Wednesday, September 30, 2026

चर्चा प्लस | चर्चा प्लस मिलावट और मंहगी स्वास्थ्य सेवाओं के बीच झूलता आमजन का स्वास्थ्य डॉ (सुश्री) शरद सिंह


चर्चा प्लस
मिलावट और मंहगी स्वास्थ्य सेवाओं के बीच झूलता आमजन का स्वास्थ्य 
डॉ (सुश्री) शरद सिंह

यदि किसी मध्यमवर्गीय परिवार के किसी सदस्य को कोई बड़ी बीमारी हो जाए तो पूरा परिवार आर्थिक रूप से पूरा हिल जाता है। कई गंभीर बीमारियों का असली कारण है मिलावटी खाद्य सामग्री। जैसे अच्छी सेहत के लिए फल खाने और दूध पीने की सलाह जी जाती है। पकने से पूर्व तोड़े गए फल जिन्हें केमिकल्स से पकाया जाता है क्या अच्छी सेहत दे सकते हैं? या फिर इंजेक्शन लगा कर निकाला गया दूध सेहत दे सकेगा? उस पर स्वास्थ्य सेवा की आसमान छूती मंहगाई मानो गरीबों के जीने का हक छीन लेना चाहती है।

चाहे पपीता हो या सेव बहुधा समय से पूर्व पेड़ों से तोड़ कर केमिकल द्वारा पकाए जाते हैं और जिन्हें खाने पर क्या-क्या साइड इफैक्ट्स हो सकते हैं इससे आमजन बेखबर है। कभी-कभार समाचार पत्रों या पत्रिकाओं में इस संबंध में जागरूकता वाले लेख प्रकाशित होते भी हैं तो उन्हें सरसरी तौर पर पढ़ कर अनदेखा कर दिया जाता है क्योंकि जब उपभोक्ता फलों के बाज़ार में पहुंचता है तो केमिकल्स से पकाए और चमकाए गए फलों की सुंदरता से मोहित हो कर भूल जाता है कि उसने क्या पढ़ा था अथवा वे फल कितने नुकसानदेह हैं। फिर मसला यह भी तो है कि सही फल कहां से मिलें? न तो हर व्यक्ति के पास बाग है और न बागीचा। दो कमरे या एक कमरे में रहने वाला परिवार अपने लिए फल नहीं उगा सकता। उसे तो बाज़ार में मिलने वाले फलों पर ही निर्भर रहना पड़ेगा। यही दशा सब्जियों की है। बड़े आकार की सब्जियां चाहे लौकी हो या कद्दू संदेह के घेरे में रहता है। क्योंकि सभी जानते हैं कि उन्हें तेजी से बड़ा करने के लिए इंजेक्शन और केमिकल वाली खाद दी जाती है। लेकिन क्या किया जाए, यदि सब्जी खानी है तो जहर की मिलावट को भी अनदेखा करना पड़ता है और बदले में मिलती है गंभीर बीमारियां।
फलों को जल्दी और कृत्रिम रूप से पकाने के लिए मुख्य रूप से एथिलीन गैस और कैल्शियम कार्बाइड का उपयोग किया जाता है। एथिलीन गैस एक प्राकृतिक पादप हार्मोन है जो सुरक्षित माना जाता है और व्यावसायिक रूप से स्वीकृत है। यह फलों में पकने की प्रक्रिया को तेजी से शुरू करता है। एथेफोन तरल रूप में आता है जो पौधों या फलों के संपर्क में आने पर एथिलीन गैस में बदल जाता है। कैल्शियम कार्बाइड आम भाषा में ‘‘कार्बाइड’’ कहा जाता है। यह पानी के संपर्क में आने पर एसिटिलीन गैस छोड़ता है, जो फलों को जल्दी पकाता है। कैल्शियम कार्बाइड में आर्सेनिक और फॉस्फोरस जैसे जहरीले और कैंसरकारी तत्व हो सकते हैं, जो तंत्रिका तंत्र को नुकसान पहुंचा सकते हैं। यही कारण है कि भारत सहित कई देशों में कैल्शियम कार्बाइड के इस्तेमाल पर कानूनी प्रतिबंध है। खाद्य सुरक्षा मानकों के अनुसार केवल नियंत्रित मात्रा में एथिलीन गैस के प्रयोग की अनुमति है क्योंकि यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नहीं होती।

पैदा होने से ले कर मृत्यु तक दूध जीवन के एक अवश्यक तत्व के रूप में जुड़ा रहता है लेकिन जब दूध भी मिलावटी और नकली हो तो? पशुओं में दूध उतारने या उसकी मात्रा बढ़ाने के लिए मुख्य रूप से ऑक्सीटोसिन नामक हार्मोन का इंजेक्शन लगाया जाता है। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, जब इंसान ऑक्सीटोसिन युक्त दूध पीता है, तो पेट के एसिड और पाचक एंजाइम इस प्रोटीन हार्मोन को पचा कर नष्ट कर देते हैं। यह सक्रिय रूप से रक्त में नहीं पहुंचता है। हालांकि भारत सरकार और भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण ने पशुओं में इसके अवैध और व्यावसायिक इस्तेमाल पर रोक लगा रखी है। इसका सबसे बुरा असर पशुओं के स्वास्थ्य पर पड़ता है। बार-बार ऑक्सीटोसिन देने से पशुओं में बांझपन, हॉर्मोनल असंतुलन, थनैला रोग (डंेजपजपे) और प्रजनन संबंधी गंभीर समस्याएं पैदा होती हैं।
नकली या सिंथेटिक दूध को असली जैसा दिखाने और उसकी मात्रा बढ़ाने के लिए कई खतरनाक और जहरीले रसायन मिलाए जाते हैं। दूध में प्रोटीन और गाढ़ापन बढ़ाने के लिए यूरिया मिलाया जाता है, जो किडनी और लिवर को गंभीर नुकसान पहुंचाता है। दूध में झाग बनाने और उसे सफेद दिखाने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है, जिससे पाचन तंत्र खराब होता है और उल्टी-दस्त की समस्या होती है। कास्टिक सोडा अथवा कास्टिक पोटाश केमिकल दूध को फटने से बचाता है और उसकी शेल्फ लाइफ बढ़ाता है, लेकिन पेट की अंदरूनी परत को जला सकता है। सोया रिफाइंड या आर्टिफिशियल फैट दूध में फैट (चिकनाई) की मात्रा को नियंत्रित करने और उसे असली जैसा गाढ़ा दिखाने के लिए मिलाया जाता है। फॉर्मेलिन यह एक जहरीला प्रिजरवेट है जो दूध को जल्दी खराब होने से बचाता है। इसके लंबे समय तक सेवन से कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी हो सकती है। हाइड्रोजन पेरोक्साइड भी दूध को फटने से बचाने के लिए मिलाया जाता है जो पाचन एंजाइमों को नष्ट करता है। स्टार्च या मैदा पानी मिलाने के बाद दूध का पतलापन छुपाने और उसे गाढ़ा रखने के लिए स्टार्च मिलाया जाता है। क्या यूरिया और कास्अिक सोडा से बनने वाला नकली दूध सेहत दे सकता है?
हमारे देश में स्वास्थ्य सेवाएं और चिकित्सा मुद्रास्फीति प्रति वर्ष 12 प्रतिशत से 15 प्रतिशत की तेजी से बढ़ रही है, जो सामान्य महंगाई दर से काफी अधिक है। स्वास्थ्य सेवाओं के मंहगे होने का एक मुख्य कारण है महंगे आयातित चिकित्सा उपकरण और उनके अपग्रेड होने की उच्च लागत। इसके अतिरिक्त निजी क्षेत्र में कुशल डॉक्टरों, सर्जनों और चिकित्सा स्टाफ के बढ़ते वेतन व शुल्क। मधुमेह और हृदय रोग जैसी पुरानी बीमारियों का बढ़ता प्रसार। ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के अनुसार भारत में लोग अपनी जेब से इलाज का भारी-भरकम हिस्सा अर्थात लगभग 63 प्रतिशत खुद चुकाते हैं। कुछ प्रमुख महंगे उपचार और लागत अनुमान इस प्रकार है-
हार्ट बाईपास सर्जरी - लगभग 1.6 लाख से 4.5 लाख रुपये ।
कैंसर उपचार (कीमो थेरेपी रेडिएशन)- लगभग 10 लाख से 25 लाख रुपये ।
लिवर ट्रांसप्लांट- लगभग 20 लाख से 35 लाख रुपये।
यदि इन बड़ी बीमारियों की चर्चा छोड़ भी दी जाए तो मामली सर्दी-जुकाम के लिए चिकित्सक को दिखा कर ईलाज कराना मंहगा पड़ता है। यही कारण है कि नीम हकीमों का यानी फर्जी चिकित्सकों का धंधा जोरों पर चलता रहता है और आम आदमी अपनी जान जोखिम में डालता रहता है।
यह सच है कि सरकार और कुछ निजी कंपनियां स्वास्थ्य बीमा के द्वारा सहायता देती हैं जैसे सबसे लोकप्रिय सरकारी योजना है आयुष्मान योजना। लेकिन यह भी सत्तर वर्ष और उससे अधिक आयु के वरिष्ठ नागरिकों के लिए है। कभी-कभी यह भी सुनने में आता है कि साठ वर्ष की आये भी इसके लिए योग्य घोषित कर दी गई है किन्तु जब कोई साठ से सत्तर के बीच की आयु का व्यक्ति आयुष्मान कार्ड  बनवाने का प्रयास करता है तो उसे निराशा हाथ लगती है। जो निजी कंपनियां स्वास्थ्य बीमा का लाभ देती हैं वे पहले प्रीमियम भरवाती हैं, वह भी नियमित रूप। जिसके पास प्रीमियत भुगतान करने योग्य पैसे होंगे उसके लिए तो ठीक है किन्तु जो प्रीमियम भरने में सक्षम नहीं होगा उसका क्या होगा?
चाहे खाद्य सामग्री को दोष दें या लाईफ स्टाईल को मगर यह डरावना सच है कि पिछले दस वर्ष में घुटनों एवं जोड़ों की तकलीफ, मधुमेह, थायराइड, कोलोस्ट््राल बढ़ना आदि की समस्याएं कई गुना बढ़ गई हैं। वर्तमान में सबसे अधिक होने वाला प्रमुख हृदयरोग कोरोनरी धमनी रोग है, जिसके कारण अक्सर दिल का दौरा (हार्टअटैक) पड़ता है। इसमें हृदय को रक्त पहुंचाने वाली धमनियों में प्लाक (चर्बी और कोलेस्ट्रॉल) जमने से वे संकीर्ण हो जाती हैं। उच्च रक्तचाप में धमनियों में रक्त का दबाव लगातार अधिक रहता है, जिससे हृदय पर अतिरिक्त जोर पड़ता है।हार्ट फेलियर में हृदय की मांसपेशियां इतनी कमजोर या सख्त हो जाती हैं कि वे शरीर को पर्याप्त रक्त पंप नहीं कर पाती हैं। अरिथ्मिया  यह दिल की धड़कन के अनियमित, बहुत तेज या बहुत धीमी होने की स्थिति है।
हृदय रोगों के मुख्य कारण है फैट, नमक, चीनी और फास्ट फूड से भरपूर आहार। ये सभी मोटापे और उच्च कोलेस्ट्रॉल को बढ़ावा देते हैं। रोजाना व्यायाम या शारीरिक श्रम न करने से दिल कमजोर होता है और वजन बढ़ता है। अनियंत्रित ब्लड प्रेशर और डायबिटीज रक्त वाहिकाओं को अंदर से नुकसान पहुंचाते हैं। तंबाकू और सिगरेट का धुआं धमनियों की आंतरिक परत को नुकसान पहुंचाता है और ब्लॉकेज का खतरा बढ़ाता है। अत्यधिक और लगातार तनाव धमनियों को प्रभावित करता है और अन्य जोखिम कारकों को गंभीर बनाता है।
स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के बारे में आज सभी जानते हैं, सभी स्वस्थ भी रहना चाहते हैं किन्तु शुद्ध खाद्य सामग्री और सस्ती बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव में आमजन का स्वस्थ रहने का सपना कभी पूरा नहीं होने पाता है। कई निजी चिकित्सा केन्द्र तो ‘‘लुटेरे’’ के नाम से कुख्यात रहते हैं किन्तु स्वस्थ होने की चाहत उन्हें उन ‘‘लुटेरों’’ के हाथों लुटने को मजबूर कर देती है। इसका कारण यही है कि आज भी सरकारी स्वास्थ्य सेवाऐं निजी सेवाओं के मुकाबले बहुत पिछड़ी हुई और जोखिम भरी हैं। इस स्थिति में सुधार हो सकता है यदि सरकारी स्तर पर ईमानदार प्रयास किए जाएं। आखिर जीने का अधिकार तो हर किसी को मिलना ही चाहिए।        

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(दैनिक, सागर दिनकर में 30.09.2026 को प्रकाशित) 
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Tuesday, September 29, 2026

