Tuesday, April 28, 2026

पुस्तक समीक्षा | संस्कृति की वास्तविकता के हर पक्ष को रेखांकित करती कविताएं | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा | संस्कृति की वास्तविकता के हर पक्ष को रेखांकित करती कविताएं
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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कविता संग्रह - संस्कृति की धरोहर
कवयित्री- डॉ.आराधना सिंह बुंदेला
प्रकाशक - न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, सी-515, बुद्धनगर, इंद्रपुरी, नई दिल्ली-110012
मूल्य - 350/-
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प्रत्येक रचना में प्रतिबिम्बित होते हैं उसके सृजनकर्ता के विचार, सरोकार एवं भावनाएं। सृजनकर्ता कोई भी हो सकता है किन्तु जब सृजनकर्ता आधुनिक चिकित्सा पद्धति में निपुण एक उच्चकोटि की स्त्रीरोग विशेषज्ञ हो तो उसके अनुभव का दायरा और सरोकार का वलय और बड़ा हो जाता है। आज जिनकी पुस्तक समीक्ष्य है उसकी सृजनकर्ता डॉ. आराधना सिंह बुंदेला वरिष्ठ स्त्री रोग विशेषज्ञ एवं लैप्रोस्कोपिक, रोबोटिक सर्जन हैं इसके साथ ही वे डायरेक्टर आरुण्या क्लिनिक, द कंपेशनेट हेल्थ केयर, नोएडा, एडिशनल डायरेक्टर ऑब्स एंड गाइनी, फोर्टिस हॉस्पिटल, नोएडा हैं। वे नोएडा औबस्टेट्रिक एंड गायनेकोलोजिकल सोसायटी की प्रेसिडेंट (2021-2023) भी रह चुकी हैं। उनकी चिकित्सकीय योग्यता ने उन्हें आधुनिक चिकित्सा के क्षेत्र में एक पहचान दी है। उनके जीवनसाथी डॉ. यशपाल सिंह बुंदेला न्यूरोसर्जन हैं। डॉ. आराधना की सासू मां श्रीमती विमल बुंदेला छतरपुर मध्यप्रदेश की वरिष्ठ कवयित्री हैं। डॉ. आराधना सिंह बुंदेला के इस नवीनतम काव्य संग्रह ‘‘संस्कृति की धरोहर’’ के पूर्व ‘‘गुजरता वक्त ठहरते पल’’ नामक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है।

भारतीय संस्कृति पारिवारिक सौहार्द को प्रमुख मानती है। जब पारिवारिक संचरना स्वस्थ एवं सृदुढ़ होगी तो समाज और राष्ट्र स्वतः सुदृढ़ रहेगा। इस काव्य संग्रह के संदर्भ में इस बात को रेखांकित करते हुए सुखद लग रहा है कि जहां एक ओर आज टीवी धारावाहिक सास-बहू के गलाकाट झगड़ों को दिखा-दिखा कर परिवार में विषबीज बो रहे हैं, वहीं यह काव्य संग्रह पारंपरिक एवं स्वस्थ पारिवारिक संरचना का उम्दा उदाहरण है। इस पुस्तक पर आर्शीवचन लिखा है कवयित्री की सासू मां श्रीमती विमल बुंदेला ने। एक तो सास तथा स्वयं कवयित्री होते हुए भी बिना किसी द्वेष भाव के स्नेहिल टिप्पणी करना तथा अपनी बहू को बेटी समान मानते हुए बढ़ावा देना, हमारे देश के वास्तविक सांस्कृतिक मूल्यों का अनुमोदन करता है। श्रीमती विमल बुंदेला ने लिखा है कि ‘‘संस्कृति की धरोहर - मेरी पुत्रवधू डॉ. आराधना की द्वितीय काव्य कृति है। आदर्श और परंपराओं के प्रति आस्था लिए हुए उनकी कविताएँ नैतिक मूल्यों का निर्वाहन करते हुए चली हैं। उनका काव्य जगत स्वस्थ, सुंदर और निर्मल है। उनकी भावनाएं निर्दाेष और उमंगें स्वच्छ आकाश को छूना चाहती हैं।’’

