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Thursday, October 30, 2014

‘साईको’ होते समाज के विरुद्ध

मित्रो, ‘इंडिया इन साइड’ के Oct 2014 अंक में ‘वामा’ स्तम्भ में प्रकाशित मेरा लेख आप सभी के लिए ....
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वामा (प्रकाशित लेख...Article Text....)

‘साईको’ होते समाज के विरुद्ध

- डॅा. (सुश्री) शरद सिंह

भारतीय रेलवे का बीना जंक्शन प्रशासनिक तौर पर एक छोटा-सा तहसीली इलाका है। इसी बीना शहर में एक नग्न युवती पेड़ों के पीछे छिपी हुई थी। इंसानों की उस पर दृष्टि पड़ी तो उसके इर्द-गिर्द भीड़ लगाने लगे। वह घबरा कर भागी। वह घबराई हुई युवती बदहवासी में बिजली के हाईटेंशन टाॅवर पर चढ़ती चली गई और लगभग 70 फुट की ऊंचाई पर पहुंच कर वह अपना संतुलन खो बैठी और गिर गई। 70 फुट की ऊंचाई से नीचे गिरते ही उसकी मौत हो गई। यह हृदयविदारक घटना घटी उस युवती के साथ जिसने अपना जीवन अभी ठीक से शुरू भी नहीं किया था। मध्यप्रदेश के डिंडौरी जिले के एक छोटे से गंाव की आदिवासी लड़की अपने और अपने परिवार के सपने को सच करने के लिए नौकरी का साक्षात्कार देने जबलपुर गई। फिर जबलपुर से इन्दौर गई। इन्दौर में चार युवकों ने उसे सहायता देने का झांसा दे कर उसके साथ बलात्कार किया। इसके बाद एक युवक उसे इन्दौर से बीना पहुंचा कर रेलवे स्टेशन पर छोड़ गया। बीना में भी उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया। दिन के उजाले में उस निर्वस्त्र युवती को भीड़ ने घेर लिया। वह आतंकित युवती भीड़ से भयाक्रांत हो कर आत्मघाती कदम उठा बैठी।
क्या यह मामूली-सी घटना है जिसके रोज घटित होने पर भी हम अख़बार का पन्ना पलट कर यह सोचते हुए आगे की ख़बर पर जा टिकते हैं कि यह हमारे परिवार की बेटी के साथ नहीं हुआ है और न ही कभी हो सकता है। कितनी अच्छी खुशफहमी में जीने लगे हैं हम? जो आज दूसरे के साथ घटा है वह हमारे परिजनों के साथ नहीं घट सकता है, इसकी क्या गारंटी? मानवता को लज्जित करने वाली इस घटना से ऐसा प्रतीत होने लगा है गोया समाज साइको हो चला है। बलात्कार का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। दिल्ली, मुंबई, बदायुं, बीना और न जाने कितने शहर। लगभग हर शहर, कस्बे या गंाव से लगभग प्रतिदिन बलात्कार की एक न एक घटना पढ़ने को मिल जाती है।
ऐसा कहा जाता है कि जब अंधेरा बढ़ रहा हो उसी समय आशा की किरण भी फूटती दिखाई देती है। यह किरण दिखाई दी बीना के इस जघन्य बलात्कार कांड के बाद। पोस्टमार्टम करने वाले चिकित्सक दम्पति ने पुलिस के हील-हवाले के बावजूद खुलासा किया कि युवती के साथ बलात्कार किया गया था। पोस्टमार्टम करने वाली चिकित्सक डाॅ. मंजू कैथोरिया ने कहा कि ‘मैं भी एक मां हूं, मेरे बच्चे भी बड़े हो रहे हैं। एक लड़की जो मौत के बाद भी मासूम लग रही थी। उसका शव हमारे सामने पड़ा थां शरीर पर जगी-जगी पर घाव थे। एकाएक ऐसा लगने लगा कि हमारे सामने ही उस युवती के सामथ कोई दुष्कर्म कर रहा हो। सारी हृदयविदारक घटना अंाखों के सामने झूलने लगी। जो उस लड़की के साथ हुआ, वह और किसी के साथ नहीं होना चाहिए। ऐसी घटनाएं हमें अन्दर तक हिला देती हैं। ऐसा करने वालों को हर हाल में सजा मिले।‘
