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Wednesday, September 14, 2022

चर्चा प्लस | हिन्दी दिवस | बस, एक सीढ़ी और ऊपर चढ़ जाए हिन्दी | डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस 
हिन्दी दिवस पर विशेष:
बस, एक सीढ़ी और ऊपर चढ़ जाए हिन्दी
            - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                     
   अनेक बार प्रयास किए गए कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्ज़ा मिल सके लेकिन हर बार हिन्दी एक सीढ़ी नीचे ही रह गई। जबकि हिन्दी में विविध भाषाओं के शब्द समाहित हैं और यह देश के विविध भाषा-भाषियों के बीच एक अच्छी, सरल संपर्क की भाषा की भूमिका निभा सकती है। बस, आवश्यकता है एक सच्चे प्रयास की। हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जिस दृढ़ता से मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक के भय से मुक्त कराया, कश्मीर में लोकतांत्रिक मूल्य बहाल करने के लिए धारा 370 हटाया, इसी तरह वे यदि ठान कर लें तो हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनने से कोई नहीं रोक सकता है। यह बात स्मरणीय है कि गुजराती मूल के होते हुए भी हमारे प्रधानमंत्री पूरी प्रखरता से हिन्दी में भाषण देते हैं।
     
भारत में जो भी विदेशी आया उसे हिन्दी सीखना सबसे आसान लगा, वह चाहे अंग्रेज हो या मुग़ल, अफ़गान। चौदहवीं सदी में अमीर खुसरो ने अपनी कविताओं में ‘हिन्दवी’ का प्रयोग किया जिसमें एक पंक्ति फारसी की तो दूसरी हिन्दी (हिन्दवी) की होती थी। वर्तमान में देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी गुजराती भाषी होते हुए भी धाराप्रवाह हिन्दी बोल लेते हैं। जिससे यह तथ्य सिद्ध होता है कि यदि हिन्दी के प्रति प्रेम और इच्छाशक्ति है तो हिन्दी को सीखना, बोलना और समझना सबसे आसान है, क्योंकि यह एक लचीली भाषा है। इसने विभिन्न भाषाओं और बोलियों के शब्द समाहित हैं। इसकी प्रकृति सार्वभौमिक (यूनीवर्सल) भाषा की प्रकृति है। हिंदी में एक भी ऐसा शब्द नहीं है जिसका उच्चारण उसके लिखने से थोड़ा भी अलग हो। इसी वजह से अंग्रेजों ने हिंदी को ‘फोनेटिक लेंग्वेज़’ कहा था। किन्तु उल्लेखनीय यह कि जहां हमारे देश के तीन-तीन नाम हैं- भारत, हिन्दुस्तान और इंडिया। वहां अभाव है तो एक राष्ट्रभाषा का। भारत में किसी भी भाषा को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा नहीं दिया गया है। संविधान का अनुच्छेद 343, अंग्रेजी के साथ हिंदी (देवनागरी लिपि में लिखित) को संघ की आधिकारिक भाषा यानी भारत सरकार की अनुमति देता है। अनेक बार प्रयास किए गए कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्ज़ा मिल सके लेकिन हर बार हिन्दी एक सीढ़ी नीचे ही रह गई। जबकि हिन्दी में विविध भाषाओं के शब्द समाहित हैं और यह देश के विविध भाषा-भाषियों के बीच एक अच्छी, सरल संपर्क की भाषा की भूमिका निभा सकती है। बस, आवश्यकता है हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्ज़ा मिलने की।
पं. मदन मोहन मालवीय, पुरुषोत्तम दास टंडन, महात्मा गंाधी से ले कर अटल बिहारी वाजपेयी ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा और राज्यों के बीच संपर्क की भाषा बनाने का अथक प्रयास किया। यहां तक कि थियोसोफिकल सोसाइटी की एनी बेसेंट ने कहा था, ‘भारत के सभी स्कूलों में हिंदी की शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए।’ लेकिन आज अंग्रेजी-भक्ति के आगे हिन्दी की उपेक्षा यथावत है। हिन्दी की चिंता दिवस, सप्ताह, पखवाड़े और मास में सिमट कर रह जाती है।
