Thursday, August 31, 2023

बतकाव बिन्ना की | जो बे ओरें लाड़ली, सो हम ओरें का बिलौटियां आएं? | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | बुंदेली व्यंग्य | प्रवीण प्रभात

"जो बे ओरें लाड़ली, सो हम ओरें का बिलौटियां आएं?" - मित्रो, ये है मेरा बुंदेली कॉलम "बतकाव बिन्ना की" साप्ताहिक #प्रवीणप्रभात , छतरपुर में।
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बतकाव बिन्ना की  
जो बे ओरें लाड़ली, सो हम ओरें का बिलौटियां आएं?              
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
        ‘‘का हो गओ भौजी? ऐसो लग रओ के आपको मूड कछू खराब आए?’’ मैंने भौजी से पूछी। बे सूके-सुकाए हुन्ना ऐसे पटक-पटक के घड़ी कर रई हतीं मनो कोनऊं खों धोबीपछाड़ दे रई होंएं।
‘‘कछू तनक-मनक नोईं बिन्ना, हमाओ पूरो मूड खराब आए।’’ भौजी की आवाजई बता रई हती के उने कोनऊं बात को भौतई बुरौ लगो आए।
‘‘का हो गओ भौजी? जो मोसे कैबे जोग होय सो, कै डारो, जी हल्को हो जैहे।’’ मैंने भौजी खों पुटियाओ।
‘‘अब का कैं बिन्ना! देख नई रईं, के कित्तों गलत हो रओ।’’ गुस्सा के मारे भौजी को गलो भर आओ। मोय लगो के बे कहूं रोन ने लगें।
‘‘मनो हो का गओ, भौजी? को कर रओ गलत?’’ मैंने फेर के पूछी।
‘‘देख नई रईं? अबईं ई राखी पे बे लाड़ली बहना लोगन खों सस्तो गैस सिलेंडर दे दो गओ। उनके लाने पैलई फोकट के हजार रुपइया दए जा रए हते औ अब कै रए के बढ़ात-बढ़ात 3 हजार कर दए जैहें। जे सब देबे के लाने सरकार के पास कां से पइसा आहें? अपनई ओरन से ले-ले के दए जा रए। का अपन ओरें अंबानी-अडानी आएं के अपन से लेत जाएं औ उते देत जाएं।’’ भौजी ने अपने मन को गुबार बाहरे काढ़ दओ।
‘‘बात सो तुमाई ठीक आए भौजी, मनो करो का जा सकत आए? आप सो अपनी की सोच रईं, तनक मोय से पूछो के मो पे का गुजरी जो जब जे पढ़ी के उने कछू नईं मिलने जिनको ब्याओ नई भओ। अब आपई बताओ के अगर मोरो ब्याओ नई भओ सो ई में मोरो का दोष? चलो, मान लओ जाए के कोनऊं किस्मत को दोष रओ हुइए, तो बिन ब्याओ वारी बहनें का खात-पियत नईयां? का हम ओरन खों चूलो नईं जलाने परत का? के हम ओरें हवा पी के जीत रैत आएं। अब का भइया जे चात आएं के हजार-तीन हजार के लाने हम ओरें कोनऊं खों पकर के ऊसे ब्याओ कर लेवें? जे कां की बात भई?’’ मैंने भौजी खों अपने जी की पीरा बताई।
‘‘जेई पे तो हमें गुस्सा आ रओ, बिन्ना! बात हजार-तीन हजार से ऊपरे जा रई। इते अपन ओरन खों बारा सौ रूपइया में सिलेंडर मिलत आएं औ उते उन ओरन खों 4-5 सौं में दे रए। बे उनकी लाड़ली बहना आएं सो अपन ओरें का बिलौटियां आए? औ जो तुम कै रईं के ब्याओ वारी लुगाइयन खों मिल रए सो, बे बी सब खों नई मिल रए। हमें कां मिलत आएं? इन्ने पइसा जोड़-जोड़ के हमाए नांव पे जे घर बनवा दओ सो हम सोई कट्टस हो गए।’’ भौजी भिन्नात भई बोलीं।
‘‘बा दूसरी पार्टी कै रई के हम सबई खों देहें।’’ मैंने कई।
‘‘बे पैले आ तो जाएं! औ जो कऊं भूल-भटक के आ गए सो बे कां से दैहें? बे सोई अपनई ओरन खों बकरा बनेहैं।’’ भौजी ने बड़ी समझदारी की बात करी। फेर भौजी आगे बोलीं के-‘‘सबई भगवान के पूरे आएं। अपन ओरन को कोनऊं भलो ने करहे। उन्हें सौ रुपइया में मईना भर बिजली दई जाने, औ इते बत्ती बुझात-बुझात उंगरिया पिरान लगत आए। अबई परों की बात आए। तुमाए भैयाजी सो ठैरेई ऊंसई। उने कोन ध्यान रैत आए के कमरा से बाहरे जा रए सो बत्ती बुझात जाएं। बे परों गए ऊपरे ढबिया पे। उते की उन्ने बत्ती जलाई। अपनो जो कछू काम-वाम करो औ लौटत बेरा बत्ती जलत भई छोड़ के नैंचे चले आए। ने उने खबर, ने हमें खबर के उते ढबिया को बलब जल रओ। बा सो कल संझा की बिरियां कोनऊं काम से हमें ढबिया पे जानो परो सो हमाओ तो जी धक से रै गओ। हम समझ गए के जे बलब कल से जल रओ। हमने बलब बुझाओ और ऊंसई सदमा में नैंचे आए। हमाओ मों सफेद पर गओ रओ। जे देख के तुमाए भैयाजी घबड़ा गए। का हो गओ, का हो गओ पूछन लगे। हमें आओ गुस्सा। हमने कई के हमसे का पूछ रए? तुम कल ढबिया को बलब जलत छोड़ आए। अब भरियो बिल। अक्कल आ जेहे ठिकाने। सो, बे बोले भर देबी, मनो तुम अपने खों सम्हारो! कऊं तुमाओ ब्लडप्रेशर ने बढ़ जाए। जान आए सो जहान आए। बे हमें समझाबे की कोशिस कर रए हते औ हमाओ हो रओ हतो मुंडा खराब। हमने कई के सुनो अब बो जमानों नई रओ के जान आए सो जहान आए। अब सो जहान आए तोई जान आए, ने तो का धरो इते।’’
‘‘अरे अब हो गई, आपको ऐसो नई कओ चाइए हतो।’’ मैंने भौजी खों समझाओ।
‘‘हऔ, बा सो बाद में हमें सोई लगो के हमने कछू ज्यादा-सी बोल दई रई। अब भूल गए सो भूल गए। कभऊं हम सोई भूल सकत आएं। मनो करो का जाए, जो बिजली के बिल की सोचो तो मूंड़ भिन्न जात आए।’’ भौजी बोलीं।
‘‘खैर, जे सब छोड़ो आप! जे बताओं के भैयाजी कां गए?’’ मैंने भौजी से पूछी।
‘‘बे ललितपुर गए हैं, छोटी जिज्जी के इते। आत हुइएं। कै रए हते के पैलई बस पकर के लौट आहें। जेई साल छोटी जिज्जी के इते गमी हो गई रई, सो बे नईं आ सकत्तीं। जे बोले के हमई हो आएं। हमने बी कई के जे सो उनके इते की अनरय की राखी कहाई, सो आपई हो आओ। उनके इते ललितपुर में जो ऐसी अत्तें नई मचीं, जैसी अपने इते मचीं दिखा रईं। आज सुभैै हमाई फोन पे बात भई रई जिज्जी से। हमने उने लाड़ली बहना वारी अत्ते बताईं सो  बे कैन लगीं के हमाए इते ऐसो नईं हो रओ।’’
‘‘नईं भौजी! कोनऊं की सहायता करे में कोनऊं बुराई नईं, मनो फोकट में काय दे रए? उने काम देओ न। फेर काम के बदले पइसा देओ। जे मुफतखोरी की आदतें काय डार रए? औ इत्तई नहीं अब सो अपन लुगाइयन में फूट परन लगी दिखात आय के, देखों उने मिल रओ औ हमें नई मिल रओ। जो का आए? मनो काम देबे से जे हुइए के हमेसई पइसा देने परहे, औ जे सो चुनाव बाद बंद कर दें, सो का।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘औ का! बा मनरेगा बी तो चलत रई। काम के बदले अनाज टाईप की स्कीमें रईं। अब जे सो बिलकुलई ठलुआ बनावे खों काम चल रओ।’’ भौजी बोलीं।
हम ओरें अपनी-अपनी कै रईं हती के इत्ते में भैयाजी आ गए। बे बस से उतर के सीधे चलत आ रए हते।
‘‘जे नंद-भौजाई की का बतकाव चल रई?’’ आतई साथ भौयाजी ने पूछी।
‘‘कछू नईं! औ आपकी यात्रा कैसी रई? बस से लौटे?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘हऔ! रेल सो संझा खों मिलती, बस हती, सो हम कढ़ आए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘औ जिज्जी कैसी आएं?’’ मैंने पूछी।
‘‘ठीक! बाकी उनके इते अनरय को त्योहार रओ सो ज्यादा कछू हल्ला-गुल्ला नई रओ। रखाी बंधाई, पांव पूजे और रुपैया-धेला पकरा के लौट आए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘बे आप से कछू कै रई हतीं?’’ भौजी ने भैयाजी से पूछी।
‘‘काय की?’’
‘‘कछू बी!’’
‘‘हऔ, तुमसे उनकी बात भई रई सुभैै, तभई से उनको दौरा सो परो औ बे कैन लगीं के का ऐसा नईं हो सकत के हमें सोई लाड़ली बहना को लाभ दिला देओ। हमने उनके लाने समझाई के ऐसो नईं हो सकत। तुम अब यूपी की निवासी आओ, एमपी को कोनऊं लाभ तुमे नई मिल सकत। बे कैन लगीं के तुमाए इते अच्छो आए। सो हमने कई के काय को अच्छो, तुमाए इते पेट्रोल कम को मिलत आए, जबकि हमाए इते ईसे मैंगो मिलत आए। सो जिज्जी, जे आप तनक-मनक की सल्ल में ने परो। तुमाई भौजी खों कछू नईं मिल रओ, सो तुमें कां से मिल जैहे? ई तरहा हमने उने समझाओ। ने तो बे संगे आबे खों उधारी खाई बैठी हतीं।’’ भैयाजी बोले।
‘‘अच्छो करो आपने के उने समझा दओ। अबईं हम ओरें जेई तो बतकाव कर रए हते के जो लाड़ली बहना उनके लाड़ली ठैरीं, सो हम ओरें का बिलौटियां आएं?’’ भौजी मों सो बनात भई बोलीं। मनो भैयाजी ने जो बिलौटियां होबे की सुनी, सो हंसत-हंसत उनको पेट पिरान लगो। उने खूबई मजो आओ जे सुन के।  बाकी हम दोई बी कां तक रोत रैतीं, सो हमें सोई हंसी आन लगी। काए से के बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!
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Wednesday, August 30, 2023

