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Tuesday, November 14, 2023

पुस्तक समीक्षा | जीवन के विविध रंगों से गुज़रती कहानियां | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

प्रस्तुत है आज 14.11.2023 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई लेखिका आराधना खरे के कहानी संग्रह "जीवन एक रंग अनेक" की समीक्षा।
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पुस्तक समीक्षा      
जीवन के विविध रंगों से गुज़रती कहानियां    
- समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह
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कहानी संग्रह - जीवन एक रंग अनेक
लेखिका     - आराधना खरे
प्रकाशक     - बुक्स क्लीनिक, कुदुदंड, पंचमुखी हनुमान मंदिर के समीप, बिलासपुर (छग) -495001
मूल्य        - 200/-
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   ‘‘जीवन एक रंग अनेक’’ यह मुहावरा उस कहानी संग्रह का नाम है जिसकी लेखिका हैं आराधना खरे। निःसंदेह जीवन अनेक रंगों से भरा हुआ है। पूरा का पूरा इन्द्रधनुष जीवन में समाया हुआ है। लाल, पीले, नारंगी, हरे जैसे उत्साहजनक रंगों से ले कर सफेद हल्के नीले, हल्के पीले, गुलाबी शांत रंगों के साथ ही काले, धूसर, गहरे कत्थई रंग तक इसमें मौजूद हैं। मनोदशाओं और जीवन के तमाम उतार-चढ़ाव को अभिव्यक्ति देने वाले रंग। हम सभी इन रंगों से हो कर गुज़रते हैं और हमारा जीवन अपने अनुभवों के विभिन्न कथानकों को रचता चलता है। कथाकार आराधना खरे ने जीवन के इन्हीं विविधरंगी अनुभवों को छोटी-छोटी कहानियों के रूप में ढाला है। ये कहानियां हमारे जीवन के, हमारे पास-पड़ोस के और हमारे समाज के मानस का वह चित्र प्रस्तुत करती हैं जिनमें वैचारिक वैविध्य के साथ संबंधों की जटिलता भी है।
    कुल 28 कहानियां है ‘‘जीवन एक रंग अनेक’’ कहानी संग्रह में। यूं तो आराधना खरे कवयित्री भी हैं तथा उनका प्रथम कहानी संग्रह ‘‘मंथन’’ प्रकाशित हो चुका है, जिसकी कहानियां मैंने पढ़ी हैं। यह दूसरा कहानी संग्रह  ‘‘मंथन’’ के आगे की कड़ी कहा जा सकता है। वैसे एक बात यहां कहना समीचीन होगी कि आराधना खरे कविताओं के बनिस्बत कथालेखन के अधिक करीब हैं। भले ही उनके कथानक अधिक विस्तार नहीं लेते हैं। आकार में उनकी कहानियां छोटी होती हैं किन्तु उन कहानियों में कथानकों की समग्रता प्रभावी ढंग से समायी रहती है। मुझे लगता है कि आराधना खरे काव्यसृजन की अपेक्षा कथालेखन में अधिक ‘‘कम्फर्टेबल’’ हैं।
    आराधना खरे ने अपनी कहानियों के माध्यम से स्त्री जीवन को उकेरा है। उन्होंने नारी अधिकारों की बात की है। वे नारी की स्वतंत्रता के पक्ष में भी खड़ी दिखाई देती हैं किन्तु उस ‘सेमेन्टिक वूमेनिज़्म’ से हट कर जो नारीवाद को एक कठोर खांचे में आकार लेने के लिए विवश करता है। आराधना खरे स्त्री को समाज के समन्वयवादी आचरण को अपनाने के लिए प्रेरित करती हैं। उन्होंने अपनी कहानियों के माध्यम से मध्यमवर्गीय परिवारों के विचारों का गहन चित्रण किया है। उन्होंने अपनी कहानियों के माध्यम से नारी मन की व्यथा को भी रेखांकित किया है। वे अपनी कहानियों के माध्यम से कोई धारणा आरोपित नहीं करती हैं, अपितु वे घटनाक्रम के साथ उसके प्रभावों एवं दुष्प्रभावों को सामने रख कर स्पष्ट करती हैं कि परिवार, समाज और एक स्त्री के लिए क्या उचित है, क्या उचित नहीं है। चलिए दृष्टिपात करते हैं उनके इस द्वितीय कहानी संग्रह ‘‘जीवन एक रंग अनेक’’ की कुछ चुनिंदा कहानियों पर।