जिसने भी इस घटना को सुना वह सचमुच भीतर तक हिल गया। लेकिन प्रतिरोध सामाजिक से अधिक राजनीतिक स्तर पर सामने आया। प्रदेश में भाजपा सरकार होने के कारण कांग्रेस ने हल्लाबोल किया। ऐसा लग रहा था कि मामला राजनीतिक हो कर रह जाएगा लेकिन उसी दौरान बीना शहर के अधिवक्ताओं ने वह कदम उठाया जो दिल्ली या मुंबई जैसे महानगरों के अधिवक्ताओं ने भी नहीं उठाया था। आतंक फैलाने की नीयत से भारत आए कसाब की ओर से लड़ने के लिए वकील उपलब्ध हो गया। निर्भया के बलात्कारियों को बचाने के लिए एक वकील ने एड़ी-चोटी का जोर लगाया। किन्तु बीना शहर के अधिवक्ताओं ने बलात्कारियों की पैरवी करने से मना कर दिया। उन्होंने एक स्वर से यही कहा कि -‘जो कृत्य इन सभी ने किया, उसके लिए पैरवी करना अपराधी का साथ देने के समान होगा।’
काश! यह जज़्बा, यह मानसिकता सकल समाज की बन जाए। यदि समाज अपराध सिद्ध बलात्कारियों का बहिष्कार करना शुरू कर दे, उन्हें बचाने के लिए आगे न आए तो बलात्कार जैसी अमानवीय घटनाओं पर अंकुश लग सकता है।
सर्वोच्च न्यायालय का भी कहना है कि बलात्कार से पीडि़त महिला बलात्कार के बाद स्वयं अपनी नजरों में ही गिर जाती है, और जीवनभर उसे उस अपराध की सजा भुगतनी पड़ती है, जिसे उसने नहीं किया। चिन्ता का विषय यह है कि हर वर्ष बलात्कार के मामलों में बढ़ोतरी होती जा रही है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार भारत में प्रतिदिन लगभग 50 बलात्कार के मामले थानों में पंजीकृत होते हैं। बहुत सारे मामलों की रिपोर्ट ही नहीं हो पाती। कभी पीडि़ता के परिवारवाले बदनामी के डर से पीछे हट जाने हैं, तो कभी रसूखवालों का दबाव उन्हें पीछे हटने को विवश कर देता है और कभी थाने में रिपोर्ट लिखने में कोताही बरती जाती है।
बलात्कार के अपराध को हल्के ढंग से नहीं लिया जा सकता है किन्तु दुख है कि समाज की मानसिक प्रवृत्ति इसे रोजमर्रा की मामूली घटना के रूप में लेने की बनती जा रही है। यदि राजनीतिक विरोध या प्रतिरोध सामने न आए तो शायद सामाजिक प्रतिरोध कहीं दिखाई ही नहीं देगा। यह स्थिति अत्यंत चिन्ताजनक है। इस बिगड़ रही मानसिकता में सबसे ज्यादा चिंता की बात तो यह है कि बलात्कार को घिनौना अपराध मानने की बजाए समाज के प्रतिनिधि इसके बेहूदे विश्लेषण जुट जाते हैं। कोई लड़की के पहनावे को दोषी ठहराता है तो कोई उसके अकेले घर से बाहर निकलने के प्रति उंगली उठाता है। इस पर भी तसल्ली नहीं होती है तो ‘‘लड़कों से भूल हो जाती है’’ जैसा बयान दे दिया जाता है।
निर्भया कांड के अपराधियों की सजा के संबंध में सुझाव देने के लिए गठित की गई जस्टिस जे.एस. वर्मा समिति ने यह महत्वपूर्ण सुझाव भी दिया था कि बेतुके बयान देने वाले जनप्रतिनिधियों की सदस्यता तत्काल खत्म कर दी जानी चाहिए। समिति के इस सुझाव पर अमल नहीं किया गया। न ही समाज के सोच में भी कोई बदलाव नहीं आया। दुर्भाग्य है कि निर्भया कांड के बाद आई जागरूकता मानो शीत निष्क्रियता में चली गई। बलात्कार की दर थमने की बजाए बढ़ती ही गई है। यदि बलत्कृत होती है तो यह भी लड़की का दोष है या फिर बलात्कारी चूंकि बेटा है इसीलिए उसे हर हाल में दण्ड से बचाना ही है। इस सोच को मानसिक रुग्गणता ही कहा जाएगा। इसी दूषित मानसिकता के चलते बलात्कार की प्रवृत्ति में बढ़ोत्तरी तो होगी ही। समाज को अपनी ही साइको (रुग्गण) मानसिकता के विरुद्ध खड़ा होना ही होगा तभी स्त्री के विरुद्ध बढ़ते जा रहे जघन्य अपराध थम सकेंगे।

India Inside, October 2014

Saturday, March 8, 2014

विधवाओं की दुर्दशा कब तक?