चर्चा प्लस | रक्षाबंधन की पौराणिक कथाएं और लोकगीत | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस 
रक्षाबंधन की पौराणिक कथाएं और लोकगीत
    - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                        
          हमारा देश त्यौहारों का देश है। जितने धर्म उतने त्यौहार। अकेले हिन्दू धर्म में ही अनेक त्यौहार हैं और उन त्यौहारों से जुड़ी असंख्य कथाएं हैं। इनमें रक्षाबंधन एक ऐसा त्योहार है जो मानवीय संबंधों को सात्विक दृढ़ता प्रदान करता है। यह भाई-बहन का त्यौहार है। यह आवश्यक नहीं है कि भाई-बहन रक्तसंबंधी ही हों। मुंहबोले भाई बबहनोके लिए भी रक्षा बंधन का उतना ही महत्व है जितना रक्तसंबंधी भाई बहनों के लिए। दिलचस्प बात यह है कि यदि रक्षाबंधन की पौराणिकता को खंगालें तो पता चलता है कि जहां से रक्षाबंधन की परम्परा का आरम्भ माना जाता है, वे रक्तसंबंधी भाई-बहन नहीं थे। तो चलिए देखते हैं उन पौराणिक कथाओं को।
‘‘रक्षाबंधन’’ शब्द से ही स्पष्ट है कि रक्षा संकल्प के साथ जुड़ा रिश्ते का बंधन। बहन भाई को रक्षासूत्र अथवा राखी बांधती है तथा उससे यह आशा करती है कि उसका भाई चाहे सगा हो या मुंहबोला हो, उसकी राखी के वचन को निभाएगा तथा बहन पर संकट आने पर उसे बचाएगा, बहन की रक्षा करेगा। भारतीय संस्कृति में वचनों एवं प्रण का बहुत महत्व रहा है। किसी भी आयु का बालक, युवक या पुरुष जब किसी बालिका, युवती अथवा स्त्री को अपनी बहन मान कर राखी बंधवाता है तो वह जीवनपर्यन्त उसे अपनी सगी बहन की तरह मान देने तथा उसकी रक्षा करने के लिए वचनबद्ध हो जाता है। और किसी संस्कृति में रक्षाबंधन जैसा त्यौहार नहीं है। फिर भी कई बार यह प्रश्न उठता है कि रक्षाबंधन का त्यौहार कब से आरम्भ हुआ क्योंकि प्रचीन साक्ष्यों में इसके ठोस प्रमाण नहीं मिलते हैं। किन्तु यह याद रखा जाना चाहिए कि हमारा प्राचीन इतिहास वेदों और पौराणिक ग्रंथों में निहित है। हमारे प्रचीन भारत में इतिहास को इतिहास की भांति नहीं लिखा गया अपितु कथाओं की भांति सहेजा गया।

रक्षा बंधन का त्यौहार श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। उत्तरी भारत में यह त्यौहार भाई-बहन के अटूट प्रेम को समर्पित है और इस त्यौहार का प्रचलन सदियों पुराना बताया गया है। इस दिन बहने अपने भाई की कलाई पर राखी बाँधती हैं और भाई अपनी बहनों की रक्षा का संकल्प लेते हुए अपना स्नेहाभाव दर्शाते हैं।

देवासुर संग्राम की कथा
रक्षाबंधन के त्यौहार का आरम्भ कुछ लोग देवासुर संग्राम की कथा के आधार पर मानते हैं। वह समय जब सभी देवता और राक्षस स्वर्ग में अपना वर्चस्व स्थापित करने की योजना बना रहे थे। इसी वर्चस्व को सिद्ध करने के लिए समुद्र मंथन की योजना बनाई गई। महाभारत आदि पर्व अध्याय 19 के अनुसार देवताओं द्वारा असुरों के संहार की कथा का वर्णन इस प्रकार है- देवता और असुर दोनों ही प्रजापति की सन्तान हैं। इन लोगों का आपस में युद्ध हुआ था, जिसे ‘‘देवासुर संग्राम’’ कहा जाता है। समुद्र मंथन में अमृत घट निकलने पर भगवान नारायण ने मोहिनी रूप धारण करने के बाद केवल देवताओं को अमृत पान कराया तो इस कारण सभी दैत्य और दानव रुष्ट हो गये। वे अस्त्र-शस्त्र लेकर देवताओं पर टूट पड़े। इससे ठीक पहले जिस समय देवता उस अभीष्ट अमृत का पान कर रहे थे, ठीक उसी समय, राहु नामक दानव ने देवता रूप में आकर अमृत पीना आरम्भ किया। वह अमृत अभी उस दानव के कण्ठ तक ही पहुँचा था कि चन्द्रमा और सूर्य ने उसका भेद खोल दिया। तब चक्रधारी भगवान विष्णु ने अमृत पीने वाले उस दानव का मस्तक चक्र द्वारा काट दिया। यह देख कर देवताओं और दानवों के बीच युद्ध छिड़ गया। स्वर्गलोक पर असुरों का आक्रमण बहुत ही भयानक था। और, स्वर्ग में सभी देवताओं की हार के बाद, वे सभी भगवान शिव के पास गए और मदद की गुहार लगाई। यह श्रावण पूर्णिमा थी जब स्वर्ग से सभी देवता भगवान शिव के पास गए और इस समस्या का समाधान खोजने के लिए प्रार्थना की। देवी पार्वती प्रार्थना कर रही थीं कि इस देवसुर युद्ध में स्वर्ग के सभी देवताओं को विजय प्राप्त हो। इसलिए माता पार्वती ने सभी स्वर्गीय देवताओं की कलाइयों पर रक्षा का पवित्र धागा बांध दिया और उन्हें असुरों पर विजय प्राप्त करने का आशीर्वाद दिया। देवासुर का दांव स्वर्गीय देवताओं के साथ लगभग हजारों वर्षों तक जारी रहा। और अंत में, स्वर्ग से देवताओं को इस युद्ध में विजय प्राप्त हुई। इस प्रकार दुवासुर की लड़ाई जीतकर इंद्र को भी अपना सिंहासन वापस मिल गया। सभी देवता भगवान शिव और माता पार्वती को रक्षा धागा बांधने के लिए धन्यवाद देने के लिए कैलाश गए। उस दिन, भगवान शिव ने घोषणा की कि हर कोई पूर्णिमा दिवस को रक्षाबंधन के त्योहार के रूप में मनाएगा। और, इसलिए, हम सभी रक्षाबंधन का शुभ त्योहार मनाते हैं।

राजा बलि की कथा
प्राचीन काल में जब राजा बलि अश्वमेध यज्ञ करा रहे थे। उस समय भगवान विष्णु ने राजा बलि को छलने के लिए वामन अवतार लिया और राजा बलि से तीन पग धरती दान में मांगी। उस समय राजा बलि ने सोचा कि यह ब्राह्मण तीन पग में भला कितनी जमीन नापेगा और उन्होंने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। देखते ही देखते वामन रुप धारण किए हुए विष्णु जी का आकार बढ़ने लगा और उन्होंने दो पग में ही सब नाप लिया। उस समय तीसरे पग में राजा बलि ने स्वयं को ही सौंप दिया और विष्णु जी ने राजा बलि को पाताल लोक दे दिया। उस समय बलि ने भगवान विष्णु से एक वचन मांगा कि वो जब भी देखें तो सिर्फ विष्णु जी को ही देखें और विष्णु जी ने तथास्तु कहकर वचन को पूर्ण कर दिया। अपने वचन के अनुसार भगवान ने तथास्तु कह दिया और पाताल लोक में रहने लगे। इस पर माता लक्ष्मी जी को अपने स्वामी विष्णु जी की चिंता होने लगी। उसी समय लक्ष्मी जी को देवर्षि ने एक सुझाव दिया जिसमें उन्होंने कहा कि वो बलि को अपना भाई बना लें और अपने स्वामी को वापस ले आएं। उसके बाद माता लक्ष्मी स्त्री का भेष धारण करके रोटी हुई पाताल लोक पहुंचीं।
इस पर राजा बलि ने उनके रोने का कारण पूछा उनके पूछने पर लक्ष्मी जी ने कहा कि मेरा कोई भाई नहीं, इसलिए में अत्यंत दुखी हूं। तब बलि ने कहा कि तुम मेरी धर्म बहन बन जाओ। इसके बाद लक्ष्मी जी ने राजा बलि को राखी बांधकर अपने स्वामी भगवान विष्णु को वापस मांग लिया। ऐसी मान्यता है कि उसी समय से रक्षाबंधन का त्योहार चलन में आया।

यम और यमुना की कथा
एक कथा यह भी प्रचलित है कि रक्षा बंधन का त्यौहार मृत्यु के देवता यम और नदी यमुना की भेंट से आरंभ हुआ। यह माना जाता है कि यम और यमुना परस्पर भाई-बहन हैं। किन्तु एक बार बारह वर्ष तक यम और यमुना की आपस में भेंट नहीं हो सकी। यमुना दुखी रहने लगी कि उसका भाई यम उससे मिलने क्यों नहीं आया। उसे लगा कि उसका भाई उसे भूल गया है। यमुना को दुखी देख कर गंगा ने उससे दुख का कारण पूछा। यमुना ने गंगा को अपने दुख का कारण बता दिया। उन्हीं दिनों गंगा की यम से भेंट हो गई। गंगा ने यम को यमुना के दुख का कारण बता दिया। तब यम को भी अपनी भूल का अहसास हुआ और वह यमुना से मिलने तत्काल चल पड़ा। जब यमुना ने यम को देखा तो उसकी प्रसन्नता का ठिकाना नहीं रहा। लेकिन उसने उलाहना दिया कि वह अपनी बहन को कैसे भूल गया? तब यम ने बताया कि उसे पृथ्वीलोक के इतने सारे मनुष्यों के बारे में सोचना पड़ता है कि वह कई दूसरी बातें भूल जाता है। तब यमुना को एक युक्ति सूझी और उसने यम की कलाई पर रेशमी धागे बंाधते हुए कहा कि ‘‘ये धागे तुम्हें अपनी इस बहन की याद दिलाते रहेंगे।’’ बदले में यम ने अपनी बहन यमुना को अमरता का आशीर्वाद दिया। तभी से रक्षाबंधन का त्यौहार मनाया जाने लगा।

श्रीकृष्ण और द्रौपदी की कथा
कथा के अनुसार श्री कृष्ण ने महाभारत में द्रौपदी को अपनी बहन के रूप में स्वीकार किया और इसकी कथा के अनुसार भगवान श्री कृष्ण ने जब अपने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का वध किया, तब उनकी कनिष्ठा ऊंगली कट गई जिससे भगवान कृष्ण की उंगली से रक्त की धार बहने लगी। उस समय द्रोपदी ने अपने साड़ी के चीर के एक टुकड़े को श्रीकृष्ण की ऊंगली पर बांध दिया। इसके बाद से ही श्री कृष्ण ने द्रौपदी को अपनी बहन के रूप में स्वीकार किया और हर संकट की परिस्थिति में उनकी रक्षा करने का वचन दिया। उसी वचन की वजह से भरी सभा में श्री कृष्ण ने द्रौपदी को दुर्योधन के द्वारा चीर हरण होने से बचाया था। बहन द्वारा बांधी गई कपड़े की छोटी-सी पट्टी के बदले कृष्ण ने द्रौपदी को अनंत चीर प्रदान किया था जिसे खंचते-खींचते दुश्शासन थक गया था किन्तु चीर समाप्त नहीं हुआ था।

