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Thursday, April 4, 2024

बतकाव बिन्ना की | चुनाव की बेरा सबई बर्रयान लगत आएं | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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बतकाव बिन्ना की
चुनाव की बेरा सबई बर्रयान लगत आएं    
   - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
       ‘‘ऊ पार्टी के दोरे हमाए लाने खुल जाएं सो हम सोई उते पिंड़ जाएं।’’ लोहरे दाऊ मन मसोसत भए बोले। उनके मों पे उनकी इच्छा छपी सी दिखा रई हती। लोहरे दाऊ को अपनो एक राजनीतिक इतिहास आए। बे चार दफा निर्दलीय ठाड़े भए रए, मनो चारो की चारो बेर उनकी जमानतें जब्त हो गई। मोय तो उनके बारे में जे समझ में कभऊं नहीं आओ के हर बेर जमानत जब्त कराबे के लाने उनके लिंगे रुपैया कां से आ जात आएं? खैर, करत हुइएं कोनऊ जुगाड़। अपनो देश ऊंसई जुगाड़न को देश आए। इते सब कछू जुगाड़ से चलत रैत आए। अब कैने को तो क्रेडिट भगवान जी खों दे दओ जात आए के इते सब कछू भगवान भरोसे चलत आए। बाकी सई कई जाए तो भगवान भरोसे नोईं जुगाड़ भरोसे चलत आए।
अब जेई से तो देख लेओ के पैले जां ‘‘मेड इन इंडिया’’ कओ जात्तो, उतई अब ‘‘मेक इन इंडिया’’ कओ जान लगो। इते-उते से पुरजा जुगाड़ो औ बना लओ कछू ने कछू। जेई टाईप को जुगाड़मेंट तो ई टेम पे अपने इते की चुनावी राजनीति में चल रओ आए। सबई अपनी-अपनी जुगाड़ लगाबे में भैराने से फिर रए। कछू ऊ पार्टी में जाबे के लाने लेन लगा के ठाड़े दिखा रए जोन में पौंच के कछू मिलबे औ जीतबे की उम्मींदे ज्यादा आएं। औ कछू सोच रए के उते तो कओ कोऊ पूछे ना, सो ईसे अच्छो आए के जिते धरे, उतई धरे रओ। बाकी कछू लोहरे दाऊ घांई बी आएं जो चुनाव को टेम आतई साथ बर्रयान लगत आएं। बे इते जात आएं, उते जात आएं औ जब दोरे-दोरे फिरत-फिरत कछू हाथ नई लगत, ऊपर से गोड़े औ दुखन लगत आएं तब बे निर्दलीय ठाड़े हो के अपनो गम गलत करत आएं।
‘‘दाऊ आप तो बरहमेस निर्दलीय ठाड़े होत रए हो, फेर ई बेर काय सोच रए के कोनऊं पार्टी में घुसो जाए?’’ मैंने लोहरे दाऊ से पूछी।
‘‘हऔ, ठीक जेई हम पूछो चा रए हते।’’ भैयाजी सोई बोल परे।
‘‘तुम ओरे का समझो जे राजनीति की बातें? तुमें तो चुनाव में खाली बटन दबाने आए। तुम ओरन खों कोन कछू मेनत करने। जे तो हम ओरन से पूछो जोन खों चुनाव में ठाड़े होने परत आए।’’ लोहरे दाऊ ऐंड़ देत भए बोले।
‘‘काय, ऐसी कोन सी मजबूरी कहानी जो तुमाओ चुनाव में ठाड़े होने जरूरी आए?’’ भैयाजी ने पूछी। उने लोहरे दाऊ की ऐंड़ ने पोसाई।
‘‘मजबूरी आए भैया, बड़ी मजबूरी आए। जो हम ओरें ठाड़े ने होंय तो चुनाव कोन के बीच हुइए?’’ अब की बेर लोहरे दाऊ मुस्क्या के बोले।
‘‘सो आप ने ठाड़े हुइयो, तो कोनऊं तो हुइए। औ जो कोनऊं एकई उम्मीदवार रओ सो ऊको ऊंसई जीत मिली कहाई।’’ भैयाजी ने कई।
‘‘जेई तो बात आए। तुमें का पतो के कोनऊं उम्मीदवार अपने विरोधी के बिगैर चुनाव नई लड़न चात आए। जो अकेलो ठाड़ो हो जाए औ जीतो कहा जाए, तो खबर का बनहे? जा कां से कई जाहे के उन्ने अपने विरोधी खों इत्ते हजार वोटों से हराओ। सो सिंगल वाली जीत तो ऊ फटफटिया घांईं कहाई के नांव तो आए फटफटिया मनो आवाज फुस्स की बी ने होए।’’ लोहरे दाऊ ने बाकायदा उदाहरण दे के हम दोई खों समझाओ।
‘‘पर दाऊ, आप जे कैसे कै रए के हम ओरें जो वोटें डारबे वारे आएं, उने कछू मेनत नईं करनी परत आए? हम ओरन खों सोई सोचने परत आए के कोन खों वोट दओ जाए औ कोन खों ने दओ जाए? कई दफा तो सबरे उम्मींदवार अपने चिनारी वारे निकर आत आएं, ऐसे में सो औरई सोचने परत आए के कोन खों देबे में अपने वोट की इज्जत रैहे?’’ मैंने लोहरे दाऊ से कई।
‘‘हऔ, औ हम ओरन की उंगरिया में सबसे घनी ताकत रैत आए। हमाई उंगरिया जोन को बटन दबा देवे, बोई को उद्धार हो जात आए। जे मानो के वोट डारबे वारन की उंगरिया पे जुगल किशोर जू को सुदर्शनचक्र वोटिंग पावर के रूप में आत जात आए। एक बटन दबाए से जोन बदमाश दिखानो, ऊको राजनीतिक कैरियर कटत भए देर नई लगत।’’ भैयाजी बोले।
‘‘वाह भैयाजी! आपने खूबई नोनों उदाहरण दओ आए। वोट मने सुदर्शनचक्र। बुरए नेताओं से अपने क्षेत्र को बचाबे वारो हथियार। खूब कई आपने।’’ मोय भैयाजी की बात भौतई अच्छी लगी। कभऊं-कभऊं भैयाजी गजब की बात बोल जात आएं।
‘‘औ बे नोटा दबाबे वारन के बारे में का बिचार है आप दोई को?’’ लोहरे दाऊ ने चुटकी सी ले लई।
‘‘हमाए बिचार से तो जे नोटा-मोटा को बटन निकार फेकबो चाइए। जो वोट डारबे जा रए हो तो या तो जिताओ, ने तो हराओ। जे का के हमें कोनऊं नोई पोसा रओ को बटन चटका के आ गए। का उते कोनऊं स्वयंबर हो रओ के तुमें जिनगी भर के लाने सोचने? अरे खाली पांच बरस के लाने चुन लेओ, औ ने तो बीच में छोर-छुट्टी करा के दफा करो जा सकत है। बो का आए, एक विज्ञापन एक बिस्कुट को दिखाओ जात आए ने के अंदर की खूबी तो ट्रायल लेबे में पता परत आए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ बात तो आप सांची कै रए भैयाजी! बाकी बा विज्ञापन मोय नई पोसात। बा विज्ञापन में एक कोच दिखाओ जात आए औ मोड़ी की मां कैती आए के अंदर की खूबी तो आजमाने पे पता परत आए। अब आपई सोचो के जो कोनऊं कोच मोड़ी की मताई के कैबे में आ के अंदर की कोनऊं और खूबी देखन लगो तो बोई दसा हुइए जो अपने इते की महिला पहलवानों की भई। सो ऐसो विज्ञापन मोय नई अच्छो लगो।’’ मैंने भैयासे कई।
‘‘अरे हऔ, जे तो हमने सोचई ने हती! तुमें कां से सूझी?’’ भैयाजी अचरज कर भए पूछन लगे।
‘‘मोरो सोई ध्यान नई गओ रओ। बा तो एक भौजी आएं उन्ने जा बात कई, सो मोय सोई सोचने परी के बे कै तो सई रईं।’’ मैंने भैयाजी खों बताई।
‘‘तुम ओरें कां से कां पौंच गए? बात चल रई हती नोटा के बटन की औ तुम ओरे अंदर की खूबी ले के बैठ गए।’’ लोहरे दाऊ नाराज होत भए बोले। उने हम ओरन की बात अपने मतलब की नईं लगी।
