर पर जिस मुद्दे को गंभीरता से किसी ने नहीं लिया उस ओर गांधी जी ने दृढ़तापूर्वक कदम उठाया। महात्मा गांधी ने 12 मार्च, 1930 को वायसराय को सूचित किया कि वे अपने 78 अनुयाइयों के साथ ‘दांडी मार्च’ (दांडी यात्रा) करने जा रहे हैं। ‘दांडी मार्च’ से अभिप्राय उस पैदल यात्रा से है, जो महात्मा गांधी और उनके स्वयंसेवकों द्वारा 12 मार्च, 1930 ई. को प्रारम्भ की गयी। इसका मुख्य उद्देश्य था, अंग्रेजों द्वारा बनाए गए ‘नमक कानून’ को तोड़ना। आश्रम के कई सदस्य, पुरुष और महिलाएं 24 दिन की ऐतिहासिक यात्रा पर रवाना हुए। गरीब किसान ब्रिटिश कानून के कारण अपनी ‘नमक की खेती’ नहीं कर पा रहे थे। गांधी जी ने वेब मिलर सहित अपने 78 स्वयंसेवकों के साथ साबरमती आश्रम से 358 कि.मी. दूर स्थित दांडी नामक स्थान के लिए 12 मार्च, 1930 ई. को प्रस्थान किया। लगभग 24 दिन बाद 6 अप्रैल, 1930 को दांडी पहुंचकर उन्होंने समुद्रतट पर नमक कानून को तोड़ा। महात्मा गांधी ने दांडी यात्रा के दौरान सूरत, डिंडौरी, वांज, धमन के बाद नवसारी को यात्रा के आखिरी दिनों में अपना पड़ाव बनाया था। यहां से कराडी और दांडी की यात्रा पूरी की थी। नवसारी से दांडी का फासला लगभग 13 मील का है।
11 मार्च, 1930 को गांधी जी ने इच्छा प्रकट की कि आंदोलन लगातार चलता रहे, इसके लिए सत्याग्रह की अखंड धारा बहती रहनी चाहिए, कानून भले ही भंग हो पर शांति रहे। लोग अहिंसा और धैर्य का रास्ता अपनाएं। 11 मार्च की संध्या की प्रार्थना नदी किनारे रेत पर हुई, उस समय गांधी जी ने कहा, ‘‘मेरा जन्म ब्रिटिश साम्राज्य का नाश करने के लिए ही हुआ है। मैं कौवे की मौत मरूं या कुत्ते की मौत, पर स्वराज्य लिए बिना आश्रम में पैर नहीं रखूंगा।’’
12 मार्च को प्रातः वह ऐतिहासिक दिन आरम्भ हुआ जब 61 वर्षीय महात्मा गांधी के नेतृत्व में 78 सत्याग्रहियों ने यात्रा आरम्भ की। उस समय किसने सोचा था कि सुदूर बुंदेलखंड में भी इसका गहरा प्रभाव पड़ रहा होगा। महात्मा गांधी के तेजस्वी और स्फूर्तिमय व्यक्तित्व ने देश की जनता के मन में ऊर्जा का संचार किया। बुंदेलखंड में भी इस आंदोलन के विचार पहुंचे और देखते ही देखते अनेक स्वतंत्रता प्रेमी महात्मा गांधी के समर्थन में आ खड़े हुए। उस समय यह बुंदेली गीत जोर-शोर से गाया जाता था-
हमें सोई नमक तोड़बे के लाने जाने है
गांधी को साथ निभाने है,
अंग्रेजन खों मार भगाने हैं....