    संग्रह की पहली कहानी है ‘‘भूल’’। यह कहानी उस त्याग की भावना को खंडित करती है जो स्त्री के मानस पर महिमामंडित कर के थोप दी जाती है कि यदि पत्नी संतानोत्पत्ति नहीं कर पा रही है तो उसे अपनी खुशियों का गला घोंट कर अपने पति को विवश कर देना चाहिए कि वह वंश चलाने के लिए दूसरा विवाह कर ले। यहां विवाह-विच्छेद की बात नहीं है, सौत के साथ रहते हुए नौकरानी की भांति जीवन व्यतीत करने की शर्त है। इस कथानक पर कई हिन्दी फिल्में भी बन चुकी हैं जिसमें नायिका को आत्मोत्सर्ग की भावना से परिपूर्ण आदर्श स्त्री तथा सौत को खलनायिका की भांति दिखाया जाता रहा है। जबकि दोनों स्त्रियां सामाजिक सोच के मकड़जाल में फंसी हुई स्त्रियां हैं। न दोनों नायिकाएं हैं और न दोनों खलनायिकाएं। पति रूपी पुरुष अपनी पहली पत्नी से बहुत प्रेम करता है। वह दूसरी स्त्री नहीं लाना चाहता है किन्तु अपनी पहली पत्नी के हठ के समक्ष उसका झुक जाना उसकी उस कमजोरी को जाहिर कर देता है कि वह भी कहीं न कहीं (गोद लिए बिना) स्वयं की संतान पाने के लिए की अदम्य लालसा रखता है और हर आग्रह को स्वीकार करने के लिए तैयार है। दूसरी पत्नी के आने  और उससे संतान की प्राप्ति होने पर अपनी पहली पत्नी के प्रति अवहेलना उसकी इस धारणा पर मुहर भी लगा देती है। साथ रहने को स्वीकार करते हुए पति का दूसरा विवाह करा देना उसकी पहली पत्नी की ही भूल थी जिसका उसे जब तक अहसास होता है, तब तक बहुत देर हो चुकी रहती है।
     दूसरी कहानी है ‘‘बदलाव’’। यह मनोविश्लेषक कहानी है। कहा जाता है कि विवाह के बाद पति-पत्नी के बीच सामन्जस्य होना आवश्यक है और उतना ही आवश्यक है ससुराल पक्ष के अपने परिजन के प्रति विवाहिता का तालमेल। इस तालमेल का आशय यह नहीं है कि वह अत्याचार अथवा प्रताड़ना सहे, बल्कि आशय है कि अपने नए परिजन की भावनाओं को समझने का प्रयास करे, हमेशा नकारात्मक ही न सोचे। इस कहानी की सबसे अच्छी बात यह है कि लेखिका ने नायिका को संबंधों का यथार्थ समझाने के लिए उसके मायके में उसकी भाभी और मां के पारस्परिक संबंधों पर ध्यान दिलाया है। जिससे उसे अपनी सास के प्रति अपनी सोच को परिणाम तक पहुंचाने में मदद मिलती है। यह कहानी रोचक विस्तार ले सकती थी किन्तु मैंने पहले ही जैसा लेख किया कि आराधना खरे छोटी कहानियों में बड़े कथानकों को समेटती हैं।
     कहानी ‘‘सौंदर्य’’ युवावस्था में दैहिक आकर्षण को व्यक्त करती है। प्रायः लड़कियों को स्कूल या काॅलेज के जीवन में ‘हीरो टाईप’ के लड़के अधिक पसंद आते हैं। ऐसे लड़कों में वे अपने सपनों का राजकुमार देखती हैं और जब सच सामने आता है तो उनके हाथ धोखा और छलावे के अतिरिक्त कुछ नहीं रह जाता है। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि समय रहते कोई उन्हें इस धोखा खाने से बचा लेता।
      ‘‘खोखलापन’’ कहानी संबंधों के समीकरण बिगड़ने से उत्पन्न होने वाले खोखलेपन को उजागर करती है। इस पुरुषवादी समाज में पुरुष इस बात की सहजता से छूट ले कर उस समय परस्त्रीगमन कर लेता है जब उसकी पत्नी गर्भवती हो या नवजात की देखभाल में व्यस्त हो। जहां पत्नी अपने परिवार का भविष्य संवार रही होती है और वहीं पति परिवार के भविष्य को बिगाड़ रहा होता है। अवैधानिक रिश्ते कभी सुख नहीं देते हैं लेकिन यदि ऐसे किसी अवैधानिक रिश्ते को वैधानिकता का प्रमाणपत्र मिल जाए तो भी क्या ऐसा रिश्ता लम्बे समय तक मधुर रह सकता है? इस प्रश्न को टटोला है लेखिका ने। छूटे हुए रिश्ते पर उसका क्या प्रभाव पड़ता है और किस कदर खोखलापन घेरता जाता है, यह कहानी इन्हीं परिस्थितियों का विवेचन करती है।
      ‘‘बुआ’’ एक मार्मिक कहानी है। यह वज्राघात की भांति मिले दुख को सहन कर के जीवन जीने का तरीका सुझाती है। कहानी ‘‘नए आयाम’’ भी जीवन जीने का सही तरीका सिखाती है। कई बार ऐसा होता है कि माता-पिता अपने बिगड़ैल बेटे को सुधारने का तरीका यही मानते हैं कि उसका विवाह कर दिया जाए। जैसे उसकी नवविवाहिता पत्नी कोई ऐसी इंस्ट्रक्टर हो जो दो बेंत लगा कर उनके बेटे को सही रास्ते पर ले आएगी, जबकि दो बेंत लगाने का भी अधिकार उसे नहीं दिया गया होता है। यानी वह रिझाए, मनाए, मार खाए और किसी भी तरह उनके बेटे को सही रास्ते पर ले आए। यह विडंबना विवाह संबंध को वितृष्णा बना कर रख देती है। यदि ऐसी किसी परिस्थिति में कोई लड़की फंस जाए तो उसे प्रताड़ना को अपनी नियति नहीं मान लेना चाहिए, वरन साहस का परिचय देना चाहिए। ऐसे मसले में मायके वालों का भी दायित्व बनता है कि वे अपनी बेटी की स्थितियों को समझें और उसका साथ दें। कहानी एक नए मोड़ पर सुखांत होती है। सामाजिक संदर्भ की यह एक उम्दा कहानी है।