‘‘सो, आप बताओ के जो आपके लाने बा बड़ी पार्टी के दोरे खुल जाएं सो आप का करहो?’’ मैंने लोहरे दाऊ से पूछी। मोरो सवाल सुन के लोहरे दाऊ ऐसे खुश भए जैसे राजा बिक्रमादित्य के कंधा पे बैठो भूत फेर के पीपर के पेड़ पे लटक के खुश हो गओ होय।
‘‘जो हमाए लाने उते के दोरे खुल जाएं सो हमें टिकट सोई मिल जाहे।’’ लोहरे दाऊ उचकत भए बोले। मनो उने टिकट मिलत भई दिखान लगी।
‘‘दाऊ, नींद में ने निंगो, गिर जैहो!’’ मैंने कई।
‘‘का मतलब?’’ दाऊ ने चैंक के पूछी।
‘‘मतलब जे के आप सपनोई देखत रैहो, उते सबरी टिकट खतम भई जा रईं।’’ मैंने लोहरे दाऊ खों याद कराई।
‘‘सो होन देओ खतम। बे हमें टिकट ने दें, सो ने दें। हम वोट सो काटई लेबी।’’ लोहरे दाऊ चतुराई से मुस्काए।
उनकी बात सुन के अब की बेरा मैं चैंक गई। काय से के उनको हर-हर दइयां चुनाव में ठाड़ो होबो और अपनी जमानतें जब्त कराबे को चक्कर कछू-कछू समझ में आ गओ।
‘‘सो जा बात आए!’’ मोरो मों से निकर परो।
मोरी बात सुन के भैयाजी ने मोरो हाथ दबा के मोए चुप रैबो को इशारो करो औ धीरे से बोले,‘‘दाऊ खों बर्रयान तो देओ। चुनाव के टेम पे सबई बर्रयान लगत आएं। तुम औ ने छेड़ो, ने तो जे अबई अपने दोई की खपड़िया खा जैहें।’’
भैयाजी की बात सुन के मोय हंसी आ गई। बाकी उनकी बात सई हती, सो मैं उठ खड़ी भई औ लोहरे दाऊ से टाटा-बाय-बाय करी। जो लौं भैयाजी सोई बोले के,‘‘मोय सोई कटरा जाने, फिर मिलबी दाऊ! जो आपके लाने दोरे खुल जाएं सो बतइयो।’’
हम दोई उते से खसक गए। दाऊ बी कोऊ और खों पकरबे के लाने निकर परे। बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की।
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Thursday, March 28, 2024

बतकाव बिन्ना की | सबसे नोनों अपनों बुंदेलखंड | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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बतकाव बिन्ना की
सबसे नोनों अपनों बुंदेलखंड    
   - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
       भैयाजी के इते मैं पौंची तो मैंने देखी कि उते सयाने सरजी बैठे हते। मोय देखतई साथ उन्ने मोसे पूछी-‘‘कां थीं बिन्ना? कुल्ल दिनां से दिखानी नईं।’’
‘‘इतई हती। तनक तबीयत खराब रई सो बाहरे कम निकरी।’’ मैंने सयाने सरजी खों बताओ।
‘‘का हो गओ रओ?’’ उन्ने फेर पूछी।
‘‘अरे, जेई सर्दी-खांसी। आजकाल वायरल फैलो न!’’ मैंने कई।
‘‘हमने सुनी के तुम कहूं बाहरे हो आईं।’’ सयाने सारजी असल बात पे आ गए।
‘‘बाहरे तो नईं, मनो दिल्ली गई रई। उते साहित्य अकादमी को लिटरेचर फेस्टिवल रओ। उतई से लौटत बेरा में तो जा इंफ्ेशन लग गओ। उते रेल के डिब्बा में सबई जने छींक-खांस रए हते। मोय तो तभई समझ में आ गई रई के सागर पौंचत-पौंचत मोय सोई हो जाने। औ बोई भओ।’’ मैंने सयाने सरजी खों बताओ।
‘‘बाकी उते दिल्ली में का दसा आए? उते तो औरई प्रदूषण रैत आए।’’ सयाने सरजी ने पूछी।
‘‘हऔ, कै तो आप ठीक रए। उते तो बरहमेस प्रदूषण रैत आए। बाकी नई दिल्ली में तो चौराहा-मौराहा अच्छे कर दए गए आएं। उते फूलन के पौधा लगा दए गए आएं। तरे-ऊपरे मुतकी सड़कें बन गईं। बाकी हमने एक बात देखी के उते पैदल वारों के लाने तो कोनऊं ठिकानोंई नइयां। सबसे ज्यादा चार पहिया भगत-फिरत दिखात आएं औ दूसरे नंबर पे दो पहिया, मने मोटर सायकिल औ स्कूटरें। औ सबई कछू इत्ती-इत्ती दूरी पे आए के पैदल चलो बी नई जा सकत। मेट्रो औ सिटी बसें ने होंय तो बड़ी मुसकिल हो जाए।’’ मैंने सयाने सरजी से कई।
‘‘औ जब तुम उते गईं रईं तो बे मफलर वारे बाहरे हते के भीतरे बुक हो गए रए?’’ सयाने सरजी ने मुस्कात भए पूछी।
‘‘ऊ टेम पे तो बाहरे हते। मनो मैं उनसे मिलबे के लाने थोड़े गई रई, जो मोय उनको पूरो डिटेल पतो होय।’’ मैंने सयाने सरजी से कई। वैसे सरजी सयाने जेई से तो कहाउत आएं के बे बातकाव करत-करत कऊं से कऊं पौंच जात आएं। आएं तो बे सरकारी मास्टर, बाकी उनके घरवारी के नांव पे चार कोचिंग सेंटर चलत आएं। जेई से तो उनको नांव सयाने सरजी पड़ गओ।
‘‘उते दिल्ली में तुमें का अच्छो लगो?’’ सयाने सरजी ने पूछी।
‘‘कछू नईं। मोय दिल्ली में कभऊं कछू अच्छो नई लगत।’’ मैंने दो-टूक कै दई।
‘‘हैं? ऐसो का? काय अच्छो नईं लगत? इते तो सबरे दिल्ली जाबे खों मरत रैत आएं। औ अब तो जे दसा आए के जोन के मोड़ा-मोड़ी गुरुग्राम में या नोयडा में पौंच गए हैं, बे उते के गुनगान करत नईं थकत आएं। औ तुम कै रईं के तुमें उते कछू अच्छो नईं लगत।’’ सयाने सरजी ने पूछी। उने मोरी बात सुन के भौतई अचरज हो रओ तो।
‘‘सुनो सरजी! दो-चार दिनां खों घूमबे के लाने तो दिल्ली अच्छी आए बाकी रहबे की जो बात होय तो मैं तो जेई कहबी के अपनो बुंदेलखंड से नोनो कहूं नईयां। उते बच्चा हरों खों लाखों को पैकेज मिलत आए, मनो खर्चा करोड़ों को होत आए। उते को स्टेटस मैंटेन करबे की दौड़ में सबरे भैराने से फिरत आएं। जबके अपने इते बड़ी चैन की जिनगी ठैरी। इते तो चार-छै हजार में भी रोटी-पानी चल जात आए।’’ मैंने कई।
‘‘पर इते कछू विकास कां हो रओ?’’ सयाने सरजी बोले।
‘‘कोन सो विकास चाउने आपके लाने? सड़कें जब चाए तब सुधरत रैत आएं। पानी की पाईपें डारबे के लाने सड़कें खोदत में कोनऊं कभऊं नई हिचकत। मनो काम रुकत नईयां, बरहमेस चलत रैत आए। औ कोन सो विकास चाउने?’’ मैंने हंस के सयाने सरजी से पूछी।
‘‘इते कोनऊं बड़ी इंडस्ट्री नोंईं। इते रेलें कम आएं। बस, एक ठईंयां हवाई अड्डा आए। इते आईटी सेक्टर नईयां।’’ सयाने सरजी अपने बुंदेलखंड की कमियां गिनाउन लगे। बे कै तो सई रै हते, मनो मोय उनकी बात ने पोसाई। कोऊ से बी तुलना कर ली जाए, मोय तो अपनो बुंदेलखंड नोनो लगत आए।
‘‘अच्छा आप जे बताओ के इते अच्छो हवा-पानी आए के नईं? मने औ जांगा के मुकाबले इते प्रदूषण कम आए के नईं?’’ मैंने सयाने सरजी से पूछी।
