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Wednesday, February 17, 2021

चर्चा प्लस | हर वृद्ध को पता होना चाहिए उसके कानूनी अधिकार | डाॅ शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh

चर्चा प्लस    
हर वृद्ध को पता होना चाहिए उसके कानूनी अधिकार
 - डाॅ शरद सिंह
    चाहे कितनी भी बड़ी घटना हो, हम उसे भुलाने में देर नहीं लगाते हैं। ख़बरें पहले पन्ने से आख़िरी पन्ने पर पहुंच कर दो-तीन पहुंच कर ग़ायब हो जाती है। यही आज का कड़वा सच है। पर इस सच से आगे बढ़ कर हमें सोचना ही होगा जब प्रश्न हमारे बुजुर्गों का हो। पिछले चर्चा प्लस में ‘समाज के मुंह पर ज़ोरदार तमाचा है इंदौर की घटना‘ और ‘सड़कों पर कहां से आते हैं ये वृद्ध भिखारी?’ शीर्षकों से दो लेख, जिनका संदर्भ था इंदौर नगर निगम कर्मचारियों द्वारा भिखारी बुजुर्गों को शिप्रा के समीप छोड़ने के प्रयास की शर्मनाक घटना। वृद्धों के भी होते हैं कानूनी अधिकार जिनके बारे में अधिकांश वृद्ध जानते ही नहीं हैं। इस मुद्दे पर ‘चर्चा प्लस’ में प्रस्तुत है चर्चा की तीसरी और अंतिम कड़ी।            
चर्चा प्लस | हर वृद्ध को पता होना चाहिए उसके कानूनी अधिकार | डाॅ शरद सिंह | सागर दिनकर, 17.02.2021

अर्जेन्टीना के कवि राबर्टो जुआरोज़ की एक कविता है-
‘‘वह बूढ़ा जो नुक्कड़ पर बैठा
फटा कोट पहने
मांगता है भीख,
क्या इसलिए कि वह भिखारी है?
नहीं, 
वह मांगता है-
क्योंकि हम बनना चाहते थे दाता
कितना सरल गणित है
समाज का।’’ 

जब कोई भीख मांगता है तो निःसंदेह उसके लिए समाज ही सबसे पहले उत्तरदायी होता है क्योंकि यदि परिवार किसी बुजुर्ग का त्याग करता है तो समाज उसे ऐसा न करने के लिए उस पर दबाव बना सकता है। लेकिन एकल परिवार के बढ़ते चलन के कारण ऐसा संभव नहीं हो पाता है। आज बुजुर्ग हाशिए पर धकेले जा रहे हैं। जेनरेशन गैप और जीवन शैली में बदलाव के कारण बुजुर्ग व्यक्ति उपेक्षा, अलगाव और असुरक्षा के शिकार हो चले हैं। एकल परिवार के चलन में बुजृर्गों के लिए कोई जगह नहीं है। वे अपने पैतृक घरों में अकेले रह जाते हैं जहां उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं होता है। न ही उन्हें दवाइयों की याद दिलाने वाला कोई होता है, न ही उनकी दवाई लाने वाला कोई होता है। अनेक मामले ऐसे भी होते हैं जिनमें वृद्ध माता-पिता के साथ इस तरह दुर्व्यवहार किया जाता है कि या तो वे स्वयं घर छोड़ देते हैं या फिर उन्हें घर से निकाल दिया जाता है। ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिसमें बुजुर्गों से मार-पीट, प्रताड़ना और यहां तक कि उनकी हत्या भी की गई है। कुछ समय पहले की ही बात है। 50 साल के एक प्रौढ़ ने अपनी मां की सिर्फ इसलिए हत्या कर दी, क्योंकि वह उनका चिकित्सा खर्च वहन नहीं कर पा रहा था। 
      