    समाज आज भी अपने दकियानूसी विचारों से पूरी तरह निकल नहीं सका है। जैसे कन्या जन्म को ही लें, आज भी कई घरों में उस समय मातम छा जाता है जब संतान के रूप में कन्या जन्म लेती है। कन्याओं के प्रति दुराव रखने के कारण कन्या शिशु की हत्या और फिर जांच की सुविधा हो जाने के बाद कन्याभ्रूण हत्या का चलन दशकों तक रहा है। जिससे समाज में पुरुष और स्त्री के अनुपात में तेजी से अंतर आने लगा था। तब सरकार ने मामले को संज्ञान में ले कर भ्रूण परीक्षण को अपराध घोषित किया। बिना चिकित्सकीय आवश्यकता के भ्रूण परीक्षण नहीं कराया जा सकता है। जो भी चिकित्सक चोरी-छिपे ऐसा करते हैं, पकड़े जाने पर अन्य निर्धारित सजा के साथ ही उनका लाईसेंस रद्द कर दिया जाता है। यहां एक गड़बड़ है कि कई राज्य सरकारें समाज की मानसिकता बदलने के लिए कन्याओं को आर्थिक मदद देने की योजनाएं चला रही हैं ताकि उनके परिवार वाले उन्हें आर्थिक दृष्टि से लाभप्रद समझें और न केवल उन्हें जन्म लेने दें अपितु उनका लालन-पालन भी करें। लेकिन लालच के वशीभूत बदली हुई मानसिकता हमेशा अच्छे परिणाम नहीं देती है। एक लालच से बड़ा दूसरा लालच पूरा होते दिखते ही वह मानसिकता गिरगिट की भांति अपना रंग बदल सकती है। बहरहाल, आराधना खरे ने अपनी कहानी ‘‘उपेक्षा’’ में ऐसी दो कन्याओं की परिस्थितियों, उनके संघर्ष एवं साहस को कथानक में ढाला है जो जुड़वां हैं। जिस घर में एक लड़की के जन्म लेने पर भारी स्यापा हो सकता हो, वहां दो-दो कन्याओं का एक साथ पैदा होना और उनके पैदा होते ही उनकी मां की मृत्यु हो जाना, उनके लिए किसी अभिशाप से कम नहीं होने वाला था। कथा नायिका सोचती है कि ‘‘ईश्वर की बड़ी कृपा होती है कि बच्चे को जन्म से तीन वर्ष तक का समय याद नहीं रहता। उन तीन वर्षों में हम बहनों को कितनी, कैसी पीड़ा से गुजरना पड़ा होगा, यह तो बिसर गया परन्तु जैसे ही समझदारी हमारे भीतर आई, मैं समझने लगी। उपेक्षा का दंश हमें डंसने लगा।’’
      दोनों बालिकाओं के पिता ने दूसरा विवाह कर लिया और अपनी बेटियों के प्रति मुंह फेर लिया। परिवार और विशेषरूप से अपने पिता से मिली उपेक्षा ने दोनों बहनों के मन पर सबसे गहरे असर डाला। यहां लेखिका ने इस बात को सामने रखने का प्रयास किया है कि बेटियों के लिए सिर पर छत, खाने को दो जून रोटी या शिक्षा दिलाने का कथित दायित्व निभाना भर पर्याप्त नहीं होता है, उन्हें सबसे अधिक जरूरत होती है अपने माता-पिता के प्यार और परिवार की आत्मीयता की।
    आराधना खरे की कहानियां सरल, सहज और संवेदनशील हैं। लेखिका अपनी कहानियों के जरिए एक ऐसे समाज को निर्मित होते देखना चाहती हैं जिसमें संबंधों में मधुरता, विश्वास, सम्मान और सुरक्षा रहे। स्त्री अपने अस्तित्व को पूर्णतया जी सके। लेखिका ने आदर्श नायिकाएं नहीं रची हैं बल्कि स्त्री के लिए उत्तम जीवन के ताने-बाने बुने हैं। मध्यमवर्गीय परिवार के परिवेश को बखूबी चित्रित करते हुए लेखिका ने भाषा की सहजता को अपनाया है। हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू अर्थात् वर्तमान में प्रचलित हिन्दी का प्रयोग उनकी कहानियों को सहज बनाता है। बस, कहानियों का आकार कुछ कथानकों को ले कर उलझन पैदा करता है। जो कथानक पर्याप्त विस्तार मांगते हैं, लेखिका ने उन्हें भी छोटे आकार में समेट दिया है जिससे बहुत कुछ अनकहा रह गया है। चूंकि ये कहानियां ‘लघुकथा’ भी नहीं कही जा सकती हैं अतः इनमें कथातत्व की अपेक्षा बढ़ जाती है। अपनी आगामी कहानियों में वे इस अपेक्षा को पूरी करेंगी, यह आशा रखी जा सकती है। इसमें कोई दो राय नहीं कि लेखिका समाज और स्त्री जीवन के प्रति सजग हो कर सोचती हैं तथा सकारात्मक दृष्टिकोण रखती हैं। उनकी लेखनी में स्वाभाविक एवं चरितार्थ किए जाने योग्य आशावाद है, जिसकी आज के इस कठिन दौर में बहुत आवश्यकता है। जीवन के विविध रंगों से हो कर गुज़रती ‘‘जीवन एक रंग अनेक’’ की कहानियां बेशक़ रोचक हैं, पठनीय हैं।
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#पुस्तकसमीक्षा  #डॉसुश्रीशरदसिंह  #bookreview #bookreviewer  #आचरण #DrMissSharadSingh