‘‘हऔ, इते प्रदूषण तो कम आए, मनो...’’ सयाने सरजी ने कई औ बे कछू आगे बोलबे जा रए हते के मैंने उने टोंकी,‘‘मनो का? जो प्रदूषण ने होय तो सेहत अच्छी रैत आए। औ जो सेहत अच्छी होय तो सबू कछू करो जा सकत आए।’’
‘‘तुमाई बात तो सही आए पर जे बी तो सोचो के खाली सेहत से पेट नईं भरत। जीबे के लाने पइसा चाउने परत आए।’’ सयाने सरजी बोले।
‘‘हऔ तो हमने कबे कई के पइसा नईं चाउने। मनो आप जे बी तो देखों के जो किराए के दो कमरा इते चार हजार में मिलत आएं, उते चालीस हजार में मिलत हैं। सो कमाई कां बची?’’ मैंने सयाने सरजी से कई।
‘‘मनो उते की लाईफ अलग आए।’’ अब सयाने सरजी ने दूसरो पैंतरा चलो।
‘‘कोन-सी लाईफ? जो इते सब जने साथ रैते तो अम्मा औ भौजी के हाथ को बनो ताजो भोजन जींमते। मनो उते तो पिज्जा, बर्गर औ चाउमिन खा के जिनगी कट रई। तनक याद करो के आपई ने बताई रई के आपको मोड़ा उते गुरुग्राम में कोनऊं मल्टीनेशनल कंपनी में आए। औ संगे बहू बी उतई काम कर रई। जे आपई ने बताई रई के उनको आॅफिस को टेम अलग-अलग आए। सात दिनां में एक-दो दिनां संगे भोजन कर पाउत आएं। ने तो एक को घरे आउत को टेम होत आए तो दूसरे को काम पे जाबे को टेम होन लगत आए। जब कभऊं संगे रैत आएं तो खाबे के लाने होटलें जाउत आएं औ संगे बियर-मियर पियत आएं। जेई लाईफ की बात कर रए आप? उनकी जे लाईफ में आप के लाने जांगा कां आए?’’ मैंने तनक करई बात पूछ लई।
‘‘हमें उनके संगे रहने ई नोईं। हम तो इतई अच्छे।’’ सयाने सरजी बोल परे।
‘‘काय? आपको उनके संगे नईं रहने के बे आपको अपने संगे ने राखहें? औ जो आपको सोई इतई अच्छो लगत आए तो आप उते की बड़वारी काय कर रए?’’ मैंने तनक औ खरी-खरी कै दई।
‘‘अब हो गई, जान देओ। औ ने गिचड़ों।’’ सयाने सरजी हथियार डारत भए बोले। बे दुखी दिखाई देन लगे। उनकी जा दसा देख के मोय अच्छो नई लगो। मैंने सोई तनक ज्यादई करई बोल दई रई। सो मैंने बात सम्हारी।
‘‘बात गिचड़बे की नोंईं। जा तो बात में बात निकरत गई। मनों जोन को जो लाईफ अच्छी लगत होय, ऊको बोई में रओ चाइए। मैं तो अपनी कै रई हती के मोय तो अपने बुंदेलखंड में अच्छो लगत आए। इते ने तो भागम-भाग, ने तो हाय-तौबा। चैन से कटत चल रई इते जिनगी। इते सबई सबखों चींनत आएं। घरे के दोरे से निकरो तो -कां जा रई बिन्ना?- पूछ लओ करत आएं। जा ठीक आए के कभऊं-कभऊं ऐसो पूछो जानो अच्छो नईं लगत, मनो जो ने पूछो जाए तो ज्यादा बुरौ लगत आए। अपने बुंदेलखंड घांईं लप्सी औ लपटा कां मिल रए? इते घाईं राई औ नौरता कऊं नचत न दिखहें। जा ठीक आए के अपने इते तनक गरीबी आए। इते किसानी कछू अच्छी नईं रैत आए। पर इते के मानुस चंट नोईं, दिल के साफ आएं।’’ मैंने कई।
‘‘सांची कै रईं बिन्ना!’’ अब के भैयाजी बोल परे, जोन अबे लौं हम दोई की बतकाव सुन रै हते।
‘‘औ का भैयाजी! रई तरक्की की बात तो तरक्की सो हुइएई। तनक धीरे-धीरे सई, पर बा तो हो के रैहे। आपई सोचो के एक टेम बा रओ के जब अपन ओरें बिजली औ सड़कों के लाने तरसत्ते। तीन घंटे को रस्ता आठ घंटा में पूरो होत्तो। बिजली कटौती को ऐसो-ऐसो टेम फिक्स करो गओ रओ के आदमी पगला जाए। मनो अब देखो, अपन ओरन खों पूरे टेम बिजली मिल रई। अच्छी सड़कें बन गईं। औ नई-नई बनत जा रई। जे तरक्की नोंई तो औ का आए?’’ मैंने कई।
‘‘मनो बुंदेलखंड राज्य बन जातो तो औ साजो रैतो।’’ सयाने सरजी अपने सयानपना से बाज नई आए औ बोल परे।
‘‘सुनो सरजी! जे फालतू की राजनीति ने करो। जो अच्छो भलो चल रओ ऊको चलन देओ। बुंदेलखंड को जोन इलाको उत्तरप्रदेश में आए, ऊके लाने उते की सरकार करत रैत आए औ जोन इलाको अपने मध्यप्रदेश में आए ऊके लाने अपने इते की सरकार काम करत रैत आए। जे काय नई सोच रै के अपने बुंदेलखंड के लाने दो-दो सरकारें लगी आएं। जो अलग राज्य बन जैहे सो एकई सरकार मिलहे।’’ मैंने सयाने सरजी खों हंस के समझाई।
‘‘बात तो ठीक कै रईं। मान गए तुमाई बात के अपनो बुंदेलखंड सबसे नोनों।’’ सयाने सरजी ने सोई मोरी बात पे ठप्पा लगा दओ।
बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की।
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Thursday, March 21, 2024

बतकाव बिन्ना की | होली के भड़या हरों खों को पकर सको | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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बतकाव बिन्ना की
होली के भड़या हरों खों को पकर सको    
   - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
       ‘‘काय भैयाजी, का कर रए? गूझा पपड़ियां बन गईं?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘हऔ बनत जा रईं। तुमाई भौजी जुटी आएं।’’ भैयाजी बोले।
‘‘औ आप? आप नईं हाथ बंटा रए? आप तो गूझा बांधबे में मास्टर आओ।’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘सई कई। हमें गूझा बांधबे में भौतई मजो आत आए। हम सो ऐसो किनारो मोड़त आएं के का मशीनें औ का तुमाई भौजी, दोई हमाओ मुकाबला नईं कर सकत।’’ भैयाजी शान देत भए बोले।
‘‘जेई से तो मैं पूछ रई के आप उते किचन में ने हो के इते बाहरे ठाड़े दिखा रए।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘बो का आए के तुमने देखी हुइए हमने इते एक बिरंच डाल रखी हती बैठबे के लाने। ऐसे तो हमने ऊको जंजीर से बांध रखो हतो, मगर तुम तो जानत आओ के जे होली के भड़या हरों को पकर सकत आए? इते डरो रैन देतो तो भैया हरें ओई की होली जरा डारते। सो बा बिरंच भीतरे के आंगन में पेल दई आए। बाकी औ कछू तो ने बचो, जे ई हम देख रए हते।’’ भैयाजी ने बताई।
