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Wednesday, January 6, 2021

चर्चा प्लस | किसान आंदोलन बनाम तारीख़ पर तारीख़, तारीख़ पर तारीख़... | डाॅ शरद सिंह

Charcha Plus Column of Dr (Miss) Sharad Singh in Sagar Dinkar Daily

चर्चा प्लस

किसान आंदोलन बनाम तारीख़ पर तारीख़, तारीख़ पर तारीख़...      
  - डाॅ शरद सिंह

         सरकार और किसान प्रतिनिधियों के बीच सातवें दौर की वार्ता भी समाप्त हो गई, बिना किसी परिणाम के। दोनों पक्षों के हाथ लगी है आठवें दौर की वार्ता की तारीख़। ठंड, कोहरे और बारिश की मार झेलते किसान और सर्वसुविधायुक्त कमरों में बैठे सरकारी ज़िम्मेदार, इन दोनों के बीच एक ही चीज समान है और वह है तारीख़ पर तारीख़, तारीख़ पर तारीख़। वैसे यह मशहूर फिल्मी डाॅयलाॅग है सनी देओल का जिसे उन्होंने अदालती मुक़द्दमों की पेशियों के संबंध में बोला था लेकिन यह डाॅयलाॅग आज किसान आंदोलन के संदर्भ में भी सही बैठ रहा है। वार्ताओं के दौर चल रहे हैं और हाथ आ रही हैं आंदोलन का हल ढूंढती तारीख़ें।   
चर्चा प्लस - किसान आंदोलन बनाम तारीख़ पर तारीख़, तारीख़ पर तारीख़... - डॉ शरद सिंह, 06 .01. 2021


 04 जनवरी 2021 को किसान प्रतिनिधियों और सरकार के बीच सातवें दौर की बातचीत शुरू होने से पहले आंदोलन में मारे गए लोगों के लिए दो मिनट का मौन रखा गया। बैठक से पहले ही किसान संगठनों के नेताओं ने  कह दिया था कि वे सरकार के सामने नया विकल्प नहीं रखेंगे। दरअसल, कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने पिछली बैठक में किसान संगठनों से अनुरोध किया था कि कृषि सुधार कानूनों के संबंध में अपनी मांग के अन्य विकल्प दें, जिस पर सरकार विचार करेगी। पिछली बैठक में शामिल किसान नेताओं ने कहा था कि सरकार ने संकेत दिया है कि वह कृषि कानूनों को वापस नहीं लेगी। उसने इसे लंबी और जटिल प्रक्रिया बताया था। छठें दौर की बैठक में सरकार ने किसानों की दो मांगें मान ली थीं। सरकार ने बिजली संशोधन बिल को वापस लेने और पराली जलाने से रोकने के लिए बने वायु गुणवत्ता आयोग अध्यादेश में बदलाव का भरोसा किसान नेताओं को दिया था। हालांकि कृषि कानूनों पर पेंच फंसा हुआ है। किसान सितंबर से ही इन कानूनों का विरोध करते हुए आंदोलन कर रहे हैं।

दिल्ली की कई सीमाओं समेत हरियाणा के कई जिलों में चल रहे किसान आंदोलन को एक माह दस दिन से ऊपर का समय हो चला है। बीते 41 दिनों से किसान कृषि कानूनों को रद्द कराने के लिए ठंड, बारिश, कोहरे और शीतलहर का प्रकोप झेल कर भी डटे हुए हैं। देश के किसानों का ये आंदोलन दिनोंदिन बढ़ता ही जा रहा है। दिल्ली में भारी बारिश और हाड़ कंपा देने वाली ठंड के बावजूद किसान सिंघु बॉर्डर समेत कई सीमाओं पर मोर्चेबंदी पर डटे हुए हैं। किसानों ने अल्टीमेटम दिया है कि अगर उनकी मांगें नहीं मानी जाती हैं तो वे अपने आंदोलन को और तेेेज करेंगे। जहां 03 जनवरी 2021, रविवार को यूपी गेट (दिल्ली-यूपी बॉर्डर) के अलावा किसानों नेे ज्ञानी बॉर्डर पर भी कब्जा कर लिया। वहीं राजस्थान से दिल्ली की ओर आ रहे किसानों पर देर रात हरियाणा पुलिस ने आंसू गैस के गोले दागे और पानी की बौछारें भी कीं। यह घटना गुरुग्राम से मात्र 16 किलोमीटर दूर रेवाड़ी अलवर मार्ग पर हुई।

