Friday, June 15, 2018

‘नई दुनिया’ (In All Editions) के ‘अधबीच’ कॉलम में

‘नई दुनिया’ (In All Editions) के ‘अधबीच’ कॉलम में आज (15.06.2018) मेरा यह लेख प्रकाशित हुआ है...आप भी पढ़िए ! इस लिंक पर भी आप इसे पढ़ सकते हैं- https://naiduniaepaper.jagran.com/Article_detail.aspx… 
हार्दिक धन्यवाद एवं आभार ‘नई दुनिया’




चर्चा प्लस : बारिश में भीगता अनाज और खून के आंसू - डॉ. शरद सिंह ‘दबंग मीडिया’ में

मुझे प्रसन्नता है कि ‘दबंग मीडिया’ ने मेरे लेख को प्रमुखता से प्रकाशित किया है।
आभारी हूं 'दबंग मीडिया' की और भाई हेमेन्द्र सिंह चंदेल बगौता की जिन्होंने मेरे इस समसामयिक लेख को और अधिक पाठकों तक पहुंचाया है.... 
चर्चा प्लस : बारिश में भीगता अनाज और खून के आंसू - डॉ. शरद सिंह  In Daban Media

चर्चा प्लस : बारिश में भीगता अनाज और खून के आंसू - डॉ. शरद सिंह

चर्चा प्लस :
बारिश में भीगता अनाज और खून के आंसू
- डॉ. शरद सिंह
खून-पसीना एक कर के जिस अनाज को किसान उगाता है वह अगर उसकी आंखों के सामने बारिश में भीग कर खराब हो जाए तो इससे बढ़ कर दुर्भाग्य उसके लिए और कुछ नहीं हो सकता है। शासन हर कदम पर किसानों की मदद करना चाहती है वहीं प्रशासनिक लापरवाही और कमियां न केवल योजनाओं को अपितु किसानों की मेहनत को भी हर साल बड़े पैमाने पर पानी में सड़ा देती है। कि
सान तो खून के आंसू रोता ही है, साथ में आम जनता भी विवश हो जाती है मंहगा अनाज खरीदने को। सवाल यह है कि चूक एक बार हो तो वह चूक कही जा सकती है लेकिन प्रति वर्ष वही विडम्बना दोहराई जाए तो उसे अपराध नही ंतो और क्या कहेंगे? इस अव्यवस्था के चलते देश में हर साल लगभग 2.10 करोड़ टन गेहूं बर्बाद होता है।
चर्चा प्लस : बारिश में भीगता अनाज और खून के आंसू - डॉ. शरद सिंह .. Article for Column - Charcha Plus by Dr Sharad Singh in Sagar Dinkar Dainik
 देश में गेहूं बर्बाद होने से कई सवाल राज्यों से लेकर केन्द्र की सरकारों पर हमेशा से खड़े होते रहे हैं। इस विषय में सुप्रीम कोर्ट ने भी केंद्र से कहा था कि देश के गोदामों में गेहूं सड़ा देने से अच्छा है उसे उसे गरीबों में बांट दिया जाए। गेहूं की बर्बादी को लेकर सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी कई मायनों में बहुत महत्वपूर्ण थी। एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में भुखमरी का सामना करने वाले सबसे ज्यादा प्रभावित लोग हैं। देश में करीब 19 करोड़ लोगों को उनकी आवश्यकता के अनुसार भोजन नहीं मिल पा रहा है। वहीं देश में हर साल 2.10 करोड़ टन गेहूं बर्बाद होता है। इस बर्बादी को लेकर न तो भारतीय खाद्य निगम गंभीर है और न ही गेहूं खरीदने वाली राज्य की एजेंसियां।