ये सभी कथाएं अपने-अपने ढंग से लोक साहित्य में भी मौजूद हैं। बुंदेली लोकगीत में बड़े रोचक ढंग से इन कथाओं का उल्लेख किया जाता है। एक गीत के बोल देखिए जिसमें ससुराल में रह रही बहन अपने भाई के लिए निवेदन भरा गीत गा रही है कि -
चाए देव लड़े, चाए दानव
भैया तुम तो आ जइयो।।
अमरित पी के देव अमर भए
दानव लड़-लड़ मर गए
दद्दा-बऊ को ध्यान राखियो
उने सबई दे अइयो।
चाए देव लड़े, चाए दानव
भैया तुम तो आ जइयो।।
इसी तरह एक और बुंदेली लोकगीत है जिसमें कृष्ण और द्रौपदी की कथा कही गई है-
बहना को कभऊं ने बिसारियो
चाए भौजी को माउर बिसारियो।।
कान्हा की कट गई उंगरिया हती
सो रानी ने पटरानी, बहना द्रौपदी ने
अपनों पल्लू खों फाड़ पट्टी बांधी रई
सो, बहना को कभऊं ने बिसारियो
चाए भौजी को माउर बिसारियो।।
जेई से तो कान्हा ने लाज राख लई
खेंच-खेंच थक गओ दुस्सासन उते
कान्हा ने द्रौपदी की चीर बढ़ा दई
सो, बहना को कभऊं ने बिसारियो
चाए भौजी को माउर बिसारियो।।
इस प्रकार के अनेक लोकगीत हैं जिनमें इन पौराणिक कथाओं का स्मरण करा कर बहने अपने भाई से रक्षाबंधन पर राखी बंधवाने आने तथा रक्षा का  अपना वचन निभाने का आग्रह करती हैं। अर्थात् जब बात रक्षाबंधन जैसे त्यौहार की हो तो पुराण और लोक एकाकार हो जाते हैं।
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पुस्तक समीक्षा | एक फाॅरेस्ट ऑफिसर के रोचक संस्मरणों का रोचक सफ़रनामा | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

प्रस्तुत है 29.08.2023 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई लेखक प्रेम नारायण मिश्रा की पुस्तक "उद्गार: एक फाॅरेस्ट  ऑफिसर  का सफ़रनामा" की समीक्षा।
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पुस्तक समीक्षा
एक फाॅरेस्ट ऑफिसर  के रोचक संस्मरणों का रोचक सफ़रनामा
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक     - उद्गार: एक फाॅरेस्ट  ऑफिसर  का सफ़रनामा
लेखक     - प्रेम नारायण मिश्रा
प्रकाशक    - आईसेक्ट पब्लिकेशन ई-7127, एस.बी.आई. अरेरा कॉलोनी भोपाल-462016
मूल्य       - 300/-
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प्रेम नारायण मिश्रा साहित्य जगत के लिए एक नया नाम कहा जा सकता है किन्तु उनके वे अनुभव पुरातन एवं दीर्घकालिक हैं जिन्हें उन्होंने अपनी पुस्तक के रूप में प्रस्तुत किया है। डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर से विज्ञान विषय से स्नातक करने के बाद प्रेम नारायण मिश्रा ने फॉरेस्ट रेंजर कॉलेज कोयंबटूर से दो वर्ष की तकनीकी शिक्षा संबंधी डिग्री प्राप्त की। वन विभाग के अधिकारी पद पर रहते हुए उन्होंने पूर्व मध्य प्रदेश में वनों का निकटता से गहन अध्ययन एवं भ्रमण कर वनवासियों का सान्निध्य, वन्य प्राणियों की निकटता से अनुभूति का दीर्घ अनुभव प्राप्त किया। सेवानिवृत्ति के उपरान्त संस्मरण के रूप में अपने अनुभवों को लेखबद्ध किया है ‘‘उद्गार: एक फाॅरेस्ट ऑफिसर का सफरनामा’’ में।
जंगल हमें लुभाते हैं। अपने पास बुलाते हैं। साथ ही रहस्मयमय भी लगते हैं। शहरी क्षेत्र के लोगों के लिए वन, वनोपज, वनवासी ये तीनों सदैव कौतूहल का विषय होते हैं। किन्तु एक बार जिसने वन को करीब से देख लिया, वह उसे कभी विस्मृत नहीं कर पाता है। वन की प्राकृतिक विशेषताएं चेतन मन पर ही नहीं, वरन अवचेतन मन पर भी अपनी छाप छोड़ जाती हैं। ‘‘उद्गार: एक फाॅरेस्ट आफीसर का सफरनामा’’ जब मेरे हाथों में आई तो मेरी अनेक स्मृतियां ताज़ा हो उठीं। मेरा जंगल से विशेष संबंध रहा है। मेरा बचपन पन्ना के सघन वन में घूमते, उसे महसूस करते व्यतीत हुआ। किशोरावस्था में मनेन्द्रगढ़ के निकट के जंगलों विशेषरूप से ग्राम बिजुरी से मनेन्द्रगढ़ के बीच विस्तारित बोरीडण्ड के जंगलों में तेंदू के वृक्षों, फलों और भालुओं के बारे में जानने का अवसर मिला। बुंदेलखण्ड के सागौन के सरसराते वनों से हर्र, बहेरा, आंवला, तेंदू आदि के वृक्षों वाले मनेन्द्रगढ़ के वनों का सफर मेरे जीवन में नए अध्याय जोड़ता गया। सतपुड़ा के जंगल भी निकट से देखे हैं। पन्ना नेशनल पार्क को बनते देखा तो कान्हा नेशनल पार्क को विकसित अवस्था में देखा। इसीलिए जब यह पुस्तक मेरे हाथों में आई तो कई ऐसे परिचितों एवं मित्रों की भी स्मृतियां ताज़ा हो गईं जो वन विभाग में सेवारत थे। इस संदर्भ में प्रेम नारायण मिश्रा की यह पुस्तक जिन्होंने वन को निकट से नहीं देखा उन्हें वनों की सैर कराती है, जिन्होंने वनों को महसूस किया है, उनकी स्मृतियां जगा देती है। इस पुस्तक में वन विभाग में सेवारत रहते हुए आने वाली परेशानियों का भी विवरण है क्योंकि वे सभी उनकी स्वयं की झेली हुई परेशानियां हैं।
प्रेम नारायण मिश्रा के संस्मरण बचपन से आरम्भ होते हैं और शिक्षा, नौकरी के छोटे-बड़े अनुभवों से गुज़रते हुए सेवानिवृत्ति पर समाप्त होते हैं। यथार्थ भी यही है कि कैरियर की नींव अप्रत्यक्ष रूप से बचपन में ही पड़ने लगती है तथा एक नौकरीपेशा व्यक्ति के नौकरीकाल के अनुभवों का दौर उसकी सेवानिवृत्ति के साथ ही विराम की अवस्था में पहुंच जाता है। इसके बाद आरम्भ होता है जीवन का अगला, भिन्न अनुभवों वाला सेवानिवृत्ति का समय। चूंकि लेखक ने ‘‘एक फाॅरेस्ट ऑफिसर का सफरनामा’’ लिखा है अतः स्वाभाविक रूप से सेवानिवृत्ति पर पहुंच कर सफरनामा थम जाता है। लेखक मिश्रा ने अपने संस्मरणों को 16 अध्यायों में लेखबद्ध किया है।
पहले अध्याय में है बचपन, किशोरावस्था, ग्रामीण परिवेश, दादा-दादी का दुलार, वरिष्ठ कुटुम्बियों का सहयोग, कृषि की मोहकता, प्रारंभिक शिक्षा एवं विश्वविद्यालय की शिक्षा एवं माहौल का चित्रण। दूसरे अध्याय में कोयंबटूर वन विद्यालय में प्रशिक्षण के दो वर्षों का विवरण एवं बस्तर में पदस्थिति पर प्रारंभिक क्षेत्रीय प्रशिक्षण के स्थानों एवं कार्यों का विवरण है। इस अध्याय में लेखक ने बड़े सुंदर शब्दों में जानकारी दी है कि -‘‘देहरादून और कोयंबटूर फॉरेस्ट्री के दो ऐसे तीर्थस्थल हैं जहां जितनी बार भी जाओ कुछ नया सीखने को मिलता है। इस दौरान श्रीप्रकाश को समझ में आया कि शैक्षणिक बौद्धिकता और प्रशिक्षण की बौद्धिकता में क्या अंतर है। शैक्षणिकता जमीन है। प्रशैक्षणिक योग्यता आसमान है। जमीन से उठकर आसमान के सितारों का भ्रमण बगैर प्रशिक्षण संभव नहीं है। प्रशिक्षण के बाद बस्तर में वन अधिकारी की पदस्थिति हुई। प्रकृति ने दुत्कारा भी, पुचकारा भी।’’
इसी दूसरे अध्याय में वे अपने कुछ अनुभव इस प्रकार बताते हैं कि-‘‘केशकाल सिर्फ बसों का मेजबान था और कुछ फारेस्ट के उपज के व्यापारियों के मकान थे। रेस्ट हाउस फारेस्ट का अंग्रेजों के समय का था आलीशान। कोंडागाँव, दण्डकारण्य प्रोजेक्ट स्थापित था, रोशनी दिखी और बस्ती भी। बस्तर तो ऐसा गाँव था कि बस भी नहीं रुकती थी, लेकिन जगदलपुर 15 किमी ही था । सड़क बस, बैलगाड़ी के रास्ते से प्रथम श्रेणी ही आगे बड़ी थी। जगदलपुर ही एक ऐसा स्थान था जिसे राजा भंजदेव के पूर्वजों ने बसाया था। एक जिला मुख्यालय जगदलपुर जिसकी सीमा महाराष्ट्र को छूती 300 किमी की दूरी पर, आंध्रा तक 200 से 250 किमी, रायपुर 250 किमी, उड़ीसा 50 किमी थी। इंद्रावती नदी के किनारे बसी यह बस्ती छोटी ही थी। राजा का भवन, रेस्टहाउस, हवाई पट्टी यहाँ के आकर्षण थे। केवल एक्की दुक्की शासकीय बसें ही चारों ओर से संपर्क बनाती थी। भोपालपटनम 200 किमी से अधिक दूर जिससे आगे गोदावरी आंध्रा की एवं महराष्ट्र की सीमा बनती थी। 200 किमी कोंटा में कोलाव आंध्रा एवं उड़ीसा की सीमा बनाती और आगे भद्राचलम गोदावरी के तट पर आंध्रा का तालुक था। बस्तर बहुत बड़े भूखण्ड वाला इलाका था जिसमें अस्सी प्रतिशत फारेस्ट था और लगभग बीस प्रतिशत वर्जिन फारेस्ट था, जो मानवीय गतिविधि से अछूता था। सभी प्रकार के वन्य जीव प्रजातियाँ यहाँ उपलब्ध थी समूचे भूखंड की आबादी सिर्फ 10 लाख थी।’’
तीसरे अध्याय में जगदलपुर मुख्यालय परिक्षेत्र में पदस्थिति पर वहाँ के कार्यों, भौगोलिकता, क्षेत्रीय जनता एवं सहयोगी कर्मचारियों का विवरण है। चैथे अध्याय प्रथम प्रभारी अधिकारी के रूप में भानपुरी परिक्षेत्र में व्यतीत हुए जीवन की कहानी। वहां लेखक लगभग ढाई वर्ष कर्तव्यस्थ रहे थे। उस समय की एक लोमहर्षक घटना का विवरण इस चैथे अध्याय में लेखक ने दिया है-‘‘एक ठंडी रात की याद, सवारी बुलेट रॉयल एनफील्ड की, दहिकोंगा से मुनगापदर जाकर कैंप करना था। सुबह बाजार के दिन हुर्रा, महुआ की खरीद विभागीय तौर पर करानी थी। साथ में दूसरी बुलेट पर पुलिस सब इन्स्पेक्टर भानपुरी थाना के प्रभारी थानेदार श्री टी.एल. तारन पीछे-पीछे थे। पहाड़ी रास्ता समाप्त होने पर मुनगापदर ग्राम के नजदीक पहुँचने पर श्रीप्रकाश ने कुछ आश्वस्त होकर रफ्तार तेज कर गाड़ी चलाने लगे। रास्ते में रेत वाला एक पेच था। चूँकि रास्ता खाली था, श्रीप्रकाश को ध्यान ही नहीं रहा कि वह कब इस सोच में डूब गए कि कैंप आने वाला है, आराम से रिलेक्स करेंगे, थानेदार से गपशप होंगी, आगे क्या करना है, आदि। ध्यान ही नहीं रहा कि जमीन कैसी है, एक्सेलरेटर खिंचता रहा और ध्यान हटा और दुर्घटना घटीश् कि कहावत असल में चरितार्थ हो गई। रेत में गाड़ी पूरी चारों तरफ घूम गई और बुलेट की डिक्की एक तरफ और श्रीप्रकाश दूसरी तरफ। गाड़ी वजनदार थी और रास्ते पर ही रही। एक विशालकाय वृक्ष के तने से टकराकर श्रीप्रकाश धराशायी हो गए।’’

