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Tuesday, August 4, 2026

पुस्तक समीक्षा | पाठकों से गहन संवाद करती कहानियों का रोचक संग्रह | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा

पाठकों से गहन संवाद करती कहानियों का रोचक संग्रह 

समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

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कहानी संग्रह - पिछली घास

लेखिका      - दीपक शर्मा

प्रकाशक     - रश्मि प्रकाशन, महाराज पुरम, कृष्णा नगर, लखनऊ-226023 (उप्र)

मूल्य        - 200/-

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‘‘पिछली घास’’ लेखिका दीपक शर्मा की सोलह कहानियों का संग्रह है। हिन्दी कथाजगत में दीपक शर्मा एक जाना-पहचाना नाम है। 30 नवम्बर 1946 में अविभाजित भारत के लाहौर में जन्मीं दीपक भुल्लर जो विवाह के बाद दीपक शर्मा के नाम से चर्चित हुईं लखनऊ क्रिश्चियन कॉलेज के स्नातकोत्तर अंग्रेजी विभाग में लम्बे समय तक अध्यक्ष एवं रीडर के पद पर रहीं। अब तक उनके बीस से अधिक कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं।  दीपक शर्मा ने अपने कहानी लेखन की शुरुआत पंजाबी में की। सन् 1979 में इनकी पहली हिन्दी कहानी ‘‘कोलम्बस अलविदा’’ पत्रिका ‘‘धर्मयुग’’ में प्रकाशित हुई। इसके बाद दीपक शर्मा ने हिन्दी कहानी का जो दामन पकड़ा आज भी उसे मज़बूती से थामे रहीं।  

इस कहानी संग्रह में गगन गिल की संक्षिप्त तथा मधु बी. जोशी की विस्तृत भूमिका पढ़ने के बाद इसमें संग्रहीत कहानियों के प्रति जिज्ञासा का विस्फोट होना स्वाभाविक है। एक आतुरता जाग उठती है इन सोलह कहानियों की सोलह दुनियाओं से गुज़रने की। संग्रह में मौजूद सोलह कहानियों में पहली कहानी है-‘‘चमड़े का अहाता’’। यह एक मानवीय विमर्श की कहानी है। इसमें एक ऐसा अहाता है जो हमारे आस-पास उपस्थित है एक ‘अंडरवर्ल्ड’ की तरह। लेकिन यह किसी माफिया अंडरवर्ल्ड नहीं है बल्कि हमारे कथित सम्य समाज के राजमार्ग के ठीक बीचो-बीच बने सीवेज़ के मेनहोल के ठीक नीचे है। एक सुगबुगाती, बजबजाती हुई दुनिया। चमड़े के शोधन कार्य की दुर्गन्धयुक्त दुनिया। जहां जानवरों की खालें खरीदी जाती हैं और उन्हें ‘चमड़ा’ बना कर बेचा जाता है। इस दुनिया में चर्मशोधन से भी अधिक दुर्गन्ध उस अपराध की है जो कि घृणित सामाजिक अपराध है, कन्या-वध का। चर्मशोधन की रासायनिक द्रव से भरी टंकियां चमड़ा शोधने के चुनौती भरे काम की गवाही होने के साथ ही उस अपराध की भी गवाह हैं जो कभी नहीं होना चाहिए था। एक चुभता हुआ पारस्परिक संवाद ही इस अपराध को एक झटके में बेनक़ाब कर देता है -

‘‘मैं सब जानता हूं’’ भाई फिर हंसा, ‘‘मैं किसी से नहीं डरता। मैंने एक बाघिनी का दूध पिया है, किसी चमगीदड़ी का नहीं।’’

‘‘तुमने चमगीदड़ी किसे कहा?’’ सौतेली मां फिर भड़कीं।

‘‘चमगीदड़ी को चमगीदड़ी कहा है।’’ भाई ने सौतेली मां की दिशा में थूका,‘‘तुम्हारी एक नहीं दो बेटियां टंकी में फेंकी गईं, पर तुम्हारी रंगत एक बार नहीं बदली। मेरी बाघिनी मां ने जान दे दी, मगर जीते जी किसी को अपनी बेटी का गला घोंटने नहीं दिया।’’ 

दीपक शर्मा की कहानियों को पढ़ते समय हिन्दी कहानी के उस इतिहास पर भी संक्षिप्त दृष्टिपात कर लेना चाहिए जहां से हिन्दी कहानी ने नई कहानी का स्वरूप ग्रहण किया। वह नई कहानी विधा जिसकी छाप दीपक शर्मा की कहानियों में स्पष्ट दिखाई देती है। उन्नीसवीं शताब्दी के अंत और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ की कड़ी में हिन्दी भाषा के उन्नयन और गद्य-विधाओं के सूत्रपात ने जिस भाषाई जनतांत्रिक का निर्वाह करते हुए साहित्य रचना की नींव रखी, उसका स्वर आज की रचनाओं में भी सुनाई देता है। 

सन् 1954 के ‘कहानी विशेषांक’ ने नई कहानी की वैचारिक भूमि पहले ही स्थापित कर दी थी। अमरकांत की कहानी ‘डिप्टी कलक्टरी’ और कमलेश्वर की कहानी ‘राजा निरबंसिया’ लिखी जा चुकी थीं। इसी क्रम में मोहन राकेश का कहानी संग्रह ‘नए बादल’ सन् 1956 में आया। इसी दौर में निर्मल वर्मा की कहानी ‘परिंदे’ और भुवनेश्वर की कहानी ‘भेड़िये’ और उषा प्रियंवदा की कहानी ‘वापसी’ पर चर्चाएं शुरू हो चुकी थीं। इन्हीं कहानियों को नई कहानी की प्रारंभिक कहानियों में गिना जाता है। इनके अलावा ‘कहानी’ और ‘नई कहानियां’ पत्रिकाओं ने इस आंदोलन की अधिकारिक रूप से घोषित पत्रिका थी। 

नई कहानी के मूल बिन्दुओं को अपने अवचेतन में ग्रहण करते हुए दीपक शर्मा ने अपना कथा संसार रचा उसमें सच के उद्घाटन का तीव्र आग्रह दिखाई देता है। उदाहरण के लिए इसी संग्रह की दूसरी कहानी ‘‘प्रेत छाया’’ अतीत में सन् 1928 में ले जाती है जब देश में साईमन कमीशन का लागू किए जाने का जम कर विरोध हो रहा था। लोग खुली सड़कों पर भीड़ की शक़्ल में निकल कर अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर रहे थे। मगर भीड़ हमेशा अनेक चेहरे लिए होती है। ‘‘गो साईमन गो’’ की नारे लगाती भीड में एक लड़के ने अपनी जाई और बहन को खो दिया था। अब जब वह लड़का चेचक की बीमारी से ग्रस्त हो कर आईसोलेशन के दिन काट रहा होता है तो उसे महसूस होता है कि उसकी जाई उससे मिलने आई है, एक प्रेतछाया की भांति। अपनों को खोने की पीड़ा और एक उद्देश्यपूर्ण देशव्यापी विरोध के बीच की अंतर्कथा। यह कहानी अपने छोटे से आकार में बड़ी-सी कथा समेटे हुए है, गोया यह कहानी नहीं अपितु एक ‘मेमोरी चिप’ हो। 

संग्रह में एक कहानी है ‘‘मां का दमा’’। यह सूत और सूती कपड़ा डाई करने वाले कारखाने में काम करने वाली स्त्रियों में से एक मंा की कहानी है। अस्वस्थकर वातावरण में काम करती महिलाएं चौतरफा मुसीबतें झेलती हैं। बेटे की ओर से कही गई इस कहानी में बेटा बताता है कि उसकी मां को दमा हो गया था जिस पर उसके पिता मां को ‘‘घोंघी’’ कह कर पुकारते थे। मां की पीड़ा का अपमान करता सम्बोधन। जबकि इसमें भला मां का क्या दोष था? लड़के ने स्वयं अपनी आंखों से कारखाने की दशा देखी थी-‘‘मां के कारखाने में काम चालू है। गेट पर मां का पता पूछने पर मुझे बताया जाता है, वे दूसरे हॉल में मिलेंगी, जहां केवल स्त्रियां काम करती हैं। जिज्ञासावश मैं पहले हॉल में जा टपकता हूं। यह दो भागों में बंटा है। एक भाग में गट्ठों में कस कर लिपटाई गई ओटी हुई कपास मशीनों में चढ़ कर तेजी से सूत में बदल रही है, तो दूसरे भाग में बंधे सूत के गट्ठर करघों में सवार हो कर सूती कपड़ों का रूप धारण कर रहे हैं। यहां सभी कारीगर पुरुष हैं। ...दूसरे हॉल का दरवाज़ा पार करते ही क्लोरीन की तीखी बू मुझसे आन टकराती है। भाप की कई-कई ताप तरंगों के संग मेरी नाक और आंखें बहने लगती हैं। थोड़ा प्रकृतिस्थ हो कर देखता हूं, भाप एक चौकोर हौज से मेरी ओर लपक रही है। हौज में बल्लों के सहारे सूती कपड़े की अट्टियां नीचे भेजी जा रही हैं। हॉल में स्त्रियां ही स्त्रियां हैं। उन्हीं में से कुछ ने अपने चेहरों पर मास्क पहन रखे हैं, ऑपरेशन करते समय डॉक्टरों और नर्सों जैसे।’’

स्वास्थ्य के लिए ऐसे घातक वातावरण में काम करने वाली स्त्रियों की पीड़ा को उनके निकट जा कर महसूस करने के बाद लिखी गई कहानी स्त्रीविमर्श का एक अलग ककहरा रचती है। 

दीपक शर्मा की संवेदनशीलता अपनी हर कहानी की भांति इस कहानी में भी बखूबी उभर की सामने आई है। कहानी ‘‘बापवाली’’ स्त्री के प्रति होने वाले घरेलू अत्याचारों का लेखा-जोखा सामने रखती है तो कहानी ‘‘ऊंट की पीठ’’ दहेज-लोलुपता और इस कुप्रथा को सवीकार करने वाले एक आम से पिता की मन को आलोड़ित करने वाली कहानी है।

कहानी ‘‘पुरानी फांक’’ संबंधों के जटिल समीकरण की अनूठी कहानी है। इस कहानी का एक संवाद देखिए जो अपने-आप में बहुत कुछ उद्घाटित करने में सक्षम है-

‘‘तुम्हें अपने वर्तमान को अनुभवों से भर लेना चाहिए।‘‘ सुहास मेरी ओर देख कर मुस्कुराता है,‘‘चूंकि तुम्हारे पास नए अनुभवों की कमी है, इसलिए तुम आने वाले अनुभवों को मनगढ़ंतपूर्वक धरण करती हो या फिर बीत चुके अनुभवों का पुनर्धारण। तुम्हें केवल अपने वर्तमान को भरना चाहिए।’’

‘‘वर्तमान?’’ घबराकर मैं अपनी आंखें मंजू दीदी के चेहरे पर गड़ा लेती हूं। मेरा वर्तमान? खिड़की के उस तरफ का एक भीषण रणक्षेत्र? और इस तरफ एक तलाक़शुदा छब्बीस वर्षीय रईसज़ादे के साथ एक कच्चा रिश्ता? दोनों तरफ एक ठीठ अंधेरा।’’

लेखिका ने मानवीय संबंधों के ज्यामितीय समीकरणों को ‘‘माना कि’’ की कल्पना से परे हट कर यथार्थ के पैमाने से नापते हुए प्रस्तुत किया है। कहानी ‘‘पिछली घास’’ इसका एक बेहतरीन उदाहरण है। पांच संतानों वाला परिवार। जिसमें पिता की देहलोलुपता एक विध्वंस रचती है। पिता एक रिश्तेदार लड़की से बलात संबंध बनाता है जिसके परिणामस्वरूप छठीं संतान का जन्म होता है। उस लड़की और छठी संतान को पिता अपनी पत्नी और बेटी के रूप में अपना लेता है किन्तु बेटे के लिए यह सब सहज नहीं है। वह विद्रोही हो उठता है। पिता की धौंस से त्रस्त हो कर पिता को पुलिस की धमकी देता है, लिहाज़ा पिता अपनी वास्तविक पत्नी और पांचों बच्चों को छोड़ कर अपनी अवैध पत्नी और छठी संतान को ले कर फरार हो जाता है। इसके बाद वह परिवार संकटों के किस मुहाने पर जा खड़ा होता है और कैसे उनके सपनों की पर्तें उधड़ती चली जाती हैं, इसे कहानी को पढ़ कर ही अनुभव किया जा सकता है। 

संग्रह की कहानियों में लेखिका का एक काल्पनिक स्थान है-कस्बापुर। यह स्थान गांव है, कस्बा, है शहर है और यहां तक कि देश का प्रतिबिम्ब भी है। कस्बापुर एक ऐसा गह्वर है जिसमें समाज की सारी समस्याएं और विडम्बनाएं समाई हुई हैं। एक जाना-पहचाना संसार रचता है कस्बापुर, जो संग्रह की कई कहानियों में मौजूद है। दीपक शर्मा भाषाई मायाजाल नहीं रचती हैं, वे सरल, बोलचाल के शब्दों में अपनी कहानियां लिखती हैं। हिन्दी, उर्दू, अंग्रेजी, अवधी, पंजाबी के शब्द बिना किसी विशेष आग्रह के स्वाभाविक रूप से अपनी जगह लेते जाते हैं। यही उनकी कहानियों का भाषाई सौंदर्य है जो कहानियों को एक प्रवाह में पठनीय बना देता है। कुल मिला कर ‘‘पिछली घास’’ को एक मूल्यावत्तापूर्ण कहानी संग्रह कहा जा सकता है।            