पुस्तक समीक्षा | जीवन के विविध रंगों से गुज़रती कहानियों का संग्रह | समीक्षक डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा
जीवन के विविध रंगों से गुज़रती कहानियों का संग्रह  
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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कहानी संग्रह - ज़िंदगी के रंग अनेक
लेखिका     - आशा मुखारया
प्रकाशक    - पाथेय प्रकाशन, जबलपुर, मध्यप्रदेश
मूल्य       - 200/-
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समीक्ष्य कहानी संग्रह उन कहानियों का संग्रह है जिसमें मध्यमवर्गीय परिवारों से जुड़े कथानक हैं। ये कथानक अपने घर-परिवार तथा अपने आसपास के घरों की अंतर्कथा हैं। कहानी संग्रह का नाम है-‘‘ज़िंदगी के रंग अनेक’’। इसकी कहानीकार हैं आशा मुखारया। संग्रह की कहानियों पर दृष्टिपात करने से पहले लेखिका के भारतीय परिवेश और सामाजिक सरोकार को जान लेना आवश्यक है। लेखिका आशा मुखारया 5 जुलाई 1942 को जबलपुर (म.प्र.) में जन्मीं, वहीं उनकी शिक्षा-दीक्षा हुई, किन्तु सागर (म.प्र.) से भी उनका गहरा नाता है। सागर में उनके अनेक परिवारजन निवासरत् हैं। उनके पति डाॅ. प्रताप सिंह मुखारया इतिहास के प्रोफेसर रहे। पति की सेवा निवृत्ति के बाद उन्होंने अपने एकमात्र पुत्र विवेक मुखारया के पास अमेरिका के जैक्सनविल (फ्लोरिडा) में बसने का निर्णय लिया। वहीं आशा मुखारया को अपने पति का चिरविछोह सहना पड़ा किन्तु बेटे-बहू के अपनत्व से उन्हें सहारा दिया। अपनी इकलौती संतान अर्थात् पुत्र विवेक के साथ रहना उनका सही निर्णय था लेकिन भारत में मौज़ूद अपना गांव, घर, शहर हर प्रवासी भारतीय की तरह उनके दिल में भी बसा हुआ है। नागरिकता भले ही अमेरिका की हो लेकिन दिल है हिन्दुस्तानी। आशा मुखारया की प्रत्येक कहानी में इस तथ्य को शब्दशः अनुभव किया जा सकता है। समय-समय पर भारत में प्रवास के दौरान भारतीय समाज में तेजी से हो रहे परिवर्तन और स्मृतियों की तिजोरी में सुरक्षित पुराने अनुभव उनकी कहानियों में सजीव हो उठे हैं। सीधे-सरल शब्दों में, बिना किसी लाग-लपेट के लिखी गई ये कहानियां सहसा ही मन को छू जाती हैं। 
‘‘ज़िंदगी के रंग अनेक’’ संग्रह की कहानियों का आकार बड़ा नहीं हैं। ये सभी कहानियां छोटी-छोटी हैं। कुल अट्ठाईस कहानियां भारतीय परिवारों के अटठाईस रंग (शेड्स) दिखाती हैं। ‘‘निर्णय’’ शीर्षक कहानी पारिवारिक संबंधों में आती जा रही संवेदनहीनता को सामने रखती है। यह कहानी एक ऐसी स्त्री के बारे में है जो परिवार में बुआ का दर्ज़ा रखती है। अपने आरम्भिक जीवन में सारी सुख-सुविधाओं का आनन्द उठाती है। किन्तु जैसे-जैसे उसकी वृद्धावस्था आती है वह पारिवारिक उपेक्षा की शिकार बनने लगती है। इस कहानी का अंत लेखिका ने एक नाटकीय मोड़ के साथ रोचक बना दिया है। जो सुखद भी लगता है। ‘‘चंदा’’ शीर्षक कहानी को पढ़ते हुए यह अनुभव करना अच्छा लगता है कि लेखिका अपनी ज़मीन से यानी बुंदेलखण्ड से जुड़ी हुई हैं। उन्होंने कहानी में बुंदेली गीतों को पिरोया है। 
‘‘वरदान’’ कहानी एक ऐसे स्त्री पात्र के इर्द-गिर्द घूमती है जिसे परिस्थितिवश एक शक्की और क्रोधी व्यक्ति के साथ विवाह करना पड़ा और अनेक वर्ष घुटन भरा जीवन जीना पड़ा। किन्तु लंदन में बसे उसके बेटे ने उसका जीवन बदलने में मदद की और उसके हिस्से की खुशियां उसकी झोली में डाल दीं। यह एक ऐसी कहानी है जो स्त्री के पारिवारिक जीवन को एक नई पहचान देती है। इसे एक ज़रूरी-सी कहानी कहा जा सकता है। इस कहानी में स्त्री जीवन का वह पक्ष भी है जिसमें उसे निराधार लांछित किया जाता है। कहानी की नायिका दीपा का परिचय देते हुए लेखिका ने लिखा है-‘‘ये वही दीपा थी जो बचपन में मेरे यहां रोज़ ही आया करती थी। मेरी छोटी बहन की सहेली थी। ज़रूरत से ज़्यादा स्मार्ट और ख़ूबसूरत। महाराष्ट्रीयन परिवार से थी। पिता चीफ इंजीनियर थे। उसे किसी से भी बात करने में हिचक नहीं होती थी। उसकी इसी आदत को ले कर लोग तरह-तरह की बातें किया करते थे।जिन लोगों को लिफ्ट नहीं देती थी, वो उसके बारे में फ़ालतू बातें करते थे। पर वो एक बहुत अच्छे चरित्र वाली लड़की थी।’’ 
परिवारों में ज़ायदाद को ले कर होने वाले झगड़े और मनमुटाव आम बात है। मंा की मृत्यु पर बेटियों का उनके ज़ेवर को ले कर खींचातानी के सच्चे किस्से अकसर सुनने को मिल जाते हैं। यही मूल कथानक है, ‘‘मैं कहां हूं’’ कहानी का। इसी तरह ‘‘वापसी’’ कहानी उन माता-पिता की कहानी है जो विदेश में जा बसे अपने बच्चों के पास उत्साह से जाते हैं किन्तु वहां घोर उपेक्षा झेल कर अपने देश लौटने को विवश हो जाते हैं, जहां जीवन के नए अनुभव उनकी प्रतीक्षा में मुस्कुराते हुए खड़े हैं। 
‘‘वी आर जस्ट फ्रेंड्स’’ एक दिलचस्प कहानी है। यह एक फ्र्लट करने वाले लड़के के प्रेम में पड़ जाने वाली लड़की की कहानी है। ‘‘ज़िन्दगी के रंग अनेक’’ संवेदनात्मक कहानी है। अपनों के होते हुए भी एकाकी जीवन जीने को विवश स्त्री की कहानी। इस कहानी में मन को भिगो देने वाला एक प्रसंग है-‘‘अपना बुढ़ापा उन्होंने अपनी किताबों के साहारे काट दिया। अपने कष्टों को छुपा कर वो अपना अकेलापन काटती रहीं। अपनी ज़िन्दगी से और अपनों से कभी शिकायत नहीं की और एक दिन चुपचाप मौत के आगोश में खो गईं।’’
संग्रह में एक कहानी है-‘‘ऐसी भी बहू’’। रोचक और सकारात्मक कहानी है जो ज़िदगी के एक ख़ास रंग को सामने रखती है। कहानी में एक ऐसी बहू का वर्णन है जो विखंडित होते आधुनिक परिवार की परिपाटी को अनदेखा कर के अपने परिवार के प्रति समर्पित रहने के लिए कृतसंकल्प है। ‘‘तीसरी पीढ़ी’’ उस पारिवारिक व्यवस्था को उजागर करती है जिसमें बेटियों को चाहे कितनी भी छूट दी जाए लेकिन जब विवाह की बात आती है तो माता-पिता पारम्परिक रुख अपना लेते हैं। लड़की चाहे विदेश में रह रही हो लेकिन उसके लिए विशुद्ध भारतीय दूल्हा और वह भी भारत में रह रहा हो तो और अच्छा है तथा दान-दहेज वाली शादी तय करने की मशक्कत शुरू हो जाती है। इस बात को अनदेखा कर दिया जाता है कि एक अलग परिवेश में रह रही लड़की ठेठ परंपरावादी परिवार या पति के साथ कैसे सुखी रह पाएगी? ऐसी लड़की की स्थिति ठीक उस पतंग की भांति होती है जिसे खुले आकाश में ऊचे- बहुत ऊंचे तक उडज्ञने दिया जाता है तथा अपनी खुशी प्रकट कर के उसका उत्साह बढ़ाया जाता है। जब वह लड़की समझने लगती है कि वह अपने जीवन का निर्णय लेने का अधिकार पा चुकी है, ऐन उसी समय उसकी डोर तेजी से लपेटे जानी लगती है। उड़ान समाप्त, स्वतंत्रता समाप्त, बाहरी दुनिया समाप्त, उसके निर्णय लेने का अधिकार समाप्त। उस पर माता-पिता अपने निर्णय को थोपना शुरू कर देते हैं तथा बाध्य करते हैं कि वह लड़की उनके निर्णय को माने। इस ट्रेजडी को कहानी की इन पंक्तियों में देखिए-‘‘इस बीच रिया को भी अपने साथ काम करने वाले एक जर्मन लड़के से प्यार हो गया और फिर इतिहास अपने को दोहराने लगा। और तीसरी पीढ़ी की कहानी शुरू हो गई। भारत में रिया के मां-बाप उसके लिए लड़का ढूंढने लगे।’’
संग्रह की एक और कहानी है जो समाज के बदलते माहौल की ओर संकेत करती है। कहानी का शीर्षक है-‘‘यहां से वहां’’। मेहमानों के चरित्र पर बुनी गई यह कहानी एक अलग ही खाका रचती है। कहानी के आरम्भिक पैरा देखिए- ‘‘आज के जमाने में लोग मेहमान-नवाज़ी से घबराने लगे हैं। पहले कैसे लोग मेहमान को भगवान मानते थे। ‘अतिथि देवो भवः’। पअ अब तो रात को घंटी बजते ही लोग घबराने लगते हैं कि पता नहीं कौन आ गया।’’
इसी कहानी के अगले पैरा में मेहमानों के बारे में भी लेखिका ने दिलचस्प विवरण दिया है-‘‘पर मुझे लगता है कि आज के मेहमान भी आरामपरस्त होते जा रहे हैं। जिसके घर भी जाएंगे, पांव पसार कर बैठ जाएंगे। बच्चों पर हुकंम चलाएंगे-पानी ले आओ, पेपर ले आओ, सिगरेट ले आओ। ये नहीं सोचते कि जिसके घर जाते हैं तो उसके काम में हााि बंटाएं जिससे मेहमान का आना न अखरे।’’
अमेरिका में बसे भारतियों के परिवेश का लेखा-जोखा है कहानी ‘‘सिद्धपुरुष’’ में। भारतीय संस्कृति और धर्म विदेश में भी भारतीयों को संबल प्रदान करता है। इस कहानी का एक अंश है-‘‘कई सालों से हम लोग अमेरिका के न्यूयार्क शहर में अपने बेटे के पास सेटिल हो गए थे। कई लोग हम लोगों से पहले वहां रहते थे। इसी से हमउम्र लोगों से काफी जान-पहचान हो गई थी। वहां पर बहुत बड़ा व सुंदर मंदिर है। हम सब सीनियर सिटीजन महीने में एक बार मिलते हैं और आपस में दुनिया-जहान की बातें करते हैं। उसमें धार्मिक बातों के अलावा जनरल, कुछ घरेलू समस्याओं पर भी बातें होती हैं।.... हम बुजुर्गों के पास समय काटने का बस यही एक तरीका था। सोमवार से शुक्रवार तक हमारे बच्चे अपनी नौकरी में काफी व्यस्त रहते हैं फिर भी उनकी कोशिश रहती है कि हम लोगों को भी समय दें। यहां पार्टियां बहुत होती हैं तो वो हम लोगों को पार्टियों में ले जाते हैं। वहां तरह-तरह के लोग मिलते हैं। बच्चों के सभी दोस्त बहुत अच्छे हैं।’’
विदेश में रहते हुए देश के अस्तित्व को अपने भीतर जगाए रखना और अपनत्व की तलाश में आपस में जुड़ते रहना हर प्रवासी भारतीय के जीवन का अभिन्न पक्ष होता है। अपने अतीत और अपने वर्तमान के बीच तुलना करना, अपने अतीत को याद रखना और पराए परिवेश में रच-बस जाना प्रवासी भारतीयों की खूबी होती है। यही विशेषता लेखिका आशा मुखारया की कहानियों देखा जा सकता है। उनकी कहानियां प्रत्येक पाठक से संवाद करने में सक्षम हैं। संग्रह का आमुख जबलपुर निवासी वरिष्ठ साहित्यकार एवं पूर्व संपादक डाॅ. राजकुमार ‘सुमित्र’ ने लिखा है-‘‘लेखिका ने मध्यमवर्गीय परिवारों की रचना, स्थिति और मनःस्थितियों का सटीक चित्रण किया है। बेटे से बेटी भली, परिवारों की टूटन, वृद्धों की उपेक्षा और परदेश में देश की याद को बड़ी मार्मिकता से उकेरा है।’’ अपने कहानी लेखन के बारे में लेखिका आशा मुखारया ने स्वयं लिखा है कि ‘‘कई बार कई घटनाएं और पात्र अपनी छाप छोड़ जाते हैं जो सालों तक मन को सालते रहते हैं और जो अंत में काग़ज़ पर उतर कर कहानियों का रूप ले लेते हैं। चाहते हुए भी और न चाहते हुए भी लिख जाते हैं। कई सालों से अपने मन के भावों को काग़ज़ पर उतारती रही और अंत में देखा कि इन कहानियों ने कहानी संग्रह का रूप धारण कर लिया है।’’
कुलमिला कर यह कहा जा सकता है कि यह छोटी कहानियों का जीवन्त रोचक संग्रह है जिसे अवश्य पढ़ा जाना चाहिए। 
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Monday, September 28, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | जो कोनऊं डाऊट होए तो फोरलेन पे फिर आइयो, पता पर जैहे | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टाॅपिक एक्सपर्ट
जो कोनऊं डाऊट होए तो फोरलेन पे फिर आइयो, पता पर जैहे
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
   दो दिनां पैले रानगिर वारी माता हरसिद्धि देवी जू को बुलावा आओ औ हम चल परे उनके दरसन के लाने। बा कई जात है ने के जबे माता बुलात आएं, तभईं उनके दरबार में पौंचो जा सकत आए। वैसे जे बात सबई देवी-देवतन के लाने कई जात आए, चाए बे कोनऊं धरम के होंए। बाकी खास बात जो हम बताबो चात आएं, जे नईयां के माता ने हमाए लाने बुलावा भेजो। खास बात सो ईके बाद सुरू होत आए। का है के हम ओरन ने करी एक गाड़ी औ निकर परे। मकरोनिया से नरसिंगपुर रोड पकरी। संझा की बिरियां हती औ झिमिर-झिमिर पानी बरस रओ तो। अबे ऊ जांगा लौ पौंचे जां मुतके बड्डे-बड्डे कालेज ठाड़ें, औ हम ओरन खों पैलो धचका लगो। हम ओरन ने गाड़ी चलाबे वारे खों गरियाओ। बा कैन लगो के “हम का करें रोड पे गड्ढा हो गए हैं, कित्तऊ बचाओ धचका तो लगहेई।”
   कछू नईं, हमने सोची के जे तो  लोहरी रोड आए, अभईं फोर लेन पे पौंच के सरसरान लगबी। उते की रोड सो साजी हुइए। अखीर ऊको साजी रखबे के लाने अपन ओरें मुतको टोल टैक्स भरत आएं। मनों जे का? जैसेई फोर लेन पे पौंचे ऊंसईं भरका घांईं गोल-गोल गड्ढन ने हम ओरन को वेलकम करो। हमें याद आई के पर की साल जेई मोसम में हम फोर लेन से झांसी गए रए। संकारे मों अंदेरे निकरे हते औ रात लौं वापसी हती। मनो ऊ रोड पे गड्ढा औ गइयां इत्ती मिलीं के ने पूछो। अब बोई दसा ई रोड पे मिल रई हती। पर गड्ढा के बारे में कोनऊं खों फिकर नईं औ गइयां तो टोल नाका के इते बीच रोड पे पसरी मिलीं। बा दसा देख के हमें लगो की अपन कित्ते महान आएं जोन टैक्स तो भरत रैत आएं मानों साजी रोड के लाने मों ने खोल पाऊत आएं। है ने सई बात? जो कोनऊं डाऊट होए तो फोरलेन पे फिर आइयो, सई से पता पर जैहे।
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Friday, September 25, 2026

