पुस्तक समीक्षा
इतिहास संबंधी अनेक भ्रम दूर करने में सक्षम है पुस्तक “छत्रसाल वंशावली”
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक - छत्रसाल वंशावली
लेखक - सन्तोष कुमार पटैरिया
प्रकाशक - शतरंग प्रकाशन एस-43, विकासदीप बिल्डिंग, द्वितीय तल, स्टेशन रोड, लखनऊ-226001
मूल्य - 200/-
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बुंदेलखंड का अपना एक गौरवशाली इतिहास है जिसमें महाराज छत्रसाल का उल्लेख स्वर्ण अक्षरों में किया जाता है। समूचे बुंदेलखंड में महाराज छत्रसाल का मान सम्मान आज भी बरकरार है। इसीलिए महाराज छत्रसाल के व्यक्तित्व एवं कार्यों को लेकर जब कोई विवाद की स्थिति निर्मित की जाती है तो बुंदेलखंड के जनमानस को गहरी ठेस पहुंचती है। ऐसी स्थिति में महाराज छत्रसाल के संबंध में उत्पन्न किए गए भ्रम का निवारण आवश्यक हो जाता है और इस प्रकार के अनेक भ्रम का निवारण करने वाली पुस्तक है “छत्रसाल वंशावली”। जो इसी वर्ष 2026 में प्रकाशित हुई है।
28 अगस्त 1958 को जन्में उत्तर प्रदेश महोबा के संतोष कुमार पटैरिया संस्कृत विषय में एम.ए. तथा ‘विद्या वाचस्पति’ की उपाधि प्राप्त हैं। उन्हें हिन्दुस्तानी अकेडमी प्रयागराज उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा बुन्देली अकादमी सम्मान 2025 से, हिन्दुस्तानी अकेडमी प्रयागराज उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा बुन्देली अकादमी सम्मान 2025 से सम्मानित किया जा चुका है। अभी तक ‘जय पीपल देव’, ‘लोक कवि ईसुरी’, उ.प्र. का स्वतंत्रता संग्राम महोबा, ‘आल्हा समर सारावली’ कृति प्रकाशित हो चुकी हैं। “छत्रसाल वंशावली” उनकी नवीनतम कृति है। यह गहन शोधपरक एवं इतिहास को उसके वास्तविक रूप में सामने रखने के उद्देश्य से लिखी गई है।
इस कृति की आधार सामग्री के संबंध में संतोष कुमार पटैरिया ने भूमिका में लिखा है कि - “यह पाण्डुलिपि चरखारी के श्री देवनंदन तिवारी के माध्यम से प्राप्त हुई है। इसमें 19 रानियों और अधिकतम सभी सन्तानों का विवरण है। सम्वत् 1962 (सन् 1905) में श्री दरयाव सिंह जैवार द्वारा लिखी इस पाण्डुलिपि की विशेषता है कि इसमें निःसंतान रानियां, गोद लिये बच्चे और छत्रसाल के अतिरिक्त उनके पुत्रों के वैवाहिक संबंधों को भी लिखा गया है। मेरे पुस्तकालय में जो भी ग्रन्थ उपलब्ध थे उनमें निहित रानियों और पुत्रों के नाम ग्रन्थ के संन्दर्भ के साथ दिये गये हैं जिससे इतिहासकारों को तुलना करने में सुविधा रहेगी। तालव्य श का प्रयोग नहीं किया जाता था किन्तु मैंने नामों के शुद्ध अक्षर लिखे हैं जहाँ शब्द पठनीय नहीं हो सका वहां--रेखा खींच दी है। राजा छत्रसाल के पुरातात्विक साक्ष्य बहुत हैं। बुंदेलाकालीन स्मारकों