Tuesday, October 31, 2023

पुस्तक समीक्षा | मटन दिलरुबा : एक महत्वाकांक्षी कहानी संग्रह | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

प्रस्तुत है आज 31.10.2023 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई  युवा कथाकार श्री शुभम उपाध्याय के उपन्यास "मटन दिलरुबा" की समीक्षा।
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पुस्तक समीक्षा      
मटन दिलरुबा: एक महत्वाकांक्षी कहानी संग्रह    
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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उपन्यास     - मटन दिलरुबा
लेखक       - शुभम उपाध्याय
प्रकाशक     - इसमाद प्रकाशन, मातृ सदन, दीवानी तकिया, कटहल बाड़ी, दरभंगा, बिहार
मूल्य        - 249/-
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शुभम उपाध्याय कथाजगत में एक नया नाम है। 18 सितंबर 1989 में जन्मे युवा कथाकार शुभम उपाध्याय । ‘‘मटन दिलरुबा’’ इनका प्रथम कहानी संग्रह है जिसमें उनके कथालेखन पर परिचयात्मक लेख लिखा है कथाकार डाॅ. आशुतोष मिश्र ने। ‘‘हैरान होंगे सब देख कर आईने का ज़िगर’’ शीर्षक से भूमिका के रूप में लिखा गया डाॅ. आशुतोष मिश्र का लेख एक नवोदित किन्तु संभावनाशील कथाकार की लेखकीय प्रतिभा पर समुचित किन्तु संतुलित प्रकाश डालता है। कथाकार आशुतोष मिश्र ने शुभम उपाध्याय के कथाकर्म को जहां अनूठा माना है वहीं उन्होंने शुभम के प्रति आशा भी प्रकट की है कि वे अपने कथाकर्म को परवान चढ़ाएंगे। बहरहाल, जैसा कि कहानी संग्रह का नाम है ‘‘मटन दिलरुबा’’, यह संग्रह की पहली कहानी भी है, एक विचित्र प्रतिध्वनि रचती है। ‘‘मटन’’ जो आमिष खाद्य का प्रतीक है तथा ‘‘दिलरुबा’’ जो प्रेम एवं सौंदर्य का बोध कराता है - ये दोनों शब्द एक साथ मिल कर एक ऐसा कंट्रास्ट रचते हैं कि यह अनुमान लगाना एक आम पाठक के लिए कठिन हो जाता है कि संग्रह में किस तासीर की कहानियां होंगी। संग्रह के नाम को ले कर यह अपने आप में सफलता भी है और जोखिम भी। जिज्ञासा जगाता नाम सदा आकर्षित करता है तथा पढ़े जाने का आग्रह करता है किन्तु ‘‘मटन’’ शब्द के साथ हर पाठक अपने आपको ‘‘कंफर्टेबल’’ अनुभव नहीं कर सकता है।
‘‘मटन दिलरुबा’’ शीर्षक कहानी अपने नाम से कहीं हट कर कथित मुजाहिदीनों एवं कश्मीर में फैली आतंकवादी गतिविधियों की ओर अपनी तर्जनी उठाती है। संग्रह में कुल 18 कहानियां हैं जो अलग-अलग कथानक समेटे हैं। इन सभी कहानियों में मुस्लिम समाज को आधार बनाया गया है किन्तु इनके कथानक किसी भी समाज के हो सकते हैं। जैसे एक कहानी है ‘‘इंतज़ार’’। यह कहानी एक ऐसे परिवार की कथा कहती है जिसमें एक कामकाजी मां अकेली अपने दम पर अपनी बेटियों की परवरिश कर रही है। उसकी नौकरीपेशा बेटी को प्रोजेक्ट में मदद करने के लिए जो लड़का घर आता है, उसे ले कर पास-पड़ोस से ले कर कार्यालय के लोग तक बातें बनाते हैं। अपनी बेटियों पर विश्वास करने वाली मां सामाजिक दबाव में आ कर बेटी बुर्का पहन कर आॅफिस जाने को विवश करती है। बेटी अपने प्रोजेक्ट मददगार को अपने प्रेम भावना बताना चाहती है किन्तु उसके हाथ आता है एक सर्वकालिक इंतज़ार। कारण भयावह है। जघन्य है। हर समाज बेटियों पर ही दबाव बनाता है, हर समाज के आवारा लड़के सड़क पर अकेली चलने वाली लड़कियों को अपने मनोरंजन का साधन मान लेते हैं। इसीलिए यह कथानक भले ही एक मुस्लिम परिवार का हो किन्तु इसमें समूचा समाज रेखांकित है।

कहानी ‘‘लोअर बर्थ’’ रेल में अकेली यात्रा कर रही एक स्त्री की कथा है जिसमें एक पुरुष यात्री के आपत्तिजनक स्पर्श से मनोवैज्ञानिक कथानक जन्म लेता है। उस स्त्री को स्पर्श पर आपत्ति भी है और वह उसकी पुनरावृत्ति भी चाहती है। यहां कहानी गहन मनोवैज्ञानिक विश्लेषण की मांग करती है क्योंकि इस बिन्दु पर फ्रायड  और एरिकसन जैसे मनोवैज्ञानिकों के सिद्धांतों का पारस्परिक टकराव कहानी का तानाबाना बुनता है। सिग्मंड फ्रायड ने 1923 में इड, ईगो और सुपर ईगो की अवधारणा दी थी, जिसमें मानव व्यक्तित्व का तीन महत्वपूर्ण घटकों में विभाजन किया गया। इड वह घटक है जिसमें मानव की प्रकृति जनित इच्छाओं (स्वभाव) को रखा गया है। जैसे भूख, प्यास, कामुकता एवं लालच आदि। फ्रायड का मानना था कि व्यक्तित्व का निर्माण केवल बचपन में होता है, वहीं एरिकसन ने अपने  ‘‘मनोसामाजिक विकास सिद्धांत’’ द्वारा व्यक्ति की यौन प्रकृति के बजाय उसकी सामाजिक प्रकृति पर जोर दिया और कहा कि व्यक्ति के स्वभाव में किसी भी आयु में परिवर्तन हो सकता है। व्यक्ति की कामुक भावनाएं किसी भी आयु में बढ़ या घट सकती हैं। ‘‘लोबर बर्थ’’ कहानी यहीं पर नहीं ठहरती है, अपितु एक असंभावित अथवा भ्रमजनित अंत पर जा पहुंचती है। जिसमें अन्य कई मनोग्रंथियां भी जुड़ जाती हैं।

  ‘मुर्दाघर’’ कहानी प्रेम, कामुकता तथा हत्या जैसे जघन्य अपराध के घटनाक्रम को रचती है। यद्यपि इसमें ‘‘प्रेम’’ मात्र एक शब्द के रूप में आया है, कामुकता आधारभूत तत्व है जिसके चलते मुर्दाघर को भी अपनी वासना को शांत करने का स्थल बना लिया जाता है। यह कहानी एक विकृत मनोदशा से बखूबी परिचित कराती है। दुर्भाग्य से ऐसे व्यक्ति समाज में मौजूद है जो यौनविकृतियों के वशीभूत हो कर असंभावित लगने वाली चेष्टाएं करते हैं तथा विभिन्न अपराधों को कारित करते हैं।