अनाज की सुरक्षा और भंडारण के दौरान हुए नुकसान के कुछ ताज़ा उदाहरण देखें कि 08 जून 2018, मध्य प्रदेश के दमोह और हटा में अधिकारियों की लापरवाही से लाखों रुपये के चने बारिश में भीग गए। कृषिमंडी में चने की ये बोरियां खुले में रखी गई थीं। चने को बारिश से बचाने के लिए अधिकारियों ने कोई उचित व्यवस्था नहीं की थी। न तो बोरियों को शेल्टर में रखवाईं गईं और न ही चने को बचाने के लिए कोई इंतजाम किया। मंडी के जिम्मेदार अधिकारियों की लापरवाही के चलते किसानों के लाखों रुपये के काबुली चने पानी में बह गए। कृषि उपज मंडी में काबुली चने की ये बोरियां खुले में रखी थीं। इसके पूर्व 15 मई 2018 को सुसनेर में भी इसी तरह लापरवाही के चलते 5 हजार क्विंटल अनाज बारिश की भेंट चढ़ गया था।
मध्यप्रदेश के सतना जिले में 82 जगहों पर सरकार ने समर्थन मूल्य पर गेहूं खरीद केन्द्र खोले। अब तक आईं तेज तूफानी हवाओं और बारिश ने इन केन्द्रों में करोड़ों का नुकसान कर दिया। उचित व्यवस्था न होने की वजह से बड़ी मात्रा में गेहूं गीला हो गया। मई माह तक जिले में 1,00,469 मीट्रिक टन गेहूं की खरीदी हो चुकी थी। मगर खरीद केन्द्रों से सिर्फ परिवहन और भंडारण 83,323 टन ही हुआ था। शेष का 20,746 मीट्रिक टन गेंहू बारिश से भीग गया। अनाज साथ ही हरपालपुर रेलवे स्टेशन पर खुले मे 3270 टन यूरिया टीकमगढ़ और छतरपुर मे विपणन संघ के माध्यम से किसानों को बांटा जाना था लेकिन अधिकारियों की लापरवाही से 500 टन यूरिया गीला हो गया।
मध्यप्रदेश ही नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश में भी भंडारण को ले कर बड़ी गड़बड़ियां सामने आती रही है। इस वर्ष को ही लें तो उत्तर प्रदेश के गेहूं का भंडारण के बारे में समाचार ऐजेंसियों ने विगत चार मई को ही आगाह करा दिया था कि करोड़ों रुपये का गेहूं क्रय केंद्रों पर खुले में पड़ा है। बारिश होने के साथ ही यह गेहूं भीग जाएगा। मई माह तक 35069.25 मीट्रिंक टन गेहूं की खरीद हो चुकी थी। लेकिन भंडारण के लिए र्प्याप्त स्थान नहीं होने से संकट के बादल मंडराने लगे। बदायूं के उझानी में 4500 एमटी भंडारण किया गया। इसके बाद वहां से भी भंडारण के लिए इंकार कर दिया गया। एटा में भी अब तक 17000 एमटी से अधिक का गेहूं भंडारित हो चुका तो एटा ने भी भंडारण करने से हाथ खड़े कर लिए। इससे क्रय केंद्रों पर खुले में रखे 4479.55 एमटी गेहूं के भंडारण की समस्या हो गई। गेहूं की खरीद 30 जून तक होनी है। जिससे क्रय केंद्रों पर और भी गेहूं आएगा। जबकि अभी भी लगभग करीब 8 करोड़ रुपये का गेहूं क्रय केंद्रों पर खुले में पड़ा है। कन्नौज में अब तक सैंकड़ों बोरी गेहूं पानी में भीगकर पहले ही खराब हो चुका है।
उल्लेखनीय है कि विकासशील देशों के ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत की रैंकिंग 97वें स्थान पर थी, लेकिन एक साल में यह तीन पायदान और गिर कर 100 वें स्थान पर पहुंच गई। भारत जैसे देश में जहां रोजाना लगभग 5013 बच्चे कुपोषण और भुखमरी का शिकार हो जाते हैं, वहां अनाज की इस तरह बर्बादी किया जाना अत्यंत दुर्भाग्य की बात है।
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(दैनिक सागर दिनकर, 13.06.2018 )
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Friday, June 8, 2018

चर्चा प्लस : अनदेखा किया तो देर हो जाएगी .. डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस : अनदेखा किया तो देर हो जाएगी