   किसी भी देश या राष्ट्र द्वारा किसी भाषा को जब अपने राजकार्य के लिए भाषा घोषित किया जाता है तो उसे उसकी राष्ट्र भाषा कहा जाता है। भारतीय संविधान में कोई भाषा राष्ट्रभाषा के रूप में उल्लिखित नहीं है। कई बार हिंदी को राष्ट्रभाषा कह दिया जाता हैै, लेकिन वास्तविकता यह है कि संविधान के सत्रहवें अध्याय में हिंदी को राजभाषा अर्थात राजकाज की भाषा के रूप में अंकित किया गया है। अन्य राज्यों या प्रदेशों की 22 भाषाओं को भी राज्य की राजभाषा के रूप में रखा गया है। भाषा, राजभाषा और राष्ट्रभाषा को लेकर देश में अनेक आंदोलन, प्रदर्शन और विरोध प्रदर्शन होते रहे हैं, फलतः देश की कोई भी भाषा राष्ट्रभाषा का दर्ज़ा नहीं पा सकी है। भारत की आधिकारिक भाषा, हिन्दी है और अंग्रेजी सहायक या गौण आधिकारिक भाषा है, भारत के राज्य अपनी आधिकारिक भाषा या भाषाएं विधिक रूप से घोषित कर सकते हैं। भारतीय संविधान और भारतीय कानून किसी भाषा को देश की राष्ट्रभाषा के रूप में  परिभाषित नहीं करता है। उल्लेखनीय है कि जिस समय संविधान लागू किया जा रहा था, उस समय अंग्रेजी आधिकारिक रूप से केन्द्र और राज्य दोनो स्तरों पर उपयोग में थी। संविधान द्वारा यह परिकल्पित किया गया था कि अगले 15 वर्ष में अंग्रेजी को चरणबद्ध रूप से हटा कर विभिन्न भारतीय भाषाओं, विशेषकर हिन्दी, को उपयोग में लाया जाएगा, लेकिन तब भी संसद को यह अधिकार दिया गया था कि वह विधिक रूप से उसके बाद भी अंग्रेजी का उपयोग हिन्दी के साथ केन्द्र स्तर पर और अन्य भाषाओं के साथ राज्य स्तर पर चालू रख सकती है।
भारतीय संविधान द्वारा, 1950 में, देवनागरी लिपि में लिखित हिन्दी को संघ की आधिकारिक भाषा घोषित किया गया। यदि संसद द्वारा तुष्टिकरण वाला निर्णय नहीं लिया जाता, तो 15 वर्षों बाद अर्थात 26 जनवरी, 1965 को अंग्रेजी का उपयोग आधिकारिक कार्यों के लिए समाप्त होना था। लेकिन अहिन्दी-भाषी राज्यों में विरोध की लहर चली। परिणामस्वरूप संसद द्वारा आधिकारिक भाषा अधिनियम के तहत आधिकारिक कार्यों के लिए अंग्रेजी के उपयोग को हिन्दी के साथ-साथ 1965 के बाद भी जारी रखने को स्वीकृति दी गई। परिणामस्वरूप, भारत की कोई राष्ट्रीय भाषा नहीं है। जबकि 22 आधिकारिक भाषाएं हैं।
   पं. मदन मोहन मालवीय ने हिन्दी को प्रतिष्ठा दिलाने के लिए सतत् प्रयास किया। न्यायालय में हिन्दी को स्थापित कराया। महामना पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने हिंदी भाषा के उत्थान एवं उसे राष्ट्र भाषा का दर्जा दिलाने के लिए इस आन्दोलन को एक राष्ट्र व्यापी आन्दोलन का स्वरुप दे दिया और हिंदी भाषा के विकास के लिए धन और लोगों को जोड़ना आरम्भ किया। आखिरकार 20 अगस्त सन् 1896 में राजस्व परिषद् ने एक प्रस्ताव में सम्मन आदि की भाषा में हिंदी को तो मान लिया पर इसे व्यवस्था के रूप में क्रियान्वित नहीं किया। लेकिन 15 अगस्त सन् 1900 को शासन ने हिंदी भाषा को उर्दू के साथ अतिरिक्त भाषा के रूप में प्रयोग में लाने पर मुहर लगा दी। बीसवीं सदी में थियोसोफिकल सोसाइटी की एनी बेसेंट ने कहा था, ‘भारत के सभी स्कूलों में हिंदी की शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए।’
पुरुषोत्तम दास टंडन ने महामना के आदर्शों के उत्तराधिकारी के रूप में हिंदी को निज भाषा बनाने तथा उसे राष्ट्र भाषा का गौरव दिलाने का प्रयास आरम्भ कर दिया था। सन् 1918 ई. में हिंदी साहित्य सम्मेलन के इन्दौर अधिवेशन में सभापति पद से भाषण देते हुए महात्मा गांधी ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा के योग्य ठहराते हुए कहा था कि, ‘मेरा यह मत है कि हिंदी ही हिन्दुस्तान की राष्ट्रभाषा हो सकती है और होनी चाहिए।’ इसी अधिवेशन में यह प्रस्ताव पारित किया गया कि प्रतिवर्ष 6 दक्षिण भारतीय युवक हिंदी सीखने के लिए प्रयाग भेजें जाएं और 6 उत्तर भारतीय युवक को दक्षिण भाषाएं सीखने तथा हिंदी का प्रसार करने के लिए दक्षिण भारत में भेजा जाएं। इन्दौर सम्मेलन के बाद उन्होंने हिंदीसेवा को राष्ट्रीय व्रत बना दिया। दक्षिण में प्रथम हिंदी प्रचारक के रूप में महात्मा गांधी ने अपने सबसे छोटे पुत्र देवदास गांधी को दक्षिण में चेन्नई भेजा। महात्मा गांधी की प्रेरणा से सन् 1927 में मद्रास में तथा सन् 1936 में वर्धा में राष्ट्रभाषा प्रचार सभाएं स्थापित की गईं। स्वतंत्र भारत में अटल बिहारी वाजपेयी ने संयुक्त राष्ट्रसंघ के अधिवेशन में हिन्दी में भाषण दिया था। वे चाहते रहे कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा होने का सम्मान मिले। इसीलिए जो हिन्दी के प्रति अनिच्छा प्रकट करते थे उनके लिए अटल बिहारी वाजपेयी का कहना था कि ‘‘क्या किसी भाषा को काम में लाए बिना, क्या भाषा का उपयोग किए बिना, भाषा का विकास किया जा सकता है? क्या किसी को पानी में उतारे बिना तैरना सिखाया जा सकता है?’’