हाड़-मांस के बने किसानों को भी मौसम की मार से जान-माल का नुकसान झेलना पड़ रहा है। कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली बॉर्डर पर किसान आंदोलन में शामिल संगरूर के गांव बखोपीर के किसान गुरचरण सिंह की ठंड लगने से मौत हो गई। यूनियन के ब्लॉक उपाध्यक्ष गुरभजन सिंह बखोपीर ने बताया कि मृतक किसान गुरचरण सिंह (67) कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली बॉर्डर पर आंदोलन में शामिल होने गए थे। अधिक ठंड लगने से गुरचरण सिंह की तबीयत खराब हो गई और वह रविवार को घर आ गए लेकिन रात को तबीयत अधिक बिगड़ने से उनकी मौत हो गई। फिर भी आंदोलनकारी किसान अपनी जान की परवाह किए बिना अपनी मांग पर डटे हुए हैं। सातवें दौर की चर्चा असफल होने के बाद भारतीय किसान यूनियन के युद्धवीर सिंह ने कहा कि मंत्री चाहते थे कि हम कानूनों पर चर्चा करें। हमने इसे खारिज कर दिया और कहा कि कानूनों पर चर्चा करने का कोई मतलब नहीं है क्योंकि हम कानूनों का पूरा रोलबैक चाहते हैं। सरकार हमें संशोधन की ओर ले जाने का इरादा रखती है लेकिन हम इसे स्वीकार नहीं करेंगे। वहीं अखिल भारतीय किसान सभा के महासचिव हन्नान मोल्लाह ने कहा कि सरकार काफी दबाव में है। हम सभी ने कहा कि यह हमारी मांग है (कानूनों को निरस्त करना)। हम कानूनों को निरस्त करने के अलावा किसी अन्य विषय पर चर्चा नहीं चाहते हैं। कानूनों को निरस्त करने तक विरोध वापस नहीं लिया जाएगा। हमने बताया कि पहले कृषि कानूनों को वापिस किया जाए, एमएसपी पर बात बाद में करेंगे। 8 तारीख तक का समय सरकार ने मांगा है। उन्होंने कहा कि 8 तारीख को हम सोचकर आएंगे कि ये कानून वापिस हम कैसे कर सकते हैं, इसकी प्रक्रिया क्या हो। 

राकेश टिकैत ने कहा कि 8 जनवरी 2021 को सरकार के साथ फिर से मुलाकात होगी। तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने पर और एमएसपी दोनों मुद्दों पर 8 तारीख को फिर से बात होगी। हमने बता दिया है कानून वापसी नहीं तो घर वापसी नहीं। इस बैठक में सरकार की ओर से केंद्रीय मंत्री नरेंद्र तोमर, पीयूष गोयल और सोम प्रकाश मौजूद रहे।