वृद्धों के पक्ष में सरकार ने मैंटेनेंस एंड वेलफेयर ऑफ पेरेंट्स एंड सीनियर सिटीजन्स एक्ट 2007 अर्थात् माता-पिता वरिष्ठ नागरिकों की देखरेख एवं कल्याण अधिनियम 2007 लागू किया हुआ है। यह कानून इसलिए बनाया गया ताकि वृद्ध अर्थात वरिष्ठ नागरिक आत्मसम्मान एवं आराम से जीवनयापन कर सकें। इस कानून के दायरे में वे सभी नागरिक आते हैं जो साठ वर्ष की उम्र पूर्ण कर चुके हों। यह कानून परिजन को भी परिभाषित करता है जिसके अनुसार स्वयं की संतान एवं निकट संबंधी न होने की स्थिति में वरिष्ठ नागरिकों के उत्तराधिकारी भी 'परिजन' हैं।  मैंटेनेंस एंड वेलफेयर ऑफ पेरेंट्स एंड सीनियर सिटीजन्स एक्ट 2007 बच्चों और परिजनों पर कानूनी उत्तरदायित्व तय करता है, जिससे बच्चे अपने माता-पिता और बुजुर्गों को सम्मानजनक तरीके से सामान्य जीवन बसर करने दें। इस कानून में राज्य सरकारों के लिए भी निर्देश हैं। इसमें कहा गया है कि राज्य सरकार हर जिले में वृद्धाश्रम खोले और उनका रखरखाव सुनिश्चित करें। इस कानून के अंतर्गत जो माता-पिता अपनी आय से अपना पालन-पोषण करने में सक्षम नहीं हैं, वे वृद्धजन अपने वयस्क बच्चों से 'मेंटेनेंस मनी' लेने का अधिकार रहते हैैं। इस मेंटेनेंस में उचित आहार, आश्रय, कपड़ा और चिकित्सा उपचार आता है, ताकि वे वृद्धजन सामान्य जीवन जी सकें। पालक या तो वास्तविक हो, या उन्होंने बच्चे को गोद ले रखा हो, या सौतेले माता या पिता हों। फिर भले ही वे वरिष्ठ नागरिक हों या नहीं, लेकिन उनकी देखरेख का जिम्मा बच्चों पर होता है। ऐसे बुजर्ग जिनके बच्चे नहीं हैं और जो साठ वर्ष या इससे अधिक के हैं, वे भी मेंटेनेंस का दावा कर सकते हैं। वे परिजनों से मेंटेनेंस की अपील कर सकते हैं। वे उन लोगों से कह सकते हैं, जिनको उत्तराधिकार के रूप में उनकी संपत्ति मिलने वाली हो। इसका आवेदन उक्त बुजुर्ग को खुद ही देना होता है। इसके लिए वे किसी व्यक्ति को भी अधिकृत कर सकते हैं। साथ ही वे किसी स्वैच्छिक संगठन से भी आवेदन देने को कह सकते हैं। इस कानून के तहत बनाए गए न्यायाधिकरण या ट्रिब्यूनल तभी बनते हैं, जब यह स्पष्ट हो कि बच्चों या परिजनों ने उक्त बुजुर्ग की अनदेखी की या फिर उनकी देखरेख करने से इंकार कर दिया। ये न्यायाधिकरण इन बच्चों या परिजनों को 10,000 रु. महीना गुजारे के लिए देने को कह सकता है। इस तरह की प्रक्रिया में वकीलों की भी कोई जरूरत नहीं होती है। लेकिन सबसे बड़ी खामी यही होती है कि अधिकांश वृद्धों को अपने इस अधिकार का पता ही नहीं होता है। विशेष रूप से ग्रामीण अंचल के अथवा कम पढ़े लिखे एवं अपर वृद्धों के साथ इस कानूनी अज्ञान की समस्या विकट रूप से है।

मैंटेनेंस एंड वेलफेयर ऑफ पेरेंट्स एंड सीनियर सिटीजन्स एक्ट 2007 में एक महत्वपूर्ण  क्लॉज़ यह भी है कि यदि कोई वरिष्ठ नागरिक, जो उपहार या किसी अन्य तरीके से अपनी संपत्ति का हस्तांतरण किसी को करता है। जिसके नाम संपत्ति की गई है, यदि वह उक्त बुजुर्ग व्यक्ति की देखरेख नहीं कर पाता है या करने से इंकार करता है तो यह माना जाता है कि संपत्ति हस्तांतरण धोखाधड़ी से किया गया है अथवा या किसी के प्रभाव में संपत्ति हस्तांतरण करा लिया गया है। 

