Showing posts with label शरदसिंह. Show all posts
Showing posts with label शरदसिंह. Show all posts

Wednesday, September 9, 2020

चर्चा प्लस - 9 सितम्बर जन्मदिन विशेष : टाॅल्सटाॅय वैचारिक गुरु थे महात्मा गांधी के - डाॅ शरद सिंह

 


चर्चा प्लस - 9 सितम्बर जन्मदिन विशेष :

      टाॅल्सटाॅय वैचारिक गुरु थे महात्मा गांधी के      

      - डाॅ शरद सिंह

 

जिसने ‘युद्ध और शांति’, ‘अन्ना करेनीना’ और ‘पुनरुत्थान’ नहीं पढ़ा उसने विश्व साहित्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मानो पढ़ा ही नहीं। रूसी लेखक लियो टाॅल्सटाॅय ने अपनी महान कृतियों से विश्व के साहित्य पर तो अपनी छाप छोड़ी ही, वहीं अपने विचारों से महात्मा गांधी का मार्गदर्शन किया। विश्व की दो महान विभूतियों के बीच महत्वपूर्ण पत्राचार होता रहा जिसने वैश्विक वैचारिकता को जन्म दिया। देश की सीमाओं को पीछे छोड़ कर मानवता की दिशा में की गई यह पहलकदमी आज के अशांत विश्व को शांति का रास्ता दिखा सकती है।

 

9 सितंबर 1828 को जन्मे लियो टॉलस्टॉय उन कालजयी लेखकों में से एक हैं जिन्होंने अपनी लेखनी से समूचे विश्व के साहित्य को प्रभावित किया। उनका जन्म मास्को से लगभग 100 मील दक्षिण में स्थित रियासत यास्नाया पोलिनाया में एक संपन्न परिवार हुआ था। इनके माता-पिता का देहांत बचपन में ही हो गया था। अतः लालन-पालन इनकी चाची कात्याना ने किया। सन 1844 में लियो टॉलस्टॉय कजान विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया और सन 1847 तक उन्होंने पूर्वीं भाषाओं और विधि संहिताओं का अध्ययन किया। ज़मींदारी के विवाद के कारणों से उन्हें स्नातक हुए बिना ही विश्वविद्यालय छोड देना पडा। सन 1851 में लियो टॉलस्टॉय कुछ समय के लिए सेना में भी प्रविष्ट हुए थे। उनकी नियुक्ति कॉकेशस पर्वतीय कबीलों से होने वाली दीर्घकालीन लडाई में हुई, जहां अवकाश का समय वे लिखने-पढने में लगाते रहे। यहीं पर उन्हें अपनी प्रथम रचना ‘चाईल्डहुड’ (1852) में लिखी, जो ‘‘एलटी’’ के नाम ‘‘द कंटपोरेरी’’ नामक पत्र में प्रकाशित हुई। उनकी लगभग सभी कृतियों ने प्रसिद्धि पाई लेकिन उनमें उनके उपन्यास ‘‘युद्ध और शांति’’ (1869), ‘‘अन्ना करेनिना’’ (1877), ‘‘पुनरुत्थान’’ (1899) ने वैश्विक कृतियां होने का इतिहास रच दिया। 


 
महात्मा गांधी टॉलस्टॉय के विचारों से अत्यंत प्रभावित थे। यद्यपि वे दोनों कभी एक-दूसरे से मिल नहीं सके किन्तु पत्रों के माध्यम से उनके बीच महत्वपूर्ण विचार विनिमय होता रहा। अपनी आत्मकथा में गांधी ने लिखा है कि टॉलस्टॉय की किताब ‘‘द किंगडम ऑफ गॉड इज विदइन यू’’ ने उनकी जिंदगी बदल दी। सन् 1894 में जर्मनी में प्रकाशित यह किताब स्वयं टाॅल्सटाय के देश रूस में प्रतिबंधित हो कर दी गई थी क्योंकि इसमें ईसाईत को नए दृष्टिकोण से व्याख्यायित किया गया था जो धर्मान्ध सत्ताधारियों को पसंद नहीं आई। टॉलस्टॉय की इस किताब को गांधी जी ने दक्षिण अफ्रीका में जोहानिसबर्ग से डरबन की ट्रेन यात्रा के दौरान एक अक्टूबर 1904 को पढ़ी थी। वह इस किताब से इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने एक अक्टूबर 1909 को ही टॉलस्टॉय को पत्र लिखा। यहां से आरम्भ हुआ टॉलस्टॉय और गांधी के बीच पत्राचार का सिलसिला।