जब एक स्त्री को अपनों का साथ मिलता है तो वह निश्चित रूप से आसमान छू लेती है। डॉ आराधना बुंदेला की कविताएं समाज के आमआदमी का पक्ष लेती हुई उन सभी विसंगतियों पर चोट करती हैं जिनके कारण व्यवस्थाएं दूषित हो चली हैं। दूसरों के दुख से द्रवित होना ही सृजन के लिए प्रेरित करता है। वे अपने सृजन पर ‘‘कविता बन गई’’ के माध्यम से कहती हैं कि-
मैं कुछ कहने नहीं जा रही थी,
पर कविता बन गई,
कुछ यूँ ही सोचे जा रही थी, और कविता बन गई।
दिल थोड़ा दुखा जिस दिन,
एहसास झिलमिलाये,
शब्दों ने ली अँगड़ाई, और कविता बन गई।

संग्रह की भूमिका लिखते हुए ‘पद्मश्री’ कवि अवध किशोर जड़िया जी ने सही लिखा है कि - ‘‘डॉ. आराधना सिंह शब्दों की मर्मज्ञ और अनुभूतियों की गहन ग्राह्यता रखती हैं। संग्रह में, कर्म कौशल को प्राथमिकता, अध्यात्म को प्रतिष्ठा, और संस्कृति को उपासना का दर्जा दिया गया, यह उनकी स्वभावगत विशेषताएँ हैं।’’

महाराजा छत्रसाल बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, छतरपुर के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. बहादुर सिंह परमार ने संग्रह की रचनाओं पर टिप्पणी की है कि ‘‘यह कविता-संग्रह जीवन अनुभवों से निकला हुआ एक ऐसा ही संग्रह है जो पाठकों को हिम्मत और विश्वास से जीवन के उतार-चढ़ाव में आगे बढ़ने का साहस देगा। ये कविताएँ संस्कारों की एक सुंदर धरोहर या मंजूषा के जैसी हैं, जिसमें विभिन्न जीवन विषयों की भावनात्मक कविताओं का मनभावन समन्वय है।’’

सबसे अच्छी बात यह है कि कवयित्री डॉ आराधना तमाम झंझावातों में भी साहस बनाए रखने का आह्वान करती हैं। वे अपनी कविता ‘‘आशा की किरण’’ में लिखती हैं कि-
जब जब कुछ बिगड़ रहा था,
कहीं न कहीं कुछ सुधर रहा था,
सब टूटता सा लग रहा था,
तब तब कहीं पर कुछ था जो जुड़ रहा था।
दुःख ही दुःख का अंधेरा जब था,
कहीं आशा का दीपक जल रहा था,
आंसुओं की उफनती नदियों में,
तब सब्र का बांध बंध रहा था।

‘‘अंतर्मन की स्फूर्त कविताएँ’’ कहते हुए उज्जैन के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. हरीशकुमार सिंह ने लिखा है कि ‘‘कवयित्री डॉ. आराधना सिंह बुंदेला के नए कविता संग्रह ‘संस्कृति की धरोहर’ को पढ़ते हुए यह अहसास होता है कि आप एक संवेदनशील कवयित्री हैं जो अपने आसपास की घटनाओं पर पैनी नजर रखती हैं और घटनाओं का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण कर कविता के विषयों को उठातीं हैं और फिर अपने शब्दों से कविता में पिरोतीं हैं।’’

संग्रह में एक मार्मिक कविता है ‘‘ख़त जो कभी पहुँचा नहीं’’। इस कविता में एक पुत्री द्वारा अपने पिता के मरणोपरांत उन्हें पत्र लिखने और उन तक न पहुंच पाने की पीड़ा है। यह एक शाश्वत पीड़ा है जो प्रत्येक संतान को कभी न कभी अनुभव करनी ही पड़ती है-
पापा जब से गए, एक ख़त लिखा था उनको,
लगता है अभी तक वो उन तक पहुँचा ही नहीं।
हाल दिल के हमेशा की तरह खोल कर लिख दिए,
सवालों के जवाब चाहने वाला एक ख़त लिखा था मैंने।

