Wednesday, September 9, 2026

चर्चा प्लस | ‘‘हिमालय है तो हम हैं’’- यही तो थीम है हिमालय दिवस की | डॉ सुश्री शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस 
9 सितंबर हिमालय दिवस पर विशेष:
‘‘हिमालय है तो हम हैं’’- यही तो थीम है हिमालय दिवस की
  - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह 
                                                                               कहा जाता है कि धरती पर एक पत्ता भी हिलता है तो नक्षत्रों तक उसका प्रभाव होता है, फिर हिमालय तो इसी पृथ्वी पर है और संकटों से घिरता जा रहा है। हिमालय पर गहराने वाले संकट हमारे अस्तित्व के लिए स्पष्ट चेतावनी हैं। हाल ही में नेपाल में आई बाढ़ इसका ताज़ा उदाहरण है। कभी भूस्खलन तो कभी ग्लेशियर्स के पिघलने से आने वाली बाढ़ हमें निरंतर चेतावनी दे रही है। हिमालय के संरक्षण के प्रति जागरूकता लाने के लिए ही मनाया जाता है ‘‘हिमालय दिवस’’। इसकी इस बार की थीम है-‘‘हिमालय है तो हम हैं’’। इस थीम की गहराई में उतरना जरूरी है।   

युग-युग से है अपने पथ पर,

देखो कैसा खड़ा हिमालय
डिगता कभी न अपने प्रण से
रहता प्रण पर अड़ा हिमालय
जो-जो भी बाधाएं आएं,
उन सबसे ही लड़े हिमालय
इसलिए तो दुनिया भर में,
हुआ सभी से बड़ा हिमालय

- कवि सोहनलाल द्विवेदी की ‘‘हिमालय’’ शीर्षक कविता की ये पंक्तियां हिमालय पर्वत की विशालता, अडिगता एवं उपादेयता का सम्मानजनक वर्णन करती है। मात्र काव्यात्मक नहीं बल्कि भौगोलिक रूप से हिमालय हमारे देश के लिए गहन पर्यावरणीय महत्व रखता है। हम भारतवासियों को ही नहीं अपितु समूची दुनिया को इसकी उच्चता और विशालता पर गर्व रहा है। हिमालय की उच्चतम चोटी तक पहुंचने की चुनौती ने हमेशा पर्वतारोहियों को आकर्षित किया है। आज हमारा यही हिमालय जलवायु परिर्वतन के संकट से जूझ रहा है। पृथ्वी के बढ़ते हुए तापमान ने जिस प्रकार दुनिया के सभी तत्वों को प्रभावित करना शुरू कर दिया है, उसी प्रकार हिमालय के ग्लेशियर्स भी उस तापमान के कारण अपनी स्थिरता को अपेक्षाकृत तेजी से खो रहे हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार अभी हाल ही में नेपाल में आई भूस्खलन वाली बाढ़ का मूल कारण ग्लेशियर्स का तेजी से पिघलना ही था। हिमालय पर जमी बर्फ हवाओं के मापमान को नियंत्रित कर के ऋतुओं में परिवर्तन लाती है। इस बर्फ का असमय पिघलने लगना ऋतुओं के पैटर्न को भी प्रभावित करने लगा है।
हिमालय दिवस प्रतिवर्ष 9 सितंबर को मनाया जाता है। इस दिवस की पहली बार आधिकारिक घोषणा उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत द्वारा सन 2014 में की गई थी। यह दिवस घोषित करने का उद्देश्य था हिमालय के पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण के बारे में जागरूकता बढ़ाना। इसके पीछे कारण था सन 2010 की अचानक आई बाढ़ और 2013 की केदारनाथ त्रासदी जैसी भीषण प्राकृतिक आपदा। इनके बाद पहाड़ों की बढ़ती पारिस्थितिक संकट के प्रति सभी का ध्यान आकर्षित करने तथा जागरूकता लाने के लिए ‘‘हिमालय दिवस’’ घोषित किया गया।

हिमलय प्राचीनतम भू-संरचनाओं में से एक है। इस विशाल पर्वत श्रृंखला का निर्माण लगभग 40 से 50 मिलियन वर्ष पहले शुरू हुआ था, जब टेक्टानिक प्लेटों की गति के कारण दो बड़े भू-भाग, भारतीय भूभाग और यूरेशिया, आपस में टकरा गए थे और हिमालय का उदय हुआ था। प्राचीन भारतीय ग्रंथों में हिमालय का उल्लेख मिलता है। शिवपुराण में हिमालय को जहां शिवस्थली कहा गया है वहीं उसे देवी पार्वती के के पिता के रूप में भी वर्णित किया गया है। भारतीय संस्कृति में हिमालय सदा ही पूज्य रहा है। किन्तु मानवीय लालच एवं लापरवाहियों के कारण हिमालय संकट के कगार पर आ पहुंचा है। इसीलिए इस वर्ष के लिए थीम रखी गई है-‘‘हिमालय है तो हम हैं’’। यह थीम संकट की गंभीरता को दर्शाती है।