पांचवें अध्याय में 1972 से 1974 तक गोलापल्ली रिजर्व फॉरेस्ट स्टेट के प्रभारी अधिकारी रहते हुए बिताए गए समय का लेखाजोखा है जिसमें दुरूह-दुर्गम आंतरिक वन क्षेत्रों का लोमहर्षक विवरण है। छठें अध्याय में कोंटावन परिक्षेत्र अधिकारी के रूप में अनूभूत वर्ष 74-75 की जीवन का वृत्तांत है। सातवें अध्याय में वन्यअंचल गीदम परिक्षेत्र के वर्ष 1976 की रोचक घटनाएं सहेजी हैं। आठवें अध्याय में तोंगपाल परिक्षेत्र की भौगोलिक स्थिति एवं कार्य से जुड़े संस्मरण है। नौवें अध्याय में बुंदेलखंड वनपरिक्षेत्र में वर्ष 1980 में छतरपुर जिले के बक्सवाहा परिक्षेत्र के कार्यकाल का विवरण है। यह वहीं बक्सवाहा परिक्षेत्र है जहां के वनक्षेत्र में हीरों के भंडार पाए जाने का पता चला। सन् 2021 में राज्य सरकार ने एक निजी कंपनी को बक्सवाहा के जंगलों की कटाई करने की अनुमति दे दी है। अनुमान के अनुसार पता चला कि 382.131 हेक्टेयर के इस जंगल क्षेत्र के कटने से 40 से ज्यादा विभिन्न प्रकार के दो लाख 15 हजार 875 पेड़ों को काटना होगा। इससे इस क्षेत्र में रहने वाले लाखों वन्य जीवों के प्राकृतिक आवास पर भी असर पड़ेगा। इस पर पर्यावरणविदों ने विरोध जताते हुए ग्रील ट्रिब्यूनल की मदद ली। लिहाजा कोर्ट के आगामी आदेश तक पेड़ न काटे जाने का आदेश पारित किया गया। इसी बक्सवाहा परिक्षेत्र में लेखक प्रेम नारायण मिश्रा ने वन्यजीवन के अनेक अनुभव प्राप्त किए जिन्हें उन्होंने सहजता से साझा किया है। बक्सवाहा एक ऐसा क्षेत्र है जिसने एक समय डाकुओं के आतंक को भी झेला था। लेखक श्री मिश्रा ने अपने तत्कालीन संस्मरण में लिखा है कि -‘‘मार्च 80 में छतरपुर जिले में बक्सवाहा क्षेत्र के जंगलों की सुरक्षा एवं दोहन कार्यों हेतु एवं तात्कालिक वनसंवर्धन कार्यों के सम्पादन हेतु प्रभारी अधिकारी की नियुक्ति हुई। यह क्षेत्र डाकुओं की स्थली थी। मुख्य डाकुओं के आत्मसमर्पण के पश्चात भी डाकुओं का अंत नहीं हुआ था। गैंग क्षेत्रवार वरदातें करती रहतीं थी। श्रीप्रकाश के इस दौरान ढाई वर्ष लगभग 8 स्थानांतरण हुए, ज्योतिष की जानकारी रखने वाले उनके साथी कहते हैं कि शनि की अढैया की बदौलत यह सब हुआ। इस दरम्यान श्रीप्रकाश ने बच्चों को पत्नी के साथ सागर में पत्नी के पिता के संरक्षण में छोड़ रखा था। पिछले ढाई वर्ष से अकेले ही विभिन्न जगहों पर रहते रहे। भोपाल में लाज होटल में, हरदा में लाज में इसी प्रकार अन्य जगहों में । बक्सवाहा में शासकीय आवास में अकेले ही रहे। विभागीय कालोनी अलग-थलग थी। आवास, रेस्ट हाउस, कर्मचारियों के आवास, कार्यालय, एवं प्रांगण में ही पानी के लिए कुँआ है। यहाँ नायब तहसीलदार, पहले सब इन्स्पेक्टर, फिर इन्स्पेक्टर थानेदार, अस्पताल में दो डॉक्टर ब्लाक ये सब बस्ती से सड़क के दूसरी तरफ थे। अक्सर सभी शाम को, श्रीप्रकाश जब मुख्यालय पर रहते तो इकट्ठे होते। यह बक्सवाहा के अधिकारियों का एक होने का स्वर्णिम काल था। अच्छे लोग भी संयोग से वहाँ इकट्ठे हो गए थे।’’

दसवें अध्याय में सागर स्थित नौरादेही अभ्यारण के प्रारंभिक कार्यकाल की झलक एवं जिला ग्रामीण विकास परियोजना (डी.आर.डी.ए.) के एक वर्ष की प्रतिनियुक्ति के कार्यकाल के अनुभवों का रोचक प्रस्तुतिकरण है। ग्यारहवें अध्याय में उस समय के संस्मरण है जब श्री मिश्रा गुना जिले में बतौर उप-वनमण्डल अधिकारी कार्यरत थे।  बारहवें अध्याय में शहडोल जिले में बतौर उप-वनमण्डल अधिकारी के कार्यकाल का विवरण है। तेरहवें अध्याय में उप-वनमंडल मनेन्द्रगढ़ जिला सरगुजा के कार्यकाल के दौरान के अनुभवों सहित उस वनपरिक्षेत्र के आंतरिक आंचलों का विवरण है। चैदहवें अध्याय में सागर जिले के सामाजिक वानकी के सेवाकाल के अंतिम समय के संस्मरण तथा उसी काल में किए गए अन्य कार्यों की जानकारियां हैं। चैदहवें अध्याय में लेख ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण टीप की है जो वर्तमान परिदृश्य को सामने रखते हुए मन को झकझोरती है-‘‘ दरअसल कोई सोच नहीं हैं, कोई सिद्धांत नहीं है, देश के विकास की, देश के नागरिकों को संस्कारित करने की। कोई ऐसा आदर्श ही नहीं है देश की युवा पीढ़ी के लिए जिसका अनुसरण वह कर सके। सिनेमा के नायक आदर्श बन रहे हैं। उच्छृंखलता, असंस्कारिता बढ़ रही है। नागरिकता उसूलों की जानकारी शून्य हो गई है। जिसकी लाठी उसकी भैंस पूरी तरह चरितार्थ हो गई है। यदि नौकरशाही किसी प्रकार चाहे भी कुछ   नियमों को पालन करने की तो टुटपुँजिये नेता आड़े आ जाते हैं। जो ओहदों वाले नेताओं की चापलूसी कर अपना पूरा व्यवसाय अनैतिक ही चलाते हैं। चाहे किसी प्रकार हो और इस प्रकार जो होना चाहिए, उसकी कल्पना ही नहीं की जा सकती। शॉर्टकट हर जगह जैसे भी संभव हो। इस कारण देश की बुनियादी तरक्की न होकर आडंबरी और कँगूरे चमकने वाली उन्नति हो रही थी।’’

पंद्रहवां अध्याय पूर्वावलोकन का है जिसमें महत्वपूर्ण एवं सुरम्य स्थलों के प्रति अपने अनुभवों एवं दृष्टिकोण को लेखक ने प्रस्तुत किया है। अंतिम सोलहवें अध्याय में उपसंहार के रूप में वर्ष 2020-22 तक के आने वाले बदलाव का एहसास तथा अन्य सामयिक विचारों को पिरोया है।

वन्यजीवन तथा वन्य जीवन से जुड़े अनुभवों में रुचि रखने वालों के लिए यह पुस्तक विशेष महत्व रखती है। यूं भी संस्मरण सच्चाई की देहरी से हो कर गुज़रते हैं अतः उनमें एक गहरा यथार्थबोध होता है जो किसी छायाचित्र के सामन पाठक के सामने प्रस्तुत होता है और खट्टे, मीठे, कड़वे अनेक स्वाद का रस्वादन करा देता है। लेखक प्रेम नारायण मिश्रा एक परंपरागत लेखक नहीं हैं अतः अपने अनुभवों को लेखबद्ध करने में उनकी प्रस्तुतिकरण की शैली वाचिक प्रतीत होती है, गोया कोई अपने अनुभव कह कर सुना रहा हो। इससे यह पुस्तक और अधिक रोचक हो उठी है। आज जब वनसंपदा गहरे संकट में है, पर्यावरण और जलवायु भी वनों के घटते क्षेत्रफल के कारण संकट से घिर गए है, ऐसे दौर में यह पुस्तक पाठकों को जंगलों से जोड़ने का काम कर सकती है।  इस पुस्तक को कम से कम एक बार जरूर पढ़ा जाना चाहिए क्योंकि क्योंकि इसमें आत्मावलोकन का तीव्र आग्रह भी है।     
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Sunday, August 27, 2023

भजन संध्या | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

27.08.2023, आज शाम समाजसेवी राजनेता श्रीमती निधि जैन जी एवं पूर्व विधायक श्री सुनील जैन जी द्वारा आयोजित भजन संध्या कार्यक्रम में शामिल होकर भक्तिमय वातावरण का भरपूर आनंद लिया। शहर की अनेक परिचित महिलाओं से भेंट करने का अवसर भी प्राप्त हुआ। वस्तुतः यह आयोजन एक आनंदोत्सव के समान था।
   🚩 इस सद्भावना पूर्ण सुमधुर आयोजन के लिए श्रीमती निधि जैन जी को हार्दिक धन्यवाद💐
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डॉ. सीरोठिया जी को सम्मान भेंट | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

 27.08.2023 आज दोपहर बाद सेवानिवृत्त वरिष्ठ चिकित्सक तथा गीतकार डॉ श्याम मनोहर सीरोठिया जी को मध्यप्रदेश हिन्दी लेखिका संघ सागर इकाई की अध्यक्ष श्रीमती सुनीला सराफ ने मेरे तथा डॉ ज्योति चौहान के साथ उनके निवास पर जाकर "रामकौर स्मृति अलंकरण" प्रदान किया।
    दरअसल, डॉ सीरोठिया जी को यह सम्मान हिन्दी लेखिका संघ मध्यप्रदेश ईकाई दमोह  के वार्षिकोत्सव एवं अलंकरण  समारोह 2023 में प्रदान किया जाना था किंतु उनके अचानक सड़क दुर्घटना में घायल हो जाने के कारण वे दमोह नहीं जा सके अतः उनका सम्मान सागर इकाई के अध्यक्ष द्वारा ग्रहण कर उन्हें प्रदान किया गया।
    डॉ सीरोठिया जी को सम्मान हेतु हार्दिक बधाई 💐 एवं शीघ्र स्वास्थ होने की दुआ 🙏
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केक काट कर मनाया "पत्रिका" का नौवां स्थापना दिवस | डॉ (सुश्री ) शरद सिंह