   22 फरवरी 1965 को राज्यसभा में राजभाषा नीति पर परिचर्चा के दौरान अटल बिहारी वाजपेयी ने जो कुछ कहा था, उसमें हिन्दी की उपेक्षा के प्रति उनकी पीड़ा को स्पष्ट रूप से अनुभव किया जा सकता है-‘‘सभापति जी! मेरा दुर्भाग्य है, मेरी मातृभाषा हिन्दी है। अच्छा होता यदि मैं किसी अहिन्दी प्रांत में पैदा हुआ होता क्योंकि तब अगर हिन्दी के पक्ष में कुछ कहता तो मेरी बात का ज्यादा वजन होता। हिन्दी को अपनाने का फैसला केवल हिन्दी वालों ने ही नहीं किया। हिन्दी की आवाज पहले अहिन्दी प्रांतों से उठी। स्वामी दयानंद जी, महात्मा गांधी या बंगाल के नेता हिन्दीभाषी नहीं थे। हिन्दी हमारी आजादी के आंदोलन का एक कार्यक्रम बनी और चौदह सूत्रीय कार्यक्रम के अंतर्गत उसका समावेश किया गया। हमारे संविधान का जो पहला मसविदा बना, उसमें अंग्रेजी के लिए पांच साल देना तय किया गया था, लेकिन श्री गोपालास्वामी अयंगार, श्री अल्लादि कृष्णास्वामी और श्री टी.टी. कृष्णमाचारी के आग्रह पर वह पांच साल की अवधि बढ़ाकर पन्द्रह साल की गयी। हिन्दी अंकों को अंतर्राष्ट्रीय अंकों का रूप नहीं दिया गया। राष्ट्रभाषा की जगह हिन्दी को राजभाषा कहा गया। उस समय अहिन्दी प्रान्तों से हिन्दी का विरोध नहीं हुआ था। संविधान में जो बातें थीं, उनका विरोध या तो राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन ने किया, जो अंग्रेजी नहीं चाहते थे या स्वर्गीय मौलाना आजाद ने किया, जो हिन्दी की जगह हिन्दुस्तानी चाहते थे, मगर दक्षिण में हिन्दी के विरोध में आवाज नहीं उठी थी, लेकिन पंद्रह साल में हमने क्या किया?’’
  हिन्दी के संदर्भ में क्या हम आज महामना मदनमोहन मालवीय और अटल बिहारी वाजपेयी के उद्गारों एवं प्रयासों को अनदेखा तो नहीं कर रहे हैं? वस्तुतः ‘राष्ट्रभाषा’ शब्द प्रयोगात्मक, व्यावहारिक व जनमान्यता प्राप्त शब्द है। राष्ट्रभाषा सामाजिक, सांस्कृतिक स्तर पर देश को जोड़ने का काम करती है अर्थात् राष्ट्रभाषा की प्राथमिक दायित्व देश में विभिन्न समुदायों के बीच भावनात्मक एकता स्थापित करना है। राष्ट्रभाषा का प्रयोग क्षेत्र विस्तृत और देशव्यापी होता है। राष्ट्रभाषा सारे देश की सम्पर्कभाषा होती है। इसका व्यापक जनाधार होता है। राष्ट्रभाषा का स्वरूप लचीला होता है और इसे जनता के अनुरूप किसी रूप में ढाला जा सकता है। विश्व में हिन्दी का गौरव तभी तो स्थापित हो सकेगा जब हम अपने देश में हिन्दी को उचित मान, सम्मान और स्थान प्रदान कर दें। हिन्दी के मार्ग में कहीं न कहीं सबसे बड़ा रोड़ा इसकी रोजगार से बढ़ती दूरी की है। इस तथ्य से हम मुंह नहीं मोड़ सकते हैं कि हमारे युवाओं में यहां युवा का अर्थ एक पीढ़ी पहले के युवाओं से भी है, अंग्रेजी पढ़ कर अच्छे रोजगार के अवसर बढ़ जाते हैं जबकि हिन्दी माध्यम से की हुई पढ़ाई कथित ‘स्लम अपारच्युनिटी’ देती है। इस बुनियादी बाधा को दूर करने के लिए हमें तय करना होगा कि हम पढ़ाई के लिए हिन्दी का कौन-सा स्वरूप रखें जिससे हिन्दी रोजगार पाने के लिए की जाने वाली पढ़ाई का शक्तिशाली माध्यम बन सके। दो में से एक मार्ग तो चुनना ही होगा- या तो संस्कृतनिष्ठ हिन्दी को विभिन्न विषयों का माध्यम बना कर युवाओं को उससे भयभीत कर के दूर करते जाएं या फिर हिन्दी के लचीलेपन का सदुपयोग करते हुए उसे रोजगार की भाषा के रूप में चलन में ला कर युवाओं के मानस से जोड़ दें। यूं भी भाषा के साहित्यिक स्वरूप से जोड़ने का काम साहित्य का होता है, उसे बिना किसी संशय के साहित्य के लिए ही छोड़ दिया जाए। आखिर हिन्दी को देश में और विदेश में स्थापित करने के लिए बीच का रास्ता ही तो चाहिए जो हिन्दी को रोजगारोन्मुख बनाने के साथ उसके लचीलेपन को उसकी कालजयिता में बदल दे। इससे भी पहले हमें छोड़ना होगा अपने उस दोहरेपन जिसके चलते हिन्दी की भलाई दिवस, सप्ताह और मास में सिमट कर रह जाती है और शेष दिनों में हम अंग्रेजी की सेवा करते रह जाते हैं। हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्ज़ा दे कर ही इस बुनियादी बाधा को दूर किया जा सकता है। हिन्दी लोकप्रिय भाषा तो है ही, बस, एक सीढ़ी और ऊपर चढ़ जाए अर्थात् हिन्दी राष्ट्रभाषा बन जाए तो वह दुनिया में देश की भाषाई पहचान बन सकती है।