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Tuesday, July 28, 2026

पुस्तक समीक्षा | बुंदेली की समृद्धि का परिचायक है समय के पन्नों में दबा ‘मंगा’ | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा 
बुंदेली की समृद्धि का परिचायक है समय के पन्नों में दबा ‘मंगा’
- समीक्षक डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
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खंडकाव्य    - मंगा (बुंदेली बोली का हास्य प्रधान प्रथम खण्ड काव्य)
लेखक      - श्री बाबू लाल खरे
प्रकाशक    - स्क्राईब पब्लिकेशन्स 303, कुबेर हाउस 162, कंचनबाग, इन्दौर (म.प्र.)
मूल्य       - 150/-
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बुंदेली में वर्षों से प्रचुर मात्रा में साहित्य लिखा जा रहा है विशेष रूप से पद्य साहित्य। किंतु बहुत सा साहित्य ऐसा रहा जो प्रकाश में नहीं आ सका। डॉ बहादुर सिंह परमार जैसे मनीषी जो बुंदेली संस्कृति और भाषा के उत्थान में निरंतर लगे हुए हैं, उन्होंने बहुत से ऐसी  पांडुलिपियां ढूंढ निकालीं जो अप्रकाशित अवस्था में साहित्यकारों के वंशजों के पास मौजूद थीं। उनके वंशज नहीं जानते थे कि उस कृति को किस तरह से प्रकाशित किया जाए अथवा कई वंशजों को इस बात की जानकारी नहीं थी कि वह साहित्य कितना महत्वपूर्ण है। इसी प्रकार बुंदेली में लिखी गई कई पुस्तक ऐसी हैं जो प्रकाशित तो हुई किंतु जिन पर पर्याप्त चर्चा होनी चाहिए थी अथवा वे पाठकों के हाथ में पहुंचनी चाहिए थी किंतु नहीं पहुंच सकीं। ऐसी ही एक पुस्तक की जानकारी मुझे पिछले दिनों प्राप्त हुई। अनायास शशी खरे जी जोकि रायपुर में निवासरत हैं और  स्वयं साहित्यकार हैं, उनसे मेरा संपर्क हुआ। चर्चा के दौरान उन्होंने मुझे बताया कि उनके पिताश्री ने बुंदेली में प्रथम हास्य खंडकाव्य लिखा था जो प्रकाशित भी हुआ। उसके कुछ अंश आकाशवाणी भोपाल से प्रसारित हुए। डॉ हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर के प्राध्यापक डॉ बलभद्र तिवारी ने अपने ग्रंथ में उसका उल्लेख भी किया। फिर भी यह खंडकाव्य उतना चर्चित नहीं हो सका कितना कि उसे होना चाहिए था। दुर्भाग्य से पुस्तक प्रकाशित होने से पूर्व उसके रचनाकार दिवंगत हो गए, किंतु सुधि परिजन ने उस खंड काव्य को सुरुचि पूर्वक प्रकाशित कराया। खंडकाव्य का नाम है “मंगा”। 
 इस खंडकाव्य की विशेष बात यह भी है कि इसमें सागर की बुंदेली बोली का प्रयोग हुआ है क्योंकि रचयिता डॉ खरे सागर जिले के निवासी थे। श्री बाबू लाल खरे का जन्म मध्यप्रदेश के सागर जिले की रहली तहसील में स्थित चरगुवां नामक एक छोटे से ग्राम में 11 नवम्बर 1917 को हुआ। पिता का नाम श्री भगवानदास तथा माता श्रीमती लक्ष्मीबाई था। धनाभाव तथा उस समय आसपास कोई उच्च शिक्षा की सुविधा वाले शिक्षालय के अभाव के कारण इन्हे ग्राम से दो मील दूर स्थित गौरझामर के मिडिल स्कूल में केवल सातवीं (हिन्दी) तक ही शिक्षा प्राप्त करने का सुयोग प्राप्त हो सका। शिक्षाकाल में ये प्रायमरी से लेकर अन्त तक अपनी कक्षा में सदा प्रथम स्थान और प्रथम श्रेणी प्राप्त करते रहे। सन् 1933 ई. में नार्मल स्कूल बिलासपुर की प्रवेश परीक्षा में सागर जिले से केवल दो छात्र चुने गए, जिनमें से एक बाबू लाल थे। प्रायमरी टीचर्स ट्रेनिंग परीक्षा में पूरे मध्यप्रदेश व बरार में प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान प्राप्त कर उन्होंने ‘‘स्पेन्स मैडल’’ प्राप्त किया। जून 1935 में थोड़े दिनों तक  मिडिल स्कूल तखतपूर (बिलासपुर) में, अगस्त 1936 से म्युनिसिपल प्राथमिक शाला देवालानाका सागर में और दिसम्बर 1936 में गवर्नमेन्ट केन्टोन्मेन्ट स्कूल नं. 1, सदर बाजार सागर में अध्यापक रहने के पश्चात् ये सन् 1948 में नार्मल स्कूल सागर के प्रेक्टिसिंग स्कूल में अधिपाठक के रूप में स्थानान्तरित हुए। सन् 1940 में पिता के स्वर्गवासी होने से एक बड़े परिवार के पालन और शिक्षण का भार इन पर आ जाने के कारण इन्हें अत्यधिक अर्थाभाव रूग्णता और चिन्ताओं से अत्यधिक कष्ट झेलना पड़े। तीन छोटे भाईयों और दो बहनों की शिक्षा तथा विवाह के उत्तरदायित्व से निवृत हो कर बाबू लाल खरे ने सन् 1949 से स्वध्यायी छात्र के रूप में विशारद तथा मैट्रिक परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। फलतः नार्मल स्कूल में अध्यापक के पद पर पदोन्नति मिली। इसके पश्चात् उन्होंने साहित्य रत्न तथा सागर विश्वविद्यालय से इन्टर, बी.ए. तथा एम.ए. की परीक्षाएं प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। इन्टर तथा एम.ए. में इन्होंने विश्वविद्यालय में प्रथम तथा बी.ए. में चतुर्थ स्थान प्राप्त किया। सन् 1956 में एम.ए. करने के पश्चात् इन्होंने पी.जी.बी.टी. कालेज जबलपुर से वी.टी. (बेसिक) परीक्षा (सन् 1957) में सिद्धान्त तथा प्रयोग दोनों में प्रथम श्रेणी तथा विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान प्राप्त करते हुए उत्तीर्ण की तथा विश्वविद्यालय स्वर्ण पदक प्राप्त किया। अगस्त 1957 में म.प्र. लोक सेवा आयोग द्वारा चयन के उपरांत शासकीय महाविद्यालय में व्याख्याता के पद पर चयन हुआ। इसके उपरांत विभिन्न शासकीय महाविद्यालयों में असि. प्रोफेसर एवं अध्यक्ष हिन्दी विभाग के पद पर कार्य किया। कुछ अवधि के लिए शासकीय महाविद्यालय में प्रभारी प्राचार्य के रूप में कार्य भी किया। बाबू लाल खरे ने ‘‘रस सिद्धान्त की परम्परा तथा शुक्लोत्तर हिन्दी समीक्षा’’ विषय पर विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन के तत्कालीन उप-कुलपति डॉ. शिव मंगल सिंह सुमन के मार्ग-दर्शन में शोध कार्य प्रारंभ किया। दुर्भाग्यवश जिसके पूर्ण होने के पूर्व ही बाबू लाल खरे का निधन हो गया।  बाबू लाल खरे  का खंड काव्य “मंगा”  हास्यरस का होते हुए भी सामाजिक यथार्थ  कुछ चुटीले अंदाज में सामने रखता है।  इस खंडकाव्य में मुहावरेदार भाषा का स्वरूप और सहज भावभिव्यंजना  अपना गहरा प्रभाव छोड़ती है। सन् 1946 में आरम्भ हुआ खंडकाव्य ‘‘मंगा’’ में 1972 तक कई और अध्याय जुड़ने के बाद पूर्ण हुआ। करीब साठ दशक पहले रचा गया यह हास्य खण्ड काव्य आज भी समसामयिक व सटीक लगता है। इसमें खांटी व्यंजनात्मकता है, शिष्ट हास्य है तथा बुंदेली रीति-रिवाज की आकर्षक झलक है। 
‘‘मंगा’’ कथा है, बुंदेलखंड के सीधे-साधे, ग्रामीण परिवेश में पले बढ़े, आलसी, अनपढ़ इंसान मंगा की। मंगा मेहनत नहीं करना चाहता है लेकिन ज़िन्दगी आराम से गुजारना चाहता है। इसीलिए दो स्त्रियों का पति बन कर उनकी मेहनत व कमाई के बूते चैन की जिंदगी गुजारने की उसकी इच्छा उस पर भारी पड़ती है। अपनी दुर्दशा से उबर कर, सही राह पर, मंगा किस तरह आता है, यही इस काव्य का मूल कथानक है। इस काव्य में संवाद भी हैं जो हास्य रस उत्पन्न करने में सक्षम हैं। व्यंग भी है और छिपा संदेश भी। कई स्थानों पर तो पढ़ कर हंसी रोके नहीं रुकती है। बानगी देखिए -
काट कूट कें गऔ सपरबे 
नरवा में जब बौ बूड़ौ, 
हाँत पाँव गये ठिठुर
काए कै पानी तौ बिकटई जूड़ौं।
सपरखोर कें मंगा नें, 
चाही कै बजाएँ हम बाजौ,
ठिठुरे हाँ ता बजी नें चुटकी,
अरे राम, हो गऔ का जौ!
पानी में गिर गऔ-जान कें 
झार चुटैया सें छूटी, 
इत्ती महँगी चीज हिरानी 
अरे बाप! किस्मत फूटी।
(पृ 9)
अनाज समाप्त हो जाने पर आलसी मंगा से उसकी पत्नी मुलिया अनाज लाने को कहती है लेकिन मंगा उसकी अनसुनी कर देता है तब मुलिया उसे खरी-खोटी सुनाती है। इस दृश्य में एक स्त्री के सहज भाव हैं जो अलसी पति से तंग आ चुकी है-
मुलिया बोली, का कएं तुमसें, कैसें हम जे दिन काटें।
कौन करम के है, तुमखों का हम बैठे-बैठे चाटें।
पुरुष प्रधान समाज की इस विडम्बना को कवि ने बड़ी बारीकी से प्रस्तुत कर दिया है कि पुरुष चाहे काम करे या न करे, दोष स्त्री के सिर पर ही मढ़ा जाता है। इसीलिए मुलिया की बात सुन कर मंगा अकड़ दिखाते हुए कहता है-
मंगा बोलौ - इतै पेट में कूँदत खूब बिलैयें हैं।
तें बैठी है सास्तर पड़बे कैसीं बरै लुगैयें हैं!
पहर भरे सें चल रइ तोरे थूथर की पैनी कैंची।
भाजी सी पौलबे खंगी है सोचत नइँ ऊँची-नैंची ।।
मुलिया की गुस्साँ बड़ बैठी जो मंगा नें दै डाँटौ ।
रोउन लगी, कही मंगा नें-पटा डार तें तौ भाटौं ।।
गोरा नोंनें भलाँ लुगाईं उनकीं रोउत तौ नइयाँ ।
जब देखौ घूमत बजार में डारें बइँयाँ में बइँयाँ ।।
चुवन लगत हैं तोरे नैनाँ तनक-तनक सी बातों में।
अब जानी कै लातों की देवी नें मान है बातों में।।
(पृ 34)
यानी चित भी मेरी, पट भी मेरी। जब मुलिया के पास दाल नहीं गलती है तो मंगा गंगिया के आगे हाथ फैलाता लेकिन सीधे-सीधे नहीं, वरन प्रेम जताने का नाटक करते हुए-
अरे, प्रेम के भूके हैं हम तौ, सुन ले मोरी गंगा!
छोड़ौ बातें, खाबे दे जो हो बै सो, - बोलौ मंगा ।।
पानी-पानी भई गंगिया सुन कें बातें भोरी-सीं ।
खुवा खूब पकवान, मिठाई बचत हती जो थोरी सी ।।
रहे कछू दिन इतै मजे में फ़िर आ गई फाँके-मस्ती ।
मंगा नें सोची कै- जा तौ जुगत मिली अच्छी सस्ती ।।
थोरौ-भौत कछू तौ मुलिया नें जोरौ हुइऐ अब लौं ।
उतै कछू दिन रहौ, गंगिया लैहै जोर कछू जब लौं ।।
सो गंगा सें लड़े और मुलिया के घर फिर कें आये।
ऐंसई पारी-पारी सें दोई के खूब प्रान खाये ।।
(पृ 60)
‘‘मंगा’’ एक ऐसा खंडकाव्य है जो प्रकाशित हो कर भी पर्याप्त चर्चा में नहीं आ पाया। किन्तु अच्छी कृति पानी की भांति देर-सबेर अपना रास्ता ढूंढ ही लेती है। प्रकाशन के बाद नेपथ्य में अर्थात समय के पन्नों में दब जाने के बाद एक बार फिर ‘‘मंगा’’ ने पाठकों के घर के दरवाजे पर दस्तक दी है। बुंदेली को समृद्ध करने वाली यह कृति बुंदेली के हर पाठक के लिए रोचक एवं हास्य से भरपूर है। इसमें बुंदेली की सोधी महक है और मिठास के साथ मिलनसारिता भी है। इस खंड काव्य की सबसे बड़ी विशेषता यह भी है कि इसमें हर पन्ने पर फुटनोट्स में बुंदेली के हिन्दी शब्दार्थ दिए गए हैं। बुंदेली साहित्य की समृद्धि को जानने के लिए स्व. बाबू लाल खरे की इस कृति को अवश्य पढ़ा जाना चाहिए। 
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आचरण,  28.07.2026
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Tuesday, June 23, 2026

पुस्तक समीक्षा | आदि-अनादि प्रश्नों को उठाती संवेदनशील कविताएं | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
आदि-अनादि प्रश्नों को उठाती संवेदनशील कविताएं
समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह  - तुम से शुरू तुम तक
कवयित्री - श्रीमती विमल बुंदेला
प्रकाशक - जे.टी.एस. प्रकाशन, वी-508, गली नं. 17, विजय पार्क, दिल्ली-110053
मूल्य  - 500/-
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कविता वह माध्यम है जो संवेदनाओं को विचारों के साथ जोड़कर एक ऐसी अभिव्यक्ति प्रदान करती है जो मन को गहरे तक छू जाती है। कई बार जब व्यक्ति अपने मन के प्रश्नों को गद्यात्मक सामने नहीं रखना चाहता है तब काव्यात्मक रूप में उन्हें पिरोकर सहजता से सामने रख देता है, यही काव्य कला की बुनियादी विशेषता होती है। श्रीमती विमल बुंदेला का यह काव्य संग्रह “तुम से शुरू तुम तक” जितना मन की कोमल भावनाओं से गहन सरोकार रखता है उतना ही वैचारिक उद्वेलन भी रखता है। श्रीमती विमल बुंदेला प्रखर विचारों की कवयित्री हैं। वे ऐसे आदि-अनादि प्रश्न अपनी कविताओं के माध्यम से उठाती हैं जिन्हें पढ़ने के बाद प्रत्येक व्यक्ति उन पर विचार करने के लिए विवश हो जाता है और पढ़ने वाले को यह भी अनुभव होता है कि यह सारे प्रश्न तो उसके अंतःस्थल में भी कहीं न कहीं मौज़ूद थे।

भारतीय संस्कृति कि यह विशेषता है कि वह संस्कारों के रूप में प्रत्येक व्यक्ति की आत्मा में बसी है। इसीलिए जब कोई रचनाकार अपना कविता संग्रह तैयार करता है तो उसका आरंभ सरस्वती वंदना से ही होता है। देवी सरस्वती विद्या की देवी हैं। प्रत्येक रचनाकार यह मानता है कि यदि वह कोई सृजन कर पा रहा है तो देवी सरस्वती की कृपा से संभव ही है। विमल बुंदेला भी अपनी प्रथम कविता “मां वाणी का प्रसाद” में यह पंक्तियां लिखती हैं कि-
अहं नहीं शब्दों में मेरे,
जो सच है वह लिखती हूँ,
ये प्रसाद माँ वाणी का है,
जो विनय भाव जगाते हैं।
श्रद्धा से नतमस्तक हूँ मैं,
दिया बहुत, माँगा कम था,
एक बूँद को तृषित हृदय था,
भरे कलश मिल जाते हैं।
संग्रह की दूसरी कविता मां शारदा को अर्पित है। वहीं तीसरी और चौथी  कविताएं “जन्मभूमि मां भारती” तथा “भारत देश”अपने देश के प्रति समर्पित है। कवयित्री विमल बुंदेला ने भी इसी प्रकार जन्मभूमि भारत को नमन किया है-
ननी-जन्मभूमि हमारी,
सुंदर और मनोहारी,
जन्म दिया प्रभु इस धरती पर,
करूँ नमन, हूँ आभारी।
देखा जाए तो ये आरंभिक कविताएं पुस्तक का मंगलाचरण हैं। उसके बाद पांचवी कविता में ही वे अपने मूल प्रश्नों पर आती हैं। पांचवी कविता का शीर्षक ही है “सीधा प्रश्न”। यहां से नौंवी कविता तक वे शाश्वत प्रश्न उठाए गए हैं जो राम कथा से उपजे हैं और प्रत्येक व्यक्ति के मानस में यदाकदा उमड़ते-घुमड़ते रहते हैं। ये कविताएं कवयित्री के सामाजिक एवं स्त्री स्वाभिमान से सरोकारों को भी प्रतिबिंबित करती हैं।
“सीधा प्रश्न” कविता में कवयित्री ने मर्यादा पुरुषोत्तम राम से प्रश्न किया है-
हे मर्यादापुरुषोत्तम राम आपको,
अब उत्तर देना होगा,
क्या गलती थी माँ सीता की,
यह विश्लेषण करना होगा।
यह प्रश्न उठाया है इस बात पर की गर्भवती सीता माता को श्रीराम ने वन में कैसे भेज दिया और उनका कैसे त्याग कर दिया जबकि वे स्वयं सीता माता की अग्नि परीक्षा ले चुके थे। इसीलिए कवयित्री कहती हैं कि-
हर नारी के मन के अंदर का,
यह दबा हुआ अंगारा है,
चुपचाप क्यों त्यागा सीता को,
यह सीधा प्रश्न हमारा है।

यह प्रश्न उस समय से मानव मन में अपनी जगह बनाए हुए हैं जब से राम कथा आरंभ हुई। स्त्री पर लांछन लगाना और उस लांछन को सही मान लेना क्या इतना सरल है? क्या यह स्त्री की प्रतिष्ठा, गरिमा एवं अस्मिता के अनुरूप है? यही प्रश्न उठाया है विमल बुंदेला जी ने। कविता “कर्तव्य सबसे बड़ा” में कैकई प्रसंग के तारतम्य में प्रश्नों को खंगाला गया है। कैकई ने पुत्र मोह में पड़कर श्री राम को 14 वर्ष का वनवास दिला दिया। जबकि इसी कारण उसका पुत्र भरत उससे रुष्ट हो गया। समूची अयोध्या धिक्कार कर उठी। एक स्त्री दूसरी स्त्री की बातों में आकर गलत कदम उठा ले तो उसके हिस्से में धिक्कार ही आता है। इस बात को विमल बुंदेला जी ने बहुत सुंदर सहज ढंग से रेखांकित किया है-
तब कैकई-सी रानी दो,
जब आई उसकी बातों में,
स्याही-सा काला नाम हुआ,
ममता की सरल किताबों में।

