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Wednesday, June 21, 2023

चर्चा प्लस | योग, स्वास्थ्य और स्लम बस्तियां | विश्व योग दिवस | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
योग, स्वास्थ्य और स्लम बस्तियां
(विश्व योग दिवस पर विशेष)
        - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह  
         संयुक्त राष्ट्र महासभा में ‘‘विश्व योग दिवस’’ घोषित करा कर प्रधानमंत्री ने विश्वस्तर पर योग को स्थापना दिलाई। ताकि दुनिया के हर व्यक्ति तक योग पहुंच सके। अफ़सोस कि हमारे देश में ही स्लम बस्तियों तक  योग की हज़ारों साल पुरानी पद्धति आज तक नहीं पहुंच सकी है। यूं भी, श्रेष्ठ मार्गदर्शक के बिना योगासनों को करना जोखि़म भरा होता है। इसीलिए हर व्यक्ति उससे नहीं जुड़ सका, और न जुड़ सकता है। उच्चवर्ग से मध्यमवर्ग तक तो योग पहुंच गया है किन्तु बीपीएल कार्डधारी एक बड़ा वर्ग आज भी योग और उसके लाभों से बहुत दूर है। इस दूरी को मिटाने की दिशा में राज्य सरकारों को विचार करना चाहिए। मुफ़्त सामान, रुपया आदि देने के साथ मुफ़्त में योग रूपी स्वस्थ जीवनशैली भी उपलब्ध कराएं, तो इससे उनका अधिक हित होगा।
21 जून 2023, योग दिवस। निःसंदेह भारतीय योग शास्त्र का लोहा समूचा विश्व मानता है। वर्तमान में विश्व के अनेक देशों में योग संस्थाएं मौजूद हैं। लोग समझ चुके हैं कि योग, दवाओं पर निर्भरता को कम करता है और एक स्वस्थ जीवन देता है। वस्तुतः योग अपने आप में एक स्वस्थ जीवन शैली है और एक स्वस्थ जीवन शैली को जीने वाला व्यक्ति बीमार कैसे पड़ सकता है? यदि वातावरण भी प्रदूषित न हो कर शुद्ध रहता तो योग के बल पर बीमारियों हम स्वयं से कोसों दूर रख सकते थे। किन्तु विश्व योग दिवस पर मुझे अपना वह प्रश्न और प्रस्ताव याद आ रहा है जो मैंने मई 2016 में उज्जैन के सिंहस्थ महाकुंभ के दौरान उज्जैन के पास ही निनौरा नामक स्थान में हुए अंतरराष्ट्रीय विचार महाकुंभ के योग सत्र में योगाचार्यों के सम्मुख रखा था। उस सत्र में परमानंद इंस्ट्यूट आॅफ योगा साईंस, इंडिया के योगाचार्यों के साथ ही तिब्बतीमूल के एक योगगुरु (अफ़सोस कि मुझे अब उनका नाम याद नहीं है) भी आए थे।
 
सत्र में चर्चा चल रही थी कि समाज के प्रत्येक स्तर तक योग की पहुंच कैसे बनाई जाए? एक योगाचार्य ने बताया कि उनके पास उच्चवर्ग एवं मध्यवर्ग के ऐसे लोग भी आए जिन्हें शराब, भांग, अफीम आदि की लत थी। वे भी योग के विभिन्न आसनों एवं ध्यान साधना के द्वारा नशे की लत से मुक्त हो गए। अतः योग समाज में अच्छे संस्कार एवं व्यवहार को बढ़ाने में मदद कर सकता है। उन सभी योगाचार्यों की बातें सुनने के बाद मुझसे रहा नहीं गया और मैंने उनसे प्रश्न किया कि आप लोगों ने योग और जनजीवन के पारस्परिक संबंध की जितनी भी जानकारियां यहां दीं, उसमें झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले मजदूर वर्ग की चर्चा तो आई ही नहीं। जबकि सबसे अधिक नशा करने वाले स्लम बस्तियों में मिलते हैं, सबसे अधिक बीमारियों का प्रकोप स्लम बस्तियों पर होता है और स्लम बस्तियों के रहवासी भी गहरे मानसिक तनाव से गुज़रते हैं। फिर मैंने प्रस्ताव रखा कि झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों के लिए भी दैनिक नहीं तो कम से कम साप्ताहिक योग प्रशिक्षण का कोई अभियान चलाया जा सकता है। इस पर एक योगाचार्य ने बताया कि उनके शिष्यों द्वारा मुंबई में यह प्रयास किया गया किन्तु बहुत अधिक प्रभावी नहीं रहा। उन लोगों को राजी करना कठिन होता है। वे सोचते हैं कि इसमें पैसे तो मिलने नहीं है तो हम अपना समय क्यों खराब करें?