मंदिर आदि की पहचान यह है कि गुम्बद के नीचे उल्टे और सीधे कमल बने हैं ज्ञातव्य है कि बुन्देलखण्ड में नीले कमल होते थे जिन्हें जयपुर राजघरानों में भेजा जाता था। नीलकमल को पुण्डरीक कहते हैं। मैं तपः पुरुष श्री गोविन्द सिंह बुन्देला, दीवान प्रतिपाल सिंह कृत बुन्देलखण्ड का इतिहास के सम्पादक डॉ. बहादुर सिंह परमार, शतरंग प्रकाशन, लखनऊ के प्रति हार्दिक आभारी हूँ। पुस्तक में श्री भगवान दास गुप्त की कृति का पत्र लिया गया है।”
बुंदेली संस्कृति के अध्येयता एवं महाराजा छत्रसाल बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, छतरपुर के प्रो. बहादुर सिंह परमार ने हमेशा बुंदेली संस्कृति एवं इतिहास पर शोध कार्य को बढ़ावा दिया है। वह स्वयं भी उन पांडुलिपियों को ढूंढते रहते हैं जो किसी कारणवश प्रकाशित नहीं हो पाई किंतु उनमें महत्वपूर्ण लेखन किया गया है। ऐसी पांडुलिपियों को ढूंढ कर वे स्वयं प्रकाशित करवाने का कार्य भी करते हैं। प्रो. बहादुर सिंह परमार ने पुस्तक में अपनी सम्मति देते हुए लिखा है कि - “बुन्देलखंड केशरी महाराजा छत्रसाल एक ऐसे व्यक्तित्व हैं जिनसे प्रेरणा ग्रहण कर न्याय, संघर्ष, सर्वधर्म समभाव के साथ अपने धर्म के प्रति गहन आस्था सीखी जाती है जिन्होंने आततायी सत्ता के विरुद्ध संघर्ष कर स्वराज्य की भावना वीर शिवाजी से सीख लेकर अपनायी। इनके बारे में तथाकथित लोग अनेक लोक-श्रुतियाँ बताते हैं। खासतौर पर उनकी संतानों और रानियों के बारे में। उनके समकालीन परिस्थितियों को नजर अंदाज कर आज के परिवेश से सोचते हैं जो न्याय संगत नहीं है। सोशल मीडिया पर महोबा के आदरणीय संतोष पटैरिया ने सूचना दी कि उन्हें एक पाण्डुलिपि प्राप्त हुई है जिसमें महाराजा छत्रसाल की सन्तानों तथा रानियों के बारे में विवरण है। मैंने उनसे अनुरोध किया कि इसे प्रकाश में आना चाहिए। उन्होंने इस बात से सहमति व्यक्त की। मैंने उनसे वायदा किया था कि इस कार्य में जो मुझसे सहयोग बनेगा अवश्य करेंगे।”
बुंदेलखंड के पितृपुरुष महाराज छत्रसाल की वंशावली के वास्तविक एवं विस्तृत स्वरूप को इतिहासकारों एवं जिज्ञासु पाठकों के सामने लाने के लिए संतोष कुमार पटैरिया ने चरखारी उत्तर प्रदेश के देवनंदन तिवारी की पांडुलिपि को आधार सामग्री के रूप में ग्रहण करते हुए इस विषय से संबंधित अन्य पुस्तकों का गहन अध्ययन किया, विद्वानों के सहयोग से तथ्यों की सत्यता को परखा तथा इसके उपरांत इस पुस्तक का कलेवर तैयार हुआ। पुस्तक की सामग्री को पांच अध्यायों में प्रस्तुत किया गया है। जिसमें प्रथम अध्याय ‘सम्मति’ तथा दूसरा ‘भूमिका’ का है।
तीसरा अध्याय “पाण्डुलिपि का पाठ (बुन्देली)” का है जिसमें दो पाठ हैं - (अ) पुत्रन को ब्याह तथा