हिमालय उपमहाद्वीप के लिए एक प्राकृतिक जलवायु अवरोधक के रूप में कार्य करता है और मौसम के पैटर्न को नियंत्रित करता है। इन पहाड़ों में अद्वितीय वनस्पतियां, जीव-जंतु और प्रमुख नदी प्रणालियां मौजूद हैं जो लाखों लोगों की आजीविका का सहारा हैं। इन सभी पर संकट का अर्थ है हिमालय पर संकट। इसीलिए हिमालय दिवस पर आयोजित होने वाले कार्यक्रम हिमालय के पर्वतीय क्षेत्रों में खराब शहरी नियोजन, वनों की कटाई, प्लास्टिक प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ते भूस्खलन जैसी समस्याओं से निपटने पर केंद्रित रहते हैं।
हिमलय पर गहराते जलवायु संकट से निपटने के लिए ठोस योजनाएं बनाई गई हैं जिनका सही क्रियान्वयन हिमालय के अस्तित्व को बचाए रख सकता है। दशकों से भारतीय हिमालयी क्षेत्र में विकास ने पहाड़ों को बाधाओं के रूप में या मानकीकृत किए जाने वाले भूदृश्यों के रूप में माना है। लेकिन हिमालय न तो एकसमान है और न ही सुगम है। इसकी भौगोलिक विविधता एवं महत्ता को ध्यान में रखते हुए ‘‘विश्व पृथ्वी दिवस 2026’’ को एक श्वेत पत्र जारी किया गया था जिसमें कहा गया था कि हिमालय में संकट केवल पर्यावरणीय ही नहीं बल्कि व्यवस्थागत भी है। जलवायु परिवर्तन के पैटर्न में बदलाव, जल प्रणालियों की अनिश्चितता और शासन व्यवस्था के खंडित रहने के कारण यह क्षेत्र एक नाजुक मोड़ पर खड़ा है। रिपोर्ट में अधिक डेटा या तीव्र विस्तार की मांग नहीं की गई है, बल्कि पहाड़ों के साथ हमारे सोचने, योजना बनाने और निर्माण करने के तरीके में मौलिक बदलाव की बात कही गई। ‘‘हिमालय का भविष्य: विकास और लचीलेपन पर पुनर्विचार’’ शीर्षक वाली यह रिपोर्ट, सीपी कुकरेजा फाउंडेशन फॉर डिजाइन एक्सीलेंस द्वारा भारतीय हिमालयी क्षेत्र में व्याप्त व्यवस्थागत संकटों के समाधान हेतु प्रस्तुत की गई थी। इंजीनियरिंग, पारिस्थितिकी, शासन और सामाजिक विज्ञान के विशेषज्ञों की भागीदारी वाली हिमालयी गोलमेज सम्मेलन से प्राप्त अंतर्दृष्टियों पर आधारित इस रिपोर्ट में यह स्पष्ट शब्दों में कहा गया था कि हिमालय क्षेत्र एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है जहां पारंपरिक विकास मॉडल अब व्यवहारिक नहीं रह गए हैं।
इस श्वेत पत्र में हिमालयी क्षेत्र के महत्व पर बल दिया गया। इस ओर भी ध्यान दिलाया गया कि हिमालय वैश्विक आबादी के लगभग एक चैथाई हिस्से, यानी लगभग दो अरब लोगों को सीधे तौर पर प्रभावित करता है, जो जल, खाद्य सुरक्षा और पारिस्थितिक संतुलन के लिए इस क्षेत्र पर निर्भर हैं। इसमें क्षेत्र में विकास और लचीलेपन के पुनर्मूल्यांकन की तत्काल आवश्यकता पर प्रकाश डाला गया है। विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ तर्क देते हैं कि वर्तमान अवसंरचना और शहरी विकास अक्सर पारिस्थितिक सीमाओं और भूवैज्ञानिक अस्थिरता की अनदेखी की गई है। इस रिपोर्ट में जलवायु परिवर्तन, बदलते जलवैज्ञानिक पैटर्न और खंडित शासन व्यवस्था के कारण उत्पन्न व्यवस्थागत विफलताओं और बढ़ते आपदा जोखिमों पर विस्तार से प्रकाश डाला गया। एक सतत भविष्य सुनिश्चित करने के लिए, इसमें एकीकृत, डेटा-आधारित नियोजन की ओर संक्रमण का प्रस्ताव रखा गया, जो जलक्षेत्र की सीमाओं का सम्मान करता है और स्थानीय सांस्कृतिक ज्ञान को समाहित करता है। यह मानकीकृत इंजीनियरिंग से हटकर संदर्भ-विशिष्ट डिज़ाइन की ओर बढ़ने का आह्वान करता है जिसमें दीर्घकालिक पर्यावरणीय स्थिरता को प्राथमिकता दी गई है।
रिपोर्ट का मूल सिद्धांत यह है कि हिमालय को अलग-थलग पारिस्थितिक या इंजीनियरिंग समस्याओं के समूह के बजाय एक परस्पर जुड़ी प्रणाली के रूप में समझा जाना चाहिए। वैज्ञानिकों ने इस ओर ध्यान दिलाया कि यद्यपि क्षेत्र के भूविज्ञान और जलविज्ञान के ज्ञान में विस्तार हुआ है, फिर भी जमीनी स्तर पर परिणाम असंगत और अक्सर विनाशकारी हुए हैं। 2013 और 2023 के बीच हुई गंभीर घटनाओं, जैसे कि केदारनाथ बाढ़, चमोली आपदा और जोशीमठ का धंसना, को असामान्य ही घटना नहीं, बल्कि मानवीय हस्तक्षेप और भू-दृश्य की अंतर्निहित संवेदनशीलता के बीच संरचनात्मक असंतुलन के अनुमानित परिणामों के रूप में देखा गया है। जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा और बाढ़ के पूर्व पैटर्न अब भविष्य की स्थितियों का पूर्वानुमान नहीं लगा सकते। 1950 के दशक से वर्षा की तीव्रता में लगभग 15 से 20 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, और कम समय में भारी वर्षा होना अब आम बात हो गई है।
हिमालय की भौगोलिक संरचना में परिवर्तन उसके साथ की जा रही छेड़छाड़ है। हिमालय में 70 प्रतिशत से अधिक सड़कें पहाडियों को काटकर बनाई जाती हैं, जिनमें ढलान को स्थिर करने के लिए उचित उपाय नहीं किए जाते। ढलान गिरने की कई घटनाएं पानी के कारण होती हैं। जब निर्माण कार्य प्राकृतिक जल निकासी को अवरुद्ध कर देता है, तो पानी जमा हो जाता है, मिट्टी में दबाव बढ़ जाता है और भूस्खलन हो जाता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि पर्वतीय क्षेत्रों में, जल प्रवाह का प्रबंधन संरचना से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।