उन योगाचार्य की बात में दम थी। जिसके पास पैसों की तंगी हो वह हर अवसर में पैसे पाने की ही चाह रखेगा। यह स्वाभाविक है। लेकिन यदि हम उन्हें सही ढंग से यह समझा सकें कि यदि वे योग और ध्यान को अपनाते हैं तो कम बीमार पड़ेगे और अधिक काम कर के अधिक पैसे कमा सकेंगे, तो शायद वे एक बार योग की दुनिया में कदम रख कर देखेंगे। आखिर स्लम बस्तियों में स्कूल चलाना और गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों के बच्चों को पढ़ाना भी किसी चुनौती से कम नहीं रहा है। लेकिन समाजसेवी शिक्षकों ने हार नहीं मानी। हर स्थिति में टिके रहे। यहां तक कि प्रौढ़ शिक्षा की कक्षाएं भी कई इलाकों में सफलतापूर्वक चलाई गईं और प्रौढ़ों को शिक्षित किया गया। तो फिर योग का रास्ता स्लम बस्तियों की ओर क्यों नहीं मुड़ सकता है? प्रश्न उठाया था मैंने 2016 में लेकिन 2023 में भी वह अनुत्तरित है।      

वैश्विक स्तर पर योग को लोकप्रिय बनाने की दिशा में उस समय एक बड़ा कदम माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा उठाया गया जब उन्होंने 27 सितम्बर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने भाषण में कहा था कि -‘‘योग दिमाग और शरीर की एकता का प्रतीक है। मनुष्य और प्रकृति के बीच सामंजस्य है। विचार, संयम और पूर्ति प्रदान करने वाला है तथा स्वास्थ्य और भलाई के लिए एक समग्र दृष्टिकोण को भी प्रदान करने वाला है। यह व्यायाम के बारे में नहीं है, लेकिन अपने भीतर एकता की भावना, दुनिया और प्रकृति की खोज के विषय में है। हमारी बदलती जीवनशैली में यह चेतना बनकर, हमें जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद कर सकता है।’’

प्रधानमंत्री ने अपील की कि योग को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थान दिया जाए। प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी की अपील के बाद 27 सितंबर 2014 को ही संयुक्त राष्ट्र महासभा में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के प्रस्ताव को अमेरिका द्वारा मंजूरी दी गई। 21 जून को ‘‘अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस’’ घोषित किए जाने के बाद 11 दिसम्बर 2014 को संयुक्त राष्ट्र के 177 सदस्यों द्वारा 21 जून को ‘‘ अंतरराष्ट्रीय योग दिवस’’ को मनाने के प्रस्ताव को अंतिम मंजूरी मिली। जिसके बाद सर्वप्रथम इसे 21 जून 2015 को पूरे विश्व में ‘‘विश्व योग दिवस’’ के नाम से मनाया गया। प्रधानमंत्री मोदी के इस प्रस्ताव को 90 दिन के अन्दर पूर्ण बहुमत से पारित किया गया, जो संयुक्त राष्ट्र संघ में किसी दिवस प्रस्ताव के लिए सबसे कम समय है।