- डॉ. शरद सिंह
मौसम की अपनी विशेषता होती है, लेकिन अब इसका ढंग बदल रहा है। गर्मियां लंबी होती जा रही हैं, और सर्दियां छोटी। पूरी दुनिया में ऐसा हो रहा है। यही है जलवायु परिवर्तन जिसके प्रभाव इन रूपों में दिखने लगे हैं - पीने के पानी की कमी, खाद्यान्न उत्पादन में कमी, बाढ़, तूफ़ान, सूखा और गर्म हवाओं में वृद्धि। हम हरे-भरे जंगल को काट कर क्रांक्रीट के जंगल खड़े करते जा रहे हैं। ग्लोबल वार्मिंग यानी पृथ्वी के तापमान में वृद्धि और इसके कारण मौसम में होने वाले परिवर्तन के कारण पृथ्वी पर विगत 100 सालों के औसत तापमान पर 10 फारेनहाईट आंका गया है और जिसके के परिणामस्वरूप बारिश के तरीकों में बदलाव, हिमखण्डों और ग्लेशियरों के पिघलने, समुद्र के जलस्तर में वृद्धि और वनस्पति तथा जन्तु जगत पर प्रभावों के रूप के सामने आ रहे हैं। इनके परिणामों के प्रति समय रहते हमें सचेत होना होगा।

चर्चा प्लस : अनदेखा किया तो देर हो जाएगी ..  डॉ. शरद सिंह .. Article for Column - Charcha Plus by Dr Sharad Singh in Sagar Dinkar Dainik
पर्यावरणीय खतरों से भारत अछूता नहीं है। हिमालय के ग्लेशियर पिघलने से खतरा बढ़ता जा रहा है। कुल 155 वर्ग किलोमीटर पर फैला ये ग्लेशियर पिछले पचास साल में करीब पंद्रह फीसदी सिकुड़ चुका है। कश्मीर में ग्लेशियरों से ढंकी जमीन में 21 प्रतिशत की कमी आई है। हिमालय के ग्लेशियर के पिघलने से भारत में आ सकती है बाढ़। हिमालय के ग्लेशियर के पिघलने से समंदर का बढ़ रहा है जल स्तर. हिमालय के ग्लेशियर के पिघलने का एक बड़ा खतरा खेती पर भी पड़ेगा। ग्लेशियर के कम होने से उत्पन्न चटियल जमीन सूरज की 80 फीसदी रोशनी को सोख लेती है जिससे तापमान बढ़ता है जबकि ग्लेशियर 80 फीसदी रोशनी को वापस परावर्तित कर देता है। परिणामतः पर्वतीय क्षेत्रों में बर्फबारी भी कम हो रही है जिससे वहां फसल चक्र बर्बाद होने का खतरा मंडरा रहा है। स्पष्ट है कि खतरा सिर्फ भारत को ही नहीं है बल्कि आसपास के दूसरे देशों को भी है। हिमालय के ग्लेशियर के पिघलने का एक बड़ा खतरा बाढ़ का भी है। ग्लेशियर से पिघला हुआ पानी एक जगह किसी झील में लगातार जमा हो सकता है जो किसी भी वक्त टूटकर अपने राह में पड़ने वाली हर चीज को तबाह कर सकता है। दुनिया का सबसे बड़ा डेल्टा सुंदरबन का अस्तित्व भी खतरे में है क्योंकि हिमालय और दुनियाभर के ग्लेशियर पिघलने की वजह से समंदर का जलस्तर भी अब बढ़ने लगा है। इसका असर सुंदरबन पर दिखने भी लगा है। हर साल 1 मिलीमीटर से लेकर 2 मिलीमीटर तक समंदर का जलस्तर बढ़ता जा रहा है। ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से खासकर जम्मू कश्मीर का औसत तापमान लगातार बढ़ता ही जा रहा है। इंडियन स्पेस रिसर्च आर्गेनाइजेशन के स्पेस एप्लीकेशन सेंटर अहमदाबाद के सर्वे में से चौंकाने वाले तथ्य सामने आए कि कश्मीर में ग्लेशियरों से ढंकी जमीन में 21 प्रतिशत की कमी आई है। कभी अकेले जनस्कार में पांच सौ ग्लेशियर हुआ करते थे और पिछले पचास सालों में 200 ग्लेशियर खत्म हो चुके हैं। कारगिल और लद्दाख के करीब तीन सौ ग्लेशियर सोलह फीसदी पिघल चुके हैं। इससे तापमान बढ़ रहा है। पैदावार पर असर पड़ रहा है और कार्बन डाईऑक्साइड की मात्रा बढ़ रही है।