‘‘सई कई भैयाजी! अब तो मनो इत्तो नईं रै गओ, ने तो पैले तो जे होत्तो कि बगिया के जरवा लों खचोड़ ले जात्ते। एक दार हम ओरन के संगे जेई भओ। जा ऊ टेम की बात आय जब मैं स्कूल में पढ़त्ती। उते पन्ना में हिरणबाग में रैत्ती। हमाए इते अच्छी बड़ी बगिया हती। ऊ टेम पे जरवा की फेंसिंग करी जात्ती। मोरी नन्ना जू ने लकड़िया वारे से जरवा मंगा के बगीचा में लगवाओ रओ। बाकी होली जलबे की एक रात पैले का भओ के कोनऊ हमाए इते को जरवा खचोड़ ले गओ। औ ई टेम घांई ऊ टेम पे बी आवारा गैयां फिरत्तीं। भुनसारे नन्ना जू ने उठ के देखो के बगीचा से जरवा नदारत हतो औ एक गाय पिड़ीं हती बगीचा में। हम ओरन खों जरवा जाबे को उत्तो दुख नईं भओ जित्तो बा गैया के पिड़बे को दुख भओ। काय से के ऊने अच्छे फूल वारे पौधा चगल डारे हते। मनो अब करो का जा सकत्तो। अनजान भड़या हरों खों गरिया के अपनो जी जुड़ा लओ।’’ मैंने भैयाजी खों आपबीती सुना दई।
‘‘अरे ने पूछो बिन्ना! ईसे ऊंची तो हमाए सगे दद्दा के संगे हो चुको।’’ भैयाजी बोले।
‘‘कैसी?’’ मैंने पूछी।
‘‘का भओ के हमाए दद्दा ने तै कर लओ हतो के होली के भड़यां हरों खों कछू चुराने ने दैहें। सो बे पलका डार के बाहरे के आंगन में सो गए। भड़या हरों ने सोई ठान लई हुइए के जो तुम शेर हो सो हम सवा शेर ठैरे। सकारें जबे दद्दा की नींद खुली तो उन्ने देखी के बे तो गद्दा-पल्ली समेत जमीन पे सो रए हते औ उनको पलकां गायब हतो। मने जब बे सो रए हते तो कोनऊ ने उनकी गहरी नींद की बेरा उन्हें गद्दा-पल्ली समेत पलका से उतार के जमीन पे सोवा दओ और पलकां ले गए। ससुरों ने कां ले जा के पलका बारो, कछू पतो नईं परो। कछू जने कैत रए के उन ओरन ने दद्दा खों कछू सुंधा दओ हुइए। जेई से उने पतो नईं परो। औ कछू जने कैत रए के जो कछू सुंघाओ होतो तो बे गद्दा-पल्ली काय छोड़ जाते? बे सोई संगे ले जाते। ऊके बाद तो हमाए दद्दा ने होली को टेम आतई सात सब कछू उठा के भीतरे धरबे को काम शुरू कर दओ रओ। काय से के होली के भड़या हरों को भला को पकर सकत?’’ भैयाजी ने अपने दद्दा की किसां सुना डारी।
रामधई पैले ऐसई होत रओ।
‘‘भैयाजी, मोय एक बात खयाल आ रई।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘का बात?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘जे बात के पैले होली के भड़या ऐसे-ऐसे कांड कर देत्ते के अब सुने में अचरज होत आए। ऐसई आजकाल जो अपने इते की राजनीति में चल रओ ऊपे आबे वारे समै में लोगन खों अचरज हुइए।’’ मैंने कई।
‘‘मने?’’
‘मने, जे के चाए बड़े होंय, चाए छुटकुल होंय सबई के सबई नेता हरें अपनी पार्टी खों गरिया के भाजपा की कैंया पे चढ़े जा रए। जोन के दादा-परदादा हरें कांग्रेस में रए औ कभऊं नांय से मांय नई भए, बे कांग्रेस खों सौतेली कै के भाजपा खों सगी बता रए। खाली टिकट के लाने कोनऊं अपनी पार्टी से ऐसी कट्टी करत रओ,, ईपे आबे वारे समै में लोगन खों विश्वास ने हुइए।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘बोई तो बात आए बिन्ना के होली के भड़या हरों खों को पकर सकत आए? जे जो तनक-मनक में नांय से मांय होत रैत आएं, जे सबरे होली के भड़या आएं। उने तो होली जलाबे के लाने सामान से मतलब आए। चाय इते से मिले के उते से मिले। बस, मिलो चाइए। जित्ती बड़ी होलिका, उत्ती बड़ी बड़वारी। सो जे सब तो हुइए। ऊंसई चुनाव को टेम आए। अब हम तुमें का बताएं बिन्ना!’’ भैयाजी बोलत-बोलत ठैर गए।
‘‘का बताने? बताओ ने आप!’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘का भओ के परों की बात आए। हमाए संग पढ़े रहे भैयाजी आजकाल राजनीति में मेवा मिलबे की आसा में लटके आएं। बे परों हमें मिले सो हमने उनसे साफ कई के भैया तुमाई कांग्रेस ने जो ई बार सई उम्मींदवारों खों टिकट ने दई तो समझ लइयो के कोनऊं नांव लेवा लों ने बचहे। सो बा कैन लगो। हमाई कांग्रेस काय? उते तो हमें कोनऊं पूछ बी नई रओ। हम तो होली के बाद भाजपा में जा रए। सो हमने ऊसे कई के तुम जा कैसे कै रए के तुमें उते कोनऊं पूछ नई रओ? तुम तो सबरे बड़े नेता हरों के खासमखास रए? तो जानत हांे, ऊने का कई?’’ भैया तनक सांस लेबे खों ठैरे।
‘‘का कई उन्ने?’’ मैंने पूछी।
‘‘बा कैन लगो के चाय कमलनाथ होंय, चाय दिग्विजय सिंह होंय, कोनऊं ठीक से मिलतई नइयां औ जो मिल जाएं तो सीधे मों बोलत नइयां। ऐसे में हम उते कैसे रै सकत आएं? तब हमने ऊसे कई के मगर तुम तो सैंकड़ा-खांड़ ऐसी फोटुवें सोशल मीडिया पे डार चुके हो जीमें तुम उन दोई के संगे सट के ठाड़े हो। कोऊ-कोऊ में तो उन ओरन ने तुमाए कंधा पे हाथ धरे आएं औ तुमसे बतियाते दिखात आएं। औ तुम कै रए के बे ओरे तुमें पूछ नईं रै? सो का, बे फोटुएं फोटोशाप वारी आएं? मैंने सोई पूछ लई। सो बा बमकत भओ बोलो के नईं बा सब सई की फोटुएं आएं, कोनऊं फोटोशाप वारी नोंई। सुनो, अब हम तुमें बता दें के जो पार्टी बदलने होय सो ऐसो कैने परत आए। ने तो जनता ने पूछहे के जब उते तुमाई पूछ-परख हती तो तुम काय उते से खसक रए? सो कछू तो कैनेई परत आए। अब तुमई बताओ के उते हमाओं का भविष्य रै गओ? बा मानुस हमई से पूछन लगो। सो, हमने कई भैया, जो तुमें साजो लगे से करो, हमें का?’’ भैयाजी ने अपने संगवारे को हाल-चाल बता डारो।
‘‘जेई तो सबई तरफी चल रओ भैयाजी! वैसे ई टेम सबसे सई टेम आए।’’ मैंने कई।
‘‘काय के लाने?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘पार्टी बदलबे के लाने। जो काऊं खों कोनऊं से डील करने होय सो मों पे रंग डार के मिलबे जा सकत आए। कोनऊं पैचान ने पाहे। औ जो खुदई कऊं छुपने होय सो मों पे रंग मल के तिगड्डा पे बैठे रओ, कोऊं ने पैचान पाहे।’’ मैंने हंस के कई।
‘‘सई कई बिन्ना!’’ भैयाजी सोई हंसन लगे। फेर बोले, ‘‘हमें होरी को एक गाना याद आ रओ, चलो तुमें सुनात आएं।’’ कैत भए भैयाजी ने गाबो शुरू कर दओ-
मोय मिले ऐसे  करिया  सैंया
कोनऊं रंग डारो दिखत नईयां
साली ने डारो, सरहज ने डारो
डारो नंदेऊं,  ससुरा  ने  डारो
उनपे  तो  कछू  जंचत नइयां
कोनऊं रंग डारो दिखत नईयां
कोनऊं रंग डारो ........
भैयाजी को गानो सुन के भौजी सोई बाहरे कढ़ आईं। फेर हम तीनोई मिलके फगुआ गान लगे। न जाने कां से भौजी को जो होरी को जो गाना याद आ गओ औ बे गान लगीं-
जरवा ले जाओ चाय, खटिया ले जाओ
होलिका परमेसरी खों बारई के आओ
सुनो मोरे होली के भड़या हरो.....