इसके पूर्व ‘‘योग: विश्व शान्ति के लिए एक विज्ञान’’ नामक सम्मेलन 4 से 5 दिसम्बर 2011 के बीच आयोजित किया गया था। यह संयुक्त रूप से लिस्बन, पुर्तगाल के योग संघ, आर्ट ऑफ लिविंग फाउण्डेशन और एस.वी.वाई.ए.एस, योग विश्वविद्यालय, बेंगलुरु के द्वारा आयोजित किया गया। उस सम्मेलन में सदस्य के रूप में उपस्थित थे- श्री श्रीरवि शंकर, संस्थापक, आर्ट ऑफ लिविंग, आदि गिरि मठ के श्री स्वामी बाल गंगाधरनाथ, स्वामी परमात्मानंद, हिन्दू धर्म आचार्य सभा के महासचिव बीकेएस अयंगर, राममणि आयंगर मेमोरियल योग संस्थान, पुणेय स्वामी रामदेव, पतंजलि योगपीठ, हरिद्वार, डॉ. नागेन्द्र, विवेकानन्द योग विश्वविद्यालय, बंगलुरू, जगत गुरु अमृत सूर्यानन्द महाराज, पुर्तगाली योग परिसंघ के अध्यक्षय अवधूत गुरु दिलीपजी महाराज, विश्व योग समुदाय, सुबोध तिवारी, कैवल्यधाम योग संस्थान के अध्यक्षय  डॉ.   डी.आर कार्तिकेयन, कानून-मानव जिम्मेदारियों व कारपोरेट मामलों के सलाहकार और डॉ॰ रमेश बिजलानी, श्री अरबिन्दो आश्रम, नई दिल्ली।

ऐसा माना जाता है कि जब से सभ्यता शुरू हुई है तभी से योग किया जा रहा है। योग के विज्ञान की उत्पत्ति हजारों साल पहले हुई थी, पहले धर्मों या आस्था के जन्म लेने से काफी पहले हुई थी। योग विद्या में शिव को पहले योगी या आदि योगी तथा पहले गुरु या आदि गुरु के रूप में माना जाता है। यह भी कहा जाता है कि कई हजार वर्ष पहले, हिमालय में आदि योगी ने अपने प्रबुद्ध ज्ञान को अपने प्रसिद्ध सप्तऋषि को प्रदान किया था।  सप्तऋषियों ने योग के इस विज्ञान को एशिया, मध्य पूर्व, उत्तरी अफ्रीका एवं दक्षिण अमरीका सहित विश्व के भिन्न - भिन्न भागों में पहुंचाया। सूर्य नमस्कारपूर्व वैदिक काल (2700 ईसा पूर्व) में एवं इसके बाद पतंजलि काल तक योग किए जाने के साक्ष्य मिलते हैं। वेदों, पुराणों, उपनिषदों, स्मृतियों, बौद्ध ग्रंथों, जैन ग्रंथों एवं महाकाव्यों में योग की वृहद चर्चा है।

योग मनुष्य के जीवन में काफी महत्वपूर्ण होता है। योग मनुष्य को स्वस्थ बनाए रखने का कार्य करता है। जो लोग योग करते है, वें मानसिक व शारीरिक दोनों रूप से स्वस्थ रहते है। योग से मन को शांति मिलती है। वर्तमान समय में जिस स्तर से रोग बढ़ रहे है, उसमें योग और भी अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। योग करने से व्यक्ति इन सभी बीमारियों से आसानी से लड़ सकता है। योग करने से कईं बीमारियाँ, जैसे- हृदय रोग, रक्तचाप की समस्या, अर्थराईटिस आदि से छुटकारा प्राप्त किया जा सकता है। योग करने से मोटापा भी नहीं आता है और शरीर जल्दी से थकता भी नहीं है। भारत में हजारों वर्षों से योग किया जाता रहा है। यह एक प्रकार का व्यायाम है जिसमे कई प्रकार के आसन शामिल है। योग हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढाता है तथा हमे शारीरिक तथा मानसिक रूप से स्वस्थ रखता है एवं शरीर के अंगो को लाभ पहुचता है। पुराने समय से योग को एक स्वस्थ जीवनशैली के लिए उपयोग किया जाता आ रहा है। हर किसी को योग करना चाहिए यह हमारी मानसिक क्षमता को भी बढ़ाता है। नियमित योग करने से अनेक लाभ मिलते है। यह हमारे मस्तिष्क को मजबूत करता है और हमारे शरीर की मांसपेशियों के लिए भी लाभकारी है। अब तो विज्ञान ने भी सिद्ध कर दिया है कि प्रतिदिन योग करने से हमे कई लाभ मिलते हैं।
 