यह कविता स्पष्ट करती है कि विमल बुंदेला जी सही को सही और गलत को गलत कहने का साहस रखती हैं। रामकथा के संदर्भ में ही एक और अनादि प्रश्न उठाती कविता है “उर्मिला का मौन त्याग” । इस कविता में उन्होंने लिखा है कि किस तरह उत्साह पूर्वक लक्ष्मण की अर्धांगिनी बनकर उर्मिला राज भवन में आई थी लेकिन श्री राम के साथ लक्ष्मण के वनवास गमन करने पर उर्मिला  ने भी राजभवन में रहते हुए वनवास सामान जीवन व्यतीत किया, जो आसान नहीं था -
चौदह वर्ष जो तुमने बिताए,
और रिश्ते सभी निभाए थे,
हमको कुछ भी ज्ञात नहीं,
कैसे सब आँसू छुपाए थे।
स्त्री मन यूं भी अधिक संवेदनशील होता है और जब कोई स्त्री दूसरी स्त्री की दशा एवं स्थिति पर विचार करती है तो वह विचार बिंदु सटीक होता है।

“अपमान की अग्नि” कविता वह अनादि प्रश्न उठाती है जिसमें लक्ष्मण के द्वारा शूर्पणखा की नाक काट दी जाती है, क्या यह दंड उचित था? शूर्पणखा भले ही राक्षस समुदाय की थी किंतु थी तो स्त्री ही, उस पर शस्त्र उठाना क्या उचित था? एक स्त्री को सदा के लिए उसके नैसर्गिक सौंदर्य से वंचित कर देना क्या उचित था? इससे भी पहले क्या मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम का सूर्पणखा को विवाह प्रस्ताव हेतु अनुज लक्ष्मण के पास भेजना क्या उचित था? इन प्रश्नों को उठाने का साहस किया है कवयित्री विमल बुंदेला ने-
लक्ष्मण के सम्मुख सुंदरी आई,
किया प्रणय निवेदन मुस्काई,
लक्ष्मण ने हँसी उड़ाई थी,
शूर्पणखा नाक कटवाई थी।
इस प्रकार के शाश्वत प्रश्न हमारे अतीत से उठकर वर्तमान तक हमें विचलित करते रहते हैं।कविता “प्रतीक्षा का फल” में शबरी की कठोर तपस्या समान प्रतीक्षा का हृदयस्पर्शी वर्णन है। संग्रह की अन्य कविताएं जैसे “अनंत स्पर्श” “हम सब एक हैं”, “बिन बाती का दीपक”, “अंतर्मन की तलाश” आदि विविध भाव भूमि की कविताएं हैं। एक और कविता है जिसका उल्लेख करना आवश्यक है। यह कविता है “उसकी ख़ामोशी”। इस कविता में कवयित्री ने कामवाली बाई की पीड़ा को शब्दांकित किया है-
गहराती शाम-सी आँखें,
उनकी नमी वह छुपाए थी,
और कोई नहीं, वह मेरी
कामवाली कम उम्र बाई थी।
संग्रह की प्रस्तावना डॉ. बहादुर सिंह परमार ने, भूमिका डॉ. शरद सिंह ने, आशिर्वचन मालती श्रीवास्तव, छतरपुर ने लिखा है। इसके साथ ही पद्मश्री डॉ अवध किशोर जड़िया का विशेष संदेश एवं डॉक्टर गायत्री जी का विशेष संदेश एवं शब्दों की कविताओं एवं कवयित्री के व्यक्तित्व पर दो शब्द आभा श्रीवास्तव के हैं।  विमल बुन्देला ने अपने आत्मकथ्य में अपनी सृजनात्मक मनोदशा का संक्षेप में उल्लेख किया है।

कवयित्री विमल बुंदेला की कविताओं की भाव भूमि बहुत गहरी है। उन्होंने अपनी हर बात को सीधे, सरल और स्पष्ट शब्दों में पिरोया है। यह कविताएं अलंकारिकता एवं छंदबद्धता की सभी शर्तों को पूरा भले ही न करती हों किंतु इनमें एक सहज प्राकृतिक लयबद्धता है जो इन कविताओं को न केवल पठनीय बनाती है, अपितु स्मरणीय भी बनाती है। इस कविता संग्रह के पेपर बैक संस्करण की कीमत रु.500/-  साहित्य प्रेमियों की बटुआ फ्रेंडली नहीं है। वैसे संग्रह की सभी कविताएं पाठक के हृदय से संवाद करने में सक्षम हैं। कविताओं का भाव सौंदर्य ही नहीं अभी तो भाषा सौंदर्य भी प्रभावित करने वाला है। लिहाज़ा कवयित्री श्रीमती विमल बुंदेला का यह संग्रह सभी को बहुत पसंद आएगा तथा विशेष रूप से वे कविताएं जिनमें उन्होंने आदि-अनादि प्रश्न उठाए हैं, वैचारिक भाव भूमि पर लंबे समय तक अपनी उपस्थिति दर्ज कराएंगी।
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Tuesday, June 16, 2026

पुस्तक समीक्षा | सॉनेट सागर - हिन्दी साहित्य में सॉनेट विधा को स्थापना और काव्यात्मक विस्तार | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
सॉनेट सागर - हिन्दी साहित्य में सॉनेट विधा को स्थापना और काव्यात्मक विस्तार  
समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह  - सॉनेट सागर
कवि        - डॉ. विनीत मोहन औदिच्य
प्रकाशक     - सर्वभाषा प्रकाशन, जे-49,गली नं.-38, राजापुरी (मेनरोड) उत्तमनगर,नई दिल्ली-110059
मूल्य       - 249/-
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सॉनेट विधा हिन्दी साहित्य के लिए हमेशा एक नूतन विधा रही है। यह माना जाता है कि सबसे पहले कवि त्रिलोचन शास्त्री ने इस विधा को हिन्दी में सम्मिलित किया। उनके समकालीन कुछ कवियों ने सॉनेट लिखे भी लेकिन फिर भी सॉनेट हिन्दी काव्य जगत में अपनी पैंठ नहीं बना सका। इधर विगत कुछ वर्षों से डॉ. विनीत मोहन औदिच्य ने सॉनेट के क्षेत्र में कड़ा महत्वपूर्ण कार्य किया है जिससे हिन्दी साहित्य में सॉनेट को स्थापना मिलने की संभावना बढ़ी है। डॉ. औदिच्य हिन्दी, अंग्रेजी एवं उर्दू के समर्थ ज्ञाता हैं। उन्होंने बेहतरीन ग़ज़लें ‘‘फ्रिक्र सागरी’’ के तख़ल्लुस से लिखी हैं। इसके साथ ही अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद कार्य में पाब्लो नरुदा के सॉनेट्स का अनुवाद कर के हिन्दी जगत को पाब्लो की काव्यात्मक विशेषताओं से परिचित कराया है। स्वयं  के मौलिक सॉनेट संग्रह तथा भारतीय सॉनेटियर्स एवं अंग्रेजी के 101 सॉनेटियर्स के सॉनेट्स के पुस्तक संपादन के बाद डॉ औदिच्य को यह महसूस होता है कि हिन्दी जगत को सॉनेट की संरचना की बारीकियों से भी अवगत होना चाहिए। हाल ही में उनका नवीनतम सॉनेट संग्रह ‘‘सॉनेट सागर प्रकाशित हुआ है जिसमें उन्होंने सॉनेट विधा के बारे में विस्तार से चर्चा की है। उन्होंने “सॉनेट काव्य विधा संरचना एवं हिन्दी साहित्य में प्रयोग” शीर्षक से लिखा है कि ‘‘काव्यात्मक एकाकी विचार की संक्षिप्त अभिव्यक्ति के लिए एक बौद्धिक या इन्द्रियजनित लहर जो भावनात्मक और लयबद्ध रूप से तीव्रता से अनुभव हो, सॉनेट एक सर्वाेत्तम माध्यम सिद्ध होगा। एक ऐसा साधन जो मधुरता और एकता के क्रांतिकारी नियमों के आधार पर निश्चित किया गया हो। उन पाठकों को जिन्हें सॉनेट साहित्य के क्षेत्र व तकनीक का ज्ञान नहीं है उन्हें इसके विकास व क्षमताओं से परिचित कराना समीचीन होगा। सॉनेट के अनेक इतिहासकार हुए हैं जिनके अपने मत व दृष्टिकोण हैं। इनमें सर्वप्रमुख कैपल लाफ्ट हैं जिन्होंने इस रोचक विधा का विशिष्ट अध्ययन किया। उन्होंने 1813-14 में मौलिक और अनूदित इटालियन सॉनेट संकलन ‘लौरा’ प्रकाशित किया। आर एच हाउसमैन ने 1833 में एक श्रेष्ठ संकलन निर्गमित किया। डाइस, लेह हंट, टामलिंसन, डी एम मेन, मिस्टर एस वैडिंगटन सहित मिस्टर डेनिस ने इंग्लिश सॉनेट्स के माध्यम से योगदान दिया। मिस्टर हाल कैन के सॉनेट्स आफ श्री सेन्चुरीज ने अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की। क्वार्टरली रिव्यू 1866, वे स्टमिनिस्टर रिव्यू 1871, द डब्लिन रिव्यू 1876-77 में सॉनेट साहित्य पर महत्वपूर्ण आलेख प्रकाशित हुए। इटली में लेंटीनी, पैट्रार्क तथा इग्लैंड में विलियम शेक्सपियर, विलियम वर्ड्सवर्थ, जान मिल्टन, स्पेंसर के अतिरिक्त अनेक देशों के कवियों ने सॉनेट काव्य विधा में लेखन कर इस विधा को लोकप्रिय बनाया। भारत में भी विभिन्न राज्यों में इस विधा को विविध स्वरूपों में लिखा जाता रहा है।’’ अपने इस लेख में डॉ. औदिच्य ने हिन्दी में सॉनेट छंद लिखे जाने के आधारभूत तत्वों को भी सामने रखा है। यह लेख सॉनेट विधा को जानने, समझने की दिशा में महत्वपूर्ण है।
‘‘सॉनेट सागर’’ में डॉ औदिच्य के कुल 51 सॉनेट संग्रहीत हैं। इस संग्रह के संबंध में ओड़िशा की सॉनेटियर व कवयित्री अनिमा दास ने “सॉनेट सागर; एक अनंत यात्रा” शीर्षक से भूमिका में लिखा है कि “प्रस्तुत नवीन संग्रह ‘सॉनेट सागर’ सॉनेटियर विनीत मोहन जी की एक अद्भुत यात्रा धारा है। इस संग्रह में लिपिबद्ध समस्त सॉनेट्स कई भाव, विचार, विषय की विस्तृत परिभाषा है। सॉनेट के मूलतः कई तत्व होते हैं जिसमें प्रमुख है मीटर, गेयता, विशिष्ट तुकांत, भाव, एक स्वतंत्र विचार, रूपक, प्रतीक, बिम्ब एवं रहस्य। 14 पंक्तियों की किसी भी कविता को सॉनेट नहीं कहा जा सकता। सॉनेट का अन्य एक रूप है जिसे अनियंत्रित रूप कहा जाता है, जिसमें उपरोक्त सभी तत्व होते हैं किंतु छंद के नियमों से मुक्त होते हैं। डॉ. विनीत मोहन जी ने सॉनेट के दोनों रूपों को सम्पूर्ण विशेषता देते हुए कई सृजन किए हैं।”
पुस्तक में अनिमा दास ने “सॉनेटियर एवं ग़ज़लकार प्रो. (डॉ.) विनीत मोहन औदिच्य उर्फ फ़िक्र सागरी: एक परिचय” शीर्षक से डॉ. विनीत मोहन औदिच्य का विस्तृत परिचय भी दिया है। डॉ औदिच्य बिना शोर मचाए नेपथ्य में रहते हुए सतत सृजनशील हैं। फिर भी उन्हें अनेक राष्ट््रीय स्तर के पुरस्कार सम्मान मिल चुके हैं। उनकी अब तक की प्रमुख कृतियां हैं- ग़ज़ल संग्रह - खुशबु-ए-सुखन (2014), कारवां-ए-सुखन (2021), अंदाज-़ए-ग़ज़ल (2022), तन्हाइयाँ आवाज़ देती हैं (2023), काव्य संग्रह काव्य प्रवाह (2015), भाव स्रोतस्विनी (2019), प्रथम सॉनेट संग्रह - 69 अंग्रेजी सॉनेटस का हिंदी अनुवाद कर ‘‘प्रतीची से प्राची पर्यंत’’ साझा संग्रह (2020), द्वितीय सॉनेट संग्रह - नोबेल पुरस्कार विजेत पाब्लो नेरुदा की ‘‘हंड्रेड लव सॉनेट्स’’ पुस्तक का हिन्दी अनुवाद ‘‘ओ प्रिया!!! (2021), तृतीय सॉनेट संग्रह ‘‘सिक्त स्वरों के सॉनेट’’ (118 सॉनेट्स) - 2022, चतुर्थ सॉनेट संग्रह ‘‘काव्य कादम्बिनी’’ - 2022 (101अंग्रेजी सॉनेट रचनाकारों के 135 सॉनेटस का हिंदी अनुवाद)। यह सुनिश्चित है कि डॉ औदिच्य द्वारा सॉनेट के लिए किया गया श्रम एवं मौलिक सॉनेट सृजन ही उन्हें हिन्दी साहित्य के इतिहास में स्थाई पहचान दिलाएगा।
डॉ. विनीत मोहन औदिच्य के सॉनेट्स में वैचारिक संवाद हैं, प्रकृति की सुंदर छटा है तथा विविध मानवीय व्यवहार हैं। संग्रह का पहला सॉनेट है “अदृश्य चक्षु” जिसमें उन्होंने लिखा है कि-
ऐसा कह दूँ कि मैं आनंद में हूँ, मिथ्या यह तथ्य नहीं
मैं ही जानता हूँ अग्नि-वन में कैसे होता श्वास रुद्ध
और दुखित मेरा जीवन है,  यह भी मेरा कथ्य नहीं
है ज्ञात मुझे कैसे काँटों की शय्या पर काया हो रही वृद्ध
इस प्रकार देखा जाए तो डॉ औदिच्य अपने सॉनेट में व्यष्टि से समष्टि की ओर बड़ी सहजता से बढ़ते चले जाते हैं। उनका अपना दुख-सुख जन-जन के दुख-सुख का प्रतिबिम्ब बन कर उभरने लगता है। इसी प्रकार उनके कुठ सॉनेट्स में नॉस्टेल्जिक शेड दिखाई देता है। जैसे एक सॉनेट है ‘‘प्रहेलिका’’। इसमें प्रकृति के लक्षणों में मानवीय भावनाओं की अद्भुत छटा का रूपक है-
कहीं दूर कानन में खिल उठा था फूल
सूखी नदी की देह से उड़ गई थी धूल
मंदार सा लाल लगा था तब आकाश
शीश झुका कर शशि बिखराया प्रकाश।
कह दिया था मेघ ने वह नहीं बरसेगा
नक्षत्रों में जलकर एक कल्प तरसेगा
आशा-अरण्य में रहेगा भौरों का गुंजार
मध्यरात्रि के स्वप्न में संभावना का नीहार।
कवि डॉ. विनीत मोहन औदिच्य प्रकृति की महत्ता को समझते हैं। उनकी संवेदनाओं में उस समय तीव्र आलोड़न उठता है जब प्रकृति को किसी भी प्रकार से चोट पहुंचाई जाती है। जैसे अपने एक सॉनेट में वे लिखते हैं कि-
रे मानव, अंधाधुंध वृक्ष काटे क्यों? चलो प्रकृति की ओर
उग आए कंक्रीट के जंगल, नहीं है जिनका कोई छोर
नंगे पर्वत, कठोर बंजर अवनि व सूखे सर नद-नदियाँ
है भूकंप का जोर भयंकर, वृक्षों पर मुरझाई कलियाँ।
कर्णकटु है प्रतिदिन बढ़ता शोर, रे कहाँ गई धरोहर?
जी रहें सभीत सारे थलचर, जलचर और नभचर
विषाक्त धुएँ में घुल रहा नवपल्लव का अमिय नीर
आ रही मृत्यु ध्वनि निकट, पीड़ित प्रकृति का वक्ष चीर।
जब हृदय व्यथित होता है तो ईश्वर की कृपा की आकांक्षा बढ़ जाती है। यूं भी भारतीय संस्कृति में ईश्वर की सत्ता को पूर्णतया स्वीकार किया गया है। श्रीराम के रूप में ईश्वर की छवि हर भारतीय के हृदय में बसती है। डॉ औदिच्य ने नया प्रयोग करते हुए सॉनेट में श्रीराम का स्मरण किया है। उनके सॉनेट ‘‘राम मेरे जीवन में’’ की कुछ पंक्तियां देखिए-
कहें राम का नाम... सुनें राम अभिराम
नित करे आराधना... हो कृतार्थ सर्वनाम
सरयु है प्राण... राम है तरणी... व निर्वाण
है आराध्य जो किया संसार का निर्माण
इस तरह देखा जाए तो संग्रह ‘‘सॉनेट सागर’’ में विषय की विविधता है तथा नूतनता है जिससे यह संग्रह रोचक बन गया है।
पुस्तक के दूसरे खंड में कवि की पूर्व प्रकाशित पुस्तकों की समीक्षाएं सहेजी गई हैं। यह समस्याएं हैं - “सिक्त स्वरों के सॉनेट”  संग्रह की समीक्षा “सॉनेट की विदेशी शैली का सुंदर भारतीय स्वरूप” - समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह, “ओ प्रिया” (पाब्लो नेरुदा की एक सौ प्रेम सॉनेट का हिंदी अनुवाद) की समीक्षा समीक्षक  प्रो. हरेराम पाठक,  प्रो. विनीत मोहन औदिच्य द्वारा अनूदित काव्य संग्रह रू अविरल बहती भाव स्रोतस्विनीश् की समीक्षा समीक्षक अनिमा दास, काव्य संग्रह “सिक्त स्वरों के सॉनेट” की समीक्षा समीक्षक डॉ. चंचला दवे, आंग्ल भाषा से हिंदी में  प्रो. विनीत मोहन औदिच्य द्वारा अनूदित सार्वकालिक श्रेष्ठ सॉनेट संग्रह “काव्य कादम्बिनी” की समीक्षा समीक्षक अनिमा दास, सॉनेट संग्रह “सिक्त स्वरों के सॉनेट” की समीक्षा समीक्षक विजय कुमार तिवारी, पाब्लो नेरुदा की एक सौ प्रेम सॉनेट का हिंदी में विनीत मोहन औदिच्य द्वारा अनूदित “ओ प्रिया” समीक्षक वीणा शर्मा वशिष्ठ, “ओ प्रिया” की समीक्षा समीक्षक मनोरमा जैन पाखी तथा ओ प्रिया” की समीक्षा समीक्षक: डॉ. शैलेष गुप्त वीर।
समीक्षाओं के उपरांत “श्री विनोद मोहन जी की लेखनी पर प्रबुद्ध साहित्यकारों की अन्य प्रतिक्रिया” शीर्षक से हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकारों की प्रतिक्रियाएं हैं यह साहित्यकार हैं अशोक बाजपेई, रामेश्वर कांबोज हिमांशु, डॉ प्रणव भारती, प्रभु दयाल मिश्र, डॉ (सुश्री) शरद सिंह, डॉ हरे राम पाठक, डॉ कविता नंदन, किशोर नायक, प्रताप नारायण सिंह, केशव मोहन पांडेय, अमरेश विश्विल, डॉ शैलेश गुप्त वीर, मनोरमा जैन पाखी, वीणा शर्मा वशिष्ठ, लिली मित्रा, डॉ छबिल कुमार मेहेर तथा अनिमा दास। पुस्तक के अंतिम परिशिष्ट में डॉ विनीत मोहन आदित्य को उनके कृतित्व के लिए दिए गए सारस्वत सम्मान की तस्वीर एवं सम्मान पत्र स्मृति चिन्ह आदि रखे गए हैं।
डॉ. विनीत मोहन औदिच्य का यह सॉनेट संग्रह ‘‘सॉनेट सागर’’ न केवल पठनीय है अपितु हिन्दी साहित्य में सॉनेट विधा को स्थापना सहित काव्यात्मक .   
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Tuesday, June 9, 2026