सबसे ज्यादा चिंता उत्तराखंड के ग्लेशियर्स का पिघलना है। 120 सालों में पिंडरी ग्लेशियर 2840 मीटर तक घट चुका है। यानी सालाना 23.5 मीटर के दर से ये ग्लेशियर पिघल रहा है। गंगोत्री ग्लेशिय़र जो देश की सबसे बड़ी नदी गंगा का जलस्रोत है, डेढ़ सौ सालों में 1147 मीटर नीचे आ चुका है। सन् 1971 से 2005 के बीच गंगोत्री क्षेत्र का ग्लेशियर 565 मीटर तक पिघल चुका है, यानी हर साल गंगोत्री में 15 मीटर तक की कमी आ रही है। ठीक ऐसे ही मिलाम ग्लेशियर 85 सालों में 990 मीटर पिघल चुका है। 50 सालों में पोंटिंग ग्लेशियर 262 मीटर नीचे आ चुका है। हिमाचल के त्रिलोकनाथ ग्लेशियर में सिर्फ 25 सालों में 400 मीटर की कमी आई है जबकि बड़ा सिंगरी ग्लेशियर सिर्फ 17 सालों में 650 मीटर तक पिघल चुका है। कुछ वर्ष पहले तक कई वैज्ञानिक जलवायु परिवर्तन को ग्लेशियर्स के पिघलने की वजह मानने से इंकार करते रहे हैं लेकिन हाल के सालों में वैज्ञानिकों के बीच ये आम राय बन चुकी है कि पिघलते ग्लेशियर्श बढ़ते तापमान का ही असर है और जल्द से जल्द इसे रोकना हम सब के लिए बेहद जरूरी है।
जो पर्यावरण हमें जीवन देता है हम उसी को तेजी के साथ नष्ट करते जा रहे हैं। ग्लोबल वार्मिंग, ग्लेशियर्स मेल्टिंग और वेदर चेंजिंग - ये तीनों हमारी खुद की पैदा की गई मुसीबतें हैं जो समूची दुनिया को भयावह परिणाम की ओर ले जा रही है। यदि हम अब भी नहीं चेते तो हमारे जीवन की डाल कट जाएगी और नीचे गिरने पर हमें धरती का टुकड़ा भी नहीं मिलेगा। दरअसल, हमें अपने रहन-सहन के ढंग को अधिक से अधिक ‘इको फ्रेंडली’ बनाना होगा तभी हम अपनी भावी पीढ़ी को विरासत में यह पृथ्वी दे सकेंगे।
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( दैनिक सागर दिनकर, 06.06.2018 )
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Sunday, June 3, 2018

चर्चा प्लस ... युवाशक्ति शतरंज का मोहरा नहीं ... डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस
युवाशक्ति शतरंज का मोहरा नहीं
- डॉ. शरद सिंह

कभी व्यापम घोटाला तो कभी शिक्षा जगत के एक्सपेरीमेंट्स, कभी माता-पिता की उच्चाकांक्षाओं का दबाव, कभी योग्यता और भविष्य से खिलवाड़, कभी बेरोजगारी की चक्की के पाटों में पिसना तो कभी सोशल मीडिया का संजाल और इन सबके साथ राजनीति का निशाना बनना, कभी-कभी ठीक वैसा ही प्रतीत होता है जैसे युवा किसी शतरंज की बिसात के मोहरे हों, जिन्हें चाहे तिरछी चाल चलाएं या ढाई घर कुदाएं। क्या सचमुच युवा शतरंज के मोहरे हैं? या फिर यह एक दुःस्वप्न है।
चर्चा प्लस ... युवाशक्ति शतरंज का मोहरा नहीं ... डॉ. शरद सिंह .. Article for Column - Charcha Plus by Dr Sharad Singh in Sagar Dinkar Dainik