चर्चा प्लस | चिरस्थायित्व एवं अमरत्व के भ्रम में जीने वाले लोग | डॉ सुश्री शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
चिरस्थायित्व एवं अमरत्व के भ्रम में जीने वाले लोग 
 - डॉ (सुश्री) शरद सिंह 
   संत कबीर ने कहा है कि “कबीर कहा गरबियो, काल गहे कर केस। ना जानो कहां मारिसी, कै घर कै परदेस।।” अर्थात तुम अपने इस शरीर और जीवन पर इतना अहंकार क्यों करते हो? मृत्यु (काल) ने तुम्हारे बाल पकड़ रखे हैं। वह तुम्हें कब और कहाँ ले जाकर मार देगी यह कोई नहीं जानता। फिर भी कुछ लोग सोचते हैं कि मैं सर्वश्रेष्ठ हूं! मैं सर्वोत्तम हूं! मैं अजर अमर हो गया हूं! मेरे विचार अनंत काल तक प्रवाहित रहेंगे! क्या सचमुच ऐसा संभव है?
जब विचारधाराएं ही स्थाई नहीं रहती अमरत्व को प्राप्त नहीं कर पाती हैं, फिर भी कोई व्यक्ति सोचे कि मैं हमेशा रहूंगा, मेरा नाम हमेशा रहेगा, मेरा अस्तित्व हमेशा रहेगा, तो यह सबसे बड़ा भ्रम है। दुख और सुख भी स्थाई नहीं रहते हैं तो फिर कोई विचार कोई व्यक्ति या कोई संस्था स्थाई कैसे रह सकती है? 
भगवद्गीता के अध्याय 2 के श्लोक 14 में कहा गया है कि संसार में सुख-दुःख और परिस्थितियाँ स्थायी नहीं हैं-
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत।। 
अर्थात, हे कुन्ती पुत्र! सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख को देने वाले इंद्रियों और विषयों के संयोग केवल आने-जाने वाले और अनित्य (अस्थायी) हैं। हे भारत! तुम सहनशील बनो और उन्हें धैर्यपूर्वक सहन करो।
सहन करना यह एक बहुत बड़ी विशेषता है और जो इस विशेषता में पारंगत हो जाता है वह निर्विकार हो जाता है। किंतु सहन करने के भी अनेक अर्थ हैं। जो व्यक्ति निर्बल है उसके  द्वारा किसी भी प्रकार की अत्याचार को सहन करना निर्विकार की श्रेणी में नहीं आएगा। उसकी स्थिति दलित और पीड़ित की ही बनेगी। अल्पकाल के लिए सहन करना और अवसर प्राप्त होते ही अपने सहनशक्ति को एक और रख कर आक्रामक हो जाना यह अवसरवादी सहनशीलता होती है। ऐसे मामले अधिकांश राजनीति के क्षेत्र में देखे जाते हैं या फिर कार्यालय परिवेश में जहां परिस्थिति वश व्यक्ति प्रताड़ित करने वाले अथवा दबाव बनाने वाले व्यक्ति की हर बात को सहन करता रहता है सिर्फ इस प्रतीक्षा में कि एक दिन समय आने पर वह पलटवार करेगा और डट कर जवाब देगा। बहरहाल चर्चा सिर्फ सहनशक्ति की नहीं बल्कि स्थायित्व और अमरत्व के भ्रम की है। 
 जब व्लादिमीर लेनिन ने रूस में साम्यवाद की स्थापना की थी और सोवियत संघ ने अपना आकार पाया था तक किसने सोचा था कि उन्हें के वंशज एक दिन लेनिन की मूर्ति को तोड़कर फेंक देंगे उनके विचारों को कुचल देंगे और साम्यवाद से पूंजीवाद की ओर बढ़ जाएंगे। ठीक इसी तरह हमारे देश के पश्चिम बंगाल में भी उस समय तक किसी ने यह नहीं सोचा होगा कि वहां से साम्यवाद के निशान ढूंढ के मिटा दिए जाएंगे, जिस समय वहां साम्यवादी सरकार थी, साम्यवादी विचारधारा का बोलबाला था। समय बदल चुका है। पूरी दुनिया में साम्यवाद सिमट चुका है। पूंजीवाद और साम्यवाद के बीच एक नया पूंजीवादी साम्यवाद जन्म ले चुका है जिसे यदि राजनीतिक भ्रम कहा जाए तो गलत न होगा। किंतु इसकी किलकारी भी अभी दुनिया के बहुत कम देश में सुनाई देती है। हमारे देश भारत में स्थितियां बिल्कुल बदल चुकी हैं। पश्चिम बंगाल में कई सड़कों और पुलों के नाम बदलने की कवायद शुरू हो चुकी है। राज्य सरकार की 10 सदस्यीय कमेटी कोलकाता की प्रमुख सड़कें लेनिन सरणी, कार्ल मार्क्स, सरणी व हो-ची-मिन्ह सरणी के नाम बदलने में जुट गई है। यानी अंतिम निशान भी पोंछे जा रहे हैं। हमेशा यही होता है और यही होता रहेगा। जब हम वह कहावत सुनते हैं कि खंडहर बता रहे हैं इमारत बुलंद थी तो इससे यह भी सिद्ध हो जाता है कि कभी उस इमारत का दबदबा रहा होगा। लेकिन समय के साथ इमारत ढहने लगी और खंडहर में बदल गई। न जाने कितने शहरों, गलियों और चौराहों के नाम बदले जा चुके हैं। यहां तक कि दुनिया में कुछ देशों ने भी अपने नाम बदल दिए। यह यूं ही नहीं होता। जब एक विचार दूसरे विचार पर स्थापित हो जाता है तो वह अपने अनुरूप पूरे परिवेश को बदलने लगता है चाहे वह किसी स्थान का नाम हो या व्यक्ति के कार्य या कृतित्व की स्मृति हो। यह प्रभावी विचार का दम्भ ही होता है जो समसामयिक रूप से उसे स्थाई और अमर होने के भ्रम में डाल देता है। वह सोचने लगता है कि मैं सर्वोत्तम हूं। मैं श्रेष्ठ हूं। मेरे जैसा दूसरा नहीं। मुझे यह दुनिया युगों-युगों तक याद रखेगी। मैं अमर हो गया हूं। मेरे विचार अमर हो गए हैं। ऐसे समय में वह भूल जाता है कि जिन विचारों को कुचलकर वह स्थापित हुआ है उन विचारों ने भी यही भ्रम पाल था कि वह अमर हो गए हैं।
अपने नाम एवं कार्यों के अमरत्व की भावना से प्रेरित होकर टाइम कैप्सूल भी भूमि में गाड़े गए। भारत में सबसे चर्चित सरकारी टाइम कैप्सूल (काल पात्र) 15 अगस्त 1973 को तत्कालीन प्रधानमंत्री द्वारा लाल किले के पास जमीन से 32 फीट नीचे गाड़ा गया था। इसे आज़ादी के 25 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में रखा गया था।  लाहौरी गेट के पास दबाए गए इस टाइम कैप्सूल को ‘‘काल पात्र’’ नाम दिया गया था। इसे लेकर देश में काफी लंबा राजनीतिक विवाद चला।इसमें भारत की आज़ादी के शुरुआती 25 वर्षों का घटनाक्रम, संघर्ष और देश की उपलब्धियों का विवरण था। इसके भीतर लगभग 10,000 शब्दों की एक पांडुलिपि  को तांबे की प्लेटों पर उकेरा गया था ताकि वह हजारों सालों तक सुरक्षित रहे। यह टाइम कैप्सूल 1,000 साल तो दूर, अपनी जगह पर मात्र 4 साल ही रह सका। आपातकाल  के बाद जब 1977 में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार सत्ता में आई, तो उन्होंने इस कैप्सूल को जमीन से बाहर निकलवा लिया। सरकार बदलने के बाद इसे निकाला और खोला तो गया, लेकिन इसके अंदर मिली सामग्री की पूरी रिपोर्ट को कभी भी आधिकारिक तौर पर सार्वजनिक नहीं किया गया।
        मेरे एक परिचित प्रोफेसर थे हिंदी विषय के। एक बार उन्होंने अपने शोध कार्य के संबंध में चर्चा करते हुए यह कहा कि मैंने फलां साहित्यकार पर शोध करके, उन पर सेमिनार करवा कर उन्हें अमर कर दिया है। उनकी लिखी सारी किताबें लाइब्रेरी में खरीदवा दी हैं। उन पर लिखी मेरी सारी किताबें भी लाइब्रेरी में  हमेशा रहेंगी। फिर उन्होंने यहां तक कह दिया कि मेरे नाम से उन्हें यानी उन फलां साहित्यकार को जाना जाएगा। मुझे उस समय आश्चर्य हुआ था यह सुनकर क्योंकि मैं इतिहास की विद्यार्थी थी और मैं यही पढ़ रही थी कि किस प्रकार बिस्मार्क, हिटलर, मुसोलिनी आदि काल की गर्त में समा गए। उनके विचार इतिहास की विषय वस्तु बन कर रह गए। उस कालखंड की तमाम विशेषताओं से हम विद्यार्थी सिर्फ अक्षरों के द्वारा ही ज्ञान प्राप्त कर रहे थे अन्यथा उसकी कल्पना हमारे लिए कठिन थी कि वह युग कैसा रहा होगा। मुझे उस समय भी लगा था कि आज प्रोफेसर जो कह रहे हैं कल इन्हें भी कोई याद रखने वाला रहेगा या नहीं क्योंकि यह इतिहास बनाने का भ्रम पाल रहे हैं लेकिन इनका व्यक्तित्व इतिहास में दर्ज होने योग्य भी नहीं है। हुआ भी यही है आज उन्हें कोई याद नहीं करता है उनकी लिखी किताबों के बारे में तो कोई जानता भी नहीं है और जिस साहित्यकार को अपनी लेखनी के द्वारा अमरत्व दिलाने का दावा उन्होंने किया था, वे जरूर एकेडमिक तबके में कभी-कभार याद कर लिए जाते हैं। अमरत्व उनके नाम को भी नहीं मिला।
कुछ साहित्यकारों को यह भ्रम होता है कि उनकी रचना यदि सिलेबस में शामिल हो जाएगी तो वह अमर हो जाएंगे, आने वाली पीढ़ी उन्हें याद रखेगी। जबकि हर पीढ़ी की व्यवस्था अलग होती है। हर पीढ़ी में अपने एक मौलिक विचार विकसित होते हैं। सिलेबस में दर्ज हर बात हमेशा याद नहीं रहती है। परीक्षा उत्तीर्ण करने और उपाधि प्राप्त करने के साथ ही सिलेबस की पुस्तकों के अनेक पन्ने स्मृति से गायब हो जाते हैं। ऐसा होना स्वाभाविक है क्योंकि उन पन्नों में दर्ज़ ज्ञान और विचार व्यवहारिक जीवन के लिए अनुपयोगी हो जाते हैं और अनुपयोगी तत्वों से कोई भी अपना वास्ता नहीं रखना चाहता है, मस्तिष्क भी नहीं। 
    शाश्वत सत्य यही है कि जो आज है वह कल नहीं होगा और जो कल होगा वह परसों नहीं रह जाएगा। समय,परिस्थितियां और विचार परिवर्तनशील होते हैं। कुछ बुनियादी वैचारिक तत्व ही स्थाई रहते हैं जो यह बार-बार याद दिलाते हैं कि जीवन स्थाई नहीं है, सामान्य विचार अथवा कुविचार स्थाई नहीं हैं। यदि कुछ स्थाई है तो वह अच्छे विचार और नश्वरता का स्मरण।
स्वयं को सर्वोच्च और सर्वशक्तिमान मानने वालों को देखते हुए कबीर दास जी का यह दोहा याद आ जाता है-
माटी कहै कुम्हार सों, तू क्या रौंदे मोए।
एक दिन ऐसा होएगा, मैं रौंदूगी तोए।।           -----------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 24.09.2026 को प्रकाशित)  
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Tuesday, September 22, 2026

पुस्तक समीक्षा | आम मुस्लिम परिवारों पर बुनी गई इक्कीस कहानियां जिनके केंद्र में है स्त्री-संघर्ष | समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा     
आम मुस्लिम परिवारों पर बुनी गई इक्कीस कहानियां जिनके केंद्र में है स्त्री-संघर्ष
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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कहानी संग्रह - कौन लगती है वह आपकी ?
लेखक - आर.के. तिवारी
प्रकाशक - एन.डी. पब्लिकेशन, सागर मो. 9039390856
मूल्य - 150/-
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कहानी हमेशा एक ऐसा संसार रचती है जिसमें यथार्थ की नई पर कल्पना का वह सुंदर महल खड़ा किया जाता है जो मानव मूल्यों को स्थापित करने में सक्षम हो। दरअसल वह लिखित या मौखिक रचना है, जिसमें किसी वास्तविक या काल्पनिक घटना, पात्र या जीवन के किसी एक पक्ष का रोचक और संक्षिप्त वर्णन होता है। महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद के अनुसार, कहानी में संपूर्ण जीवन का विस्तृत विश्लेषण नहीं होता, बल्कि उसके किसी एक चरित्र, अंग या परिस्थिति का मनोरम चित्रण होता है। वहीं आलोचक रामचंद्र शुक्ल मानते हैं कि कहानी व्यष्टि से समष्टि में प्रवेश करने का द्वार खोलती है।’’
‘‘कौन लगती है वह आपकी?’’ सागर के कथाकार आरके तिवारी का नवीनतम कहानी संग्रह है। इस संग्रह में उनकी 21 कहानी संग्रहित है। इन कहानियां की विशेषता यह है कि यह सभी आम मुस्लिम समाज के परिवार, उनके रीति-रिवाज एवं उनकी स्थिति-परिस्थिति पर केंद्रित हैं। कथाकार के तिवारी की कथा लेखन की यह खूबी है कि वे समाज के यथार्थ को भावनात्मक स्तर पर आकलन करते हुए कहानियां लिखते हैं। आरके तिवारी जी ने बैंकिंग जीवन से सेवानिवृत होने के बाद बतौर साहित्यकार शब्दों के निवेश में अपनी विशेष पहचान बनाई है। आज उनका नाम सागर के साहित्यकारों में प्रतिष्ठापूर्वक लिया जाता है। उनकी रचनाओं में गहरा सामाजिक सरोकार उपस्थित रहता है। उनकी कहानी आम जीवन के दुख-सुख का ताना-बाना बुनती है। चाहे व्यंग हों, लघु कथाएं हों अथवा लघु उपन्यास सभी में तिवारी जी का रचना कौशल स्पष्ट दिखाई देता है। वैसे उनकी अब तक 11 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है जिनमें 5 कहानी संग्रह, 3 लघु उपन्यास, 2 काव्य संग्रह, 1 व्यंग्य संग्रह है।
नवीनतम कहानी संग्रह ‘‘कौन लगती है वह आपकी?’’ पहली कहानी है ‘‘कासमी बेन’’। यह एक ऐसी महिला की कहानी है जो देश प्रेम को ही अपना धर्म मानती है। इस कहानी की पात्र तबस्सुम भारत-पाकिस्तान की सीमा में आतंकवाद ग्रस्त क्षेत्र में बच्चे को अपने सीने से लगाए हुए शहीद हो जाती है। यह मार्मिक कहानी है। यह इस विश्वास को दृढ़ करती है कि प्रत्येक भारतीय चाहे वह किसी भी जाति या धर्म का हो देश के प्रति पहले समर्पित रहता है तथा प्रत्येक नागरिक शांति चाहता है। इस कहानी में एक स्त्री की अडिग इच्छाशक्ति भी स्पष्ट रेखांकित है।
डॉ. आनंद तिवारी, प्राचार्य, शास.उ. स्ना. कन्या महाविद्यालय, सागर ने संग्रह की भूमिका में लिखा है कि ‘‘प्रत्येक कहानी का अंत आशावादी संदेश से समाप्त होता है। कहानी का मुख्यपात्र आम आदमी जो परिवार हेतु संघर्ष कर रहा है, भावनात्मकता दृष्टि से कहानियों में प्रेम, करूणा, समर्पण, त्याग, पारिवारिक मूल्यों को प्रदर्शित किया गया है। भाषा शैली सरल सहज और समझने योग्य है, प्रत्येक कहानी पाठक को आकर्षित करती है, क्योंकि कहानियों में सद्भाव, संवेदना, सहानभूति जैसी भावनायें प्रबलता से है। यह संग्रह पूर्णतः मुस्लिम महिलाओं, परिवारों पर केन्द्रित हैं। जो एक विशेष बात है।’’
      दूसरी कहानी है ‘‘गुलाबो’’। बच्चे तो आखिर बच्चे होते हैं कोमल, सुंदर, प्यारे-प्यारे। देवदूत से निर्मल एवं गुलाब के फूल जैसे मन को प्रफुल्लित कर देने वाले। नन्ही बच्ची गुलाबो भी ठीक एक गुलाब के फूल की तरह, सुंदर कोमल और निश्छल है। उसकी मां शकीला ने असलम से शादी सिर्फ इसीलिए की थी कि वह अपनी बेटी गुलाबो को एक अच्छी परवरिश के साथ एक पिता का प्यार भी उपलब्ध करा सके। लेकिन असलम के लिए वह एक सौतेली बेटी थी जिसे वह बात बात पर डांट देता था, झिड़क देता था। ऐसा लगता था कि वह गुलाबो को कभी अपनाएगा नहीं लेकिन एक हादसे ने सब कुछ बदल दिया और तब असलम को एहसास हुआ की गुलाबो उसकी अपनी सगी बेटी जैसी है क्योंकि बच्चे कभी सौतेली नहीं होते, बच्चे तो बच्चे ही होते हैं। यह कहानी मानवीय संबंधों की रेशों की उलझन को सुलझाती हुई संवेदना का सुंदर ताना-बाना बुनती है।
तीसरी कहानी है ‘‘मायका’’। हर उसे स्त्री की दो दुनिया होती हैं जो विवाहित है। पहले दुनिया उसके मायके की होती है और दूसरी दुनिया ससुराल की। एक दुनिया से निकाल कर दूसरी दुनिया में प्रवेश करना और फिर उसमे स्वयं को राम देना आसान नहीं होता है। कई बार दूसरी दुनिया में निर्वाह करना कठिन हो जाता है तब उसे लौटना पड़ता है अपनी पहली दुनिया में जहां सब कुछ बदल चुका होता है। एक संघर्ष उसका स्वागत करता है जिस पर विजय पाना उसके लिए अनिवार्य है क्योंकि यही उसकी जीवन में परीक्षा की घड़ी भी होती है। यह कहानी आकार में भले ही छोटी है किंतु इसकी मुख्य पात्र साहिब के संघर्ष के रूप में एक भरपूर कथानक समेटे हुए हैं।
संग्रह में कई छोटी-छोटी कहानी है जैसे कम्मो, ईद की ईदी, हारुन मियां का दर्द, ख़ौफ़ बंदोबस्त आदि। इनमें ‘‘ईद की ईदी’’ एक बेहद मासूम कहानी है जो धर्म के नाम पर पलने वाले आपसी वैमनस्य पर तीखा प्रहार करती है। एक हिंदू व्यक्ति छोटी बच्ची को ईदी के रूप में पैसे दे कर एक पूरे मुस्लिम परिवार की मदद करता है जबकि ईद गुजरे कुछ महीने हो चुके हैं। यहां लेखक ने ईदी के सच्चे अर्थ को स्थापित करते हुए बताया है कि यह कोई ‘‘रिटर्न गिफ्ट’’ नहीं बल्कि इंसानियत और आपसी भाईचारे की प्रतीक का व्यवहार है।
लेखक एवं सिनेमैटोग्राफर माधव चंद्र ने कहानी संग्रह की कहानियों के बारे में विस्तृत टिप्पणी करते हुए ‘‘कौन लगती है वह आपकी ? लघु साहित्य की चैपाल से एक आवाज’’ शीर्षक से लिखा है कि ‘‘साहित्य की दुनिया में कुछ कहानियाँ ऐसी होती हैं जो महज कहानी नहीं, बल्कि कौन लगती है वह? समाज के सीने में दबी हुई एक टीस होती हैं। यह 21 कहनियों का गुलदस्ता ‘‘कौन लगती है वह आपकी?’’, इन्हीं टीसों को बड़े सादे ढंग से सामने रखती है। न इसमें कोई बड़ा दर्शन है, न कोई नाटकीय क्रांति। यह तो बस हमारे बीच की उस सच्चाई को दिखाती है, जहाँ रिश्तों पर रुतबे की धूल पड़ जाती है। लेखक, आर. के. तिवारी जी की यह किताब कौन लगती है वह आपकी? की इक्कीस कहनियों को पढ़ते हुए मेरा दिल बार-बार भर आया। जैसे कोई पुराना दोस्त कंधे पर हाथ रखकर कहे,देखो, जिंदगी इसी में है- दर्द में, प्यार में, भाईचारे में।’’
कहानी ‘‘शबीरा अंजुम’’ के आरंभ में ही कथाकार आरके तिवारी ने कथानक के स्वरूप से परिचित कराते हुए लिखा है कि ‘‘यह कहानी एक शबीरा अंजुम नाम की चित्रकार लड़की की है जिसकी परवरिश उसकी माँ ने की जिसे समाज की दकियानूशी विचारधारा और बेटियों के विरोधी मानसिकता वालों ने तलाक दे कर घर से बाहर कर दिया था पर वह हिम्मत नहीं हारी जो उनके गाल पर आजादी का एक तमाचा है।’’ वस्तुतः लड़की चाहे किसी भी धर्म या समाज की हो उसका संघर्ष एक लगभग एक-सा होता है। यदि उसे अपने परिवार से, अपने माता-पिता से सहारा मिल जाए तो वह हर एक संघर्ष में विजय पा सकती है। यही इस कहानी का मूल संदेश है। यह कहानी स्त्री की क्षमता और आत्मविश्वास की कहानी है।
कहानी “कौन लगती है वह आपकी” मालिक नौकर के आपसी संबंधों के झरोखे से मानवमूल्यों की तफ्तीश करती है। इसी कहानी का एक अंश है- “ऐसा कौन मालिक होगा जो अपने मुलाज़िमों की इस कदर फिक्र करता होगा कौन लगती है वह आपकी क्या रिश्ता है आपका और फिर उसी तेवर में बोली आप कुछ भी कहें! पर मुझे शक है कि फातीमा आपकी रखैल है और अब जब उसकी उम्र ढल गई तो अब आपकी नज़र उसकी जवान बेटी पर है। इतना सुनना था कि नवाब गुस्से से चीखते हुए बोले ! खामोश बदजात औरत ! तूं औरत के सारे कायदे भूल गई क्या! अपनी जुबान को लगाम दे वर्ना ! इतना कह नवाब कुछ और करे! कि तभी दरवाजे से एक जोरदार कड़क आवाज़ सुन कर सभी उसी ओर देखने लगे। वह आवाज़ और किसी की नहीं नवाब के चचा जान हामिद अंसारी की थी जो उसी शहर में अलग एक कोठी में अपने परिवार सहित रहते थे। जो कुछ दिनों पहले हज्ज के लिए गये थे और अभी हाल ही में लौटकर आये थे और आज अपने भतीजे नवाब नूर मोहम्मद से मिलने उनके घर आये पर यहाँ का माजरा देख गुस्से से रुबीना से बोले ऐ क्या बकवास लगा रखी है बहू! बेहूदी की हद हो गई तुम्हें कुछ पता भी है तुम अपने शौहर पर इतना घिनौना इलज़ाम लगा रही हो। तुम्हें पता भी है वह कितनी कशमकश की ज़िन्दगी जी रहा है! अरे उस खुदा का शुक्रिया अदा करो कि वह यह सब बरदास्त कर रहा है।”
हर अंधेरा भीतर से इतना स्याह भी नहीं होता जितना ऊपर से दिखाई देता है। हर नौकर बेईमान नहीं होता और हर मलिक क्रूर या शोषक नहीं होता। जहां मानवी संवेदनाएं होती हैं वहां मालिक और नौकर का आपसे रिश्ता एक दूसरे के पूरक के रूप में होता है किसी बेमेल रिश्ते की तरह नहीं। क्या कहानी एक ही एक अलग ही धरातल पर पाठकों से सीधा संवाद करती है और मन को छू जाती है।
“बंदोबस्त” कहानी मैं वर्णित परिस्थितियां किसी भी मजहब से जुड़े परिवार की हो सकती है क्योंकि दंगे फसाद मजहब के नाम पर होते हैं लेकिन उस पीड़ित होने वाले सिर्फ इंसान ही होते हैं। मात्र धर्म के आधार पर किसी को दंगाई मान लेना मानवीय कृत्य है। यह कहानी उसे परिवार की है जिसके एकमात्र कमाने वाले व्यक्ति को दंगाई होने की संदेह में गिरफ्तार कर हवालात में डाल दिया जाता है। घर में खाने के लाले पड़ जाते हैं। नन्हा बालक रसूल इन सब बातों से अनभिज्ञ है। वह मां से जिद करता है कि इस बार ईद में उसके लिए नया कुर्ता पजामा सिलवा दे। उसकी मां अपनी व्यवस्था पर रो पड़ती है। लेकिन जो व्यक्ति खांटी विषम परिस्थितियों में भी हिम्मत से कम लेता है उसके लिए रास्ते खुद ब खुद निकल आते हैं।
कथाकार आर.के. तिवारी ने अपनी कहानियों में मध्यवर्गीय एवं निम्न मध्यम वर्गीय मुस्लिम परिवारों की समस्याओं को प्राथमिकता दी है तथा उनका सकारात्मक हल भी अपनी कहानियों में प्रस्तुत किया है। इस दृष्टि से यह कहानी संग्रह न केवल पठनीय है अपितु मनन-चिंतन के लिए भी प्रेरित करता है। सभी कहानियां मुस्लिम परिवारों पर केंद्रित होने के कारण भी यह संग्रह विशिष्ट बन गया है।
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Saturday, September 19, 2026