पुस्तक समीक्षा | उच्चशिक्षा जगत के स्याह पक्षों को उजागर करता है उपन्यास “पहाड़ का पाताल” | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा

उच्चशिक्षा जगत के स्याह पक्षों को उजागर करता है उपन्यास “पहाड़ का पाताल”

समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

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उपन्यास     - पहाड़ का पाताल

लेखक      - श्यामसुंदर दुबे

प्रकाशक    - ग्रंथलोक, 1/7342, नेहरू मार्ग, ईस्ट गोरख पार्क, शहदरा, दिल्ली-32

मूल्य       - 550/-

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पहाड़ को सभी देखते हैं लेकिन पहाड़ की जड़ों की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता है। जबकि पहाड़ जितना धरातल के ऊपर दिखाई देता है उससे कहीं अधिक धरातल के नीचे होता है। ठीक यही स्थिति व्यवस्था और मनुष्यों के चरित्र की होती है। ऊपर से जो कुछ जितना दिखाई देता है उससे कहीं अधिक अप्रत्यक्ष रहता है। अतः यदि पहाड़ है तो उसका पाताल भी होगा ही। कभी-कभी यह पाताल चौंकाता है, चमतना को झकणेर देता है। यही कहता है डॉ. श्यामसुंदर दुबे का उपन्यास ‘‘पाताल का पहाड़’’।  

जब किसी उपन्यास की चर्चा होती है तो मन-मस्तिष्क में एक विस्तृत कथानक की रूपरेखा उभरने लगती है। एक ऐसा कथानक जिसमें अनेक घटनाएं होंगी और अनेक पात्र। ये सभी जीवन से जुड़े हुए होंगे और कल्पना एवं यथार्थ के एक रोचक ताने-बाने से बुने हुए होंगे। निःसंदेह उपन्यासकार मानवजीवन से संबंधित सुखद, दुखद मर्मस्पर्शी घटनाओं को क्रमबद्धता के साथ प्रस्तुत करता है। वस्तुतः उपन्यास में एक ऐसी विस्तृत कथा होती है जो अपने भीतर अन्य गौण कथाएं समेटे रहती है। इस कथा के भीतर समाज और व्यक्ति की विविध अनुभूतियां और संवेदनाएं, अनेक प्रकार के दृश्य और घटनाएं और बहुत प्रकार के चरित्र हो सकते हैं, और यह कथा विभिन्न शैलियों में कही जा सकती है। शर्त ये है कि उपन्यासकार के पास जीवन दृष्टि होनी चाहिए। जीवन के यथार्थ का गहरा अनुभव होना चाहिए, सृजनात्मक कल्पना की अपार शक्ति होनी चाहिए, विचारों की गहनता होनी चाहिए और जीवन की विवेचना होनी चाहिए। ‘‘पहाड़ का पाताल’’ उपन्यास का जिज्ञासा जगाने वाला नाम है। उपन्यास का यह नाम एक व्यंजनात्मक नाम है जो पहाड़ की भांति ऊंचाई लिए हुए उच्चशिक्षा जगत की खोखली होती जड़ों के अंतरंग पक्षों की बात करता है। आज उच्चशिक्षा जगत से हर शिक्षित वर्ग संबंध रखता है। स्वयं नहीं तो अपने बच्चों की शिक्षा के जरिए। अतः उस उच्चशिक्षा जगत के सच को जानना भी ज़रूरी है। उच्चशिक्षा जगत के स्याह पक्षों की अपने उपन्यास के माध्यम से पड़ताल की है कथाकार,ललित निबंधकार एवं लोकविद डॉ.श्यामसुंदर दुबे ने। 

‘‘पहाड़ का पाताल’’ अपने आप में अनेक घटनाक्रम और अनेक पात्र समेटे हुए है। मूल कथानक मूलपात्र अपर्णा और आशुतोष के इर्दगिर्द ही घूमता है लेकिन इस परिक्रमा में ऐसे प्रसंग और ऐसे गोपन सामने आते हैं जो उपन्यास के उद्देश्य को बार-बार रेखांकित करते हैं तथा अन्य पात्रों को भी केन्द्र की ओर ले आते हैं। मूल कथा से कई अंतर्कथाएं जुड़ती जाती हैं लेकिन डॉ. श्यामसुंदर दुबे का लेखकीय कौशल कहीं भी क्रम-भंग नहीं होने देता है। उपन्यास लेखन की गंभीरता के संदर्भ में डॉ. रामदरश मिश्र का मानना रहा कि ‘‘उपन्यास एक हल्की-फुल्की विधा नहीं है जो संभव-असंभव घटनाओं और चटकीले-भड़कीले प्रसंगों की अवतारणा करती चलने वाली कथा के माध्यम से पाठकों का मनोरंजन करे, उपन्यास की वास्तविक शक्ति महान है। उसका उद्देश्य बड़ा है।’’

उपन्यास का आरंभ दो पुराने सहपाठी आशुतोष और अपर्णा की परस्पर पुनः भेंट से होता है। दोनों के बीच अतीत के पन्ने खुलने लगते हैं और उनमें से ऐसे चरित्र झांकने लगते हैं जो उच्चशिक्षा के श्वेत-स्याह पहलुओं को तार-तार कर के सामने रख देते हैं। शोधकार्य करने वाले विद्यार्थियों का कतिपय मार्गनिदेशकों द्वारा शोषण किए जाने की घटनाएं यदाकदा सामने आती रही हैं। विशेषरूप से महिला शोधकर्ताओं को उस समय विकट समस्या का सामना करना पड़ता है जब उनका पाला किसी देहलोलुप मार्गनिदेशक से पड़ जाता है। यदि वे अपना शोधकार्य छोड़ती हैं तो उनका भविष्य दांव पर लग जाता है और यदि वे शोधकार्य जारी रखती हैं तो उनके सामने दो विकल्प रहते हैं कि या तो वे अपना मार्गनिदेशक बदल लें या फिर परिस्थितियों से समझौता कर लें। मार्गनिदेशक बदलना सुगमकार्य नहीं होता है। इसका कारण बताना जरूरी होता है जोकि किसी भी महिला शोधार्थी को दुविधा की स्थिति में डाल देता है। निःसंदेह, यह उच्चशिक्षा जगत का एक घिनौना पक्ष है। इस दुराव्यवस्था के चलते कई बार योग्य शोधार्थी पीछे रह जाते हैं और अयोग्य शोधार्थी आगे बढ़ते चले जाते हैं। जो स्वयं योग्य नहीं है वह विद्यार्थियों को कैसे योग्य बनाएगा, यह एक विचारणीय प्रश्न है। किन्तु यही एक प्रश्न नहीं है जिस पर सोचने की आवश्यकता है। और भी प्रश्न यह उपन्यास सामने रखता है। जैसे प्रोफेसर साहब के ‘‘प्रताप’’ से आसानी से पीएच. डी. की उपाधि उनके हर ‘‘सेवक’’ को मिल जाना। इस संदर्भ में बड़ा रोचक वर्णन किया है उपन्यासकार ने -‘‘पंडित बनवारी लाल का प्रताप चतुर्दिक व्याप्त था। इस प्रताप के ताप से हिन्दी का मुख जसवंत नगर की झील में शुभ्र सरसिज-सा खिल रहा था। यहां एक बार जो आ गया फिर वह डॉक्टर ऑफ फिलासफी हो कर ही जाता था। इस उपलब्धि की व्याधि में फंसे दो-दो पंचवर्षीय योजनाओं वाले बजरबट्टू निखट्टू को सीनियर्स की चप्पलें घिसते, ज़र्दा लसियाते और किसी न किसी लड़की को गसियाते यहां के सहेट स्थलों पर बिलानागा पाया जा सकता था।’’

विश्वविद्यालय परिसर में प्रेमलीलाओं के प्रसंग न हों, यह संभव नहीं है। युवावस्था में प्रेम स्वाभाविक मनोभाव है और महाविद्यालय या विश्वविद्यालय इसके लिए सबसे ‘‘हॉट प्लेस’’ कहे जा सकते हैं। प्रस्तुत उपन्यास में कुछ दशकों पहले के विश्वविद्यालयीन प्रेमप्रसंगों का वर्णन है और यथानुसार उन स्थलों का भी दिलचस्प विवरण दिया गया है जहां छात्र-छात्राएं परस्पर प्रेमालाप कर पाते थे। डॉ दुबे लिखते हैं कि  ‘‘लायब्रेरी का अंतरंग, पहाड़ी की ढलानों के झुरमुट और कैंटीन का डार्क कॉर्नर ऐसे ही रस प्लावी अभिसार केन्द्र थे। सरेराह लड़कियां गठियाने के अवसर वर्जित थे। जमाना ज़रा दूसरे किस्म का जो था।’’

यहां मुंशी प्रेमचंद का यह कथन स्मरण हो आता है कि ‘‘मैं उपन्यास को मानव-जीवन का चित्र समझता हूं। मानव-चरित्र पर प्रकाश डालना और उसके रहस्यों को खोलना ही उपन्यास का मुख्य स्वर है।” इस स्वर को उपन्यासकार श्यामसुंदर दुबे ने बखूबी साधा है। उपन्यास में वर्णित कुछ नाम वास्तविक न हो कर भी बहुत जाने-पहचाने से लगते हैं। एक उद्धरण देखिए -‘‘विषय विशेषज्ञ के रूप में हिन्दी के जाने-माने विद्वान डॉ. हेमेन्द्र और डॉ. सियावर सिंह आए थे। इन दोनों का आतंक उन दिनों हिन्दी क्षेत्र में छाया हुआ था। इनका दबदबा ऐसा था कि किसी अदना से अदना साहित्यकार की पहली कितबिया को ये मुक्तिबोध की डायरी के समक्षक स्थापित कर देते थे। इस तरह की स्थापना सुन कर हिन्दी जगत सकते में आ जाता था। अकसर ऐसे सकते आते-जाते रहते थे और इन दोनों के कारण हिन्दी जगत अपने इतिहास विषयक अनेक अनिर्णयों में लटका रहता था। इन लटकाऊ लोगों की पैंठ कहां नहीं थी? ये पुस्तक चयन समिति, विदेश-यात्रा समिति, राजभाषा समिति, पुरस्कार समिति जैसी सैंकड़ों समितियों के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष पद सुशोभित किए हुए थे।’’

इन व्यंजनात्मक पंक्तियों में वर्णित दोनों व्यक्तियों के यथार्थ को वे पाठक सहज ही भांप सकते हैं जो हिन्दी साहित्य की आलोचनात्मक गतिविधियों से किसी न किसी रूप में जुड़े हुए हैं। जो सीधेतौर पर नहीं जुड़े हैं अथवा वास्तविक जीवन में उनसे अनभिज्ञ हैं, वे भी आसानी से समझ सकते हैं कि ऐसे ख्यातिलब्ध व्यक्ति विश्वविद्यालयों में प्राध्यापक चयन प्रक्रिया को किस तरह प्रभावित करते हैं। कुलमिला कर एक सौदा-सा होता है चयनकर्ताओं के बीच कि तुम मेरे उम्मीदवार का चयन करो और मैं तुम्हारे उम्मींदवार का चयन कर दूंगा। यहां उम्मीदवारों के पक्षधरों की योग्यता उम्मीदवारों की योग्यता पर भारी पड़ जाती है। यह भी एक स्याह पक्ष है विश्वविद्यालयीन जगत का।

उपन्यास में छात्रों की वह दुनिया भी है जो सीनियर्स का वरदहस्त मिल जाने पर हर तरह के कार्यकलाप करने को स्वतंत्र हो जाते हैं, साथ ही अपने सीनियर्स के हर काम करने को मुस्तैद रहते हैं। छात्रसंघ और छात्रसंघ के चुनाव दोनों में ‘‘शागिर्द’’ छात्रों की अहम भूमिका रहती है। इन्हीं ‘‘शागिर्द’’ छात्रों में सबसे योग्य छात्र आगे चल कर छात्रसंघ का नेतृत्व करता है। यह गांव से आने वाले छात्रों के लिए एक मायावी दुनिया होती है जहां उन्हें नए सिरे से जीना सीखना पड़ता है। कथानक में ऐसा ही एक छात्र अनिल है जिसे विश्वविद्यालय परिसिर में प्रवेश करते ही अपने सीनियर रामसुजान सिंह की ‘‘कृपा’’ प्राप्त हो गई और उसे उन तमाम परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ा जो एक नए छात्र को सीनियर्स के कारण होती है। इसी पात्र अनिल जब प्रो. अनिल बन जाता है तो वह विवाहित होते हुए भी छात्रा शुभ्रा के मोह में पड़ जाता है जो कि वस्तुतः प्रेम नहीं दैहिक आकर्षण मात्र था।