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Thursday, September 16, 2021

चर्चा प्लस | हिन्दी कब पाएगी राष्ट्रभाषा का दर्ज़ा | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस 

हिन्दी कब पाएगी राष्ट्रभाषा का दर्ज़ा

  - डॉ. शरद सिंह
     अभी तक हिन्दी राष्ट्रभाषा नहीं बन सकी है जबकि पं. मदन मोहन मालवीय, पुरुषोत्तम दास टंडन, महात्मा गांधी से ले कर अटल बिहारी वाजपेयी ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा और राज्यों के बीच संपर्क की भाषा बनाने का अथक प्रयास किया। यहां तक कि थियोसोफिकल सोसाइटी की एनी बेसेंट ने कहा था, ‘भारत के सभी स्कूलों में हिंदी की शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए।’ लेकिन आज अंग्रेजी-भक्ति के आगे हिन्दी की उपेक्षा यथावत है। हिन्दी की चिंता दिवस, सप्ताह, पखवाड़े और मास में सिमट कर रह जाती है।

किसी भी देश की संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा उसकी राष्ट्रभाषा होती है, जिसका प्रयोग लिखनें, पढ़नें और वार्तालाप करने में किया जाता है। राष्ट्रभाषा वह भाषा होती है, जिसमे देश के सभी कार्यों का निष्पादन किया किया जाता है। देश के सभी सरकारी कार्य इसी भाषा में किये जाते है। इस संदर्भ में रोचक बात यह है कि हमारे देश के तीन नाम हैं-भारत, हिन्दुस्तान और इंडिया। लेकिन अभाव है तो एक राष्ट्रभाषा का। भारत में किसी भी भाषा को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा नहीं दिया गया है। संविधान का अनुच्छेद 343, अंग्रेजी के साथ हिंदी (देवनागरी लिपि में लिखित) को संघ की आधिकारिक भाषा यानी भारत सरकार की अनुमति देता है। अनेक बार प्रयास किए गए कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्ज़ा मिल सके लेकिन हर बार हिन्दी एक सीढ़ी नीचे ही रह गई। जबकि हिन्दी में विविध भाषाओं के शब्द समाहित हैं और यह देश के विविध भाषा-भाषियों के बीच एक अच्छी, सरल संपर्क की भाषा की भूमिका निभा सकती है। बस, आवश्यकता है हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्ज़ा मिलने की।

पं. मदन मोहन मालवीय ने हिन्दी को प्रतिष्ठा दिलाने के लिए सतत् प्रयास किया। न्यायालय में हिन्दी को स्थापित कराया। महामना पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने हिंदी भाषा के उत्थान एवं उसे राष्ट्र भाषा का दर्जा दिलाने के लिए इस आन्दोलन को एक राष्ट्र व्यापी आन्दोलन का स्वरुप दे दिया और हिंदी भाषा के विकास के लिए धन और लोगो को जोड़ना आरम्भ किया। आखिरकार 20 अगस्त सन् 1896 में राजस्व परिषद् ने एक प्रस्ताव में सम्मन आदि की भाषा में हिंदी को तो मान लिया पर इसे व्यवस्था के रूप में क्रियान्वित नहीं किया। लेकिन 15 अगस्त सन् 1900 को शासन ने हिंदी भाषा को उर्दू के साथ अतिरिक्त भाषा के रूप में प्रयोग में लाने पर मुहर लगा दी। बीसवीं सदी में थियोसोफिकल सोसाइटी की एनी बेसेंट ने कहा था, ‘भारत के सभी स्कूलों में हिंदी की शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए।’