टाॅपिक एक्सपर्ट | गणपति बप्पा खों पूजो औ दसलक्षण खों मानों, सब अच्छो-अच्छो रैहे- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

टाॅपिक एक्सपर्ट |
गणपति बप्पा खों पूजो औ दसलक्षण खों मानों, सब अच्छो-अच्छो रैहे
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
     गणपति बप्पा बिराजे हैं औ संगे जैन समाज को दसलक्षण परब सोई चल रओ । बप्पा सो भलो करहेईं, मनो अपन ओरन खों बी कछु अच्छे काम करो चाइए जीसे जिनगी सुदर जाए। अच्छी बातें सबई धरम में होत आएं। सो, अच्छी बातें चाए जोन धरम की होंए बे सबई मानुस को पालन करो चाइए। जो ने पतो होय सो खुदई देख लेओ। पैलो लक्षण आए क्षमा। दूसरो आए मार्दव मने ने लड़ो औ ने झूठो गरब करो। तीसरो आए आर्जव मने दूसरों से जलापिट्टी ने करो। चौथो आए सत्य। अब ई बारे में आप सब खुदई जानत हो। पांचवो आए शौच मने बुरई आदतन औ लालच खों छोर देओ। छठों आए संयम मने सहूरी धरे में भलाई ठैरी। सातमों तप औ आठमों आए त्याग। ईको मतलब जे के नोने काम करो औ सबरी बुराई खों छोर देओ, सो गिरहस्थी बी नोनी चलहे। नौमों अंकिचन औ दसमों आए  ब्रह्मचर्य। अंकिचन मने नियम खों पालो औ ब्रह्मचर्य मने बुरई आदत़ें छोर के भले मानुस बनो। सो जे सबरे लक्षण सबई के पालन जोग आएं। सांची कई के नईं?
    जो पइसा की जोड़ा-जोड़ी में ने परो जाए तो जिनगी आसान हो जाए। फेर  रिशवतखोरी, कामचोरी, मिलावटखोरी ने हुइए। दूसरन की मदद करो। औ संगे, सांची बोलो औ कोनऊं सल्ल ने पालो। गणपति बप्पा बी जेई कैत आएं औ महवीर जू बी जेई कैत आएं। जो अपन ओरें अच्छे से रैहें, तो अपनो घर-परिवार अच्छो रैहे। जो घर-परिवार अच्छो रैहे, सो अपने गांव-शहर अच्छे रैहें। अच्छे गांव-शहरन सेई तो अपनो देस अच्छो रैहे। सो गणपति बप्पा खों पूजो औ दसलक्षणन खों मानों। फेर सब अच्छो-अच्छो हुइए।
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हार्दिक आभार पत्रिका 🙏
हार्दिक आभार प्रिय रेशू 🌹
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Wednesday, September 16, 2026

चर्चा प्लस | श्रीगणेश के हर नाम के पीछे मौजूद है एक रोचक कहानी | डॉ सुश्री शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस 
श्रीगणेश के हर नाम के पीछे मौजूद है एक रोचक कहानी 
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह
                                                              एकदंत, मोहासुरपति, विध्नराज, धूम्रवर्ण, गजानन आदि 108 नाम हैं श्री गणेश के जिन्हें प्रथम पूज्य देवता माना जाता है। जिा देवता का अवतरण ही अत्यंत रोचक ढंग से हुआ हो और जिन्होंने एक अलग ही स्वरूप पाया, ऐसे देव श्रीगणेश के हर नाम के पीछे एक कहानी मौजूद है। ये कहानियां श्रीगणेश के स्वरूप को तो समझाती ही है, साथ ही इस बात से भी आगाह करती हैं कि चाहे कोई व्यक्ति किसी भी रूप, रंग या व्यवसाय को हो उससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है। हर व्यक्ति अपने गुणों के कारण पूज्य बन सकता है।  

हिन्दू संस्कृति में श्रीगणेश एकमात्र ऐसे देवता है जिनका मुख हाथी का तथा शेष शरीर मनुष्यों  अथवा देवताओं जैसा है। उनका यह स्वरूप मानव और वन्यजीवन के बीच घनिष्ठ अटूट संबंधों को दर्शाता है। वन्य पशुओं में हाथी को सबसे अधिक बलशाली, सबसे अधिक बुद्धिमान, सबसे अधिक स्मरणशक्ति वाला तथा सबसे अधिक धैर्यवान माना जाता है। हाथी तब तक किसी पर प्रहार नहीं करता है जब तक कि उसके परिवार अथवा उस पर संकट न आए। हाथी दीर्घायु होता है तथा विशुद्ध शाकाहारी होता है। अलौकिक शक्ति के धनी होते हुए भी श्रीगणेश में समस्त गजतत्व मौजूद हैं। सृष्टि की योग्य कृति मानव तथा वन्य समुदाय की सर्वश्रेष्ठ रचना गज के सम्मिश्रण वाले श्री गणेश की शक्तियों का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। पौराणिक कथा के अनुसार गणेश जी ने ही महाभारत को अबाधगति से लिपिबद्ध किया था।
गजाननं भूतगणादि सेवितं, कपित्थ जम्बूफलसार भक्षितं।
उमासुतं शोक विनाशकारणं, नमामि विघ्नेश्वर पादपंकजं।।
श्रीगणेश के एक नहीं अपितु 108 नाम हैं, जिनका जाप किया जाता है। प्रत्येक नाम का अपना एक अलग महत्व है। जैसे - अखुरथ- जिनके पास रथ के रूप में एक चूहा है, अलमपता- सदा सनातन भगवान, अमितःअतुलनीय प्रभु, अनंतचिद्रुपमयं- अनंत और चेतना-व्यक्तित्व, अवनीश- पूरी दुनिया के भगवान, अविघ्न- सभी बाधाओं को दूर करने वाला, बालगणपति- प्रिय और प्यारा बच्चा, भालचंद्र- चंद्रमा-कलक वाले भगवान, भीम- विशाल और विशाल, भूपति- देवताओं के स्वामी, भुवनपति - जगत के स्वामी, बुद्धिनाथ- ज्ञान के देवता, बुद्धिप्रिया- ज्ञान और बुद्धि को प्यार करने वाले भगवान, बुद्धिविधता- ज्ञान और बुद्धि के देवता, शूपर्णकर्ण- बड़े कान वाले भगवान, शुबनः सर्व मंगलमय प्रभु, शुभगुणकानन- वह जो सभी गुणों का स्वामी है, श्वेता- वह जो सफेद रंग की तरह पवित्र हो, सिद्धिधाता- सफलता और सिद्धियों के दाता, सिद्धिप्रिया- वह जो इच्छाओं और इच्छाओं को पूरा करती है, सिद्धिविनायक- सफलता के दाता, स्कंदपुर्वजा- स्कंद (भगवान मुरुगन) के बड़े भाई, सुमुख- जिसका मुख प्रसन्न है, सुरेश्वरम- सभी प्रभुओं के भगवान, स्वरूप - सौंदर्य के प्रेमी, तरुण- अजेय भगवान, उद्दंड- बुराइयों और दोषों की दासता, उमापुत्र- देवी उमा (पार्वती) के पुत्र, वक्रतुंड - घुमावदार सूंड वाले भगवान, वरगणपति - वरदानों के दाता, वरप्रदा- इच्छाओं और इच्छाओं का दाता, वरदविनायक - सफलता प्रदान करने वाले, वीरगणपति- वीर प्रभु, विद्यावारिधि- ज्ञान और बुद्धि के देवता, विघ्नहर्ता- विघ्नों का नाश करने वाले, विघ्नराज- सभी बाधाओं के भगवान, विघ्नस्वरूप- विघ्नों का रूप धारण करने वाले, विकट- विशाल और राक्षसी, विनायक- सभी लोगों के भगवान आदि।
श्रीगणेश के कुछ नामों की रोचक कथाएं भी देख ली जाएं। ये ही तो हमारी पौराणिक विरासत हैं-

एकदंत की कथा
श्रीगणेश के एकदंत होने की कई कथाएं मिलती हैं-
एक कथा- एक बार विष्णु के अवतार परशुराम शिव से मिलने कैलाश पर्वत पर आए। उस समय शिव ध्यानावस्थित थे तथा वे कोई व्यवधान नहीं चाहते थे। शिवपुत्र गणेश ने परशुराम को रोक दिया और मिलने की अनुमति नही दी। इस बात पर परशुराम क्रोधित हो उठे और उन्होंने श्री गणेश को युद्ध के लिए चुनौती दे दी। श्रीगणेश ने चुनौती स्वीकार कर ली। दोनों के बीच घनघोर युद्ध हुआ। इसी युद्ध में परशुरामजी के फरसे से उनका एक दांत टूट गया।
दूसरी कथा- भविष्य पुराण में कथा है जिसके अनुसार कार्तिकेय ने श्रीगणेश का दन्त तोडा था। श्रीगणेश अपनी बाल अवस्था में अति नटखट हुआ करते थे। एक बार उन्होंने खेल-खेल में अपने ज्येष्ठ भाई कार्तिकेय को परेशान करना शुरू कर दिया। कार्तिकेय को श्रीगणेश पर गुस्सा आ गया और वे गणेश से लड़ पड़े। इसी लड़ाई-झगड़े में गणपति का एक दांत टूट गया।
तीसरी कथा- एक अन्य कथा के अनुसार महर्षि वेदव्यास जी को महाभारत लिखने के लिए किसी बुद्धिमान लेखक की जरुरत थी। उन्होंने इस कार्य के लिए श्रीगणेश को चुना। श्रीगणेश इस कार्य के लिए मान तो गए। पर उन्होंने एक शर्त रखी कि महर्षि वेदव्यास महाभारत लिखाते समय रुकेंगे नहीं और न ही बोलना बंद करेंगे। वेदव्यास ने शर्त स्वीकार कर ली। तब श्री गणेश जी ने अपने एक दांत को तोड़कर उसकी कलम बना ली और उसी से वेद व्यास जी के वचनों पर महाभारत लिखी।
चौथी कथा- गजमुखासुर नामक एक महाबलशाली असुर हुआ जिसने अपनी घोर तपस्या से यह वरदान प्राप्त कर दिया की उसे कोई अस्त्र शास्त्र मार नही सकता। यह वरदान पाकर उसने तीनो लोको में अपना प्रभुत्व जमा लिया। सब उससे भयभीत रहने लगे। तब उसका वध करने के लिए सभी देवताओं ने श्रीगणेश को मनाया। गजानंद ने गजमुखासुर को युद्ध के ललकारा और अपना एक दांत तोड़कर हाथ में पकड़ लिया। गजमुखासुर को अपनी मृत्यु नजर आने लगी। वह मूषक रूप धारण करके युद्ध से भागने लगा। गणेशजी ने उसे पकड़ लिया और अपना वाहन बना लिया।

मोहासुरपति
जब कार्तिकेय ने तारकासुर का वध कर दिया तो दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने मोहासुर नाम के दैत्य को देवताओं को प्रताड़ित करने के लिए भेजा। मोहासुर से मुक्ति के लिए देवताओं ने गणेश की उपासना की। तब गणेश ने महोदर अवतार लिया। महोदर का उदर यानी पेट बहुत बड़ा था। वे मूषक पर सवार होकर मोहासुर के नगर में पहुंचे तो मोहासुर ने बिना युद्ध किये ही गणपति को अपना इष्ट बना लिया। तभी से श्रीगणेश मोहासुरपति कहलाए।