भौजी को जो गाना सुनतई साथ हम दोई भैया-बैन की हंसी फूट परी। काय से के ईसे पैसे हम ओंरे होली के भड़यां हरों की तो बात कर रए हते। भौजी को कछू समझ ने परी के हम दोई काय हंसे? बे अपनो गीत गात चली गईं औ बाकी, बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की।
खेलियो होरी, मनो सूखी वारी।
पानी की ने करियो बरबादी।। 
हैप्पी होली।।
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Thursday, March 7, 2024

बतकाव बिन्ना की | अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस को बुलौव्वा | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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बतकाव बिन्ना की
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस को बुलौव्वा    
   - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
       ‘‘का बात है भौजी? काय की गिचड़ हो रई आप ओरन में?’’ मैं भैयाजी के घरे के बाजू से गुजर रई हती के भीतरे से भैयाजी औ भौजी की गिचड़बे की आवाजें सुनाई परीं। मोसे नई रओ गओ औ मैंने पौंच के पूछई लओ।
‘‘अरे कछू नईं बिन्ना! तुमाई भौजी की तो रोजई कछू ने कछू चलत रैत आए।’’ भैयाजी बात छुपात भए बोले।
‘‘हमाई काय चलत रैत आए? तुमई अपनी चलात हो!’’ भौजी गरज परीं।
‘‘हो का गओ? कछू तो बताओ!’’ मैंने दोई से पूछीं
‘‘हम बता रए बिन्ना, का आए के हमने तुमाए भैयाजी से गई के हमें नई धुतिया देवा देओ, सो जे पैले कैन लगे के का करहो धुतिया, इत्ती तो आएं तुमाए पास। अब तुमई सोचो के जे का बात भई?’’ भौजी बोलीं।
‘‘हऔ! सांची कै रईं आप! धुतिया तो जित्ती बी होय कमई लगत आए। काए से के दो-चार दफा पैहनी नईं के बा ऊंसई सी लगन लगत आए।’’ मैंने सोई भौजी की बात पे हामी भरी, काय से उनकी बात मैं समझ सकत्ती।
‘‘जै हो तुम दोई की!’’ भैयाजी हाथ जोरत भए बोले।
‘‘जै तो तब हुइए जबें आप भौजी खों नई धुतिया देवा दैहो।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘जा बात के लाने तो जे मान गए आएं।’’ झट्टई भौजी बोलीं।
‘‘ऐं, तो फेर काय गिचड़ रईं?’’ मोए जा सुन के अचरज भओ।
‘‘हमने इनसे जे कई के हम ऐसई धुतिया ने लेबी, आप संगे चल के दिलाओ हमें। पर जे कै रै के तुम अकेली जाओ औ ले लेओ, ने तो शरद बिन्ना खों संगे ले जाओ। तुमें तो हमें संगे ले चलबी लेकिन इनके पांव में का गेरमां बंधे, के जे संगे निंग नई सकत?’’ भौजी बोलीं।
‘‘हऔ तो, भौजी ठीक तो कै रईं के आप संगे चलो।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘चल तो सकत आएं मनो, उते जा के हम बोर हो जैहें।’’ भैयाजी कुनमुनात भए बोले।
‘‘काए भैयाजी, जबें भौजी आपके संगे सबई कहूं जा सकत आएं सो आप इनके संगे धुतिया दिबाबे काय नईं जा सकत?’’ मोय सोई गुस्सा सा आन लगो। मैंने आगे कई,‘‘अब जे जो बई धुतिया पैन्ह के कोनऊं शादी में जैंहे तो अकेली थोड़े जैंहें, आप सोई संगे जैहो। सो इते जाबे में का हो रओ?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘जै कोनऊं शादी में जाबे के लाने धुतिया नोईं खरीद रईं?’’ भैयाजी बोल परे।
‘‘सो? का घरे पैन्हबे के लाने लेने?’’
‘‘अब इन्हईं से पूछ लेओ।’’ भैयाजी बोले।
‘‘बो का आए बिन्ना के हमें अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस को बुलौव्वा मिलो आए। काय, तुमें तो सोई मिलो हुइए।’’ भौजी बतात-बतात पूछ बैठीं।
‘‘कां को बुलौव्वा?’’ मैंने भौजी से पूछी।
‘‘बा ममता जिज्जी वारो महिला दल आए न, ऊने हमें बुलौव्वा दओ आए।’’ भौजी ने बताई।
‘‘अच्छा बा वारो महिला दल।’’ मैंने कई।
‘‘हऔ!’’ भौजी बोलीं।
‘‘सो का होने उते?’’ मैंने भौजी से पूछी।
‘‘बे ममता जिज्जी बता रईं हतीं के उते किसम-किसम के ब्यंजनों के स्टाल लगहें। किटी औ हाउजी सोई खिलाई जैहे। औ कोनऊं महिला नेता सोई आहें, तनक भाषण-माषण दे के, फोटू-मोटू खेंचा कर कढ़ जैहें। इत्तई में तो चार-छै घंटा लग जाने।’’ भौजी बातन लगीं। फेर उनको खयाल आओ,‘‘काय तुम हमसे काय पूछ रईं? तुमें तो सोई बुलौव्वा आओ हुइए।’’
‘‘आओ तो आए, मनो उन्ने मोय खाली व्हाट्सअप करो आए जीमें बा नेताईंन को नांव औ प्रोग्राम शुरू होबे को टेम लिखो, औ कछू नईं दऔ ऊमें।’’ मैंने भौजी खों बताई।
‘‘हैं? ऐसो का! बाकी हमें तो खुद ममता जिज्जी ने फोन कर के कई के तुमें आनई परहे। हमने तो उनसे बोली बी रई के जो हम आहें तो आपके भैयाजी घरे अकेले पर जैहें। सो बे कैन लगीं के जे महिला दिवस आए। ई दिनां तो उनको अकेलोई रैन देओ। तुम तो इते आओ, आपन ओरें हाउजी खेलबी। भौतई मजो आने वारो।’’ भौजी ने बताई के ममता जिज्जी ने उनसे का कई।
‘‘आप से बनत आए हाउजी खेलत?’’ मैंने भौजी से पूछी।
‘‘तनक-मनक बनत आए। कुल्ल समै से खेली नइयां। अब सोच रए के महिला दिवस अपन ओरन को दिवस आए सो बा दिनां हाउजी औ किटी तो खेलो चाइएं।’’ भौजी बोलीं।
‘‘महिला दिवस जे सब के लाने नई मनाओ जात भौजी।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘सो काय के लाने मनाओ जात आए?’’ भौजी मों बनात भईं बोलीं।
‘‘महिला दिवस जे लाने मनाओ जात आए के सबई जने संगे बैठे औ आप ओरन के लाने का अच्छो हो सकत ई पे बिचार करें। कोनऊ ने अच्छो काम करो होय, सो ऊकी बड़वारी करें। ताकि बाकी लुगाइयन पे ऊको असर परे। कछू आगे की योजना बनाई जाए के अपन ओरन की भलाई के लाने अपन ओंरे का-का कर सकत आएं।’’ मैंने भौजी खों समझाओ।
‘‘बात तो तुम साजी कै रईं मनो एक दिनां तो अपन ओरन को मजो करो चाइए।’’ भौजी बोलीं।
‘‘एक दिनां का, सबई दिनां करो चाइए। बाकी ई एक दिनां तो संगे बैठ के सोचने चाइए के अपन ओरन को का मिल रओ औ का मिलो चाइए।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘अपन ओरन खों कां कछू मिल रओ? बाकी जो सरकार की लाड़ली आए उनें तीन हजार रुपैया मिल रए। बात रई का मिलो चाइए की, सो जेई रुपैया अपन सबई खों मिलो चाइए।’ भौजी बोलीं।
‘‘काय ईसे साजो जे नइयां का के जे रूपैया के बदले कछू पक्को काम मिलो चाइए।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘को दे रओ काम? ईसे तो जे रुपैया भले, जोन कछू बिना करे-धरे खाते में आहें।’’ भौजी बोलीं।