भारत में जो भी विदेशी आया उसे हिन्दी सीखना सबसे आसान लगा, वह चाहे अंग्रेज हो या मुग़ल, अफ़गान। चौदहवीं सदी में अमीर खुसरो ने अपनी कविताओं में ‘हिन्दवी’ का प्रयोग किया जिसमें एक पंक्ति फारसी की तो दूसरी हिन्दी (हिन्दवी) की होती थी। वर्तमान में देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी गुजराती भाषी होते हुए भी धाराप्रवाह हिन्दी बोल लेते हैं। जिससे यह तथ्य सिद्ध होता है कि यदि हिन्दी के प्रति प्रेम और इच्छाशक्ति है तो हिन्दी को सीखना, बोलना और समझना सबसे आसान है, क्योंकि यह एक लचीली भाषा है। इसने विभिन्न भाषाओं और बोलियों के शब्द समाहित हैं। इसकी प्रकृति सार्वभौमिक (यूनीवर्सल) भाषा की प्रकृति है। हिंदी में एक भी ऐसा शब्द नहीं है जिसका उच्चारण उसके लिखने से थोड़ा भी अलग हो। इसी वजह से अंग्रेजों ने हिंदी को ‘फोनेटिक लेंग्वेज़’ कहा था।
पुरुषोत्तम दास टंडन ने महामना के आदर्शों के उत्तराधिकारी के रूप में हिंदी को निज भाषा बनाने तथा उसे राष्ट्र भाषा का गौरव दिलाने का प्रयास आरम्भ कर दिया था। सन् 1918 ई. में हिंदी साहित्य सम्मेलन के इन्दौर अधिवेशन में सभापति पद से भाषण देते हुए महात्मा गांधी ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा के योग्य ठहराते हुए कहा था कि, ‘मेरा यह मत है कि हिंदी ही हिन्दुस्तान की राष्ट्रभाषा हो सकती है और होनी चाहिए।’ इसी अधिवेशन में यह प्रस्ताव पारित किया गया कि प्रतिवर्ष 6 दक्षिण भारतीय युवक हिंदी सीखने के लिए प्रयाग भेजें जाएं और 6 उत्तर भारतीय युवक को दक्षिण भाषाएं सीखने तथा हिंदी का प्रसार करने के लिए दक्षिण भारत में भेजा जाएं। इन्दौर सम्मेलन के बाद उन्होंने हिंदीसेवा को राष्ट्रीय व्रत बना दिया। दक्षिण में प्रथम हिंदी प्रचारक के रूप में महात्मा गांधी ने अपने सबसे छोटे पुत्र देवदास गांधी को दक्षिण में चेन्नई भेजा। महात्मा गांधी की प्रेरणा से सन् 1927 में मद्रास में तथा सन् 1936 में वर्धा में राष्ट्रभाषा प्रचार सभाएं स्थापित की गईं।
अटल बिहारी वाजपेयी ने संयुक्त राष्ट्रसंघ के अधिवेशन में हिन्दी में भाषण दिया था। वे चाहते रहे कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा होने का सम्मान मिले। इसीलिए जो हिन्दी के प्रति अनिच्छा प्रकट करते थे उनके लिए अटल बिहारी का कहना था कि ‘‘क्या किसी भाषा को काम में लाए बिना, क्या भाषा का उपयोग किए बिना, भाषा का विकास किया जा सकता है? क्या किसी को पानी में उतारे बिना तैरना सिखाया जा सकता है?’’
22 फरवरी 1965 को राज्यसभा में राजभाषा नीति पर परिचर्चा के दौरान उन्हांने दिया था, इसमें हिन्दी की उपेक्षा के प्रति उनकी पीड़ा को स्पष्ट रूप से अनुभव किया जा सकता है-‘‘सभापति जी! मेरा दुर्भाग्य है, मेरी मातृभाषा हिन्दी है। अच्छा होता यदि मैं किसी अहिन्दी प्रांत में पैदा हुआ होता क्योंकि तब अगर हिन्दी के पक्ष में कुछ कहता तो मेरी बात का ज्यादा वजन होता। हिन्दी को अपनाने का फैसला केवल हिन्दी वालों ने ही नहीं किया। हिन्दी की आवाज पहले अहिन्दी प्रांतों से उठी। स्वामी दयानंद जी, महात्मा गांधी या बंगाल के नेता हिन्दीभाषी नहीं थे। हिन्दी हमारी आजादी के आंदोलन का एक कार्यक्रम बनी और चौदह सूत्रीय कार्यक्रम के अंतर्गत उसका समावेश किया गया। हमारे संविधान का जो पहला मसविदा बना, उसमें अंग्रेजी के लिए पांच साल देना तय किया गया था, लेकिन श्री गोपालास्वामी अयंगार, श्री अल्लादि कृष्णास्वामी और श्री टी.टी. कृष्णमाचारी के आग्रह पर वह पांच साल की अवधि बढ़ाकर पन्द्रह साल की गयी। हिन्दी अंकों को अंतर्राष्ट्रीय अंकों का रूप नहीं दिया गया। राष्ट्रभाषा की जगह हिन्दी को राजभाषा कहा गया। उस समय अहिन्दी प्रान्तों से हिन्दी का विरोध नहीं हुआ था। संविधान में जो बातें थीं, उनका विरोध या तो राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन ने किया, जो अंग्रेजी नहीं चाहते थे या स्वर्गीय मौलाना आजाद ने किया, जो हिन्दी की जगह हिन्दुस्तानी चाहते थे, मगर दक्षिण में हिन्दी के विरोध में आवाज नहीं उठी थी, लेकिन पंद्रह साल में हमने क्या किया?’’