टॉलस्टॉय ने अपने विचारों से चर्च की व्यस्थाओं पर जबरदस्त प्रहार किया था। टॉल्सटॉय ने लिखा कि ‘‘चर्च का इतिहास क्रूरतापूर्ण और भयावह है और ईसा के सिद्धातों के खिलाफ है। यह बात हर जगह, हर धर्म के लिए क्यों इतनी सटीक मालूम होती है? हर धर्म- नए या पुराने- के तथाकथित रक्षकों ने अपना-अपना दमन चक्र चलाया है। यूरोप और ईसाई धर्म भी इससे अछूता नहीं रहा।’’ टॉलस्टॉय ने उपनिवेशवाद पर भी कड़ाई से लिखा। उन्होंने लिखा कि ‘‘एक इंसान का दूसरे के लिए सबसे बड़ा उपहार है ‘शान्ति’ और फिर भी यूरोप के ईसाई देशों ने अपने मातहत लगभग तीन करोड़ लोगों के भाग्य का फैसला हथियारों से किया है।’


हिंसा का उत्तर अहिंसा से देने का रास्ता भी उन्होंने ईसा के उपदेशों से ही सुझाया कि ‘‘तुम अपने पडोसी से झगड़ो मत, और न ही हिंसा का सहारा लो। किसी और को पीड़ा देने से अच्छा है खुद पीड़ित हो जाओ और बिना किसी प्रतिरोध के हिंसा के सामना करो।’’ उनके इस सुझाव का महात्मा गांधी के विचारों पर गहरा प्रभाव डाला। गांधी जी के अहिंसावादी विचारों को इससे दृढ़ता मिली और आगे चल कर गांधी जी ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अहिंसक सत्याग्रह आंदोलन चलाया। गोपाल कृष्ण गोखले गांधी के राजनैतिक गुरु थे तो टॉलस्टॉय उनके वैचारिक गुरु थे।


गांधी जी द्वारा दक्षिण अफ्रीका का ट्रांसवाल सविनय अवज्ञा आंदोलन टॉलस्टॉय की विचारधारा से प्रभावित था। जिसकी चर्चा गांधीजी ने अपने टाल्सटाॅय को लिखे अपने पहले पत्र में की थी। इस पत्र के बारे में टॉलस्टॉय ने अपनी डायरी में लिखा था- ‘‘आज मुझे एक हिंदू द्वारा लिखा हुआ दिलचस्प पत्र मिला है।’’ इसके जवाब में उन्होंने गांधी को लिखा, ‘मुझे अभी आपके द्वारा भेजा गया दिलचस्प पत्र मिला है और इसे पढ़कर मुझे अत्यंत खुशी हुई। ईश्वर हमारे उन सब भाइयों की मदद करे जो ट्रांसवाल में संघर्ष कर रहे हैं। ‘सौम्यता’ का ‘कठोरता’ से संघर्ष, ‘प्रेम’ का ‘हिंसा’ से संघर्ष हम सभी यहां पर भी महसूस कर रहे हैं। मैं, आप सभी का अभिवादन करता हूं।’’


गांधीजी ने उन्हें दूसरा खत 4 अप्रैल, 1910 में लिखा और साथ में अपनी किताब ‘हिंद स्वराज’ भी भेजा। गांधीजी ने आग्रह किया कि अगर उनका स्वास्थ्य ठीक हो तो किताब के बारे में अपनेे विचारों से अवगत कराएं। उन दिनों टॉलस्टॉय अस्वस्थ रहने लगे थे। टॉलस्टॉय ने 10 अप्रैल 1910 को अपनी डायरी में लिखा कि ‘‘आज मुझसे दो जापानी मिलने आये जो यूरोपियन सभ्यता की प्रशंसा किए जा रहे थे और वहीं मुझे एक हिंदू का पत्र और उसकी किताब मिली जो यूरोप की सभ्यता में कमियों को साफ-साफ उजागर करते हैं।’’


गांधीजी के पत्र के उत्तर में टॉलस्टॉय ने 24 अप्रैल 1910 को लिखा कि ‘‘मुझे आपका पत्र और किताब मिली। सत्याग्रह सिर्फ हिंदुस्तान के लिए ही नहीं वरन, संपूर्ण विश्व के लिए इस समय सबसे महत्वपूर्ण है।’’