‘‘औ बा रुपैया को आप करहो का?’’ मैंने भौजी से पूछी।
‘‘करने का आए? बा रुपैया से औ धुतिया खरीदबी। किटी खेलबी। औ ऐसई कछू काम करबी।’’ भौजी हड़बड़ा सी बोलीं।
‘‘बस, जेई के लाने आपको लाड़ली बहना वारे रुपैया चाउने?’’ मैंने भौजी से पूछी।
‘‘अब हमें नईं पतो। बाकी जो बासन मांजबे खों आत आए न लछमी, बा बता रई हती के ऊकी मोड़ी को एक मैंगो मोबाईल चाउने सो बा ओई के लाने बा रुपैया इकट्ठो करत जा रई।’’ भौजी बोलीं।
‘‘जेई तो सल्ल आए भौजी के एक तो सबरी लुगाइयों खों लाड़ली बहना नई बनाओ गओ। औ जोन को बनाओ गओ, ऊमें मुतकी ऐसी आएं जिने सई से जेई नई पतो के बा पइसन को बे का करें के उनके ज्यादा काम आए।’’ मैंने कई।
‘‘सो ईमें अपन ओरें का कर सकत आएं?’’भौजी बोलीं।
‘‘जेई सब तो सोचो चाइए महिला दिवस पे के अपन ओरें कैसे कमाएं, कैसे घर सम्हारें, कैसे अच्छो काम करें, औ जोन को कछू पइसा मिल रए बे कां लगाबें के उने आगे चल के औ फायदा होय।’’ मैंने भौजी खों समझाई।
‘‘अब हम समझे!’’ भौजी हंस के बोलीं।
‘‘का समझीं आप?’’ मैंने भौजी से पूछी। काय से के उनके हंसबे को मतलब मोय समझ में ने आव।
‘‘जेई समझे के ममता जिज्जी ने तुमें फोन कर के बुलौव्वा काय नई दओ।’’ भौजी फेर हंसन लगीं।
‘‘काय?’’ मोय कछू समझ ने परी।
‘‘जेई से उन्ने तुमें खास बुलौव्वा नईं दओ के तुम उने ऐसई बातें बतातीं औ उनको खाबे-पीबे को स्टाल औ किटी, हाउजी को प्लान फेल करा देतीं।’’ भौजी बोलीं।
‘‘पर बिन्ना सई तो कै रई!’’ अब के भैयाजी बोल परे, जो अबे लौं चुप्पी मारे हम दोई की बातकाव सुन रए हते।
‘‘आप ने बोलो! आप तो मनो, उठो औ झट्टई तैयार हो जाओ। हम दोई के संगे चल के हमें नईं धुतिया दिलाओ।’’ भौजी ने भैयाजी खों डांट लगा दई। भैयाजी उठे औ चल परे तैयार होबे के लाने। औ मैं सोचन लगी के कोनऊं औ प्रोग्राम होतो तो भौजी पुरानी धुतिया से काम चला लेतीं, मनो जे तो ममता जिज्जी को महिला दिवस को बुलौव्वा आए, ईमें तो भौजी खों नईं धुतिया चाउने परहे।
सो आप ओरन खों सोई अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की बधाई। बाकी, बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की।      
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Thursday, February 29, 2024

बतकाव बिन्ना की | दुनिया कैसी ? मोए जैसी ! | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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बतकाव बिन्ना की
दुनिया कैसी ?  मोए जैसी !     
   - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
       ‘भैयाजी, आज भुनसारे मोरी नींद खुली, तभईं से मोए एक किसां याद आ रई। कओ तो सुना दई जाए।’’ मैंने भैयाजी से पूछी। मोए पतो के भैयाजी कभऊं मोय मनो ने करहें, चाए मैं उने किसां सुनाऊं चाए गारी गाऊं।
‘‘हऔ सुनाओ!’’ जैसी मैंने सोची रई, भैयाजी ने तुरतईं ‘हौ’ बोल दओ।
‘‘भैयाजी ऐसो आए के हिन्दी में कही जात के साउन के अंधरा खों सबई कछू हरीरो-हरीरो दिखात आए। सो, जेई टाईप की किसां बुंदेली में सोई कही जात आए। सुनो किसां!’’ मैंने कई।
‘‘हऔ तो सुनाओ अब। का भूमिकई बांधत रैहो?’’ भैयाजी चिड़कात भए बोले।
‘‘का भओ भैयाजी के एक हतो भगुंता नाई। ऊकी बड़े-बड़े घरों में पौंच हती। काए से के भगुंता हाथ-पांव की मालिश करबे में अव्वल हतो। एक दिना भगुंता को दूर-दराज को नातेदार गुजर गओ। ऊ मरबे के पैले भगुंता के लाने सोने की दो मोहरें छोड़ गओ। इके पैले भगुंता के पास एकऊ मोहरें ने हतीं, सो दो-दो मोहरें पा के ऊकी बांछें खिल गईं। पर इके संगे ऊको फिकर भई के जे मोहरन खों लुका के राखने परहे, ने तो कऊं कोनऊं छिना ने ले। कऊं कोनऊ चोर चुरा ने ले जाए। भगुंता ने सोची के घर की किवरियां खो कौन भरोसो, जा तो एकई लात की आए। इसे तो मोहरन खों संगे राखने में भलाई कहानी। सो, मोहरें राखने के लाने भगुंता को कोऊ जागां ने सूझी सो ऊने एक डबिया लई, ऊमें दोई मोहरे राखी औ डबिया खों अफ्नी मालिस की पेटी में धर लई।
‘‘अब ठीक आए। अब मोरी मोहरन खों कोनऊ हाथ ने लगा पैहे।’’ भगुंता ने सोची। काए से के पेटी तो बरहमेस ऊके संगई बनी रैत्ती। अब तो भगुंता अपनी पेटी खों औरई अपने कलेजे से चिपटाए रहन लगो।
एक दिना भगुंता सरपंच की मालिश कर रओ हतो। दोई जनों में कछू-कछू बतकाव सोई चल रई हती। सरपंच ने भगुंता से पूछी-‘‘काए रें, भगुंता। तोये तो पतो हुइये के गांव में का चल रओ?’’
‘‘आप मालक की किरपा! सब ठीकई चल रओ।’’ भगुंता बोलो।
‘‘कोनऊ खों कोई तकलीफ-परेसानी तो नइयां?’’ सरपंच ने पूछी।
‘‘तकलीफ परेसानी काए की? अपने तो गांव में भिखमंगा सोई सोने की दो-दो मोहरे राखत आएं।’’ भगुंता ऐंड़ के बोलो।
सरपंच ताड़ गओ के दाल में कछु कारो आए। सरपंच ने जा खबर तो सुन रखी हती के भगुंता खों अपने नातेदार के मरबे पे दो मोहरे मिली रईं। हो न हो, जा भगुंता ऊ मोहरन के लाने कै रओ। फेर सरपंच ने सोची के, बा मोहरे जा अफ्नी जेई पेटी में राखत हुइए, तभईं तो जा पेटी कलेजे से चिपटाए फिरत आए।
‘‘जारे, भगुंता! जा के भीतरे से तनक बिजना तो उठा ला। तनक गरमी सी लग रई।’’ सरपंच ने भगुंता से कई औ ऊको उते से टरका के, ऊकी पेटी थथोल डारी। सरपंच के हाथ बा डबिया लग गई जा में भगुंता ने मोहरे रखी हतीं। सरपंच ने सोची के जा भगुंता बड़ो ऐंड रओ आए, जा के लाने भगुंता खो सबक सिखाओ जाए। औ सरपंच ने डबिया से मोहरे निकार लई। तब लो मगुंता भीतरे से बिजना उठा लाओ। भगुंता समझई ने पाओ के ऊके पाछूं सरपंच ने ऊकी मोहरे निकार लई आएं।
सरपंच के इते से लौट के भगुंता ने अपनी पेटी जांची। ऊने डबिया में से मोहरे नदारत पाई। ऊको जी धक से रै गओ। ऊने पूरो घर छान मारो, मोहरें कहूं ने मिली। ऊने सोची के पेटी खोलत-करत में मोहरे कहू गैल में हेरा गई हुइएं। बा जे तो सोचई ने सकत्तो के सरपंच ऊकी मोहरे निकार सकत आए।
ऊ दिनां से भगुंता उदास रैन लगो।
ऊकी उदासी देख के एक दिनां सरपंच ने ऊसे पूछी- ‘‘काए रे भगुंता! तोये तो पतो हुइए के गांव में का चल रओ?’’
