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Wednesday, September 9, 2026

चर्चा प्लस | ‘‘हिमालय है तो हम हैं’’- यही तो थीम है हिमालय दिवस की | डॉ सुश्री शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस 
9 सितंबर हिमालय दिवस पर विशेष:
‘‘हिमालय है तो हम हैं’’- यही तो थीम है हिमालय दिवस की
  - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह 
                                                                               कहा जाता है कि धरती पर एक पत्ता भी हिलता है तो नक्षत्रों तक उसका प्रभाव होता है, फिर हिमालय तो इसी पृथ्वी पर है और संकटों से घिरता जा रहा है। हिमालय पर गहराने वाले संकट हमारे अस्तित्व के लिए स्पष्ट चेतावनी हैं। हाल ही में नेपाल में आई बाढ़ इसका ताज़ा उदाहरण है। कभी भूस्खलन तो कभी ग्लेशियर्स के पिघलने से आने वाली बाढ़ हमें निरंतर चेतावनी दे रही है। हिमालय के संरक्षण के प्रति जागरूकता लाने के लिए ही मनाया जाता है ‘‘हिमालय दिवस’’। इसकी इस बार की थीम है-‘‘हिमालय है तो हम हैं’’। इस थीम की गहराई में उतरना जरूरी है।   

युग-युग से है अपने पथ पर,

देखो कैसा खड़ा हिमालय
डिगता कभी न अपने प्रण से
रहता प्रण पर अड़ा हिमालय
जो-जो भी बाधाएं आएं,
उन सबसे ही लड़े हिमालय
इसलिए तो दुनिया भर में,
हुआ सभी से बड़ा हिमालय

- कवि सोहनलाल द्विवेदी की ‘‘हिमालय’’ शीर्षक कविता की ये पंक्तियां हिमालय पर्वत की विशालता, अडिगता एवं उपादेयता का सम्मानजनक वर्णन करती है। मात्र काव्यात्मक नहीं बल्कि भौगोलिक रूप से हिमालय हमारे देश के लिए गहन पर्यावरणीय महत्व रखता है। हम भारतवासियों को ही नहीं अपितु समूची दुनिया को इसकी उच्चता और विशालता पर गर्व रहा है। हिमालय की उच्चतम चोटी तक पहुंचने की चुनौती ने हमेशा पर्वतारोहियों को आकर्षित किया है। आज हमारा यही हिमालय जलवायु परिर्वतन के संकट से जूझ रहा है। पृथ्वी के बढ़ते हुए तापमान ने जिस प्रकार दुनिया के सभी तत्वों को प्रभावित करना शुरू कर दिया है, उसी प्रकार हिमालय के ग्लेशियर्स भी उस तापमान के कारण अपनी स्थिरता को अपेक्षाकृत तेजी से खो रहे हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार अभी हाल ही में नेपाल में आई भूस्खलन वाली बाढ़ का मूल कारण ग्लेशियर्स का तेजी से पिघलना ही था। हिमालय पर जमी बर्फ हवाओं के मापमान को नियंत्रित कर के ऋतुओं में परिवर्तन लाती है। इस बर्फ का असमय पिघलने लगना ऋतुओं के पैटर्न को भी प्रभावित करने लगा है।
हिमालय दिवस प्रतिवर्ष 9 सितंबर को मनाया जाता है। इस दिवस की पहली बार आधिकारिक घोषणा उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत द्वारा सन 2014 में की गई थी। यह दिवस घोषित करने का उद्देश्य था हिमालय के पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण के बारे में जागरूकता बढ़ाना। इसके पीछे कारण था सन 2010 की अचानक आई बाढ़ और 2013 की केदारनाथ त्रासदी जैसी भीषण प्राकृतिक आपदा। इनके बाद पहाड़ों की बढ़ती पारिस्थितिक संकट के प्रति सभी का ध्यान आकर्षित करने तथा जागरूकता लाने के लिए ‘‘हिमालय दिवस’’ घोषित किया गया।

हिमलय प्राचीनतम भू-संरचनाओं में से एक है। इस विशाल पर्वत श्रृंखला का निर्माण लगभग 40 से 50 मिलियन वर्ष पहले शुरू हुआ था, जब टेक्टानिक प्लेटों की गति के कारण दो बड़े भू-भाग, भारतीय भूभाग और यूरेशिया, आपस में टकरा गए थे और हिमालय का उदय हुआ था। प्राचीन भारतीय ग्रंथों में हिमालय का उल्लेख मिलता है। शिवपुराण में हिमालय को जहां शिवस्थली कहा गया है वहीं उसे देवी पार्वती के के पिता के रूप में भी वर्णित किया गया है। भारतीय संस्कृति में हिमालय सदा ही पूज्य रहा है। किन्तु मानवीय लालच एवं लापरवाहियों के कारण हिमालय संकट के कगार पर आ पहुंचा है। इसीलिए इस वर्ष के लिए थीम रखी गई है-‘‘हिमालय है तो हम हैं’’। यह थीम संकट की गंभीरता को दर्शाती है।

हिमालय उपमहाद्वीप के लिए एक प्राकृतिक जलवायु अवरोधक के रूप में कार्य करता है और मौसम के पैटर्न को नियंत्रित करता है। इन पहाड़ों में अद्वितीय वनस्पतियां, जीव-जंतु और प्रमुख नदी प्रणालियां मौजूद हैं जो लाखों लोगों की आजीविका का सहारा हैं। इन सभी पर संकट का अर्थ है हिमालय पर संकट। इसीलिए हिमालय दिवस पर आयोजित होने वाले कार्यक्रम हिमालय के पर्वतीय क्षेत्रों में खराब शहरी नियोजन, वनों की कटाई, प्लास्टिक प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ते भूस्खलन जैसी समस्याओं से निपटने पर केंद्रित रहते हैं।
हिमलय पर गहराते जलवायु संकट से निपटने के लिए ठोस योजनाएं बनाई गई हैं जिनका सही क्रियान्वयन हिमालय के अस्तित्व को बचाए रख सकता है। दशकों से भारतीय हिमालयी क्षेत्र में विकास ने पहाड़ों को बाधाओं के रूप में या मानकीकृत किए जाने वाले भूदृश्यों के रूप में माना है। लेकिन हिमालय न तो एकसमान है और न ही सुगम है। इसकी भौगोलिक विविधता एवं महत्ता को ध्यान में रखते हुए ‘‘विश्व पृथ्वी दिवस 2026’’ को एक श्वेत पत्र जारी किया गया था जिसमें कहा गया था कि हिमालय में संकट केवल पर्यावरणीय ही नहीं बल्कि व्यवस्थागत भी है। जलवायु परिवर्तन के पैटर्न में बदलाव, जल प्रणालियों की अनिश्चितता और शासन व्यवस्था के खंडित रहने के कारण यह क्षेत्र एक नाजुक मोड़ पर खड़ा है। रिपोर्ट में अधिक डेटा या तीव्र विस्तार की मांग नहीं की गई है, बल्कि पहाड़ों के साथ हमारे सोचने, योजना बनाने और निर्माण करने के तरीके में मौलिक बदलाव की बात कही गई। ‘‘हिमालय का भविष्य: विकास और लचीलेपन पर पुनर्विचार’’ शीर्षक वाली यह रिपोर्ट, सीपी कुकरेजा फाउंडेशन फॉर डिजाइन एक्सीलेंस द्वारा भारतीय हिमालयी क्षेत्र में व्याप्त व्यवस्थागत संकटों के समाधान हेतु प्रस्तुत की गई थी। इंजीनियरिंग, पारिस्थितिकी, शासन और सामाजिक विज्ञान के विशेषज्ञों की भागीदारी वाली हिमालयी गोलमेज सम्मेलन से प्राप्त अंतर्दृष्टियों पर आधारित इस रिपोर्ट में यह स्पष्ट शब्दों में कहा गया था कि हिमालय क्षेत्र एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है जहां पारंपरिक विकास मॉडल अब व्यवहारिक नहीं रह गए हैं।
इस श्वेत पत्र में हिमालयी क्षेत्र के महत्व पर बल दिया गया। इस ओर भी ध्यान दिलाया गया कि हिमालय वैश्विक आबादी के लगभग एक चैथाई हिस्से, यानी लगभग दो अरब लोगों को सीधे तौर पर प्रभावित करता है, जो जल, खाद्य सुरक्षा और पारिस्थितिक संतुलन के लिए इस क्षेत्र पर निर्भर हैं। इसमें क्षेत्र में विकास और लचीलेपन के पुनर्मूल्यांकन की तत्काल आवश्यकता पर प्रकाश डाला गया है। विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ तर्क देते हैं कि वर्तमान अवसंरचना और शहरी विकास अक्सर पारिस्थितिक सीमाओं और भूवैज्ञानिक अस्थिरता की अनदेखी की गई है। इस रिपोर्ट में जलवायु परिवर्तन, बदलते जलवैज्ञानिक पैटर्न और खंडित शासन व्यवस्था के कारण उत्पन्न व्यवस्थागत विफलताओं और बढ़ते आपदा जोखिमों पर विस्तार से प्रकाश डाला गया। एक सतत भविष्य सुनिश्चित करने के लिए, इसमें एकीकृत, डेटा-आधारित नियोजन की ओर संक्रमण का प्रस्ताव रखा गया, जो जलक्षेत्र की सीमाओं का सम्मान करता है और स्थानीय सांस्कृतिक ज्ञान को समाहित करता है। यह मानकीकृत इंजीनियरिंग से हटकर संदर्भ-विशिष्ट डिज़ाइन की ओर बढ़ने का आह्वान करता है जिसमें दीर्घकालिक पर्यावरणीय स्थिरता को प्राथमिकता दी गई है।
रिपोर्ट का मूल सिद्धांत यह है कि हिमालय को अलग-थलग पारिस्थितिक या इंजीनियरिंग समस्याओं के समूह के बजाय एक परस्पर जुड़ी प्रणाली के रूप में समझा जाना चाहिए। वैज्ञानिकों ने इस ओर ध्यान दिलाया कि यद्यपि क्षेत्र के भूविज्ञान और जलविज्ञान के ज्ञान में विस्तार हुआ है, फिर भी जमीनी स्तर पर परिणाम असंगत और अक्सर विनाशकारी हुए हैं। 2013 और 2023 के बीच हुई गंभीर घटनाओं, जैसे कि केदारनाथ बाढ़, चमोली आपदा और जोशीमठ का धंसना, को असामान्य ही घटना नहीं, बल्कि मानवीय हस्तक्षेप और भू-दृश्य की अंतर्निहित संवेदनशीलता के बीच संरचनात्मक असंतुलन के अनुमानित परिणामों के रूप में देखा गया है। जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा और बाढ़ के पूर्व पैटर्न अब भविष्य की स्थितियों का पूर्वानुमान नहीं लगा सकते। 1950 के दशक से वर्षा की तीव्रता में लगभग 15 से 20 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, और कम समय में भारी वर्षा होना अब आम बात हो गई है।
हिमालय की भौगोलिक संरचना में परिवर्तन उसके साथ की जा रही छेड़छाड़ है। हिमालय में 70 प्रतिशत से अधिक सड़कें पहाडियों को काटकर बनाई जाती हैं, जिनमें ढलान को स्थिर करने के लिए उचित उपाय नहीं किए जाते। ढलान गिरने की कई घटनाएं पानी के कारण होती हैं। जब निर्माण कार्य प्राकृतिक जल निकासी को अवरुद्ध कर देता है, तो पानी जमा हो जाता है, मिट्टी में दबाव बढ़ जाता है और भूस्खलन हो जाता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि पर्वतीय क्षेत्रों में, जल प्रवाह का प्रबंधन संरचना से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।

पर्वतीय क्षेत्र में वन एक आवश्यक प्राकृतिक संरचना के रूप में कार्य करते हैं और भूस्खलन के खतरे को 30 से 40 प्रतिशत तक कम कर सकते हैं। यद्यपि जनसंख्या के बदलते पैटर्न इन भू-भागों पर असमान दबाव डाल रहे हैं। लोग उच्च ऊंचाई वाले क्षेत्रों से दूर जा रहे हैं, जबकि निचले इलाकों में स्थित शहर अधिक भीड़-भाड़ वाले होते जा रहे हैं।

पर्यटन को भी हिमालय के पर्यावरण को क्षति पहुंचाने वाला कारण माना गया है। शिमला और मनाली जैसे स्थानों में मौसमी जनसंख्या वृद्धि वहां की स्थायी जनसंख्या से पांच से दस गुना अधिक होती है। इससे अपशिष्ट उत्पादन स्थानीय प्रणालियों की क्षमता से दो से तीन गुना अधिक हो जाता है। रिपोर्ट में दबाव कम करने और अधिक संतुलित आर्थिक अवसर पैदा करने के लिए पर्यटन को विभिन्न क्षेत्रों में फैलाने का सुझाव दिया गया है।
हिमालय भारतीय उपमहाद्वीप की जलवायु और करोड़ों लोगों को जीवनदायिनी जल संसाधन प्रदान करता है। हिमालय को ‘‘एशिया का जल स्तंभ’’ कहा जाता है। यह भारत की जलवायु और पर्यावरण को प्रभावित करने वाली सबसे महत्वपूर्ण भौगोलिक विशेषताओं में से एक है। उत्तरी भारत और पड़ोसी देशों में फैली यह विशाल पर्वत श्रृंखला मौसम के पैटर्न को नियंत्रित करने, नदी प्रणालियों को बनाए रखने, कृषि को सहारा देने और जैव विविधता को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। हिमालय का महत्व केवल इसके मनमोहक दृश्यों तक ही सीमित नहीं है। यह क्षेत्र मीठे पानी की आपूर्ति, पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने और कृषि उत्पादकता को बढ़ावा देकर लाखों लोगों के जीवन को प्रभावित करता है। यह क्षेत्र जैविक और आनुवंशिक विविधता का समृद्ध भंडार भी है, जो इसे वैज्ञानिक अनुसंधान और जैव प्रौद्योगिकी के लिए अत्यंत मूल्यवान बनाता है। यद्यपि जलवायु परिवर्तन और मानवीय गतिविधियों के कारण हिमालय लगातार पर्यावरणीय दबावों का सामना कर रहा है। बढ़ते तापमान, ग्लेशियरों का पिघलना, पर्यावासों का क्षरण और चरम मौसम की घटनाएं इस नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र को बदल रही हैं। भारत में पर्यावरणीय स्थिरता और जलवायु परिवर्तन से निपटने की क्षमता सुनिश्चित करने के लिए हिमालय की भूमिका और उसके सामने आने वाली चुनौतियों को इस बार हिमालय दिवस पर समझना अत्यंत आवश्यक है।
एवरेस्ट विजेता सर एडमंड हिलेरी ने कहा था-‘‘हिमालय मैंने जैसे तुम्हें देखा है, तुम सदा वैसे ही रहना।’’        
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(दैनिक, सागर दिनकर में 09.09.2026 को प्रकाशित) 
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Wednesday, September 2, 2026

चर्चा प्लस | कृति सेनन के ब्रालेट से ज्यादा चिंता करिए प्राकृतिक चेतावनी की | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  

कृति सेनन के ब्रालेट से ज्यादा चिंता करिए प्राकृतिक चेतावनी की
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह 


        एक कामर्शियल विज्ञापन में अभिनेत्री कृति सेनन के ब्रालेट पहनने पर पक्ष और विपक्ष में जितनी तलवारें खिंची यदि उसकी आधी भी बहस प्राकृति संकट को ले कर होती तो नेपाल जैसी विभीषिका से बचा जा सकता था। हम इंसानों के द्वारा प्रकृति के असंतुलित दोहन से स्थितियां दिन पर दिन बदतर हो रही हैं। जोशी मठ हासदे से ले कर हाल ही में नेपाल में आई कीचड़ की बाढ़ ने जता दिया कि प्रकृति नाराज़ है और वह बार-बार चेतावनी दे रही है किन्तु हमारी वर्तमान राष्ट््रीय चिंता तो एक विज्ञापन में पहना गया ब्रालेट है। विज्ञापन को नकारने के बजाए उसे पूरी पब्लीसिटी देना गोया राष्ट््रीय कर्तव्य है। क्या 903 लोगों की मौतें और चार हजार से अधिक लोगों का लापता हो जाना मामूली बात है? जबकि अभी संकट की दस्तक मात्र है।         