हिन्दी के संदर्भ में क्या हम आज महामना मदनमोहन मालवीय और अटल बिहारी वाजपेयी के उद्गारों एवं प्रयासों को अनदेखा तो नहीं कर रहे हैं? वस्तुतः ‘राष्ट्रभाषा’ शब्द प्रयोगात्मक, व्यावहारिक व जनमान्यता प्राप्त शब्द है। राष्ट्रभाषा सामाजिक, सांस्कृतिक स्तर पर देश को जोड़ने का काम करती है अर्थात् राष्ट्रभाषा की प्राथमिक दायित्व देश में विभिन्न समुदायों के बीच भावनात्मक एकता स्थापित करना है। राष्ट्रभाषा का प्रयोग क्षेत्र विस्तृत और देशव्यापी होता है। राष्ट्रभाषा सारे देश की सम्पर्कभाषा होती है। इसका व्यापक जनाधार होता है। राष्ट्रभाषा का स्वरूप लचीला होता है और इसे जनता के अनुरूप किसी रूप में ढाला जा सकता है। विश्व में हिन्दी का गौरव तभी तो स्थापित हो सकेगा जब हम अपने देश में हिन्दी को उचित मान, सम्मान और स्थान प्रदान कर दें। हिन्दी के मार्ग में कहीं न कहीं सबसे बड़ा रोड़ा इसकी रोजगार से बढ़ती दूरी की है। इस तथ्य से हम मुंह नहीं मोड़ सकते हैं कि हमारे युवाओं में यहां युवा का अर्थ एक पीढ़ी पहले के युवाओं से भी है, अंग्रेजी पढ़ कर अच्छे रोजगार के अवसर बढ़ जाते हैं जबकि हिन्दी माध्यम से की हुई पढ़ाई कथित ‘स्लम अपॉर्च्युनिटी’ देती है। इस बुनियादी बाधा को दूर करने के लिए हमें तय करना होगा कि हम पढ़ाई के लिए हिन्दी का कौन-सा स्वरूप रखें जिससे हिन्दी रोजगार पाने के लिए की जाने वाली पढ़ाई का शक्तिशाली माध्यम बन सके। दो में से एक मार्ग तो चुनना ही होगा- या तो संस्कृतनिष्ठ हिन्दी को विभिन्न विषयों का माध्यम बना कर युवाओं को उससे भयभीत कर के दूर करते जाएं या फिर हिन्दी के लचीलेपन का सदुपयोग करते हुए उसे रोजगार की भाषा के रूप में चलन में ला कर युवाओं के मानस से जोड़ दें। यूं भी भाषा के साहित्यिक स्वरूप से जोड़ने का काम साहित्य का होता है, उसे बिना किसी संशय के साहित्य के लिए ही छोड़ दिया जाए। आखिर हिन्दी को देश में और विदेश में स्थापित करने के लिए बीच का रास्ता ही तो चाहिए जो हिन्दी को रोजगारोन्मुख बनाने के साथ उसके लचीलेपन को उसकी कालजयिता में बदल दे। हिन्दी के मार्ग में सबसे बड़ा रोड़ा इसकी रोजगार से बढ़ती दूरी है। इस तथ्य से हम मुंह नहीं मोड़ सकते हैं कि हमने वह वातावरण निर्मित होने दिया है जहां अंग्रेजी पढ़ कर अच्छे रोजगार के अवसर बढ़ जाते हैं जबकि हिन्दी माध्यम से की हुई पढ़ाई कथित ‘स्लम अपॉर्च्युनिटी’ देती है। हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्ज़ा दे कर ही इस बुनियादी बाधा को दूर किया जा सकता है। इससे भी पहले हमें छोड़ना होगा अपने उस दोहरेपन जिसके चलते हिन्दी की भलाई दिवस, सप्ताह और मास में सिमट कर रह जाती है और शेष दिनों में हम अंग्रेजी की सेवा करते रह जाते हैं।
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(सागर दिनकर, 16.09.2021)
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Wednesday, September 12, 2018

चर्चा प्लस ... हिन्दी की उपेक्षा पर स्व. अटल जी की पीड़ा - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस ... 