‘‘रामधई, बड़ो बुरओ चल रओ आए। मालक की किरपा नई रई, मालक रूठे कहाने। ’’ भगुंता ने मों लटका के कई।
‘‘काए? ऐसो का हो गओ? कौन-सी विपदा आन परी? अपने तो गांव में भिखमंगा सोई सोने की दो-दो मोहरें राखत आए।’’ सरपंच ने पूछी।
‘‘हजूर, अब कहां धरीं दो मोहरें।’’ भगुंता खिसियानो सो बोलो।
‘‘काए? तुमई तो कहत्ते के अपने गांव में भिखमंगा सोई सोने की दो-दो मोहरें राखत आएं।’’ सरपंच ने चुटकी लई।
‘‘अरे हजूर, ने पूछो। मोय तो कछु समझई में नई आत। जब लो मोरे ऐंगर दो मोहरे रईं सो मोये सबई के ऐगर मोहरें दिखात रईं। अब मोरी मोहरे हिरा गई सो मोये लगत आए के ई गांव में सबई के सब कंगला हो गएं। सो मोसेे से कछू ने पूछो, हजूर!’’ भगुंता की आंखन से टप-टप अंसुआं झरन लगे।
जा देख के सरपंच को जी पसीज गओ।
‘‘वाह रे भगुंता। तेरी तो बोई किसां ठैरी के दुनिया कैसी, मोए जैसी। जो मैं दुखी, सो दुनिया दुखी। जो मैं खुशी तो दुनिया खुशी। अरे मूरख, जे दुनिया खों अफ्नो घाई ने देखो कर। तू, तू आए औ दुनिया, दुनिया आए। सबई की अपनी खुशी औ अपने दुक्ख होए आएं। समझ परी कछू?’’ सरपंच ने भगुंता से कई और ऊकी सोने की दोई मोहरें ऊकी गदेली पे धर दईं।
भगुंता अपनी मोहरें देख के भौतई खुश हो गओ। बाकी ऊको समझ ने परी के सरपंच के लिंगे ऊकी मोंहरें कां से आई। पर ऊको ईसे का? कऊं से आई होय? मिल तो गईं। फेर सरपंच से पूछो बी नई जा सकत्तो।
ऊको खुश देख के सरपंच ने फेर ऊसे पूछी-‘‘काए भगुंता, अब गांव को का हाल-चाल आए?’’
‘‘मालिक की किरपा! अब सब ठीक हो गओ।’’ भगुंता पैले घाई चहक के बोलो।
‘‘सो अब कोनऊ खों कोऊ तकलीफ-परेसानी नइयां?’’ सरपंच ने फेर के पूछी।
‘‘काए की परेसानी, अपने गांव में भिखमंगा सोई सोने की दो-दो मोहरे राखत आए।’’ भगुंता पैलई घांईं बोलो।
जा सुन के सरपंच ने अपनो मूंड़ पीट लओ। औ मनई मन सोचन लगो के जे भगुंता तो मोहरन को अंधरा आए। जा नईं सुधर सकत।
‘‘सो भैयाजी, जा हती किसां।’’ किसां खतम करत भई मैंने कई।
‘‘हऔ, नोनी किसां हती। जा सो बई बात भई के दुनिया कैसी? मोय जैसी!’’ भैयाजी हंस के बोले।
‘‘हऔ भैयाजी! जेई तो सोचबे की बात आए के जब लों कछू पार्टी वारे जेई सोचत रैहें के दुनिया उनई के जैसी आए, तबलौं बे कभऊं ने जीते पाहें। अबे बी टेम आए के बे अपनी सोच बदल लेंवें, ने तो राम नाम सत्त हो जैहे।’’ मैंने कई।
‘‘ठीक कई बिन्ना!’’ भैयाजी ने मोरी बात की समर्थन कीे।
आप ओरें सोई सोचियो, जो मैंने झूठ कई होय! बाकी, बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की।
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Thursday, February 8, 2024

बतकाव बिन्ना की | इते एक्जाम चल रए, उते टाईगर घूम रए | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | प्रवीण प्रभात

बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | सा. प्रवीण प्रभात
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बतकाव बिन्ना की
इते एक्जाम चल रए, उते टाईगर घूम रए ! 
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
       ‘‘बिन्ना तुम कुल्ल टेम से लगी हो के तुमें नौरादेही टाईगर रिर्जव जाने। अब चलों हम तुमें पन्ना नेशनल पार्क लिवा चलहें।’’ भैयाजी बड़े अच्छे मूड में दिखाने।
‘‘आप हमें ने बनाओ! इते इत्ते पास नौरादेही लौं अब तक नईं लिवा ले गए औ बतकाव कर रए पन्ना नेशनल पार्क की।’’ मैंने सोई भैयाजी खों उलाहना दओ।
‘‘नई सच्ची, हम तुमें और तुमाई भौजी, दोई जनों खों नेशनल पार्क लिवा ले चलहें।’’ भैयाजी फेर के बोले।
‘‘काय उते का खास हो गओ जो आप नेशनल पार्क को रट्टा दे रए?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘काय तुमने अखबार नई पढ़ो का? सबरे अखबार में बड़े-बड़े अक्षरन में खबरें छपी आएं के पन्ना नेशनल पार्क में सवा घंटा में दस ठईयां टाईगर दिखाने।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ! मैंने सोई पढ़ी रई। ऊ टाईगर हरन की पूरी फेमिली संगे हती। बाघ रए, बाघिन रई औ संगे उनके मोड़ा-मोड़ी मने उनके बाल-बच्चा सोई रए।’’ मैंने कई।
‘‘जेई से तो हम सोच रए के इते नौरादेही में सो कछू लड़ईयां, खरगोश, बंदरा औ पंछी-मंछी देखबे खों मिलहें, मनो उते तो टाईगर को पूरो कुनबा दिख जेहै।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ, आप कै तो सई रए। कां तो एक टेम ऐसो आ गओ रओ के लगत्तो के उते पार्क में एकऊ टाईगर ने बचहें, मगर अब देखों आप के पूरो कुनबा उते अपनो फैमिली टाईम बिता रओ। जा पढ़ के तनक अच्छो सो लगो। मनो मोय टाईगर के कुनबा से एक औ टाईगर की याद आ गई।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘कोन से टाईगर?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘बेई जोन कैत्ते के ‘टाईगर अभी जिन्दा है’! मनो उने तो जीतबे के बाद प्रदेश-बदर कर दओ गओं।’’ मैंने कई।
‘‘जो का कै रईं? जिला बदर, प्रदेश बदर जे तो अपराधियन खों करो जात आए, तुम कोन की कै रईं? जोन हम समझ रए उनई की, के कोनऊं और की?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘उनई की जोन आप समझ रए। अभईं बे होते सो टाईगर के कुनबा पे सोई कोनऊं अच्छो सो डायलाग बोल रए होते। बाकी भैयाजी, जे जो टाईगर हरों को कुनबा आए का उनकी फैमिली लाईफ की प्राइवेसी को तनकऊं खयाल नईं रखो जात का? हमने अखबार में पढ़ी के बे ओरें बेडरूम सीन कर रए हते औ देखबे वारों खों बा सब बी दिखा दओ गओ। मोय जो नईं पोसाओ।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘तुम तो बेफालतू की कैत रैत हो! अरे, बे तो टाईगर आएं, उनको कोनऊं बेडरूम थोड़ेई होत आए।’’ भैयाजी झुंझलात भए बोले। फेर कछू सोचत भए बोले,‘‘सुनो, ने हुइए तो अपने संगे बा पांड़ेजी की गुड़िया खों सोई लिवा चलहें। बा सोई हमें मुतकी बेर कै चुकी के ऊको टाईगर देखने।’’ भैयाजी बोले।
‘‘जो गुड़िया खों संगे ले चलने आए तो एक्जाम खतम होबे को इंतेजार करने पड़हे। काय से के अबे तो स्कूलन के एक्जाम चालू हांे गए। औ आपको पता भैयाजी, उते एक्जाम टेम पे उन ओरन खों फट्टी पे जमीन पे बैठने परो। ई पे जबे हल्ला मचो तब उन ओरन के लाने कुर्सी टेबल को इंतजाम करो गओ। बा इंतजाम पैले बी तो हो सकत्तो। कोनऊं एक्सीडेंट घांई अचानक से एक्जाम थोड़ेई होन लगे। कुल्ल दिना पैले एक्जाम की डेट बता दई जात आए। फेर बी बे बच्चन के लाने कुर्सी-टेबल को इंतजाम पैले से ने कर सके। मनो जो कोनऊं हल्ला ने करतो तो पूरो एक्जाम का फट्टी पे ई निपटा दओ जातो? मोय तो जे तरीका समझ में ने आओ।’’ मोय कैत-कैत गुस्सा सो आन लगो।