(ब) सरीला, जैतपुर, चरखारी, पन्ना आदि सहित विवरण।
चतुर्थ अध्याय में “महाराज छत्रसाल वंशवृक्ष (हिन्दी)” के अंतर्गत तीन पाठ रखे गए हैं - (अ) पाण्डुलिपि के अनुसार वंशवृक्ष, (ब) बुन्देलों का संक्षिप्त विवरण, तथा (स) विवरण में निहित ग्राम / नगर के नाम।
पंचम अध्याय में अन्य ग्रन्थों में छत्रसाल की रानियों और पुत्रों के विवरण की जानकारी दी गई है।
लेखक संतोष कुमार पटैरिया ने भूमिका में महाराज छत्रसाल के जन्म से संबंधित संक्षिप्त विवरण दिया है। उन्होंने लिखा है कि “वीर छत्रसाल ने लगभग बारह वर्ष की अवस्था में अपने माता पिता खोये थे। चम्पतराय बुन्देला के सारवाहन, अंगदराय, रतन, छत्रसाल और गोपाल पुत्र थे। सन् 1649 में खेलसर में बाकी खाँ द्वारा सारवाहन मारे गये थे। उनके निधन के बाद छत्रसाल का जन्म हुआ था। व्यक्ति के प्रसिद्ध होने पर उसकी जन्मतिथि और बचपन का विवरण खोजा जाता है और फिर कई मत सामने आते हैं इस प्रकार जन्मतिथि ही निश्चित नहीं हो पाती है। लिखने वाले आसपास के काल की घटनाओं को अनदेखी करते हुये अपना मत लिख देते हैं। इम्पीरियल गजेटियर में तो सन् 1643 ई. में छत्रसाल के जन्म का उल्लेख है। छत्रसाल के राजकवि श्री गोरेलाल 'लाल' थे उन्होंने अपनी कृति छत्रप्रकाश में आठवें अध्याय में छत्रसाल के नामकरण के बारे में लिखा है-
ईस नखत अनुरूप अरू, अरथवंत परिनााम। जनम पत्र तातें लिख्यौ, छत्रसाल यह नाम।।
ईस नक्षत्र से शिव के नक्षत्र आर्द्रा से आशय है। छत्रप्रकाश में जन्मतिथि तो दृष्टिगत नहीं हुई है किन्तु यह उल्लेख किया है कि सारवाहन के निधन से दुखी माँ को स्वप्न हुआ था कि मैं आपके यहाँ पुनः जन्म लूँगा। श्री भीखराम शर्मा पन्ना के पास छत्रसाल का जन्मांक था जो जन सामान्य तक पहुँच सका। छत्रसाल की जन्मतिथि सम्वत् 1707 का भी उल्लेख मिलता है। किन्तु लाल कवि ने छत्रसाल की ग्यारहवें वर्ष की अवस्था में चम्पतराय के लालकुंवरि के निधन का उल्लेख किया है।”
महाराज छत्रसाल के निधन के संबंध में लेखक ने भूमिका में ही यह भी जानकारी दी है कि “वैराग्य की ओर अग्रसर छत्रसाल को कुछ लोगों द्वारा मिले तथ्य के आधार पर छत्रसाल सम्वत् 1788 पौष सुदी तृतीया को धुबेला महल की कुछ दूरी पर बने मंदिर में अपना अंगरखा उतारकर अज्ञात स्थान पर चले गये। एक दिन प्रतीक्षा के बाद मंदिर के समीप ही उनकी सांकेतिक अन्त्येष्टि की गई। उसी स्थान पर बाजीराव पेशवा प्रथम द्वारा स्मारक बनवाना आरंभ किया था जो पूर्ण नहीं हो सका। छत्रसाल के प्रस्थान के सोलह वर्षों बाद सम्वत् 1804 में माघ सुदी एकादशी को लगभग 95 वर्ष की अवस्था में भूषण का निधन हुआ था। कृष्णकवि ने तो प्रयागराज के पंडा द्वारा लिखा गया विवरण उद्धृत किया है जिसमें अस्थियां लाने वालों का उल्लेख