ज़लज़ला आया और आ के हो गया रुख़सत मगर
वक़्त  के रुख़  पे  तबाही की इबारत लिख गया।
     - शायर फ़राज़ हामिदी का यह शेर जोशीमठ से नेपाल तक की आपदा की पीड़ा को बाखूबी बयां करता है।
       मुझे याद आ रही है एक कहानी जो मैंने प्रायमरी स्कूल के दौरान पढ़ी थी। सिलेबस में या सिलेबस के बाहर, यह याद नहीं है। बहुत सोचा लेकिन उस कहानी के लेखक का नाम याद नहीं आ रहा है। सो, यदि किसी को लेखक का नाम पता हो तो मुझे जरूर बताने का कष्ट करे। उस कहानी का कथानक और शिल्प इतना प्रभावी था कि कहानी आज भी मुझे याद है। यह कहानी सन् 1935 में क्वेटा में आए भीषण भूकंप की चर्चा पर आधारित थी। क्वेटा पहले भारत का हिस्सा था लेकिन अब पाकिस्तान में है और बलूचिस्तान प्रांत की राजधानी है। कहानी का सारांश यह था कि कपड़ा बेचने वाला एक दूकानदार अपने दूकान में दूकानदारी कर रहा है। वह ग्राहकों को कपड़ा दिखाता है और उनसे क्वेटा में हुई जान-माल की हानि के बारे में प्रश्न करता जाता है। वह एक प्रश्न करता है कि कैसा कपड़ा चाहिए? तो उसका दूसरा प्रश्न होता है कि क्वेटा में कितने लोग मारे गए? फिर वह कपड़े की खूबियां बताता है और साथ में पूछता है कि वहां तो सब कुछ बर्बाद हो गया होगा? इसी प्रकार पह कपड़ा बेचते हुए वह अपने ग्राहकों से क्वेटा में आए भूकंप की भीषणता की चर्चा करता है, जानकारी लेता है और अपनी चिंता व्यक्त करता है। भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदा और मानवीय जीवन संबंधी विवशताओं के समीकरण पर यह अद्भुत कहानी थी। लेकिन आज स्थिति इससे दुखद हो गई है। आज भूकंप के खतरे बढ़ गए हैं लेकिन हमारे सरोकार प्रकृति को ले कर वर्तमानजीवी हो गए हैं। आज बाढ़ें भयावह रूप लेती जा रही हैं। लेकिन इस बारे में चिंता करने के बजाय कृति सेनन के ब्रालेट की चिंता में समय खपाना जागरूकता की निशानी बन गया है। एक पक्ष इसे भारतीय संस्कृति की तौहीन बता रहा है तो दूसरा पक्ष इसे स्त्री की आजादी से जोड़ कर इसकी पैरवी कर रहा है। सोशल मीडिया कृति सेनन और कंगना रनौत की कम और पूरे कपड़ों के साथ टांके गए पोस्टों से भारा पड़ा है। इक्का-दुक्का पोस्ट नेपाल के हादसे पर भी दिख जाती है गोया कुछ लोग स्वयं को जागरूक दिखाना चाहते हैं। अन्यथा इस तरह की आपदा की जड़ तक पहुंचने में भला किसको दिलचस्पी है? 
6 फरवरी 2023 को जब टर्की में विनाशकारी भूकंप आया था तब मुझे एक आश्चर्यजनक व्यवहार का सामना करना पड़ा था। भूकंप की खबर पढ़ने के बाद जब मैंने अपने परिचित से चर्चा की कि टर्की में कितना विनाशकारी भूकंप आया है तो पहले तो उन्होंने अनभिज्ञता प्रकट की जब कि भूकंप की ख़बरों से टीवी और मोबाईल अपडेट भरे हुए थे। फिर भी उन्हें पता नहीं था। खैर, मैंने उन्हें बताया कि भूकंप की तीव्रता 7.8 रिक्टर स्केल थी। लेकिन उन्होंने मेरी बात को अनसुना करते हुए पूछा कि टर्की तो मुस्लिम देश है न? मैं उनका प्रश्न सुन कर अवाक रह गई थी। भूकंप में मरने वाले मनुष्य थे, हिन्दू या मुस्लिम तो बाद की बात है। इसके बाद मुझे समझ में नहीं आया था कि मैं उस उच्च शिक्षित (?) व्यक्ति से टर्की के भूकंप के बारे में आगे क्या बात करूं? फिर भी मैंने खुद को तसल्ली दी और चर्चा को भूकंप पर केन्द्रित किया। तो इस पर वे लापरवाही से बोले कि हां, अभी महाराष्ट्र में भूकंप आया था लेकिन अपने यहां सागर में कोई ख़तरा नहीं है। मैंने पूछा था कि आप इतने दावे से कैसे कह सकते हैं कि यहां कभी भूकंप नहीं आएगा? तो उन्होंने उत्तर दिया कि यहां न तो कोई बड़ी नदी है और कोई बड़े पहाड़। उनके इस ज्ञान ने मुझे उन्हें याद दिलाने को मजबूर कर दिया कि हम जिस ठोस जमीन पर रह रहे हैं वह टेक्टोनिक प्लेट्स पर टिकी हुई है और ये प्लेट्स भू-केन्द्र के तरल पदार्थ पर तैर रही हैं। फिर मैंने उन्हें याद दिलाया कि जब-जब जबलपुर में भूकंप के झटके आए हैं तब-तब उसकी तरंगे हमारे सागर शहर की भूमि को भी मामूली स्तर पर हिला चुकी हैं।
भूकंप के जिस ज्ञान को हम अपनी छोटी कक्षाओं में अर्जित कर चुके हैं उन्हें बड़े हो कर कैसे भूलते जा रहे हैं? यह सोच कर आश्चर्य होता है। आज हमें सोने (गोल्ड) के भाव के उतार-चढ़ाव की चिंता रहती है लेकिन प्रकृति को अपने द्वारा पहुंचाए जा रहे नुकसान की चिंता नहीं रहती है। जबकि सोना हमें सुख दे सकता है पर जीवन नहीं। राजा मिडास की कहानी ने यही तो समझाया था हमें। जिसने राजा मिडास की कहानी सुनी होगी उसे याद होगा कि राजा मिडास ने भगवान से वरदान मांगा कि वह जिस चीज को छुए वह सोने की हो जाए। मिडास ने अपना महल, सिंहासन, पेड़-पौधे अब को छू-छू कर सोने का बना लिया। यहां तक कि जब उसने अपनी पत्नी, अपनी बेटी को छुआ तो वे भी सोने की मूर्ति में बदल गईं। फिर उसे जब भूख लगी और वह खाने बैठा तो हाथ लगाते ही भोजन सोने में बदल गया। पानी भी सोने में बदल गया। जब भूख-प्यास से प्राण निकलने की नौबत आ गई तब कहीं जा कर राजा मिडास को अपनी भूल का अहसास हुआ। लेकिन तब तक पहुत देर हो चुकी थी। जाने-अनजाने हम भी राजा मिडास की तरह प्रकृति को भूल कर लालच की ओर तेजी से बढ़ते जा रहे हैं। स्थिति यह है कि हम जिस डाल पर बैठे हैं उसी को जड़ से काटते जा रहे हैं। भूकंप की बढ़ती संख्या और बढ़ती तीव्रता उसी का दुष्परिणाम है जो हमने प्रकृति को क्षति पहुंचाई है। हमने पेड़ काटे, जंगल छोटे कर दिए, भूमि से उसकी नमी सोख ली, भूमि पर मिट्टी का ठहराव घटा दिया। बड़े-बड़े बांध बना कर स्थिर और ठोस जमीन को लहरों वाले तरल पानी से भर दिया। गगनचुंबी इमारतों के जंगल खड़े कर दिए, यह ठीक से जांचे बिना कि वहां की भूमिगत चट्टानें उन इमारतों का बोझ उठा सकती हैं या नहीं? नए सरकारी नियम हैं कि भूकंप सुरक्षित भवन बनाए जाएं लेकिन सच्चाई किसी से छिपी नहीं है कि इसका पूरी तरह से पालन बहुत कम होता है। जैसे नियम बनाया गया था कि नए भवनों पर रूफ वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम बनाया जाए लेकिन गोया हम मान कर चलते हैं कि नियम बस्तों में बंधे रहने के लिए होते हैं। टर्की तो एक विकसित देश है। वहां आधुनिक संसाधन अपनाए जाते हैं। फिर भी वहां की मल्टीस्टोरी इमारतें भूकंप की 7.8 की तीव्रता नहीं झेल सकीं थीं। तो हमारा क्या होगा जब हमें इस तीव्रता का भूकंप झेलना पड़ेगा?
तुर्की और सीरिया में आए विनाशकारी भूकंप से दोनों देशों के कई शहरों में भारी तबाही हुई थी। रिक्टर पैमाने पर भूकंप की तीव्रता 7.8 मापी गई और इससे हजारों लोगों के मारे गए थे। तुर्की दुनिया के सबसे सक्रिय भूकंप क्षेत्रों में से एक है। भारत की स्थिति भी उससे अलग नहीं है। चाहे भारत हो या नेपाल हो बड़े बांधों से पैदा होने वाले संकट को अनदेखा करना, ग्लेशियर्स के तेजी से पिघलने को अनदेखा करना ही हमें विनाश का आईना दिखा देगा। नेपाल में आया ‘‘मड फ्लड’’ अर्थात कीचड़ की बाढ़ के पीछे असली कारण ग्लेशियर्स पिघलने से अचानक जलस्तर बढ़ना था। ग्लेशिर्यस क्यों तेजी से पिघल रहे हैं? क्योंकि पृथ्वी का तापमान निरंतर बढ़ रहा है, क्योंकि इससे मौसम के पैटर्न में तेजी से बदलाव हो रहा है। दुख की बात ये है कि यह सब हमारे संज्ञान में है, फिर भी प्रकृति को चोट पहुंचाने से हम बाज नहीं आ रहे हैं। 
मां पहले प्यार से समझाती है। फिर भी बच्चा तोड़-फोड़ करने को उतारू रहता है तो मां विवश हो कर उस पर हाथ उठाती है ताकि वह सुधर जाए। भूकंप के रूप में धरती माता हमें बार-बार चेतावनी दे रही है कि विकास के नाम पर प्रकृति से खिलवाड़ करना बंद करो। लेकिन हम उनकी चेतावनी को लगातार अनसुना कर रहे हैं। अक्टूबर 2021 में उत्तराखंड के जोशीमठ शहर के कुछ घरों में पहली बार दरारें दिखाई दीं। एक साल बाद, 11 जनवरी तक, शहर के सभी नौ वार्डों में 723 घरों के फर्श, छत और दीवारों में बड़ी या छोटी दरारें दिखने लगीं। कई घरों में पोल उखड़ गए। जवाब में, शहर के भीतर कई परिवारों को अस्थायी रूप से सुरक्षित स्थानों पर ले जाया गया है। लेकिन बेहतर होता कि आपदा की आहटें पहले ही सुन ली गई होतीं।
वैज्ञानिकों ने हमेशा इस ओर ध्यान दिलाया और चेतावनी भी दी। प्रसिद्ध स्विस भूविज्ञानी अर्नोल्ड हेम और उनके सहयोगी ऑगस्टो गैस्टर ने 1936 में मध्य हिमालय की भूवैज्ञानिक संरचना पर पहला अभियान चलाया, तो उन्होंने अपना यात्रा वृतांत ‘‘द थ्रोन ऑफ द गॉड्स (1938)’’ और शोध कार्य ‘‘सेंट्रल हिमालय: जियोलॉजिकल द ऑब्जर्वेशन’’ रिकॉर्ड किया। स्विस अभियान 1936 (1939) ने विवर्तनिक दरारों, मुख्य केंद्रीय दोष (एमटीसी) की उपस्थिति की पहचान की, और चमोली गढ़वाल में हेलंग से तपोवन तक के क्षेत्र को भूगर्भीय रूप से संवेदनशील बताया। मध्य हिमालय के भूविज्ञान पर अनुसंधान और अध्ययन आगे बढ़े इसके बाद 1976 में ‘‘मिश्रा समिति’’ ने भी अध्ययन कर जोशीमठ को संवेदनशील घोषित कर इलाज के सुझाव दिए। सन 2022 में उत्तराखंड सरकार के आपदा प्रबंधन विभाग ने भी जोशीमठ पर मंडरा रहे खतरे की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित किया था। इन तमाम चेतावनियों के बाद भी जोशीमठ को बचाने की कोशिश नहीं की गई, बल्कि वहां बड़ी-बड़ी इमारतों का जंगल उगता चला गया। बढ़ती जनसंख्या के कारण जोशीमठ के गर्भ में उतरता रहा। आज जोशीमठ उसी दलदल पर असहनीय बोझ तले दबकर अलकनन्दा की ओर सरक रहा है।
6 फरवरी को टर्की में आए भूकंप में भी लगभग यही बात सामने आई थी कि वैज्ञानिकों ने पहले ही चेतावनी दी थी। बल्कि नीदरलैंड के शोधकर्ता वैज्ञानिक फ्रेंक होगरबीट्स ने 3 फरवरी 2023 को एक ट्वीट कर के लिखा था कि निकट भविष्य में, दक्षिण-मध्य तुर्की, जॉर्डन, सीरिया, लेबनान में 7.5 तीव्रता का भूकंप आएगा। अपने ट्वीट के साथ उन्होंने भूकंप का केंद्र दिखाते हुए एक नक्शा भी शेयर किया था। उनकी बात सही निकली। बल्कि उनकी चेतावनी से दशमलव तीन प्रतिशत अधिक का यानी 7.8 तीव्रता का भूकंप आया। 
यदि बात करें भारत की तो सितंबर 2019 में, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनएमडीए) ने एक भूकंप आपदा जोखिम सूचकांक (एड्री) रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसमें महानगरों और भूकंपीय क्षेत्र जोन चार और जोन पांच के शहरों सहित 50 शहरों पर विशेष रूप से ध्यान दिया गया था। सर्वेक्षण किए गए शहरों में से 30 शहर (दिल्ली सहित) मध्यम स्तर के जोखिम पर हैं और 13 (शिमला सहित अधिकतर हिमालयी शहर) उच्च जोखिम पर हैं। लेकिन साथ में यह भी कहा गया कि दिल्ली को भी एक बड़े जोखिम का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि अधिकांश शहर स्व-निर्मित है। बिना तकनीकी इनपुट के जो इसे उच्च तीव्रता वाले भूकंपों के प्रति संवेदनशील बनाता है।


नेपाल की ओर से बह कर आने वाली नदियां हों या चीन से उतरने वालीं, भारत के लिए संकट पैदा करने में सक्षम है। नेपाल आपदा के बाद यह आशंका जताई भी गई थी कि कहीं चीने को अपने दो बंाधों ये यदि बंधान खोले तो और अधिक भयावह स्थिति का सामना करना पड़ेगा। इस गंभीर समाचार पर कितने लोगों ने ध्यान दिया? शायद गिनती के लोगों ने। अधिकांश का सरोकार तो ब्रालेट पहनी अभिनेत्री के विज्ञापन से था। उन्हें संस्कृति की चिंता थी जिसे उस विज्ञापन को अनदेखा कर के, उसे अप्रभावकारी साबित कर के भी संस्कृति के पक्ष में खड़ा हुआ जा सकता था। जबकि कोई भी संस्कृति तभी तक है जब तक उस संस्कृति के लोग सुरक्षित हैं और जीवित हैं। अतः पहली और प्रखर चिंता होनी चाहिए थी प्राकृतिक आपदा की, बालेट की नहीं। 
दरअसल हमने प्रकृति को निरंतर नुकसान पहुंचा कर उसे अशांत कर दिया है। हम भूगर्भीय हलचलों को रोक नहीं सकते, लेकिन ग्लेशिर्य के पिघलने की गति को कम कर सकते हैं। इस तरह प्रकृति को संरक्षित कर के नुकसान की तीव्रता को कम कर सकते हैं। बशर्तें हम समय रहते सचेत हो जाएं और प्रकृति द्वारा दी जा रही चेतावनियों पर ध्यान देना शुरू कर दें। यदि हमें किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा से बचना है तो हमें प्रकृति-मित्र बनना होगा। प्रकृति की चिंता करनी होगी।                                                        -----------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 02.09.2026 को प्रकाशित) 
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Wednesday, August 26, 2026

चर्चा प्लस | साहित्य में इतिहास को पिरोने में माहिर थे आचार्य चतुरसेन शास्त्री | सागर दिनकर


चर्चा प्लस
26 अगस्त, जन्मदिवस विशेष:

साहित्य में इतिहास को पिरोने में माहिर थे आचार्य चतुरसेन शास्त्री
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह 
      
‘‘वैशाली की नगर वधू’’ जैसा ऐतिहासिक उपन्यास लिखने वाले आचार्य चतुरसेन शास्त्री का नाम हिन्दी साहित्य के इतिहास में सुनहरे अक्षरों से दर्ज़ है किन्तु हिन्दी से दूर होती नवोदित पीढ़ी उनके नाम का भी स्मरण नहीं रख पा रही है। आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने उपन्यासों के अलावा उन्होंने विपुल मात्रा में कहानियाँ भी लिखी हैं, साथ ही गद्य-काव्य के अतिरिक्त धर्म, राजनीति, इतिहास, समाजशास्त्र, स्वास्थ्य और चिकित्सा जैसे विषयों पर महत्वपूर्ण लेखन किया। इसके साथ ही नाटक, एकांकी, आत्मकथा जैसी विधाओं में भी कलम चलाई। 26 अगस्त 1891 को जन्में आचार्य चतुरसेन शास्त्री के साहित्यिक योगदान को सदा याद रखा जाना चाहिए तभी हिन्दी साहित्य की वास्तविक वैचारिक समृद्धि से परिचित हो सकेंगे। 
 