लंबोदर
समुद्रमंथन के समय भगवान विष्णु ने जब मोहिनी रूप धरा तो शिव उन पर मोहित हो गए। भावावेश में उनका स्खलन हो गया, जिससे एक काले रंग के दैत्य की उत्पत्ति हुई। इस दैत्य का नाम क्रोधासुर था। क्रोधासुर ने सूर्य की उपासना करके उनसे ब्रह्मांड विजय का वरदान ले लिया। क्रोधासुर के इस वरदान के कारण सारे देवता भयभीत हो गए। वो युद्ध करने निकल पड़ा। तब गणपति ने लंबोदर रूप धरकर उसे रोक लिया। क्रोधासुर को समझाया और उसे ये आभास दिलाया कि वो संसार में कभी अजेय योद्धा नहीं हो सकता। क्रोधासुर ने अपना विजयी अभियान रोक दिया और सब छोड़कर पाताल लोक में चला गया।

विकट
भगवान विष्णु ने जलंधर के विनाश के लिए उसकी पत्नी वृंदा का सतीत्व भंग किया। उससे एक दैत्य उत्पन्न हुआ, उसका नाम था कामासुर। कामासुर ने शिव की आराधना करके त्रिलोक विजय का वरदान पा लिया। इसके बाद उसने अन्य दैत्यों की तरह ही देवताओं पर अत्याचार करने शुरू कर दिए। तब सारे देवताओं ने भगवान गणेश का ध्यान किया। तब भगवान गणपति ने विकट रूप में अवतार लिया। विकट रूप में भगवान मोर पर विराजित होकर अवतरित हुए। उन्होंने देवताओं को अभय वरदान देकर कामासुर को पराजित किया।

विघ्नराज
एक बार पार्वती अपनी सखियों के साथ बातचीत के दौरान जोर से हंस पड़ीं। उनकी हंसी से एक विशाल पुरुष की उत्पत्ति हुई। पार्वती ने उसका नाम मम (ममता) रख दिया। वह माता पार्वती से मिलने के बाद वन में तप के लिए चला गया। वहीं उसकी भेंट शम्बरासुर से हुई। शम्बरासुर ने उसे कई आसुरी शक्तियां सीखा दीं। उसने मम को गणेश की उपासना करने को कहा। मम ने गणपति को प्रसन्न कर ब्रह्मांड का राज मांग लिया। शम्बर ने उसका विवाह अपनी पुत्री मोहिनी के साथ कर दिया। शुक्राचार्य ने मम के तप के बारे में सुना तो उसे दैत्यराज के पद पर विभूषित कर दिया। ममासुर ने भी अत्याचार शुरू कर दिए और सारे देवताओं के बंदी बनाकर कारागार में डाल दिया। तब देवताओं ने गणेश की उपासना की। गणेश विघ्नराज के रूप में अवतरित हुए। उन्होंने ममासुर का मान मर्दन कर देवताओं को छुड़वाया।

धूम्रवर्ण
एक बार भगवान ब्रह्मा ने सूर्यदेव को कर्म राज्य का स्वामी नियुक्त कर दिया। राजा बनते ही सूर्य को अभिमान हो गया। उन्हें एक बार छींक आ गई और उस छींक से एक दैत्य की उत्पत्ति हुई। उसका नाम था अहम। वह शुक्राचार्य के पास गया और उन्हें गुरु बना लिया। वह अहम से अहंतासुर हो गया। उसने खुद का एक राज्य बसा लिया और भगवान गणेश को तप से प्रसन्न करके वरदान प्राप्त कर लिए। उसने भी बहुत अत्याचार और अनाचार फैलाया। तब गणेश ने धूम्रवर्ण के रूप में अवतार लिया। उनका वर्ण धुंए जैसा था। वे विकराल थे। उनके हाथ में भीषण पाश था जिससे बहुत ज्वालाएं निकलती थीं। धूम्रवर्ण ने अहंतासुर का पराभाव किया। उसे युद्ध में हराकर अपनी भक्ति प्रदान की।

श्रीगणेश अन्य देवताओं की भांति शारीरिक दृष्टि से सुंदर नहीं हैं किन्तु उनकी अपरिमित बुद्धि के कारण उन्हें प्रथमपूज्य देवता का पद प्राप्त है। यही वह बात है जिसे हम मनुष्यों को सीखना चाहिए कि जाति, धर्म, आकार, प्रकार, सुंदरता, असुंदरता का कोई अर्थ नहीं है, यदि किसी चीज का अर्थ है तो वह है सर्वकल्याण। यही तो सत्य मौजूद है श्रीगणेश के स्वरूप में और यही सत्य हमारे जीवन में उनके अस्तित्व को रोचक बनाता है।


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(दैनिक, सागर दिनकर में 16.09.2026 को प्रकाशित) 
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Tuesday, September 15, 2026

पुस्तक समीक्षा | इतिहास संबंधी अनेक भ्रम दूर करने में सक्षम है पुस्तक “छत्रसाल वंशावली” | समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
इतिहास संबंधी अनेक भ्रम दूर करने में सक्षम है पुस्तक “छत्रसाल वंशावली”
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक - छत्रसाल वंशावली
लेखक  - सन्तोष कुमार पटैरिया
प्रकाशक  - शतरंग प्रकाशन एस-43, विकासदीप बिल्डिंग, द्वितीय तल, स्टेशन रोड, लखनऊ-226001
मूल्य       - 200/-
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बुंदेलखंड का अपना एक गौरवशाली इतिहास है जिसमें महाराज छत्रसाल का उल्लेख स्वर्ण अक्षरों में किया जाता है। समूचे बुंदेलखंड में महाराज छत्रसाल का मान सम्मान आज भी बरकरार है। इसीलिए महाराज छत्रसाल के व्यक्तित्व एवं कार्यों को लेकर जब कोई विवाद की स्थिति निर्मित की जाती है तो बुंदेलखंड के जनमानस को गहरी ठेस पहुंचती है। ऐसी स्थिति में महाराज छत्रसाल के संबंध में उत्पन्न किए गए भ्रम का निवारण आवश्यक हो जाता है और इस प्रकार के अनेक भ्रम का निवारण करने वाली पुस्तक है “छत्रसाल वंशावली”। जो इसी वर्ष 2026 में प्रकाशित हुई है।

28 अगस्त 1958 को जन्में उत्तर प्रदेश महोबा के संतोष कुमार पटैरिया संस्कृत विषय में एम.ए. तथा ‘विद्या वाचस्पति’ की उपाधि प्राप्त हैं। उन्हें हिन्दुस्तानी अकेडमी प्रयागराज उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा बुन्देली अकादमी सम्मान 2025 से, हिन्दुस्तानी अकेडमी प्रयागराज उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा बुन्देली अकादमी सम्मान 2025 से सम्मानित किया जा चुका है। अभी तक ‘जय पीपल देव’, ‘लोक कवि ईसुरी’, उ.प्र. का स्वतंत्रता संग्राम महोबा, ‘आल्हा समर सारावली’ कृति प्रकाशित हो चुकी हैं। “छत्रसाल वंशावली” उनकी नवीनतम कृति है। यह गहन शोधपरक एवं इतिहास को उसके वास्तविक रूप में सामने रखने के उद्देश्य से लिखी गई है।

इस कृति की आधार सामग्री के संबंध में संतोष कुमार पटैरिया ने भूमिका में लिखा है कि - “यह पाण्डुलिपि चरखारी के श्री देवनंदन तिवारी के माध्यम से प्राप्त हुई है। इसमें 19 रानियों और अधिकतम सभी सन्तानों का विवरण है। सम्वत् 1962 (सन् 1905) में श्री दरयाव सिंह जैवार द्वारा लिखी इस पाण्डुलिपि की विशेषता है कि इसमें निःसंतान रानियां, गोद लिये बच्चे और छत्रसाल के अतिरिक्त उनके पुत्रों के वैवाहिक संबंधों को भी लिखा गया है। मेरे पुस्तकालय में जो भी ग्रन्थ उपलब्ध थे उनमें निहित रानियों और पुत्रों के नाम ग्रन्थ के संन्दर्भ के साथ दिये गये हैं जिससे इतिहासकारों को तुलना करने में सुविधा रहेगी। तालव्य श का प्रयोग नहीं किया जाता था किन्तु मैंने नामों के शुद्ध अक्षर लिखे हैं जहाँ शब्द पठनीय नहीं हो सका वहां--रेखा खींच दी है। राजा छत्रसाल के पुरातात्विक साक्ष्य बहुत हैं। बुंदेलाकालीन स्मारकों मंदिर आदि की पहचान यह है कि गुम्बद के नीचे उल्टे और सीधे कमल बने हैं ज्ञातव्य है कि बुन्देलखण्ड में नीले कमल होते थे जिन्हें जयपुर राजघरानों में भेजा जाता था। नीलकमल को पुण्डरीक कहते हैं। मैं तपः पुरुष श्री गोविन्द सिंह बुन्देला, दीवान प्रतिपाल सिंह कृत बुन्देलखण्ड का इतिहास के सम्पादक डॉ. बहादुर सिंह परमार, शतरंग प्रकाशन, लखनऊ के प्रति हार्दिक आभारी हूँ। पुस्तक में श्री भगवान दास गुप्त की कृति का पत्र लिया गया है।”

   ‌‌बुंदेली संस्कृति के अध्येयता एवं महाराजा छत्रसाल बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, छतरपुर के प्रो. बहादुर सिंह परमार ने हमेशा बुंदेली संस्कृति एवं इतिहास पर शोध कार्य को बढ़ावा दिया है। वह स्वयं भी उन पांडुलिपियों को ढूंढते रहते हैं जो किसी कारणवश प्रकाशित नहीं हो पाई किंतु उनमें महत्वपूर्ण लेखन किया गया है। ऐसी पांडुलिपियों को ढूंढ कर वे स्वयं प्रकाशित करवाने का कार्य भी करते हैं। प्रो. बहादुर सिंह परमार ने पुस्तक में अपनी सम्मति देते हुए लिखा है कि - “बुन्देलखंड केशरी महाराजा छत्रसाल एक ऐसे व्यक्तित्व हैं जिनसे प्रेरणा ग्रहण कर न्याय, संघर्ष, सर्वधर्म समभाव के साथ अपने धर्म के प्रति गहन आस्था सीखी जाती है जिन्होंने आततायी सत्ता के विरुद्ध संघर्ष कर स्वराज्य की भावना वीर शिवाजी से सीख लेकर अपनायी। इनके बारे में तथाकथित लोग अनेक लोक-श्रुतियाँ बताते हैं। खासतौर पर उनकी संतानों और रानियों के बारे में। उनके समकालीन परिस्थितियों को नजर अंदाज कर आज के परिवेश से सोचते हैं जो न्याय संगत नहीं है। सोशल मीडिया पर महोबा के आदरणीय संतोष पटैरिया ने सूचना दी कि उन्हें एक पाण्डुलिपि प्राप्त हुई है जिसमें महाराजा छत्रसाल की सन्तानों तथा रानियों के बारे में विवरण है। मैंने उनसे अनुरोध किया कि इसे प्रकाश में आना चाहिए। उन्होंने इस बात से सहमति व्यक्त की। मैंने उनसे वायदा किया था कि इस कार्य में जो मुझसे सहयोग बनेगा अवश्य करेंगे।”

   बुंदेलखंड के पितृपुरुष महाराज छत्रसाल की वंशावली के वास्तविक एवं विस्तृत स्वरूप को इतिहासकारों एवं जिज्ञासु पाठकों के सामने लाने के लिए संतोष कुमार पटैरिया ने चरखारी उत्तर प्रदेश के देवनंदन तिवारी की पांडुलिपि को आधार सामग्री के रूप में ग्रहण करते हुए इस विषय से संबंधित अन्य पुस्तकों का गहन अध्ययन किया, विद्वानों के सहयोग से तथ्यों की सत्यता को परखा तथा इसके उपरांत इस पुस्तक का कलेवर तैयार हुआ। पुस्तक की सामग्री को पांच अध्यायों में प्रस्तुत किया गया है। जिसमें प्रथम अध्याय ‘सम्मति’ तथा दूसरा ‘भूमिका’ का है। ‌
तीसरा अध्याय “पाण्डुलिपि का पाठ (बुन्देली)” का है जिसमें दो पाठ हैं - (अ) पुत्रन को ब्याह तथा
(ब) सरीला, जैतपुर, चरखारी, पन्ना आदि सहित विवरण।
   चतुर्थ अध्याय में “महाराज छत्रसाल वंशवृक्ष (हिन्दी)” के अंतर्गत तीन पाठ रखे गए हैं - (अ) पाण्डुलिपि के अनुसार वंशवृक्ष, (ब) बुन्देलों का संक्षिप्त विवरण, तथा (स) विवरण में निहित ग्राम / नगर के नाम।
     पंचम अध्याय में अन्य ग्रन्थों में छत्रसाल की रानियों और पुत्रों के विवरण की जानकारी दी गई है।
     
        लेखक संतोष कुमार पटैरिया ने भूमिका में महाराज छत्रसाल के जन्म से संबंधित संक्षिप्त विवरण दिया है। उन्होंने लिखा है कि “वीर छत्रसाल ने लगभग बारह वर्ष की अवस्था में अपने माता पिता खोये थे। चम्पतराय बुन्देला के सारवाहन, अंगदराय, रतन, छत्रसाल और गोपाल पुत्र थे। सन् 1649 में खेलसर में बाकी खाँ द्वारा सारवाहन मारे गये थे। उनके निधन के बाद छत्रसाल का जन्म हुआ था। व्यक्ति के प्रसिद्ध होने पर उसकी जन्मतिथि और बचपन का विवरण खोजा जाता है और फिर कई मत सामने आते हैं इस प्रकार जन्मतिथि ही निश्चित नहीं हो पाती है। लिखने वाले आसपास के काल की घटनाओं को अनदेखी करते हुये अपना मत लिख देते हैं। इम्पीरियल गजेटियर में तो सन् 1643 ई. में छत्रसाल के जन्म का उल्लेख है। छत्रसाल के राजकवि श्री गोरेलाल 'लाल' थे उन्होंने अपनी कृति छत्रप्रकाश में आठवें अध्याय में छत्रसाल के नामकरण के बारे में लिखा है-
ईस नखत अनुरूप अरू, अरथवंत परिनााम। जनम पत्र तातें लिख्यौ, छत्रसाल यह नाम।।
    ईस नक्षत्र से शिव के नक्षत्र आर्द्रा से आशय है। छत्रप्रकाश में जन्मतिथि तो दृष्टिगत नहीं हुई है किन्तु यह उल्लेख किया है कि सारवाहन के निधन से दुखी माँ को स्वप्न हुआ था कि मैं आपके यहाँ पुनः जन्म लूँगा। श्री भीखराम शर्मा पन्ना के पास छत्रसाल का जन्मांक था जो जन सामान्य तक पहुँच सका। छत्रसाल की जन्मतिथि सम्वत् 1707 का भी उल्लेख मिलता है। किन्तु लाल कवि ने छत्रसाल की ग्यारहवें वर्ष की अवस्था में चम्पतराय के लालकुंवरि के निधन का उल्लेख किया है।”