चाहे ‘‘मंदिर-मस्जिद’’ हो, ‘‘चश्मदीद’’ हो या फिर ‘‘शहरी’’- सभी कहानियां समाज में व्याप्त वैचारिक दोषों एवं मनोविकारों को चिन्हित करती हैं। संग्रह की सभी कहानियों में अपना अलग, अनूठा तेवर है। एक अधूरापन भी है जिसे कथाकार ने अपने लेखन की विशेषता के रूप में अपनाया है और जो पाठकों के लिए बहुत कुछ छोड़ जाता है सोचने-विचारने को। इसमें कोई संदेह नहीं कि शुभम उपाध्याय ने आम जनजीवन से कथानकों को उठाया है, बस, उसे देखा है मुस्लिम परिवेश के दृष्टिकोण से। हर एक लेखक की अपनी चयनिता होती है कि वह अपनी कहानियों में किस समाज, किस दशा अथवा किस मनोदशा की बात करना चाहता है। शुभम उपाध्याय ने कथालेखन को ही क्यों चुना, इस बारे में उन्होंने ‘‘लेखक की कलम से’’ के अंतर्गत अपने विचार लिखे हैं। वे लिखते हैं कि -‘‘शुरुआत उपन्यास से भी की जा सकती थी पर वह वापिस उसी ठहराव की माँग करता है, जो मेरी नजर में या तो बहुत कम मात्रा में है या फिर नदारद है। मैं ये नहीं कहता कि युवा साथियों में उतना इत्मीनान नहीं है कि लम्बे-चौड़े उपन्यासों को वे दत्त-चित्त होकर पूरा नहीं पढ़ते। पढ़ते होंगे पर मुट्ठी भर। आप माने या न मानें पर ये आज के दौर की हकीक़त है। मेरा मानना है कि छोटी- छोटी कहानियां उन्हें ज्यादा लुभातीं होंगीं। कम समय में सीधे मुद्दे की बात। कोई लाग लपेट नहीं। सो पहले कहानियां लिखना ही चुना गया और फिर कहानियां लिखीं गयीं।’’
अर्थात् शुभम उपाध्याय अपने कथालेखन के उद्देश्य को ले कर स्पष्ट हैं। वे इस उद्देश्य को ले कर चले हैं कि युवा पाठकवर्ग उनकी कहानियों को पढ़े। इस अभिलाषा में कोई दोष नहीं है। हर लेखक चाहता है कि उसका लिखा हुआ पाठकों द्वारा पढ़ा जाए। लेकिन जब प्राथमिक उद्देश्य यही हो तो थोड़ा चैंकाता है। वस्तुतः इसीलिए कहा जाने लगा है कि इस दौर में ‘‘बेस्टसेलर राईटर’’ बनना आसान है किन्तु ‘‘बेस्ट राईटर’’ बनना कठिन है। यह एक चुनौती भरा समय है जो लेखक से धैर्य और समय की मांग करता है। अच्छा है कि शुभम उपाध्याय इस तथ्य को पहचानते हैं।

शुभम उपाध्याय की भाषा और शैली दोनों पर अच्छी पकड़ है। वे थिएटर से भी जुड़े हुए हैं इसलिए संवाद की सटीकता एवं संक्षिप्तता प्रभावी ढंग से उभरी है। रहा भाषा का प्रश्न तो एक बार फिर मैं यहां लेखक के ही विचार उनकी भाषा को ले कर उद्धृत कर रही हूं-‘‘बात करें भाषा की। इस किताब की भाषा खलिश हिन्दुस्तानी है। लिखने वाले नए लेखकों ने सहज, साफसुथरी और सलीकेदार हिंदी में जो काम किया है वो यक़ीनन काबिले तारीफ है इसके लिए वे बधाई के हक़दार हैं! पर हमारी साहित्यिक विरासत का एक हिस्सा “ हिन्दुस्तानी” का भी रहा है तो मक़सद ये था कि आजादी के दौर में लिखी जाने वाली हिंदी -उर्दू ( जिसे आप नई वाली हिंदी की बड़ी बहन यानि पुरानी वाली हिंदी कह सकते हैं) जो अपनी कसावट, ठसकपन और तबरेजी के लिए मशहूर थी से हमारे साथियों (ख़ासकर युवा) को रूबरू कराया जाये। उसी दिशा में यह एक कोशिश है।’’

हिंग्लिश के दौर में उर्दू जायके वाली भाषा की ओर ले जाना एक बेहतर प्रयास कहा जा सकता है। अपने इस कथन में लेखक संभवतः ‘‘खलिश हिन्दुस्तानी’’ की बजाए ‘‘खालिस हिन्दुस्तानी’’ लिखना चाहते थे क्योंकि  खलिश का अर्थ होता है कसक, टीस, मलाल, अफसोस आदि। जबकि खालिस का अर्थ होता है शुद्ध, खरा, सच्चा। संभवतः यह मुद्रण दोष भी हो सकता है।

इस कहानी संग्रह की भाषा सआदत हसन मंटो के समय की भाषा है, प्रेमचंद की नहीं। वर्तमान हिन्दुस्तानी भी नहीं। उर्दू के अरबी, फारसीनिष्ठ अनेक शब्दों का प्रयोग किया गया है। उदाहरण देखें-‘‘जब हर एक इंसान यहां खुदा के रहमो करम पर हो। जब हर एक इंसान का अपना मुख़तलिब तसव्वुर हो। जब हर एक इंसान को नेकी करने का तोहफा मिला हो। जब हरेक इंसान को उसने इबादत बख़शी हो। तो हम कौन होते हैं उसके कानूनों में हेर फेर करने वाले? इतना कमजोर तो नहीं हो सकता वह कि अपनी सल्तनत-ए-कुदरत, अपने दीनो इल्म की हिफाजत करने के लिए वो हम जैसों का आसरा रखे। बस एक मोहब्बत ही है जो मुन्तशिर है ... अल्ताफ।’’