Dr Sharad Singh
महिला दिवस पर विशेष ......
मित्रो, ‘इंडिया इन साइड’ के March 2014 अंक में ‘वामा’ स्तम्भ में प्रकाशित मेरा लेख आप सभी के लिए ....
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                                                            - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह


हे र्इश्वर!
तू मुझे अगले जन्म में भी औरत ही बनाना
पर नहीं होने देना विधवा
नहीं भेजना मथुरा, वृन्दावन
नहीं देना अपनों का परायापन
मुझे हर जन्म में औरत होना ही क़बूल है
बस, तू मुझे रखना मनुष्यों के नहीं
मनुष्यता के बीच.....
मुझे हर जन्म में औरत होना ही क़बूल है....

मुझे याद आ रही है 'एक प्रार्थना शीर्षक की अपनी एक कविता। मार्च का महीना है न, और इस मार्च के महीने में 08 मार्च को 'महिला दिवस मनाया जाता है। हम मानने और मनाने में अग्रणी हैं। हम स्त्री को देवी मानते हैं और देवी तो काल्पनिक होती है। किसी भी देवी को किसी ने देखा नहीं है। फिर स्त्री का देवी रूप काल्पनिक ही तो हुआ न!
'एक प्रार्थना कविता में मथुरा या वृन्दावन में रहने वाली विधवा स्त्री की वेदना है। एक विधवा जिसे अपनों ने त्याग दिया और छोड़ दिया कहीं भी जा कर मरने को। ऐसी ही विधवाओं को सहारा मिलता है मथुरा, वृन्दावन के विधवाश्रमों में। चाहे सरकारी संस्थान हों या गैरसरकारी, वहां के सुव्यवस्थाओं और कुव्यवस्थाओं के ब्यौरे में जाने की आवश्यकता नहीं है। क्यों कि यह किसी से छिपा नहीं है। यदि करोड़ों की राशि खर्च कर के हम 40 साल पुरानी सैन्य-पनडुब्बी को 'अपडेट करते रहने का दम भर सकते हैं तो किसी विधवा-आश्रम में आर्थिक अनियमितता या कुव्यवस्थाएं तो बहुत छोटी बात हैं। ग़रीब आटोरिक्शा चालकों को हर दस साल में विवश किया जाता है कि वे अपने आटोरिक्शा बदल दें ताकि दुर्घटना को न्योता देने वाले पुराने वाहन सड़क से हट जाएं। वहीं चालीस साल पुरानी, छब्बीस साल पुरानी टेक्नालाजी वाली पनडुबिबयों को कैसे 'अपडेट किया जाता रहा? इतने पुराने स्कूटर्स तक के पाटर्स बाज़ार में नहीं मिल पाते हैं। लिहाजा जब देश की सुरक्षा पर भ्रष्टाचार के दांव खेले जा सकते हैं तो बेसहारा विधवाओं के लिए सुव्यवस्था की उम्मीद कैसे की जा सकती है। 
क्या हम कठोर हो गए हैं या हमारे आंसू सूख गए हैं? जबकि बी.बी.सी. के संवाददाता एंथोनी डेंसलोव का दिल रो पड़ा वृन्दावन की विधवाओं की दशा देख कर और उसने एक रिपोर्ट लिखी -'' कृष्ण के वृंदावन में अब गोपियाँ नहीं विधवाएं मिलती हैं। यह रिपोर्ट 25 मार्च 2013 को सामने आर्इ  थी। अपनी रिपोर्ट में एंथोनी डेंसलोव ने लिखा था कि -'' भारत में हर साल हजारों विधवाएं उत्तर प्रदेश के वृंदावन का रुख़ करती हैं. परिवारवालों ने उन्हें छोड़ दिया है और अब इस दुनिया में वे अकेली हैं। इनमें से कुछ तो सैकड़ों मील का सफ़र तय करने के बाद वृंदावन पहुंचती हैं लेकिन कोई नहीं जानता कि वो ऐसा क्यों करती हैं। भारत में मंदिरों और र्धामिक स्थलों की भरमार है। लेकिन यमुना के तट पर सिथत वृंदावन का खास महत्व है क्योंकि ये कृष्ण की नगरी है। वृंदावन में सैकड़ों मंदिर हैं और यहां हर किसी की जुबान पर कृष्ण और उनकी प्रेमिका राधा का ही नाम है। हर साल दुनियाभर से लाखों की संख्या में कृष्ण भक्त यहां पहुंचते हैं। लेकिन इस सबसे दूर वृंदावन का एक