      महाराज छत्रसाल के निधन के संबंध में लेखक ने भूमिका में ही यह भी जानकारी दी है कि “वैराग्य की ओर अग्रसर छत्रसाल को कुछ लोगों द्वारा मिले तथ्य के आधार पर छत्रसाल सम्वत् 1788 पौष सुदी तृतीया को धुबेला महल की कुछ दूरी पर बने मंदिर में अपना अंगरखा उतारकर अज्ञात स्थान पर चले गये। एक दिन प्रतीक्षा के बाद मंदिर के समीप ही उनकी सांकेतिक अन्त्येष्टि की गई। उसी स्थान पर बाजीराव पेशवा प्रथम द्वारा स्मारक बनवाना आरंभ किया था जो पूर्ण नहीं हो सका। छत्रसाल के प्रस्थान के सोलह वर्षों बाद सम्वत् 1804 में माघ सुदी एकादशी को लगभग 95 वर्ष की अवस्था में भूषण का निधन हुआ था। कृष्णकवि ने तो प्रयागराज के पंडा द्वारा लिखा गया विवरण उद्धृत किया है जिसमें अस्थियां लाने वालों का उल्लेख है। जगतराज के राजकवि हरिकेश थे इन्होंने जगतराज की दिग्विजय काव्य विविध छंदों में लिखा है। चरखारी रियासत द्वारा इस कृति की लीथो मुद्रण पद्धति से 250 प्रतियां प्रकाशित की गई थी। कृति को हिन्दी साहित्य, इतिहास में छत्रप्रकाश के समान स्थान नहीं मिला। इस कृति में चंपतराय, छत्रसाल जगतराज और उनके पुत्रों का विवरण है। चंदेलवंश बनाफर वंश का भी विवरण देते हुए आल्हा ऊदल विषयक इतिहास भी दिया गया है।”    
   “पाण्डुलिपि का पाठ (बुन्देली)” में बुंदेली बोली में बुंदेलावंश की 19 रानियां का विवरण है। यह अध्याय इस विवरण से आरंभ होता है - “श्री महाराजाधिराज श्रीराजा श्री महाराज छत्रसाल जू देव के बाउन कुंवर कौ हाल वा ब्याहु सादी को हाल लिख्यते ।। महाराज छत्रसाल जू दव की जेठीरानी वेरछा वारे पमार दिमान गुपाल सिंह को बेटी रानी भानकुंवर तिनके महाराजा हिरदेसाह ।।1।।
दूसरी रानी सहरा के धंधरे दिमान हिरदेसाह की बेटी रानी दानकुंवर तिनके महाराजा जगतराज ||2||
तीसरी रानी रामपुरवाले वघेले राजा धनसिंह की बेटी रानी उदेत कुंवर तिनके दिमान नवल सिंह ।।३।।”
       अध्याय "पुत्रन को ब्याह" में  हिरदेसाह के जन्म से विवरण आरंभ किया गया है -
“महाराजा हिरदेसाह को जन्म सम्वत् 1736 में भयौ और महाराजा हिरदेसाह ब्याहे रीमा (रीवा) वाले बघेले लाल राजाराम रानी विचित्रकुंवर तिनके महाराजा मन्नासिंह ||1 ||
वा. महाराजा प्रथीं सिंह साहगढ़ वाले ||2||
वा दूसरी रानी वरेठीवारे पमार दिमान देवी सिंह की बेटी रानी गंजकदवा । ।३ ।।
तीसरी रानी उदगुवा वारे पमार दिमान जैसिंह की बेटो रानी रामकुंवर तिनके दिमान अमरसिंह मलारा (मलहरा) वारे ।।4। |”
        अध्याय “महाराज छत्रसाल वंशवृक्ष” में महाराज छत्रसाल के वंश की रानियों एवं उनकी संतानों का विवरण है। जैसे - “ रानियाँ देवकुँवर, कमलावती के नाम भी मिलते हैं। भानकुँवर पत्नी श्री गोपाल सिंह पमार, बेरछा कृष्णकविकृत बुन्देल भास्कर पृष्ठ 46 के अनुसार भानकुंवर के विवाह की तिथि वैशाख शुक्ल 3 सम्वत् 1621 |
हिरदेशाह जन्म सम्वत् 1736
पहली पत्नी विचित्र कुँवर पुत्री श्री राजाराम बघेल, रीवा के पुत्र मन्ना सिंह और पृथ्वी सिंह शाहगढ़ दूसरी रानी नृपकुँवर पुत्री श्रीदेवी सिंह पमार बरेठी मेदनीमल्ल पहले रूद्रपुर बाद में गंजकदवा तीसरी रानी रामकुँवर पुत्री जौ सिंह पमार, उदगुवाँ अमर सिंह, मलहरा, मनेश कुँवर जाट जाति की, मालम सिंह, लुगासी
छत्रसाल की दूसरी रानी दानकुँवर पुत्री श्री हृदयशाह धंधेरे सहरा के पुत्र जगतराज
तीसरी रानी उदेतकुँवर पुत्री श्री धन सिंह बघेला रामपुरा इनके पुत्र नवल सिंह, भारतीचंद्र
चौथी रानी महाराजकुँवर पुत्री श्री हरि सिंह, धंधेरे, मौहार (निःसंतान)।”
      इसी अध्याय में अन्य जाति की रानियां से उत्पन्न पुत्रों का भी उल्लेख किया गया है। अंत में संख्यात्मक जानकारी देते हुए लेखक ने लिखा है- 19 रानियां से 41 पुत्र तथा 11 अन्य रानिया से अर्थात कुल 52 पुत्र।
     इसके बाद प्राप्त पांडुलिपि के अनुसार महाराज छत्रसाल का वंश वृक्ष दिया गया है। लेखक ने बुंदेली के धार्मिक प्रतीक और देवताओं का भी संक्षिप्त विवरण दिया है साथ ही पांडुलिपि में मिले ग्राम और नगरों के नाम का उल्लेख किया है।
       बुंदेलखंड के इतिहास लेखन में दीवान प्रतिपल से का अभिन्न योगदान है अतः लेखक संतोष कुमार पटेरिया ने दीवान प्रतिपाल सिंह द्वारा लिखित बुंदेलखंड का इतिहास में उद्धृत छत्रसाल की रानियों, रानियां के पिता के नाम, जाति एवं स्थान के नाम की तालिका भी शामिल की है।
     इसी क्रम में कृष्ण कवि द्वारा लिखा गया “बुंदेलखंड का इतिहास (पन्ना खण्ड) से उदित जानकारी भी रखी है।
     इतिहास के संदर्भ में वर्तमान स्थिति शोध की कमी के कारण आए दिन विवादों से घिरी रहती है। कुछ विवाद फिल्म कारों के द्वारा भी जाने-अनजाने खड़े कर दिए जाते हैं। जैसे फिल्म 'बाजीराव मस्तानी' में महाराज छत्रसाल और मस्तानी के इतिहास को नाटकीय रूप से पेश किया गया है, जिसपर इतिहासकारों और वंशजों द्वारा कई विवाद और आपत्तियां जताई गई। इसमें मस्तानी की उत्पत्ति और पृष्ठभूमि को लेकर विवाद की स्थिति रही। फिल्म और इतिहास में मस्तानी की माता को लेकर मतभेद उत्पन्न हो गया। कुछ इतिहासकार उन्हें महाराज छत्रसाल और उनकी फारसी-मुस्लिम पत्नी (रोहानी बेगम) की पुत्री मानते हैं, जबकि कुछ इसे लेकर अन्य दावे करते हैं। इसके साथ ही फिल्म में दिखाया गया है कि मस्तानी खुद संदेश लेकर बाजीराव के पास जाती हैं और समय रहते बाजीराव आकर युद्ध का पासा पलट देते हैं। वहीं ऐतिहासिक तथ्य बताते हैं कि जैतपुर के युद्ध में बंगश ने छत्रसाल को हरा दिया था और उन्हें नजरबंद कर लिया था, जिसके बाद गुप्त संदेश वाहक (रघुनाथ पंडित) बाजीराव के पास मदद के लिए पहुंचे थे।
     ऐसी भ्रामक स्थितियां उत्पन्न हो चुकने के बाद साथ ही जब शोधात्मक पठन-पाठन का चलन काम होता जा रहा है, यह पुस्तक स्पष्ट करती है की महाराज छत्रसाल के वश में कौन-कौन हुए, उनकी कितनी रानियां थी और कितने पुत्र थे। इस प्रकार यह पुस्तक महाराज छत्रसाल से जुड़े कई भ्रम खंडित करती है। यही कारण है जो इस पुस्तक की इतिहास संबंधी उपादेयता को बढ़ा देता है। यह पुस्तक शोधार्थियों तथा बुंदेलखंड के इतिहास एवं छत्रसाल वंशावली में रुचि रखने वालों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। पुस्तक की पृष्ठ संख्या भले ही मात्र 68 है किंतु यह नवीन शोधों को एक मजबूत प्लेटफॉर्म प्रदान करने में सक्षम है।  
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Wednesday, September 9, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | अब तो दारू से तौबा करो भैया हरों | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

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अब तो दारू से तौबा करो भैया हरों
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
  जा खबर सबई ने पढ़ी औ सबई ने सुनी के अपने सागर जिला में जहरीली दारू पी के मुतके आदमी मर गए औ अबे मरत जा रए। ऊपे मुतके बीमार डरे। कोऊ-कोऊ घरे तो जे दसा सुनी के उते कोऊ कमाबे वारों ने बचो। जेई लाने तो कई जात आए के पैले आदमी दारू पीबो सुरू करत आए, फेर दारू आदमी खों पी जात आए। अखीर जहरीली दारू पी गई मुतके आदमियन खों। अब ईकी जांच-पड़ताल हो रई के इत्ती मौतन को जिम्मेवार को आए? चलो, अपन सोई पड़ताल कर लइए! काए से के मरबे वारन के पांछू रै गए उनके मोड़ा-मोड़ी को रोबो देखो-सुनो नईं जा रओ।

 सो ध्यान से पढ़ियो! ताजा बात तो जेई पता परी आए के जोन कारीगर दारू बनाउत्तो बा तीरथ करबे खों चलो गओ सो ऊके बदले कोनऊं अनारी ने दारू बनाई जीसे बा बिगर गई औ जहरीली बन गई। लेओ, सुनबे में कित्ती जरा सी बात आए। मनो इत्तई में तो मुतके जनों को हो गओ राम नाम सत्त। बाकी हम तो जेई जानत आएं के सबसे बड़े दोषी बे दारू पीबे वारे आएं। माफ करियो, काए से मरबे वारे औ कष्ट में रैबे वारों के दोष नईं गिनाए जात, मनो जे तो माननेई परहे के जो बे दारूखोरी ने करते तो उनकी जा दसा ने होती। जे तो तै आए के सरकार दारूबंदी कभऊं ने करहे काए से ऊको मोटो रेवेन्यू मिलत आए। दारू बनावे वारन से गलती भई मनो उन्ने कट्टा दता के तो ने पिलाई रई। सो बचे कोन? बेई दारूखोर जोन अपने परिवार के हींसा को पइसा दारू में उड़ात रए औ अब अपने बेई परिवार खों अकेलो कर गए। सो, भैया हरों अब तो जाग जाओ औ दारूखोरी से तौबा कर लेओ। काए से के दारू आप ओरन की जिनगी औ परिवार से बड़ी कभऊं नईं हो सकत। सो, भैया हरों बिनती आए के चाए खुसी होए, चाए गम, दारू के लाने ने उठें कदम!
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Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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चर्चा प्लस | ‘‘हिमालय है तो हम हैं’’- यही तो थीम है हिमालय दिवस की | डॉ सुश्री शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस 
9 सितंबर हिमालय दिवस पर विशेष:
‘‘हिमालय है तो हम हैं’’- यही तो थीम है हिमालय दिवस की
  - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह 
                                                                               कहा जाता है कि धरती पर एक पत्ता भी हिलता है तो नक्षत्रों तक उसका प्रभाव होता है, फिर हिमालय तो इसी पृथ्वी पर है और संकटों से घिरता जा रहा है। हिमालय पर गहराने वाले संकट हमारे अस्तित्व के लिए स्पष्ट चेतावनी हैं। हाल ही में नेपाल में आई बाढ़ इसका ताज़ा उदाहरण है। कभी भूस्खलन तो कभी ग्लेशियर्स के पिघलने से आने वाली बाढ़ हमें निरंतर चेतावनी दे रही है। हिमालय के संरक्षण के प्रति जागरूकता लाने के लिए ही मनाया जाता है ‘‘हिमालय दिवस’’। इसकी इस बार की थीम है-‘‘हिमालय है तो हम हैं’’। इस थीम की गहराई में उतरना जरूरी है।   

युग-युग से है अपने पथ पर,

देखो कैसा खड़ा हिमालय
डिगता कभी न अपने प्रण से
रहता प्रण पर अड़ा हिमालय
जो-जो भी बाधाएं आएं,
उन सबसे ही लड़े हिमालय
इसलिए तो दुनिया भर में,
हुआ सभी से बड़ा हिमालय

- कवि सोहनलाल द्विवेदी की ‘‘हिमालय’’ शीर्षक कविता की ये पंक्तियां हिमालय पर्वत की विशालता, अडिगता एवं उपादेयता का सम्मानजनक वर्णन करती है। मात्र काव्यात्मक नहीं बल्कि भौगोलिक रूप से हिमालय हमारे देश के लिए गहन पर्यावरणीय महत्व रखता है। हम भारतवासियों को ही नहीं अपितु समूची दुनिया को इसकी उच्चता और विशालता पर गर्व रहा है। हिमालय की उच्चतम चोटी तक पहुंचने की चुनौती ने हमेशा पर्वतारोहियों को आकर्षित किया है। आज हमारा यही हिमालय जलवायु परिर्वतन के संकट से जूझ रहा है। पृथ्वी के बढ़ते हुए तापमान ने जिस प्रकार दुनिया के सभी तत्वों को प्रभावित करना शुरू कर दिया है, उसी प्रकार हिमालय के ग्लेशियर्स भी उस तापमान के कारण अपनी स्थिरता को अपेक्षाकृत तेजी से खो रहे हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार अभी हाल ही में नेपाल में आई भूस्खलन वाली बाढ़ का मूल कारण ग्लेशियर्स का तेजी से पिघलना ही था। हिमालय पर जमी बर्फ हवाओं के मापमान को नियंत्रित कर के ऋतुओं में परिवर्तन लाती है। इस बर्फ का असमय पिघलने लगना ऋतुओं के पैटर्न को भी प्रभावित करने लगा है।
हिमालय दिवस प्रतिवर्ष 9 सितंबर को मनाया जाता है। इस दिवस की पहली बार आधिकारिक घोषणा उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत द्वारा सन 2014 में की गई थी। यह दिवस घोषित करने का उद्देश्य था हिमालय के पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण के बारे में जागरूकता बढ़ाना। इसके पीछे कारण था सन 2010 की अचानक आई बाढ़ और 2013 की केदारनाथ त्रासदी जैसी भीषण प्राकृतिक आपदा। इनके बाद पहाड़ों की बढ़ती पारिस्थितिक संकट के प्रति सभी का ध्यान आकर्षित करने तथा जागरूकता लाने के लिए ‘‘हिमालय दिवस’’ घोषित किया गया।

हिमलय प्राचीनतम भू-संरचनाओं में से एक है। इस विशाल पर्वत श्रृंखला का निर्माण लगभग 40 से 50 मिलियन वर्ष पहले शुरू हुआ था, जब टेक्टानिक प्लेटों की गति के कारण दो बड़े भू-भाग, भारतीय भूभाग और यूरेशिया, आपस में टकरा गए थे और हिमालय का उदय हुआ था। प्राचीन भारतीय ग्रंथों में हिमालय का उल्लेख मिलता है। शिवपुराण में हिमालय को जहां शिवस्थली कहा गया है वहीं उसे देवी पार्वती के के पिता के रूप में भी वर्णित किया गया है। भारतीय संस्कृति में हिमालय सदा ही पूज्य रहा है। किन्तु मानवीय लालच एवं लापरवाहियों के कारण हिमालय संकट के कगार पर आ पहुंचा है। इसीलिए इस वर्ष के लिए थीम रखी गई है-‘‘हिमालय है तो हम हैं’’। यह थीम संकट की गंभीरता को दर्शाती है।