इसी तरह एक और उदाहरण -‘‘अनवर ने ज्यों ही अपनी पेंट की जेब का जायजा लिया तो उसे उस जालिम आशिक जिसकी आंखों में भेंगापन था के खूनी खत का एहसास हुआ जो अपनी मौजूदगी से तशरीफ- ए- अनवर की तरद्दुद बढ़ा रहा था।’’

लेखक का उर्दू पर अच्छा अधिकार है। रहा ‘‘पुरानी हिन्दी’’ और ‘‘नई वाली हिन्दी’’ का प्रश्न तो वह एक अलग लंबी बहस का विषय है, उस पर यहां चर्चा करना अर्थपूर्ण नहीं होगा।

लेखक ने आत्मकथन के अंतिम वाक्य में लिखा है कि -‘‘तो किताब की शक्ल लिए इस डायनामाइट को आप पाठकों के हवाले करता हूं...।’’ शुभम उपाध्याय ने अपने कहानी संग्रह को ‘‘डायनामाइट’’ संज्ञा दी है, जबकि उनकी कहानियां विध्वंस नहीं रचती हैं वरन निर्माण की ओर विचार प्रस्तावित करती हैं। संभवतः वे अपनी कहानियों में आए विस्फोटक विचारों की ओर संकेत करना चाहते हैं। कुुलमिला कर ‘‘मटन दिलरुबा’’ कहानी संग्रह कहानीकार शुभम उपाध्याय का एक महत्वाकांक्षी संग्रह कहा जा सकता है जिसमें परिपक्वता की ओर दृढ़ता से बढ़ाए गए कदमों की स्पष्ट आहट है और पठनीय कहानियां हैं।     
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Tuesday, May 24, 2022

पुस्तक समीक्षा | समाज के दोहरे चरित्र को आईना दिखाती कहानियां | समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

प्रस्तुत है आज 24.05.2022 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई कवि, कथाकार "महेश कटारे सुगम"  के कहानी संग्रह "फसल" की समीक्षा... आभार दैनिक "आचरण" 🙏

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पुस्तक समीक्षा
समाज के दोहरे चरित्र को आईना दिखाती कहानियां
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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कहानी संग्रह - फसल
लेखक      - महेश कटारे ‘सुगम’
प्रकाशक    - लोकोदय प्रकाशन, प्रालि., 65/44 शंकरपुरी, छितवापुर रोड, लखनऊ (उप्र)
मूल्य       - 150 /-
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  आज जिस कहानी संग्रह की समीक्षा मैं कर रही हूं वह बुंदेलखंड के कहानीकार महेश कटारे सुगम का कहानी संग्रह ‘‘फसल’’ है। इस संग्रह में मौजूद कहानियों में ग्रामीण परिवेश की समसामयिक समस्याओं, जिन पर शहरी समस्याओं की छाप है, को स्पष्ट महसूस किया जा सकता है। इन कहानियों में आंचलिकता का पुट रचा बसा है। संग्रह की पहली कहानी का नाम है - ‘‘फसल’’। यह कहानी बुंदेलखंड में व्याप्त दस्यु समस्या पर आधारित है। इसका कथानक उस समय का है जब बुंदेलखंड में डाकुओं का आतंक व्याप्त था और सरकार हर संभव प्रयास कर रही थी कि इस समस्या पर लगाम लगाई जा सके।
70-80 के दशक में मध्य प्रदेश के भिंड जिले की चंबल घाटी में डाकू मलखान सिंह एक दुर्दांत नाम था। उन दिनों मलखान सिंह के सिर पर 70 हजार रुपये ( आज के हिसाब से लगभग 6 लाख रुपये) का इनाम रखा गया था। दस्यु उन्मूलन के प्रयास करने पर मलखान सिंह, पूजा बाबा जैसे अनेक कुख्यात डाकुओं ने आत्मसमर्पण कर दिया था। आत्मसमर्पण की योजना बनाना सरकार के लिए इसलिए भी जरूरी हो गया था क्योंकि इन दस्युओं की ग्रामीण जनता में बहुत प्रतिष्ठा थी। वे गरीबों की आर्थिक मदद करते थे तथा कभी किसी परिवार की बहू-बेटी से अभद्रता नहीं करते थे। इसका सकारात्मक असर जनता के दिलों-दिमाग पर था। इसीलिए ग्रामीण जनता उन्हें पुलिस से बचने में मदद किया करती थी। अतः यह जरूरी हो गया था कि उन्हें सम्मानजनक तरीके से आत्मसमर्पण के लिए राजी कर लिया जाए। मलखान सिंह का आत्मसमर्पण सशत्र्त था। उसने सरकार से यह मांग रखी थी कि उसके किसी भी साथी को मृत्युदंड की सजा न दी जाए जिसे सरकार ने मान लिया था। मलखान सिंह ने तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह की उपस्थिति में महात्मा गांधी की तस्वीर के सामने अपने हथियार रख कर आत्मसमर्पण की घोषणा की थी।  इस आत्मसमर्पण में पुलिस अधीक्षक और उनकी पत्नी की अहम भूमिका चर्चित रही थी जिसमें कहा जाता था कि भिंड के पुलिस अधीक्षक की पत्नी ने डाकू मलखान सिंह को राखी बांधकर आत्मसमर्पण के लिए राजी किर था। आत्मसमर्पण के बाद डाकुओं को खुली जेल में रखा गया था। जहां रहते हुए वे अपनी सजा भी काट रहे थे किंतु आम जनजीवन से भी जुड़े हुए थे।