 हिन्दी की उपेक्षा पर स्व. अटल जी की पीड़ा
- डॉ. शरद सिंह
 
जब हमारी बात सुनी नहीं जाती है, मानने योग्य हो कर भी मानी नहीं जाती है तो क्षोभ होता है अपनी स्थिति पर। कुछ इसी तरह की पीड़ा से गुज़रे थे पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी। हिन्दी के गहन समर्थक स्व. अटल जी देश में हिन्दी की उपेक्षा को देख कर तड़प उठे थे और वे कह उठे थे कि-‘अच्छा होता यदि मैं किसी अहिन्दी प्रांत में पैदा हुआ होता...’।
हिन्दी की उपेक्षा पर स्व. अटल जी की पीड़ा - डॉ. शरद सिंह .. चर्चा प्लस ... Column of Dr (Miss) Sharad Singh in Sagar Dinkar News Paper
अटल बिहारी भली-भांति जानते थे कि कब, कहां, क्या कहना है? अटल बिहारी अपने भाषण के श्रोताओं से अपने उद्गारों द्वारा सीधा सम्बन्ध स्थापित करने में माहिर रहे। चाहे साहित्यिक मंच हो, चाहे राजनीतिक मंच हो अथवा संसद हो, अटल बिहारी के ओजस्वी भाषणों को सभी ध्यानपूर्वक सुनते रहे हैं, यहां तक कि उनके राजनीतिक विरोधी भी उनके भाषणों की प्रशंसा करते रहे हैं। चाहे कितना भी आक्रामक विषय क्यों न हो, वे अपने भाषणों में शालीनता बनाए रखते और शब्दों की गरिमा बनाए रखते। ‘‘राष्ट्रवादी व्यक्तित्व अटल बिहारी वाजपेयी’’ को लिखने के दौरान मुझे स्व. अटल बिहारी वाजपेयी के विचारों को गहराई से जानने का अवसर मिला। मेरी यह किताब सन् 2015 में सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हुई। अपनी इसी किताब में सहेजा गया उनके भाषा के प्रमुख अंश मैं यहां प्रस्तुत कर रही हूं जो 22 फरवरी 1965 को राज्यसभा में राजभाषा नीति पर परिचर्चा के दौरान उन्हांने दिया था, इसमें हिन्दी की उपेक्षा के प्रति उनकी पीड़ा को स्पष्ट रूप से अनुभव किया जा सकता है- µ
‘‘सभापति जी! मेरा दुर्भाग्य है, मेरी मातृभाषा हिन्दी है। अच्छा होता यदि मैं किसी अहिन्दी प्रांत में पैदा हुआ होता क्योंकि तब अगर हिन्दी के पक्ष में कुछ कहता तो मेरी बात का ज्यादा वजन होता। हिन्दी को अपनाने का फैसला केवल हिन्दी वालों ने ही नहीं किया। हिन्दी की आवाज पहले अहिन्दी प्रांतों से उठी। स्वामी दयानंद जी, महात्मा गांधी या बंगाल के नेता हिन्दीभाषी नहीं थे। हिन्दी हमारी आजादी के आंदोलन का एक कार्यक्रम बनी और चौदह सूत्रीय कार्यक्रम के अंतर्गत उसका समावेश किया गया। हमारे संविधान का जो पहला मसविदा बना, उसमें अंग्रेजी के लिए पांच साल देना तय किया गया था, लेकिन श्री गोपालास्वामी अयंगार, श्री अल्लादि कृष्णास्वामी और श्री टी.टी. कृष्णमाचारी के आग्रह पर वह पांच साल की अवधि बढ़ाकर पन्द्रह साल की गयी। हिन्दी अंकों को अंतर्राष्ट्रीय अंकों का रूप नहीं दिया गया। राष्ट्रभाषा की जगह हिन्दी को राजभाषा कहा गया। उस समय अहिन्दी प्रान्तों से हिन्दी का विरोध नहीं हुआ था। संविधान में जो बातें थीं, उनका विरोध या तो राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन ने किया, जो अंग्रेजी नहीं चाहते थे या स्वर्गीय मौलाना आजाद ने किया, जो हिन्दी की जगह हिन्दुस्तानी चाहते थे, मगर दक्षिण में हिन्दी के विरोध में आवाज नहीं उठी थी, लेकिन पंद्रह साल में हमने क्या किया? यदि पन्द्रह साल में जैसा कि सभा ने निर्णय किया था और जैसा कि संविधान में लिखा गया था, हिन्दी पढ़ाने की व्यवस्था होती तो फिर आज जो परिस्थिति पैदा हो गई है, वह न होती, लेकिन केन्द्र तो मद्रास में हिन्दी नहीं ला सकता था। मद्रास की सरकार ने हिन्दी को अनिवार्य नहीं किया। अनिवार्यता हटा ली गयी। परीक्षाओं में पास होना भी अनिवार्य नहीं रहा और वहां हिन्दी की पढ़ाई एक मजाक बनकर रह गयी। जनता का राज जनता की भाषा में ही चलना चाहिए, मगर उत्तर प्रदेश में, बिहार में, राजस्थान में भी अंग्रेजी चल रही है क्योंकि सब नईदिल्ली की तरफ देखते हैं, दिल्ली से प्रेरणा लेते हैं। अगर नईदिल्ली और प्रांतों में हिन्दी नहीं चला सकती तो हिन्दी प्रांतों में उसे अंग्रेजी चलाने का अधिकार नहीं होगा।