गांधी 15 अगस्त 1910 को लिखे अपने अगले खत में टॉलस्टॉय को लिखा कि उन्होंने अपने साथी कालेनबाख के साथ मिल कर जोहनिसबर्ग में ‘टॉलस्टॉय फार्म’ की स्थापना की है। गांधी जी के इन पत्रों ने और विचारों ने टॉलस्टॉय को गांधी जी की ओर आकर्षित किया। अब टॉलस्टॉय की डायरी में ‘गांधी’ शब्द कई बार आने लग था और वे उनके ट्रांसवाल के संघर्ष में काफी दिलचस्पी भी ले रहे थे। टॉलस्टॉय ने गांधीजी को अपना आखिरी पत्र 20 सितम्बर 1910 को लिखा। यह पत्र लम्बा होने के साथ-साथ मार्मिक भी था। पत्र में उन्होंने लिचाा के -‘‘अब जब मौत को मैं अपने बिलकुल नजदीक देख रहा हूं तो मैं कहना चाहता हूं जो मेरे जेहन में साफ- साफ नजर आता है और जो आज सबसे ज्यादा जरूरी है, और वह है - ‘निष्क्रय प्रतिरोध‘ (इसे आप ‘सत्याग्रह’ भी कह सकते हैं) जोकि कुछ और नहीं बल्कि प्रेम का पाठ है। प्रेम इंसान के जीवन का एकमात्र और सर्वोच्च नियम है और यह बात हर इंसान की आत्मा भी जानती हैय और अगर इंसान किसी गलत अवधारणा को न माने, तो शायद वह इसे समझ सकता है। इसी प्रेम की उद्घोषणा सभी संतों ने की है फिर वह चाहे भारतीय हो, चीनी हो, यहूदी हो, यूनानी हो या रोमन हो। जब प्रेम में बल का प्रवेश हो जाता है तो फिर वह जीवन का नियम नहीं रह पाता और हिंसा का रूप धारण कर लेता है और ताकतवर की शक्ति बन जाता है।’’


20 नवम्बर, 1910 को टॉलस्टॉय ने अंतिम सांस ली। टॉलस्टॉय की मृत्यु के समाचार से गांधी जी को बहुत ठेस पहुंचीं। उन्होंने अपने एक लेख में लिखा कि ‘‘मुझको तो अभी बहुत सीखना था उनसे। काल के क्रूर हाथों ने मुझसे मेरा पथ-प्रदर्शक छीन लिया। इस पीड़ा से उबरने के लिए मैंने कुछ समय एकांत में बिताया।’’

यदि विभिन्न देशों के बीच भौगोलिक विवाद त्याग कर दुनिया के सभी देश परस्पर वैचारिक विचार-विमर्श करें तो युद्ध, हिंसा और अशांति के दरवाजे़ आसानी से बंद हो सकते हैं। यही तो संदेश था टॉलस्टॉय का।

 

                -------------------------   

(दैनिक सागर दिनकर में 02.09.2020 को प्रकाशित)


#दैनिक #सागर_दिनकर #शरदसिंह #चर्चाप्लस #DrSharadSingh #miss_sharad  #CharchaPlus #SagarDinkar #युद्धऔरशांति #अन्नाकरेनीना #पुनरुत्थान #टॉलस्टॉय #वैचारिकगुरु #महात्मागांधी #MahatmaGandhi #Tolstoy #AnnaKarenina #WarAndPeace #Resurrection #TolstoyFarm #SouthAfrican #HermannKallenbach #PostForAwareness