27.08.2023 .. आज दोपहर की शुरुआत बड़ी उत्साह भरी रही। राजस्थान पत्रिका के सागर संस्करण "पत्रिका" के नौवें स्थापना दिवस मनाया पत्रिका के कार्यालय में ... पहले एक अनौपचारिक-सा टॉक शो... फिर सांसद भाई राजबहादुर सिंह जी के साथ केक काटकर सेलीब्रेशन।
    आमंत्रितों में मेरे साथ थे सांसद भाई राजबहादुर सिंह, पूर्व नगरनिगम अध्यक्ष भाई प्रदीप पाठक, गायकनोलॉजिस्ट एवं रीजनल डायरेक्टर डॉ ज्योति चौहान, समाज सेवी श्रीमती प्रतिभा तिवारी, चीफ इंजीनियर पृर्वक्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी, भारतीय स्टेट बैंक सिविल लाइंस शाखा प्रबंधक, महार रेजिमेंटल सेंटर स्कूल के प्राचार्य आदि तथा पत्रिका परिवार।
   हार्दिक शुभकामनाएं एवं आभार 
संपादक विजय कुमार चौधरी जी, संपादकीय प्रभारी ब्रजेश कुमार त्रिपाठी जी एवं श्रीमती रेशू जैन जी 🌹🙏🌹
( 27.08.2023)
#डॉसुश्रीशरदसिंह #DrMissSharadSingh #patrika #राजस्थानपत्रिका

Article | Traditionally, Affection With Rivers | Dr (Ms) Sharad Singh | Central Chronicle

Article
Traditionally, Affection With Rivers
 -    Dr (Ms) Sharad Singh
Writer, Author & Social Activist
Blogger - "Climate Diary Of Dr (Ms) Sharad Singh"
 
 Both water and environment are essential elements of life. Life is not possible without water and availability of water is not possible without healthy environment. Our sages had proper knowledge of the environment. He also understood the mutual harmony between the inanimate world i.e. earth, rivers, mountains, plateau etc. and the animate world i.e. human beings, animals, plants, vegetation etc. and denoted this harmony as an essential element of the environment. He understood that The balance of nature can be disturbed due to the damage of any of the inert and animate elements. That's why he propounded respect towards every element. So that humans do not harm any element. We gradually forgot these ancient values, as a result of which today we have to face the crisis of environmental imbalance. 
Positive consciousness towards water and environment is found in public life even today. A farmer finds out the direction of the wind by blowing dust or flour into the air. He also learns that if a bird is taking a bath in the dust, it means that it will rain soon. Folk songs, folk tales and folk rituals beautifully explain the importance of all the elements of nature. In the perception of public life, if the mountain is a friend, then the river is a friend, if it is in the earth, then food is the god. All those elements of nature, together with which this earth and all the living beings found on earth are close to man, are worshipable so that man remains identified with them and man remains alert to protect all these elements. 

Today, we are worried about the cleanliness and water level of the rivers, while how a river can be soulful in public life, this fact can be seen in the Bambulia folk song sung in Bundelkhand. Budeli people starts singing as soon as it touches the water of Narmada.
Narbda maiya aise to mili re,
Aise to to mili Ke Jaise Mile
Matai Aur Baap re ..  Narbda maiya Ho....

Means, the river Narmada has met with love in the same way as parents meet. It is natural to ask the question that what is the specialty of Narmada that makes it look like senior members of its family unlike other rivers? The answer is very simple, it is Narmada which protects farmers from adverse conditions of life through its water, it is the biggest river of this region. But the logic of the innocent villagers is even simpler than this. They say that Triveni (Ganga, Yamuna, Saraswati) move in the same direction but Narmada is unique as it flows in opposite direction.

 The place of affinity towards Narmada is sure in the Bundeli Lokmanas, there is no room for confusion or confusion. He is clear about his connection with Narmada. He gives the status of his mother to Narmada, while he gives the status of sisters to Triveni. Lok gives Narmada the status of his mother, while Triveni is given the status of sisters. This sentiment is very clear that the presence of the mother and her blessings are always together, but the sisters go away after marriage, despite being intimate. Mother is always near even after being far away and sisters are residents of far away villages even though they are near.
Narbda mori mata lage re
Mata to lage re
tirveni lage mori bain re 
Narbda maiya Ho..... 
Means - Narmada is like mother while Triveni is like sisters. Where relationship is established with the rivers, how can any one harm the rivers? These folk thoughts have been protecting the rivers for centuries. Ever since this relationship of affinity with the rivers was broken, the rivers started getting neglected. In the era of consumerism, we have considered natural water sources only as a means of exploitation. That is why those who do illegal mining of sand from the rivers have no hesitation. Those who kill fish by spreading electric current in the water do not feel any pain. Those who pollute the water of the rivers do not think even for a moment. The personification of rivers is beautifully found in Bhojpuri folk songs. For example, in rituals like upanayana, marriage etc. the place of pilgrimage is Gaya and the place of pilgrimage is Prayag. Invitation is sent-
Gaya ji ke nevtile aaju ta
neviti Benimadhav ho
Nevtile tirath Prayag
Tab hi jag pooran....

- Mean, when holy places like Gaya and Tithraj Prayag are invoked, only then the Yagya will be completed. In the folk rituals, the folk rituals which are ignored in the modern society by saying that they are ancient beliefs, there are many elements of awareness towards water and environment. Some examples are presented here. Sharing Motherhood When a pregnant woman comes out of the delivery room for the first time, she first goes to the well to draw water. This work is done as a family festival. The women walking with that woman worship the well, then the pregnant woman squeezes drops of milk from her breast into the water of the well. Only after this ritual does she draw water from the well. In this way, she shares drinking water with her mother because just as mother's milk is life-giving for a newborn child, in the same way water is life-giving for all beings.

Well worship On the occasion of marriage, water is needed for various worship-services. This water is brought from river, pond or well. Interesting songs are sung on this occasion. There is one such song in which it is said that while going to fetch water for the marriage ceremony, a snake sits blocking the way. The woman requests him to leave the way but he does not move. When women invite him to come to the wedding, he immediately leaves the way. Seven earthen pots filled with water are also worshiped in Saptapadi, which is performed at the time of Saptapadi marriage. These seven Kalash are the symbol of seven seas. The union of two families is expressed by mixing the water of these urns with each other. Use of water in worship: At the time of worship, water is offered to Agni and other deities symbolically by sprinkling water from Durva so that the availability of water remains constant.

A ghat filled with water is used in the death ceremony. It is meant to say that water plays an important role in public life from the beginning of life till the end of life.
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 (27.08.2023)
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Saturday, August 26, 2023

डॉ (सुश्री) शरद सिंह अतिथि समीक्षक हिन्दी लेखिका संघ दमोह के वार्षिक समारोह 2023 में

"महिला सशक्तिकरण पर बहुत बातें होती हैं, बहुत प्रयास किए जाते हैं किंतु यह सार्थक तब प्रतीत होता है जब महिलाएं स्वयं अपनी क्षमता और सार्थकता को प्रकट करती हैं। इस दिशा में  हिंदी लेखिका संघ मध्य प्रदेश का योगदान सराहनीय है।" ये थे मेरे विचार। जी हां, कल 25 अगस्त को हिन्दी लेखिका संघ मध्यप्रदेश ईकाई दमोह  के वार्षिकोत्सव एवं अलंकरण  समारोह 2023... मैं भी कल दमोह में थी बतौर अतिथि समीक्षक। मेरा समीक्षात्मक वक्तव्य था दमोह इकाई की अध्यक्ष विदुषी श्रीमती पुष्पा चिले जी के उपन्यास "शापग्रस्त" पर। 
   🚩इस अवसर पर मंच पर मैं तथा राजनीति एवं साहित्य दोनों क्षेत्रों के विशिष्टजन उपस्थित थे। केन्द्रीय मंत्री जलशक्ति एवं खाद्य प्रसंस्करण श्री प्रहलाद सिंह पटेल, पूर्व वित्त एवं वाणिज्य मंत्री श्री जयंत कुमार मलैया, विधायक दमोह श्री अजय टण्डन, नगरपालिका अध्यक्ष श्रीमती मंजू राय, साहित्यकार श्रीमती पुष्पा चिले, साहित्यकार डॉ रघुनंदन चिले, साहित्यकार सुनीला सराफ आदि।
   🚩इस अवसर पर उपन्यास "शापग्रस्त" सहित तीन पुस्तकों का लोकार्पण तथा कुछ साहित्यकारों का सम्मान भी किया गया।
🌹 इस साहित्यिक अनुष्ठान में मुझे आमंत्रित करने के लिए हार्दिक आभार लेखिका संघ दमोह इकाई एवं दमोह इकाई की अध्यक्ष श्रीमती पुष्पा चिले जी🙏
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Friday, August 25, 2023

शून्यकाल | वचन और आज्ञाएं हमेशा जनहित में नहीं होतीं | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

 "दैनिक नयादौर" में मेरा कॉलम ...
शून्यकाल
वचन और आज्ञाएं हमेशा जनहित में नहीं होतीं
 - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                      
       हमें अपनी बाल्यावस्था से ही यह शिक्षा दी जाती है कि आज्ञाकारी बनना चाहिए और वचन का पक्का होना चाहिए। यह जीवन में अच्छाइयों को बनाए रखने के लिए ज़रूरी भी होता है। यदि आज्ञाओं की अवहेलना होने लगे तो अपराध और अनाचार बढ़ जाता है। यदि वचनबद्धता न रहे तो हर तरह के पारस्परिक संबंध स्वच्छंद हो जाते हैं। इसलिए हर संस्कृति में आज्ञाकारिता एवं वचनबद्धता को अनिवार्य एवं बुनियादी तत्व माना गया है। किन्तु हमारे प्राचीन ग्रंथ इसी के साथ यह संदेश भी देते हैं कि वचन और आज्ञाएं हमेशा जनहित में नहीं होतीं, अतः इनका पालन सोच-समझ कर किया जाना चाहिए। चलिए इसे विस्तार से देखते हैं वर्तमान संदर्भ में।
चाणक्य नीति में एक बहुत अच्छी बात लिखी है-
एकं हन्यान्न वा हन्यादिषुर्मुक्तो धनुष्मता।
बुद्धिर्बुद्धिमतोत्सृष्टा हन्याद् राष्ट्रम सराजकम् ।।
अर्थात - कोई धनुर्धर जब बाण छोड़ता है तो सकता है कि वह बाण किसी को मार दे या न भी मारे, लेकिन जब एक बुद्धिमान कोई गलत निर्णय लेता है तो उससे राजा सहित संपूर्ण राष्ट्र का विनाश हो सकता है। 