हिंदू दत्तक एवं देखभाल कानून 1956 में भी स्पष्ट उल्लेख है कि जो माता-पिता या पालक खुद का खर्च उठाने में सक्षम नहीं हैं, साथ ही उनको किसी स्रोत से आय नहीं है, उनको इस कानून में मेंटेनेंस पाने का अधिकार है तथा बच्चों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे माता-पिता की देखरेख करें।  मुस्लिमलॉ के अनुसार पुत्र एवं पुत्री का यह दायित्व बनता है कि वे अपने बुजुर्ग माता-पिता की देखरेख करें। इस कानून के अंतर्गत विवाहित बेटियों की भी यह जिम्मेदारी है कि वे माता-पिता की देखरेख करें। यदि किसी मजिस्ट्रेट ने किसी वरिष्ठ नागरिक या माता-पिता की जिम्मेदारी वहन करने का आदेश दिया है और कोई संतान या दत्तक या परिजन उसका पालन नहीं करता है तो उसके ख़िलाफ़ भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत प्रकरण चलाया जा सकता है तथा प्रथम श्रेणी के न्यायाधीश उसे माता-पिता को एक निश्चित मासिक भत्ता तय देने को कह सकते हैं। 

वृद्धों के हित में सरकार सदैव सजग रहती है। सन् 1999 में केंद्र सरकार ने वृद्धजन के लिए राष्ट्रीय नीति घोषित की थी। इसमें उनके स्वास्थ्य, सुरक्षा, सामाजिक सुरक्षा और उनके सुचारू जीवन का ध्यान रखा गया। इस नीति में परिजनों को बुजुर्गों की देखरेख के लिए प्रोत्साहित किया गया। सरकार की ओर से वरिष्ठ नागरिकों को कई सुविधाएं दी जाती हैं। जैसे रेल टिकट में छूट, ट्रेन में नीचे की बर्थ, आयकर में छूट, बैंक एफडी पर ज्यादा ब्याज आदि। 

देश में बुजुर्गों हित के लिए इतने नियम-कानून होने के बावजूद बुजुर्ग यदि सड़कों पर भिखारियों का जीवन बिताने को विवश हैं तो इसके मूल दो कारण हैं- पहला कि उन्हें इन कानूनों एवं प्रावधानों ज्ञान नहीं है और दूसरा कारण कि वे संतान-मोह के कारण अपने बच्चों के दुर्व्यवहार के विरुद्ध भी आवाज़ नहीं उठाना चाहते हैं। बुजुर्गों के हितों की रक्षा के लिए जरूरी है कि वे सारे कानून और प्रावधान जो उनके हितों की रक्षा करते हैं, हर स्तर पर प्रचारित किए जाएं तथा स्कूली शिक्षा के पाठ्यक्रम में भी जोड़े जाएं। इससे बच्चों को भी इनका ज्ञान रहेगा और वे अन्याय करने से डरेंगे। वही दूसरी ओर यही बच्चे जब उम्र बढ़ने पर वृद्धावस्था या सीनियर सिटिजन के दौर में पहुंचेंगे तो उन्हें अपने अधिकारों का भली-भांति पता होगा। बहरहाल वर्तमान में जो वृद्धजन सड़कों पर भीख मांगने को विवश हैं उन्हें वृ़द्धाश्रमों में पहुंचा कर एक सम्मानजनक जीवन देना सरकार के साथ ही समाज के हर नागरिक का कर्त्तव्य बनता है। यह तय है कि अपने बुजुर्गों के प्रति संवेदनाओं को जगाए रखने से न तो वृद्धजन सड़कों पर भीख मांगने को मजबूर होंगे और ‘‘इंदौर-कांड’’ जैसी शर्मनाक घटना की पुनरावृत्ति भी कभी नहीं होगी। 

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(दैनिक सागर दिनकर 17.02.2021 को प्रकाशित)
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