Wednesday, October 31, 2018

चर्चा प्लस : 31 अक्तूबर जन्मदिन पर विशेष : ‘स्टेच्यू आफॅ यूनिटी’ से ऊंचा है सरदार वल्लभ भाई पटेल का क़द - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss)Sharad Singh
चर्चा प्लस  
31 अक्तूबर जन्मदिन पर विशेष :
  ‘स्टेच्यू आफॅ यूनिटी’ से ऊंचा है सरदार वल्लभ भाई पटेल का क़द
 - डॉ. शरद सिंह
       सरदार वल्लभ भाई पटेल की 182 मीटर ऊंची प्रतिमा के अनावरण के साथ ही यह प्रतिमा ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ के नाम से दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा के रूप में जानी जाएगी। सरदार वल्लभ भाई पटेल राजनीति जगत के वह स्तम्भ थे जिनका क़द किसी भी स्टेच्यू या किसी भी राजनीतिज्ञ से बहुत बड़ा है। भारत का एक राष्ट्र के रूप में जो एकीकृत स्वरूप है, वह सरदार पटेल की ही देन है। सरदार पटेल के जन्मदिन के अवसर पर मैं अपनी पुस्तक ‘राष्ट्रवादी व्यक्तित्व : वल्लभ भाई पटेल’ के कुछ अंश यहां दे रही हूं जो सन् 2015 में सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हुई थी।    
Charcha Plus a column of Dr Sharad Singh in Daily Sagar Dinkar Newspaper
         देश के प्रथम गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल की जयंती 31 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनकी 182 मीटर ऊंची प्रतिमा के अनावरण के साथ ही यह प्रतिमा ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ के नाम से दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा के रूप में जानी जाएगी। इसे अहमदाबाद से 200 किमी दूर सरदार सरोवर डैम के निकट स्थापित किया गया है। इस प्रोजेक्ट की घोषणा 2010 में की गई थी, जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे। तत्कालीन मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी ने अक्टूबर 2013 में इसकी आधारशिला रखी थी तथा इंजीनियरिंग कंपनी एल एंड टी को इसका कांट्रैक्ट दिया गया था। कुल 182 मीटर ऊंची इस प्रतिमा के निर्माण में 25,000 टन लोहे और 90,000 टन सीमेंट का इस्तेमाल किया गया। स्टैच्यू को 7 किमी दूर से देखा जा सकता है। उल्लेखनीय है कि राज्य की असेंबली सीट 182 के बराबर ही इसकी ऊंचाई 182 मीटर रखी गई है।  
सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के नाडियाड स्थित एक साधारण कृषक परिवार में हुआ था। कहा जाता है कि 31 अक्टूबर 1875 को जब वल्लभ भाई का जन्म हुआ तो गांव में अनेक शुभ समाचार प्राप्त हुए जिससे वल्लभ भाई के जन्म को शुभ मानते हुए प्रसन्नता की लहर दौड़ गई। वल्लभ भाई जन्म से ही आकर्षक छवि के थे। गांव के लोग उन्हें अपनी गोद में लकर दुलारना पसन्द करते थे। उस समय यह किसी को पता नहीं था कि यही बालक एक दिन आधुनिक भारत का निर्माता बनेगा। सरदार वल्लभ भाई पटेल के पिता का नाम झावेरभाई और माता का नाम लाडभाई था। उनके पिता पूर्व में करमसाड में रहते थे। करमसाड गांव के आस-पास दो उपजातियों क निवास था-लेवा और कहवा। इन दोनों उपजातियों की उत्पत्ति भगवान रामचन्द्र के पुत्रों लव और कुश से मानी जाती है। वल्लभ भाई पटेल का परिवार लव से उत्पन्न लेवा उपजाति का था जो पटेल उपनाम का प्रयोग करते थे। वल्लभ भाई के पिता मूलतः कृषक होते हुए भी एक कुशल योद्धा एवं शतरंज के श्रेष्ठ खिलाड़ी थे। स्वतंत्र भारत को सुव्यवस्थित, सुसंगठित एवं आधुनिक स्वरूप प्रदान करने वाले व्यक्तित्व सरदार वल्लभ भाई पटेल का जीवन स्वयं में एक आदर्श जीवन था। उन्होंने कभी भी समझौतावादी नहीं किया। वे स्पष्टवादी थे तथा ऐसे ही आचरण की अपेक्षा दूसरों से भी रखते थे। उनके विचारों में असीम दृढ़ता थी। वे जो कार्य एक बार स्वीकार कर लेते उसे हर हाल में सफलतापूर्वक पूरा करके ही विश्राम करते। उनका यह स्वरूप भारतीय रियासतों के विलय के समय प्रत्यक्षरूप से उभर कर सामने आया। वैसे बाल्यावस्था से ही यह दृढ़ता उनके भीतर मौजूद थी।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सबसे दुरूह दायित्व वल्लभ भाई की प्रतीक्षा कर रहा था। यह दायित्व था देशी रियासतों के एकीकरण का। यदि स्वतंत्रता प्राप्त हो जाने के बाद भी भारत पूर्व की भांति अनेक रियासतों में बंटा रहता तो उस स्वतंत्रता का कोई महत्व नहीं रहता। क्योंकि वे रियासतें स्वार्थ के वशीभूत देश की प्रगति में बाधाएं खड़ी करने का काम करतीं। किन्तु वल्लभ भाई किसी भी मूल्य पर स्वतंत्रता के महत्व को कम नहीं होने दे सकते थे। वल्लभ भाई ने ऐसा राजनीतिक दृढ़ता का चमत्कार कर दिखाया कि एक वर्ष के भीतर ही अधिकांश रियासतें स्वेच्छा से भारतीय संघ में विलीन होकर उसका एक उपयोगी अंग बन गईं। सरदार पटेल का नाम भारत की तत्कालीन 563 रियासतों के भारत में विलीनीकरण के कारण बहुत ही सम्मान से लिया जाता है। उनके ‘लौहपुरूष’ होने का प्रमाण उनके द्वारा रियासतों को भारतीय संघ में सम्मिलित करने के उनके महान कार्य में देखने को मिला।