मैं एक सुझाव देना चाहता हूं कि अगर हमारे गैर हिन्दी वाले हिन्दी को जोड़ भाषा, लिंक लैंग्वेज मानने के लिए तैयार नहीं हैं तो ईमानदारी से केवल मद्रास में, नईदिल्ली में कहना काफी नहीं है। अतुल्य बाबू संसद में कहेंगे कि हमने हिन्दी मान ली है, बंगाल में कहेंगे हिन्दी नहीं लदेगी। श्री कामराज रायपुर में कहेंगे हिन्दी चलनी चाहिए और वहां सिण्डीकेट के सदस्यों के साथ बैठकर हिन्दी के खिलाफ होने वाले आंदोलन में आहुति डालेंगे, यह दुरंगी बात, यह दोमुंही बात बंद होनी चाहिए। आप ईमानदारी से कहिए कि हम हिन्दी नहीं मानेंगे।
आप तय कर लीजिए कि आप कौन-सी भाषा मानते हैं। जिसकी भाषा हिन्दी नहीं है मैं उन्हें दावत देता हूं कि वे अपनी सभा कर लें और उसमें निश्चय कर लें कि हिन्दी जोड़ भाषा नहीं होगी, हिन्दी राजभाषा नहीं होगी और हम जो भाषा तय करते हैं, वह रहेगी और अगर वे सब मिलकर एक भाषा तय कर लेंगे तो हम हिन्दी वाले पंद्रह साल में उसको सीख कर दिखाएंगे। उसे हिन्दी वालों पर लाद दो, मगर अंग्रेजी को हटाओ। मगर वह खुद कोई भाषा तय नहीं करेंगे। हिन्दी नहीं चलने देंगे और हमारे ऊपर अंग्रेजी लादे रखना चाहते हैं।
एक सुझाव मैं और देना चाहता हूं। कहा जाता है कि झगड़ा नौकरियों का है, बच्चों का भविष्य क्या बनेगा? मेरा निवेदन है कि यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन के लिए अंग्रेजी चल रही है। यह सिफारिश पहले भी की गई थी कि अंग्रेजी के साथ हिन्दी और एक अन्य भारतीय भाषा का ज्ञान हर एक उम्मीदवार के लिए आवश्यक कर दिया जाए। अंग्रेजी में परीक्षा हो लेकिन उसके साथ हिन्दी का ज्ञान हो और हिन्दी के साथ एक भारतीय भाषा का ज्ञान अनिवार्य कर दिया जाए। अभी हिन्दी राज्यों में तीन भाषायी फार्मूला नहीं चल रहा। चलना चाहिए लेकिन जब तक नौकरी के लिए उसकी जरूरत नहीं होगी, कोई दक्षिण की भाषा नहीं पढ़ेगा। यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन के इम्तिहान में जो भी विद्यार्थी बैठे, उन्हें अपनी मातृभाषा के अलावा एक भारतीय भाषा अनिवार्य रूप से जाननी चाहिए। हिन्दी के अलावा एक और भाषा क्या हो, यह अहिन्दी वाले तय कर लें। अगर वे उर्दू तय करेंगे तो हम मान लेंगे। अगर वे पंजाबी के पक्ष में मत देंगे तो हम मान लेंगे मगर वे एक भाषा तय कर दें और हिन्दी प्रांतों के जो भी लड़के आएंगे, उन्हें उस भाषा का पढ़ना अनिवार्य कर दिया जाए। अगर उन्हें नौकरी लेनी है तो वे उस भाषा को पढ़ेंगे किन्तु नौकरियों के कारण देश के सांस्कृतिक विकास को रोका नहीं जा सकता। कितने लोग केन्द्रीय नौकरियों में आते हैं? चाहिए तो जनसंख्या के हिसाब से नौकरियों का कोटा तय कर दीजिए, चाहिए तो हिन्दी वालों को दस साल के लिए केन्द्रीय सेवाओं से वंचित कर दीजिए।
हम हिन्दी वालों को समझाएंगे जाकर, मगर चित भी मेरी, पट भी मेरी, यह नहीं चलेगा। नौकरियों के लिए ऐसा वातावरण पैदा करना कि देश की एकता खतरे में पड़ जाए, यह अच्छा नहीं है। इसलिए इस सवाल को जरा ऊंचे धरातल पर देखना होगा। अंग्रेजी पढ़ने में कितनी शक्ति, कितना समय, कितना धन खर्च होता है? हमारे श्री गोविन्द रेड्डी कह रहे थे कि अंग्रेजी का स्तर गिर रहा है, क्यों कि हवा बदल गई है, वातावरण बदल गया है। लड़के प्राथमिक शिक्षा, माध्यमिक शिक्षा अपनी भाषा में शुरू करते हैं और फिर उनके ऊपर अंग्रेजी लादी जाती है। यह केवल हिन्दी प्रांतों में नहीं है, अहिन्दी प्रांतों में भी है। मद्रास में तमिल को, बंगाल में बंगला को जो स्थान मिलना चाहिए, वह नहीं मिला। इसलिए नहीं कि राजभाषा हिन्दी हो गई, लेकिन इसलिए कि अंग्रेजी वहां पर अभी तक छाई हुई है। कुल दो फीसदी लोग अंग्रेजी जानते हैं। क्या वे चिरन्तन काल तक अठानवे फीसदी अंग्रेजी न जानने वालों पर राज करते रहेंगे? दो फीसदी लोग ऊंचे वर्ण के हैं, ऊंचे वर्ग के हैं और अठानवे फीसदी का शोषण करना चाहते हैं।
राष्ट्र की सच्ची एकता तब पैदा होगी जब भारतीय भाषाएं अपना स्थान ग्रहण करेंगी और अगर भारतीय भाषाएं हर जगह अपना स्थान ग्रहण कर लें तो फिर ‘लिंक लेंग्वेज’ के बनने में दो राय नहीं होंगी। अभी मद्रास में तमिल नहीं आई, बंगाल में बंगला नहीं आई। इसलिए वहां के लोगों को हिन्दी के खिलाफ भड़काया जा सकता है। एक बार वहां के आम आदमी समझ जाएं कि दो फीसदी अंग्रेजी जानने वाले हमें गुलाम रखने के लिए हिन्दी के विरोध का नारा लगा रहे हैं तो फिर अंग्रेजी नहीं रहेगी।’’
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( सागर दिनकर, 12.09.2018)


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