योग को किसी धर्म, जाति या समुदाय विशेष से जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए। यह एक स्वस्थ जीवन जीने की शैली है। यूं भी प्रत्येक धर्म के संतों एवं महापुरुषों ने किसी न किसी रूप में योग को अपनी जीवनचर्या बनाया था। तप, ध्यान, साधना आदि योग के ही तो अंग हैं। योग के मार्ग पर चल कर ही उन्होंने अपने जीवन को अपनी इच्छानुसार दिशा दी अतः हमें भी योग को अपनाना चाहिए, बल्कि अपनी दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा बनाना चाहिए।

लेकिन मैं योग पर इस चर्चा को उसी बिन्दु पर ला कर रोकना चाहूंगी जिस बिन्दु पर इस चर्चा में स्लम बस्तियों के लिए योग का अभियान प्लस हो सके। जो गरीब योग संस्थानों तक चल कर नहीं जा सकते हैं क्या योग केन्द्र उनकी बस्तियों तक नहीं पहुंच सकते हैं? योग जनहित भी तो सिखाता है। अन्यथा यदि स्वास्थ्य सेवाओं के संबंध में विचार करें, तो कई बार लगता है कि उच्चस्तरीय और अत्याधुनिक स्वास्थ्य सेवाएं सिर्फ़ पैसे और कुर्सी वालों के लिए ही होती है, गरीब तबका आज भी सरकारी स्वास्थ्य कार्ड बनवा कर अच्छी स्वास्थ्य सेवाएं हासिल नहीं कर पाता है। किसी मंत्री अथवा उच्चाधिकारी को छींक भी पड़ती है तो एक इशारे पर एम्बुलेंस उसके बंगले के दरवाज़े पर खड़ी दिखाई देती है, वहीं एक गरीब व्यक्ति को अपने बेटे का शव भी थैले में रख कर घर तक ले जाना पड़ता है। हम बोलें या न बोलें पर, सरकारी और गैरसरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के सच से हम सभी परिचित हैं। अतः कम से कम योग को जन-जन तक पहुंचना चाहिए। मंहगी दवाएं खरीदने की हैसियत न रखने वालों को योग की निःशुल्क सेवाएं मिलनी ही चाहिए। अच्छा स्वास्थ्य पाना एक नागरिक की हैसियत से उनका भी तो अधिकार है। नीमहकीमों के हाथों खिलवाड़ बनने से वे बचेंगे। बाबा रामदेव के बारे में हम कितनी भी विपरीत सोच रखें, लेकिन यह तो मानना ही पड़ता है कि उन्होंने आयुर्वेदिक औषधियों को हर परिवार के बजट के अनुकूल बनाने का महत्वपूर्ण कार्य किया। योग को भी उन्होंने लोकप्रिय बनाया। प्रधानमंत्री ने  विश्वस्तर को योग को स्थापना दिलाई। किन्तु श्रेष्ठ मार्गदर्शक के बिना योगासनों को करना जोखिम भरा होता है। इसीलिए हर व्यक्ति उससे नहीं जुड़ सका ओर न जुड़ सकता है। उच्चवर्ग से मध्यमवर्ग तक तो योग पहुंच गया है किन्तु बीपीएल कार्डधारी एक बड़ा वर्ग आज भी योग और उसके लाभों से बहुत दूर है। इस दूरी को मिटाने की दिशा में राज्य सरकारों को विचार करना चाहिए। मुफ्त सामान, रुपया आदि देने के साथ मुफ्त में स्वस्थ जीवनशैली भी उपलब्ध कराएं तो उनका अधिक हित होगा।  
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Wednesday, August 17, 2016

चर्चा प्लस ... स्वतंत्रता, स्वास्थ्य, सुरक्षा और स्त्री .... डाॅ. शरद सिंह

Dr Sharad Singh
मेरा कॉलम  ‪"चर्चा प्लस"‬ "दैनिक सागर दिनकर" में (17. 08. 2016) .....
 