भारत की स्वतंत्रता संग्राम में राजशाही का कोई विशेष योगदान नहीं था। बहुत से शासक केवल नाममात्र के शासक थे। छोटे-छोटे रजवाड़े अपने किलों में या दरबारों में अपनी प्रशंसा कराके ही खुश हो जाते थे। परंतु इसके उपरांत भी उनके भीतर यह इच्छा अवश्य थी कि स्वतंत्र भारत में संभवतः वह भी अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाये रख सकेंगे। इस प्रकार स्वतंत्र भारत में भी वे अपनी राजशाही का स्वप्न देख रहे थे। उनकी यह अभिलाषा उस समय और भी बलवती हो गयी जब अंग्रेजों ने भारतीय रियासतदारों को यह अधिकार दे दिया कि वह चाहें तो भारत के साथ जा सकते हैं, चाहें तो पाकिस्तान के साथ जा सकते हैं और यदि चाहें तो अपना स्वतंत्र अस्तित्व भी बनाए रख सकते हैं। वी.पी. मेनन द्वारा भारतीय इतिहास के इस चरण पर लिखे गए दो विशाल खण्डों में से पहली पुस्तक है ‘‘दि स्टोरी ऑफ इंटग्रेशन ऑफ दि इण्डियन स्टेट्स’’(1955)  और दूसरी पुस्तक (1957) का ष्शीर्षक है- ‘‘दि ट्रांसफर ऑफ पॉवर इन इण्डिया’’। पहली पुस्तक ‘‘दि स्टोरी ऑफ इंटग्रेशन ऑफ दि इण्डियन स्टेट्स’’ पुस्तक में उल्लेख है कि रियासती राज्यों के बारे में ब्रिटिश सरकार के इरादे एटली द्वारा जानबूझकर अस्पष्ट छोड़ दिए गए थे। माउंटबेटन से यह अपेक्षा थी कि वह रियासतों की ब्रिटिश भारत से उनके भविष्य के रिश्ते रखने में सही दृष्टिकोण अपनाने हेतु सहायता करेंगे। नए वायसराय को भी यह बता दिया गया था कि ‘‘जिन राज्यों में राजनीतिक प्रक्रिया धीमी थी, के शासकों को वे अधिक लोकतांत्रिक सरकार के किसी भी रुप हेतु तैयार करें।’’
माउन्टबेंटन ने इसका अर्थ यह लगाया कि वह प्रत्येक राजवाड़े पर दबाव बना सकें कि वह भारत या पाकिस्तान के साथ जाने हेतु अपनी जनता के बहुमत के अनुरुप निर्णय करें। उन्होंने सरदार पटेल की सहायता करना स्वीकार किया और 15 अगस्त से पहले ‘ए फुल बास्केट ऑफ ऐपल्स‘ देने का वायदा किया। इतिहास लेखिका ऑलेक्स फॉन टुलसेनमाल के अनुसार अधिकांश राज्य भारत के साथ मिलना चाहते थे। टुलसेनमाल ने लिखा है कि -”लेकिन सर्वाधिक महत्वपूर्ण राज्यों में से चार-हैदराबाद, कश्मीर, भोपाल और त्रावनकोर-स्वतंत्र राष्ट्र बनना चाहते थे। इनमें से प्रत्येक राज्य की अपनी अनोखी समस्याएं थीं। हैदराबाद का निजाम दुनिया में सर्वाधिक अमीर आदमी था तथा वह मुस्लिम था जबकि  उसकी प्रजा अधिकांश हिन्दू। उसकी रियासत बड़ी थी और ऐसी अफवाहें थीं कि फ्रांस व अमेरिका दोनों ही उसको मान्यता देने को तैयार थे। कश्मीर के महाराजा हिन्दू थे और उनकी प्रजा अधिकांशतः मुस्लिम थी। उनकी रियासत हैदराबाद से भी बड़ी थी परन्तु व्यापार मार्गों और औद्योगिक संभावनाओं के अभाव के चलते काफी सीमित थी। भोपाल के नवाब एक योग्य और महत्वाकांक्षी रजवाड़े थे और जिन्ना के सलाहकारों में से एक थे। उनके दुर्भाग्य से उनकी रियासत हिन्दूबहुल थी और वह भारत के एकदम बीचोंबीच थी, पाकिस्तान के साथ संभावित सीमा से 500मील से ज्यादा दूर।’’
इस समूचे प्रकरण में मुस्लिम लीग की रणनीति इस पर केंद्रित थी कि अधिक से अधिक रजवाड़े भारत में मिलने से इंकार कर दें। जिन्ना यह देखने के काफी इच्छुक थे कि नेहरू और पटेल को ”घुन लगा हुआ भारत मिले जो उनके घुन लगे पाकिस्तान” के साथ चल सके। लेकिन सरदार पटेल ने कठोरता से काम लेते हुए ऐसे सभी षडयंत्रों को विफल किया। सरदार वल्लभ भाई पटेल राजनीति जगत के वह स्तम्भ थे जिनका क़द किसी भी स्टेच्यू या किसी भी राजनीतिज्ञ से बहुत बड़ा है। भारत का एक राष्ट्र के रूप में जो एकीकृत स्वरूप है, वह सरदार पटेल की ही देन है।
              -------------------------
          ( सागर दिनकर, 30.10.2018)