किसानों के संघर्ष की निरंतरता को देखते हुए विभिन्न राजनीतिक दल उनके समर्थन में बयानबाज़ी कर रहे हैं। वैसे आंदोलनकारी किसानों ने आरम्भ में ही राजनीतिक दलों को स्पष्ट कर दिया था कि जिसे समर्थन देना है वह बाहर से दे। राजनीतिक दलों के लोगों से हम अपना मंच साझा नहीं करेंगे और न ही अपने प्रदर्शन में शामिल होने देंगे। राजनीतिक दल भी उनकी इस बात को स्वीकार करते हुए उनके मंच से दूर रह कर समर्थन दे रहे हैं। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा कि ‘‘भाजपा की सरकार पर किसानों को बिल्कुल भरोसा नहीं है। मंडी बंद कर दी, मंडी बेच दी, कितने किसानों पर आंसू गैस के गोले चलाए गए, कितनों की हत्या हो गई, कितनों ने आत्महत्या कर ली और कितनों की जानें चली गई लेकिन सरकार को परवाह नहीं है।’’ 
यद्यपि आंदोलनकारियों ने इस तरह के राजनीतिक बयानों से स्वयं को दूर रखा है। वे किसी भी राजनीतिक दल का संदर्भ काम में नहीं ला रहे हैं। संभवतः उन्हें आरम्भ से ही यह डर था कि आंदोलन में राजनीतिक दलों के शामिल होने से आंदोलन की वास्तविकता पर राजनीति का मुलम्मा चढ़ जाएगा और किसानों का हित धरा के धरा रह जाएगा।

दिलचस्प बात तो यह है कि समाज के विभिन्न वर्गों का भी किसान आंदोलन को समर्थन मिल रहा है। समाज के कई वर्गों के बाद अब किसानों को बौद्ध भिक्षुओं का भी साथ मिल गया है। गाजीपुर बॉर्डर पर कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के विरोध प्रदर्शन के 38वें दिन प्रदर्शन में बौद्ध भिक्षुओं ने हिस्सा लिया। एक बौद्ध भिक्षु ने पत्रकारों से चर्चा करते हुए बताया कि ‘‘हम लखनऊ से आए हैं। किसान सड़कों पर हैं इसलिए हम मठों को छोड़ किसानों के साथ आए हैं। जब तक कानून वापस नहीं होंगे हम नहीं जाएंगे।’’ 

रहा चर्चा के दौरान माहौल का सवाल तो उसे उस तस्वीर से समझा जा सकता है जो सरकार और किसानों के बीच वार्ता के स्थल दिल्ली के विज्ञान भवन के अंदर की है जिसमें कुछ किसानों को कुर्सियों पर बैठे देखा जा सकता है, कुछ लोग हाल के फर्श पर बैठे हुए है जबकि नजदीक के टेबल पर लंच रखा है। किसानों ने अपने लंगर से आया खाना खाया और किसानों ने सरकार के लंच को ठुकरा दिया। वार्ता में भाग लेने वाले किसान मज़दूर संघर्ष कमेटी के सरवन सिंह पंधेर के अनुसार, ‘‘कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने साफतौर पर कहा कि कानून रद्द नहीं किए जाएंगे, उन्होंने हमसे यहां तक कहा कि कानून रद्द कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट की शरण लीजिए।’’ पंधेर ने कहा, ‘‘हमने पंजाब के युवाओं से लंबी लड़ाई के लिए तैयार रहने को कहा है। हम गणतंत्र दिवस पर बड़ा प्रदर्शन करेंगे।’’

स्थिति की गंभीरता को समझते हुए अब सरकार को कोई ऐसा कदम उठाना चाहिए जिससे एक सर्वमान्य रास्ता निकल सके। विधि विशेषज्ञों के अनुसार एक रास्ता यह भी हो सकता है कि इस कानून को राज्यों के अधिकार क्षेत्र के हवाले कर दिया जाए। राज्य सरकारें अपने राज्य की स्थितियों के अनुसार इसे लागू करें। अथवा विशेषज्ञों के अनुसार दूसरा विकल्प है कि तीनों कृषि कानूनों को वापस लेते हुए उनका पुनर्निर्धारण किया जाए और ऐसा करते समय किसानों को उसमें शामिल रखा जाए। बहरहाल, जैसा कि कृषि मंत्री नरेेन्द्र सिंह तोमर ने कहा है कि सरकार को अभी होमवर्क करने के लिए समय चाहिए तो चर्चा के आठवें दौर की तारीख़ तो हाथ आनी ही थी। और याद आना था फिल्म ‘‘दामिनी’’ (1993) में अभिनेता सनी देओल का बोला गया वह मशहूर डाॅयलाॅग जिसमें वे अदालती पेशियों के संबंध में कहते हैं-‘‘ तारीख़ पर तारीख़, तारीख़ पर तारीख़, तारीख़ पर तारीख़, तारीख़ पर तारीख़ मिलती रही है। लेकिन इंसाफ नहीं मिला माय लॉर्ड, इंसाफ़ नहीं मिला, मिली है तो सिर्फ ये तारीख़।’’