    यद्यपि जैसी की आशा थी इस आत्मसमर्पण से समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हुई अपितु कुछ अपराधी मनोवृति के ग्रामीणों को रास्ता मिल गया लूटपाट करने का और अपने प्रतिशोध लेने का वे लोगों को लूटते डकैती डालते हत्याएं करते और बीहड़ में कूद जाते। उनको अपने आप को ‘डाकू सरदार’ या ‘दस्यु सुंदरी’ कहलाने में गर्व महसूस होता। यह समस्या आगे भी कई दशकों तक चलती रही। अजयगढ़, बांदा क्षेत्र के कुख्यात डाकू चार्ली राजा के आत्मसमर्पण के अवसर पर पत्रकार के रूप में मैं भी उस घटना के साक्षी रही हूं। चार्ली राजा को देख कर ही यह अंदाजा लगता था कि यह मलखान सिंह की परंपरा दस्यु नहीं है। चार्ली शब्द का अर्थ ही उद्दंड या चलता -पुर्जा होता है। कई डाकू सामान्य जिंदगी में लौट कर भी असामान्य बने रहे। ऐसा ही एक पात्र महेश कटारे ने अपनी कहानी ‘‘फसल’’ में रखा है। किंतु कहानी में एक नया मोड़ तब आता है जब उस दुर्दांत डाकू की घर वापसी के बाद उसकी दुर्दांता बनी रहती है और उसे समूल नष्ट करने के लिए उस से पीड़ित परिवार का युवक अपने हाथों में बंदूक उठा लेता है लेकिन वह तय करता है कि उस डाकू को मारने के बाद वह बीहड़ की ओर नहीं कानून की ओर जाएगा। बुंदेलखंड की दस्यु समस्या से परिचित कराती यह एक अच्छी कहानी है।
‘‘साठ मिनट का सफर’’ जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है एक यात्रा वृतांत है। इसमें 60 मिनट की रेल यात्रा का रोचक विवरण है। एक कंपार्टमेंट में अनाधिकृत रूप से छात्राओं का प्रवेश करना और अपनी चुलबुली हरकतों से कंपार्टमेंट को गुंजायमान किए रखना इस कहानी की रोचकता का सबसे बड़ा पक्ष है।
‘‘रोज़-रोज़’’ कहानी का शीर्षक पढ़कर सहसा अज्ञेय की कहानी ‘‘रोज़’’ याद आ गई। यूं तो अज्ञेय की ‘‘रोज’’ पहले ‘‘गैंग्रीन’’ नाम से छपी थी लेकिन बाद में इसका शीर्षक बदलकर अज्ञेय ने ‘‘रोज’’ कर दिया था। यद्यपि अज्ञेय की ‘‘रोज’’ और महेश कटारे कि ‘‘रोज’’ में कोई साम्य नहीं है। दोनों विपरीत ध्रुवीय कहानी हैं। अज्ञेय की ‘‘रोज’’ जहां एक ऐसी स्त्री की कथा है जो अपने पारिवारिक जीवन में एक घर में कैदी सा जीवन बिता रही है, जिसकी रोज ही एक सी दिनचर्या है। वही महेश कटारे की ‘‘रोज़-रोज़’’ उन स्त्रियों की संघर्ष गाथा है जो अपने परिवार का पेट पालने के लिए पैसेंजर ट्रेन पर सवार होकर, एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन तक की यात्रा करती हैं। वहां से उतरकर वे जंगल जाती हैं। वहां से लकड़ियां बटोरती हैं और फिर उन लकड़ियों के गठ्ठों को अपने सिर पर ढोकर स्टेशन तक लाती हैं और फिर वही यात्रा ट्रेन की अपने घर वापसी तक। इन लकड़ियों को बेचकर ही परिवार का जीवन यापन होता है। किंतु इस प्रतिदिन की यात्रा में अनेक संकट हैं- ट्रेन की भीड़ का संकट, टिकट कलेक्टर का संकट, जंगल में पहुंचकर वनरक्षक का संकट, अर्थात अनेक स्तरों पर इन स्त्रियों को रोज-रोज जूझना पड़ता है। यह स्त्री विमर्श की एक सशक्त कहानी मानी जा सकती है।