चलिए चाणक्य नीति के इसी श्लोक को आधार बना कर अतीत के कुछ पन्ने पलटते हैं, कुछ घटनाएं देखते हैं। पुराणों में भगवान शिव अपनी वचनबद्धता के लिए प्रसिद्ध हैं। जब कोई व्यक्ति भगवान शिव की तपस्या करता तो भगवान शिव उसकी तपस्या से प्रसन्न हो कर उसे वरदान देने के लिए वचनबद्ध हो जाते। वे फिर इस बात का आकलन करने की स्थिति में नहीं रहते कि तप करने वाला व्यक्ति सुपात्र है अथवा कुपात्र है? एक पौराणिक कथा है भस्मासुर की। अधिकांश लोगों ने सुनी होगी। फिर भी जो नहीं जानते हैं, उनके लिए इस कथा को पुनः स्मरण किया जा सकता है। एक असुर था। जिसका नाम था भस्मासुर।  वह पृथ्वी ही नहीं वरन देवलोक पर भी अपना अधिकार जमाना चाहता था। इसके लिए उसे आवश्यकता थी ऐसी शक्ति की जिससे वह आसानी से किसी को भी मार सके। उसे पता था कि भगवान शिव के पास एक ऐसा कंगन है जिसे किसी के भी सिर पर रख कर उसे तत्काल भस्म किया जा सकता है। भस्मासुर ने वह कंगन प्राप्त करने के उद्देश्य से शिव की तपस्या आरम्भ कर दी। कई वर्ष तक वह तपस्यारत रहा। अंततः भगवान शिव उसकी तपस्या से प्रसन्न हो गए और जैसी कि उनकी वचनबद्धता थी कि वे जिसकी तपस्या से प्रसन्न हो जाते थे उसे उसकी इच्छानुसार वरदान देते थे। 
‘‘मांगो भसमासुर, क्या मांगते हो?’’ शिव ने भस्मासुर से वरदान मांगने को कहा तो भस्मासुर ने वरदान के रूप में उनका वह कंगन मांग लिया जिसमें किसी को भी भस्म कर देने की शक्ति थी। शिव तो वचनबद्ध थे। उन्होंने सहर्ष अपना कंगन भस्मासुर को प्रदान कर दिया। कंगन पाते ही भस्मासुर अपनी असली औकात में आ गया और उसने सबसे पहले कंगन को भगवान शिव के सिर पर ही रखने का प्रयास किया। शिव वहां से अदृश्य हो कर बच गए। वह चमत्कारी कंगन सुर, असुर, मनुष्य सभी के लिए घातक था। अब भस्मासुर ने अपने हाथ में कंगन धारण कर के आतंक मचाना शुरू कर दिया। उसने ऋषी-मुनियों को मारना शुरू कर दिया। जो कहीं उसे कोई देवता दिख जाते तो उनके पीछे दौड़ पड़ता। दूसरे असुरों को भी उसने मारना शुरू कर दिया ताकि उसका एकाधिकार हो सके। उसके इस आतंक से सुर, असुर, मनुष्य सभी त्राहि-त्राहि कर उठे। तब सबने मिल कर भगवान विष्णु से मदद मांगी। भगवान विष्णु ने उन्हें मदद का अश्वासन दिया और अप्सरा का रूप धारण कर के भस्मासुर से मिलने चल दिए। भस्मासुर जो शक्ति से मदांध बैठा था, उस रूपवती अप्सरा को देख कर मोहित हो गया। उस अप्सरा को पाने की भस्मासुर के मन में इच्छा बलवती हो उठी। उसने अप्सरा से प्रणयनिवेदन किया। अप्सरा ने इठलाते हुए कहा कि मैंने सोच रखा है कि जो बलशाली व्यक्ति नृत्य में भी पारंगत होगा, उसी को मैं वरण करूंगी। यह सुन कर भस्मासुर तनिक निराश हुआ। उसने कहा कि मैं सर्वबलशाली हूं किन्तु नृत्य में पारंगत नहीं हूं। तब अप्सरा ने कहा कि कोई बात नहीं तुम्हारे बल को देखते हुए मैं तुम्हें पारंगत होने की शर्त से मुक्त करती हूं फिर भी मैं चाहती हूं कि तुम मुझे देख-देख कर मेरे साथ नृत्य करो। यदि यह तुम्हें स्वीकार है तो मैं नृत्य के बाद तुम्हारा वरण कर लूंगी। भस्मासुर तो बल और वासना के मद से अंधा हो चुका था। उसने अप्सरा की बात तत्काल मान ली। अप्सरा ने अपने  दोनों हाथ हिलाते हुए नृत्य शुरू किया। भस्मासुर उसका अनुसरण करने लगा। पहले तो वह अपना एक ही हाथ हिलाता रहा किन्तु अप्सरा के उकसाने पर उसने अपने  दोनों हाथ उठा कर नाचना आरम्भ कर दिया। नृत्य में एक मुद्रा ऐसी आई जिसमें भस्मासुर ने अपने भस्मकंगन वाला हाथ अपने ही सिर पर रख लिया और तत्काल भस्म हो गया। तब विष्णु अप्सरा का रूप त्याग कर अपने असली रूप में आ गए। इस तरह भस्मासुर का अंत हुआ तथा विष्णु ने भगवान शिव को सलाह दी कि सोच-समझ कर वरदान दिया करें। पर शिव तो अपनी वचनबद्धता से जकड़े हुए थे। कई बार ऐसा हुआ कि शिव ने तपस्या से प्रसन्न हो कर आसुरी गुणों वाले व्यक्तियों को वरदान दे दिया। भस्मासुर की यह कथा शायद इसीलिए सृजित हुई कि मनुष्यों को यह सीख दी जा सके कि बिना सोचे समझे वरदान अर्थात समर्थन या वोट न दिया जाए। क्या पता कौन तपस्वी के वेश में भस्मासुर निकल आए और जनहित का बंटाढार कर दे।
आजकल हम राजनीति में एक शब्द बहुतायत सुनते हैं, वह शब्द है ‘‘हाईकमान’’। हाईकमान के आदेश का पालन करने वाले जमीनीनेताओं एवं कार्यकर्ताओं को आदर्श माना जाता है। जबकि कई बार यह भी देखने में आता है कि जमीनी सच्चाई और हाईकमान के आदेश अथवा अपेक्षा में बहुत अंतर होता है। यह मसला टिकटों के वितरण के समय भी देखने में आता है। हाईकमान के पास जो सूचना पहुंचती है उसके आधार पर चुनावी टिकटों का वितरण कर दिया जाता है। यदि सूचनाएं पक्षपाती पहुंच गईं तो वह उम्मीदवार टिकट पाने से वंचित रह जाता है जिसकी पकड़ अपने क्षेत्र में तगड़ी होती है। किन्तु या तो वह आज्ञा को चुपचाप शिरोधार्य कर लेता है अथवा विद्रोह का रास्ता अपना लेता है। दोनों ही स्थितियों में राजनीतिक दल को ही नुकसान पहुंचता है। यदि आज्ञा शिरोधार्य कर ली जाए तो आंतरिक कलह के बीज पड़ने लगते हैं और विद्रोही तेवर तो विद्रोही होते ही हैं। इस तरह कई बार आज्ञाकारिता समूचे दल को मंहगी पड़ जाती है। आज्ञाकारिता के अनेक रूप हो सकते हैं। हमारे प्राचीन ग्रंथ हमें उन विविध रूपों के बारे में बताते हैं। साथ ही बताते हैं दुष्परिणामों को भी। रामकथा को ही लें। यदि राम ने अपने पिता दशरथ की आज्ञा को तार्किकता से ठुकरा दिया होता तो वे भले ही एक आदर्श पुत्र साबित न होते किन्तु अयोध्या को रामराज्य चौदह वर्ष पहले ही मिल गया होता। पुत्र के लिए आज्ञाकारिता उत्तम थी किन्तु प्रजा के हित में नहीं थी। यह तो गनीमत कि भरत ने अपना सिक्का चलाने के बजाए राम की अनुपस्थिति में भी उनकी उपस्थिति बनाए रखी जिससे राम प्रजा की स्मृति में निरंतर बने रहे और प्रजा उत्सुकता से उनकी वापसी की राह देखती रही। तनिक सोचिए कि यदि भरत राजसिंहासन पर राम की चरणपादुका रखने के बजाए स्वयं बैठ जाते तो प्रजा उनकी ही आदी हो जाती। श्रीराम की आज्ञाकारिता प्रजा पर भारी पड़ सकती थी। 
द्वापर में तो यही हुआ। भीष्म की वचनबद्धता और आज्ञाकारिता ने मानवता की अनेक बार धज्जियां उड़ाईं। परिणाम में महाभारत का युद्ध हाथ आया जिसमें उस जनहानि को रेखांकित ही नहीं किया गया है जो आम नागरिकों ने झेला। युद्धकाल में लगभग हर घर से वयस्क युवा पुरुषों को सेना में बलात भर्ती कर लिया जाना तत्कालीन समय का नियम था। अतः सोचने की बात है कि महाभारत का युद्ध भले ही कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि पर लड़ा गया किन्तु युद्ध में शामिल हर राज्य के हर घर का युवा पुरुष युद्ध की बलि चढ़ गया। उन आम परिवारों पर कैसा संकट टूटा होगा, इसका अनुमान लगाना भी कठिन है।

इसलिए आवश्यक है कि नीति वाक्य जैसी प्रतीत होने वाली स्थितियों को भी जांचा और परखा जाए और फिर जो जनहित में उचित हो वही किया जाए।                                  
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डॉ (सुश्री) शरद सिंह आरोग्य संवाद में विशिष्ट अतिथि

"चाट, पकौड़े, चाऊमिन, औ पिज्जा औ नूडल्स।
इनको नियमित खाए जो, बन जाए डूडल्स।।
बन जाए डूडल्स, बनाओ इनसे दूरी
वरना रह जाएगी इच्छा सभी अधूरी।।" कल ऑटोनोमस गर्ल्स डिग्री कॉलेज, सागर की छात्राओं को "स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मस्तिष्क" विषय पर अपना व्याख्यान देते हुए मैंने उपरोक्त पंक्तियों भी सुझाव के तौर पर उन्हें सुनाईं।
    आयोजन था गर्ल्स डिग्री कॉलेज, सागर में पिंक सागर एवं eduGlife संस्था द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित, नारी "आरोग्य संवाद" कार्यक्रम।  आयोजनकर्ता थीं अधिवक्ता दीपा तिवारी एवं श्रीमती चारूलता त्रिपाठी। इस कार्यक्रम में सागर महापौर श्रीमती संगीता तिवारी, प्राचार्य डॉ. आनंद तिवारी, पूर्व विधायक श्रीमती पारुल साहू, गायकनोलॉजिस्ट डॉ. नीना गिडियन, टीआई श्रीमती उमा नवल आर्य, समाजसेवी डॉ. प्रतिभा तिवारी, गायकनोलॉजिस्ट डॉ. निधि मिश्रा, योग विशेषज्ञ डॉ. श्वेता नेमा ने भी अपने महत्वपूर्ण विचार साझा किए। 
     डॉ अंजना चतुर्वेदी सहित महाविद्यालय की प्राध्यापकों एवं छात्राओं की उल्लेखनीय उपस्थिति रही।
    एक सार्थक आयोजन, एक सार्थक दिन!
🚩धन्यवाद प्रिय चारुलता त्रिपाठी 🙏
🚩धन्यवाद डॉ. दीपा तिवारी 🙏
🚩धन्यवाद डॉ. आनंद तिवारी 🙏
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Thursday, August 24, 2023

बतकाव बिन्ना की | हम सो चांद पे टमाटर उगाहें | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | बुंदेली व्यंग्य | प्रवीण प्रभात