#शरदसिंह #सागरदिनकर #दैनिक #मेराकॉलम     #Charcha_Plus #Sagar_Dinkar #Daily #SharadSingh #वल्लभ_भाई_पटेल #स्टेच्यू_ऑफ_यूनिटी #StatueOfUnity #VallabhBhai Patel #राष्ट्रवादी_व्यक्तित्व_वल्लभ_भाई_पटेल

Friday, August 31, 2018

चर्चा प्लस ... ‘इंडिया’ क्यों? सिर्फ़ ‘भारत’ क्यों नहीं ? - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh

चर्चा प्लस ...
‘इंडिया’ क्यों? सिर्फ़ ‘भारत’ क्यों नहीं ?
- डॉ. शरद सिंह

विदेशों में हम भारतीयों से जब हमारी नागरिकता पूछी जाती है तो हम गर्व से कहते हैं-‘आई एम इंडियन’। इसी बात को जब हिन्दी में कहने की बारी आती है तो ‘मैं इंडियन हूं’ कहने में गर्व का अनुभव करते हैं। गोया ‘भारतीय’ कहना कोई लज्जाजनक बात हो। इसका सबसे बड़ा कारण है हमारे देश के तीन नामों का होना। दुनिया का कोई भी देश ऐसा नहीं है जिसके तीन नाम एक साथ क्रियाशील हों। अब समय आ गया है कि इस विचित्र स्थिति से उबरते हुए देश का आधिकारिक रूप से एक नाम और वह भी मूल प्राचीन नाम ‘भारत’ मान्य कर दिया जाए।
‘इंडिया’ क्यों? सिर्फ़ ‘भारत’ क्यों नहीं ? - डॉ. शरद सिंह ... चर्चा प्लस .. Column of Dr (Miss) Sharad Singh in Sagar Dinkar News Paper

विश्व का सबसे बड़ा गणतंत्र का दर्ज़ा रखने वाला देश - भारत, हिन्दुस्तान या इंडिया। एक देश जिसके तीन नाम। आधिकारिक तौर पर दो नाम हैं-इंडिया और भारत। बार-बार इस बात की मांग उठती रही है कि देश का एक नाम रहे-‘भारत’। अभी कुछ अरसा पहले विश्वविख्यात जैन संत आचार्य विद्यासागर ने ‘इंडिया’ शब्द की व्याख्या करते हुए देश का नाम ‘भारत’ रखे जाने पर तार्किक पक्ष रखे हैं और ‘भारत बोलो’ मुहिम का आह्वान किया है।