आशा की जानी चाहिए कि 08 जनवरी 2021 को होने वाली आठवें दौर की चर्चा में कोई न कोई सकारात्मक निष्कर्ष निकल सकेगा और किसानों तथा सरकार के बीच का यह गतिरोध समाप्त हो सकेगा।
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(दैनिक सागर दिनकर में 06.01.2021 को प्रकाशित)
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Wednesday, December 9, 2020

चर्चा प्लस | किसान आंदोलन से गर्माता जाड़े का मौसम | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस
किसान आंदोलन से गर्माता जाड़े का मौसम 
- डाॅ शरद सिंह
दिल्ली के इर्द-गिर्द जमा हजारों किसानों में औरतें, बच्चे और बुजुर्ग भी हैं। ये आंदोलनकारियों के साथ हैं। लेखक, खिलाड़ी, कलाकारों के साथ ही पूर्व सैनिक भी किसानों के समर्थन में आ खड़े हुए हैं और केन्द्र सरकार से मिले अपने-अपने सम्मान तथा सुविधाएं लौटाने की घोषणा कर चुके हैं। ‘भारत बंद’ की घोषणा को भी समर्थन मिला। ऐसे में सरकार का हरसंभव प्रयास यही है कि मामला जल्दी से जल्दी शांत हो जाए। मुद्दा है कृषि कानून 2020 जिसने कड़ाके की ठंड को भी गर्मा दिया है।
किसान आंदोलन का ऐसा तेवर स्वतंत्र भारत में शायद ही किसी ने देखा हो जैसा कि न दिनों देखने को मिला है। जब इस आंदोलन की शुरुआत हुई थी तो किसी ने नहीं सोचा होगा कि मामला ‘‘आर या पार’’ तक जा पहुंचेगा। देश में इससे पूर्व कई छोटे-बड़े किसान आंदोलन हुए जिनमें से कई में तो सरकार ने आंदोलनकारियों से मिलने से भी मना कर दिया था। तमिलनाडु के आंदोलनकारी किसानों को भी इसी तरह के नकारात्मक अनुभव का सामना करना पड़ा था। लेकिन इस बार एक राज्य के किसानों के साथ दूसरे राज्यों के किसान दल भी आ कर मिलते गए। राजनीतिक विपक्षी दलों ने भी किसानों के समर्थन में शंखनाद कर दिया। फिर भी सरकार बिल वापस लेने को तैयार नहीं हुई। आंदोलनकारी कृषक भी पीछे हटने को तैयार नहीं। सरकार और आंदोलनकारियों के बीच लगातार असफल चर्चाओं के बाद  12वें दिन 7 दिसम्बर 2020 को किसानों के समर्थन में पंजाब के 30 एथलीट्स अवॉर्ड लौटाने राष्ट्रपति भवन की ओर बढ़े, भले ही पुलिस ने उन्हें रास्ते में ही रोक दिया। किसानों के 8 दिसंबर 2020 को भारत बंद का ऐलान किया जिसके समर्थन में कांग्रेस समेत 20 सियासी दल और 10 ट्रेड यूनियंस आ खड़े हुए। इस आंदोलन की विशेष बात यह है कि इस आंदोलन का स्वरूप सुसंगठित और सुव्यवस्थित है। आंदोलनकारियों के लिए खाने, ओढ़ने-बिछाने, मेडिकल सुविधाओं से ले कर मोबाईल चार्जिंग की सोलर सिस्टम सुविधा भी उपलब्ध है। साथ आए उनके बच्चे मोबाईल के जरिए अपनी आॅनलाईन पढ़ाई भी जारी रखे हुए हैं। साझे चूल्हे आंदोलन को भी साझापन दे रहे हैं।    