My Column ‪Charcha Plus‬ in "Dainik Sagar Dinkar" .....
  स्वतंत्रता, स्वास्थ्य, सुरक्षा और स्त्री
- डॉ शरद सिंह
समाज की भांति हिन्दी व्याकरण भी पुरुष प्रधान है। अंग्रेजी में व्यक्तिवाचक संज्ञा के लिए प्रथम, द्वितीय, तृतीय के साथ ‘पर्सन’ अर्थात् ‘व्यक्ति’ जुड़ा होता है। यह ‘पर्सन’ (व्यक्ति) पुरुष भी हो सकता है और स्त्री भी किन्तु, हिन्दी भाषा के व्याकरण में मानो स्त्री न तो कोई व्यक्ति है और न व्यक्तिवाचक संज्ञा। प्रथम है तो पुरुष, द्वितीय है तो पुरुष और तृतीय है तो पुरुष, फिर स्त्री के लिए जगह कहां हैं? क्या स्त्री का अस्तित्व मात्र लिंग तक सीमित हैं? मैं न तो व्याकारण की आधिकारिक ज्ञाता हूं और न आधिकारित व्याख्याकार, लेकिन एक स्त्री होने के नाते यह बात मुझे सदैव चुभती है।
स्वतंत्रता मात्र एक शब्द नहीं, असीमित संभावनाओं एवं असीमित सकारात्मकता के द्वार की चाबी है। इस चाबी से देष के बहुमुखी विकास का द्वार तो खुला ही, स्त्री के अधिकारों का द्वार भी खुला। सन् 1947 से सन् 2016 तक के लम्बे सफर में स्त्री ने प्रगति के अनेक सोपान चढ़े हैं। फिर भी बहुत कुछ बुनियादी स्तर पर छूटा हुआ है। विषेष रूप से मध्यमवर्गीय और ग्रामीण अंचलों में तस्वीर अभी श्वेत-ष्याम दिखाई देती है। इन तबकों में बेटे की ललक स्त्री को आज भी बाध्य करता है कि वह बेटी पैदा करने के बारे में सोचे भी नहीं। विवाह के समय बहू के साथ ढेर सारा दहेज मिले। स्त्री परिवार की सदस्य तो रहे किन्तु मुखिया बनने का स्वप्न न देखे। अर्थात् स्त्री परिवार की अनुमति के बिना न तो कमाने की सोचे और न खर्च करने के बारे में विचार करे, परिवार से संबंधित महत्वपूर्ण निर्णय भी लेने के बारे में न सोचे। आज भी यह कटुसत्य स्त्रीप्रगति की तस्वीर को मुंहचिढ़ाता रहता है। स्त्री के विरुद्ध होने वाले अपराधों के आंकड़े भी घटने का नाम नहीं ले रहे हैं। जिस तरह महाभारत काल में भरे दरबार में दुश्शासन ने द्रौपदी का चीर हरण करने का दुस्साहस किया था, वैसा दुस्साहस आजकल बलात्कार के रूप में समाचारों की सुर्खियां बनता रहता है। उस जमाने में कृष्ण ने द्रौपदी की रक्षा की थी लेकिन इस जमाने में दुश्शासन तो बहुतेरे हैं लेकिन कृष्ण जैसे साहस का अभाव है।

Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper
 स्वास्थ्य की बुनियाद
स्त्री बुनियाद है परिवार की। वह बच्चों को जन्म देती है और उनकी परवरिष करती है। लेकिन इसी स्त्री की षिक्षा और स्वास्थ्य के बारे में आंकड़े अधिक बोलते हैं, सच्चाई कम। राजनीतिक हलकों अथवा सरकारों को स्त्री-स्वास्थ्य जच्चा-बच्चा के टीकाकरण तक ही सीमित दिखाई देता रहा है। पहली बार मध्यप्रदेष सरकार ने एक महत्वपूर्ण घोषणा की कि छात्राओं को सैनेटरी पेड्स मुफ़्त उपलब्ध कराए जाएंगे। स्त्री-जीवन के जिस सबसे महत्वपूर्ण पक्ष की ओर कभी ध्यान नहीं दिया गया उस ओर ध्यान दिया जाना इस बात का द्योतक कहा जा सकता है कि स्त्री के स्वास्थ्य के प्रति एक राज्य-सरकार का ध्यान आकृष्ट तो हुआ। बाकी राज्य सरकारों को भी बिना किसी राजनीतिक पूर्वाग्रह के इस कदम को अपनाना चाहिए। क्योंकि जो परिवार गरीबीरेखा ने नीचे जी रहे हैं अथवा जिनमें स्त्री-स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता नहीं है, उन परिवारों की बेटियों को मासिकधर्म के समय स्वच्छ साधन उपलब्ध हो सके। मासिकधर्म वह प्रक्रिया है जो स्त्री के जननी बनने में अहम भूमिका निभाती है।
नई दिल्ली लोधी रोड स्थित सभागार में 15 फरवरी, 2012 को केन्द्रीय पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय द्वारा ग्रामीण स्वच्छता प्रवर्द्धन हेतु राष्ट्रीय परामर्श का आयोजन किया गया था। इस कार्यक्रम का मुख्य मुद्दा शौचालय था। चर्चा में हिस्सा लेने वाले प्रमुख गैर-सरकारी संगठनों ने बहुत विस्तार से इस मुद्दे पर बातचीत की कि भारत की निरन्तर बढ़ती मलिन बस्तियों और ताल-तलैयों में बैक्टीरिया के बढ़ने से अनेक बीमारियां पैदा होती हैं और देशभर में ग्रामीण इलाके के लोग उससे प्रभावित होते हैं।
02 अक्टूबर 2014 को मोदी सरकार ने ‘स्वच्छ भारत अभियान’ के अंतर्गत ख्ुाले में शौच से मुक्ति की ओर कदम बढ़ाने का खुला आह्वान किया। स्त्री-जीवन की सुऱक्षात्मक प्रगति के पक्ष में ‘‘सोच से शौचालय तक’’ का यह कदम स्वागत योग्य रहा है। किन्तु इसके लिए जनजागरूकता सबसे अधिक जरूरी है। यह तो आमजनता को ही समझना पड़ेगा न कि एक स्वस्थ औरत ही स्वस्थ पीढ़ी को जन्म दे सकती है और एक स्वस्थ औरत ही बहुमुखी प्रगति कर सकती है। 