स्याह पहलू भी है। इसे विधवाओं के शहर के नाम से भी जाना जाता है। मंदिरों के बाहर आपको सादी सफेद साड़ियां पहने ये विधवाएं भीख मांगते मिल जाएंगी। इनमें से अधिकांश उम्रदराज होती हैं। भारत में विधवाएं अब सती नहीं होती हैं लेकिन जिंदगी अब भी उनके लिए बदतर है। विधवाओं को अशुभ माना जाता है. तमाम कानूनों के बाद आज भी उन्हें पति की संपतित से बेदखल कर दिया जाता है और वे दर-दर भटकने के लिए मजबूर हो जाती हैं। धार्मिक ज्ञान से भरे लोग हो या समाजशास्त्री इस सवाल का ठोस जवाब किसी के पास नहीं है कि वृंदावन में ऐसा क्या है कि पूरे भारत से खासकर बंगाल से विधवाएं यहां का रुख़ करती हैं। केवल वृंदावन में ही छह हजार विधवाएं हैं और आसपास के इलाक़ों में भी बड़ी संख्या में विधवाओं ने अपना ठिकाना बना रखा है। दूर दूर से विधवाएं वृंदावन में आकर रहती हैं। इनमें से कई तो अपनी बची खुची जिंदगी को राधा कृष्ण की सेवा में लगाने के इरादे से यहां पहुंचती है जबकि बाकी अपने परिजनों की बेरुखी और ज्यादतियों से बचने के लिए वृंदावन का रुख करती हैं। ये भारतीय समाज का ऐसा पहलू है जिसे सरकार दुनिया की नज़रों से छिपाना चाहेगी क्योंकि लाख कोशिशों के बावजूद ये समस्या सुलझाई नहीं जा सकी। 
एंथोनी डेंसलोव आगे लिखते हैं कि ''इनमें से कुछ पश्चिम बंगाल से 100 मील से भी अधिक दूरी तय करके यहां पहुंची हैं. कई बार वे खुद यहां पहुंचती हैं और कई बार उनके परिजन उन्हें यहां छोड़ जाते हैं। सैफ अली दास 60 साल की हैं लेकिन जमाने की मार ने उन्हें वक्त से पहले ही बूढ़ा बना दिया है. उन्होंने कहा कि उनके पति पियक्कड़ थे और 12 साल पहले उनका देहांत हो गया था। उनकी एक बेटी थी जो अस्पताल में चल बसी और बेटे का संपत्ति विवाद में खून हो गया। बेटे की मौत के बाद उनकी दुनिया वीरान हो गई और उन्होंने बाकी का जीवन वृंदावन में बिताने का फैसला किया। वहीं सोंदी 80 साल की हैं. उनके पति का जवानी में ही निधन हो गया था. उनके बच्चे हैं लेकिन जीवन की सांध्य बेला में बहू ने उन्हें बेघर कर दिया। बहुत सी विधवाएं मंदिरों में भजन गाती हैं या फिर भीख मांग कर गुजारा करती हैं। विधवाओं के लिए चार आश्रम संचालित किए जा रहे हैं लेकिन अधिकांश किराए के मकान में रहती हैं और किराया चुकाने के लिए भीख मांगती हैं।’’

संस्कृति के धनी इस भारत देश में लोग अभी भी इतने निर्मम हैं कि जो स्त्री एक परिवार को संवारने के लिए अपने माता-पिता, घर, गांव को छोड़ कर विवाहिता के रूप में आती है। उसे विधवा होते ही लांछन और प्रताड़ना कर शिकार बना देते हैं। उसे घर से धक्के मार कर निकाल देते हैं। भले ही उसके पास जीने, रहने का कोर्इ आसरा न हो। इस 21वीं सदी में भारतीय स्त्री की प्रगति का दंभ करने से पहले एक बार गंभीरतापूर्वक खंगालना खहिए उन कारणों को जो विधवाओं को आश्रमों में शोषित होने के लिए विवश कर रहे हैं। आवश्यकता है इस विषय पर समाज के हर वर्ग को आत्मावलोकन की।
जिस दिन विधवाएं सामाजिक एवं पारिवारिक प्रताड़ना के कारण आश्रमों में तिल-तिल कर मरने को विवश नहीं होंगी और उन्हें अपने समाज तथा परिवार में भरपूर आत्मीयता मिलेगी, सम्मान मिलेगा तभी कोर्इ अर्थ रहेगा 'महिला दिवस उत्सव के रूप में मनाने में। है न! 
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Friday, July 27, 2012