"हम सो चांद पे टमाटर उगाहें" - मित्रो, ये है मेरा बुंदेली कॉलम "बतकाव बिन्ना की" साप्ताहिक #प्रवीणप्रभात , छतरपुर में।
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बतकाव बिन्ना की  
हम सो चांद पे टमाटर उगाहें              
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
        ‘‘का सोच रए भैयाजी?’’ मैंने देखी के भैयाजी कछू गहरी सोच में डूबे हते।
‘‘कछू नईं!’’ भैयाजी बोले।
आप ओरन खों बता दें के जे हमाए बुंदेलखंड की रीत आए के कित्ती बी बड़ी सल्ल काए ने बिंधी होय, पैले जेई कहो जात आए के ‘कछू नईं’। मनो आप को पता परे के आपके कोनऊं चिनारी वारे को एक्सीडेंट हो गओ आए। सो आप उनको देखबे के लाने हस्पताले पौंचों और पलका पे डरे ऊ धनी से पूछो के ‘काए भैया का भओ? कछू ज्यादा तो ने लगी?’’
सो, बा बोलहे,‘‘कछू नई! तनक टांग टूट गई आए।’’
मने कैबे को मतलब जे के इते ‘‘कछू नई’’ के आगे सब कछू हो सकत आए।
‘‘जे का बताहें! हम बता रए।’’ इत्ते में भौजी सोई उतई आ गईं औ कैन लगीं,‘‘हमने तुमाए भैयाजी से कई के हमने पैले बी सुनो रओ के कोनऊं ने उते चांद पे प्लाट ले लओ हतो। बाकी पैले तो उते जा नईं सकत्ते। अब कछू टेम बाद हो सकत आए अपन ओरें सबई जने चांद पे जा-आ सकें। सो, जेई से हम इनसे कै रए के चांद पे अभई से एकाद प्लाट-म्लाट बुक करा लेओ। औ दो-चार एकड़ सब्जी-भाजी को बगीचा लाबे जोग जमीन मिल जाए सो बा सोई ले लेओ।’’
भौजी की बात सुन के मोय तो मनो चक्कर सो आ गओ। मूंड़ घूम गओ।
‘‘उते प्लाट ले के का करहो भौजी? इते तो इत्तो साजो सो मकान ठाड़ो तुमाओ!’’ मैंने भौजी से पूछी।
‘‘बा हमने सब सोच लई आए। जे इते को जे मकान किराए पे चढ़ा देबी औ उते चांद पे जा के रैबी।’’ भौजी बड़ी सहूरी से बोलीं।
‘‘मनो आप किराया कैसे वसूलहो? मईना के मईना तो उते से इते ने आ पाहो।’’ मैंने भौजी से पूछी।
‘‘का करने मईना के मईना इते आ के? पेटीएम या गूगलपे कछू से भी किराया मंगा लओ करहें। औ उते से नैचें अपनो जे घर सो दिखात रैहे। जो कोनऊं कछू घेरा-घारी करहे तो उतई से फोटू खेंच के एफआरई दर्ज़ करा देबी।’’ भौजी बोलीं।
सच्ची उन्ने सबई कछू सोच रखो हतो। बिलकुल साॅलिड प्लान तैयार हतो उनको।
‘‘जे ठीक सोचो आपने! बाकी आपने पता करो का के उते कित्ते वर्ग फुट जमींने बिक रईं?’’ मैंने भौजी से पूछी।
‘‘जेई तो हम तुमाए भैयाजी से बोल रए के जल्दी भाव-ताव पता करो, औ बुक करा लेओ। अबई सबई जने टूट परहें सो अपन ओरन खों ने मिल पाहे। तुम सोई एक प्लाट उते ले लेओ। अबे का आए के, अबे उते भीड़ ने हुइए, सो प्लाट सस्तो मिल जैहे। कल्ल खों उते स्कूले, काॅलेजें, माॅल खुलन लगें औ काॅलोनी बनन लगहे सो, कीमतें बढ़ जैहें।’’ भौजी चिंता करत भई बोलीं।
मोय तो जे देख के हैरत भई के मोरी भौजी प्राॅपर्टी के मामले में कित्ती चतुर आएं।
‘‘पैले आप ओरें पता करो, जो मोरे जोग दाम हुइए सो मैं सोई सोच सकत हूं।’’ मैंने भौजी को दिल राखबे खों कै दओ। काय से मोय तो पतो के बा चांद कोनऊं अपने इंडिया की प्राॅपर्टी नोंई के अपनई ओरें उते प्लाट खरीदबी। दुनिया भरे के धनी-धोरी पैलऊं ऊ पे दांत गड़ाए फिर रए।
‘‘भौजी, मोय जे सो बताओ के इते से तो आपको मकान किराया पौंचहे सो उते पइसा की कमी तो पड़ने नईयां। सो सब्जी-भाजी के लाने जमीन काय ले रईं? उते तो जा के आराम करियो!’’ मैंने भौजी से पूछीं।
‘‘नईं बिन्ना, तुम समझी नोंई! का है के अब सो हर साल कोनऊं ने कोनऊं सब्जी को भाव बढ़ो रैत आए। कभऊं प्याज मैंगी हो गई, सो कभऊं टमाटर मैंगे हो गए। ई बार देख लेओ, दो सौ औ ढाई सौ तक लौं पौंच गए रए टमाटर। सो हमने सोची आए के उते टमाटरें उगाहें। उते की टमाटरें इते औ मैंगी बिकहें।’’ कैत भईं भौजी की आंखें चमकन लगीं। मनो उन्ने चांद पे टमाटरें उगान शुरू कर दईंे होंय।
‘‘आपको बिचार सो अच्छो आए भौजी!’’ मैंने भौजी की बात पे हामी भरी।
‘‘बिन्ना, तुम सोई इन्हईं के सुर में बोलन लगीं। तुमाई भौजी को बस चले सो पूरौ चांद खरिदवा लेवें।’’ भैयाजी बोल परे।
‘‘सो ईमें गलत का आए?’’ मैंने भौयाजी से पूछी।
‘‘हऔ, जेई सो हम इनसे कै रए। मगर इने कछू समझ परे तब न!’’ भौजी बोलीं।
‘‘बाकी जबलौं चांद पे नईं मिल पा रई तब लौं इतई धरती पे दो-चार एकड़ खरीद लेओ आप! ऊंसे का हुइए, के ऊ पे आप एक-दो बेरा टमाटरें उगा लेहो, उत्ते में जमीन के पइसा वसूल हो जाने, फेर ऊंको बेंच दइयो। ऊसे जो पइसा मिलहे बा आपके लाने उते चांद पे जमीन खरीदबे के काम आहे।’’ मैंने सोई आपनो ज्ञान पेल दओ।
‘‘कै सो तुम ठीक रईं! काय सुन रए के नईं? तुम तो अबई उठो औ दोई जांगा पतों करो के चांद पे जमीन की बुकिंग को कर रओ औ इते कहूं दो-चार एकड़ सस्ती जमीन मिल रई का?’’ भौजी उचकत भईं बोलीं।
‘‘कां की सूझत रैत आए तुमें सोई! अरे उते को करओ बुकिंग? शेखचिल्ली घांई ने करो! रई इते की तो इते अब कां धरी सस्ती जमीनें? सबरे पहाड़ काट डारे, सबरे जंगल पटा दए। नाज जोग जमीने नई पड़ रईं औ तुमें दो-चार एकड़ की पर रई?’’ भैयाजी झुंझलात भए बोले।
‘‘तुम पे नई हो रओ, सो ऐसे बोलो! हम पता कर लेबी। बस, तुम सो पइसा को जुगाड़ बनाए राखो!’’ भौजी तिनकत भईं बोलीं।
‘‘अब जे इनकी सुन लेओ! अरे कुल्ल पइसा चाउने परहें मोरी मताई!’’ भैयाजी झुंझलात भए भौजी से बोले।
‘‘हम तुमाई मताई नोंई! पगला काय रए?’’ भौजी सोई आप से तुम पे उतर आईं। जो भौजी को मत्था पलट जाए सो ऐसई होत आए।
‘‘भैयाजी! मोय इते तो नई चाउंने, बाकी चांद पे अपनो प्लाट बुक करियो सो, छोटो सो मोरे लाने सोई बुक करा दइयो।’’ भोली बनत भई मैंने सोई भैयाजी कई। मनो भीतरे से मोय हंसी फूट पड़ रई हती, पर भैयाजी को मजा चखाबे में बड़ों मजो आ रओ हतो।
‘‘धन्न हो तुम दोई!’’ भैयाजी अपने दोई हाथ जोरत भए बोले,‘‘तुम दोई जैसी दो-चार औ मिल जाएं सो हमाओ तो बंटाढार हो जेहे।’’
‘‘काय को बंटाढार हो जेहे? हम तो सोच ई रए के अपनी सुंदरकांड की किटी वारी सहेलियन से औ पूछ लेंवें, जो उनमें चार-छः बी राजी हो गईं सो उनसे कमीशन ले के आप उनके लाने चांद पे प्लाट बुक करा दइयो।’’ भौजी भैयाजी की बात अनसुनी करत भई बोलीं।
‘‘सो भैयाजी, अब मोय देओ चलबे की इजाजत! जो चांद पे प्लाट की बात तै हो जाए सो मोय मोबाईल कर दइयो।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘रामधई, हमई काय नईं चले गए चंद्रयान के संगे, कम से कम तुम ओरन से तो पीछो छूट जातो! तुम ओरन घांई लोग आएं जो चांद को लों ने छोड़हें। उते पौंच के बी अतिक्रण करहें, नारी-नरदा बहाहें, इते-उते पनी फेंकहें।’’ भैयाजी खिजियात भए बोले।    
‘‘अबई से काय डरा रए? खैर, जो होय सो, आप मोय खबर करियो!’’ मैंने भैयाजी से कई औ उते से चल परी। काए से के बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!
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Wednesday, August 23, 2023

चर्चा प्लस | तुलसी जयंती विशेष | तुलसी की ‘रामलला नहछू’ लघु कृति होते हुए भी लोक का महाकाव्य है | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस : तुलसी जयंती विशेष                                                                            
     तुलसी की ‘रामलला नहछू’ लघु कृति होते हुए भी लोक का महाकाव्य है
    - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                        
          भारतीय जनमानस में गोस्वामी तुलसीदास एक अति सम्मानित कवि के रूप में स्थापित हैं। उनकी कृति ‘‘रामचरित मानस’’ प्रत्येक हिन्दू घर में एक धार्मिक ग्रंथ के रूप में पूज्य है। धर्मपरायण स्त्री-पुरुष, यहां तक कि बालक, बालिकाएं भी ‘‘रामचरित मानस’’ का पाठ करके श्रीराम से निकटता अनुभव करते हैं। गोस्वामी तुलसी दास की प्रथम कृति मानी जाती है ‘‘रामलला नहछू’’। इस कृति का भी महत्व कम नहीं है। यद्यपि इसकी प्रथम कृति होने पर विद्वानों में मतभेद भी है किन्तु इस कृति में भी विशिष्ट लोकरस है। ‘‘रामचरित मानस’’ की आभा के विस्तार के सम्मुख यह लघु कृति आज भी अपनी महत्ता बनाए हुए है। तो, चलिए स्मरण करते हैं तुलसीदास जी की जयंती पर उनकी प्रथम कृति का।
तुलसीदास जयंती हर साल श्रावण मास की सप्तमी तिथि को मनायी जाती है। इस गणना के अनुसार इस वर्ष 2023 में 23 अगस्त को तुलसीदास का 526 वां जन्मदिवस है। तुलसीदास के लिए यह कहना समीचीन होगा कि वे लोक में जन्में, लोक में रहे और लोक में समा गए। तुलसीदास ने अपनी बाल्यावस्था से ही अनेक कठिनाइयां झेलीं। उत्तरप्रदेश के चित्रकूट जिले में राजापुर गांव में तुलसीदास का जन्म हुआ था। उनके पिता आत्माराम एक सम्मानित ब्राह्मण थे। तुलसीदास की माता का नाम हुलसी था। तुलसीदास का जन्म सम्वत 1554 में श्रावण मास में शुक्ल सप्तमी के दिन अभुक्त मूल नक्षत्र में हुआ। ज्योतिष के अनुसार यह नक्षत्र शुभ नहीं माना जाता है। इससे तुलसीदास के प्रति एक पूर्वाग्रह जाग उठा। जबकि कहा जाता है कि  तुलसीदास  जन्म लेते ही रोए नहीं थे अपितु उनके मुख से ‘राम’ शब्द निकला था। यह भी किंवदंती है कि जन्म से ही उनके मुख में दांत थे जिससे उनके पिता ने उन्हें अमंगलकारी मान लिया। उनकी माता हुलसी ने तुलसी की रक्षा के लिए चुनियां नाम की अपनी एक दासी को सौंप दिया। तत्कालीन समाज में अमंगल के प्रभाव को नष्ट करने के लिए इस प्रकार की विधि अपनाई जाती थी। किन्तु तुलसी के जीवन में विपत्ति का आरम्भ होना तय था। इसीलिए दासी को सौंपने के दूसरे दिन ही उनकी मां ने यह संसार त्याग दिया। इस घटना से अंधविश्वासी पिता का अंधविश्वास और गहरा गया। उन्होंने तुलसी को वापस बुलाने से मना कर दिया। दासी चुनियां ने बालक तुलसी को पुत्रवत स्नेह दिया। सबकुछ ठीक चलने लगा था किन्तु जब तुलसी साढे पांच वर्ष के थे तभी दासी चुनिया का निधन हो गया। अब एक अनाथ बालक की भांति यहां-वहां भटकने के अतिरिक्त तुलसी के पास और कोई चारा नहीं था। उन्हें कई बार भूखे ही सोना पड़ता था। यह भी किंवदंती है कि बालक तुलसी कई दिनों से भूखे थे और उन्हें कोई भी भिक्षा में भोजन नहीं दे रहा था तब माता पार्वती को दया आई और वे स्वयं एक ब्राह्मणी का वेश रखकर उनके पास आईं। इसके बाद वे प्रतिदिन स्वयं आ कर बालक तुलसी को भोजन कराने लगीं।