व्याख्यानों की परिपाटी की अंतर्कथा सामने रखते हुए उपन्यासकार ने करारा कटाक्ष किया है। प्रो. अक्षर मार्तंड ऐसे ही एक पात्र हैं जो दूसरे शहरों में जा कर व्याख्यान देने को ही अपना प्राध्यापकीय कर्म मनते हैं। उनका विवरण देखिए-‘‘वे हमें साकेत पढ़ाते थे लेकिन कक्षाओं में कम ही दिखते थे। दिख जाते तो अपनी फाईल में रखे ओल्ड स्टूडेंट्स के नोट्स से ही वे हमें पढ़ाते थे। वे अक्सर व्याख्यान देने के लिए बाहर जाते रहते थे। जब कोई प्रोफेसर व्याख्यान देने बाहर जाता था तब उसे कर्त्तव्य अवकाश दिया जाता था। कर्त्तव्य अवकाश की इस सुविधा ने प्रो. अक्षर मार्तंड को व्याख्यान दिग्विजयी बना दिया था। कार्यालय का लिपिक जानता था कि अब की बार प्रो. अक्षर मार्तंड कौन-सी संस्था में व्याख्यान देने का प्रमाणपत्र लाएंगे। उनके अब तक के गौशाला, मूकबधिर पाठशाला उज्जैन में गर्दभ मेले में व्याख्यान देने के प्रमाणपत्र काफी चर्चित हो चुके थे।’’

उपन्यास में दो और महत्वपूर्ण पात्र हैं जो विश्वविद्यालय परिसर से हट कर भी परिसर से जुड़े हुए हैं। ये पात्र हैं- काजू सपेरा और बेड़नी फुलमतिया। काजू सपेरा का कंट्रास्ट जीवन और फुलमतिया के जीवन की त्रासद घटनाएं उपन्यास में एक अलग ही रंग भरती हैं तथा मूल कथानक के परिवेश को और सम्पन्नता प्रदान करती हैं। फुलमतिया के साथ डकैतों का भी प्रसंग है जो तत्कालीन अपराधकथा के परिदृश्य को सामने रखता है। प्रो. प्रमोद शंकर, मेडम कस्तवार आदि कई पात्र हैं जो अपनी छोटी-बड़ी उपस्थिति से मूलकथानक को सफलतापूर्वक गतिप्रदान करते हैं।

उपन्यासकार ने शुभ्रा और काजू सपेरा के बहाने आगामी समय का भी आकलन करने से गुरेज़ नहीं किया है-‘‘इतना निश्चित है कि आगामी जो समय है, वह पुरुषार्थहीन महत्वाकांक्षाओं का समय है। यह अकर्मण्यता एक ऐसी अपसंस्कृति को जन्म दे सकती है जिसमें और तो और बच्चियों की देह के भूखे भेड़िए अनेक तरह की चालें चल कर अपना मतलब सिद्ध करते रहेंगे। भगवान बचाए ऐसे समय से।’’  

‘‘पहाड़ का पाताल’’ के लेखक श्यामसुंदर दुबे स्वयं लगभग चालीस वर्ष तक उच्चशिक्षा विभाग में प्रोफेसर एवं प्राचार्य के पद पर रहे हैं अतः उच्चशिक्षा जगत के कोनों-कतरों से भी वे बखूबी वाक़िफ़ हैं। वे सागर विश्वविद्यालय में मुक्तिबोध सृजनपीठ के डायरेक्टर भी रह चुके हैं। उनसे विश्वविद्यालयीन जगत की कमियां एवं ख़ामियां छुपी नहीं हैं। उन्होंने जिस रोचक ढंग से उच्चशिक्षा जगत की दुरावस्थाओं की बखिया उधेड़ी है वह अपने-आप में अनूठी है। उपन्यास की भाषा कथानक और पात्रों के अनुरूप  हिन्दी, उर्दू, अंग्रेजी के साथ-साथ देशज शब्दों से परिपूर्ण है। उपन्यास में सुरुचिपूर्ण विस्तार है, रोचकता है, और विचार-विमर्श के लिए अनेक ज्वलंत बिन्दु हैं। उच्चशिक्षा जगत के अंधेरे कोनों में झांकता यह उपन्यास प्रत्येक दृष्टि से दिलचस्प एवं बारम्बार पठनीय है।      

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Tuesday, May 19, 2026

पुस्तक समीक्षा | नैराश्य के अंधेरे में आशा का दीप जलाने का आह्वान | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा
नैराश्य के अंधेरे में आशा का दीप जलाने का आह्वान 
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह - एक दीप और जलाना
कवि      - बद्रीलाल ‘दिव्य’
प्रकाशक - साहित्यागार, धामाणी मार्केट की गली, चौड़ा रास्ता, जयपुर
मूल्य - 200/- 
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आज मानव समाज के सामने सबसे बड़ा संकट है बाजारवाद का और बाजारवाद की मूल प्रवृत्ति होती है मनुष्य के भीतर भौतिक वस्तुओं को पाने की अदम्य में लालसा को जगा देना। जब मनुष्य ‘‘और-और-और’’ पाने की लालसा के शिकंजे में फंस जाता है तो फिर उसे गलत और सही में अंतर दिखाई देना बंद हो जाता है। फिर ठीक यहीं से भ्रष्टाचार का आरंभ होता है। देश में व्याप्त भ्रष्टाचार की प्रवृत्ति ने व्यवस्थाओं को दीमक की तरह धीरे-धीरे खोखला कर दिया है। यदि एक स्थान से भ्रष्टाचार को दूर करने का प्रयास किया जाए तो दूसरे स्थान पर उसकी लकीरें दिखाई देने लगते हैं। आज लगभग हर व्यक्ति अपनी सीमाओं को भूलकर दूसरे के हिस्से का सब कुछ हड़प कर जाना चाहता है। देखा जाए तो यह एक निराशाजनक स्थिति है। घोर निराशा के अंधकार में हर संवेदनशील व्यक्ति आशा की किरण देखना चाहता है। साहित्य की किसी भी विद्या से जुड़ा व्यक्ति संवेदनाओं से सरोकार रखता है और जो संवेदनाओं से सरोकार रखता है वह सदा मानव हित, जनकल्याण और देश की प्रगति के बारे में चिंतन मनन करता है। इसीलिए कवि अटल बिहारी वाजपेई ने तत्कालीन व्यवस्थाओं को चुनौती देते हुए ये पंक्तियां कही थीं-
हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा, 
काल के कपाल पर लिखता-मिटाता हूं, 
गीत नया गाता हूं।

विपरीत परिस्थितियों में नए गीत गाने का हौसला उस कवि में बखूबी पाया जाता है जो दूसरों की पीड़ा से द्रवित होता है और देश में खुशहाली लाने की प्रबल इच्छा रखता है। कोटा राजस्थान के कवि बद्रीलाल मेहरा ‘दिव्य’ इसी प्रकार के कवि हैं जो अंधकार में आशा का दीप जलाकर प्रकाश बिखरने की अभिलाषा रखते हैं। उनका काव्य संग्रह “एक दीप और जलाना” निराशा से उपजी आशावादी कविताओं का संग्रह है। कवि बद्रीलाल ‘दिव्य’ मूलत: राजस्थानी उपभाषा के कवि हैं। किंतु हिंदी में भी उनके कई संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। 

“एक दीप और जलाना” काव्य संग्रह में कुल 41 कविताएं हैं। संग्रह की भूमिका में वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. (डॉ.) अनिता वर्मा ने लिखा है कि “कवि बद्री लाल ‘दिव्य’ ने अपनी अनुभूतियों के साथ जीवन के विविध रंग महसूस किए हैं, देखें है। उसकी चेतना का संसार अब व्यक्तिगत न होकर संसार का है। वह अपनी संवेदनाओं, दृष्टि की व्यापकता में सबको समाहित कर लेता है। यही सृजन की सार्थकता और सृजन का उद्देश्य है। प्रस्तुत कविताओं में जीवन के विविध रंग बिखरे पडे हुए हैं। जिनमें प्रेम, आत्ममंथन, द्वन्द्व, प्रकृति, पर्यावरण, आमजन, सभी को केन्द्र में रखकर कवि की चेतना का विस्तार विविध स्वरूपों व मनोभाव के साथ उद्घाटित हुआ है।”

   वहीं कवि बद्रीलाल ‘दिव्य’ ने अपने संग्रह की कविताओं के बारे में लिखा है कि ‘‘एक दीप और जलाना’’ मेरा आठवाँ काव्य संग्रह है। हम दीपावली पर लाखों दीप जलाते है लेकिन कभी-कभी एक छोटा-सा दीप उन दीपों की महत्ता में चार चांद लगा देता है। इस काव्यं संग्रह के लेखन के पीछे मेरा मूल उद्देश्य यही है कि देश में शान्ति और सद्भावना रूपी दीप जले ताकि देश में एकता स्थापित हो सके। भले ही देश में सत्य अहिंसा, भाईचारा, मानवता, आदि के लाखों दीप सजे हो, उनमें शान्ति और सद्भावों का एक दीप भी जरूरी है।” कवि की यह सद्भाव पूर्ण आकांक्षा उनके इस संग्रह का मूल तत्व है। संग्रह की पहली कविता ही इस बात का साक्क्ष्य प्रस्तुत करती है जिसका शीर्षक है “हम दीपक जलाएं”। यह कविता यद्यपि श्रीराम के आगमन की प्रसन्नता में दीपक जलाने का आह्वान करती है किंतु श्री राम का आगमन भी तो अंधकार में प्रकाश की उज्जवल किरणों के समान है। श्री राम भारतीय संस्कृति में आस्था विश्वास और दृढ़ निश्चय के प्रतीक है अन्याय के विरुद्ध न्याय की स्थापना के संवाहक हैं इसीलिए श्री राम के आगमन को सदा सकारात्मक ऊर्जा के प्रवाह के रूप में लिया जाता है। कवि ने लिखा है-
मेरे राम आ रहे है, हम दीपक जलाएँ।
दीपक जलायें हम, गृह-मंदिर सजाएँ।।
राम जी का स्वागत, दौड़-दौड़ करेगें।
राम जी कृपालु भय, पीर सबकी हरेगें।।
भैया भरत मिलने को, रूदन मचाएँ।
मेरे राम आ रहे है, हम दीपक जलाएँ ।।

असत्य पर सत्य की विजय को स्थापित करके अयोध्या लौटने वाले श्रीराम, लक्ष्मण और सीता माता के स्वागत में आमजन द्वारा दीप जलने के क्रम में कवि ने कहा है कि “एक दीप और जलाना”। यह दीप उन सभी मूल्यों को स्थायित्व प्रदान करने की भावना का है जिससे मानव जीवन को उच्चता मिलती है। श्रेष्ठ मानव जीवन वही है जिसमें सहजता हो, सरलता हो, जीवन मूल्य हो और असीम संवेदनाएं हों। “एक दीप और जलाना” कविता में कवि दिव्य’ ने लिखा है कि-
सत्य, अहिंसा, मानवता के, 
चाहे लाखों दीप सजाना। 
मगर शान्ति-सद्भावों का, 
एक दीप और जलाना ।।

जिस प्रकार श्रीराम अन्याय के विरुद्ध न्याय की विजय का घोष करते हैं इस प्रकार पक्षियों का जीवन दासता से रहित उन्मुक्त जीवन का प्रतीक है। यदि मनुष्य स्वतंत्रता की अभिलाषा रखता है तो उसे सबसे पहले पक्षी का जीवन ही याद आता है। मनुष्य भी एक स्वतंत्र प्राणी है जिसने स्वयं के लिए अनंत श्रृंखलाओं की संरचना कर डाली। सुप्रसिद्ध फ्रांसीसी दार्शनिक जीन-जैक्स रूसो ने कहा था कि “मनुष्य स्वतंत्र पैदा होता है, लेकिन वह सर्वत्र जंजीरों में जकड़ा रहता है।’’ यह जंजीरें मनुष्य ने स्वयं गढ़ी हैं और जब इन जंजीरों का कसाव बढ़ जाता है तो उससे मुक्त होने के लिए व्यक्ति छटपटाने लगता है क्योंकि मनुष्य की प्रवृत्ति भी पक्षियों के सम्मान उन्मुक्तता की प्रवृत्ति है। “हम पंछी उन्मुक्त” शीर्षक कविता में कवि ने लिखा है-
प्राचीरों को तोड़ चले, 
हम पंछी उन्मुक्त है।
पिंजरे में कैद सभी हम, 
क्यों मानवता सुषुप्त है।।

व्यक्ति तभी स्वतंत्र रह सकता है जब वह अनुकूल वातावरण में जीवन जी रहा हो। ऐसा वातावरण जिसमें महंगाई की मार न हो, पूंजीपतियों के द्वारा लूट न हो, राजनीतिक छल कपट न हो और सामाजिक समानता हो तभी व्यक्ति की स्वतंत्रता सुरक्षित रह पाती है। इसीलिए वर्तमान पर दृश्य को देखते हुए कवि ‘दिव्य’ ने अपनी कविता ‘यह कैसी आजादी’ में तर्जनी उठाई है-
नियम कानून सब टांगे खूंटी। 
जनता मंहगाई से रूठी ।।
पूँजीपतियों की हो रही मस्ती।
हत्या लूट कितनी है सस्ती ।।

भारतीय जीवन दर्शन की सनातन संस्कृति के अनुसार, प्रत्येक मनुष्य जन्म के साथ ही कुछ प्राकृतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक ऋणों (कर्तव्यों) से बंधा होता है। इन ऋणों से मुक्त होने के लिए जीवन में सदाचार, त्याग और सेवा का मार्ग अपनाना आवश्यक माना गया है। ये तीन ऋण देव, ऋषि तथा पितृ ऋण के नाम से जाने जाते हैं । इसमें पितृ ऋण का आशय मात्र पिता के ऋण से नहीं अपितु माता और पिता दोनों के ऋण से उऋण होना है। जो इन ऋणों का महत्व समझता है, वही देश और समाज के लिए विशेष कार्य कर सकता है। कवि ‘दिव्य’ ने अपनी कविता ‘कैसे तेरा ऋण उतारूँ’ मैं मां के ऋण को वर्णित किया है-
सौ-सौ जीवन, मैं तुझ पर वारूँ।
हे माँ! कैसे तेरा ऋण उतारूँ।।
तूने मुझको जन्म दिया है, 
तेरा मैंने दुग्ध पिया है।
तेरा अमृत-सम दुग्ध पीकर, 
कौन नहीं यहाँ जीवन जीया है।।

कवि बद्रीलाल ‘दिव्य’ की कविताओं में जहां व्यवस्थाओं के प्रति उलाहना है, वहीं उनका समाधान भी  सुझाया गया है। यही बात संग्रह की कविताओं को विशिष्ट बनाती है। इन कविताओं में भाव सौंदर्य के साथ भाषाई सौंदर्य भी है जो कविता के प्रवाह को बांधे रखता है। ‘एक दीप और जालना’ कविता संग्रह विपरीत समय में आशा का संचार करने वाली कविताओं का संग्रह है इस दृष्टि से इन कविताओं को कम से कम एक बार जरूर पढ़ा जाना चाहिए। 
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Tuesday, May 12, 2026

पुस्तक समीक्षा | पीड़ा की समग्रता को जानने पर ही संभव है पीड़ा से सम्वाद | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा
पीड़ा की समग्रता को जानने पर ही संभव है पीड़ा से सम्वाद
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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दोहा संग्रह - पीड़ा से सम्वाद
कवि      - डॉ. श्याम मनोहर सीरोठिया
प्रकाशक - नवदीप प्रकाशन, 821-बी, गुरु रामदास नगर एक्सटेंशन, गुरुद्वारा रोड, लक्ष्मी नगर, दिल्ली-110092
मूल्य - 225/- 
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दोहा हिंदी साहित्य की सबसे लोकप्रिय, प्राचीन और सशक्त काव्य विधाओं में से एक है। इसका प्रयोग आदिकाल से लेकर आधुनिक काल तक नीति, प्रेम, भक्ति, और लोक-व्यवहार की बात कहने के लिए किया जाता रहा है। माना जाता है कि अपभ्रंश से हिंदी तक की यात्रा में सिद्ध कवि सरहपा ने इसका प्रयोग सबसे पहले किया। कबीर, रहीम, रैदास और तुलसीदास ने दोहे के माध्यम से अमर साहित्य रचा। उन्होंने अपने दोहों में जीवन के हर आवश्यक पक्ष पर विचार किया। दोहा छंद अपनी लघुता में गहन अर्थ समाहित करने की क्षमता अर्थात गागर में सागर भरने की विशेषता के कारण आधुनिक हिंदी साहित्य में भी अत्यंत लोकप्रिय और महत्वपूर्ण बना हुआ है। परंपरा और आधुनिकता के सेतु के रूप में, यह आज भक्ति व नीति के साथ-साथ व्यंग्य, समसामयिक सामाजिक विषयों, और जीवन के अनछुए पहलुओं को सशक्त रूप से अभिव्यक्त कर रहा है। आधुनिक काल के दोहाकार सामाजिक विद्रूपताओं, राजनीतिक भ्रष्टाचार और आम आदमी की समस्याओं पर चोट करने के लिए दोहा विधा का प्रभावी ढंग से उपयोग कर रहे हैं। पारंपरिक क्लिष्ट भाषा के बजाय, आज के दोहे सीधी, सरल और मारक हिंदी भाषा में लिखे जा रहे हैं, जो सीधे पाठकों के दिल को छूते हैं। 