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस नए कृषि कानून को ‘‘आजादी के बाद किसानों को किसानी में एक नई आजादी’’ देने वाला कानून कहते हैं। वे सरकार की स्थिति स्पष्ट करते हुए कह चुके हैं कि विपक्षी दल इन कानूनों को लेकर दुष्प्रचार कर रहे है क्योंकि किसानों को एमएसपी का फायदा नहीं मिलने की बात गलत है। बिहार चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था, ‘‘जो लोग दशकों तक देश में शासन करते रहें हैं, सत्ता में रहे हैं, देश पर राज किया है, वो लोग किसानों को भ्रमित कर रहे हैं, किसानों से झूठ बोल रह हैं।’’ मोदी ने कहा था कि विधेयक में वही चीजें हैं जो देश में दशकों तक राज करने वालों ने अपने घोषणापत्र में लिखी थीं। मोदी ने कहा कि यहां ‘‘विरोध करने के लिए विरोध’’ हो रहा है। लेकिन मोदी सरकार को उस समय झटका लगा था जब केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने अपने पद से इस्तीफा देते हुए ट्वीट किया था कि ‘‘मैंने केंद्रीय मंत्री पद से किसान विरोधी अध्यादेशों और बिल के खिलाफ इस्तीफा दे दिया है। किसानों की बेटी और बहन के रूप में उनके साथ खड़े होने पर गर्व है।’’

आंदोलनकारी किसान संगठनों का आरोप है कि नए कानून की वजह से कृषि क्षेत्र भी पूंजीपतियों या कॉरपोरेट घरानों के हाथों में चला जाएगा और इसका नुकसान किसानों को होगा। मामला बहुत पेंचीदा है। जो सीधे कृषिकार्यों स जुड़े हैं उनके लिए इस नए कृषि कानून को समझना आसान है लेकिन आम आदमी के लिए ज़रा कठिन है। यदि सरल शब्दों में कहा जाए तो सरकार अपने इस कानून को ले कर भविष्य के प्रति अत्यंत आश्वस्त है जबकि आंदोलनकारी किसान इस कानून से पैदा होने वाली भावी परेशानियों को ले कर आंदोलन की राह पर हैं।

क्या है यह नया कृषि कानून और इससे कृषक उत्तेजित क्यो हो उठे इसे समझने के लिए दोनों पक्षों के कुछ बिन्दुओं को समझना होगा। कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक, 2020 कानून में एक ऐसा इकोसिस्टम बनाने का प्रावधान है जहां किसानों और व्यापारियों को राज्य की एपीएमसी (एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्केट कमिटी) की रजिस्टर्ड मंडियों से बाहर फसल बेचने की आजादी होगी। इसमें किसानों की फसल को एक राज्य से दूसरे राज्य में बिना किसी रोक-टोक के बेचने को बढ़ावा दिया गया है। बिल में मार्केटिंग और ट्रांस्पोर्टेशन पर खर्च कम करने की बात कही गई है ताकि किसानों को अच्छा दाम मिल सके। इसमें इलेक्ट्रोनिक व्यापार के लिए एक सुविधाजनक ढांचा मुहैया कराने की भी बात कही गई है।

इस संबंध में आंदोलनकारियों सशंकित हैं कि कानून लागू होने के बाद धीरे-धीरे एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) के जरिए फसल खरीद बंद कर दी जाएगी। मंडियों में व्यापार बंद होने के बाद मंडी ढांचे के तरह बनी ई-नेम जैसी इलेक्ट्रोनिक व्यापार प्रणाली का औचित्य ही नहीं रह जाएगा।

कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक, 2020 कानून  में कृषि करारों (कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग) को उल्लिखित किया गया है। इसमें कॉन्ट्रैक्ट फार्मिग के लिए एक राष्ट्रीय फ्रेमवर्क बनाने का प्रावधान किया गया है। इस कानून के तहत किसान कृषि व्यापार करने वाली फर्मों, प्रोसेसर्स, थोक व्यापारी, निर्यातकों या बड़े खुदरा विक्रेताओं के साथ कॉन्ट्रैक्ट करके पहले से तय एक दाम पर भविष्य में अपनी फसल बेच सकते हैं। पांच हेक्टेयर से कम जमीन वाले छोटे किसान कॉन्ट्रैक्ट से लाभ कमा पाएंगे। बाजार की अनिश्चितता के खतरे को किसान की जगह कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग करवाने वाले प्रायोजकों पर डाला गया है। अनुबंधित किसानों को गुणवत्ता वाले बीज की आपूर्ति सुनिश्चित करना, तकनीकी सहायता और फसल स्वास्थ्य की निगरानी, ऋण की सुविधा और फसल बीमा की सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी। इसके तहत किसान मध्यस्थ को दरकिनार कर पूरे दाम के लिए सीधे बाजार में जा सकता है। किसी विवाद की सूरत में एक तय समय में एक तंत्र को स्थापित करने की भी बात कही गई है।

इस संबंध में आंदोलनकारियों का कहना है कि कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के दौरान किसान प्रायोजक से खरीद-फरोख्त पर चर्चा करने के मामले में कमजोर होगा। छोटे किसानों की भीड़ होने से शायद प्रायोजक उनसे सौदा करना पसंद न करे। किसी विवाद की स्थिति में एक बड़ी निजी कंपनी, निर्यातक, थोक व्यापारी या प्रोसेसर जो प्रायोजक होगा उसे बढ़त होगी।
आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक 2020 के अंतर्गत अनाज, दलहन, तिलहन, खाद्य तेल, प्याज और आलू को आवश्यक वस्तुओं की सूची से हटाने का प्रावधान है। इसका अर्थ यह हुआ कि सिर्फ युद्ध जैसी ‘‘असाधारण परिस्थितियों’’ को छोड़कर अब जितना चाहे इनका भंडारण किया जा सकता है। इस कानून से निजी सेक्टर का कृषि क्षेत्र पर हस्तक्षेप बढ़ेगा। कृषि इन्फ्रास्ट्रक्चर में निवेश बढ़ेगा, कोल्ड स्टोरेज और फूड स्प्लाई चेन का आधुनिकीकरण होगा। यह किसी सामान के मूल्य की स्थिरता लाने में किसानों और उपभोक्ताओं दोनों को मदद करेगा। प्रतिस्पर्धी बाजार का वातावरण बनेगा और किसी फसल के नुकसान में कमी आएगी।

आंदोलनकारी मानते हैं कि ‘‘असाधारण परिस्थितियों’’ में कीमतों में तेजी से बढ़त होगी जिसे बाद में नियंत्रित करना मुश्किल होगा। बड़ी कंपनियों को किसी फसल को अधिक भंडार करने की क्षमता होगी। इसका अर्थ यह हुआ कि फिर वे कंपनियां किसानों को दाम तय करने पर मजबूर करेंगी।

हज़ारों को किसानों का औरतों, बच्चों और बुजुर्गों सहित आंदोलन के लिए जुटना इस बात का संकेत है कि वे इस नए कानून को ने कर समझौते के मूड में नहीं हैं और भावुकता की सीमा तक अपने आंदोलन से जुड़े हुए हैं। उस पर किसानों के समर्थन में लेखकों, खिलाड़ियों, कलाकारों और पूर्व सैनिकों का आगे आना स्थिति का गंभीरता को जता रहा है। यह अच्छा है कि सरकार चर्चा के लिए तत्पर है। देश में शांति, स्थिरता और विकास के लिए अन्नदाता किसानों का शंकामुक्त और भयमुक्त होना आवश्यक है। शांति के वातावरण में कठिन से कठिन मसले हल किए जा सकते हैं। बहरहाल, किसान आंदोलन से यह जाड़े का मौसम गर्मा रहा है।

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(दैनिक सागर दिनकर में 09.12.2020 को प्रकाशित)
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