आचार्य चतुरसेन शास्त्री का जन्म 26 अगस्त 1891 को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के चाँदोख ग्राम में हुआ था। बचपन में उनका नाम चतुर्भुज रखा गया। उनके पिता का नाम केवलराम वर्मा और माता का नाम नन्हीं देवी था। उनके पिता चाहते थे कि पुत्र चतुरसेन चिकित्सा के क्षेत्र में नाम कमाएं। सिंकदराबाद से आरंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद चतुरसेन शास्त्री ने जयपुर के संस्कृत कॉलेज से आयुर्वेद में आचार्य और संस्कृत में शास्त्री की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने अपने कार्य जीवन का आरंभ एक आयुर्वेदिक चिकित्सक के रूप में किया था और कुछ समय एक धर्मार्थ औषधालय में 25 रुपए मासिक वेतन पर नौकरी भी की। बाद में उनकी नियुक्ति डी.ए.वी कॉलेज, लाहौर में आयुर्वेद के प्राध्यापक के रूप में हो गई, लेकिन प्रबंधन से उनकी बन नहीं सकी और उन्होंने कुछ वर्षों बाद ही त्यागपत्र दे दिया। अब वह अजमेर चले गए जहाँ अपने ससुर के औषधालय में सहयोग करने लगे। मरीजों को देखने के साथ ही उनका साहित्य प्रेम घटने के बजाए बढ़ता गया। यूं भी वे किशोरावस्था से ही लेखन करने लगे थे। वस्तुतः शिक्षा समाप्त होने के बाद उन्होंने दिल्ली में आयुर्वेदिक चिकित्सक के रूप में अभ्यास शुरू किया, लेकिन वह सफल नहीं रहे और उन्हें दुकान बंद कर दी। आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो गई कि उनकी पत्नी के गहने तक गिर गए। गुजरात के लिए उन्होंने एक धर्मार्थ औषधालय में 25 रुपये प्रतिमाह वेतन पर काम किया। सन 1917 में वे डीएवी कॉलेज, लाहौर में आयुर्वेद के वरिष्ठ प्रोफेसर बने, लेकिन प्रबंधन के असहयोग के कारण उन्होंने छोड़ दिया और अजमेर चले गए।  अजमेर में दोस्तों के यहाँ रहते हुए उन्होंने लिखना शुरू कर दिया। बाद में दिल्ली में उन्होंने लंबे समय तक चिकित्सा कार्य (सन् 1936 से अभ्यास की) और विपुल मात्रा में ऐतिहासिक और वैज्ञानिक रचनाएँ लिखीं, जिससे उन्हें प्रसिद्धि मिली।

उनका निजी जीवन कई उतार-चढ़ाव से भरा रहा। एक के बाद एक तीन पत्नियों के असामयिक देहांत ने मन को आहत रखा था तो लेखन में यश पा सकने की पीड़ा से भी गुजरते रहे थे। चैथे विवाह के बाद उनके जीवन में पुनः कुछ स्थिरता आई और उन्होंने अपनी कृति ‘वैशाली की नगरवधू’ लिखकर पूरी की। यह कृति उनके लिए स्थायी यश कारण बनी। इसके साथ ही उनके एक नए लेखक रूप का उभार हुआ और वह एक उपन्यासकार के रूप में समादृत हुए।
ऐतिहासिक विषय-वस्तु के उनके उपन्यास अपनी श्रेणी में विशिष्ट स्थान रखते हैं।

आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा रचित ‘‘वैशाली की नगरवधू’’ हिंदी साहित्य का एक अत्यंत प्रसिद्ध और प्रामाणिक ऐतिहासिक उपन्यास है। इस उपन्यास की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं। यह उपन्यास ईसा पूर्व छठी शताब्दी के बौद्ध काल, मगध साम्राज्य और लिच्छवि गणराज्य (वैशाली) की पृष्ठभूमि पर आधारित है। इसमें प्राचीन भारत की राजनीति, संस्कृति और समाज का जीवंत चित्रण किया गया है। सशक्त एवं प्रधान चरित्र आम्रपाली (अम्बपाली) उपन्यास का मुख्य केंद्र बिंदु वैशाली की नगरवधू और लोक-सुंदरी आम्रपाली का चरित्र है। आम्रपाली केवल सौंदर्य की प्रतीक नहीं है, बल्कि वह स्वाभिमान, आत्मबल, और त्याग की साक्षात मूर्ति के रूप में उभरती है। इस उपन्यास में तत्कालीन समाज के आंतरिक संकट, वज्जि गणतंत्र के कानूनों तथा बिंबसार, अजातशत्रु जैसे राजाओं की महत्वाकांक्षाओं का यथार्थवादी वर्णन है। उपन्यास में बौद्ध धर्म और जैन धर्म के उदय, तथा भगवान बुद्ध व महावीर स्वामी के समाज-सुधार व समतामूलक विचारों के प्रभाव को बहुत सुंदरता से दर्शाया गया है। चतुरसेन शास्त्री ने ऐतिहासिक और पुराकालीन वातावरण को जीवंत करने के लिए संस्कृतनिष्ठ और तत्सम शब्दों से युक्त प्रभावी भाषा का प्रयोग किया है। जिससे कथानक का देशकाल जीवंत लगता है। वस्तुतः आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने ‘‘वैशाली की नगरवधू’’ उपन्यास केवल मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि एक गहरे सामाजिक और ऐतिहासिक संदेश के साथ लिखा था। लेखक ने स्वयं इस उपन्यास के बारे में कहा था, ‘‘मैं अब तक की अपनी सारी रचनाओं को रद्द करता हूँ, और वैशाली की नगरवधू को अपनी एकमात्र रचना घोषित करता हूँ।’’
चतुरसेन शास्त्री इस उपन्यास के माध्यम से भारत के प्राचीन इतिहास (विशेषकर ईसा पूर्व छठी शताब्दी के बौद्ध कालीन वैभव, वैशाली गणतंत्र और मगध साम्राज्य) को प्रामाणिकता के साथ पाठकों के सामने लाना चाहते थे। उपन्यास का सबसे बड़ा उद्देश्य यह भी था कि ‘‘नगरवधू’’ जैसी कुप्रथा के माध्यम से पुरुष प्रधान समाज में स्त्री के शोषण को तर्जनी दिखाई जा सके। आम्रपाली को उसकी इच्छा के विरुद्ध पूरे नगर की संपत्ति घोषित कर दिया जाता है। शास्त्री जी ने इस घटना के माध्यम से स्त्री अधिकारों और उनकी गरिमा का प्रश्न उठाया है। साथ ही उपन्यास में गणतंत्र के पतन की अवस्था को भी सामने रखा गया है। वैशाली एक महान और शक्तिशाली गणतंत्र था, लेकिन आंतरिक ईष्र्या, गुटबाजी और विलासिता के कारण उसका पतन हुआ। लेखक ने इसके माध्यम से यह संदेश दिया है कि यदि कोई समाज अंदर से कमजोर हो जाए, तो बाहरी ताकतें (जैसे मगध) उसका विनाश कर देती हैं। उपन्यास का अंत आम्रपाली द्वारा भगवान बुद्ध की शरण में जाने और बौद्ध भिक्षुणी बनने से होता है। इसके जरिए लेखक ने यह सिद्ध किया है कि सत्ता, रूप और वैभव क्षणभंगुर हैं, और अंतिम शांति केवल त्याग, अध्यात्म और करुणा से ही मिल सकती है।
यह उपन्यास एक सम्पूर्ण आख्यान की भांति है जिसमें तत्कालीन राजनीतिक पक्ष पर भी विस्तार से पक्ष रखा गया है। इसमें आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने प्राचीन भारत के दो सबसे शक्तिशाली राज्यों वैशाली (वज्जी संघ) और मगध साम्राज्य के बीच के गहरे राजनीतिक, सामाजिक और कूटनीतिक संघर्ष को बेहद सजीव रूप में प्रस्तुत किया है। यह संघर्ष केवल दो राजाओं का नहीं, बल्कि दो अलग-अलग शासन प्रणालियों का टकराव था। वैशाली आठ कुलों का एक संघ (वज्जी संघ) था, जहाँ गणतंत्र व्यवस्था थी। यहाँ निर्णय राजाओं की संस्था (संथागार) में लोकतांत्रिक तरीके से लिए जाते थे। वहीं मगध में साम्राज्यवादी राजतंत्र था, जहाँ सत्ता एक ही राजा (बिंबिसार और बाद में अजातशत्रु) के हाथ में केंद्रित थी। मगध का एकमात्र लक्ष्य साम, दाम, दंड, भेद से अपने साम्राज्य का विस्तार करना था। उपन्यास दिखाता है कि कोई भी लोकतंत्र तब तक नहीं हारता, जब तक वह अंदर से कमजोर न हो। वैशाली के लिच्छवि सरदार आपस में ही ईष्र्या, अहंकार और पारस्परिक कलह में लिप्त थे। वैशाली के गणतंत्र का एक क्रूर नियम था कि नगर की सबसे सुंदर स्त्री किसी एक पुरुष की पत्नी नहीं बन सकती, उसे ‘‘नगरवधू’’ (सार्वजनिक संपत्ति) बनना होगा। आम्रपाली को नगरवधू बनने के लिए बाध्य किया जाता है जिससे वैशाली के भीतर ही असंतोष व्याप्त हो जाता है। मगध के शासकों ने वैशाली की इसी आंतरिक कमजोरी का लाभ उठाया।

आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने अपने इस उपन्यास के द्वारा यह तथ्य रखा कि जब राष्ट्र की सुरक्षा पर आंतरिक राजनीति और अहंकार हावी हो जाते हैं, तो पूरे समाज को उसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती है।

आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने ‘‘वैशाली की नगरवधू’’ के अतिरिक्त ‘‘आत्मदाह’’, ‘‘बहते आँसू’’, ‘‘दो किनारे’’, ‘‘नरमेध’’, ‘‘अपराजिता’’, ‘‘बगुला के पंख’’, ‘‘मोती’’, ‘‘पूर्णाहुति’’, ‘‘रक्त की प्यास’’, ‘‘सोमनाथ’’, ‘‘आलमगीर’’, ‘‘वयंरक्षाम’’, ‘‘सह्याद्रि की चट्टानें’’ आदि उपन्यास लिखे। उन्होंने नाटक भी लिखे- राजसिंह, मेघनाथ, छत्रसाल, गांधारी, श्रीराम, अमर राठौर, उत्सर्ग, क्षमा। ‘‘मेरी आत्मकहानी’’ नाम से आत्मकथा लिखी।
‘‘रजकण’’ तथा ‘‘अक्षत’’उनके कहानी ससंग्रह हैं तथा निबंध संग्रह हैं- ‘‘अंतस्तल’’, ‘‘मेरी खाल की हाय’’, ‘‘तरलाग्नि’’। इनके अतिरिक्त उन्होंने बाल साहित्य, एकांकी तथा चिकित्सा से संबंणित पुस्तकें भी लिखीं। सन 1909 से 1948 के 40 वर्षों की अवधि में वह 84 छोटी-बड़ी पुस्तकें लिख चुके थे और पत्रिकाओं में सैकड़ों लेखों का प्रकाशन हो चुका था।
शास्त्री जी की कहानियाँ उत्कृष्ठ थीं। उनकी एक कहानी ‘‘खूनी’’ के ‘‘प्रताप’’ पत्रिका में प्रकाशित होने पर ‘‘प्रताप’’ के संपादक पं. माखनलाल चतुर्वेदी ने लिखा था, ‘‘खूनी को छाप कर प्रताप निहाल हो गया।’’
उनकी गद्यकाव्य रचनाएं प्रायः  ‘‘प्रताप’’ में प्रकाशित होती रहीं जिनमें ‘चित्तौड़ के किले में’’, ‘‘स्वदेश’’ व ‘‘अनूप शहर के घाट पर’’ आदि प्रमुख हैं। ‘‘अन्तस्तल’’ अचार्य शास्त्री का प्रसिद्ध गद्यकाव्य संग्रह है। यह हिन्दी में गद्य काव्य की प्रथम प्रकाशित पुस्तक मानी जाती है।

आचार्य चतुरसेन शास्त्री छायावाद युग के प्रमुख उपन्यासकार और कथाकार रहे। उनका मुख्य लेखन काल प्रेमचंद के समकालीन और उनके बाद का है, जिसमें हिंदी में ऐतिहासिक उपन्यास-लेखन की परंपरा को समृद्ध करने का श्रेय प्राप्त है। 2 फरवरी 1960 को उनका निधन हुआ। आचार्य चतुरसेन शास्त्री की कृतियां हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि हैं। इन कृतियों को पढ़े बिना इतिहासपरक साहित्य लेखन की बारीकियों को समझा नहीं जा सकता है। वे साहित्य में इतिहास को पिरोने में माहिर थे।       

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(दैनिक, सागर दिनकर में 26.08.2026 को प्रकाशित) 
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Wednesday, August 19, 2026

चर्चा प्लस | भाजपा की भावी चुनावी रणनीति और स्मृति ईरानी का राजनीतिक ग्राफ | सागर दिनकर


चर्चा प्लस
भाजपा की भावी चुनावी रणनीति और स्मृति ईरानी का राजनीतिक ग्राफ
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह 

 
        स्मृति ईरानी का संगठन में प्रभावशाली ढंग से कमबैक यानी पुनः आगमन को भाजपा की भावी रणनीति का एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। ऐसा क्या हुआ की स्मृति ईरानी की भजपा पार्टी संगठन एक बार फिर आवश्यकता महसूस हुई। राजनीतिक विशेषज्ञों की माने तो ज़ेन-जी के तीखे तेवर ने स्मृति ईरानी की पार्टी संगठन को याद दिला दी। अभिनय की दुनिया से राजनीति के मंच पर आईं स्मृति ईरानी कभी कद्दावर नेता के रूप में उभरीं तो कभी उन्हें बैकफुट में डाल दिया गया। फिर भी उनकी छाप स्थाई बनी रही। चलिए देखते हैं भारतीय जनता पार्टी की भावी रणनीति और स्मृति ईरानी का राजनीतिक ग्राफ जो अब तक अनेक उतार-चढ़ावों से भरा रहा है।


भारतीय जे़न-जी ने सारी दुनिया को बहुत कुछ सिखा दिया। रोजगार की तलाश में भटकते युवा, मल्टीनेशनल कंपनियों की चाकरी करने को तत्पर युवा, तमाम डिग्रियों के होते हुए परिवार का सहारा न बन पाने की गहरी निराशा से घिरा युवा इतना प्रखर आंदोलन भी कर सकता है, यह किसी ने भी नहीं सोचा होगा। आंदोलन का तरीका इतना नया होगा, यह भी किसी ने नहीं सोचा होगा। यदि तनिक भी अंदेशा रहता तो आंदोलन को समाप्त कराने में इतनी देर नहीं लगाई जाती। आंदोलन समाप्त हुआ लेकिन उसकी प्रतिध्वनियां आज भी राजनीतिक गलियारों में सुनी जा सकती हैं। इसका ताज़ा उदाहरण भारतीय जनता पार्टी के संगठन की नई कार्यकारिणी में स्मृति ईरानी की वापसी के रूप में देखा जा सकता है।  भारतीय जनता पार्टी की भावी रणनीति का मुख्य उद्देश्य आगामी विधानसभा चुनावों और 2029 के आम चुनावों के लिए संगठन को धार देना है। पार्टी युवा और अनुभवी चेहरों संतुलित रूप में स्थान देती दिखाई दे रही है। पार्टी को स्मृति ईरानी के तीखे तेवर भी चाहिए जो उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनावों पर भाजपा की पकड़ को मजबूत कर सके।
स्मृति ईरानी का राजनीतिक सफर एक लोकप्रिय टीवी अभिनेत्री से लेकर भारतीय जनता पार्टी की शीर्ष राष्ट्रीय नेतृत्व तक का रहा है। उतार-चढ़ाव से भरे इस सफर में उन्होंने कई महत्वपूर्ण पड़ाव तय किए हैं।

वर्ष 2003 में स्मृति ईरानी ने आधिकारिक तौर पर भाजपा की सदस्यता ली। वर्ष 2004 में उन्होंने चांदनी चैक लोकसभा सीट से कपिल सिब्बल के खिलाफ चुनाव लड़ा, जिसमें उन्हें हार का सामना करना पड़ा। उन्हें महाराष्ट्र युवा मोर्चा का उपाध्यक्ष बनाया गया और बाद में पार्टी के राष्ट्रीय सचिव व वर्ष 2010 में भाजपा महिला मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली। वर्ष 2011 और 2017रू वह गुजरात से राज्यसभा सांसद चुनी गईं। मोदी सरकार (2014) के पहले मंत्रिमंडल में उन्हें सबसे कम उम्र के मंत्रियों में शामिल किया गया और मानव संसाधन विकास  जैसी अहम मंत्रालय की कमान सौंपी गई। इसके बाद उन्होंने कपड़ा मंत्रालय और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का दायित्व भी संभाला। जब नरेंद्र मोदी 2014 में सत्ता में आए थे तो उनके कैबिनेट में महत्वपूर्ण पदों पर नितिन गडकरी, सुषमा स्वराज, राजनाथ सिंह और अरुण जेटली जैसे अनुभवी लोग थे। साथ ही कैबिनेट में कुछ ऐसे चेहरे भी थे जिन्हें ज्यादा अनुभव नहीं था। फिर भी मोदी सरकार ने स्मृति ईरानी को एजुकेशन मिनिस्ट्री देकर सबको चैंका दिया। लेकिन स्मृति ईरानी विवादों की चपेट में आ गईं। ‘‘फेक डिग्री’’ विवाद से लेकर येल यूनिवर्सिटी में उनके कमेंट तक, केंद्रीय विद्यालयों में संस्कृत को तीसरी भाषा के तौर पर अनिवार्य बनाने और स्कूलों को 25 दिसंबर को ‘‘गुड गवर्नेंस डे’’ के तौर पर मनाने का निर्देश देने से लेकर रोहित वेमुला मामले तक स्मृति ईरानी समाचारों की सुर्खियां बनती रहीं और साशल मीडिया पर ट्र्ोल होती रहीं।
सन 2019 में लोकसभा चुनाव में उन्होंने उत्तर प्रदेश की हाई-प्रोफाइल अमेठी सीट से कांग्रेस नेता राहुल गांधी को हराकर ऐतिहासिक जीत दर्ज की। लेकिन सन 2024 में आम चुनावों में अमेठी सीट पर स्मृति ईरानी को कांग्रेस के किशोरी लाल शर्मा के हाथों हार का सामना करना पड़ा, जिसके कुछ समय बाद उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल से भी अलग होना पड़ा था।
स्मृति ईरानी का राजनीतिक ग्राफ उतने ही रंग बदलता दिखता है जितना कोई टीवी सीरियल के पात्र की भूमिका। 2016 के बीच में उनसे एचआरडी पोर्टफोलियो ले लिया गया, 2017 के बीच में उन्हें आई एण्ड बी मिनिस्ट्री में वापस लाया गया, और फिर कुछ और आरोपों के बाद उन्हें हटा दिया गया। भाजपा ने 2019 के लोकसभा चुनाव की तैयारी शुरू की, मगर तब तक ईरानी का प्रभाव समाप्त हो चला था। आखिर, उन्होंने कोई चुनाव नहीं जीता था, भले ही उन्होंने चांदनी चैक और अमेठी में जोरदार लड़ाई लड़ी थी किन्तु 2019 के चुनाव ने एक बार फिर सब बदल दिया। अमेठी में राहुल गांधी के खिलाफ उस एक जीत के साथ, ईरानी एक बड़ी ताकत बन गईं, एक ऐसी ताकत जिसकी भाजपा को जरूरत थी। सन् 2019 के चुनाव ने स्मृति ईरानी को भाजपा की जरूरत बना दिया। उन्हें एक ‘‘टूल’’ के रूप में भी तब-तब प्रयोग में लागा गया जब भजपा को राहुल गांधी पर हमला करना होता रहा, तो वह उन्हें तुरंत सामने लाया गया। ईरानी ने भाजपा को अमेठी में ऐसी जीत दिलाई जो पहले कभी नहीं मिली। भाजपा ने स्मृति ईरानी को 2014 में राहुल गांधी के मुकाबले अमेठी के चुनावी मैदान में उतरा तो स्मृति ने राहुल व गांधी व उनके परिवार को घर में ही घेरकर रखने की रणनीति पर कुछ ऐसा काम किया कि पूरा गांधी परिवार अमेठी-रायबरेली की राजनीति में उलझकर रह गया, जिसका लाभ भाजपा को भरपूर मिला। भाजपा लीडरशिप ने 2014 में स्मृति ईरानी को उनके राजनीतिक अनुभव से कहीं ज्यादा जिम्मेदारियां सौंपी गईं, जिससे वे लगभग असफल रहीं। इसके बाद उन्हें किनारे रखा गया।