लगभग दस वर्ष पहले पन्ना (म.प्र.) के 75 वर्षीय ठाकुर लच्छे दाऊ ने अपना संस्मरण सुनाते हुए मुझे यह गीत सुनाया था और साथ ही एक घटना भी बताई थी कि उनकी दादी और मां इस गीत को गाती हुई चक्की चलाया करती थीं। पन्ना में नियुक्त अंग्रेजों के नुमाइंदे अधिकारी को किसी ने इस बात की शिक़ायत कर दी कि ठाकुर परिवार के घर की महिलाएं अंग्रेज विरोधी कार्यक्रम में संलिप्त हैं। इसके बाद घर पर दो सिपाही आ धमके। मां और दादी ने पर्दे के भीतर से ही बात की और गीत को बदल कर सुनाते हुए फटकार लगा दी। बेचारे सिपाही अपना-सा मुंह ले कर लौट गए। लेकिन इस घटना ने महिलाओं के बीच दांडी यात्रा की चर्चा को और हवा दे दी।
महात्मा गांधी की दांडी यात्रा के संबंध में एक और गीत प्रचलित था-
मैंहगो नमक हमें नई खाने
अंग्रेजन को सबक सिखाने
आए हमाए ऐंगर गांधी
जेई बात हमखों समझाने
बुजुर्ग बताते हैं कि महात्मा गांधी सागर भी आए थे। यहां उनकी यात्रा से संबधित पोस्टर छापे गए थे। वे अनंतपुरा से 2 दिसंबर की शाम 4 बजे सागर आए थे। स्टेशन के पास उनकी आमसभा हुई थी, जो शाम 7 बजे तक चली। आज़ादी के दौर में हर तरफ गांधी का नाम गूंज रहा था। वक्ता के तौर पर उनको सुनने काफी लोगों की भीड़ जमा हुआ करती थी।
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चर्चा प्लस .. (2 अक्टूबर) जन्मतिथि पर विशेष : सदा प्रासंगिक हैं महात्मा गांधी के विचार - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस .. (2 अक्टूबर) जन्मतिथि पर विशेष :
 

सदा प्रासंगिक हैं महात्मा गांधी के विचार
- डॉ. शरद सिंह
        

अपने जीवन को कष्टों के सांचे में ढालकर दूसरों के लिए सुखों की खोज करने वाले महात्मा गांधी बीसवीं सदी के महानायकों में से एक थे। उनके विचारों, उनके कार्यों एवं उनके जीवन-दर्शन ने समूची मानवता को नये आदर्श प्रदान किए। उनका कहना था, ‘‘स्त्रियों को अबला पुकारना उनकी आंतरिक शक्ति को दुत्कारना है।’’ स्वतंत्रता आंदोलन के समय भी उन्होंने स्वच्छता के आग्रह को विस्मृत नहीं किया था। महात्मा गांधी का कहना था, ‘‘स्वच्छता अच्छे विचारों को जन्म देती है और अच्छे विचार मनुष्य को अच्छी जीवन-दशाएं प्रदान करते हैं।’’
Charcha Plus - (2 अक्टूबर) जन्मतिथि पर विशेष... सदा प्रासंगिक हैं महात्मा गांधी के विचार  -  Charcha Plus Column by Dr Sharad Singh
    वैश्विक स्तर पर महात्मा गांधी के विचारों को सर्वसम्मति से स्वीकार किया जाता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है कि 15 जून, 2007 को संयुक्त राष्ट्र की महासभा में 2 अक्टूबर को ‘अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस’ घोषित करने के लिए मतदान हुआ, तदुपरान्त संयुक्त राष्ट्र संघ ने 2 अक्टूबर के दिन को ‘अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस’ घोषित किया। महात्मा गांधी के विचारों को ‘गांधीवाद’ के नाम से पुकारा जाता है। गांधीवाद को अपनाने के लिए उनके राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक आदि विचारों को अपनाना आवश्यक है।
महात्मा गांधी राजनीति का परिष्कृत रूप स्थापित करना चाहते थे। उनका मानना था कि राजनीति के परिष्कार के लिए राजनीति में सत्य, अहिंसा, नैतिकता, परोपकार, सादगी एवं सदाचार का अधिक से अधिक प्रतिशत होना चाहिए तभी राजनीति दूषित होने से बची रहती है। 21वीं सदी के दूसरे दशक में राजनीति में जो हिंसा, बाहुबल, बेईमानी, भाई-भतीजावाद एवं आर्थिक घोटालों का बोलबाला दिखाई देता है, उसमें महात्मा गांधी के ‘राजनीति के परिष्कार’ का मूलमंत्र प्रासंगिक एवं व्यावहारिक ठहरता है। यदि राजनेताओं में संयम रहे अथवा संयमित व्यक्ति राजनीति में प्रवेश करें तो राजनीति का परिष्कार सम्भव है। एक स्वस्थ राजनीतिक परिवेश देश के प्रत्येक तबके को उसके अधिकारों से जोड़ सकता है और राजनीतिक संस्थाओं के प्रति नागरिकों के मन में विश्वास पैदा कर सकता है।