तुलसीदास के जीवन में दैवीय चमत्कारों की उपस्थिति मानी जाती है। मानो कोई दैवीय शक्ति उनसे वह सृजन कराना चाहती थी जिसके बारे में उन्हें आरम्भ में स्वयं कोई अनुमान नहीं था। माग्य उन्हें काशी ले गया। संवत् 1628 में वे काशी से अयोध्या की ओर चले। उन दिनों प्रयाग में माघ मेला लगा हुआ था। इसलिए वे कुछ समय के लिए प्रयाग में ठहर गए। संयोगवश एक दिन उन्हें भारद्वाज और याज्ञवल्क्य मुनि के दर्शन हो गए। माघ मेला समाप्त होते ही तुलसीदास वापस काशी पहुंचे और वहां के प्रहलादघाट पर एक ब्राह्मण के घर ठहरे। उस ब्राह्मण के घर पर संस्कृत ग्रंथों का पाठ होता था तथा वहां संस्कृतमय वातावरण था। अतः तुलसीदास भी संस्कृत में पद्य रचना करने लगे। किन्तु विचित्र बात यह थी कि वे दिन भर में जो संस्कृत पद्य लिखते, रात भर में वे सब गायब हो जातीं। सात दिन तक यही क्रम चलता रहा। आठवें दिन तुलसीदास को स्वप्न में भगवान शिव ने आदेश दिया कि उन्हें संस्कृत में नहीं वरन अपनी लोकभाषा में सृजन करना है। इस घटना के बाद तुलसीदास अयोध्या चले गए जहां उन्होंने लोकभाषा को अपने सृजन का माध्यम बनाया।
अपने 126 वर्ष के दीर्घ जीवनकाल में तुलसीदास ने कई ग्रन्थों रचे- रामललानहछू, गीतावली, कृष्ण गीतावली, रामचरितमानस, पार्वतीमंगल, विनय पत्रिका, जानकीमंगल, दोहावली, वैराग्यसंदीपनी, रामाज्ञाप्रश्न, सतसई, बरवै रामायण, कवितावली तथा हनुमान बाहुक। इनमें गोस्वामी तुलसीदास की प्रथम रचना ‘‘रामलला नहछू’’ मानी जाती है। यद्यपि इसके प्रथम होने को ले कर विद्वानों में मतभेद रहा है किन्तु अधिकांश लोग इसे ही प्रथम कृति मानते हैं। ‘‘गोसाईं चरित’’ में लिखा है कि ‘‘पार्वति मंगल’’, ‘‘जानकी मंगल’’ और ‘‘रामलला नहछू’’ की रचना मिथिला में एक साथ हुई। ‘‘पार्वती मंगल’’ में रचना-काल का उल्लेख इस प्रकार है -
जय संवत् फागुन सुदि पॉंचै गुरू दिन।
अस्विनि विचरेऊँ मंगल सुनि सुख छिन-छिन।।
अतः इसी के अनुरुप ‘‘रामलला नहछू’’ का रचनाकाल तय किया जाता है। यह एक लघु कृति है। इसके बीस सोहर छंदों में नहछू लोकाचार का वर्णन किया है। ’सोहर’ अवध क्षेत्र का प्रख्यात छंद है, यद्यपि यह अन्य क्षेत्रों में भी सोहर गाने का रिवाज़ है। ‘‘नहछू’’ दो शब्दों से बना है - नख और क्षुर अर्थात् नख काटना। अवध में विवाहपूर्व दूल्हे के नाखून काटे जाते हैं और इस रस्म को ‘‘नहछू’’ कहा जाता है। इस रस्म के दौरान स्त्रियां गारी सहित तरह-तरह के मनोरंजक गीत गाती हैं।

‘‘रामलला नहछू’’ की भाषा अवधि है जिसमें गोंडा और अयोध्या के आसपास बोली जाने वाली पूर्वी अवधी के शब्द निहित हैं। जैसे- अहिरिन, महतारि, आवइ, हरखइ आदि। सोहर छंद में निबद्ध इस काव्य रचना में अप्रतिम दृश्यात्मकता है। ‘‘रामलला नहछू’’ में उपस्थित दृश्य देखिए कि जब राम की नहछू रस्म निभाई जा रही है तो वहां उपस्थित स्त्रियां यह गीत गाती हैं-
काहे राम जिउ सांवर लछिमन गोर हो
की दहु रानी कौउसिलहीं परिगा भोर हो।
राम अहहिं दशरथ के लछिमन आनि क हो
भरत सत्रुहन भई सिरी रघुनाथ क हो।।
अर्थात् स्त्रियां गारी गाती हुई कहती हैं कि हमें यह समझ में नहीं आता है कि एक ही पिता के पुत्र होकर राम सांवले क्यों हैं और लक्ष्मण गोरे क्यों हैं? फिर शंका प्रकट करती हैं कि कहीं कौशल्या से कोई चूक तो नहीं हो गयी थी? फिर स्वयं अपनी बात पलटती हुई कहती हैं कि राम तो दशरथ के ही पुत्र हैं, शायद लक्ष्मण दूसरे के पुत्र हों। आखिर भरत और शत्रुघ्न भी तो राम के भाई हैं।

वैसे, ‘‘रामलला नहछू’’ के कुछ पदों को पढना भी अपने आप में ज्ञान के उस द्वार को खोल देता है जहां तुलसीदास का लघु किन्तु एक महत्वपूर्ण सृजन दिखाई देता है-
आदि सारदा गनपति गौरि मनाइय हो।
रामलला कर नहछू गाइ सुनाइय हो।।
जेहि गाये सिधि होय परम निधि पाइय हो।
कोटि जनम कर पातक दूरि सो जाइय हो ।। 01।।
कोटिन्ह बाजन बाजहिं दसरथ के गृह हो ।
देवलोक सब देखहिं आनँद अति हिय हो।।
नगर सोहावन लागत बरनि न जातै हो।
कौसल्या के हर्ष न हृदय समातै हो ।। 02।।
आले हि बाँस के माँड़व मनिगन पूरन हो।
मोतिन्ह झालरि लागि चहूँ दिसि झूलन हो।।
गंगाजल कर कलस तौ तुरित मँगाइय हो।
जुवतिन्ह मंगल गाइ राम अन्हवाइय हो।। 03।।
गजमुकुता हीरामनि चैक पुराइय हो।
देइ सुअरघ राम कहँ लेइ बैठाइय हो।।
कनकखंभ चहुँ ओर मध्य सिंहासन हो।
मानिकदीप बराय बैठि तेहि आसन हो।। 04।।
बनि बनि आवति नारि जानि गृह मायन हो।
बिहँसत आउ लोहारिनि हाथ बरायन हो।।
अहिरिनि हाथ दहेड़ि सगुन लेइ आवइ हो।
उनरत जोबनु देखि नृपति मन भावइ हो।। 05।।
रूपसलोनि तँबोलिनि बीरा हाथहि हो।
जाकी ओर बिलोकहि मन तेहि साथहि हो।।
दरजिनि गोरे गात लिहे कर जोरा हो।
केसरि परम लगाइ सुगंधन बोरा हो।। 06 ।।
मोचिनि बदन-सकोचिनि हीरा माँगन हो।
पनहि लिहे कर सोभित सुंदर आँगन हो।।
बतिया कै सुधरि मलिनिया सुंदर गातहि हो।
कनक रतनमनि मौरा लिहे मुसुकातहि हो।। 07।।
गोस्वामी तुलसीदास ने ‘‘रामलला नहछू’’ के अपने पदों में लोकाचार और उससे जुड़ी भावनाओं को जीवंत कर दिया है। कुछ और पद देखिए-
भरि गाड़ी निवछावरि नाऊ लेइ आवइ हो।
परिजन करहिं निहाल असीसत आवइ हो।।
तापर करहिं सुमौज बहुत दुख खोवहिँ हो।
होइ सुखी सब लोग अधिक सुख सोवहिं हो ।। 17।।
गावहिं सब रनिवास देहिं प्रभु गारी हो।
रामलला सकुचाहिं देखि महतारी हो।।
हिलिमिलि करत सवाँग सभा रसकेलि हो।
नाउनि मन हरषाइ सुगंधन मेलि हो ।। 18।।
दूलह कै महतारि देखि मन हरषइ हो।
कोटिन्ह दीन्हेउ दान मेघ जनु बरखइ हो।।
रामलला कर नहछू अति सुख गाइय हो।
जेहि गाये सिधि होइ परम निधि पाइय हो ।।19।।
दसरथ राउ सिंहसान बैठि बिराजहिं हो।
तुलसिदास बलि जाहि देखि रघुराजहि हो।।
जे यह नहछू गावैं गाइ सुनावइँ हो।
ऋद्धि सिद्धि कल्यान मुक्ति नर पावइँ हो ।। 20।।
जो पग नाउनि  धोव  राम धोवावइं हो।
सो पगधूरि सिद्ध मुनि दरसन पावइं हो।।
रामलला कर नहछू इहि सुख गाइय हो।
जेहि गाए सिधि होइ परम पद पाइय हो।। 21।।
‘‘रामलला नहछू’’ में भले ही एक रस्म का वर्णन है किन्तु उसमें लोक का सुख, लोक की प्रसन्नता, लोक का व्यवहार, लोक भाषा, लोक संगीत, लोकछंद, लोक स्वर, लोक की उत्सवधर्मिता तथा लोक का परस्पर आपसी सद्भाव आदि सभी कुछ निहित है। यह कृति गोस्वामी तुलसीदास को ‘‘रामचरित मानस’’ से परे भी एक उत्कृष्ट रचनाकार स्थापित करती है। यह कृति आकार में छोटी होते हुए भी लोक का महाकाव्य रचती है।
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