मोदी 2.0 में स्मृति ईरानी को और अधिक मिलने की उम्मीद थी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। स्मृति ईरानी पिछले दो वर्ष से पार्टी को यह याद दिलाने में लगी रहीं कि उन्होंने भाजपा को एक बड़ी जीत दिलाई थी। लेकिन भाजपा मानो कुछ समय के लिए उनसे जुड़े विवादों से दूर रहने का मन बनाए बैठी थी। ऐसे में स्मृति ईरानी से एक पोर्टफोलियो छीना जाना स्वाभाविक था। यद्यपि उसी दौर भाजंपा नई काउंसिल में कुल 11 महिला मंत्रियों को रखने की बात कर रही थी।ं लेकिन फाइनेंस को छोड़कर, महिलाओं को जरूरी पोर्टफोलियो से दूर रखना भाजपा का ‘‘सेफ गेम’’ माना गया था।

अब मानो स्मृति ईरानी का राजनीतिक शक्ति की दृष्टि से ‘वनवास’ समाप्त हुआ है। भाजपा ने उन्हें राष्ट्रीय महासचिव  नियुक्त किया है। पार्टी ने उन्हें उत्तर प्रदेश के 2027 के विधानसभा चुनाव के संदर्भ में  संगठनात्मक कमान सौंप कर एक बड़ी जिम्मेदारी दी है। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो राहुल गांधी की बढ़ती तेजी औ ज़ेन-जी के आक्रामक तेवर ने पार्टी प्रमुखों को स्मृति ईरानी की याद दिला दी। यूं तो सांसद कंगना रानावत कई मौकों पर भाजपा की ओर से मोर्चा खोल देती हैं, किन्तु स्मृति ईरानी औ कंगना रानावत की छवि में बहुत अंतर है। स्मृति को अपने पूर्व के टीवी सीरियल की पारिवारिक छवि का भरपूर फायदा मिलता रहा है जबकि कंगना के पास ऐसी कोई मजबूत छवि नहीं है। कंगना आज भी स्मृति ईरानी की भांति मतदाताओं के दिल में जगह नहीं बना पाई हैं। इसीलिए पार्टी संगठन का स्मृति ईरानी पर भरोसा जताना स्वाभाविक है।

स्मृति ईरानी की अब तक की जीवन यात्रा भी किसी टीवी सीरियल की तरह रोचक रही है। स्मृति ईरानी का जन्म 23 मार्च 1976 को दिल्ली में हुआ और उन्होंने राष्ट्रीय राजधानी में ही शिक्षा ग्रहण की। अजय कुमार मल्होत्रा जो पंजाबी हैं, माता शिबानी बागची बंगाली हिंदू पृष्ठभूमि से हैं और जनसंघ से जुड़ी रहीं हैं। स्मृति ईरानी ने माॅडलिंग की और छोटी-मोटी नौकरियां भी कीं। वे मैकडॉनल्ड्स में वेट्रेस और क्लीनर के पद पर रहीं। स्विमवीयर में फोटोशूट भी किया। वे सन 1998 में फेमिना मिस इंडिया सौन्दर्य प्रतियोगिता के फाइनल में पहुंची, किन्तु विजेता नहीं बन पायी। बाद में वे मुम्बई चली गईं, जहां उन्होंने वर्ष 2000 में टेलीवीजन सीरियल ‘‘हम है कल आज कल और कल’’ से अपने करियर की शुरुआत की। लेकिन उन्हें एकता कपूर के टीवी धारावाहिक ‘‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’’ में ‘तुलसी’ का केन्द्रीय किरदार निभाया और लोकप्रियता हासिल की। उस दौर में वे हर घर की चहेती बन गईं। उस किरदार के लिए उन्होंने अपना वजन भी बढ़ाया।
स्मृति ईरानी ने सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए पांच भारतीय टेलीविजन अकादमी अवार्ड, चार इंडियन टेली अवार्ड और आठ स्टार परिवार पुरस्कार जीते हैं। वर्ष 2001 में उन्होने जीटीवी पर प्रसारित ‘‘रामायण’’ में सीता का किरदार भी निभाया था। वर्ष 2006 में उन्होने बालाजी टेलीफिल्मस के अन्तर्गत ‘‘थोड़ी सी जमीन और थोड़ा सा आसमान’’ टीवी सीरियल में सह निदेशक की भूमिका अदा की। वर्ष 2008 में उन्होंने डांस पर आधारिक टीवी सीरियल ‘‘ये हैं जलवा’’ को साक्षी तंवर के साथ होस्ट किया।

स्मृति ने सन 2001 में जुबिन ईरानी से विवाह किया, जो पारसी हैं। इसके बाद वे स्मृति मल्होत्रा से स्मृति ईरानी बन गईं। उनके दो बच्चे हैं - जोहर ईरानी और जोइश ईरानी। जुबिन ईरानी की पूर्व पत्नी से भी एक संतान है शेनियल ईरानी जो जुबिन और स्मृति के साथ रहती है। 
स्मृति ईरानी का राजनीतिक जीवन वर्ष 2003 में तब शुरू हुआ जब उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सदस्यता ग्रहण की और दिल्ली के चांदनी चौक लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ा। हालांकि वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उम्मीदवार और पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल से हार गईं। वर्ष 2004 में इन्हें महाराष्ट्र यूथ विंग का उपाध्यक्ष बनाया गया। इन्हें पार्टी ने पांच बार केंद्रीय समिति के कार्यकारी सदस्य के रूप में मनोनीत किया और राष्ट्रीय सचिव के रूप में भी नियुक्त किया। वर्ष 2010 में उन्हें भाजपा महिला मोर्चा की कमान सौंपी गई। वर्ष 2011 में वे गुजरात से राज्यसभा की सांसद चुनी गई। इसी वर्ष इनको हिमाचल प्रदेश में महिला मोर्चे की भी कमान सौंप दी गई।
भारतीय आम चुनाव, 2014 में स्मृति ने कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और आम आदमी पार्टी के नेता कुमार विश्वास के खिलाफ अमेठी संसदीय सीट से चुनाव लड़ा और उन्हें कड़ी चुनौती दी। यद्यपि वे यह भी चुनाव हार गईं, लेकिन राज्यसभा की सदस्य होने के नाते उन्हें भारत सरकार में मानव संसाधन विकास मंत्री बनाया गया। 2019 के लोक सभा चुनाव ने स्मृति बेन ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी को अमेठी में पराजित किया। लंबे समय तक राहुल गांधी को अमेठी में घेर कर रखने वाली स्मृति को भाजपा ने ऐसे समय में अपना महामंत्री बनाया है जब राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व गृह मंत्री अमित शाह पर सीधे तौर पर आक्रामक तेवर दिखा रहे हैं। इससे इस बात का भी कयास लगाया जा रहा है कि भावी चुनावों में कांग्रेस व भाजपा के बीच पार्टी-प्रतिष्ठा की लड़ाई का मैदान एक बार फिर अमेठी-रायबरेली ही रहेगा। यह भी माना जा रहा है कि अमेठी के साथ रायबरेली व सुलतानपुर में भाजपा को मजबूती मिलेगी।
आम चुनाव 2024 में हार के बाद कांग्रेस की सक्रियता को कम करने के लिए और 2027 विधान सभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन के लिए भाजपा ने भी धरातल पर काम करना शुरू कर दिया। पांच विधान सभा क्षेत्रों वाली अमेठी संसदीय सीट की सलोन सुरक्षित विधान सभा क्षेत्र भी रायबरेली का हिस्सा है तो जगदीशपुर विधान सभा का हलियापुर क्षेत्र सुलतानपुर का भूभाग है। 2014 से लेकर 2024 तक अमेठी में स्मृति ईरानी ने भाजपा के पक्ष में अपना प्रभाव स्थापित किया है। स्पष्ट है कि उनके इस प्रभाव का लाभ भजपा को आगामी चुनावों में भी मिलेगा।                                                 -----------------------

(दैनिक, सागर दिनकर में 19.08.2026 को प्रकाशित) 
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Wednesday, August 12, 2026

चर्चा प्लस | कालिदास के साहित्य में जीवंत है प्रकृति और पर्यावरण | सागर दिनकर


चर्चा प्लस
कालिदास के साहित्य में जीवंत है प्रकृति और पर्यावरण
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह 
                                                        v.  महान संस्कृत कवि कालिदास की रचनाओं जैसे ‘मेघदूत’, ‘रघुवंश’, ‘ऋतुसंहार’ और ‘कुमारसंभव’ में मानवीय भावनाओं और प्रवृत्तियों का अद्भुत वर्णन मिलता है। इसी तरह, इन महाकाव्यों में पर्यावरण और उसके संरक्षण के प्रति जो चिंतन प्रकट किया गया है, वह भी अद्वितीय है। कालिदास के महाकाव्यों को पढ़ते समय हम प्रायः पर्यावरण से जुड़े पहलू को अनदेखा कर देते हैं और मुख्य कथा पर ही ध्यान केंद्रित करते हैं। यद्यपि इन महाकाव्यों के अन्य पक्षों पर भी ध्यान दिया जाता है, लेकिन हम पाएंगे कि कालिदास ने अपनी हर रचना में पर्यावरण के प्रति गहरा प्रेम व्यक्त किया है। इसके साथ ही, पर्यावरण के संरक्षण और पर्यावरण में असंतुलन के कारण होने वाली प्राकृतिक आपदाओं या कष्टों की ओर भी ध्यान आकर्षित किया गया है।


कालिदास को प्रकृति का कवि कहा जाता है। संस्कृत साहित्य में महान कवि और नाटककार कालिदास का एक महत्वपूर्ण स्थान है। उनकी रचनाओं की शाश्वत सुंदरता और उनकी बेजोड़ महानता के कारण उन्हें न केवल भारत में बल्कि पूरी दुनिया में ‘‘प्रकृति के कवि’’ का सम्मानजनक खिताब मिला है। कालिदास का पूरा साहित्य पर्यावरण संरक्षण की भावना से ओत-प्रोत है। कालिदास ने अपनी कविताओं के माध्यम से प्रकृति के प्रति अपने प्रेम और पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपनी जागरूकता को व्यक्त किया है। महान संस्कृत कवि कालिदास की रचनाओं जैसे ‘मेघदूत’, ‘रघुवंश’, ‘ऋतुसंहार’ और ‘कुमारसंभव’ में मानवीय भावनाओं और प्रवृत्तियों का अद्भुत वर्णन मिलता है। इसी तरह, इन महाकाव्यों में पर्यावरण और उसके संरक्षण के प्रति जो चिंतन प्रकट किया गया है, वह भी अद्वितीय है। कालिदास के महाकाव्यों को पढ़ते समय हम प्रायः पर्यावरण से जुड़े पहलू को अनदेखा कर देते हैं और मुख्य कथा पर ही ध्यान केंद्रित करते हैं। यद्यपि इन महाकाव्यों के अन्य पक्षों पर भी ध्यान दिया जाता है, लेकिन हम पाएंगे कि कालिदास ने अपनी हर रचना में पर्यावरण के प्रति गहरा प्रेम व्यक्त किया है। इसके साथ ही, पर्यावरण के संरक्षण और पर्यावरण में असंतुलन के कारण होने वाली प्राकृतिक आपदाओं या कष्टों की ओर भी ध्यान आकर्षित किया गया है।
संस्कृत साहित्य के प्रसिद्ध कवि, महान कवि कालिदास की रचनाओं में प्रकृति के प्रति विशेष प्रेम दिखाई देता है। अपने महाकाव्यों में प्रकृति के वर्णन के माध्यम से, कालिदास ने न केवल प्रकृति की सुंदरता को उजागर किया है, बल्कि अपने नायक-नायिकाओं के माध्यम से आम जनता को प्रकृति संरक्षण के प्रति जागरूक करते हुए उन्हें नुकसान न पहुँचाने का संदेश भी दिया है। प्रकृति की विशेषताओं और महत्व का वर्णन करते हुए उन्होंने ‘‘ऋतुसंहार’’, ‘‘कुमारसंभव’’ और ‘‘रघुवंश’’ की रचना की है। अपने विश्व-प्रसिद्ध नाटक ‘‘अभिज्ञानशाकुंतलं’’ के मंगलाचरण में प्रकृति के मूल तत्वों (जल, अग्नि, सूर्य, चंद्रमा, आकाश, पृथ्वी, वायु) की ‘‘अष्टमूर्ति देव’’ के रूप में स्तुति करते हुए उन्होंने प्रकृति के दैवीय स्वरूप को भी प्रस्तुत किया है।
कालिदास ‘‘कुमारसंभव’’ की शुरुआत हिमालय के प्राकृतिक वर्णन से करते हैं-
अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराजः।
पूर्वापरौ तोयनिधीवगाह्य स्थितः पृथिव्या इव मानदण्डः।।