 सभी जानते हैं कि युवा शक्ति वह धारा है जो जिधर भी मुड़ जाए, उधर का दृश्य बदल देती है। यदि निर्माणात्मक क्षेत्र में युवाओं का उपयोग किया जाए तो वह देश के विकास में चार चांद लगा सकती है, दुनिया से अपना लोहा मनवा सकती है लेकिन यदि उसे विध्वंस के कार्यों में लगा दिया जाए तो एक शांत प्रदर्शन पल भर में हिंसक बलवे में बदल सकता है। अपार शक्ति के यही युवा जब धन लोलुप भ्रष्टाचारियों के हाथों छले जाते हैं तो उनका समूचा भविष्य अंधकार की गर्त्त में समा जाता है। व्यापम घोटाला इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है।
व्यावसायिक परीक्षा मण्डल पर विभिन्न व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के लिए और सरकारी नौकरियों में भर्ती के लिए प्रवेश के लिए बड़े पैमाने पर प्रतियोगी परीक्षाओं के संचालन की जिम्मेदारी थी। व्यापम घोटाले में सरकारी अधिकारियों, नेताओं और बिचौलियों के बीच मिलीभगत से अयोग्य उम्मीदवारों को रिश्वत के बदले परीक्षा में उच्च अंक दिला कर उन्हें उत्तीर्ण कराया गया। अयोग्य परीक्षार्थियों के स्थान पर मोटी रकम के बदले अन्य योग्य छात्रों को जिनमें पूर्व चयनित मैरिट उम्मीदवारों से परीक्षा में उम्मीदवार के तौर पर परीक्षाएं दिलाई गईं। जिस के लिए परीक्षा प्रवेश कार्ड पर असली परीक्षार्थी की तस्वीर नकली परीक्षार्थी की तस्वीर से बदल दी गयी तथा परीक्षा के बाद जिसे पुनः मूल रूप में में ले आया गया। यह कारनामा व्यापम के भ्रष्ट अधिकारियों के साथ मिलीभगत में किया गया। इसके साथ ही अयोग्य उम्मीदवारों को नकली परीक्षार्थियों के साथ पूर्व निर्धारित स्थान पर इस तरह बैठाया जाता था कि नक़ल और आंसर शीट्स की अदलाबदली आसानी से की जा सके। इस के लिए बिचौलियों के माध्यम से व्यापम के भ्रष्ट अधिकारियों को मोटी रकमों का भुगतान किया जाता। इतना ही नहीं बल्कि अयोग्य उम्मीदवारों से उत्तर पुस्तिका ख़ाली छुड़वा दी जाती और परीक्षा के बाद इन उत्तर पुस्तिकाओं में उत्तर चिन्हित कर दिए जाते। कुछ मामलों में व्यापम के भ्रष्ट अधिकारियों और बिचौलियों की मिलीभगत से अयोग्य उम्मीदवारों को परीक्षा से पहले ही उत्तर कुंजी उपलब्ध कराई गई।
व्यापम घोटाले में पहली एफआईआर छतरपुर जिले में सन् 2000 में दर्ज़ की गयी थी। सन् 2004 में खंडवा जिले में सात और मामले दर्ज किए गए। इसके बाद इंदौर के सामाजिक कार्यकर्ता आनंद राय ने घोटाले में जांच का अनुरोध करते हुए एक जनहित याचिका दायर की। सन् 2009 में, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आरोपों की जांच के लिए मेडिकल शिक्षा के संयुक्त निदेशक की अध्यक्षता में एक जांच समिति का गठन किया। सन् 2014 की 15 जून को एसटीएफ ने निविदा शिक्षकों की भर्ती घोटाले में कथित संलिप्तता के चलते राज्य के पूर्व तकनीकी शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा को गिरफ्तार किया। तदोपरांत, 18 और 19 जून 2014 को पुलिस ने पीएमटी घोटाले में भागीदारी के आरोप में राज्य के विभिन्न स्थानों से 100 से अधिक मेडिकल छात्रों को गिरफ्तार किया। सितम्बर 2014 में एसटीएफ ने ख़ुलासा किया कि जगदीश सागर का रैकेट भारतीय स्टेट बैंक में भर्ती और अन्य राष्ट्रीयकृत बैंकों के लिए प्रवेश परीक्षा की धांधली में भी शामिल है तथा इन प्रवेश