है। जगतराज के राजकवि हरिकेश थे इन्होंने जगतराज की दिग्विजय काव्य विविध छंदों में लिखा है। चरखारी रियासत द्वारा इस कृति की लीथो मुद्रण पद्धति से 250 प्रतियां प्रकाशित की गई थी। कृति को हिन्दी साहित्य, इतिहास में छत्रप्रकाश के समान स्थान नहीं मिला। इस कृति में चंपतराय, छत्रसाल जगतराज और उनके पुत्रों का विवरण है। चंदेलवंश बनाफर वंश का भी विवरण देते हुए आल्हा ऊदल विषयक इतिहास भी दिया गया है।”
“पाण्डुलिपि का पाठ (बुन्देली)” में बुंदेली बोली में बुंदेलावंश की 19 रानियां का विवरण है। यह अध्याय इस विवरण से आरंभ होता है - “श्री महाराजाधिराज श्रीराजा श्री महाराज छत्रसाल जू देव के बाउन कुंवर कौ हाल वा ब्याहु सादी को हाल लिख्यते ।। महाराज छत्रसाल जू दव की जेठीरानी वेरछा वारे पमार दिमान गुपाल सिंह को बेटी रानी भानकुंवर तिनके महाराजा हिरदेसाह ।।1।।
दूसरी रानी सहरा के धंधरे दिमान हिरदेसाह की बेटी रानी दानकुंवर तिनके महाराजा जगतराज ||2||
तीसरी रानी रामपुरवाले वघेले राजा धनसिंह की बेटी रानी उदेत कुंवर तिनके दिमान नवल सिंह ।।३।।”
अध्याय "पुत्रन को ब्याह" में हिरदेसाह के जन्म से विवरण आरंभ किया गया है -
“महाराजा हिरदेसाह को जन्म सम्वत् 1736 में भयौ और महाराजा हिरदेसाह ब्याहे रीमा (रीवा) वाले बघेले लाल राजाराम रानी विचित्रकुंवर तिनके महाराजा मन्नासिंह ||1 ||
वा. महाराजा प्रथीं सिंह साहगढ़ वाले ||2||
वा दूसरी रानी वरेठीवारे पमार दिमान देवी सिंह की बेटी रानी गंजकदवा । ।३ ।।
तीसरी रानी उदगुवा वारे पमार दिमान जैसिंह की बेटो रानी रामकुंवर तिनके दिमान अमरसिंह मलारा (मलहरा) वारे ।।4। |”
अध्याय “महाराज छत्रसाल वंशवृक्ष” में महाराज छत्रसाल के वंश की रानियों एवं उनकी संतानों का विवरण है। जैसे - “ रानियाँ देवकुँवर, कमलावती के नाम भी मिलते हैं। भानकुँवर पत्नी श्री गोपाल सिंह पमार, बेरछा कृष्णकविकृत बुन्देल भास्कर पृष्ठ 46 के अनुसार भानकुंवर के विवाह की तिथि वैशाख शुक्ल 3 सम्वत् 1621 |
हिरदेशाह जन्म सम्वत् 1736
पहली पत्नी विचित्र कुँवर पुत्री श्री राजाराम बघेल, रीवा के पुत्र मन्ना सिंह और पृथ्वी सिंह शाहगढ़ दूसरी रानी नृपकुँवर पुत्री श्रीदेवी सिंह पमार बरेठी मेदनीमल्ल पहले रूद्रपुर बाद में गंजकदवा तीसरी रानी रामकुँवर पुत्री जौ सिंह पमार, उदगुवाँ अमर सिंह, मलहरा, मनेश कुँवर जाट जाति की, मालम सिंह, लुगासी
छत्रसाल की दूसरी रानी दानकुँवर पुत्री श्री हृदयशाह धंधेरे सहरा के पुत्र जगतराज
तीसरी रानी उदेतकुँवर पुत्री श्री धन सिंह बघेला रामपुरा इनके पुत्र नवल सिंह, भारतीचंद्र
चौथी रानी महाराजकुँवर पुत्री श्री हरि सिंह, धंधेरे, मौहार (निःसंतान)।”