महिलाओं को सशक्त बनाने का स्वप्न ही महात्मा गांधी के स्त्री-आंदोलन की बुनियाद था। महात्मा गांधी मानते थे कि स्त्रियों को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पुरुषों के समकक्ष सशक्त होना चाहिए। वे राजनीति में महिलाओं की सहभागिता के पक्षधर थे। वस्तुतः महात्मा गांधी का अहिंसावादी आंदोलन स्त्रियों की उपस्थिति के कारण अधिक सार्थक परिणाम दे सका। इस तथ्य को महात्मा गांधी ने स्वीकार करते हुए एक बार कहा था कि स्त्रियां प्रकृति से ही अहिंसावादी होती हैं। स्त्रियां पुरुषों की तुलना में अधिक संवेदनशील और सहृदय होती हैं, अतः स्त्रियों की उपस्थिति से अहिंसावादी आंदोलन एवं सत्याग्रह अधिक कारगर हो सकते हैं।
महात्मा गांधी स्त्रियों को अबला कहने के विरोधी थे। वे मानते थे कि स्त्री पुरुषों की भांति सबल और शक्ति सम्पन्न है। जिस प्रकार एक सशस्त्र पुरुष के सामने निःशस्त्र पुरुष कमजोर प्रतीत होता है, ठीक उसी तरह सर्वअधिकार प्राप्त पुरुषों के सामने स्त्री अबला प्रतीत होती है जो कि वस्तुतः अबला नहीं है। उनका कहना था, ‘‘स्त्रियों को अबला पुकारना उनकी आंतरिक शक्ति को दुत्कारना है। यदि हम इतिहास पर नजर डालें तो हमें उनकी वीरता की कई मिसालें मिलेंगी। यदि महिलाएं देश की गरिमा बढ़ाने का संकल्प कर लें तो कुछ ही महीनों में वे अपनी आध्यात्मिक अनुभूति के बल पर देश का रूप बदल सकती हैं।’’
गांधी जी मानते थे कि स्त्रियों की उपस्थिति पुरुषों को भी आचरण की सीमाओं में बांधे रखती है। यही कारण है कि उन्होंने कांग्रेस में महिलाओं को नेतृत्व का पूरा अवसर दिया। विभिन्न आंदोलनों में स्त्रियों को शामिल होने दिया। उन्होंने कांग्रेस के अंतर्गत स्त्रियों के सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक और राजनीतिक उत्थान के कार्यक्रम भी चलाए। वे स्त्रियों को एक स्त्री के रूप में न देखकर एक पूर्ण व्यक्ति के रूप में देखते थे। वे पारिवारिक सम्पत्ति पर पुरुषों के बराबर स्त्रियों को स्वामित्व दिए जाने के भी पक्षधर थे।
महात्मा गांधी का कहना था, ‘‘कोई भी राष्ट्र अपनी आधी आबादी (अर्थात् स्त्रियों) की अनदेखी करके विकास नहीं कर सकता है।’’ वे कहते थे कि पुरुषों की तुलना में स्त्रियों को कमजोर नहीं समझना चाहिए। वे स्त्रियों के आर्थिक स्वावलम्बन एवं शिक्षा के पक्षधर थे। शुचिता एवं सतीत्व के नाम पर स्त्रियों को बन्धन में रखना वे पसन्द नहीं करते थे। महात्मा गांधी का यह विचार हर युग में खरा उतरता है।
महात्मा गांधी ने स्वच्छता पर विशेष बल दिया। जब वे दक्षिण अफ्रीका में थे तो वहां उन्हें अनुभव हुआ कि वहां बसे भारतीय स्वच्छता पर ध्यान नहीं देते हैं जिसके कारण अंग्रेज उन्हें घृणा की दृष्टि से देखते हैं। इस पर महात्मा गांधी ने वहां स्वच्छता आंदोलन चलाया। इस आंदोलन का परिणाम यह हुआ कि अफ्रीका में बसे भारतीय समाज में घर-बार साफ रखने के महत्त्व को स्वीकार कर लिया गया।
महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता आंदोलन के समय भी उन्होंने स्वच्छता के आग्रह को विस्मृत नहीं किया था। महात्मा गांधी का कहना था, ‘‘स्वच्छता अच्छे विचारों को जन्म देती है और अच्छे विचार मनुष्य को अच्छी जीवन-दशाएं प्रदान करते हैं।’’ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में महात्मा गांधी का सामना असीम गन्दगी से हुआ। कई बार उन्होंने स्वयं झाड़ू लेकर दूसरों का भी पाखाना साफ किया। अपनी भारत-यात्रा के दौरान भी रेल के तृतीय श्रेणी के डिब्बे में व्याप्त गन्दगी का साम्राज्य तथा काशी की गलियों में फैली हुई गन्दगी ने उनके मन को आहत किया। स्वतंत्रता आंदोलन के समय भी उन्होंने स्वच्छता के आग्रह को विस्मृत नहीं किया था। महात्मा गांधी का कहना था, ‘‘स्वच्छता अच्छे विचारों को जन्म देती है और अच्छे विचार मनुष्य को अच्छी जीवन-दशाएं प्रदान करते हैं।’’
यदि महात्मा गांधी के विचारों को अपनाकर स्वच्छता को जीवन का अंग बना लिया जाए तो नागरिकों को स्वस्थ तन-मन की सम्पदा मिल सकती है। वस्तुतः महात्मा गांधी का प्रत्येक विचार हर युग में हर परिस्थिति में प्रासंगिक है और रहेगा। यदि उनके मर्म को भली-भांति समझकर उसे आत्मसात किया जाए।
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 02.10.2019)
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