भारत या इंडिया, क्या नाम है इस देश का? हिन्दुस्तान सिर्फ़ बोलचाल में है अथवा पुराने अभिलेखों में किन्तु ‘इंडिया’ और ‘भारत’ आज भी समान रूप से प्रयोग में लाया जा रहा है। सन् 2012 में लखनऊ की सामाजिक कार्यकर्ता उर्वशी शर्मा ने केंद्र सरकार से यह प्रश्न किया था। सूचना के अधिकार के अंतर्गत उर्वशी शर्मा ने पूछा था कि सरकारी तौर पर भारत का नाम क्या है? उन्होंने अपने प्रश्न पूछे जाने का कारण बताते हुए उल्लेख किया िा कि “इस बारे में हमारे बीच काफी असमंजस है। बच्चे पूछते हैं कि जापान का एक नाम है, चीन का एक नाम है लेकिन अपने देश के दो नाम क्यूं हैं।“ इसीलिए वे यह जानना चाहती हैं कि वे बच्चों को सही-सही उत्तर दे सकें और आने वाली पीढ़ी के बीच इस बारे में कोई संदेह न रहे। उर्वशी ने कहा कि “हमें सुबूत चाहिए कि किसने और कब इस देश का नाम भारत या इंडिया रखा? कब ये फैसला लिया गया?“

उर्वशी का तर्क था कि यह एक भ्रम की स्थिति है जो सरकारी स्तर पर भी देश के दो नामों का प्रयोग किया जाता है। इसी आधार पर उन्होंने कहा कि ‘‘मैं केवल ये जानना चाहती हूं कि भारत का सरकारी नाम भारत है या इंडिया क्योंकि सरकारी तौर पर भी दोनों नाम इस्तेमाल किए जाते हैं।“ उल्लेखनीय है कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना में लिखा है- ’इंडिया दैट इज़ भारत’। अर्थात् देश के दो नाम हैं। सरकारी कामकाज में ’गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया’ और ’भारत सरकार’ दोनों का प्रयोग किया जाता है। अंग्रेजी में भारत और इंडिया दोनों का इस्तेमाल किया जाता है जबकि हिंदी में भी इंडिया कहा जाता है. उर्वशी ने कहा था कि वे इस मुद्दे को गंभीरता से लेती हैं क्योंकि ये देश की पहचान का सवाल है।

उर्वशी को प्रधानमंत्री कार्यालय से जवाब मिला जिसमें कहा गया कि उनके आवेदन को गृह मंत्रालय के पास भेजा गया हैं। किन्तु गृह मंत्रालय में इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं था। इसलिए इसे संस्कृति विभाग और फिर वहां से राष्ट्रीय अभिलेखागार भेजा गया, जहां जानकारी की ढूंढ-खोज शुरू हुई। राष्ट्रीय अभिलेखागार 300 वर्षों के सरकारी दस्तावेज़ों का खज़ाना है। आज भी उर्वशी को अपने प्रश्न के उत्तर की प्रतीक्षा है।

देश के नामों को ले कर उच्चतम न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर करके मांग की जा चुकी है कि ‘इंडिया’ का नाम बदल कर भारत किया जाना चाहिए। याचिका में कहा गया था कि महाराजा परीक्षित, कुरु वंश के अंतिम दुर्जेय सम्राट की मृत्यु तक, पूरी दुनिया भारतवर्ष के रूप में जाना जाता था। इसके अलावा दुनिया के एक महान सम्राट का शासन था । भारत ऋग्वेद में उल्लेख किया है। इस पर उच्चतम न्यायालय ने केंद्र और राज्यों से जवाब मांगा। यह याचिका को महाराष्ट्र के सामाजिक कार्यकर्ता निरंजन भटवाल ने दायर की थी। मुख्य न्यायाधीश एच एल दत्तू और न्यायाधीश अरूण मिश्रा की पीठ ने सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को इस जनहित याचिका पर नोटिस भी जारी किया। इस याचिका में केंद्र को किसी सरकारी उद्देश्य के लिए और आधिकारिक पत्रों में इंडिया नाम का उपयोग करने से रोकने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता निरंजन भटवाल ने आग्रह किया कि न केवल सरकारी अपितु गैर सरकारी संगठनों और कॉरपोरेट्स को भी सभी आधिकारिक और अनाधिकारिक उद्देश्यों के लिए देश का नाम ‘भारत’ का उपयोग करने का निर्देश दिया जाना चाहिए। दुर्भाग्यवश लगभग छह माह बाद भी याचिकाकर्ता को कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिला।