‘‘कुमारसंभव’’ में बताया गया है कि पार्वती ने शिव को पति के रूप में पाने के लिए गौरी शिखर पर्वत पर जाकर तपस्या करने के लिए अपनी कुटिया बनाई। वहाँ उन्होंने सबसे पहले पौधे लगाए और अपने बच्चों की तरह ही रोज़ दूध जैसे पानी से उन्हें सींचा और उनकी देखभाल की। यह काम उनकी तपस्या का ही एक हिस्सा था, जैसे यज्ञ वगैरह। इसी तरह, ‘‘रघुवंश महाकाव्य’’ में सिंह और दिलीप के बीच बातचीत के दौरान, सिंह दिलीप को एक पेड़ के बारे में बताता है और कहता है कि ‘‘हे राजा! यह वही देवदार का पेड़ है जिसे शिव और पार्वती ने मिलकर अपने पुत्र की तरह पाला-पोसा था और जब हाथी ने रगड़कर उसकी छाल हटा दी, तो पार्वती को वैसा ही दर्द हुआ जैसा उन्हें राक्षसों के साथ लड़ाई में अपने बेटे कार्तिकेय के घायल होने पर हुआ था। कालिदास ने लिखा है कि पार्वती खुद पेड़ से गिरी हुई पत्तियाँ ही खाने के तौर पर लेती थीं ताकि हरी पत्तियाँ तोड़ने से पेड़ को तकलीफ़ न हो।
यह प्रकृति के प्रति मानवीय संबंधों की गहनता का द्योतक है कि कालिदास ने एक वृक्ष की पीड़ा से ठीक उसी प्रकार व्यथित होते हुए पार्वती को वर्णित किया जिस प्रकार एक माता अपने पुत्र की पीड़ा से व्यथित हो उठती है। कातिदास द्वारा किया गया यह वर्णन प्रकृति के प्रति तत्कालीन संवेदना को प्रमाणित करता है।
महाकवि कालिदास से जुड़ी हुई बहुप्रचलित  रोचक कथा में भी प्रकृति से जीवन के मूल्यों को सीखने की शिक्षा दी गई है जिसमें बताया गया है कि जब राजा के सभासद किसी मूर्ख व्यक्ति को ढूढने निकले तो उन्हें एक ऐसा युवक दिखाई दिया जो एक वृक्ष की ऐसी डाल को काट रहा था जिस पर वह स्वयं बैठा हुआ था। इसी कथा से ही वह कहावत विकसित हुई कि ‘‘उस डाल को मत काटो जिस तुम स्वयं बैठे हो।’’ इस कथा की सत्यता की गहराई को छोड़ कर यदि इसके प्रकृति के पक्ष को देखा जाए तो इसमें प्रकृति के द्वारा जीवन की शिक्षा दे दी गई है। जबकि हमने इस शिक्षा को लगभग भुला दिया है। इसीलिए हम जिस पृथ्वी पर रहते हैं लगातार उसे क्षति पहुंचा रहे हैं। डाल कटने पर डाल सहित से गिरने पर तो चोट ही लगेगी किन्तु पृथ्वी का संतुलन बिगड़ने पर पृथ्वी से जीवन का अस्तित्व ही मिट जाएगा। 
कवि कालिदास का पौधों के प्रति लगाव इस बात से भी साबित होता है कि वे कहते हैं कि अगर कोई ज़हरीला पेड़ अपने-आप उग आए, तो उसे काटना नहीं चाहिए - ‘‘विषवृक्षोऽपि संवर्ध्य स्वयं छेत्तुमसाम्प्रतं’’। वे आगे कहते हैं कि यह ज़हरीला पेड़ जीवों को नुकसान पहुँचाने के बजाय उनके लिए फ़ायदेमंद ही होगा।
वस्तुतः चाहे वनस्पति कितनी भी विषाक्त क्यों न हो, उसमें कोई न कोई औषधीय गुण अवश्य होता है। जैसे धतूरा विषैला होता है किन्तु औषधीय तत्वों से भरपूर होता है। हमारे पूर्वजों, ऋषि-मुनियों ने वैदिक ग्रथों में धतूरे को भगवान शिव का प्रिय बता कर उसके अस्तित्व को सुरक्षित करने का महत्वपूर्ण कार्य किया।
‘‘रघुवंश’’ में ऋषियों की पत्नियों द्वारा हिरणों की अपने बच्चों की तरह देखभाल करने का वर्णन है। दूसरी ओर, कालिदास ‘‘कुमारसंभव’’ में लिखते हैं कि पार्वती की तपस्या के कारण तपोवन में एक-दूसरे के दुश्मन जानवर भी अपनी दुश्मनी भूल गए और बिना किसी बैर-भाव के प्यार से साथ रहने लगे। तपोवन में आकर, ब्रह्मचारी पार्वती से पूछते हैं कि ‘‘क्या बेलों और पेड़ों में नई कोंपलें ठीक से फूट रही हैं, क्या कोई रुकावट तो नहीं है? क्या जंगल का पानी आपके नहाने लायक है? क्या वे दूषित तो नहीं हैं?’’
कालिदास ने गर्मी के मौसम का वर्णन करते हुए, पशुओं के जीवन में पानी की ज़रूरत और पानी न होने पर उनके जीवन की भयावहता को दिखाया है। वे लिखते हैं कि ‘‘कितनी भीषण गर्मी है, सूरज की तेज़ धूप में सूखी घाटी में पानी की बूँदें मिलना भी मुश्किल है।श् तेज़ धूप और ज़बरदस्त प्यास से बेहाल हाथी पानी की चाह में यह भी भूल जाते हैं कि शेर उन्हें मार डालेगा। प्यास से व्याकुल होकर पानी की तलाश में वे शेर से भी नहीं डरते।’’
कवि कालिदास द्वारा वर्णित यह दृश्य प्रायः नेशनल जियोग्राफी अथवा बीबीसी अर्थ के कार्यक्रमों में दिखाई दे जाता है जिसमें आफ्रिका के मसाईमारा के जंगलों में सिमटे हुए जलस्रोत पर सभी प्रकार के वन्य पशु एक साथ पहुचते हैं पानी पीने। यह जियो या मरो का प्रश्न होते हुए भी चरितार्थ होता है। आखिर पानी जीवन का अति आवश्यक तत्व है।
कालिदास प्रकृति के कुशल चितेरे हैं। उनका प्रकृति वर्णन सूक्षम और यथार्थ है प्रकृति को जितना महत्त्व पूर्ण स्थान कालिदास के काव्य में मिला है उतना परवर्ती साहित्य में नहीं। नारी सौंदर्य एवं नायिकाओं के अलंकरण के लिए भी वे प्राकृतिक उपादानों का ही ग्रहण करते हैं। जैसे वसंत पुष्पों से अलंकृत पार्वती दृ
”अशोकनिर्भत्सितपद्मरागमाकृष्टहेमद्युतिकर्णकारम् द्य
मुक्ताकलापीकृत्सिन्दुवारं वसन्तपुष्पाभरणं वहन्ती द्यद्य” (कुमारसम्भवम् 3/53)
अर्थात अशोक के पुष्प से पद्मराग मणि का तिरस्कार करने वाले, सोने की कान्ति को ग्रहण करने वाले हार के समान किये गये निर्गुण्डी के पुष्पों वाले ऐसे वसन्त ऋतु के फूल रूप भूषण को धारण करति हुई (पर्वतराज कन्या दिखाई पड़ी।)
‘ऋतुसंहारं’ में एक श्लोक में कवि ने कहा है-
“विपांडूरं कीटरजस्त्रिन्नावितमं भुजंग्वाद्रकगतिप्रसपिर्तम”।
- अर्थात जब बरसात का पानी घरों के दीवारों से प्रथम बार टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें बनाता हुआ पीले-पीले के सूखे पत्तों को हटाता हुआ ऐसा प्रतीत होता है, मानो काला भुजंग वन में विचरण कर रहा हो।
‘‘मेघदूत’’ में भी प्रकृति के अनुपम वर्णन की छटा हमें बहुत ही प्रभावित करती है, कोई यक्ष जब पहाड़ी ढलान पर मेघ को देखता है तो वह यह मेघ से अत्यंत प्रभावित हो जाता है और उसी समय वह यक्ष कह उठता है- “धूमो ज्योतिः सलिलमरुतां संनिपातः क्व मेघः”।
इस प्रकार धुँआ, अग्नि, जल और वायु के समन्वित रूप मेघ का ऐसा आकार कालिदास चित्रित करते हैं, मानो आकाश में मेघ स्वयं ही पर्वतशिखर- जैसा सजीव हो उठता है, न केवल मेघ अपितु मानचित्र से हिमालय की तराई में बसी अलका तक के वर्णन में कालिदास ने प्रकृति के विभिन्न क्षेत्रों का अत्यंत सजीव वर्णन किया है।
‘‘ऋतुसंहारम’’ छह ऋतुओं का संग्रह है जो एक प्रेमी द्वारा देखी जाने वाली अलग-अलग ऋतुओं के वर्णन के रूप में हैं। कालिदास का ‘‘ऋतुसंहारम’’ छह भागों में विभाजित है। सभी भाग 144 छंदों के साथ छह ऋतुओं से जुड़े हुए हैं। कविता में छह भारतीय ऋतुओं के लिए छह सर्ग हैं- ग्रिस्मा (ग्रीष्म), वर्षा (बरसात), शरत (शरद ऋतु), हेमंत (जाड़ा), सिसिर (शीतकालीन), वसंत (वसंत)। प्रत्येक ऋतु को दो महीनों में विभाजित किया गया है; सभी ऋतुएँ प्रकृति के चक्र के रूप में एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं। यह उस तालिका ऋतु का कालक्रम है, जिसे हिंदू चंद्र कैलेंडर में भारतीय 12 महीनों के छह मौसमों में विभाजित किया गया है।
‘‘मेघदूतम’’ में कालिदास ने पर्यावरण के लगभग सभी घटकों - अग्नि, वायु, जल, आकाश, पृथ्वी, सूर्य, चंद्रमा, औषधि और वनस्पति आदि को प्रस्तुत किया है। ये सदैव बिना बदले की इच्छा के हमारी सहायता करते हैं, इसलिए ये देवताओं के समान हैं। इसके अधिकांश छंदों में पर्यावरणीय तत्वों का स्मरण किया गया है और यह संदेश दिया गया है कि प्रकृति के विरुद्ध कार्य नहीं करना चाहिए। पूर्वी मेघ में बाह्य प्रकृति का सबसे सुंदर रूप चित्रित किया गया है। एक ओर गंधावती, गंभीरा, चर्मण्वती, रेवा, जाह्न्वी, मंदाकिनी, यमुना, देवगंगा, सरस्वती जैसी नदियाँ हैं तो दूसरी ओर अलका, अवंती, विदिशा, कुरूक्षेत्र और उज्जयिनी ऊँची नगरियाँ हैं। कहीं रामगिरि, अमरकूट, देवगिरि, निचारगिरि जैसे पर्वत और पठार दिखाई देते हैं तो कहीं विशाल हिमालय, विंध्य और कैलाश। कहीं रामगिरि का पवित्र जल से भरा सरोवर है तो कहीं हंसों का प्रिय विश्व प्रसिद्ध मानसरोवर। कालिदास के काव्य में प्रकृति का सौंदर्य और प्रकृति के तत्व ही जीवन और संवेदनाओं के पर्याय हैं। इस प्रकार कालिदास का काव्य पर्यावरण और उसकी सुरक्षा के प्रति जागरूक प्रतीत होता है, हम बस इसे समझने की जरूरत है।                                                            
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(दैनिक, सागर दिनकर में 12.08.2026 को प्रकाशित) 
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Wednesday, August 5, 2026

चर्चा प्लस | समय रहते समझना ही होगा ऊर्जा संरक्षण के महत्व और तरीकों को | सागर दिनकर

चर्चा प्लस
समय रहते समझना ही होगा ऊर्जा संरक्षण के महत्व और तरीकों को
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                
          जब लाईट चली जाती है तो हम झुंझला उठते हैं। यदि सरकार के द्वारा विद्युत कटौती की जाने लगती है तो हमारा क्रोध और बढ़ जाता है। डीजल-पेट्रोल के दाम बढ़ते हैं तो हम घबरा उठते हैं। लेकिन क्या हम ऊर्जा के इन स्रोतों की बचत के बारे में व्यक्तिगत स्तर पर कभी गंभीरता से विचार करते हैं? जीवाश्म ईंधन का उपयोग कम करने के लिए इलेक्ट्रिक गाड़ियां आ गईं लेकिन बिजली उत्पादन के लिए भी तो कोयला जैसा जीवाश्म ईंधन लगता है। यानी आगे चल कर हमें अपनाना होगा बिजली के पारंपरिक स्रोत का विकल्प। तो वह, अभी से क्यों नहीं? इस पर विचार करना जरूरी है।
   सन 2006 में भारत बुक सेंटर, लखनऊ से मेरी एक पुस्तक प्रकाशित हुई थी-‘‘सस्ता और सुरक्षित ऊर्जा स्रोतरू सौर तापीय ऊर्जा’’। इस पुस्तक के प्राक्कथन में मैंने लिखा था-‘‘वर्तमान समय ऊर्जा और उसके स्रोतों पर चिंतन करने का समय है। हम ऊर्जा संकट के जिस दौर से गुज़र रहे हैं, वह हमें अपने परंपरागत ऊर्जा स्रोतों पर पुनः दृष्टिपात करने का आग्रह कर रहा है। लकड़ी, कोयला, पनबिजली, गैस, खनिज तेल आदि हमारे परंपरागत ऊर्जा स्रोत मानव के द्वारा उस समय से काम में लाए जा रहे हैं जबसे इन स्रोतों की जानकारी मनुष्य को हुई। हजारों वर्षों से इन ऊर्जा स्रोतों के निरंतर काम में आने, जनसंख्या के दबाव बढ़ने तथा इन ऊर्जा स्रोतों की भावी उपलब्धता की गंभीरता की ओर स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं। परंपरागत ऊर्जा स्रोतों को न तो पुनर्जीवित किया जा सकता है और न पुनर्निर्मित किया जा सकता है। इनका भंडार समाप्त हो जाने पर हम ऊर्जाहीन हो जाएंगे। अतः समय रहते परंपरागत ऊर्जा स्रोतों के एक ऐसे विकल्प को अपना लेना आवश्यक है जो हमारी भावी आवश्यकताओं को सुचारू रूप से पूरा कर सके। वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत के रूप में जिन परंपरागत स्रोतों को अपनाया जा सकता है, वे हैं- 1.सौर ऊर्जा 2.पवन ऊर्जा 3.ज्वारीय ऊर्जा 4.भू-तापीय ऊर्जा। इन परंपरागत ऊर्जा स्रोतों में सौर ऊर्जा अथवा सौर तापीय ऊर्जा सबसे उत्तम ऊर्जा स्रोत है। यह सूर्य से प्राप्त होने वाली ऊर्जा है और इसीलिए इसकी उपलब्धता सतत एवं अक्षुण्ण है। सौर तापीय ऊर्जा सब जगह उपलब्ध हो सकती है। इसको उपयोग में लाना भी आसान है। सौर तापीय ऊर्जा के क्षेत्र में निरंतर अनुसंधान हो रहे हैं तथा यह भविष्य की विश्वसनीय ऊर्जा के रूप में स्वीकार की जा चुकी है। सुदूर ग्रामीण अंचलों के लिए भी सौर तापीय ऊर्जा के द्वारा ईंधन एवं विद्युत की आपूर्ति की जा सकती है जो अन्य किसी स्रोत से दीर्घकाल तक संभव नहीं है। इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए, मैंने सौर तापीय उर्जा के बारे में जैसे-जैसे अध्ययन किया, वैसे-वैसे मैंने इसे एक सशक्त विश्वसनीय और उपयोग में आसान ऊर्जा स्रोत के रूप में पाया। मुझे लगता है कि सौर तापीय ऊर्जा भारत जैसे विकासशील देश में समाज के प्रत्येक स्तर के नागरिकों द्वारा अपनाया जाना चाहिए। इससे देश की राष्ट्रीय आय के एक बड़े भाग की बचत हो सकेगी, जो परंपरागत ऊर्जा को आयात करने में व्यय हो जाती है। सौर तापीय ऊर्जा को अपना कर न केवल ईंधन अपितु विद्युत आपूर्ति से संबंधित संकटों से भी हम उबर सकेंगे। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सकेंगे।’’

तब से अब तक ऊर्जा के संबंध में स्थितियां बेहतर नहीं हुई हैं बल्कि और अधिक बिगड़ी हैं। आज फिर वही शब्द लिखने पड़ रहे हैं जो मैंने उस समय लिखे थे कि आमजन जीवन में सौर ऊर्जा को अपनाए जाने की जरूरत है।
कोयले की उपलब्धता पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं और कोयला बिजली उत्पादन में सबसे बड़ी भूमिका निभाता है। कोयले की उपलब्धता के भावी संकट को देखते हुए जर्मनी ने अपने देश में कोयला खनन का काम बंद कर चुका है। अन्य देश भी इस दिशा में अपनी योजनाएं बना रहे हैं। भारत जैसे विकासशील देश के लिए एकदम से कोयले का उपयोग बंद कर देना संभव नहीं है अतः उसने जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में सन् 2030 से 2050 तक का समय मांगा है। लेकिन क्या यह हमारे लिए सन 2030 तक संभव है? हम यदि रेलवे लाईन के पास पहुंच कर देखें तो कुछ ही देर में कोयले से भरी मालगाड़ी सामने से गुज़रती हुई दिखाई दे जाएगी। वह पचासों बोगियों में भरा हुआ कोयला कारखानों और विद्युत तापगृहों में पहुंच कर ऊर्जा उत्पादन का काम करता है। वर्षों से इस प्रकार कोयला खनन किया जा रहा है। हजारों वर्ष में तैयार यह कोयला जिस तेजी से और जिस बड़े पैमाने में हमने उपयोग में लाया है, उससे भूमि के नीचे मौजूद कोयले का भंडार अपना अस्तित्व खोता जा रहा है। कोयले का पुर्नउत्पादन इतनी तेजी से नहीं हो सकता है कि हम खोदते जाएं, कोयला निकालते जाएं और पृथ्वी हमें कोयला बना-बना कर देती जाए। यह हजारों वर्ष की प्राकृतिक प्रक्रिया से निर्मित होता है। इस बात को जानते हुए भी हमने यह अनदेखी की कि कोयला एक दिन पूरी तरह समाप्त हो सकता है। इसीलिए स्थिति इस गंभीरता तक आ पहुंची है कि कोयले का उपयोग बंद किए जाने का वैश्विक स्तर पर प्रयास आरम्भ करना पड़ रहा है।

हम दैनिक जीवन में विद्युत ऊर्जा का बेहद उपयोग करते हैं। अब तो ई-बाईक, ई-कार आदि के रूप में उपयोग बढ़ता जा रहा है। इस ‘ई’ का मतलब है इलेक्ट्रिक या बिजली। तो जब तक बिजली पारंपरिक स्रोतों पर निर्भर है और हमारे पारंपरिक स्रोत समाप्त नहीं हुए हैं तब तक हमें बिजली प्राप्त होती रहेगी। लेकिन उसके बाद? क्या हम अंधकारयुग में जीने को तैयार हैं? कदापि नहीं। इसकी कल्पना भी हम नहीं करना चाहते हैं। तो फिर क्यों न समय रहते ऊर्जा के अपने स्रोत को पारंपरिक से बदल कर वैकल्कि पर ‘‘स्विच’’ कर दिया जाए। यानी हम जीवाश्म ईंधन के बदले सौर ऊर्जा को स्रोत के रूप में पूरी तरह से अपना लें।