डॉ आराधना की कविताओं पर मनोविज्ञानी डॉ. छाया श्रीवास्तव ने संग्रह को ‘‘जीवन के विविध रंगों का एक सजीव दस्तावेज’’ कहा है। वहीं महाराजा छत्रसाल बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय छतरपुर की हिन्दी प्रोफेसर डॉ. श्रीमती गायत्री वाजपेयी नं संग्रह को ‘‘संस्कृति की धरोहरः भावों का महकता मधुवन’’ करार दिया है। उन्होंने लिखा है कि ‘‘ये कविताएँ सिर्फ कविताएँ नहीं हैं, बल्कि जीवन के उतार- चढ़ाव,रिश्ते, आत्मीयता, सामाजिक संवेदनाओं और भावनाओं का सुंदर समन्वय हैं।’’

संग्रह के आरंभ में कवयित्री की मातुश्री श्रीमती चंद्रकांता सिंह का भी ‘‘आशीर्वचन’’ है। वे लिखती हैं कि ‘‘मेरी बेटी आराधना बचपन से ही बहुमुखी प्रतिभा की धनी रही है। उनका यह दूसरा काव्य संग्रह प्रकाशित हो रहा है, जिसमें उन्होंने दिल से निकले हुए अपने भावों को बड़ी गहराई और सुंदरता से व्यक्त किया है।’’
मां ही तो वह प्रथम शिक्षिका होती है जो अपनी बेटी को संस्कार एवं संस्कृति सिखाती है। फिर ऐसी बेटी की कलम से जब कविता फूटती है तो वही भाव कविता का आकार लेते हैं जो डॉ आराधना की कविता ‘‘रिवाज और संस्कृति’’ में हैं-
रिवाजों पर चल कर, हमने बड़ों के पैर छूना सीखा,
आशीर्वाद बहुत मिला, आया सम्मान देने का सलीका,
रिवाजों से सीख कर, हम दिया बाती करते,
मंदिर की घंटियाँ और नगाड़ों की गूंज सुनते।

एक और कविता है जो कवयित्री की संवेदनाओं को बखूबी मुखर करती है- ‘‘बेटी का हॉस्टल जाना’’। यूं तो यह एक सामान्य-सी घटना है कि पढ़ाई के लिए बेटी को दूसरे शहर भेजना पड़ता है और उसे हॉस्टल में रहना पड़ता है किन्तु इस घटना के पीछे छिपी रहती है गहरी वेदना जिसे मां का हृदय अनुभव कर के व्याकुल होने लगता है। कविता की कुछ पंक्तियां देखिए-
तुम हॉस्टल गई रानी बेटी,
बिखरे तुम्हारे पेन और कॉपी,
तुम्हारी किताबें जगह जगह,
याद दिलातीं तुम्हारी।
आधे खाये हुए चिप्स का पैकेट,
मैगी भी कुछ तनहा सी,
ईयर फोन्स तुम छोड़ गई....

डॉ. आराधना सिंह बुंदेला की कविताएं छंदबद्ध नहीं हैं किन्तु उनमें एक छांदासिक प्रवाह है जो पाठक को अपने साथ बहा ले जाने में सक्षम है। उनका हिन्दी का शब्द ज्ञान समृद्ध है। वे भावानुसार सटीक शब्दों का चयन करती हैं। उन्हें पता है कि कहां व्यंजनात्मक होना है और कहां कोमल संवाद करना है। भौतिक विज्ञानी स्टीफन हॉकिंग ने सही कहा था कि ‘‘हम विज्ञान में जितना आगे बढ़ते हैं, संस्कृति के उतने निकट होते जाते हैं।’’ डॉ. आराधना सिंह बुंदेला चिकित्सा विज्ञान में जितनी माहिर हैं उतनी ही सांस्कृतिक रुझान रखती है और यह तथ्य उनके इस नवीनतम संग्रह ‘‘संस्कृति की धरोहर’’ की प्रत्येक कविता में महसूस की जा सकती है। संग्रह की सभी कविताएं पठनीय हैं तथा अप्रत्यक्ष रूप से जीवन जीने की कला सिखा जाती हैं।
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