परीक्षाओं में बैंकिंग कार्मिक चयन संस्थान परीक्षा और भारतीय स्टेट बैंक प्रोबेशनरी ऑफिसर परीक्षा में भी गड़बड़ी के तथ्य सामने आए। जांच के दौरान व्यापम से जुड़े कई लोगों की संदेहास्पद मुत्यु हुई। फिर भी इस मामले में यदि किसी का सबसे अधिक नुकसान हुआ तो वह युवाओं का। बेरोजगारी से त्रस्त युवा को यदि उसकी योग्यता से बढ़ कर रोजगार का सुनहरा सपना दिखा कर भ्रमित कर दिया जाए तो उसे जाल में फंसते देर नहीं लगेगी। यही हुआ व्यापम के अंतर्गत। भ्रष्टाचारियों ने युवाओं को अपना आसान शिकार बनाया और उन्हें ठगते चले गए।
युवा वर्ग जो अपनी शिक्षण आयु से गुजर रहा होता है उसे एक विश्वसनीय शिक्षा प्रणाली प्रदान करने के बजाए अकसर नए-नए प्रयोगों में झोंक दिया जाता है। सन् 2017 में सीबीएसई ने 2009 से चले आ रहे संबंद्ध स्कूलों की छठी से नौवीं कक्षाओं के लिए निरंतर और व्यापक मूल्यांकन (सीसीई) प्रणाली को अमान्य कर दिया था क्योंकि बोर्ड को छठी से नौवीं कक्षा के लिए यूनिफॉर्म असेसमेंट स्कीम लागू करना था। इससे एक जैसा एग्जामिनेशन सिस्टम व रिपोर्ट कार्ड होने के बाद माइग्रेशन पर दूसरे राज्य में जाने वाले स्टूडेंट्स का दाखिला आसान हो जाएगा। इरादे नेक थे लेकिन मार्च 2018 में सीबीएसई पेपर लीक ने देश के लाखों बच्चों की प्रतिभा के साथ खिलवाड़ किया। इस संबंध में कपिल सिब्बल ने टिप्पणी की कि ‘‘परीक्षा प्रणाली में बदलाव करने का सरकार का फ़ैसला उलटा पड़ गया है। पहले प्रश्नपत्रों के अलग-अलग सेट होते थे, इस बार एक ही सेट पूरे देश में चलाया गया।’’
मार्च, 2018 में ही मध्यप्रदेश की राज्यपाल आनंदी बेन पटेल ने कहा कि मप्र के विश्वविद्यालयों की परीक्षाएं सीसीटीवी कैमरों की निगरानी में हों। आनंदी बेन राज्यपाल होने के नाते प्रदेश सरकार के सभी विश्वविद्यालयों की कुलाधिपति भी हैं। परीक्षा प्रणाली को पारदर्शी बनाने पर जोर देते हुए मध्यप्रदेश की राज्यपाल आनंदी बेन पटेल ने कहा कि राज्य सरकार के विश्वविद्यालयों की आगामी परीक्षाएं सीसीटीवी कैमरों की निगरानी में आयोजित करायी जाएं। यानी शिक्षा जगत जिसे मंदिर के समान पवित्र और निष्कलंक माना जाता रहा, वह आज किसी ख्ुली जेल में बदलता जा रहा है जिसमें गोया हर विद्यार्थी अपराधी हो और उसे सीसीटीवी के निगरानी में रहना जरूरी हो। यदि आज एक गर्वनर परिक्षार्थियों के लिए सीसीटीवी की निगरानी की इच्छा प्रकट कर रही हैं तो इसका मतलब यह नहीं है कि आज ही सारी गड़बड़ी हुई हो। यह तो वर्षों से चली आ रही शैक्षिक दुरावस्था का कुपरिणाम है आज विद्यार्थियों को शिक्षण व्यवस्था पर भरोसा नहीं रहा और शिक्षण व्यवस्था का विद्यार्थियों पर से भरोसा उठ गया है। दरअसल शिक्षण व्यवस्था की बिसात पर विद्यार्थी वे युवा हैं जो अपने माता-पिता की उच्चाकांक्षाओं को पूरा करने की दौड़ में 500 में 500 लाने की होड़ में अपनी स्वाभाविकता गवां रहे हैं और समय से पहले कठिन जिम्मेदारियों के पाले में खड़े किए जा रहे हैं।