यूं तो देश में हर वर्ष राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण दिवस मनाया भी जाता है। यह ऊर्जा खपत के महत्व और हमारे दैनिक जीवन में इसके उपयोग और वैश्विक पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिति पर इसके प्रभाव का आकलन करने के लिए मनाया जाता है। भारत में राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण दिवस मनाने का उद्देश्य रहता है, लोगों को ऊर्जा के महत्व, ऊर्जा की बचत, और ऊर्जा संरक्षण के बारे में जागरुक किया जा सके। ऊर्जा संरक्षण का सही अर्थ है ऊर्जा के अनावश्यक उपयोग को कम करके कम ऊर्जा का उपयोग कर ऊर्जा की बचत की जाए। लेकिन यह दिवस भी अन्य दिवसों की भांति एक दिन का समारोह बन कर रह जाता है। 
   कुशलता से ऊर्जा का उपयोग भविष्य में उपयोग के लिए इसे बचाने के लिए बहुत आवश्यक है। यह सच है कि विद्युत जैसी ऊर्जा को बचा कर उसका भंडारण नहीं किया जा सकता है, लेकिन उसके उत्पादन में लगने वाले कोयला जैसे स्रोत बचाए जा सकते हैं और मंहगी बिजली के विरुद्ध सौर ऊर्जा को अपना कर अपने घरेलू बजट को भी सम्हाला जा सकता है।

यह सच है कि वर्तमान में हमारे देश में सौर उपकरण घर में लगवाने मंहगे पड़ते हैं किन्तु आरंभिक खर्च के बाद न्यूनतम खर्च उसे बैलेंस कर देता है। यदि इस दिशा में सरकार कारगर सब्सिडी लागू कर दे तो सौर ऊर्जा के घरेलू उपकरण हर नागरिक के लिए सस्ते और आसानी से उपलब्ध हो सकेंगे। इस दिशा में चीन ने हमारे देश के बाजार को आकर्षित करने में कसर नहीं छोड़ी है। ऑनलाईन बाजार में कम से कम कीमत में उसने ऐसे उत्पाद उतार दिए हैं जो दिन भर सौर ऊर्जा ग्रहण करते हैं और रात भर घर, लॉन, सड़क आदि को रोशन करते हैं। बेशक ये उपकरण बिना गारंटी के होते हैं किन्तु इनकी कम कीमत इनके ‘‘यूज एंड थ्रो’’ की क्वालिटी के आड़े नहीं आती है। यदि खाना पकाने के सोलर कुकर, चूल्हे और घरेलू बिजली के उपकरणों को सब्सिडी के साथ खुले बाजार में उपलब्ध कराया जाए तो इसे सभी लोग खरीदना पसंद करेंगे। इसका अनुमान बिजली बचाने वाले बल्बों, पंखों आदि की खरीदी के प्रति रुझान को देख कर लगाया जा सकता है। क्योंकि सुविधा पाने के साथ-साथ पैसे की बचत हर कोई करना चाहता है।  

यह भी सच है कि हमें ऊर्जा की बचत की आदत नहीं है। यह आदत हमें अपनानी होगी। कोई भी ऊर्जा की बचत इसकी गंभीरता से देखभाल करके कर सकता है। दैनिक उपयोग के बहुत से विद्युत उपकरणों को जैसे- बिना उपयोग के चलते हुए पंखों, बल्बों, एसी, हीटर आदि को बंद कर के विद्युत की बचत की जा सकती है। इस तरह ऊर्जा की बचत का तरीका ऊर्जा संरक्षण अभियान में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। जीवाश्म ईंधन, कच्चे तेल, कोयला, प्राकृतिक गैस आदि दैनिक जीवन में उपयोग के लिए पर्याप्त ऊर्जा उत्पन्न करते हैं लेकिन दिनों-दिन इनकी बढ़ती मांग प्राकृतिक संसाधनों के कम होने का भय पैदा करने लगा है। ऊर्जा संरक्षण ही केवल एक ऐसा रास्ता है जो ऊर्जा के गैर-नवीनीकृत साधनों के स्थान पर नवीनीकृत साधनों को प्रतिस्थापित करता है। ऊर्जा उपयोगकर्ताओं को ऊर्जा की कम खपत करने के साथ ही कुशल ऊर्जा संरक्षण के लिये जागरुक करने के उद्देश्य से विभिन्न देशों की सरकारों ने ऊर्जा और कार्बन के उपयोग पर कर लगा रखा है। उच्च ऊर्जा उपभोग पर कर ऊर्जा के प्रयोग को कम करने के साथ ही उपभोक्ताओं को एक सीमा के अन्दर ही ऊर्जा का प्रयोग करने के लिये प्रोत्साहित करता है। किन्तु इससे अधिक नागरिक हित का तरीका है सौर ऊर्जा को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना।

भवन निर्माण के समय थर्मल इंसुलेशन का प्रयोग हमारे देश में नहीं किया जाता है किन्तु इस दिशा में ऊर्जा के बचत वाले निर्माण को बढ़ावा दिया जा सकता है जिससे ठंड की ऋतु में ऊर्जा की बचत की जा सके। अन्यथा, ठंड के मौसम में हीटर, ब्लोअर आदि उपकरणों पर बड़े पैमाने पर ऊर्जा खर्च करनी पड़ती है। थर्मल पर्दें, स्मार्ट खिड़कियां इस दिशा में कारगर साबित हो रही हैं। ऊर्जा की एक बड़ी मात्रा को प्राकृतिक रोशनी और कॉम्पैक्ट फ्लोरोसेंट लैंप या सीएफएल से और अन्य साधनों के द्वारा ऊर्जा खपत कम की जा सकती है। साथ ही फ्लोरोसेंट बल्ब, रैखिक फ्लोरोसेंट, सौर स्मार्ट टॉर्च, स्काई लाइट, खिड़कियों से प्रकाश व्यवस्था और सौर लाइट का प्रयोग करके बचाया जा सकता है। जल संरक्षण भी बेहतर ऊर्जा संरक्षण का कार्य करता है। लोगों के द्वारा हर साल लगभग हजारों गैलन पानी बर्बाद किया जाता है जिसकी विभिन्न संरक्षण के साधनों जैसे- 6 जीपीएम या कम से कम प्रवाह वाले फव्वारों, बहुत कम फ्लश वाले शौचालय, नल जलवाहक, खाद शौचालयों का प्रयोग करके बचत की जा सकती है।

 राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण अभियान भारत में ऊर्जा संरक्षण की प्रक्रिया को सुविधाजनक बनाने के लिए विद्युत मंत्रालय द्वारा शुरू किया गया। भारत में पेट्रोलियम संरक्षण अनुसंधान एसोसिएशन वर्ष 1977 में भारत सरकार द्वारा भारतीय लोगों के बीच ऊर्जा संरक्षण और कुशलता को बढ़ावा देने के लिए स्थापित किया गया था। ये ऊर्जा का संरक्षण महान स्तर पर करने के लिये भारत सरकार द्वारा उठाया गया बहुत बड़ा कदम है। बेहतर ऊर्जा कुशलता और संरक्षण के लिए भारत सरकार ने एक अन्य संगठन ऊर्जा दक्षता ब्यूरों को भी 2001 में स्थापित किया गया।

ऊर्जा संरक्षण दिवस वस्तुतः एक राष्ट्रीय जागरूकता अभियान दिवस है। लेकिन जैसा कि हमारी प्रवृत्ति है कि चाहे व्यक्तिगत स्तर पर हो या सरकारी स्तर पर, दिवस मनाने के बाद हम अपने सारे संकल्प भूल जाते हैं और सारी योजनाएं ठंडे-बस्ते में बांध देते हैं। लेकिन अब वह समय आ ही गया है कि हमें ऊर्जा की उपलब्धता एवं ऊर्जा स्रोतों के प्रति गंभीर होना होगा। हमें लापरवाही और अनदेखा करने की अपनी प्रवृत्ति को बदला होगा। हम अपनी आने वाली पीढ़ी को खाली कोयला खदानें और तेल के रिक्त कुए सौंपने के बजाए उन्हें सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, भू-तापीय ऊर्जा, सागरीय ऊर्जा के कभी न खाली होने वाले भंडार सौंप कर जाएं। विशेष रूप से सौर ऊर्जा का वह भंडार, जिससे दैनिक जीवन में भी सस्ती और सुगम ऊर्जा मिलती रहे।                                                
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(दैनिक, सागर दिनकर में 05.08.2026 को प्रकाशित)  
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Wednesday, July 29, 2026

चर्चा प्लस | प्रेमचंद की कहानियों में मौजूद है बुंदेलखंड का इतिहास और संस्कृति - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस  

प्रेमचंद की कहानियों में मौजूद है बुंदेलखंड का इतिहास और संस्कृति 

 - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

 

                                      

    प्रेमचंद ने भारतीय समाज की विशेषताओं और अन्तर्विरोधों को एक कुशल समाजशास्त्री की भांति गहराई से समझा। इसलिए उनके साहित्य में भारतीय समाज की वास्तविकता स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। स्त्रियों, दलितों सहित सभी शोषितों के प्रति प्रेमचंद ने अपनी लेखनी चलाई। प्रेमचंद मात्र एक कथाकार नहीं वरन् एक समाजशास्त्री भी थे। उनकी समाजशास्त्री दृष्टि सैद्धांतिक नहीं बल्कि व्यवहारिक थी। इसीलिए वे उस सच्चाई को भी देख लेते थे जो अकादमिक समाजशास्त्री देख नहीं पाते हैं। उन्होंने जहां एक ओर कर्ज में डूबे किसान की मनोदशा को परखा वहीं समाज के दोहरेपन की शिकार स्त्रियों की दशा का विश्लेषण किया। उन्होंने ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य की कहानियां भी लिखीं और उनके लिए प्रेमचंद ने बुंदेलखंड के कथानकों को चुना।


31 जुलाई 1880 को जन्मे प्रेमचंद को हिन्दी साहित्य का ‘कथा सम्राट’ कहा जाता है। प्रेमचंद ने ‘‘नवाबराय’’ के नाम से उर्दू में साहित्य सृजन किया। यह नवाबराय नाम उन्हें अपने चाचा से मिला था जो उनके बचपन में उन्हें लाड़-प्यार में ‘‘नवाबराय’’ कह कर पुकारा करते थे। किन्तु अंग्रेज सरकार के कारण उन्हें अपना लेखकीय नाम ‘‘नवाबराय’’ से बदलकर ‘‘प्रेमचंद’’ करना पड़ा। हुआ यह कि उनकी ’सोज़े वतन’ (1909, ज़माना प्रेस, कानपुर) कहानी-संग्रह की सभी प्रतियां तत्कालीन अंग्रेजी सरकार ने ज़ब्त कर लीं। उर्दू अखबार “ज़माना“ के संपादक मुंशी दयानरायण निगम ने उन्हें सलाह दी कि वे सरकार के कोपभाजन बनने से बचाने के लिए ‘‘नबावराय’’ के स्थान पर ’प्रेमचंद’ लिखने लगें। इसके बाद वे ‘‘प्रेमचंद’’ के नाम से लेखनकार्य करने लगे। 

प्रेमचंद ने भारतीय समाज की विशेषताओं और अन्तर्विरोधों को एक कुशल समाजशास्त्री की भांति गहराई से समझा। इसलिए उनके साहित्य में भारतीय समाज की वास्तविकता स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। स्त्रियों, दलितों सहित सभी शोषितों के प्रति प्रेमचंद ने अपनी लेखनी चलाई। प्रेमचंद मात्र एक कथाकार नहीं वरन् एक समाजशास्त्री भी थे। उनकी समाजशास्त्री दृष्टि सैद्धांतिक नहीं बल्कि व्यवहारिक थी। इसीलिए वे उस सच्चाई को भी देख लेते थे जो अकादमिक समाजशास्त्री देख नहीं पाते हैं। उन्होंने जहां एक ओर कर्ज में डूबे किसान की मनोदशा को परखा वहीं समाज के दोहरेपन की शिकार स्त्रियों की दशा का विश्लेषण किया। उन्होंने ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य की कहानियां भी लिखीं और उनके लिए प्रेमचंद ने बुंदेलखंड के कथानकों को चुना। बुंदेलखंड पर आधारित उनकी दो कहानियां हैं- -‘राजा हरदौल’ और ‘रानी सारंधा’।

‘राजा हरदौल’ बुंदेलखंड की लोकप्रिय कथा है। इस बहुचर्चित कथा का बुंदेलखड के सामाजिक जीवन में भी बहुत महत्व है। यह कथा ओरछा के राजा जुझार सिंह की अपने छोटे भाई हरदौल सिंह के प्रति प्रेम और संदेह की कथा है जिसने ओरछा के इतिहास को प्रभावित किया। जुझार सिंह मुगल शासक शाहजहां के समकालीन थे। वे साहसी थे, वीर थे किन्तु उनकी संदेही प्रवृत्ति उनके इन गुणों को लांछित कर गई। इस वास्तविक घटना का सारांश यह है कि जब जुझार सिंह अपने दक्षिण भारत के अभियान पर गए तब उनका छोटा भाई हरदौल अपनी भाभी रानी कुलीना के साथ राज्य सम्हाल रहा था। दोनों का रिश्ता माता-पुत्र जैसा था। किन्तु कुछ ईर्ष्यालुओं ने जुझार सिंह के वापस आते ही रानी और हरदौल के मध्य अनैतिक संबंधों की चर्चा कर के जुझाार सिंह को भ्रमित कर दिया। संदेही जुझार सिंह अपने भाई और अपनी पत्नी की पवित्रता को नहीं देख सका और उसने अपनी पत्नी रानी कुलीना को आदेश दिया कि वह अपनी पवित्रता सिद्ध करने के लिए हरदौर को विष खिला दे। रानी स्तब्ध रह गई। अपने पुत्र समान देवर को जहर देना उसके लिए कठिन था। तब हरदौल ने अपनी भाभी को समझाया की सम्मान से बड़ा जीवन नहीं होता है, वे विष मिला भोजन परोस दें। अंततः रानी के द्वारा विष मिले भोजन को खा कर हरदौल ने अपना बलिदान दे दिया। यह भी कथा है कि जुझार सिंह ने रानी द्वारा भोजन में विष न दे पाने के कारण रानी से ही विष मिला पान का बीड़ा बनवा कर हरदौल को खिला दिया था जिससे हरदौल की मृत्यु हो गई थी। ओरछा में लाला हरदौल की समाधि आज भी मौजूद है और यह परम्परा है कि बुंदेलखंड में विवाह का पहला कार्ड लाला हरदौल का नाम लिख कर उनकी समाधि पर पहुंचाया जाता है। मान्यता है कि ऐसा करने से लाला हरदौल वधूपक्ष के घर वधू के मामा के रूप में आते हैं और विवाह निर्विघ्न सम्पन्न होता है।   

प्रेमचंद ने पान में विष मिला कर देने की कथा को अपनी कहानी में पिरोया है। उन्होंने ‘राजा हरदौल’ कहानी इन पंक्तियों से आरम्भ की है, ‘‘बुंदेलखंड में ओरछा पुराना राज्य है। इसके राजा बुंदेले हैं। इन बुंदेलों ने पहाड़ों की घाटियों में अपना जीवन बिताया है।’’ 

वे बुंदेलों के चरित्र की विशेषताओं को सामने रखते हुए हरदौल की ओर से यह संवाद लिखते हैं कि ‘खबरदार, बुंदेलों की लाज रहे या न रहे; पर उनकी प्रतिष्ठा में बल न पड़ने पाए- यदि किसी ने औरों को यह कहने का अवसर दिया कि ओरछे वाले तलवार से न जीत सके तो धांधली कर बैठे, वह अपने को जाति का शत्रु समझे।’ वहीं जुझार सिंह युद्ध के लिए विदा लेते समय अपनी रानी से कहता है, ‘प्यारी, यह रोने का समय नहीं है। बुंदेलों की स्त्रियां ऐसे अवसर पर रोया नहीं करतीं।’ इसी कहानी में प्रेमचंद ने एक ऐसी स्त्री के मनोभावों को बड़े ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है जो अपने पुत्र, अपने भाई सरीखे देवर को विष देने के लिए विवश की जा रही है- ‘‘ रानी सोचने लगी, क्या हरदौल के प्राण लूं? निर्दोष, सच्चरित्र वीर हरदौल की जान से अपने सतीत्व की परीक्षा दूं? उस हरदौल के खून से अपना हाथ काला करूं जो मुझे बहन समझता है? यह पाप किसके सिर पड़ेगा? क्या एक निर्दोष का खून रंग न लाएगा? आह! अभागी कुलीना! तुझे आज अपने सतीत्व की परीक्षा देने की आवश्यकता पड़ी है और वह ऐसी कठिन? नहीं यह पाप मुझसे नहीं होगा। यदि राजा मुझे कुलटा समझते हैं, तो समझें, उन्हें मुझ पर संदेह है, तो हो। मुझसे यह पाप न होगा। राजा को ऐसा संदेह क्यों हुआ? क्या केवल थालों के बदल जाने से? नहीं, अवश्य कोई और बात है। आज हरदौल उन्हें जंगल में मिल गया। राजा ने उसकी कमर में तलवार देखी होगी। क्या आश्चर्य है, हरदौल से कोई अपमान भी हो गया हो। मेरा अपराध क्या है? मुझ पर इतना बड़ा दोष क्यों लगाया जाता है? केवल थालों के बदल जाने से? हे ईश्वर! मैं किससे अपना दुख कहूं? तू ही मेरा साक्षी है। जो चाहे सो हो, पर मुझसे यह पाप न होगा।’’

बुंदेलखंड पर आधारित दूसरी कहानी ‘रानी सारंधा’ बुंदेलखंड गौरव कहे जाने वाले महाराज छत्रसाल की मां रानी सारंधा की कथा है। रानी सारंधा ओरछा के राजा चम्पतराय की पत्नी थीं। चम्पतराय के संबंध में प्रेमचंद ने अपनी कहानी में लिखा है कि ‘राजा चम्पतराय बड़े प्रतिभाशाली पुरुष थे। सारी बुन्देला जाति उनके नाम पर जान देती थी और उनके प्रभुत्व को मानती थी। गद्दी पर बैठते ही उन्होंने मुगल बादशाहों को कर देना बन्द कर दिया और वे अपने बाहुबल से राज्य-विस्तार करने लगे। मुसलमानों की सेनाएं बार-बार उन पर हमले करती थीं पर हार कर लौट जाती थीं।’ 