सुरक्षा का प्रश्न
एक और बुनियादी समस्या जिसके बारे में लगभग दस वर्ष से भी पहले मैंने एक कहानी लिखी थी ‘मरद’। कहानी का सार यही था कि सुंदरा नाम की एक नवयुवती विवाह के उपरान्त अपने ससुराल आती है, जहां उसे खुले में शौच के लिए जाना पड़ता है। जब तक उसकी सास या उसकी सहेलियां उसके साथ जाती हैं तब तक वह सरपंच की कुदुष्टि से बची रहती है। लेकिन एक दिन अकेले जाने पर सुंदरा सरपंच की हवस की षिकार हो जाती है। वह पुलिस के पास जाना चाहती है लेकिन उसकी सास उसे चुप रहने को मना लेती है, उसका पति भी उसे चुप रहने को कहता है। कुछ वर्ष बाद जब कुदृष्टि के काले साए सुंदरा की अवयस्क बेटी चमेली पर मंडराने लगते हैं तो वह चुप न बैठ कर रौद्र रूप धारण कर लेती है और अपने दम पर शौचालय बनवाने की घोषणा करती हुई ललकार कर अपने पति से कहती है -‘‘‘‘तू बैठ के सोच! आ के देखे तो साला सरपंच, गाड़ दूंगी उसे खुड्डी में...अब मैं वो सुंदरा नहीं कि तेरे कहे से चुप बैठूं, अब मैं मंा हूं चमेली की! समझे!’’
यह सभी जानते हैं कि सारे के सारे अपराध पुलिस के रोजनामचे तक नहीं पहुंच पाते हैं, कुछ पहुचते हैं तो दर्ज़ नहीं हो पाते हैं और कुछ दर्ज़ होते भी हैं तो वे या तो वापस ले लिए जाते हैं अथवा प्रताड़ित को लांछन की असीम वेदना सहते हुए दम तोड़ देना पड़ता है। एक ओर देश की आजादी का उत्सव और दूसरी ओर यह अप्रिय लगने वाला दुखद प्रसंग। लेकिन सच तो सच ही रहेगा कि जिस घड़ी कल्पना चावला अंतरिक्ष में उड़ान भर रही थी, ठीक उसी समय देष के किसी दूर-दराज़ ग्रामीण क्षेत्र में शौच के लिए जाती स्त्री बलात्कार की षिकार हो रही थी। कल्पना चावला के रूप में स्त्री की वैष्विक प्रगति को सबने देखा किन्तु उस बलत्कृत स्त्री की तो रिपोर्ट भी दर्ज़ नहीं हो पाई। भारतीय स्त्री के जीवन का यह स्याह पक्ष एक धब्बा है देश की तमाम प्रगति पर। यदि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद महिलाओं की एक पीढ़ी का बहुमुखी विकास हो चुका होता तो आज देश में महिलाओं की दशा का परिदृश्य कुछ और ही होता। उस स्थिति में न तो दहेज हत्याएं होतीं, न मादा-भ्रूण हत्या और न महिलाओं के विरुद्ध अपराध का ग्राफ इतना ऊपर जा पाता। उस स्थिति में झारखण्ड या बस्तर में स्त्रियों को न तो ‘डायन’ घोषित किया जाता और न तमाम राज्यों में बलात्कार की घटनाओं में बढ़ोत्तरी हो पाती। महिलाओं को कानूनी सहायता लेने का साहस तो रहता। लिहाजा प्रश्न उठता है कि महिला एवं बालविकास मंत्रालय कार्य कर रहा है, राष्ट्रीय महिला आयोग दायित्व निभा रहा है तथा स्वयंसेवी संस्थाएं समर्पित भाव से काम कर रही हैं तो फिर विगत 53 वर्ष में देश की समस्त महिलाओं का विकास क्यों नहीं हो पाया? कहीं कोई कमी तो है जो स्त्रियों के समुचित विकास के मार्ग में बाधा बन रही है। जाहिर है कि यह कमी स्त्री के प्रति सुरक्षा में कमी की है। 