युवाशक्ति के राजनीतिक से संबंध कोई नए नहीं हैं। छात्रसंघों को राजनीतिक जीवन की प्राथमिक पाठशाला कहा गया है। पहले डॉ. राम मनोहर लोहिया के आंदोलन और बाद में जेपी आंदोलन ने युवाओं पर बहुत व्यापक प्रभाव डाला था। लोहिया की सामाजिक-राजनीतिक सक्रियता ने जहां युवाओं को राजनीति से जोड़कर सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों पर जागरूक किया तो जेपी ने व्यवस्था की चूलें हिला दी थीं। इन्हीं आंदोलनों की प्रेरणा थी कि भारतीय राजनीति में लालू यादव, नीतीश कुमार, शरद यादव, मुलायम सिंह, सुशील मोदी जैसे समाजवादी नेताओं की एक पूरी पीढ़ी तैयार हुई। भाजपा के रविशंकर प्रसाद, अरुण जेटली, सुषमा स्वराज और विजय गोयल छात्रसंघ से आए हुए नेता हैं। कांग्रेस के सीपी जोशी, अजय माकन, भाकपा के डी. राजा, सीताराम येचुरी, तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी भी छात्रसंघ की उपज हैं। अकेले इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ से शंकरदलाय शर्मा, मदनलाल खुराना, विजय बहुगुणा, जनेश्वर मिश्र, चंद्रशेखर, वीपी सिंह, अर्जुन सिंह जैसे नेता और सुभाष कश्यप जैसे प्रशासक और संविधानविद निकले। जेएनयू का छात्रसंघ इस मामले में सबसे ज्यादा सक्रिय है और लगातार जनहित के मुद्दे उठाता रहा है। किन्तु विश्वविद्यालयों में छात्रसंघ चुनाव कराए जाएं या नहीं, इसे लेकर यूपीए सरकार ने पूर्व चुनाव आयुक्त जेएम लिंगदोह की अध्यक्षता में कमेटी का गठन किया था। सन् 2006 में लिंगदोह कमेटी ने अपनी रिपोर्ट सौंपी जिसमें कई तरह के दिशा-निर्देश और सिफारिशें थीं। कमेटी ने छात्रसंघ उम्मीदवारों की आयु, क्लास में उपस्थिति, शैक्षणिक रिकॉर्ड औैर धनबल-बाहुबल के इस्तेमाल आदि की समीक्षा करते हुए कई सिफारिशें की थीं। इस कारण तमाम योग्य छात्र न सिर्फ छात्रसंघ चुनाव लड़ने से वंचित हो गए, बल्कि एक तरह से छात्रसंघों की नकेल विश्वविद्यालय प्रशासन के हाथों में दे दी गई। लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों का देश भर में विरोध हुआ, लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने छात्रसंघ चुनावों के लिए लिंगदोह की सिफारिशों को बाध्यकारी कर दिया। वहीं इसके उलट नए वोटर के रूप में युवाशक्ति को देखते हुए आज भी प्रत्येक दिग्गज नेता विद्यार्थियों को अपनी ओर करने का प्रयास करता है। उन्हें ये विद्यार्थी उन मोहरों के की भांति दिखाई देते हैं जो उन्हें सत्ता सुंदरी से मिलवा सकते हैं।
चाहे माता-पिता हों या राजनेता अथवा शिक्षाविद् - इन्हें युवाओं को उचित दिशानिर्देश देना चाहिए, सही रास्ता दिखाना चाहिए न कि अपनी उच्चाकांक्षाओं की शतरंज के मोहरे बना कर चलाना चाहिए। वहीं युवाओं को भी जो कि अपनी पिछली पीढ़ी के सुवाओं से कहीं अधिक समझदार और दुनियादार हैं, उन्हें भी भ्रष्टाचारियों के हाथों अपनी योग्यता का दोहन नहीं होने देना चाहिए। युवाओं को हर कदम पर यह साबित करना चाहिए कि वे योग्य हैं, संयमी हैं, शांत हैं लेकिन किसी भी शतरंज के मोहरे नहीं हैं।
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( दैनिक सागर दिनकर, 31.05.2018 )
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