‘रानी सारंधा कहानी के आरम्भ में वे बुंदेलखंड उस रियासत का वर्णन करते हैं जहां रानी सारंधा का जन्म हुआ था। वे लिखते हैं-‘शताब्दियां व्यतीत हो गयीं बुंदेलखंड में कितने ही राज्यों का उदय और अस्त हुआ मुसलमान आए और बुंदेला राजा उठे और गिरे-कोई गांव कोई इलाका ऐसा न था जो इन दुरवस्थाओं से पीड़ित न हो मगर इस दुर्ग पर किसी शत्रु की विजय-पताका न लहरायी और इस गांव में किसी विद्रोह का भी पदार्पण न हुआ। यह उसका सौभाग्य था।’ यह कथा रानी सारंधा के जीवन के साथ ही बंुदेलखंड के परिवेश से परिचित कराती है। कहानी के आरंभ में ही वे लिखते हैं-‘‘ अंधेरी रात के सन्नाटे में धसान नदी चट्टानों से टकराती हुई ऐसी सुहावनी मालूम होती थी जैसे घुमुर-घुमुर करती हुई चक्कियां। नदी के दाहिने तट पर एक टीला है। उस पर एक पुराना दुर्ग बना हुआ है जिसको जंगली वृक्षों ने घेर रखा है। टीले के पूर्व की ओर छोटा-सा गांव है। यह गढ़ी और गाँव दोनों एक बुंदेला सरकार के कीर्ति-चिह्न हैं। शताब्दियां व्यतीत हो गयीं बुंदेलखंड में कितने ही राज्यों का उदय और अस्त हुआ मुसलमान आये और बुंदेला राजा उठे और गिरे-कोई गांव कोई इलाका ऐसा न था जो इन दुरवस्थाओं से पीड़ित न हो मगर इस दुर्ग पर किसी शत्रु की विजय-पताका न लहरायी और इस गाँव में किसी विद्रोह का भी पदार्पण न हुआ। यह उसका सौभाग्य था।’’ प्रेमचंद ने बुंदेलखंड की स्त्री के आत्मसम्मान को बखूबी परखा और फिर उसे इन शब्दों में व्यक्त किया-‘‘ वायुमण्डल में मेघराज की सेनाएँ उमड़ रही थीं। ओरछे के किले से बुन्देलों की एक काली घटा उठी और वेग के साथ चम्बल की तरफ चली। प्रत्येक सिपाही वीर-रस से झूम रहा था। सारंधा ने दोनों राजकुमारों को गले से लगा लिया और राजा को पान का बीड़ा दे कर कहा-बुन्देलों की लाज अब तुम्हारे हाथ है।’’

प्रेमचंद ने रानी सारंधा की श्रेष्ठता को स्थापित करते हुए इस तथ्य को अपनी कहानी में सुंदर ढंग से पिरोया है कि रानी सारंधा ने राजा चम्पतराय के मन में स्वाभिमान को पुनःजाग्रत किया। उन्होंने लिखा है-‘‘ सारंधा-ओरछे में मैं एक राजा की रानी थी। यहां मैं एक जागीरदार की चेरी हूं। ओरछे में वह थी जो अवध में कौशल्या थीं यहां मैं बादशाह के एक सेवक की स्त्री हूँ। जिस बादशाह के सामने आज आप आदर से सिर झुकाते हैं वह कल आपके नाम से कांपता था। रानी से चेरी हो कर भी प्रसन्नचित्त होना मेरे वश में नहीं है। आपने यह पद और ये विलास की सामग्रियां बड़े महंगे दामों मोल ली हैं।’’ चम्पतराय के नेत्रों पर से एक पर्दा-सा हट गया। वे अब तक सारंधा की आत्मिक उच्चता को न जानते थे। जैसे बे-मां-बाप का बालक मां की चर्चा सुन कर रोने लगता है उसी तरह ओरछे की याद से चम्पतराय की आंखें सजल हो गयीं। उन्होंने आदरयुक्त अनुराग के साथ सारंधा को हृदय से लगा लिया।’’

प्रेमचंद ने जहां अपनी कहानियों में दुखी, दलित, शोषित और दुर्बल चरित्रों को महत्व दिया, वहीं बुंदेलखंड के इतिहास के तथ्यों और चरित्रों को भी अपनी कहानियों में स्थान दिया। कथा सम्राट प्रेमचंद के कथा साहित्य में बुंदेलखंड के कथानकों का पाया जाना इस बात का द्योतक है कि वे बुंदेली संस्कृति, परम्पराओं एवं इसके गौरवशाली इतिहास से प्रभावित थे।                 -----------------------

(दैनिक, सागर दिनकर में 29.07.2026 को प्रकाशित)  

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Wednesday, July 22, 2026

चर्चा प्लस | फुटबॉल की दुनिया सिखाती है कि मेहनत से भाग्य बदला जा सकता है | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस
फुटबॉल की दुनिया सिखाती है कि मेहनत से भाग्य बदला जा सकता है       
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह   
                                                               
  यदि यह कहा जाए के विश्व कप में खेलने वाला हर खिलाड़ी अरबों डॉलर का धनी है तो यह सुन कर किसी को भी आश्चर्य नहीं होगा। किन्तु यह जान कर अवश्य आश्चर्य होगा कि इनमें से कई प्रसिद्ध खिलाड़ी वे हैं जिनका बचपन भूख और गरीबी में कटा। इनके पास अपने जूते तक नहीं थे, फुटबॉल नहीं थी और तो और भरपेट खाना भी नहीं था। लेकिन वे अपनी मेहनत के दम पर आज फुटबॉल के साम्राज्य के मिलेनियर हैं। उनमें से कई अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा उन स्थानों के विकास में दान कर रहे हैं जहां उनका बचपन अभाव और गरीबी में बीता था।


    20 जुलाई 2026 का अर्थात इसी माह में फीफा वर्ल्ड कप 2026 का समापन हुआ। एक नए इतिहास के साथ। जिसमें 16 वर्ष बाद स्पेन ने वर्ल्ड कप जीत कर अर्जेंटीना की उम्मींदों पर पानी फेर दिया और उनके स्टार खिलाड़ी लियोनेल आंद्रेस मेसी के अंतिम वर्ल्डकप को पराजय का उपहार दे दिया। लेकिन खेल तो खेल होता है। कोई हारता है तो कोई जीतता है। अर्जेंटीना हारा और स्पेन जीता। किन्तु विश्व कप में शामिल लगभग हर टीम के लिए एक बात अपराजित रही कि उनमें कई खिलाड़ी ऐसे थे जिन्होंने अपने जीवन में भूख और अभाव झेला था पर मेहनत के बल पर वे अपनी किस्मत बदल सके। 
      विश्व फुटबॉल में कई महान खिलाड़ियों ने अत्यधिक गरीबी से उठकर खेल की दुनिया में सर्वाेच्च स्थान, प्रशंसकों का प्यार और अपार धन प्राप्त किया है। इन खिलाड़ियों ने फटे-पुराने कपड़े की बॉल बना कर अपने जीवन में फुटबॉल को स्थान देते हुए सोचा भी नहीं होगा कि एक दिन वे विश्व कप के सितारे बन कर चमकेंगे। फुटबॉल के वे महान खिलाड़ी जो अत्यंत गरीबी से उठकर आए उनमें सबसे पहला नाम आता है ‘‘द किंग ऑफ फुटबॉल’’ कहे जाने वाले ब्राजील के महान खिलाड़ी पेले का। उनका जन्म ट्रैस कोराकोस में हुआ था। उनका बचपन इतनी गरीबी में बीता कि वे जूते तक नहीं खरीद पाते थे और अक्सर मोजे में अखबार भरकर फुटबॉल खेलते थे। कई बार वह स्थिति आई जब उन्होंने उबले आलू के छिलके खा कर अपना पेट भरा। यह फुटबॉल के उनके कौशल का कमाल था कि गरीबी से निकलकर उन्होंने ब्राजील को तीन बार फीफा विश्व कप जिताया।
        महान फुटबॉलर पेले का शुरुआती जीवन अत्यधिक गरीबी, कड़े संघर्ष और फुटबॉल के प्रति अटूट जुनून से भरा हुआ था। पेले का वास्तविक नाम था एडिसन अरंतस डो नैसिमेंटो। उनका यह नाम महान अमेरिकी आविष्कारक थॉमस एडिसन के नाम पर रखा गया था। पेले का ‘‘पेले’’ नाम पड़ने का भी एक दिलचस्प किस्सा है। बचपन में उनका निकनेम ‘‘डिको’’ था। उनके पसंदीदा खिलाड़ी स्थानीय क्लब के गोलकीपर थे जिनका नाम ‘‘बेले’’ था। बचपन में पेले इस नाम का सही उच्चारण नहीं कर पाते थे और अनजाने में उन्हें ‘‘पेले’’ बोलते थे। उनके दोस्तों ने उनका मजाक उड़ाने के लिए उन्हें ‘‘पेले’’ बुलाना शुरू कर दिया। शुरुआत में पेले को यह नाम बिल्कुल पसंद नहीं था और वे चिढ़ जाते थे, लेकिन बाद में यही नाम इतिहास बन गया।
पेले का जन्म 23 अक्टूबर 1940 को ब्राजील के मिनस गेरैस के एक छोटे से कस्बे ट्रैस कोराकोस में हुआ था। उनके पिता का नाम डोडिन्हो था, जो खुद एक स्थानीय फुटबॉल खिलाड़ी थे, लेकिन घुटने की गंभीर चोट के कारण उनका करियर खत्म हो गया था। उनकी माँ का नाम सेलेस्टे अरांटस था। उनकी माली हालत बहुत खराब थी। पेले का बचपन भयंकर गरीबी में बीता। उनका परिवार ब्राजील के बाऊ शहर में एक बेहद तंग झोपड़ी जैसे मकान में रहता था, जहां अकसर उनके पास खाने तक के पैसे नहीं होते थे। परिवार का हाथ बंटाने के लिए छोटी आयु में ही पेले चाय की दुकानों पर बर्तन धोने और रेलवे स्टेशन पर जूते पॉलिश करने का काम करना पड़ा। फिर भी फुटबॉल के प्रति उनका लगाव कम नहीं हुआ। फुटबॉल खेलने के लिए जूते होना जरूरी थे लेकिन पेले के पास इतने पैसे नहीं थे कि वे एक जोड़ी जूते खरीद सकें। उनके साथी लड़के जूते पहन कर फुटबॉल खेलते मगर पेले उनके साथ नंगे पैर ही खेला करते थे। इससे उनके पैरों में चोट लगती रहती थी। लेकिन वे चोटें फुटबॉल के प्रति उनके प्रेम को कम नहीं कर सके। फुटबॉल की असली बॉल खरीदना उनके लिए एक सपना था। इसलिए, वे फटे हुए पुराने मोजों के अंदर अखबार या फटे कपड़े ठूंसकर, उन्हें रस्सी से बांधकर फुटबॉल बनाते थे और गलियों में खेला करते थे। पेले ने गलियों में खेलते हुए ‘‘बाऊ: एथलेटिक क्लब’’ की जूनियर टीम में जगह बनाई। वहाँ उन्होंने अपनी जादुई ड्रिबलिंग से सबको हैरान कर दिया। जिससे ब्राजील के पूर्व राष्ट्रीय खिलाड़ी वाल्डेमार डी ब्रिटो ने पेले की छिपी हुई प्रतिभा को पहचाना। उन्होंने पेले को ट्रेनिंग दी और मात्र 15 वर्ष की उम्र में उन्हें ब्राजील के बड़े क्लब ‘‘सैंटोस एफसी’’ के ट्रायल के लिए ले गए। ब्रिटो ने सैंटोस के निदेशकों से कहा था कि ‘‘यह लड़का दुनिया का सबसे महान फुटबॉल खिलाड़ी बनेगा।’’
पेले ने अपनी मेहनत से अपने मेंटोर ब्रिटो की भविष्यवाणी को सच कर दिखाया। फिर उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और मात्र 17 साल की उम्र में 1958 के विश्व कप में ब्राजील को चैंपियन बनाकर साबित कर दिया कि मेहनत एक गरीब को भी दुनिया का बेताज बादशाह बना सकती है।
     अर्जेंटीना के डिएगो माराडोना भी एक ऐसे ही खिलाड़ी हुए जिनका बचपन भीषण गरीबी में बीता। फुटबॉल इतिहास के सबसे जादुई खिलाड़ियों में से एक, माराडोना का जन्म अर्जेंटीना के ब्यूनस आयर्स के एक बहुत ही गरीब इलाके यानी स्लम बस्ती में हुआ था। वे अपने 8 भाई-बहनों में सबसे बड़े थे। उन्होंने पैसों की कमी से जूझते हुए अपना बचपन बिताया। उनके माता-पिता के पास इतना पैसा नहीं था कि वे मेराडोना को एक अच्छा फुटबॉल, जूते या जर्सी दिला पाते। किन्तु ये कमियां मेराडोना के मनोबल को तोड़ नहीं सकीं। उन्होंने अपने खेल कौशल को निरंतर चमकाया और अपनी असाधारण ड्रिबलिंग के बल पर दुनिया के सबसे महान खिलाड़ियों में अपनी जगह बनाई।
   पुर्तगाल के क्रिस्टियानो रोनाल्डो आज विश्व के महानतम खिलाड़ियों में गिने जाते हैं। उनका बचपन भी बेहद गरीबी में बीता। वे पुर्तगाल के मदीरा में एक छोटे से घर में पले-बढ़े, जहाँ आर्थिक तंगी इतनी थी कि उनकी माँ उनके जन्म से पहले गर्भपात तक करवा लेना चाहती थीं। उनके पिता माली का काम करते थे जिसमें उन्हें बहुत कम पैसे मिलते थे। उस पर उनके पिता को शराब पीने की लत थी जिससे उनके कमाए पैसों में से अधिकांश शराब की भेंट चढ़ जाते थे। शराब की लत के कारण घर की स्थिति काफी खराब थी। कई बार पूरे परिवार को आधापेट खा कर रह जाना पड़ता था। क्रिस्टियानो रोनाल्डो को फुटबॉल से प्यार था और वे सारी मुश्किलों से जूझते हुए फुटबॉल में अपने कौशल को चमकाते रहे। यह उनकी मेहनत ही थी जिसके दम पर उन्होंने पुर्तगाल के उच्चकोटि के खिलाड़ियों के बीच अपनी जगह बनाई और आज उनका नाम  दुनिया के सबसे सफल और अमीर खिलाड़ियों में गिना जाता हैं।
    स्पेन के लामिन यमाल का नाम इस समय हर फुटबॉल प्रेमी के दिल में है। हाल के वर्षों में वे विश्व फुटबॉल के सबसे बड़े स्टार के रूप में सामने आए। यमाल का बचपन भी अत्यंत गरीबी में बीता। उनका परिवार स्पेन के जिस इलाके में रहता था, वहाँ की आधी से अधिक आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करती थी और उनके पिता परिवार का पेट पालने के लिए कड़ा संघर्ष करते थे। उस समय वे लामिन यमाल को फुटबॉल खेलने पर झिड़का भी करते थे क्योंकि उन्हें लगता था कि खेलने से कुछ भी हासिल नहीं होगा। तब उन्हें क्या पता था कि एक दिन उनके बेटे की मेहनत उनके बेटे को फुटबॉल के आकाश का चमकता सितारा बना देगी और पैसों की बरसात करेगी। 
        ज्लाटन इब्राहिमोविच यूं तो स्विडिश फुटबॉलर के नाम से जाने जाते हैं किन्तु उनके माता-पिता बोस्निया और क्रोएशिया से आए अप्रवासी थे। ज्लाटन  का बचपन भूख और अभावों में गुजरा। वे माल्मो के एक ऐसे गरीब इलाके में पले-बढ़े जहां अपराध का बोलबाला था। वहां के बच्चे अपराध की दुनिया में कदम रख कर अपने सपने पूरा करने की कोशिश करते थे। ज्लाटन के पिता की आमदनी अच्छी नहीं थी। कई बार उनके परिवार को भूखा रहना पड़ता था। ऐसे विपरीत वातावरण में ज्लाटन ने हिम्मत नहीं हारी और अपने दम पर अपने व्यक्तित्व को सही राह दी। उन्होंने पहले ताइक्वांडो में ब्लैक बेल्ट हासिल किया लेकिन फुटबॉल के प्रति उनका प्रेम और समर्पण उनका करियर बना। विश्व कप में खेल कर उन्होंने साबित कर दिया कि यदि मेहनत और हौसला हो तो हालात बदले जा सकते हैं।
सेनेगल के सादियो माने भी एक ऐसे खिलाड़ी हैं जिन्होंने बचपन में अथाह गरीबी झेली और आगे चल कर एक महान फुटबॉलर के रूप में अपनी पहचान बनाई। सेनेगल के बाम्बली गांव के सादियो माने का बचपन बहुत ही गरीबी में बीता। उनके पास खेलने के लिए न तो फुटबॉल था और न जूते। उन्होंने गांव के मैदानों में नंगे पैर फुटबॉल खेलकर अपना सफर शुरू किया। आज वे विश्व के बेहतरीन विंगर्स में से एक हैं। उनकी विशेषता यह भी है कि वे जिस गांव से उठ कर उंचाइयों तक पहुंचे उस गांव के विकास के लिए और वहां और स्कूलों के निर्माण एवं व्यवस्था के लिए अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा दान में देते हैं।
      स्पेन की राष्ट्रीय फुटबॉल टीम में हाल के इतिहास में सबसे गरीब पृष्ठभूमि से आने वाले खिलाड़ी लामिन यमाल हैं। वे स्पेन के बार्सिलोना के पास स्थित रोकाफोंडा नामक इलाके में पले-बढ़े हैं, जिसे स्पेन के सबसे पिछड़े और गरीब पड़ोसों में से एक माना जाता है, जहाँ की लगभग आधी आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करती है। लामिन यमाल की माँ इक्वेटोरियल गिनी से और पिता मोरक्को से आए अप्रवासी थे। जब यमाल का जन्म हुआ, तब उनकी माँ की उम्र महज 16 वर्ष थी। उनके पिता सड़कों पर कचरा और सामान बीनने का काम करते थे ताकि परिवार को भोजन मिल सके। शुरुआती दिनों में उनका परिवार एक ऐसे कम्यूनल सेंटर (सामूहिक आवास) में रहता था जहां सबको मुफ्त भोजन दिया जाता था। बाद में वे कुछ समय दोस्तों के घरों में एक कमरा लेकर रहे। जब वे पहली बार बार्सिलोना की मशहूर एकेडमी ‘‘ला मासिया’’ पहुंचे, तो उनके पास खुद के स्पोर्ट जूते तक नहीं थे। वहाँ के कोच ने उन्हें पुराने जूते खरीद दिए जो उनके पैरों से बड़े साईज़ के थे। पर वे डटे रहे। अपनी असाधारण प्रतिभा के दम पर वे मात्र 15-16 साल की उम्र में स्टार बन गए। आज वे बार्सिलोना और स्पेन की टीम के सबसे मुख्य खिलाड़ियों में से एक हैं और उन्होंने अपनी कमाई से अपने माता-पिता और दादी के लिए आलीशान घर खरीद दिया है।
इन खिलाड़ियों की कहानी यह साबित करती है कि प्रतिभा और असीम मेहनत के आगे विपरीत परिस्थितियां और गरीबी भी हार मान लेती है। वहीं यह भी मानना होगा कि फुटबॉल ने ऐसी प्रतिभाओं को उड़ान भरने के लिए आकाश दिया। क्रिकेट या टेनिस की दुनिया में भले ही ऐसे उदाहण कम ही मिलते हों किन्तु फुटबॉल की दुनिया में यह बार-बार सिद्ध हुआ है कि मेहनत करने वाला अपनी ज़िन्दगी की दिशा मोड़ सकता है और भुखमरी से अपना सफर शुरू कर के भी उस सम्पन्नता तक पहुंच सकता है जहां वह दूसरों की भलाई के लिए दान करने में सक्षम हो सके।                                        -----------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 22.07.2026 को प्रकाशित) 
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Wednesday, July 15, 2026