डॉ. श्याम मनोहर सीरोठिया गीत एवं छांदासिक काव्य के सिद्ध हस्ताक्षर हैं। उन्होंने अनेक दोहे लिखे हैं जिनमें कुछ शताधिक दोहे तो एक ही विषय पर केन्द्रित रहे हैं। उनका दोहा संग्रह ‘‘पीड़ा से सम्वाद’’ जीवन के विविध पक्षों पर लिखे गए दोहों का संग्रह है। पीड़ा जीवन का एक शाश्वत पक्ष है। इस धरती पर कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है और न होगा जो यह दावे से कह सके कि उसने पीड़ा का अनुभव कभी नहीं किया। यह अवश्य है कि प्रत्येक व्यक्ति के अनुभव में भिन्नता होती है। यथा किसी को प्रेम में पीड़ा मिलती है तो किसी को अर्थाभाव के कारण, किसी को अपनों से अवहेलना के कारण तो कभी शारीरिक कष्ट के कारण। पीड़ा का कारण कुछ भी हो किन्तु उसकी तीव्रता का चरमबिन्दु सभी में लगभग एक-सा होता है। फिर भी पीड़ा के मूल भाव एवं प्रकृति को जान कर पीड़ा की तीव्रता को कम किया जा सकता है। अपने दोहों के माध्यम से डॉ. सीरोठिया ने यही कहना चाहा है जिसे उन्होंने ‘‘पीड़ा से सम्वाद’’ नाम दिया है। वस्तुतः पीड़ा से सम्वाद वही व्यक्ति कर सकता है जो पीड़ा की समग्रता को समझता हो, जानता हो। यहां उल्लेख करना जरूरी है कि पेशे से चिकित्सक रहे डॉ. सीरोठिया को हिन्दी साहित्य से अगाध प्रेम है। इसीलिए उन्होंने एमबीबीएस होते हुए भी, शासकीय चिकित्सक होते हुए भी हिन्दी साहित्य में एम.ए. किया क्योंकि वे हिन्दी और उसके साहित्य को भली-भांति जानना और समझना चाहते थे। इसी के साथ गीत एवं छांदासिक विधाओं में निंरतर सृजन कार्य करते रहे। डॉ. सीरोठिया के सृजन में सतहीपन नहीं है, वरन एक गंभीरता की अनुभूति होती है क्योंकि उन्होंने अपने सृजनकर्म को ‘‘टाईम पास’’ या त्वरित ‘‘नेम-फेम’’ के साधन के रूप में नहीं लिया अपितु काव्य की जिस विधा को अपनाया, उसमें पूरी तरह रमते चले गए।    
 
संग्रह के बर्ल्ब में डॉ. श्याम मनोहर सीरोठिया की अपने सृजन के प्रति यह टिप्पणी बहुत अर्थपूर्ण है-‘‘किसी भी काव्य की रचना मानसिक वृत्तियों एवं विभिन्न प्रकार के सम्वेदनों के सामंजस्य से होता है। एक-एक भाव के लिए शब्द का चयन, और उसे सौन्दर्ययुक्त आकर्षक बनाने, अलंकृत करने का तन्मय भाव ही काव्य को सजीव बनाता है। कई बार यह किसी चित्र को बनाकर उसमें प्राण भरने जैसा कठिन भी होता है। कवि और काव्य का महिमा वर्णन हमें वेदों में भी मिलता है, यजुर्वेद में तो कवि को परमेश्वर के समतुल्य सम्मान दिया गया है। खैर, मेरे लिए काव्य साधना किसी सम्मान के लिए नहीं, स्वान्तः सुखाय की एक सहज प्रक्रिया मात्र है। मूक हृदय की मुक्ति साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो विधान करती आयी है, मेरे लिए वही कविता है।’’

यूं तो संत कबीर ने यह दोहा किसी और संदर्भ में कहा है किन्तु यदि साहित्य सृजन की सार्थकता पर इसे लागू किया जाए तो कवि के हृदय में साहित्य के प्रति सम्मान एवं लगन के रूप में भी इसे समझा जा सकता है-
सांच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप ।
जाके हिरदे सांच है, ताके हिरदे आप ।।

डॉ. सीरोठिया के इस दोहा संग्रह की विशेषता यह है कि इसमें दोहों का मूल आधार भले ही जीवन की जटिलताएं है, किन्तु इसमें विषय की विविधता है। किसी को इनमें प्रेम-संयोग मिलेगा, तो किसी को प्रेम-वियोग, किसी को सामाजिक समरसता, तो किसी को विसंगतियों के दृश्य दिखाई देंगे। जैसे संग्रह की भूमिका लिखते हुए प्रो. डॉ. रघुनांदन प्रसाद तिवारी, डी.लिट., पूर्व विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग, मोतीलाल नेहरू महाविद्यालय, दिल्ली ने ‘‘सामाजिकता समरसता के सशक्त और समर्थ दोहे’’ शीर्षक से लिखा है कि ‘‘दोहा-संग्रह ‘‘पीड़ा से सम्वाद’’ मेरे हाथ में है। इस संग्रह को पढ़ते हुए एवं अपने पूर्व अनुभवों के आधार पर एक बात मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि डॉ. सीरोठिया तन्मयी भाव के रचनाकार हैं। डॉ. सीरोठिया की रचनाओं में विषय के साथ जुड़ने की अद्भुत क्षमता है। डॉ. सीरोठिया जिस तदाकार भाव से काव्य रचना करते हैं वह मन को छू जाता है।’’

यह ‘‘तन्मयी भाव’’ डॉ. सीरोठिया के रचनाकर्म को स्थापना दिलाने में सक्षम है। प्रत्येक रचना तब हृदय को स्मर्श कर पाती है जब उसके भाव एवं विषय से तादात्म्य स्थापित कर लिया गया हो। इस संग्रह के दोहों की एक विशेषता यह भी है कि इनमें समस्याओं के साथ समाधान भी सुझाया गया है। जिससे इनकी उपादेयता और अधिक बढ़ जाती है। 

‘‘पीड़ा से सम्वाद’’ दोहा संग्रह के कुल दोहों को विषयवार 11 शीर्षकों में बांटा गया है- 1. मन से मन की बात 2. बाँटो सबको प्यार 3. इन्सान-सूरत और सीरत 4. दोस्त और दोस्ती 5. सपन करें साकार 6. समय बड़ा अनमोल 7. उपकार और उपकारी 8. कलह 9. निन्दा और निन्दक 10. जल, जंगल, जमीन 11. कभी-कभी ऐसे भी। इन शीर्षकों को पढ़ कर ही समझ में आने लगता है कि कवि ने जीवन के हर बिन्दु को परस्पर जोड़कर इस संग्रह के दोहों की रेखा खींची है। दरअसल पीड़ा का सबसे बड़ा कारण होता है छल, कपट, धोखा। जब समय विपरीत हो और लोग मुंह फेर लें तो पीड़ा का जन्मना स्वाभाविक है-
समय बदलते ही यहाँ, अक्सर बदलें लोग। 
देता है धोखा बहुत, अपनेपन का रोग।।
चली जिन्दगी, उमर भर, इच्छाओं के साथ। 
लेकिन फिसली रेत सी, अब हैं खाली हाथ।।
यदि व्यौहार एवं आचरण में अपनत्व हो तो बड़े से बड़ा दुख भी कम हो जाता है। इसीलिए तुलसीदास ने लिखा है कि -
आवत ही हरसे नहीं, नैनन नहीं सनेह।
‘तुलसी’ वहां न जाइए, चाहे कंचन बरसे मेह।।

इसीलिए डॉ. श्याम मनोहर सीरोठिया अपने दोहों में कहते हैं कि-
घर आये हर अतिथि को, दें समुचित सम्मान । 
संस्कार कहते यही, रखिये सबका ध्यान।।
सबसे होना चाहिए, सुख कारक व्यौहार । 
इससे फलता-फूलता, है अपना परिवार।। 

बाजारवाद के इस खुरदुरे समय में प्रायः देखने को मिलता है कि लोग विलासिता की वस्तुएं अथवा एक अदद बड़ा अवसर पाने मात्र को आत्मसम्मान एवं स्वाभिमान गिरवी रखने में तपिक भी हिचकते नहीं है। ऐसे लोगों का आह्वान करते हुए डॉ सीरोठिया लिखते हैं-
जिसने खुद का ही नहीं, कभी किया सम्मान। 
उसको फिर संसार में, मिलता है अपमान।। 
वृक्ष अकेले ही सहें, हर मौसम की मार। 
देते हैं फल-फूल वह, निज गुण के अनुसार।। 

गलाकाट प्रतियोगिता के इस दौर में मित्रघात भी आम बात हो चली है। ऐसी अनेक घटनाएं आए दिन समाचार पत्रों में पढ़ने को मिल जाती हैं जिनमें कभी किसी दोस्त के द्वारा धोखा दिए जाने अथवा एक तरफा प्रेम में पड़ कर जघन्य अपराध कर बैठने का विवरण होता है। जबकि मित्रता और प्रेम परस्पर विश्वास एवं एक-दूसरे की भावनाओं के सम्मान का विषय होता है। जैसे संत कबीर ने कहा है-‘‘प्रेम ने बारी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय।’’ अर्थात प्रेम न किसी खेत की बाड़ में उगता है और न बाजार में बिकता है। जो व्यक्ति इस सत्य को समझ नहीं पाता है वह स्वयं की और दूसरों की पीड़ा का कारण बनता है। अतः डॉ. सीरोठिया लिखते हैं कि- 
कभी दोस्त का ना करें, भूले से अपमान । 
आदर और समानता, का नित रक्खें ध्यान।।
मुश्किल में है डालता, इक तरफा का प्यार। 
कभी-कभी कारण बने, दुख का यही अपार।।
संत होना वैराग्यधारी होना नहीं है। संत होना सद्गुणों से युक्त होना है। जो संत है वहीं जगत का उद्धार कर जगत पर उपकार कर सकता है- 
सन्तों का इस जगत पर, सदा रहा उपकार। 
दुनिया को इनसे मिलें, सुन्दर, सरल विचार।।

डॉ. श्याम मनोहर सीरोठिया के दोहे बेहद सरल, सुबोध और जनभाषा में हैं, जिन्हें आम आदमी आसानी से समझ सकता है। उनके दोहे कम शब्दों में समूचा जीवन दर्शन प्रस्तुत करने में सक्षम हैं। डॉ. सीरोठिया ने प्रेम, सौंदर्य, विरह, नैतिकता, राजनीति, दर्शन, और अध्यात्म जैसे विविध विषयों पर दोहे लिखे हैं जो निराशा के क्षणों में उनके दोहे ‘‘हार न मानने’’ की प्रेरणा देते हैं। जैसे-
सच के सूरज की नहीं, कभी हुई है रात। 
हों विरोध की आँधियाँ, धोखे की बरसात।।

दोहा संग्रह ‘‘पीड़ा से सम्वाद’’ पठनीय संग्रह है क्योंकि यह मानवीय चेतना और संवेदना के साथ दोहों के समकालीन सरोकारों को गहनता से रेखांकित करता है। 
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Tuesday, April 28, 2026

पुस्तक समीक्षा | संस्कृति की वास्तविकता के हर पक्ष को रेखांकित करती कविताएं | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा | संस्कृति की वास्तविकता के हर पक्ष को रेखांकित करती कविताएं
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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कविता संग्रह - संस्कृति की धरोहर
कवयित्री- डॉ.आराधना सिंह बुंदेला
प्रकाशक - न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, सी-515, बुद्धनगर, इंद्रपुरी, नई दिल्ली-110012
मूल्य - 350/-
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प्रत्येक रचना में प्रतिबिम्बित होते हैं उसके सृजनकर्ता के विचार, सरोकार एवं भावनाएं। सृजनकर्ता कोई भी हो सकता है किन्तु जब सृजनकर्ता आधुनिक चिकित्सा पद्धति में निपुण एक उच्चकोटि की स्त्रीरोग विशेषज्ञ हो तो उसके अनुभव का दायरा और सरोकार का वलय और बड़ा हो जाता है। आज जिनकी पुस्तक समीक्ष्य है उसकी सृजनकर्ता डॉ. आराधना सिंह बुंदेला वरिष्ठ स्त्री रोग विशेषज्ञ एवं लैप्रोस्कोपिक, रोबोटिक सर्जन हैं इसके साथ ही वे डायरेक्टर आरुण्या क्लिनिक, द कंपेशनेट हेल्थ केयर, नोएडा, एडिशनल डायरेक्टर ऑब्स एंड गाइनी, फोर्टिस हॉस्पिटल, नोएडा हैं। वे नोएडा औबस्टेट्रिक एंड गायनेकोलोजिकल सोसायटी की प्रेसिडेंट (2021-2023) भी रह चुकी हैं। उनकी चिकित्सकीय योग्यता ने उन्हें आधुनिक चिकित्सा के क्षेत्र में एक पहचान दी है। उनके जीवनसाथी डॉ. यशपाल सिंह बुंदेला न्यूरोसर्जन हैं। डॉ. आराधना की सासू मां श्रीमती विमल बुंदेला छतरपुर मध्यप्रदेश की वरिष्ठ कवयित्री हैं। डॉ. आराधना सिंह बुंदेला के इस नवीनतम काव्य संग्रह ‘‘संस्कृति की धरोहर’’ के पूर्व ‘‘गुजरता वक्त ठहरते पल’’ नामक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है।

भारतीय संस्कृति पारिवारिक सौहार्द को प्रमुख मानती है। जब पारिवारिक संचरना स्वस्थ एवं सृदुढ़ होगी तो समाज और राष्ट्र स्वतः सुदृढ़ रहेगा। इस काव्य संग्रह के संदर्भ में इस बात को रेखांकित करते हुए सुखद लग रहा है कि जहां एक ओर आज टीवी धारावाहिक सास-बहू के गलाकाट झगड़ों को दिखा-दिखा कर परिवार में विषबीज बो रहे हैं, वहीं यह काव्य संग्रह पारंपरिक एवं स्वस्थ पारिवारिक संरचना का उम्दा उदाहरण है। इस पुस्तक पर आर्शीवचन लिखा है कवयित्री की सासू मां श्रीमती विमल बुंदेला ने। एक तो सास तथा स्वयं कवयित्री होते हुए भी बिना किसी द्वेष भाव के स्नेहिल टिप्पणी करना तथा अपनी बहू को बेटी समान मानते हुए बढ़ावा देना, हमारे देश के वास्तविक सांस्कृतिक मूल्यों का अनुमोदन करता है। श्रीमती विमल बुंदेला ने लिखा है कि ‘‘संस्कृति की धरोहर - मेरी पुत्रवधू डॉ. आराधना की द्वितीय काव्य कृति है। आदर्श और परंपराओं के प्रति आस्था लिए हुए उनकी कविताएँ नैतिक मूल्यों का निर्वाहन करते हुए चली हैं। उनका काव्य जगत स्वस्थ, सुंदर और निर्मल है। उनकी भावनाएं निर्दाेष और उमंगें स्वच्छ आकाश को छूना चाहती हैं।’’

जब एक स्त्री को अपनों का साथ मिलता है तो वह निश्चित रूप से आसमान छू लेती है। डॉ आराधना बुंदेला की कविताएं समाज के आमआदमी का पक्ष लेती हुई उन सभी विसंगतियों पर चोट करती हैं जिनके कारण व्यवस्थाएं दूषित हो चली हैं। दूसरों के दुख से द्रवित होना ही सृजन के लिए प्रेरित करता है। वे अपने सृजन पर ‘‘कविता बन गई’’ के माध्यम से कहती हैं कि-
मैं कुछ कहने नहीं जा रही थी,
पर कविता बन गई,
कुछ यूँ ही सोचे जा रही थी, और कविता बन गई।
दिल थोड़ा दुखा जिस दिन,
एहसास झिलमिलाये,
शब्दों ने ली अँगड़ाई, और कविता बन गई।