इसी अध्याय में अन्य जाति की रानियां से उत्पन्न पुत्रों का भी उल्लेख किया गया है। अंत में संख्यात्मक जानकारी देते हुए लेखक ने लिखा है- 19 रानियां से 41 पुत्र तथा 11 अन्य रानिया से अर्थात कुल 52 पुत्र।
इसके बाद प्राप्त पांडुलिपि के अनुसार महाराज छत्रसाल का वंश वृक्ष दिया गया है। लेखक ने बुंदेली के धार्मिक प्रतीक और देवताओं का भी संक्षिप्त विवरण दिया है साथ ही पांडुलिपि में मिले ग्राम और नगरों के नाम का उल्लेख किया है।
बुंदेलखंड के इतिहास लेखन में दीवान प्रतिपल से का अभिन्न योगदान है अतः लेखक संतोष कुमार पटेरिया ने दीवान प्रतिपाल सिंह द्वारा लिखित बुंदेलखंड का इतिहास में उद्धृत छत्रसाल की रानियों, रानियां के पिता के नाम, जाति एवं स्थान के नाम की तालिका भी शामिल की है।
इसी क्रम में कृष्ण कवि द्वारा लिखा गया “बुंदेलखंड का इतिहास (पन्ना खण्ड) से उदित जानकारी भी रखी है।
इतिहास के संदर्भ में वर्तमान स्थिति शोध की कमी के कारण आए दिन विवादों से घिरी रहती है। कुछ विवाद फिल्म कारों के द्वारा भी जाने-अनजाने खड़े कर दिए जाते हैं। जैसे फिल्म 'बाजीराव मस्तानी' में महाराज छत्रसाल और मस्तानी के इतिहास को नाटकीय रूप से पेश किया गया है, जिसपर इतिहासकारों और वंशजों द्वारा कई विवाद और आपत्तियां जताई गई। इसमें मस्तानी की उत्पत्ति और पृष्ठभूमि को लेकर विवाद की स्थिति रही। फिल्म और इतिहास में मस्तानी की माता को लेकर मतभेद उत्पन्न हो गया। कुछ इतिहासकार उन्हें महाराज छत्रसाल और उनकी फारसी-मुस्लिम पत्नी (रोहानी बेगम) की पुत्री मानते हैं, जबकि कुछ इसे लेकर अन्य दावे करते हैं। इसके साथ ही फिल्म में दिखाया गया है कि मस्तानी खुद संदेश लेकर बाजीराव के पास जाती हैं और समय रहते बाजीराव आकर युद्ध का पासा पलट देते हैं। वहीं ऐतिहासिक तथ्य बताते हैं कि जैतपुर के युद्ध में बंगश ने छत्रसाल को हरा दिया था और उन्हें नजरबंद कर लिया था, जिसके बाद गुप्त संदेश वाहक (रघुनाथ पंडित) बाजीराव के पास मदद के लिए पहुंचे थे।
ऐसी भ्रामक स्थितियां उत्पन्न हो चुकने के बाद साथ ही जब शोधात्मक पठन-पाठन का चलन काम होता जा रहा है, यह पुस्तक स्पष्ट करती है की महाराज छत्रसाल के वश में कौन-कौन हुए, उनकी कितनी रानियां थी और कितने पुत्र थे। इस प्रकार यह पुस्तक महाराज छत्रसाल से जुड़े कई भ्रम खंडित करती है। यही कारण है जो इस पुस्तक की इतिहास संबंधी उपादेयता को बढ़ा देता है। यह पुस्तक शोधार्थियों तथा बुंदेलखंड के इतिहास एवं छत्रसाल वंशावली में रुचि रखने वालों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। पुस्तक की पृष्ठ संख्या भले ही मात्र 68 है किंतु यह नवीन शोधों को एक मजबूत प्लेटफॉर्म प्रदान करने में सक्षम है।
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