चर्चा प्लस | महात्मा गांधी की दृष्टि में कला और सौंदर्य की लोक-महत्ता | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस  
महात्मा गांधी की दृष्टि में कला और सौंदर्य की लोक-महत्ता      
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह                                                          
        महात्मा गांधी मानते थे कि कला को जनोपयोगी होना चाहिए। उनके अनुसार कला सिर्फ कला के लिए नहीं वरन आमजन के लिए होनी चाहिए। उन्होंने साफ शब्दों में लिखा है कि ‘‘मैं उस कला और साहित्य का पक्षधर हूं जो जनता से जुड़ा हो। वही कला कला है जो सुखकर हो। सच्ची कला केवल आकार पर नहीं बल्कि उसकी पृष्ठभूमि में जो है, उस पर भी ध्यान केन्द्रित करती है। एक कला वह है जो मारती है और एक कला वह है जो जीवन देती है। इसीलिए माना जाता है कि यदि महात्मा गांधी के विचारों को समझना है तो उनके समग्र विचारों को जानना जरूरी है जैसे कला और सौंदर्य के संबंध में उनके विचार।


अधिकांश लोग महात्मा गांधी को एक राजनीतिक व्यक्ति के रूप में ही देखते और समझते हैं। उनकी दृष्टि में माहत्मा गांधी वे व्यक्ति थे जिन्होंने बड़े-बड़े अहिंसक आंदोलन किए और देश को स्वतंत्रता दिलाई। इसमें कोई संदेह नहीं है कि महात्मा गांधी में विशेष राजनीतिक सूझ-बूझ थी लेकिन इसके साथ ही जीवन के विविध पक्षों को ले कर उनमें अगाध जिज्ञासा थी तथा उनका अपना मौलिक दृष्टिकोण था। सादा जीवन जीने वाले महात्मा गांधी को कला और सौंदर्य की अद्भुत समझ थी। महात्मा गांधी ने अपनी पुस्तक ‘एक्सपेरिमेंट्उ विथ ट्रू’ में कला के बारे में लिखा है- ‘‘मैं जानता हूं कि बहुत-से व्यक्ति अपने को कलाकार कहते हैं और उन्हें इस रूप में मान्यता भी प्राप्त है लेकिन उनकी कृतियों में आत्मा के उदग्र आवेग और आकुलता का लेश भी नहीं होता जबकि प्रत्येक सच्ची कला आत्मा के आंतरिक स्वरूप की सिद्धि में सहायक होनी चाहिए। जहां तक मेरा ताल्लुक है, मुझे अपनी आत्मसिद्धि में बाह्य रूपों की सहायता की कतई जरूरत नहीं है। इसलिए मैं कोई कलाकृतियां प्रस्तुत नहीं कर सकता।’’
दरअसल किसी भी कला के तीन आधार तत्व होते हैं- 1. जातीय तत्ववाद  2. कल्पनात्मक विस्तार 3. ऐतिहासिक परम्परा। जातीय तत्ववाद में मानव जाति समूह का अथवा जातीय दर्शन एवं चिन्तन होता है। कभी-कभी यह तत्व अवचेतन में रहकर कला पर अपना प्रभाव डालता है तो कभी अपने जातीय तत्वों को जानबूझ कर कला में पिरोया जाता है। यह तत्व सामाजिक रुढ़ियों और जातिगत ऐतिहासिक परम्परा के रूप में भी गतिमान रहता है। कल्पनात्मक विस्तार वैचारिक परिपक्वता को दर्शाता है। कला के संदर्भ में कल्पना मूर्त और अमूर्त के मध्य संबंध स्थापन का कार्य करती है। कल्पना का हृदय से सीधा संबंध होता है इसलिए यह कला के रूप में प्रकट होने के बाद प्रायः चकित कर देती है। ऐतिहासिक परम्परा कला के विकास को वातावरण प्रदान करती है, उसे दिशा देती है। भारतीय कलाओं के आधार में मनुष्य और सृष्टि का अटूट संबंध है पाया जाता है यह संबंध सार्वभौमिक सम्पूर्णता के आदर्श पर आधारित रहा है।
महात्मा गांधी कला में प्राकृतिक तत्वों को असीमित मानते थे। उनके अनुसार मानवीय कला प्राकृतिक कला के सामने कुछ भी नहीं है। वे कला की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि -‘‘‘हो सकता है कि मेरे कमरे की दीवारें नंगी हों, मुझे तो शायद सिर पर छत की भी जरूरत नहीं है क्योंकि तब मैं असीम विस्तार वाले तारों भरे आकाश को निहार सकता हूं। जब मैं चमकते तारों से भरे आकाश को निहारता हूं तो मेरे सामने ऐसा अद्भुत परिदृश्य होता है जिसकी बराबरी मनुष्य की कला कभी नहीं कर सकती।’’

कला के महत्व के साथ ही महात्मा गांधी  ने कला के उद्देश्य को भी स्पष्ट किया। वे मानते थे कि कला का कोई न कोई उद्देश्य होता है और यह उद्देश्य ही कला की गुणवत्ता को सिद्ध करता है। उन्होंने लिखा है कि ‘‘इसका तात्पर्य यह नहीं है कि मैं सामान्यतः मानी गई कला-वस्तुओं के मूल्य को स्वीकार करने से इन्कार करता हूं बल्कि सिर्फ यह है कि मैं व्यक्तिगत रूप से यह अनुभव करता हूं कि यह प्राकृतिक सौन्दर्य के शाश्वत प्रतीकों की तुलना में कितनी अपूर्ण है। इन कला-वस्तुओं का मूल्य वहीं तक है जहां तक कि वे आत्मा को सिद्धि की दिशा में अग्रसर होने में सहायक होती हैं। ’’

भारतीय दृष्टिकोण से कला की यही परिभाषा हो सकती है। हम केवल उसके लक्ष्य से ही यह लक्षण नहीं बना रहे हैं। काव्य की जो परिभाषा अपने यहाँ है, उसे यदि व्यापक रूप से लगाइए तो वह काव्य की ही परिभाषा नहीं रह जाती; चित्र, मूर्ति, कविता, संगीत आदि कलामात्र की परिभाषा हो जाती है। वस्तुतः कलामात्र की परिभाषा को ही काव्य की परिभाषा बनाने के लिए, एक देशीय रूप देकर काव्य की परिभाषा प्रस्तुत की गई है। अर्थात्, काव्य की परिभाषा पूर्ण व्याप्ति तभी होती है जब हम वाक्यं रसात्मकं काव्यम्” के स्थान परकृ“कृतिरसात्मिका कला कहें वा रमणीयार्थप्रतिपादकः शब्दः काव्यम्” के बदले रमणीयार्थप्रतिपादिका कृतिः कला”
महात्मा गांधी कला में सत्य को ढूंढते थे। यदि कला में सत्यता है तो वह सभी के लिए उपयोगी हो सकती है। उनके अनुसार ‘‘सत्य का शोध पहली चीज है, सौन्दर्य और शुभत्व उसमें अपने आप जुड़ जाएंगे। मैं समझता हूं कि ईसा मसीह सर्वोत्कृष्ट कलाकार थे, चूंकि  उन्होंने सत्य के दर्शन किए थे और उसे अभिव्यक्त किया था। ऐसे ही मोहम्मद साहब भी थे जिनकी ‘कुरान’ सम्पूर्ण अरबी साहित्य की सबसे श्रेष्ठ कृति है, कम-से-कम विद्वानों का मत यही है। कारण यह है कि दोनों ने पहले सत्य को पाने का प्रयास किया था, इसलिए उनकी वाणी में अभिव्यक्ति का सौन्दर्य सहज ही आ गया, हालांकि उन्होंने कोई कला-रचना नहीं की थी। मुझे इसी सत्य और सौन्दर्य की चाह है, मैं इसी के लिए जीऊंगा और इसी के लिए मरूंगा।’’

महात्मा गांधी मानते थे कि कला को जनोपयोगी होना चाहिए। उनके अनुसार कला सिर्फ कला के लिए नहीं वरन आमजन के लिए होनी चाहिए। उन्होंने साफ शब्दों में लिखा है कि ‘‘मैं उस कला और साहित्य का पक्षधर हूं जो जनता से जुड़ा हो। वही कला कला है जो सुखकर हो। सच्ची कला केवल आकार पर नहीं बल्कि उसकी पृष्ठभूमि में जो है, उस पर भी ध्यान केन्द्रित करती है। एक कला वह है जो मारती है और एक कला वह है जो जीवन देती है। सच्ची कला अपने रचनाकार की सुख-शांति, संतोष और शुचिता का प्रमाण होनी चाहिए। मैं संगीत और अन्य सभी कलाओं का प्रेमी हूं लेकिन मैं उनको उतना महत्त्व नहीं देता जितना कि आम तौर पर दिया जाता है। मिसाल के तौर पर मैं उन कार्यकलापों के महत्त्व को स्वीकार नहीं कर सकता जिन्हें समझने के लिए तकनीकी ज्ञान की जरूरत होती है। जीवन सब कलाओं से बढ़कर है। मैं तो यहां तक कहूंगा कि जिसने जीवन में प्रायः पूर्णता को प्राप्त कर लिया है, वह सबसे बड़ा कलाकार है, कारण कि उदात्त जीवन के निश्चित आधार और संरचना के बिना कला है भी क्या?’’
सत्य महात्मा गांधी का प्रिय विषय था। वे निरंतर सत्य की खोज में लगे रहते थे। वे कहते थे कि -‘‘मैं सत्य में अथवा सत्य के द्वारा सौन्दर्य को खोजता और पाता हूं। सत्य के सभी रूप-केवल सच्चे विचार ही नहीं बल्कि सच्ची तस्वीरें या गीत भी अत्यंत सुंदर होते हैं। लोग प्रायः सत्य में सौन्दर्य के दर्शन नहीं कर पाते, आम आदमी उससे दूर भागता है और उसमें सौन्दर्य के दर्शन की क्षमता ही खो बैठता है। जब लोग सत्य में सौन्दर्य के दर्शन करने लगेंगे, तब सच्ची कला का उदय होगा।’’

जर्मन दार्शनिक हेगेल का मानना थ कि ‘‘सौंदर्य संवोदी रूप में सत्य या विचार की अभिव्यक्ति है।’’ वे यह भी मानते थे कि सौंदर्य केवल प्रकृति का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह मानवीय चेतना और परम सत्य की कलात्मक अभिव्यक्ति है। हेगेल के दर्शन में सौंदर्य मात्र बाहरी दिखावट अथवा इंद्रियों को प्रसन्न करने वाली चीज नहीं है, बल्कि यह मानवीय चेतना या आत्मा की बाहरी दुनिया में अभिव्यक्ति है। उनके अनुसार शुद्ध विचार या सत्य जब किसी कला माध्यम के द्वारा साकार होता है तो वही सौंदर्य है। कला में सौंदर्य प्रकृति की नकल करने से नहीं अपितु उसमें अपनी दृष्टि को शामिल करना भी है। ठीक इसी प्रकार महात्मा गांधी ने कला के साथ सौंदर्य के महत्व एवं विशेषताओं को देखा और परखा। वे कला, सौंदर्य और सत्य को परस्पर पूरक मानते थे। महात्मा गांधी के अनुसार -‘‘‘सच्चे कलाकार की दृष्टि में वही मुख सुंदर है जो अपने बाह्य रूप से भिन्न, आत्मा के भीतर प्रतिष्ठित सत्य से आलोकित है। सत्य से भिन्न कोई सौन्दर्य नहीं है। इसके विपरीत, सत्य अपने आपको ऐसे रूपों में प्रकट कर सकता है जो बाहर से तनिक भी सुंदर न हों। कहा जाता है कि सुकरात अपने जमाने का सबसे सत्यनिष्ठ व्यक्ति था लेकिन कहते हैं कि उसकी मुखाकृति ग्रीस में सबसे कुरूप थी। मेरी दृष्टि में सुकरात सुंदर था क्योंकि उसने आजीवन सत्य के लिए संघर्ष किया और आपको याद होगा कि सुकरात की बाह्याकृति के कारण फिडिएस को उसके अन्दर के सत्य की सुंदरता को सराहने में कोई बाधा नहीं आई, हालांकि कलाकार के नाते वह बाह्याकृतियों में भी सौन्दर्य के दर्शन का अभ्यस्त था।’’

महात्मा गांधी ने वास्तविक सुंदर कृति की बड़े सरल शब्दों में व्याख्या की है। वे इस बारे में भी प्रकाश डालते हैं कि सुंदर कृति कब जन्म लेती है-‘‘सत्य और असत्य प्रायः साथ-साथ मौजूद रहते हैं, उसी तरह अच्छाई और बुराई का भी साथ है। कलाकार में भी अनेक बार वस्तुओं की सच्ची और झूठी धारणाओं का सह-अस्तित्व रहता है। सच्ची सुंदर कृति तब जन्म लेती है जब कलाकार सच्ची धारणा से प्रेरित होता है। यदि इसके उदाहरण जीवन में विरल हैं तो कला के क्षेत्र में भी विरल ही हैं।’’ वे आगे कहते हैं कि ‘तुम सब्जियों के रंग में सुंदरता क्यों नहीं देख पाते? और निरभ्र आकाश भी तो सुंदर है, लेकिन नहीं, तुम तो इंद्रधनुष के रंगों से आकर्षित होते हो, जो केवल एक दृष्टिभ्रम है। हमें यह मानने की शिक्षा दी गई है कि जो सुंदर है, उसका उपयोगी होना आवश्यक नहीं है और जो उपयोगी है, वह सुंदर नहीं हो सकता। मैं यह दिखाना चाहता हूं कि जो उपयोगी है, वह सुंदर भी हो सकता है।’’
इसमें कोई संदेह नहीं है कि महात्मा गांधी ने न केवल राजनीतिक मसलों का हल निकाला बल्कि कला और सौंदर्य का भी गहराई आकलन किया और इन दोनों तत्वों को जनोपयोगी तथा मानसिक विकास के लिए आवश्यक माना। इसीलिए वे मानते थे कि जो कला और सौंदर्य आमजन के मन में शांति, सुंदरता और जीवंतता का बोध कराए वही सच्ची कला और सौंदर्य है। महात्मा गांधी ने जितने सुंदर ढंग से कला और सौंदर्य की व्याख्या की है, उसे पढ़ कर ऐसा प्रतीत होता है जैसे कोई दार्शनिक विषय के मर्म को आत्मसात कर के अपने विचार व्यक्त कर रहा हो। महात्मा गांधी के इन विचारों को जाने बिना उनके वैचारिक व्यक्तित्व को पूरी तरह नहीं समझा जा सकता है।                                    ---------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 15.07.2026 को प्रकाशित) 
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