संग्रह की भूमिका लिखते हुए ‘पद्मश्री’ कवि अवध किशोर जड़िया जी ने सही लिखा है कि - ‘‘डॉ. आराधना सिंह शब्दों की मर्मज्ञ और अनुभूतियों की गहन ग्राह्यता रखती हैं। संग्रह में, कर्म कौशल को प्राथमिकता, अध्यात्म को प्रतिष्ठा, और संस्कृति को उपासना का दर्जा दिया गया, यह उनकी स्वभावगत विशेषताएँ हैं।’’

महाराजा छत्रसाल बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, छतरपुर के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. बहादुर सिंह परमार ने संग्रह की रचनाओं पर टिप्पणी की है कि ‘‘यह कविता-संग्रह जीवन अनुभवों से निकला हुआ एक ऐसा ही संग्रह है जो पाठकों को हिम्मत और विश्वास से जीवन के उतार-चढ़ाव में आगे बढ़ने का साहस देगा। ये कविताएँ संस्कारों की एक सुंदर धरोहर या मंजूषा के जैसी हैं, जिसमें विभिन्न जीवन विषयों की भावनात्मक कविताओं का मनभावन समन्वय है।’’

सबसे अच्छी बात यह है कि कवयित्री डॉ आराधना तमाम झंझावातों में भी साहस बनाए रखने का आह्वान करती हैं। वे अपनी कविता ‘‘आशा की किरण’’ में लिखती हैं कि-
जब जब कुछ बिगड़ रहा था,
कहीं न कहीं कुछ सुधर रहा था,
सब टूटता सा लग रहा था,
तब तब कहीं पर कुछ था जो जुड़ रहा था।
दुःख ही दुःख का अंधेरा जब था,
कहीं आशा का दीपक जल रहा था,
आंसुओं की उफनती नदियों में,
तब सब्र का बांध बंध रहा था।

‘‘अंतर्मन की स्फूर्त कविताएँ’’ कहते हुए उज्जैन के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. हरीशकुमार सिंह ने लिखा है कि ‘‘कवयित्री डॉ. आराधना सिंह बुंदेला के नए कविता संग्रह ‘संस्कृति की धरोहर’ को पढ़ते हुए यह अहसास होता है कि आप एक संवेदनशील कवयित्री हैं जो अपने आसपास की घटनाओं पर पैनी नजर रखती हैं और घटनाओं का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण कर कविता के विषयों को उठातीं हैं और फिर अपने शब्दों से कविता में पिरोतीं हैं।’’

संग्रह में एक मार्मिक कविता है ‘‘ख़त जो कभी पहुँचा नहीं’’। इस कविता में एक पुत्री द्वारा अपने पिता के मरणोपरांत उन्हें पत्र लिखने और उन तक न पहुंच पाने की पीड़ा है। यह एक शाश्वत पीड़ा है जो प्रत्येक संतान को कभी न कभी अनुभव करनी ही पड़ती है-
पापा जब से गए, एक ख़त लिखा था उनको,
लगता है अभी तक वो उन तक पहुँचा ही नहीं।
हाल दिल के हमेशा की तरह खोल कर लिख दिए,
सवालों के जवाब चाहने वाला एक ख़त लिखा था मैंने।

डॉ आराधना की कविताओं पर मनोविज्ञानी डॉ. छाया श्रीवास्तव ने संग्रह को ‘‘जीवन के विविध रंगों का एक सजीव दस्तावेज’’ कहा है। वहीं महाराजा छत्रसाल बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय छतरपुर की हिन्दी प्रोफेसर डॉ. श्रीमती गायत्री वाजपेयी नं संग्रह को ‘‘संस्कृति की धरोहरः भावों का महकता मधुवन’’ करार दिया है। उन्होंने लिखा है कि ‘‘ये कविताएँ सिर्फ कविताएँ नहीं हैं, बल्कि जीवन के उतार- चढ़ाव,रिश्ते, आत्मीयता, सामाजिक संवेदनाओं और भावनाओं का सुंदर समन्वय हैं।’’

संग्रह के आरंभ में कवयित्री की मातुश्री श्रीमती चंद्रकांता सिंह का भी ‘‘आशीर्वचन’’ है। वे लिखती हैं कि ‘‘मेरी बेटी आराधना बचपन से ही बहुमुखी प्रतिभा की धनी रही है। उनका यह दूसरा काव्य संग्रह प्रकाशित हो रहा है, जिसमें उन्होंने दिल से निकले हुए अपने भावों को बड़ी गहराई और सुंदरता से व्यक्त किया है।’’
मां ही तो वह प्रथम शिक्षिका होती है जो अपनी बेटी को संस्कार एवं संस्कृति सिखाती है। फिर ऐसी बेटी की कलम से जब कविता फूटती है तो वही भाव कविता का आकार लेते हैं जो डॉ आराधना की कविता ‘‘रिवाज और संस्कृति’’ में हैं-
रिवाजों पर चल कर, हमने बड़ों के पैर छूना सीखा,
आशीर्वाद बहुत मिला, आया सम्मान देने का सलीका,
रिवाजों से सीख कर, हम दिया बाती करते,
मंदिर की घंटियाँ और नगाड़ों की गूंज सुनते।

एक और कविता है जो कवयित्री की संवेदनाओं को बखूबी मुखर करती है- ‘‘बेटी का हॉस्टल जाना’’। यूं तो यह एक सामान्य-सी घटना है कि पढ़ाई के लिए बेटी को दूसरे शहर भेजना पड़ता है और उसे हॉस्टल में रहना पड़ता है किन्तु इस घटना के पीछे छिपी रहती है गहरी वेदना जिसे मां का हृदय अनुभव कर के व्याकुल होने लगता है। कविता की कुछ पंक्तियां देखिए-
तुम हॉस्टल गई रानी बेटी,
बिखरे तुम्हारे पेन और कॉपी,
तुम्हारी किताबें जगह जगह,
याद दिलातीं तुम्हारी।
आधे खाये हुए चिप्स का पैकेट,
मैगी भी कुछ तनहा सी,
ईयर फोन्स तुम छोड़ गई....

डॉ. आराधना सिंह बुंदेला की कविताएं छंदबद्ध नहीं हैं किन्तु उनमें एक छांदासिक प्रवाह है जो पाठक को अपने साथ बहा ले जाने में सक्षम है। उनका हिन्दी का शब्द ज्ञान समृद्ध है। वे भावानुसार सटीक शब्दों का चयन करती हैं। उन्हें पता है कि कहां व्यंजनात्मक होना है और कहां कोमल संवाद करना है। भौतिक विज्ञानी स्टीफन हॉकिंग ने सही कहा था कि ‘‘हम विज्ञान में जितना आगे बढ़ते हैं, संस्कृति के उतने निकट होते जाते हैं।’’ डॉ. आराधना सिंह बुंदेला चिकित्सा विज्ञान में जितनी माहिर हैं उतनी ही सांस्कृतिक रुझान रखती है और यह तथ्य उनके इस नवीनतम संग्रह ‘‘संस्कृति की धरोहर’’ की प्रत्येक कविता में महसूस की जा सकती है। संग्रह की सभी कविताएं पठनीय हैं तथा अप्रत्यक्ष रूप से जीवन जीने की कला सिखा जाती हैं।
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Tuesday, April 21, 2026

पुस्तक समीक्षा | जीवंत कहानियों का संग्रह है “उस बहार का इंतज़ार” | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
जीवंत कहानियों का संग्रह है  “उस बहार का इंतज़ार”
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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कहानी संग्रह - उस बहार का इंतज़ार
लेखिका - उर्मिला शिरीष
प्रकाशक - वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नयी दिल्ली-110002
मूल्य - 400/-
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उर्मिला शिरीष हिंदी कथा जगत की वे वरिष्ठ कथाकार है जिन्हें लंबी कहानियों में तारतम्य बनाए रखने की महारत हासिल है। मैंने उनके अधिकांश उपन्यास और कहानियां पढ़ी हैं। उनकी हर कहानी का कथानक अपने आसपास का होता हुआ महसूस होकर भी चौंकाता है, अनूठा लगता है। कम पात्रों के होते हुए कहानी को हजारों शब्दों में साधना आसान काम नहीं है। कई बार कहानी के प्रवाह में ढीलापन आने की संभावना रहती है और जहां ढीलापन आ जाए वहां कथानक का तारतम्य में टूट जाता है। किन्तु उर्मिला शिरीष की हर कहानी कसी हुई रहती है। कहीं कोई भटकाव नहीं, कहीं कोई शिथिलता नहीं। हर पात्र इतना जीवंत कि अपने आसपास उनकी मौजूदगी महसूस की जा सकती है। उर्मिला जी अपनी कहानियों में मनोवैज्ञानिक विश्लेषण जिस खूबसूरती से करती हैं वह किसी कशीदाकारी से काम नहीं है। ये सारी खूबियां उनके कहानी संग्रह ‘‘उस बहार का इंतजार’’ की कहानियों में देखी जा सकती है।
उर्मिला शिरीष के रचना कर्म में शामिल हैं उनके चौदह कहानी संग्रह, पाँच कहानी संग्रहों तथा सात अन्य पुस्तकों का सम्पादन। तीन उपन्यास। एक साक्षात्कार, एक आलोचना तथा एक जीवनी (गोविन्द मिश्र) की पुस्तक। उर्मिला शिरीष की श्रेष्ठ कहानियाँ, लोकप्रिय कहानियाँ, ग्यारह लम्बी कहानियाँ, चयनित कहानियाँ, दस प्रतिनिधि कहानियाँ आदि संकलित। मेरे साक्षात्कार । देश के विभिन्न भाषाओं में उनकी कहानियों और उपन्यासों का अनुवाद प्रकाशित हो चुका है। वे हिंदी की प्रतिष्ठित कथाकार हैं।
आधुनिक हिंदी कहानियां  यथार्थवाद, मनोवैज्ञानिक गहराई, महानगरीय बोध, और बदलते सामाजिक मूल्यों को प्रमुखता से दर्शाती हैं। ये कहानियां आम जनजीवन, महानगरीय एकाकीपन, स्त्री-पुरुष संबंधों में जटिलता, भ्रष्टाचार और मध्यवर्गीय चेतना को यथार्थवादी दृष्टिकोण से प्रस्तुत करती हैं। उर्मिला शिरीष की कहानी आधुनिक हिंदी कहानी की प्रवृत्तियां का बखूबी पोषण करती हैं। उनकी कहानियों में पात्रों के आंतरिक द्वंद्व, अवचेतन मन और मानसिक उलझनों का सूक्ष्म चित्रण मिलता है। संयुक्त परिवार का टूटना, पीढ़ीगत संघर्ष (जेनरेशन गैप) और उपभोगवादी संस्कृति का प्रभाव का विश्लेषणात्मक पक्ष उनकी कहानियों में देखा जा सकता है। सरल, सहज आम बोलचाल की भाषा उनकी कहानियां को और अधिक आकर्षक बना देती है।
‘‘उस बहार का इंतजार’’ कहानी संग्रह में कुल ग्यारह कहानियां हैं। हर कहानी का शेड अलग है। संग्रह की पहली कहानी ‘‘चींटियों की रेस’’ उस भ्रम को तोड़ती है कि जहां धन-दौलत है वहां खुशियां और सुकून हैं। सुकून पाने के लिए कुछ कठोर निर्णय लेने जरूरी होते हंै। कहानी की नायिका सुजाता ऐसे ही कठोर निर्णय के दौर से गुजरती है जिसके आगे उसकी सुख शांति का घर हो सकता है लेकिन अब तक वह जहां थी वहां उपेक्षा की अतिरिक्त और कुछ नहीं था। यह कहानी एक तलाकशुदा स्त्री की कहानी है जो यथार्थ की कई परतें खोलती है। परिस्थितियों का खुलासा, परिवार के सदस्यों का असंतुलित व्यवहार और मानसिक अंतर्द्वंद का प्रभावी चित्रण इस कहानी की विशेषता है।
दूसरी कहानी है ‘‘बिंजो माय फ्रेंड’’। ये कहानी आज के यथार्थ को पूरी मार्मिकता से बयान करती है। इस कहानी में लगभग हर दूसरे या तीसरे घर की त्रासदी मौजूद है जहां गहरे अंधेरे की भांति अकेलापन है। बच्चों के पास जाकर न बसने की ज़िद और फिर अलगाव की सीमा तक टूटती संबंधों की डोर बेजुबान पशुओं में अपनापा ढूंढने लगती है। एक निर्मम, कठोर, कड़वा सच। किसी के भी अंतर्मन को झकझोरने में सक्षम है यह कहानी।
तीसरी कहानी है ‘‘नाच, कठपुतली’’। ‘कठपुतली’ शब्द अपने आप में विवशता का प्रतीक है। न चाहते हुए भी दूसरों के अनुसार जिंदगी जीने का प्रतीक है। कभी जीवन कठपुतली की तरह नचाने लगता है तो कभी लोगों का व्यवहार, उनकी मंशा, उनकी लालसाएं दूसरों को कठपुतली बनाने के लिए प्रेरित करने लगती है, अब यह उस दूसरे व्यक्ति पर निर्भर रहता है कि वह कठपुतली बनना चाहता है या अपने स्वाभिमान के साथ अडिग खड़ा रहना चाहता है। कहते हैं न कि मन के हारे हार है। यह कहानी अदिति नाम की स्त्री के जीवन संघर्ष की कहानी है जिसे परिस्थितियां कठपुतली की तरह नाचना चाहती हैं लेकिन उसके भीतर की जिजीविषा उसे न झुकने का हौसला देती है।
चौथी कहानी है ‘‘हरा पत्ता’’। यह कहानी विदेश में बस गए बेटे-बेटियों के पास जाने के लिए ग्रीन कार्ड हासिल करने की जद्दोजहद का खुलासा करती है। एक मायावी संजाल ही तो है ग्रीन कार्ड, जिसके मोह से बाहर निकलना कठिन है, लेकिन जिसकी वास्तविकता समझने के बाद धुंधला पड़ने लगता है मोह और तब शुरू होता है एक गाढ़ा अंतर्द्वंद। विदेश में बसी संतानों के पास जाने के लिए स्वर्ग द्वार के समान ग्रीन कार्ड पाने का मोह छोड़ना क्या संभव है? यह कहानी मनष्चेतना की आंखें खोलती है और एक नई संभावना सामने रखती है।
संग्रह की पांचवी कहानी है ‘‘मंदिर और कुआं’’ जिसका कथानक ग्रामीण परिवेश में पंच, सरपंच, पंचायत, मंदिर, कुआं आदि से सरोकार रखता हुआ गांव में आते जा रहे परिवर्तन को भी रेखांकित करता है। परंपराओं में होने वाला परिवर्तन मनुष्य के स्वभाव को भी परिवर्तित करने लगता है। परंपरा और आधुनिकता के बीच का द्वंद एक धुनकी की भांति मनुष्य को धुनने लगता है।
‘‘पराजय का समीकरण’’, ‘पीपल का पेड़‘‘, ‘‘विदा होती बेटियों की माँ‘‘, ‘‘लड़कियों की हँसी‘‘ और ‘‘ऑनस्क्रीन‘‘ कथन को की विविधता और पात्रों की मनोदशा को सामने रखने वाली कहानी है, जिनमें संवेदना, संवेग, सौजन्यता, परंपराएं, आधुनिकता एवं मूल्य बोध के विभिन्न रंग समय हुए हैं। यह सभी कहानियां मनुष्य के चरित्र विश्लेषण का रोचक आख्यान गढ़ती हैं।
संग्रह की अंतिम कहानी है ‘‘उस बहार का इन्तज़ार’’। दो संस्कृतियों के बीच उसे अंतर को व्यक्त करती है जो पारस्परिक संवेदनाओं एवं पारिवारिक गठन पर आधारित है। भारतीय संस्कृति में रिश्ते बहुत मायने रखते हैं, वही पाश्चात्य संस्कृति में रिश्तों का अर्थ व्यक्तिगत इच्छाएं मात्र होती हैं। जब वही पाश्चात्य भारतीय संस्कृति के संपर्क में आता है तो उसे संबंधों की महत्ता का भान होने लगता है। स्मिथ और संहिता के रूप में लेखिका ने तो विविध संस्कृतियों के जीवन पर प्रभाव को अपने कथानक में बखूबी पिरोया है। यह कहानी मानवीय मूल्यों को स्थापित करती हुई भारतीय संस्कृति एवं परंपराओं को भी पुनर्स्थापना देती है।
‘‘उस बहार का इंतज़ार’’ उर्मिला शिरीष
की कहानियों का वह संग्रह है जो पाठकों को उनके कथा- कौशल के और अधिक निकट ले जाने में सक्षम है। इस संग्रह की प्रत्येक कहानी पठनीय हैं तथा रोचकता के साथ आत्म मंथन को विवश करती हैं।
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Tuesday, April 14, 2026