भारत का इतिहास सदियों से काफी गौरवशाली रहा है। भारत का नाम प्राचीन वर्षों में ‘भारतवर्ष’ था। इसके पूर्व भारत नाम जम्बूदीप था। देश का नाम भारत होने के संबंध में एक सर्वमान्यकथा प्रचलित है कि कुरूवंशीय राजा दुष्यंत और शकुंतला के प्रतापी पुत्र भरत के नाम पर ही देश का नाम भारतवर्ष पड़ा। यद्यपि कई आधुनिक विद्वान इस कथा को प्रमाण के अभाव में खारिज़ करते हैं किन्तु पुराणों में ‘भारतवर्ष’ नाम का उल्लेख नकारा नहीं जा सकता है। ‘वायु पुराण’ में इस बात की पुष्टि होती है कि देश का नाम भारतवर्ष क्यों पड़ा। इस संदर्भ में ‘वायु पुराण’ का यह श्लोक ध्यान देने योग्य है जिसमें कहा गया है कि हिमालय पर्वत से दक्षिण का वर्ष अर्थात क्षेत्र भारतवर्ष है-

हिमालयं दक्षिणं वर्षं भरताय न्यवेदयत्।

तस्मात्तद्भारतं वर्ष तस्य नाम्ना बिदुर्बुधाः।

इंडिया नाम तो अंग्रेजों की गुलामी के साथ आयाजबकि पुराणों में भारत के प्राचीन नाम जम्बूद्वीप का भी उल्लेख मिलता है। जम्बूदीप का अर्थ है समग्र द्वीप। भारत के प्राचीन धर्म ग्रंथों में हर जगह जम्बूदीप का उल्लेख आता है। उस समय भू-भाग एक विस्तृत द्वीप था जिसे आगे चल कर भारतीय उपमहाद्वीप कहा गया। ‘वायु पुराण’ में ही दी गई एक अन्य कथा के अनुसार त्रेता युग में देश का नाम भारतवर्ष पड़ा। ‘वायु पुराण’ के अनुसार त्रेता युग के प्रारंभ में स्वंयभू मनु के पौत्र और प्रियव्रत के पुत्र ने भरत खंड को बसाया था। लेकिन राजा प्रियव्रत के कोई भी पुत्र नहीं था इसलिए उन्होंने अपनी पुत्री के पुत्र अग्नींध्र को गोद ले लिया था जिसका पुत्र नाभि था। नाभि की एक पत्नी मेरू देवी से जो पुत्र पैदा हुआ उसका नाम ऋषभ था और ऋषभ के पुत्र का नाम भरत था और भरत के नाम पर ही देश का नाम भारतवर्ष पड़ा था। उस वक्त राजा प्रियव्रत ने अपनी कन्या के दस पुत्रों में से सात पुत्रों को पूरी धरती के सातों महाद्वीपों का अलग-अलग राजा नियुक्त किया था। इस तरह राजा प्रियव्रत ने जम्बू द्वीप का शासक अग्नींध्र को बनाया था। इसके बाद राजा भरत ने जो अपना राज्य अपने पुत्र को दिया वही भारतवर्ष कहलाया। ‘वायु पुराण’ में यह कथा इस प्रकार है-

व्याख्या सप्तद्वीपपरिक्रान्तं जम्बूदीपं निबोधत। अग्नीध्रं ज्येष्ठदायादं कन्यापुत्रं महाबलम।। प्रियव्रतोअभ्यषिञ्चतं जम्बूद्वीपेश्वरं नृपम्।। तस्य पुत्रा बभूवुर्हि प्रजापतिसमौजसः। ज्येष्ठो नाभिरिति ख्यातस्तस्य किम्पुरूषोअनुजः।। नाभेर्हि सर्गं वक्ष्यामि हिमाह्व तन्निबोधत। (वायु 31-37, 38)

विचारणी है कि जब कम्बोडिया अपना नाम बदल कर मोलिक नाम कम्पूचिया कर सकता है, सिलोन अपने मौलिक नाम श्रीलंका को अपना सकता है तो इंडिया सिर्फ़ भारत क्यों नहीं हो सकता है। एक देश, एक नाम, एक पहचान - यह जरूरी है देश के वैश्विक गौरव के लिए।
-----------------------
( सागर दिनकर, 31.08.2018)