पर्वतीय क्षेत्र में वन एक आवश्यक प्राकृतिक संरचना के रूप में कार्य करते हैं और भूस्खलन के खतरे को 30 से 40 प्रतिशत तक कम कर सकते हैं। यद्यपि जनसंख्या के बदलते पैटर्न इन भू-भागों पर असमान दबाव डाल रहे हैं। लोग उच्च ऊंचाई वाले क्षेत्रों से दूर जा रहे हैं, जबकि निचले इलाकों में स्थित शहर अधिक भीड़-भाड़ वाले होते जा रहे हैं।

पर्यटन को भी हिमालय के पर्यावरण को क्षति पहुंचाने वाला कारण माना गया है। शिमला और मनाली जैसे स्थानों में मौसमी जनसंख्या वृद्धि वहां की स्थायी जनसंख्या से पांच से दस गुना अधिक होती है। इससे अपशिष्ट उत्पादन स्थानीय प्रणालियों की क्षमता से दो से तीन गुना अधिक हो जाता है। रिपोर्ट में दबाव कम करने और अधिक संतुलित आर्थिक अवसर पैदा करने के लिए पर्यटन को विभिन्न क्षेत्रों में फैलाने का सुझाव दिया गया है।
हिमालय भारतीय उपमहाद्वीप की जलवायु और करोड़ों लोगों को जीवनदायिनी जल संसाधन प्रदान करता है। हिमालय को ‘‘एशिया का जल स्तंभ’’ कहा जाता है। यह भारत की जलवायु और पर्यावरण को प्रभावित करने वाली सबसे महत्वपूर्ण भौगोलिक विशेषताओं में से एक है। उत्तरी भारत और पड़ोसी देशों में फैली यह विशाल पर्वत श्रृंखला मौसम के पैटर्न को नियंत्रित करने, नदी प्रणालियों को बनाए रखने, कृषि को सहारा देने और जैव विविधता को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। हिमालय का महत्व केवल इसके मनमोहक दृश्यों तक ही सीमित नहीं है। यह क्षेत्र मीठे पानी की आपूर्ति, पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने और कृषि उत्पादकता को बढ़ावा देकर लाखों लोगों के जीवन को प्रभावित करता है। यह क्षेत्र जैविक और आनुवंशिक विविधता का समृद्ध भंडार भी है, जो इसे वैज्ञानिक अनुसंधान और जैव प्रौद्योगिकी के लिए अत्यंत मूल्यवान बनाता है। यद्यपि जलवायु परिवर्तन और मानवीय गतिविधियों के कारण हिमालय लगातार पर्यावरणीय दबावों का सामना कर रहा है। बढ़ते तापमान, ग्लेशियरों का पिघलना, पर्यावासों का क्षरण और चरम मौसम की घटनाएं इस नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र को बदल रही हैं। भारत में पर्यावरणीय स्थिरता और जलवायु परिवर्तन से निपटने की क्षमता सुनिश्चित करने के लिए हिमालय की भूमिका और उसके सामने आने वाली चुनौतियों को इस बार हिमालय दिवस पर समझना अत्यंत आवश्यक है।
एवरेस्ट विजेता सर एडमंड हिलेरी ने कहा था-‘‘हिमालय मैंने जैसे तुम्हें देखा है, तुम सदा वैसे ही रहना।’’        
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(दैनिक, सागर दिनकर में 09.09.2026 को प्रकाशित) 
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