पुस्तक समीक्षा | जेंडर डिस्कोर्स की रोशनाई वाला विशेषांक और नए कानूनों की रोशनी | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
जेंडर डिस्कोर्स की रोशनाई वाला विशेषांक और नए कानूनों की रोशनी
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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विशेषांक - समय के साखी (जेंडर डिस्कोर्स पर केंद्रित)
संपादक - आरतीे
प्रकाशक - संपादकीय कार्यालय, 701, अन्नपूर्णा परिसर, पीएण्डटी चौराहा के पास, भोपाल (म.प्र.) 462003
मूल्य - 300/-
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         आरती जी के संपादन में प्रकाशित होने वाली पत्रिका “समय के साखी” का 57 वां अंक सागर के वरिष्ठ कवि वीरेंद्र प्रधान जी के सौजन्य से मुझे प्राप्त हुआ। वस्तुतः यह अंक सामान्य अंक न होकर विशेषांक है और वह भी जेंडर डिस्कोर्स पर। यह एक ऐसा विषय है जिस पर सभी को गंभीरता से चिंतन करने की आवश्यकता है। विशेष रूप से अब, जब जेंडर को लेकर नए अधिनियम आकार ले रहे हैं। वीरेंद्र प्रधान जी ने “समय के साखी” पत्रिका का जेंडर डिस्कोर्स विशेषांक इस आग्रह के साथ दिया कि मैं इस विशेषांक के संबंध में कुछ समीक्षात्मक लिखूं। चूंकि जब मैं सामयिक प्रकाशन की साहित्यिक पत्रिका “साहित्य सरस्वती’’ (नई दिल्ली) की कार्यकारी संपादक थी तब पत्रिका के संपादक महेश भारद्वाज जी के निर्देशन में थर्ड जेंडर विमर्श विशेषांक प्रकाशित किया गया था। बाद में विशेषांक की सामग्री के अलावा कुछ और विद्वानों से लेख आमंत्रित करके कलेवर को “थर्ड जेंडर विमर्श” पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया गया। ताकि शोधार्थियों एवं जेंडर डिस्कोर्स में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए विशेष एवं तार्किक जानकारी एक ही ज़िल्द में उपलब्ध हो सके। जहां तक स्त्री विमर्श का सवाल है तो मेरा लेखन एवं सामयिक प्रकाशन का मुख्य प्रकाशन स्त्री विमर्श पर ही केंद्रित रहा है। इसलिए ‘‘समय के साखी’’ पत्रिका का जेंडर डिस्कोर्स विशेषांक मेरे लिए दिलचस्प का विषय था। फिर भाई वीरेंद्र प्रधान जी का आग्रह भी था। परिणामतः मैंने विशेषांक को एकाग्रचित्त हो कर आद्योपांत पढ़ा। विशेषांक में स्त्री विमर्श और ट्रांसजेंडर विमर्श दोनों मौजूद हैं। मुझे भी लगा कि इस पर अवश्य लिखा जाना चाहिए।
   दिलचस्प बात यह है की ट्रांसजेंडर को लेकर विगत दिनों अधिनियम 2026 पर बड़ा बवाल मचा। ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026, 2019 के कानून को बदलकर पहचान के लिए स्व-घोषणा की जगह मेडिकल सर्टिफिकेट अनिवार्य किय गया है। इस प्रस्तावित बदलाव का ट्रांसजेंडर समुदाय विरोध कर रहा है क्योंकि उनका मानना है कि यह आत्म-निर्णय के अधिकार को सीमित करता है। यह बिल 13 मार्च 2026 को पेश किया गया था। यह कानून 2014 के ‘‘नालसा’’ (नेशनल लीगल सर्विसेस अथरिटी) फैसले का उल्लंघन माना जा रहा है, जिसने पहचान के स्व-निर्धारण को मान्यता दी थी। समुदाय द्वारा ‘‘काला कानून’’ कह कर इसे आत्म-सम्मान के खिलाफ भी कहा गया। वही दूसरा विषय है स्त्रियों के अधिकारों का ‘‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’’ (106वां संवैधानिक संशोधन) के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में लागू किया जाना है। प्रधानमंत्री मोदी के अनुसार, इस कानून का लाभ 2029 के लोकसभा चुनाव से मिलना शुरू हो सकता है। यह कितने प्रतिशत महिलाओं को सशक्त बना सकेगा यह तो भविष्य ही बताएगा किंतु इससे महिलाओं की सभी सहभागिता राजनीति में बढ़ेगी।
    स्त्री विमर्श और ट्रांसजेंडर विमर्श यह दोनों विषय विशेषांक में शामिल हैं। इन पर विद्वानों ने अपनी अपनी राय दी है। देखा जाए तो 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में महिला जनसंख्या लगभग 58.64 करोड़ (कुल जनसंख्या का 48.5 प्रतिशत) थी। 2021 में 1000 पुरुषों पर 1020 महिलाएं थीं, जबकि शहरी क्षेत्रों 985 पाया गया है। वहीं, सन 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की आधिकारिक संख्या 4.88 लाख थी। हालांकि, कार्यकर्ता और विभिन्न अनुमान बताते हैं कि सामाजिक कलंक और पहचान के मुद्दों के कारण वास्तविक संख्या इससे 6-7 गुना अधिक हो सकती है। सटीक सरकारी आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं।
विशेषांक में समाज में जेंडर के अनुपात, उनकी स्थितियों एवं उनके जीवन की प्रगति की संभावनाओं पर विचार किया गया है। जो आलेख इसमें शामिल किए गए हैं वे हैं- बंदीगृह की औरतें और खामोशी का विमर्श- प्रज्ञा जोशी, जिंदा कौमों की मुर्दा दास्तान- नाइश हसन, वे बहादुर स्त्रियाँ- हिन्दी कहानी में घुमंतू समुदाय, स्त्री और पुलिस- रमाशंकर सिंह,  ट्रांसजेंडर और समाज मनोवैज्ञानिक समझ की जरूरत- अब्दुल रहीम ‘‘चंदा’’, दलित स्त्री का ‘अन्य’ आत्मकथा-संदर्भ- डॉ. बजरंग बिहारी तिवारी, इकोफेमिनिज्म: स्त्री और प्रकृति का पक्षधर-सुरेश तोमर, राष्ट्रवादी उन्माद के दौर में मुस्लिम स्त्री - समीना खान, संघर्ष से कामयाबी तक का लंबा सफर- सुमित पी.वी., पितृसत्ता: विचारधारा-आलोचना के नए आयाम- ईश्वर सिंह दोस्त, समकालीन भारतीय स्त्री आंदोलन- अवंतिका शुक्ला।
आलेखों के साथ ही दो वर्ताएं -‘‘बातचीत-एक’’ तथा ‘‘बातचीत-दो’’ हैं। जिनमें ‘‘बातचीत-एक’’ में सविता सिंह, सीमा आजाद, रेखा सेठी, रेखा कस्तवार, संजीव चंदन के विचार हैं तथा ‘‘बातचीत-दो’’ में वंदना चौबे, जितेन्द्र विसारिया, अनुपम सिंह एवं नेहा नरूका के विचार हैं। 
‘‘लेखा-जोखा’’ के अंतर्गत ‘‘कुछ पहाड़ लाँधे हैं, अभी बाकी हैं बहुत....’’ शीर्षक से सुधा अरोड़ा के ज़मीनी विचार हैं। इसके साथ ही ‘‘प्रसंग: आलोचना’’ के अंतर्गत माया मिश्र ने लिखा है ‘‘स्त्री रचनात्मकता: किताबों के आलोक में’’।
लेखक रामशंकर सिंह का यह कथन ध्यान देने योग्य है-‘‘पितृसत्तात्मक परिवारों में महिलाओं को अपना ताबेदार बनाया और इस ताबेदारी को लिखने की प्रक्रिया से और ताकत मिली। सब कुछ लिख दिया गया- कौन स्वामी, कौन सेवक, किसको किस जगह पर रखा जाना है- यह सब लिखा गया। उन समाजों में जहाँ लेखन कला नहीं थी, वहाँ ‘परम्परा के भीतर’ स्त्रियों की ताबेदारी को सुरक्षित रखा गया। यह अनायास नहीं था कि मानवविज्ञानी लेवी स्ट्रॉस को कहना पड़ा कि एक केंद्रीकृत, पदानुक्रमित राज्य अपने आपको पुनरुत्पादित करने के लिए लेखन कला का प्रयोग करता है...। लेखन एक अजीब चीज है...। एकमात्र घटना जो इसके साथ हमेशा जुड़ी रही है, वह है शहरों और साम्राज्यों का निर्माण राजनीतिक व्यवस्था में एकीकरण, अर्थात् बड़ी संख्या में व्यक्तियों का जातियों और वर्गों के पदानुक्रम में एकीकरण। यह मानवजाति के ज्ञानोदय की अपेक्षा शोषण को ही बढ़ावा देने के लिए प्रतीत होता है।’ वास्तव में पहले परम्परा और बाद में लिखित संहिताओं में स्त्रियों के लिए ताबेदारी की इबारतें तैयार की गई। इसे आप अनुभवमूलक तरीके से उस समय लक्षित कर सकते हैं, जब कहा जाता है कि ‘ऐसा हमारे ग्रंथों में कहा गया है’ ‘हमारी परम्परा में ऐसा है’ या ‘हमारे यहाँ तो ऐसा था।’ इन सारे तर्कों में लेखन कला, समाज का वर्चस्वशाली सांस्कृतिक तंत्र और राज्य भूमिका निभाते हैं।’’
सक्रिय समाजसेवी, लेखिका एवं स्त्री अधिकारों की पैरोकार सुधा आरोड़ा ने स्त्रीमुक्ति - ‘‘कुछ भ्रांतियाँ और सुझाव’’ शीर्षक से स्त्री विमर्श के स्वरूप की बारीकी से व्याख्या की है। उन्होंने लिखा है कि ‘‘स्त्री विमर्श दरअसल पितृसत्ता, सम्पत्ति में भागीदारी और राजनीतिक तथा सांस्कृतिक रूप से स्त्रियों की बराबरी और सम्मान का मुद्दा है। भारत में स्त्री का अस्तित्ववादी संघर्ष बहुत पुराना है। बौद्धकाल से लेकर वैदिक काल और मध्यकाल तक इसके अनेक उदाहरण भरे पड़े हैं। गार्गी, मैत्रेयी, अपाला, घोषा, लोपा, अनेक थेरियों सहित सारन्धा, अहिल्याबाई से लेकर रजिया सुल्तान तक हम एक परंपरा देख सकते हैं कि स्त्रियों ने सोच और सत्ता दोनों ही स्तरों पर संघर्ष किया। मीराबाई, अक्क महादेवी, ललद्यद, जनाबाई और बहिणा बाई दर्जनों नाम हैं। लेकिन दुर्भाग्य से भारत में इन सबके द्वारा उठाए गए प्रश्नों को जोड़कर स्त्री मुक्ति का एक वृहद पाठ तैयार नहीं किया जा सका इसलिये लिंगभेद के खिलाफ भारत में संघर्ष की परंपरा को बल न मिल सका।’’  सुधा आरोड़ा ने आगे लिखा है कि ‘‘स्त्रियों में बदलाव आया पर इस बदलाव के लिये हमारा समाज तैयार नहीं है। उन्होंने घर की चहारदीवारी के साथ अर्थ उपार्जन में भी हाथ बंटाया पर यह दोहरी जिम्मेदारी भी उसे अपना सम्मान दिलाने में नाकाम रही। दिक्कत यह है कि स्त्री की दशा में सुधार, समाज और पुरुषों की मानसिकता को बदले बिना नहीं हो सकता और समाज पुरुषसत्तात्मक है और आंदोलनकारी स्त्रियों की जमात को पीछे धकेलने में पुरुषों का ही नहीं, पुरुष सोच वाली महिलाओं का भी बहुत बड़ा हाथ है। यह एक अलग मुद्दा है।’’
ट्रांसजेंडर की जब बात आती है तो भारत के प्ररिप्रेक्ष्य में वह और अधिक जटिल हो जाती है। सच तो ये है कि आज भी यहां लोग ट्रांसजेंडर की जैविक विविधता को नहीं जानते और समझते हैं। उनके लिए एक ट्रांसजेंडर मात्र ट्रांसजेंडर होता है, नाच-गा कर नेग के पैसे मांगने वाला समुदाय। इस संदर्भ में अब्दुल रहीम ‘‘चंदा’’ का लेख ‘‘ट्रांसजेंडर और समाज: मनोवैज्ञानिक समझ की जरूरत’’ बहुत महत्वपूर्ण है। उन्होंने लिखा है कि ‘‘ट्रांस जेंडर शब्द को लेकर समाज के आम लोग अक्सर भ्रम की स्तिथि में होते हैं। वे ट्रांस जेंडर केवल उन्हें समझते हैं जो किन्नर के रूप में नाच-गाकर बधाई माँगने का काम करते हैं। जबकि ऐसा नहीं है। ट्रांस जेंडर में वे सभी व्यक्ति आते हैं जिनका जन्म से प्राप्त लिंग उनके मनोवैज्ञानिक लिंग अर्थात जेंडर से मेल नहीं खाता। उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति का जन्म एक पुरुष के रूप में हुआ लेकिन वह व्यक्ति जेंडर से खुद को एक स्त्री महसूस करता है या एक स्त्री शरीर में जन्मा व्यक्ति खुद को पुरुष अनुभव करता है। अर्थात जिन व्यक्तियों की लैंगिक पहचान जन्म के समय निर्धारित लिंग से मेल नहीं खाती ऐसे सभी व्यक्ति ट्रांस जेंडर होते हैं। ट्रांस जेंडर में अलग अलग श्रेणियों के लोग सम्मिलित हैं।’’ उन्होंने ट्रांस महिला, ट्रांस पुरुष, इंटर सेक्स, ट्रांस सेक्सुअल  में बायोलाॅजिकल अंतर बताते हुए ‘‘हिजड़ा या किन्नर’’ को भी स्पष्ट किया है। उन्होंने लिखा है कि ‘‘हिजड़ा शब्द अरबी भाषा के हिज से बना है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है विछोह, विरह या छोड़ देना। वैसे हिजड़ा या किन्नर अपने आप मे कोई जेंडर नहीं। यह एक गुरु-शिष्य आधारित परम्परा है। जो परंपरा सदियों पुरानी है। वर्तमान में यह परम्परा भारत, पाकिस्तान, नेपाल और बंग्लादेश में है, इस परम्परा को केवल ट्रांस महिलाएँ ही आगे बढ़ाती हैं।’’
यहां उल्लेखनीय है कि अब्दुल रहीम ‘‘चंदा’’ स्वयं ट्रांसजेंडर समुदाय से हैं। उन्होंने एमकॉम, एमए (भारतीय शास्त्रीय संगीत में) जबलपुर से किया है। वे कई वर्षों तक किन्नर डेरे में रहीं। 2007 में डेरा छोड़ कर ट्रांस जेंडर अधिकारों पर एक कार्यकर्ता के रूप में में काम की शुरुआत की। 2011 में ‘‘अस्मान फाउंडेशन’’ नाम से समुदाय आधारित संगठन की स्थापना की जो वर्तमान में ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों पर कार्य कर रहा है। वे सामाजिक न्याय विभाग द्वारा गठित जिला किन्नर कल्याण बोर्ड में समुदाय की प्रतिनिधि सदस्य भी हैं। उन्होंने कविताएं एवं ग़ज़लें भी लिखी हैं। देखा जाए तो वे अपने समुदाय की एक बौद्धिक प्रतिनिधि हैं। इस विशेषांक में उनका लेख ट्रांसजेंडर समुदाय की स्थिति को आधिकारिक रूप से सामने रखता है।
जैसाकि ‘‘समय के साखी’’ की संपादक आरती ने लिखा है-‘‘विशेषांक में बातचीत के दो भाग वरिष्ठ और युवा साथियों के साथ अलग-अलग रखकर, खासतौर पर चार दशक के स्त्री चिंतन, चुनौतियों और अभी तक के हासिल को समझने की कोशिश की गई है। उससे भी ज्यादा जरूरी है कि जो लोग लगातार जेंडर जस्टिस पर काम करते आए हैं, उनके विचारों की समानता और विभिन्नता को जाना जा सके।’’ इस दृष्टि से ‘‘समय के साखी’’ का यह ट्रांसजेंडर डिस्कोर्स विशेषांक पठनीय होने के साथ-साथ संग्रहणीय भी है तथा शोधार्थियों के लिए तो बेहद उपयोगी है।    
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