     ‘‘केट्टी’’ कहानी एक ऐसी युवती की है जो केरल की रहने वाली है। पारिवारिक आर्थिक विपन्नता के कारण वह अपनी बचपन की सहेली के पास ग्वालियर आ जाती है और वही नर्सिंग का कोर्स करके नर्स के रूप में एक गांव में नियुक्ति पा जाती है। यहां से शुरू होती है उसकी विडंबनाओं की कहानी। अस्पताल पहुंचते ही वहां का स्टाफ उसे इस प्रकार देखता है जैसे वह कोई मनोरंजन की वस्तु हो। थक-हार कर वह विवाह का रास्ता अपनाती है। वह एक ऐसे पुरुष से विवाह करती है जो पहले से ही विवाहित है किंतु उसके प्रति आकर्षित है। वह पुरुष अर्थात कंपाउंडर मिश्रा समाज में साख रखता है। अतः उस से विवाह करके केट्टी स्वयं को सुरक्षित महसूस करती है। केट्टी ने एक सुखद सुरक्षित जीवन की कल्पना करते हुए कंपाउंडर मिश्रा से शादी की थी वह कल्पना शीघ्र ही चूर-चूर हो गई। विवाह के बाद कंपाउंडर मिश्रा का वास्तविक रूप उसके सामने आया। वह जितना ऊपर से सज्जन दिखाई देता था, भीतर से उतना ही दुर्जन साबित हुआ। हर रात वैवाहिक-बलात्कार का सामना करती हुई केट्टी इस नतीजे पर पहुंचती है कि कानूनी अधिकार प्राप्त भेड़िए से मुक्त हो जाना ही श्रेयस्कर है। यह कहानी एक साथ गई मुद्दों पर चर्चा करती है जैसे स्त्री का अकेले रहते हुए अपने पैरों पर खड़े होने का संघर्ष, समाज में मौजूद भेड़िएनुमा लोगों की देह लोलुप चेष्टाएं और विवाह के उपरांत शराबी तथा पत्नी को उपभोग की वस्तु समझने वाला पति मिलने से उत्पन्न जीवन संकट। यह कहानी समाज में स्त्री की दशा पर पुनर्विचार करने का तीव्र आग्रह करती है।
‘‘प्यास’’ कहानी उस ग्रामीण परिवेश और समाज की कहानी है जहां मनुष्य की प्यास को भी उनकी जाति से आंका जाता है। कहानी का नायक गणपत नाई बड़ेजू की पोती का टीका चढ़ाने जाता है जहां उससे अपमान का सामना करना पड़ता है। यहां तक कि रास्ते में वह सभी को कुएं से पानी लाकर पिलाता है किंतु जब उसे प्यास लगती है तो उसे डपट दिया जाता है कि इसे बड़ी प्यास लगी हुई है। उतार दो इसे गाड़ी से जब कई किलोमीटर यह पैदल चल कर आएगा, तभी से समझ में आएगा। इस तरह का दोहरे व्यवहार की यह कहानी समाज के चाल, चरित्र और चेहरे को बेनकाब करती है।
‘‘फिर का भऔ’’ कहानी गांव के एक रसूखदार के बिगड़ैल बेटे को एक लड़की द्वारा दंडित किए जाने की रोचक कहानी है। ‘‘इस तरह’’ एक हंसमुख जिंदादिल कंडक्टर की कहानी है जिसकी जाति का पता लगाने के लिए सूत्रधार परेशान रहता है। गोया कंडक्टर की जाति उसके अस्तित्व से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो किंतु अंततः सूत्रधार को एहसास होता है कि वह गलत रास्ते पर जा रहा है।
‘‘घर’’ सर्पग्रस्त घर की कहानी है। मकान मालिक सर्पोंें के हाथों बहुत व्यक्तिगत क्षति झेलता है। अंततः उसका धैर्य जवाब दे जाता है। वह सांपों को कुचलने के लिए कटिबद्ध हो उठता है। ‘‘अपना बोझ’’ एक खेतिहर श्रमिक दंपति के संघर्ष की कहानी है। पति तपेदिक से बीमार पड़ जाने पर पत्नी घर का खर्च उठाने के लिए बैलगाड़ी से सामान ढोने का काम करने लगती है। समाज के ठेकेदार उसके इस कार्य पर उंगली उठाते हैं किंतु मदद के लिए कोई नहीं आता है। अनेक हृदय विदारक संकटों से गुजरने के बाद जब लोग मदद के लिए आते हैं तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। कथा की नायिका मदद लेने से इनकार कर देती है। वह कहती है कि जब जीवन भर दूसरों का बोझ उठाया तो आज अपना बोझ खुद उठाने में उससे कोई परेशानी नहीं है।
      ‘‘मुक्ति’’ उच्च शिक्षा प्राप्त कर बेरोजगार घूम रहे युवाओं के टूटते सपनों की कहानी है। कहानी का नायक चाय की दुकान वाले का बेटा है। उसने उच्च शिक्षा प्राप्त की है और वह भी नौकरी पाने के सपने देखता है। परंतु वह ‘‘ओव्हरऐज़’’ हो जाता है लेकिन उसके सपने पूरे नहीं हो पाते हैं। अंततः वह अपनी डिग्रियों को भट्टी के हवाले करके अपने टूटे सपनों से मुक्ति पा जाता है। ‘‘चींटे’’  तथा  ‘‘दृश्य-अदृश्य’’ समाज-विमर्श की कहानियां हैं।
पुस्तक की भूमिका कुंदन सिंह परिहार ने लिखी है। ‘‘कहानी लेखन पर दो टूक’’ - इस शीर्षक से कहानीकार ने आत्मकथन लिखा है। जिसमें उन्होंने अपनी साहित्य की यात्रा के आरंभ होने के कारण बताए हैं। महेश कटारे सुगम की यह विशेषता है कि वे अपने लेखन में साफ़गोई का परिचय देते हैं। बिना किसी लाग लपेट के। वे सीधे मुद्दे की बात पर आते हैं और कथा को विस्तार देते जाते हैं। सरल सहज हिंदी में बुंदेली बोली की छौंक जहां कहानियों की सरसता बढ़ा देती है, वही उन कहानियों का जमीन से जुड़ाव भी स्थापित करती है। ‘‘फसल’’ कहानीकार महेश कटारे सुगम का वह कहानी संग्रह है जो समाज चिंतन का एक मौलिक धरातल प्रस्तुत करता है। निश्चित रूप से यह एक पठनीय कहानी संग्रह है।   
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Wednesday, May 4, 2022

जो प्रायः गोपन रहता है कथा साहित्य के द्वारा हमारे सामने उभर कर आता है। - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

‘‘जीवन विविध रंगों से बना होता है, वह चाहे स्त्री का हो या पुरुष का। किंतु हमारा सामाजिक ढांचा इस प्रकार है कि जिसमें स्त्री के हिस्से में फीके, धूसर रंग अधिक आते हैं। भले ही उसकी देह पर वस्त्र या साज-सज्जा के रूप में चटक रंग दिखाई देंगे लेकिन भीतर से उसके जीवन का त्रासद पक्ष, जो कि प्रायः गोपन रहता है कथा साहित्य के द्वारा हमारे सामने उभर कर आता है।" अपने ये विचार मैंने (डॉ सुश्री शरद सिंह ने) अपने समीक्षा उद्बोधन में कहे। अवसर था होटल मैजेस्टिक प्लाज़ा के सभागार में म. प्र. प्रगतिशील लेखक संघ की सागर इकाई द्वारा लेखिका देवकी भट्ट नायक  के कहानी संग्रह " दूसरा मंगलसूत्र " और डॉ. दिव्या नायक की स्वास्थ संबंधी पुस्तक " Detoxifying Mind ,Body And Soul " का विमोचन समारोह।
      इस आयोजन में मुख्य अतिथि थे वरिष्ठ कथाकार श्री मुकेश वर्मा (भोपाल) विशिष्ट अतिथि थे दिनेश भट्ट (छिंदवाड़ा) तथा कार्यक्रम की अध्यक्षता की श्री शैलेंद्र शैली (भोपाल) ने। कहानी संग्रह पर समीक्षात्मक उद्बोधन दिया मैंने तथा डॉ आशुतोष मिश्र ने।
दिनांक 02.05.2022