बीड़ी जलाइ ले ....

  - डॉ. शरद सिंह
 
जागरूकता के अभाव में बीड़ी बनाने वाली महिलाओं और उनके परिवार के सदस्यों पर ज़बर्दस्त खतरा मंडराता रहता है।
                                                                    

      मालती बीड़ी बनाती है। जिस समय मालती बीड़ी बनाती है उस समय उसका बेटा उसकी गोद में लेटा हुआ किलकारियां भरता रहता है। उस दौरान नियमित रूप से प्रतिदिन तम्बाकू के बारीक कण मालती और उसके दुधमुंहे बेटे की सांसों में प्रवेश करते रहते हैं। मालती नहीं जानती है कि बीड़ी लपेटने का काम उसे नाक-मुंह पर कपड़ा बांध कर करना चाहिए। मालती नहीं जानती है कि लगातार बैठे-बैठे बीडि़यां लपेटने से उसकी उंगलियों में उठने वाली मरोड़ और कमर में होने वाले दर्द से कैसे बचा जाए? मालती नहीं जानती है कि इस काम ने जिस प्रकार उसकी मंा को अस्थमा का मरीज बनाया उसी तरह उसे या उसके बेटे को किसी भी प्राणघातक बीमारी से जकड़ सकता है। वह तो बस इतना जानती है कि बीडि़यां बना कर वह अपने परिवार को कम से कम एक समय की रोटी तो दे ही सकती है। वह सिर्फ़ इतना जानती है कि यदि बीड़ी न होती तो वह और क्या बनाती? उसे तो और कुछ बनाना आता ही नहीं है। बीड़ी लपेटने का काम मालती के परिवार को जीने का सहारा तो दे रहा है लेकिन उनसे बदले में धीरे-धीरे जीवन ले भी रहा है। यही विडम्बना है इस काम की। 
‘इंडिया इनसाइड’ के जुलाई 2012 अंक  में प्रकाशित डॉ शरद सिंह का लेख