वास्तविक अधिकारों की जरूरत
राजनीतिक क्षेत्र में स्त्रियों की संख्या के आंकड़ों पर अकसर विवाद होता रहता है। फलां राजनीतिक दल महिलाओं को उतना स्थान नहीं देता, जितना कि हम देते हैं, जैसे दावे हास्यास्पद ढंग से जब तक उछलते रहते हैं। कम से कम हिन्दी पट्टी में तो यह आम दृष्य है कि महिला सरपंच के सारे संवैधानिक निर्णय उसका पति अर्थात् ‘सरपंच पति’ लेता है। उत्तर प्रदेष में ‘प्रधानपति’ का पद इसी हेतु है कि ‘प्रधान’ के पति महोदय प्रधान को निर्णय लेने में मदद कर सके। अब यदि पुरुष-बैसाखियों के सहारे स्त्री की प्रगति खड़ी है तो यह काहे की प्रगति? स्वनिर्णय लेने के अधिकार से बढ़ कर और कोई अधिकार नहीं होता है। यह अधिकार अभी भी स्त्री से कोसों दूर है।
अंत में मैं उस तथ्य को एक बार फिर दोहराना चाहूंगी जिसे मैंने अपने उपन्यास ‘पिछले पन्ने की औरतें’ की भूमिका में सामने रखा था कि समाज की भांति हिन्दी व्याकरण भी पुरुष प्रधान है। अंग्रेजी में व्यक्तिवाचक संज्ञा के लिए प्रथम, द्वितीय, तृतीय के साथ ‘पर्सन’ अर्थात् ‘व्यक्ति’ जुड़ा होता है। यह ‘पर्सन’ (व्यक्ति) पुरुष भी हो सकता है और स्त्री भी किन्तु, हिन्दी भाषा के व्याकरण में मानो स्त्री न तो कोई व्यक्ति है और न व्यक्तिवाचक संज्ञा। प्रथम है तो पुरुष, द्वितीय है तो पुरुष और तृतीय है तो पुरुष, फिर स्त्री के लिए जगह कहां हैं? क्या स्त्री का अस्तित्व मात्र लिंग तक सीमित हैं? मैं न तो व्याकारण की आधिकारिक ज्ञाता हूं और न आधिकारित व्याख्याकार, लेकिन एक स्त्री होने के नाते यह बात मुझे सदैव चुभती है।’
अभी स्त्रियों को अपना भविष्य संवारने के लिए बहुत संघर्ष करना है। उन्हें अभी पूरी तरह सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक, राजनीतिक एवं मातृत्व का अधिकार प्राप्त करना है जिस दिन उसे अपने सारे अधिकार मिल जाएंगे जो कि देश की नागरिक एवं मनुष्य होने के नाते उसे मिलने चाहिए, उस दिन एक स्वस्थ समाज की कल्पना भी साकार हो सकेगी। जिसमें स्त्री और पुरुष सच्चे अर्थों में बराबरी का दर्जा रखेंगे।
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