हिमालय उपमहाद्वीप के लिए एक प्राकृतिक जलवायु अवरोधक के रूप में कार्य करता है और मौसम के पैटर्न को नियंत्रित करता है। इन पहाड़ों में अद्वितीय वनस्पतियां, जीव-जंतु और प्रमुख नदी प्रणालियां मौजूद हैं जो लाखों लोगों की आजीविका का सहारा हैं। इन सभी पर संकट का अर्थ है हिमालय पर संकट। इसीलिए हिमालय दिवस पर आयोजित होने वाले कार्यक्रम हिमालय के पर्वतीय क्षेत्रों में खराब शहरी नियोजन, वनों की कटाई, प्लास्टिक प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ते भूस्खलन जैसी समस्याओं से निपटने पर केंद्रित रहते हैं।
हिमलय पर गहराते जलवायु संकट से निपटने के लिए ठोस योजनाएं बनाई गई हैं जिनका सही क्रियान्वयन हिमालय के अस्तित्व को बचाए रख सकता है। दशकों से भारतीय हिमालयी क्षेत्र में विकास ने पहाड़ों को बाधाओं के रूप में या मानकीकृत किए जाने वाले भूदृश्यों के रूप में माना है। लेकिन हिमालय न तो एकसमान है और न ही सुगम है। इसकी भौगोलिक विविधता एवं महत्ता को ध्यान में रखते हुए ‘‘विश्व पृथ्वी दिवस 2026’’ को एक श्वेत पत्र जारी किया गया था जिसमें कहा गया था कि हिमालय में संकट केवल पर्यावरणीय ही नहीं बल्कि व्यवस्थागत भी है। जलवायु परिवर्तन के पैटर्न में बदलाव, जल प्रणालियों की अनिश्चितता और शासन व्यवस्था के खंडित रहने के कारण यह क्षेत्र एक नाजुक मोड़ पर खड़ा है। रिपोर्ट में अधिक डेटा या तीव्र विस्तार की मांग नहीं की गई है, बल्कि पहाड़ों के साथ हमारे सोचने, योजना बनाने और निर्माण करने के तरीके में मौलिक बदलाव की बात कही गई। ‘‘हिमालय का भविष्य: विकास और लचीलेपन पर पुनर्विचार’’ शीर्षक वाली यह रिपोर्ट, सीपी कुकरेजा फाउंडेशन फॉर डिजाइन एक्सीलेंस द्वारा भारतीय हिमालयी क्षेत्र में व्याप्त व्यवस्थागत संकटों के समाधान हेतु प्रस्तुत की गई थी। इंजीनियरिंग, पारिस्थितिकी, शासन और सामाजिक विज्ञान के विशेषज्ञों की भागीदारी वाली हिमालयी गोलमेज सम्मेलन से प्राप्त अंतर्दृष्टियों पर आधारित इस रिपोर्ट में यह स्पष्ट शब्दों में कहा गया था कि हिमालय क्षेत्र एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है जहां पारंपरिक विकास मॉडल अब व्यवहारिक नहीं रह गए हैं।
इस श्वेत पत्र में हिमालयी क्षेत्र के महत्व पर बल दिया गया। इस ओर भी ध्यान दिलाया गया कि हिमालय वैश्विक आबादी के लगभग एक चैथाई हिस्से, यानी लगभग दो अरब लोगों को सीधे तौर पर प्रभावित करता है, जो जल, खाद्य सुरक्षा और पारिस्थितिक संतुलन के लिए इस क्षेत्र पर निर्भर हैं। इसमें क्षेत्र में विकास और लचीलेपन के पुनर्मूल्यांकन की तत्काल आवश्यकता पर प्रकाश डाला गया है। विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ तर्क देते हैं कि वर्तमान अवसंरचना और शहरी विकास अक्सर पारिस्थितिक सीमाओं और भूवैज्ञानिक अस्थिरता की अनदेखी की गई है। इस रिपोर्ट में जलवायु परिवर्तन, बदलते जलवैज्ञानिक पैटर्न और खंडित शासन व्यवस्था के कारण उत्पन्न व्यवस्थागत विफलताओं और बढ़ते आपदा जोखिमों पर विस्तार से प्रकाश डाला गया। एक सतत भविष्य सुनिश्चित करने के लिए, इसमें एकीकृत, डेटा-आधारित नियोजन की ओर संक्रमण का प्रस्ताव रखा गया, जो जलक्षेत्र की सीमाओं का सम्मान करता है और स्थानीय सांस्कृतिक ज्ञान को समाहित करता है। यह मानकीकृत इंजीनियरिंग से हटकर संदर्भ-विशिष्ट डिज़ाइन की ओर बढ़ने का आह्वान करता है जिसमें दीर्घकालिक पर्यावरणीय स्थिरता को प्राथमिकता दी गई है।
रिपोर्ट का मूल सिद्धांत यह है कि हिमालय को अलग-थलग पारिस्थितिक या इंजीनियरिंग समस्याओं के समूह के बजाय एक परस्पर जुड़ी प्रणाली के रूप में समझा जाना चाहिए। वैज्ञानिकों ने इस ओर ध्यान दिलाया कि यद्यपि क्षेत्र के भूविज्ञान और जलविज्ञान के ज्ञान में विस्तार हुआ है, फिर भी जमीनी स्तर पर परिणाम असंगत और अक्सर विनाशकारी हुए हैं। 2013 और 2023 के बीच हुई गंभीर घटनाओं, जैसे कि केदारनाथ बाढ़, चमोली आपदा और जोशीमठ का धंसना, को असामान्य ही घटना नहीं, बल्कि मानवीय हस्तक्षेप और भू-दृश्य की अंतर्निहित संवेदनशीलता के बीच संरचनात्मक असंतुलन के अनुमानित परिणामों के रूप में देखा गया है। जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा और बाढ़ के पूर्व पैटर्न अब भविष्य की स्थितियों का पूर्वानुमान नहीं लगा सकते। 1950 के दशक से वर्षा की तीव्रता में लगभग 15 से 20 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, और कम समय में भारी वर्षा होना अब आम बात हो गई है।
हिमालय की भौगोलिक संरचना में परिवर्तन उसके साथ की जा रही छेड़छाड़ है। हिमालय में 70 प्रतिशत से अधिक सड़कें पहाडियों को काटकर बनाई जाती हैं, जिनमें ढलान को स्थिर करने के लिए उचित उपाय नहीं किए जाते। ढलान गिरने की कई घटनाएं पानी के कारण होती हैं। जब निर्माण कार्य प्राकृतिक जल निकासी को अवरुद्ध कर देता है, तो पानी जमा हो जाता है, मिट्टी में दबाव बढ़ जाता है और भूस्खलन हो जाता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि पर्वतीय क्षेत्रों में, जल प्रवाह का प्रबंधन संरचना से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।

पर्वतीय क्षेत्र में वन एक आवश्यक प्राकृतिक संरचना के रूप में कार्य करते हैं और भूस्खलन के खतरे को 30 से 40 प्रतिशत तक कम कर सकते हैं। यद्यपि जनसंख्या के बदलते पैटर्न इन भू-भागों पर असमान दबाव डाल रहे हैं। लोग उच्च ऊंचाई वाले क्षेत्रों से दूर जा रहे हैं, जबकि निचले इलाकों में स्थित शहर अधिक भीड़-भाड़ वाले होते जा रहे हैं।

पर्यटन को भी हिमालय के पर्यावरण को क्षति पहुंचाने वाला कारण माना गया है। शिमला और मनाली जैसे स्थानों में मौसमी जनसंख्या वृद्धि वहां की स्थायी जनसंख्या से पांच से दस गुना अधिक होती है। इससे अपशिष्ट उत्पादन स्थानीय प्रणालियों की क्षमता से दो से तीन गुना अधिक हो जाता है। रिपोर्ट में दबाव कम करने और अधिक संतुलित आर्थिक अवसर पैदा करने के लिए पर्यटन को विभिन्न क्षेत्रों में फैलाने का सुझाव दिया गया है।
हिमालय भारतीय उपमहाद्वीप की जलवायु और करोड़ों लोगों को जीवनदायिनी जल संसाधन प्रदान करता है। हिमालय को ‘‘एशिया का जल स्तंभ’’ कहा जाता है। यह भारत की जलवायु और पर्यावरण को प्रभावित करने वाली सबसे महत्वपूर्ण भौगोलिक विशेषताओं में से एक है। उत्तरी भारत और पड़ोसी देशों में फैली यह विशाल पर्वत श्रृंखला मौसम के पैटर्न को नियंत्रित करने, नदी प्रणालियों को बनाए रखने, कृषि को सहारा देने और जैव विविधता को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। हिमालय का महत्व केवल इसके मनमोहक दृश्यों तक ही सीमित नहीं है। यह क्षेत्र मीठे पानी की आपूर्ति, पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने और कृषि उत्पादकता को बढ़ावा देकर लाखों लोगों के जीवन को प्रभावित करता है। यह क्षेत्र जैविक और आनुवंशिक विविधता का समृद्ध भंडार भी है, जो इसे वैज्ञानिक अनुसंधान और जैव प्रौद्योगिकी के लिए अत्यंत मूल्यवान बनाता है। यद्यपि जलवायु परिवर्तन और मानवीय गतिविधियों के कारण हिमालय लगातार पर्यावरणीय दबावों का सामना कर रहा है। बढ़ते तापमान, ग्लेशियरों का पिघलना, पर्यावासों का क्षरण और चरम मौसम की घटनाएं इस नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र को बदल रही हैं। भारत में पर्यावरणीय स्थिरता और जलवायु परिवर्तन से निपटने की क्षमता सुनिश्चित करने के लिए हिमालय की भूमिका और उसके सामने आने वाली चुनौतियों को इस बार हिमालय दिवस पर समझना अत्यंत आवश्यक है।
एवरेस्ट विजेता सर एडमंड हिलेरी ने कहा था-‘‘हिमालय मैंने जैसे तुम्हें देखा है, तुम सदा वैसे ही रहना।’’        
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(दैनिक, सागर दिनकर में 09.09.2026 को प्रकाशित) 
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Tuesday, September 8, 2026

पुस्तक समीक्षा | ‘नीरद’ की ग़ज़लों के सरोकार का विस्तार है मन से जन तक - समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

पुस्तक समीक्षा 
‘नीरद’ की ग़ज़लों के सरोकार का विस्तार है मन से जन तक 
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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ग़ज़ल संग्रह - सांझ के घुंधलके
कवि       - अशोक कुमार ‘नीरद’
प्रकाशक  - न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, सी-515, बुद्ध नगर, इंद्रपुरी, नई दिल्ली-110012
मूल्य       - 299/- 
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हिंदी साहित्य की काव्य विधा में समकालीन हिंदी ग़ज़ल ने अपना विशेष स्थान बना लिया है। अनेक वर्षों की लंबी यात्रा करने के उपरांत हिंदी ग़ज़ल के कर्म में नित नए नाम जुड़ते गए हैं। जिनमें से कुछ समर्पित ग़ज़लकारो का नाम वरिष्ठता क्रम में लिया जाता है तो कुछ का कनिष्ठ के रूप में। किंतु इन सभी का योगदान हिंदी ग़ज़ल को समृद्ध करने में रहा है। वरिष्ठ ग़ज़लकारों में एक नाम अशोक कुमार नीरद का भी है। इन्होंने सन 1968 से ही ग़ज़लों से अपना नाता जोड़ लिया था। ग़ज़ल में सब समय प्रयोग धर्मिता को अपनाते हुए अपनी ग़ज़ल की कहानी में इन्होंने निरंतर परिवर्तन लाया जिससे आज भी इनकी ग़ज़लें समसामयिक मूल्य तथा वर्तमान परिवेश में सटीक बैठती हैं। 
ग़ज़ल विधा के लिए समर्पित भाव से कार्यरत वरिष्ठ ग़ज़लकार हरेराम समीप जी अशोक कुमार नीरद के सृजन के संबंध में कहते हैं कि “अशोक कुमार ‘नीरद’ की ग़ज़लों से गुज़्रते हुए अनेक मर्मस्पर्शी अशआर मिलते हैं, तब लगता है जैसे उन्होंने शेर-दर-शेर अपना दिल उतार कर रख दिया है। उनकी ग़ज़लों में अनुभूतियों की अनेक परतें मिलती हैं। उनकी ग़ज़लों में जीवन के सभी पक्ष मौजूद हैं। कुछ भी नहीं छूटा है। चाहे वे सामाजिक और राजनीतिक विसंगतियाँ हों, असुरक्षा और आतंक का अँधेरा हो, या प्रेम और प्रतिरोध का उजास। चाहे टूटते रिश्ते, अकेलापन या भूख, गरीबी, शोषण, उत्पीड़न या कमरतोड़ महँगाई। इतना ही नहीं, आज के समाज में व्याप्त उपभोक्तावाद पर भी नीरद की कलम ने अनूठे अशआर ईजाद किए हैं। नीरद की ग़ज़लें वास्तव में आम आदमी की ग़ज़लें हैं। नीरद अपनी ग़ज़लों में उस बेजुबान तक पहुँचना चाहते हैं जो अपना दुःख और परेशानी किसी से नहीं कह पा रहा है। इस तरह वे दुखी जन के अधिवक्ता की तरह वंचित के आत्मसंघर्ष में उसके साथ खड़े रहना चाहते हैं।”
    समकालीन हिंदी ग़ज़लों को लेकर अशोक कुमार नीरद का दृष्टिकोण स्पष्ट है। वे हिंदी ग़ज़ल को आमजन की अभिव्यक्ति के रूप में एक सशक्त विद्या मानते हैं। उनके अद्यतन गजल संग्रह सांझ के धुंधलके के आरंभिक पृष्ठों में  मुंबई के साहित्यकार अनिल गौड़ द्वारा उनसे लिया गया साक्षात्कार है जिसमें हिंदी ग़ज़ल पर विस्तृत चर्चा की गई है। इस साक्षात्कार के बानगी के तौर पर कुछ प्रश्नोत्तर देखें जिनमें उन्होंने हिंदी ग़ज़ल सार्वभौमिक कैसे बन सकती है इसकी चर्चा की है - 
अनिल गौड़- आप हिंदी ग़ज़ल किसे मानते हैं?
नीरद - ग़ज़ल एक फॉर्मेट है और विधा भी। ग़ज़ल उर्दू से ही हिन्दी में आयी है। जाहिर है उसका कलेवर और पिंगल तो वही रहेगा जो उर्दू में है। उर्दू के पिंगल का अनुपालन करते हुए हिन्दी की कहन, प्रकृति, शिल्प, सौष्ठव और मुहावरेबंदी करके कही गयी हिन्दी संस्कारों से संपृक्त ग़ज़ल को ही हिन्दी ग़ज़ल कहेंगे।
अनिल गौड़ - हिंदी ग़ज़ल को अपनी पहचान विकसित करने के लिए क्या करना चाहिए? विषय, भाषा, कथन शैली में नवीनता कैसे आ सकती है?
नीरद -हिन्दी ग़ज़ल की सार्वभौमिक पहचान तब ही बनेंगी जब वो अपने प्रांजल और परिष्कृत रूप में पाठकध्श्रोता के सामने आए और पढ़ते-सुनते ही हृदय में उतर कर विभोर कर सके। इसके लिए जो ग़ज़लें कही जा रही हैं उनपर खुले मन से विमर्ष होना चाहिए ताकि ग़ज़लकारों को ये समझ आ सके कि वो कहाँ खड़े हैं। निरंतर चर्चा-परिचर्चा का परिणाम निश्चित रूप से सकारात्मक होगा। रहा भाषा का प्रश्न तो भाषा ऐसी सहज, सरल होनी चाहिए जो जनसामान्य बोलता समझता है यानि हिन्दी ग़ज़ल की भाषा का जनतांत्रिक होना ही ग़ज़ल के उत्कर्ष, नयेपन ओर प्रसार का निश्चित रूप से कारक होगा। रही विषय और कथन-शैली की बात तो यह ग़ज़लकार की रुचि और सामथ्र्य पर, उसके अध्ययन, मनन, चिंतन और दृष्टिकोण पर आधारित है।
‘‘सांझ के घुंधलके’’ ग़ज़ल संग्रह में 101 गजलें हैं। सभी ग़ज़लें गहरी कहन रखती हैं। वस्तुतः ‘नीरद’ के अनुभव का दायरा विस्तृत है और संवेदनाओं से सरोकार अनंत, इसीलिए उनकी ग़ज़लें मन से जन तक विस्तार पाती हैं। उनकी ग़ज़लों की भाषा आम बोलचाल की भाषा है इसलिए इनकी संप्रेषणीयता स्पष्ट है। इस संबंध में इसी संग्रह में ‘‘साँझ के धुँधलके - भारतीय समाज के अंतर्विरोधों का मुखर प्रतीक’’ शीर्षक से दिल्ली के साहित्यकार वीरेन्द्र कुमार शेखर ने ‘नीरद’ की ग़ज़लों बुनावट और भाषा पर कुछ इस प्रकार टिप्पणी की है- ‘‘नीरद की भाषा में न तो कोई बनावटीपन है, न कोई बौद्धिक दुरूहता। वे सीधे, स्पष्ट और सशक्त शब्दों में लिखते हैं-क्योंकि वे मानते हैं कि कविता को यदि आत्मा से निकलना है, तो उसे कृत्रिम लहजे की ज़रूरत नहीं। इसी कारण से उनकी रचनाएँ दुरूहता से नहीं, बल्कि सरस बौद्धिकता और भावबोध से भरपूर हैं। वे कठिन बातों को सहज ढंग से कह पाने की विलक्षण क्षमता रखते हैं- जो किसी भी श्रेष्ठ साहित्यिक प्रतिभा की निशानी होती है।’’
यही भाषाई खूबी हिन्दी ग़ज़ल को समसामयिक बनाती है। संग्रह की पहली ग़ज़ल में ग़ज़लकार ‘नीरद’ उस सांझ के धुंधलके की बात करते हैं जिसमें सूरज भी विवश दिखाई देता है। शेर देखिए-
साँझ  के  धुँधलके ही  दीखते  क्षितिज  पर हैं 
जिनको कहते सूरज हम किस क़दर वो कातर हैं
क्यों  रहस्य  से  आखि़र  आवरण नहीं उठता 
क्यों  नहीं  सवालों  का  पार  पाते  उत्तर हैं

‘नीरद’ पारस्परिक संबंधों में घुलती जा रही स्वार्थपरता पर भी उंगली रखते हैं। यह स्वार्थ ही तो है जिसमें हर व्यक्ति दूसरे से आगे निकल जाने की होड़ में है, चाहे वह घनिष्ठ मित्र ही क्यों न हो। इसी होड़ के चलते मित्रघात भी आम बात हो चती है।
बिजुरिया नीड़ पर मेरे गिराई है 
मुहिम यह दोस्तों ने ही चलाई है
जहां अपने बिरानेपन को जीते हों 
वो  रिश्ते  भूलने  में ही भलाई है