सुहागरानी की कहानी इससे अलग नहीं है। विवाह के साल भर बाद सुहागरानी ने एक बेटे को जन्म दिया।  अपनी गोद में अपने बेटे को लिटा कर वह पूरी-पूरी दोपहर बीडि़यां लपेटती रहती। वह अपने बेटे के लिए पैसे जोड़ना चाहती थी। सट्टेदार उसके पति का परिचित था अतः उसकी बनाई बीडि़यों में ‘छट्टा की बीडि़यां’ (ख़राब बनी बीडि़यां) अधिक नहीं निकलती थीं। उसे अमूमन ठीक-ठाक पैसा मिल जाता था। सुहागरानी ने अपने इकलौते बेटे के लिए बीडि़यां बना कर अतिरिक्त पैसे जोड़े किन्तु बदले में अपने बेटे से उसका स्वास्थ्य छीन लिया। सुहागरानी के बेटे को तीन वर्ष की आयु में पहुंचते तक दमा रोग हो गया। सुहागरानी और उसके पति ने अपने बेटे का बहुत इलाज कराया किन्तु विशेष लाभ नहीं हुआ। बीड़ी में भरे जाने वाले ज़र्दा (तम्बाकू) के कण उसके बेटे के फेफड़ों पर अपना असर दिखा चुके थे। दवाओं के कारण इतना अवश्य हुआ कि सुहागरानी का बेटे जीवित है, दमे के रोगी का जीवन जी रहा है। दुर्भाग्यवश, सुहागरानी यह मानने को कभी तैयार नहीं हुई कि उसके बीडि़यां बनाने के दौरान वातावरण में उड़ने वाले ज़र्दे के कण (पार्टीकल्स) के कारण उसके बेटे को दमा हुआ। परिणामतः उसने बीडि़यां लपेटना अनवरत जारी रखा है।
देश में लगभग 50 लाख श्रमिक बीड़ी श्रमिक के रूप में कार्यरत हैं जिनमें अधिकांश महिला श्रमिक हैं। बीड़ी उद्योग मनुष्य द्वारा तम्बाकू के प्रयोग से जुड़ा एक महत्वपूर्ण उद्योग है। इस उद्योग में बीड़ी लपेटने का काम मुख्य रूप से औरतों द्वारा किया जाता है। ये औरतें प्रमुखतः निम्न आर्थिक वर्ग की रहती हैं। इनकी आर्थिक स्थिति ही इन्हें बीड़ी लपेटने के कार्य के लिए प्रेरित करती है। इसके साथ ही दूसरा प्रेरक कारण होता है इनका सामाजिक बंधन और तीसरा, अशिक्षा।
 बीड़ी लपेटने (बीड़ी रोलिंग) का काम करने वाली औरतें उस वर्ग की रहती हैं जिसमें शिक्षा का प्रसार न्यूनतम है। ऐसे लगभग प्रत्येक परिवार की एक ही कथा है कि आमदनी कम और खाने वाले अधिक। जिसके कारण एक अप्रत्यक्ष चक्र चलता रहता है -आर्थिक तंगी के कारण अपने बच्चों को शिक्षा के बदले काम में लगा देना इस प्रकार के अधिकांश व्यक्ति अकुशल श्रमिक के रूप में अपना पूरा जीवन व्यतीत कर देते हैं। ठीक यही स्थिति इस प्रकार के समुदाय की औरतों की रहती है। ऐसे परिवारों की बालिकाएं अपने छोटे भाई-बहनों को सम्हालने और अर्थोपार्जन के छोटे-मोटे तरीकों में गुज़ार देती हैं। इन्हें शिक्षित किए जाने के संबंध में इनके माता-पिता में रुझान रहता ही नहीं है। ‘लड़की को पढ़ा कर क्या करना है?’ जैसा विचार इस निम्न आर्थिक वर्ग पर भी प्रभावी रहता है। इस वर्ग में बालिकाओं का जल्दी से जल्दी विवाह कर देना उचित माना जाता है। ‘आयु अधिक हो जाने पर अच्छे लड़के नहीं मिलेंगे’, जैसे विचार अवयस्क विवाह के कारण बनते हैं। छोटी आयु में घर-गृहस्थी में जुट जाने के बाद शिक्षित होने का अवसर ही नहीं रहता है।
‘इंडिया इनसाइड’ के जुलाई 2012  

मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में फैले बुन्देलखण्ड भू-भाग में औरतों को आज भी पूरी तरह से काम करने की स्वतंत्रता नहीं है। गांव और शहरी क्षेत्र, दोनों स्थानों में आर्थिक रूप से निम्न तथा निम्न मध्यम वर्ग के अनेक परिवार ऐसे हैं जिनके घर की स्त्रियां आज भी तीज-त्यौहारों पर ही घर से बाहर निकलती हैं और वह भी घूंघट अथवा सिर पर साड़ी का पल्ला ओढ़ कर। इस परिवेश में बीड़ी लपेटने का काम मुख्य रूप से औरतों द्वारा किया जाना स्वाभाविक है। यह काम ऐसा है जिसे वे अपने घर के किसी कोने में बैठ कर, सिर पर पल्ला या घूंघट ओढ़ कर भी कर सकती हैं। इसीलिए बुन्देलखण्ड में बीड़ी लपेटने के काम में औरतों की संलग्नता सर्वाधिक है। 
बीड़ी महिला श्रमिकों द्वारा समय-समय पर अपनी समस्याओं को ले कर प्रदर्शन एवं आंदोलन किए जाते हैं। ‘सेवा’ जैसे अनेक सामाजिक संगठन तथा श्रमिक संगठन उनके इस प्रयास को सहायता एवं समर्थन देते रहते हैं। स्थानीय स्तर पर भी आवाज़ें उठाई जाती हैं। किन्तु जागरूकता का अभाव होने के कारण बीड़ी बनानेवालियों और उनके परिवार के सदस्यों को स्वास्थ्य के प्रति जोखिम से छुटकारा अभी भी नहीं है। 
(‘इंडिया इनसाइड’ के जुलाई 2012 अंक में मेरे स्तम्भ ‘वामा’ में प्रकाशित मेरा लेख साभार)