अशोक कुमार ‘नीरद’ ने अपनी ग़ज़लों में यथोचित मुहावरों का भी प्रयोग किया है। यह प्रयोग कथ्य को और अधिक सहज और कटाक्ष पूर्ण बना देता है। आज जीवन में आए दिन ऐसे मामले उत्पन्न हो जाते हैं जिन्हें देख कर, सुन कर या उनसे गुज़र का हमारे हाथों के तोते उड़ जाते हैं, यानी हम ठगे से रह जाते हैं। हाथों से तोते उड़ने के मुहावरे का यह उम्दा प्रयोग देखिए-
हमारे हाथों के उड़ते ही रोज़ तोते हैं 
किसी भी हाल में लेकिन कभी न रोते हैं
जिसे थे लोग दिया करते बद्दुआ हरदम 
मुराद पाने अब उसके मुरीद होते हैं
कि जिनको भोग नई पौध तृप्ति पाएगी 
फलों के ऐसे ही हम बीज आज बोते हैं
लेखन का दीर्घकालीन अनुभव भी सृजन में सटीकता ला देता है। 21 नवंबर 1945 को मध्यप्रदेश के ऐतिहासिक नगर बुरहानपुर में जन्मे अशोक कुमार ‘नीरद’ ने सन 1968 में सागर विश्वविद्यालय से विज्ञान में स्नातक उपाधि प्राप्त की। जीवन के उतार-चढ़ावों से गुज़रते हुए 2012 में मुंबई पहुंचे और तब से अँधेरी (पूर्व), मुंबई में ही निवासरत हैं। ‘नीरद’ ने बारह वर्ष की उम्र से लेखन प्रांरभ, प्रायः गीत, गजल, मुक्तक, दोहा, छंद, आदि सभी विधाओं में, सन् 1968 से हिन्दी-ग़ज़लें कहना आरंभ कर दिया था। उनके छह ग़ज़ल संग्रह हैं- जुगनू को सूरज का भ्रम है (सन् 2008), ग़ज़ल के स्वर (सन् 2012), दीवारों के जाल (सन् 2022), अंकुर बोलते हैं (सन् 2024), पैमाने नये आये (सन् 2025) एवं साँझ के धुँधलके (सन् 2026) में। पहला गीत संग्रह ‘‘विश्वास का सवेरा’’ 2012 में तथा दूसरा गीत संग्रह ‘‘आशा के अक्षत’’ सन् 2025 में प्रकाशित हुआ। उनकी ग़ज़लों की स्वीकार्यता पाठ्यक्रमों में भी देखी जा सकती है। मुंबई विश्वविद्यालय के बी ए के पाठ्यक्रम में कुछ बर्षों से कुछ ग़ज़लें सम्मिलित। कवयित्री बहिणाबाई चैधरी उत्तर महाराष्ट्र विश्वविद्यालय, जलगाँव के बी ए के पाठ्यक्रम में भी कुछ ग़ज़लों का समावेश किया गया है।
अनिल गौड़ को साक्षात्कार देते हुए हिंदी ग़ज़ल के भविष्य के प्रति आश्वस्ति प्रकट करते हुए ‘नीरद’ कहते हैं कि ‘‘आज का युग अति व्यस्तता का युग है। साहित्य के प्रति लोगों का रुझान कम होता जा रहा है। ग़ज़ल का सबसे धनात्मक पहलू यह है कि शेर के दो मिसरे वो बात कह जाते है जो दो पेज की कविता नहीं कह पाती। निस्संदेह हिन्दी ग़ज़ल का भविष्य उज्जवल है। आनेवाले समय में हिन्दी- ग़ज़ल हिन्दी की प्रमुख विधा के आसन पर विराजेगी।’’
यद्यपि उस प्रकार के सृजन के प्रति उनके मन में खिन्नता भी जागती है जो सतही तौर पर किया जाता है। जिस प्रकार वे साहित्य के नाम पर परोसी जा रही विकृति की भत्र्सना करते हैं ठीक उसी प्रकार हिंसा को वीरता का नाम दिए जाने को भी वे धिक्कारते हैं-
देखकर नूतन सृजन को सर बहुत चकरा रहा है 
नाम पर साहित्य के क्या-क्या परोसा जा रहा है
क्रूर हिंसा लग रही है वीरता अब आदमी को 
बुजदिली पर अपनी सीना तान कर इठला रहा है

फिर भी वे आशावादी हैं और उस पक्ष को रेखांकित करते हैं जो अभी हारा नहीं है तथा सतत संघर्षरत है। 
हो भले ही त्रस्त, बेचारा नहीं है 
हारकर भी आदमी हारा नहीं है
टस से मस होना नहीं सीखा है 
इसने ये मेरा ईमान है, पारा नहीं है
इस प्रकार देखा जाए तो ग़ज़ल संग्रह ‘‘सांझ के धुंधलके’’ की सभी ग़ज़लें सशक्त है तथा विचारों को उद्वेलित करने में सक्षम हैं। इस प्रकार की गहन विश्लेष्णात्मक कलेवर की ग़ज़लें ग़ज़ल विधा के भविष्य के प्रति भी आश्वस्त करती हैं।  
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Sunday, September 6, 2026

बतकाव बिन्ना की | हमने कभऊं सोची ने हती जो देखबे को मिलो | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की
हमने कभऊं सोची ने हती जो देखबे को मिलो
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

    ईके पैले गांव देहात खों ले के हमाए बिचार कछू और हते। हमने पन्ना जिला के छोटे से छोटे गांव देखे। दमोए के मुतके गांव देखे। छतरपुर जिला के मुतके तो नोंई पर कछू गांव जरूर देखे। टीकमगढ़ के गांवन से सोई गुजरे। सागर जिला के गांवन में तो जब चाए तब घुमक्कड़ी के लाने निकरबो होई जात आए। अबे लौं मोए जेई लगत रओ के गांव देहात में सुबिदाओं की कमी आए। उते चाए दबाई के लाने होए, चाए सुद्ध पानी के लाने, भौत तकलीफ उठाने परत आए। औ बेरोजगारी सो ऐसी के उते से गरीब-गुरबा खों पेट भरे के लाने सहर में जा के मजूरी करने परत आए। उतईं जो किसान आएं उने जी-तोड़ मेनत करने परत आए। सो मोए हमेसई गांव के लाने दया माया रई। मनो पिछली शनिच्चर खों हमें बा देखने को मिलो जा के बारे में हमने कभऊं सोची ने हती।
का भओ के हमें जाने रओ सीताराम रसोई नांव की संस्था। काए से के उते गरीब-गुरबा बुजुरगन खों मुफत में भरपेट खाना खवाओ जात आए। हम सोई उते भोजन कराबे के लाने जात रैत आएं। ई दार बी गए। उते अपने सगे हातन से भोजन परोसो। उते की खाना पकाने वारी बाइयों खों धुतिया भेंट करी। काए से हमें बे भौतई अच्छी लगत आएं, बिलकुल अपनी बैन घांई। औ उनकी मेनत औ ब्यौहार भौतई अच्छो रैत आए। फेर हम ओरन ने सोची के ऊंसई घरे लौटबे से अच्छो आए के तनक चक्कर काट के, एकाद गंाव देहात से घूमत चलें। अच्छो लगहे। सो सीताराम रसोई से निकर के पैले बालाजी मंदिर में शनि भगवान के दर्शन करे। बा मंदिर सोई ऊंची पहरिया पे बनो आए, सो उते जा के भौतई अच्छो लगत आए। सो, उते बालाजी हनुमान भगवान औ शनिदेव के दरसन करे हमने। फेर हम ओरन ने रस्ता पकरी मंदिर के नैचे से पांछू वारी। हम ओरन खों पतो ने हतो के हम ओरें कोन तरफी जा रए? मनो जा तो पता रई के अपने जिला से बायरे नईं जा रए। कछू दूर तो साजी रस्ता रई, फेर मनों रोड को नक्सा बदल गओ। साजी सी रोड पे गड्ढा मिलन लगे। दचका खात भए कछू दूर औ चले तो रोड कनारे ‘‘प्रधानमंत्री सड़क योजना के अंतर्गत’’ लिखों भओ बोर्ड दिखानों। हमने प्रधानमंत्री योजना वारी मुतकी रोडें देखी आएं मनो ऐसी गड्ढा वारी रोड पैली दार देखी। रस्ता में एक बड़ो स्कूल औ एक फैक्टरी दिखानी। मनो रोड की दसा से उनको कोनऊं मेल ने हतो।
चलो कछू नईं, गांव आए। ऊ रोड पे भैंसन ने चल-चल के गड्ढा बना दओ हुइए। जा सोस के हमने खुद खों तसल्ली दई। इत्ते में एक फेमस गांव को बोर्ड दिखानों। कछू नईं। गांव के बायरे से निकरी रोड पे बी कऊं-कऊं गिलावो सो मचो हतो। बा बी कछू नईं। काए से के अब बरसात के दिनां में गिलावो ने हुइए तो का धूरा उड़हे? बा गांव बड़ो हतो। गांव के बायरे के हिस्सा में एक तरफी नोने-नोने खेत हते। तो दूसरी तरफी जंगल विभाग वारों के सगोना के जंगल हते। बा सब देख के भौतई अच्छो लग रओ तो। ऊ सीनरी देखत समै रोड के दचका लौं बिसर गए। तनक देर बाद लगो के अब कोनऊं से पूछ लेव चाइए के हम ओरें कोन तरफी जा रए? लग तो रई हती के जोन तरफी बढ़ रए बा रोड चक्कर काट के राजघाट बंधान लौं जात हुइए। फेर बी कोनऊं से पूछ लेबो सई लगो। हमने संग वारे भैयाजी जू से कई के कोऊ दाऊ दिखाएं सो उनसे पूछ लइयो। मनो भैया जू खों दाऊ से पैले तीन मोड़ा दिखा गए। 12 ने तो 14 बरस के रए हुइएं। तीनों में से एक सायकिल लए हतो। मनो तीनोंई गुटखा खा रए हते। भैया जू ने उनईं तीनों से पूछ लई के जा रोड कोन गांव खों जा रई? जा सुन के एक मोड़ा ने अपने कुकुरमुत्ता घांई बालन पे हात फेरत भओ बड़े स्टाईल से पूछो आप ओरन खों कां जाने? भैया जू बोले के हमें राजघाट जाने। जा सुन के बा मोड़ा बोलो के फेर तो तुम ओरें आगे ई रोड पे चलके दाएं मुड़ जइयो। तब लौं दूसरो मोड़ा गुटखा अपने मों में डार के खींसा निपोरत भओ बोलो के दाएं नईं बाएं मुड़ियो। इत्ते में तीसरो मोड़ा बोलो इते कां चले आए, पांछे लौट जाओ। भैया जू ठैरे बुंदेलखंड के बायरे के सो बे उन ओरन की कई उत्ती समझ ने पाए। मनो मोए समझ में आ गई के जे मोड़ा गांव के भले आएं मनों ठैरे चंटा-पंटा। पूरे आवारा टट्टू। सो हमने भैया जू से कई के इन ओरन खों पतो नइयां, आप तो आगूं चलो, रोड कऊं तो पौंचाहे। 
हम ओरन की गाड़ी बढ़ी औ पांछू से उन तीनों की हंसबे की आवाज सुना परी। हमाओ जी तो ऐसो करो के गाड़ी रुकवाएं औ उतर के उन ओरन खों दो-दो थपाड़ा लगाएं। जरा-जरा से लरका औ गुटखा खा-खा के गर्रा रए। मनो हमने अपनों गुस्सा पे काबू करो औ बढ़ लए।
कछू दूर पे एक दूसरो गांव आ गओ। उते जो दिखानों, बा हम देखतई रै गए। उते एक दलान में छै-सात लुगवा बैठे पत्ता खेल रए हते। मनो सई कएं तो उते जुआ चल रओ हतो। चलो कछू नईं, गांव ठैरो। टेम पास। मनो गांव वारन को इत्ती फुरसत कां से मिल गई? ऊपरे से जां हम ओरन की गाड़ी उते से निकरी तो बे सब हम ओरन खों देखन लगे। जे ई कोई बीस कदम बाद एक घर के बायरे पट्टा घांईं बनो चबूतरा पे छै-सात लोग औ दिखाने। बे सोई फुरसत से बैठे गपिया रए हते। उतई एक टपरा हतो। चाय को। ऊमें चार जने बैठे हते। बे ओरें मोबाईल पे कछू देखने में मगन हते। बाकी हम ओरन की गाड़ी उते से कढ़ी तो सब के सब हम ओरन की तरफी घूरन लगे। भैया जू ने हमसे पूछी के इन ओरन से रस्ता पूछी जाए? हमने कई के नईं, जे ठलुआ हरें को जाने का बताएं। इते तो गाड़ी बी ने रोको, बढ़त चलो। मनो उन ओरन खो देख के हमें लगो के इन ओरन खों कछू काम-धंदा नइयां का? इने तो फुरसत के मारे टेम नइयां। औ ईसे बुरई बात जे के इते की लुगाइन खों जो ऊ तरफी से निकरने परत हुइए तो कित्तो बुरौ लगत हुइए? कुल मिला के बा सो अच्छो माहौल ने दिखानों। 
हम सोसन लगे के कछू गांव खों ई गुटखा औ मोबाईल ने का कर डारो। मेनत करबे वारे की जांगा इने ठलुआ बना डारो। ऐसई बुरए माहौल में मोड़ियां औ लुगाइयां खतरा में पर जात आएं। जा सोस के हमाओ मन दुखी होन लगो। इत्ते में कोनऊं हम ओरन की गाड़ी के पांछू से हार्न बजात सुनाई परो। पीछे देखत के शीश में देखो तो मोटरसायकिल वारो दिखानों। ऊके हार्न से भैया जू को दिमाग गरम हो गओ। उन्ने साईड में गाड़ी रोकी औ ऊंसे बोले के तुमें जल्दी आए सो तुमई पैले कढ़ जाओ। हमने देखी के ऊके मोटरसायकिल पे ऊके पांछू लुगाई औ बच्चा सोई बैठे हते। हम भैया जू खों कछू समझा पाउते के इत्ते में बा मोटर सायकिल वारे ने पूछी के आप ओरन खों राजघाट जाने? भैया जू बोले हऔ। सो बा बोलो के तो फेर हमाए पांछू-पांछू आ जाओ, हम सोई ऊ तरफी जा रए। ऊकी जा बात सुन के भैया जू को गुस्सा ठंडो पर गओ। औ हम समझ गए के जा मोटर सायकिल वारो ऊ गुटखा छाप लरकों के इते से हमाई बात सुन के पछांरें आ रओ हुइए। औ हमें रस्ता बताबे के लाने हार्न बजा रओ हतो। 
सो हम ओरन ने ऊपे भरोसा करो औ अपनी गाड़ी ऊकी मोटरसायकिल के पांछू लगा दई। गांव से निकरतई सांत अच्छी रोड मिलन लगी औ हम ओरें ऊके पांछू-पांछू चल परे। सातेक किलोमीटर चलबे के बाद बड़ी रोड दिखानीं। बा मोटरसायकिल वारो रुको औ बोलो के अब आप ओरें बायीं तरफी मुड़ जाओ औ जेई बड़ी रोड पे चल हो तो दसेक किलोमीटर पे राजघाट दिखान लगहे। ऊको दूसरी तरफी जाने रओ सो बा दूसरी तरफी मुड़ गओ। भैया जू ने ऊको धन्यबाद करो। जोन रोड पे हम ओरन खों ऊने पौंचाओ रओ बा सागर से जैसीनगर वारी रोड हती। ऊपे पौंच के हम ओरन खों रस्ता याद आ गओ। काए से के ऊ रोड पे चल के हम ओरें पैले एक बेर सिलवानी गांव लौं गए रए। सो, फेर तो साजी रोड पे गाड़ी दौरा दई। रस्ता में एक मंदिर पे रामधुन सोई सुनाई परी। फेर राजघाट दिखान लगो। सो ऐसी रई ऊ दिनां की सैर।
मनों एक बात हमें पता परी के सबरे गंाव एक सी दसा के नईयां। कऊं-कऊं गुटखा औ मोबाईल की हवा कछू ज्यादाई लग गई आए। ऐसे गांवन में मुतके ठलुआ बी आएं जोन ताश पत्ती खेलत बैठे रैत आएं। उते रोड पे चलत लुगाइयां कमई दिखानीं। औ जो ऐसे ठलुआ रोड के लिंगे बैठे होंए तो लुगाइयां निकरें बी तो कैसे? सो हमें गांव को जा दूसरो चेहरा देखबे को मौका सोई मिल गओ। मनो ऐसो माहौल होन नईं चाइए। बाकी हम नईं चात के कछू जने के मारे पूरो गांव को नांव धरो जाए सो हमने गांव को नांव नईं लिखो। बाकी जोन उते के रैबे वारे आएं औ ने तों उते से कढ़े हुइएं सो बे समझ जैहें। बाकी बा मोटर सायकिल वारे घांईं अच्छे लोग अबे बी उते रैत आएं। जोन से गांव की इज्जत बनी रैत आए। जे नोनी बात आए।            
रई बतकाव की तो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लौं जुगाली करो जेई की। मनो सोचियो जरूर ई बारे में के गांवन पे सई से ध्यान देबे की जरूरत आए के नईं? औ कछू नईं तो उते गुटखा औ दारू पे लगाम लगाओ चाइए। संगे ठलुआ हरों से कछू काम लओ जाओ चाइए। कओ, सई कई के नईं?  
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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