‘‘तरीका जे आए बिन्ना, के अपने इते जब लौं कोनऊं मर-मुरा ने जाए तब तक लौं सड़क के गड्ढा लौं नई भरे जात, सो जे तो एक्जाम की बात आए। अपने इते प्रशासन व्यवस्था कड़क मम्मी घांईं आए। के जब लौं बच्चा रो-रो के हलाकान ने हो जाए, बा ऊको दूध लौं नई पिवात।’’ भैयाजी बोले।
‘‘सांची कई आपने! बाकी गर स्कूलन की छोड़ दई जाए तो आप देखो सबरे नेता हरन को एक्जाम सो चलई रओ।’’ मैंने कई।
‘‘एक्जाम नोईं, एक्जाम की तैयारी कओ! एक्जाम सो अबे हुइए। फेर हार-जीत में पतो परहे के कोन की तैयारी अच्छी भई रई हती औ कोन की पंचर रई।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ तैयारी कै लेओ! मनो आए तो एक्जाम घांई। पब्लिक खों कैसे पटाने, ईकी कोचिंग क्लासें लगन लगी आएं। कऊं जोड़ो यात्रा हो रई, तो कऊं मोड़ो यात्रा हो रई।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘मोड़ो यात्रा? जा कोन सी यात्रा आए?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘मोड़ो यात्रा मने वोटरन खों अपनी ओर करबे की कोशिश वारी यात्रा।’’ मैंने हंस के कई। काय से के जो मोरो ईजाद हतो।
‘‘काय तुमें नई लग रओ के ई बेर को चुनाव एकतरफा सो हुइए? विपक्ष में सो कोनऊं दम ई नईं दिखा रई।’’ भैयाजी बोले।
‘‘इत्ते जल्दी में ने परो भैयाजी! अबे कुल्ल टेम आए। हो सकत के कछू चमत्कार हो जाए।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘चमत्कार का हुइए? अब तो नमस्कार भओ जा रओ। मने टाटा-बाय-बाय। अभईं विधान सभा चुनावन में नई देखों का? औ बा तो रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के पैले को रओ, सो विपक्ष आड़ो डरो दिखानो। अब तुमाओ विपक्ष कोन से खेत काट लैहे?’’ भैयाजी मोए ताना मारत भए बोले।
‘‘मोरो विपक्ष काय को? मैं कोन सी राजनीति वारी ठैरी? औ ने मोए चुनाव में ठाड़ी होने, जो आप मोरो विपक्ष कै रए।’’ भैयाजी की बात सुन के मोरो मुंडा खराब हो गओ।
‘‘तुमई तो चमत्कार की बात कर रई हतीं।’’ भैयाजी ने कई।
‘‘हऔ सो अब्बी कर रई! का विपक्ष के बारे में कछू सोचबे से बा मोरो कहा जेहै?’’ मैंने सोई बहस करी।
‘‘तुमाओ नई भओ, मनो तुमें उनसे सहानुभूति सो हो रई।’’ भैयाजी चिड़कात भए बोले।
‘‘सो ऊमें का भओ? जो कोनऊं कमजोर होय, बीमार होय, परेशान होय, सो का उनके लाने सहानुभूति नईं रखो चाइए?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘रखो, खूब रखो सहानुभूति, बाकी जब बे रोएं सो आंसुवां सोई पोंछ दइयो।’’ भैयाजी मोरो मजाक सो उड़ात भए बोले।
‘‘हऔ पोंछ देबी। रोबे वारों को अंसुवां पोछना पुन्न को काम होत आए।’’ मैंने हंस के कई। काय से के मोय समझ में आ गई रई के भैयाजी मोय जानबूझ के चिड़का रए हते।
   ‘चलो छोड़ो पक्ष-विपक्ष को! जे बताओ के नेशनल पार्क जाबे को कबे को प्रोग्राम बनाओ जाए?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘मैंने कई ना के जो गुड़िया को संगे ले चलने होय सो एक्जाम खतम होबे को इंतजार करने पड़हे। ने तो ऐसो करो जा सकत आए के पैले अपने ओरें हो आएं, फेर जो गुड़िया फुर्सत हो जेहै सो ऊके संगे फेर के चले चलबी।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘हऔ, तुमाओ सोचबो सई आए।’’ भैयाजी बोले। फेर हंसत भए कैन लगे के-‘‘ हौ, औ उते चल के जे बी देख लेबी के उते को सीन बच्चन के देखबे जोग आए के नईं? नई तो पार्क वालन से कैबी के इते ‘सिर्फ वयस्को के लिए’ को बोर्ड लगा देओ।’’
भैयाजी की बात सुन के मोय सोई हंसी आ गई। बाकी इते एक्जाम चल रए औ उते टाईगर हरें घूम रए। जंगल वारे टाईगर सो एक्जाम के बाद लौं घूमहें, मनो चुनावी एक्जाम के बाद राजनीति वारे टाईगर हरों को का हुइए, कछू कओ नई जा सकत। चाए जीतें, चाए हारें, उने कोन से पार्क भेज दओ जाए, जा कोनऊं खों नईं पतो।
बाकी सबरे एक्जाम भूल-भाल के हम ओरें नेशनल पार्क जाबे की प्लानिंग करन लगे। जबें हो आहें सो बताहें, ने तो बतकाव के लाने कुल्ल टापिक ठैरे हम ओरन के पास। जो लौं चुनाव नई हो जा रए तब लौं टापिक की कोनऊं कमी ने रैहे। ने तो रामजी की किरपा सो बनी कहाई। बो का कैत आएं के ‘राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट।’ जी तरफी देखो राम नाम की ठिलियां सजी दिखा रईं। सबसे बड़ो भक्त होबे की होड़ सी सोई मची आए। रामजी सबकी भली करें! तुलसीदास जी सोई कै गए रए के -
जा पर कृपा राम की होई,
ता पर कृपा करहिं सब कोई।
सो, भैया-बैन हरों, मनो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। तब तक लौं जै रामजी की!
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Thursday, January 18, 2024

बतकाव बिन्ना की | सुमिरन करियो रामलला को, और जलइयो बाती | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | प्रवीण प्रभात

बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | सा. प्रवीण प्रभात
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बतकाव बिन्ना की
सुमिरन करियो रामलला को, और जलइयो बाती
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
       सुमिरन करियो रामलला को,और जलाइयो बाती।
        सगरी  बिपदा दूरई रैहे, दिन होय चाए अधराती।।
- जो मैं भैयाजी के इते पौंची तो भौजी को जो गानो सुनाई परो। भीतरे पौंच के देखी तो भौजी भीतरे को आंगन लीप रई हतीं औ गाना गाउत जा रई हतीं। मैं उतई चुपचाप ठाढ़ी हो के उनको गाना सुनन लगी।
‘‘अरे बिन्ना तुम कब से ठाढ़ीं?’’ तभई भौजी की मोपे नजर परी औ बे गानो भूल के मोसे पूछन लगीं।
‘‘अबई आई। आप भौतई अच्छो गात हो। चुप काय हो गईं? गाओ न!’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘अरे कां? बा तो ऊंसई गान लगी।’’ भौजी टालत भई बोलीं।
‘‘अरे, जे आप भीतरे को आंगन काय लीप रईं? यां तो फर्शी लगी।’’ मैंने भौजी से पूछी। काय से के मैंने देखी के भौजी ने फर्शी पे सोई गोबर से लीप रखो हतो।
‘‘फर्शी भले आए, पर जब लौं गोबर से लिपाई ने करो तब लौं लगत नइयां के कोनऊं खास त्योहार अपन मना रए।’’ भौजी बोलीं।
‘‘सो अब कोन सो त्योहार आ रओ? अबई तो सकरायत कढ़ी आए।’’ मैने उनसे पूछी। काय से के 15 जनवरी खों सकराय मनाई गई औ 26 जनवरी आबे में अबे कुल्ल टेम हतो।
‘‘काय? रामलला की प्राणप्रतिष्ठा अपने ओरन खों नई करने का?’’ भौजी ने मुस्क्याते हुए मोसे पूछी।
‘‘अरे हऔ! करने काय नइयां? सो जे लाने आपकी तैयारी चल रई! अब समझ में आई। मनो अबईं तो 22 तारीख में कछू टेम आए। बोई दिनां, ने तो एकाद दिनां पैले करतीं लिपाई। तब तक लौं जे बासी ने पर जैहे?’’ मैंने भौजी से पूछी।
‘‘ऊं दिनां तो ताजी लिपाई करबी, मनो जे ठैरी फर्शी, ईपे जब लौं लिपाई की दो-तीन लेयर ने हो जाए सो चमकत कोन आए।’’ भौजी ने बड़ी प्रैक्टिकल बात करी।
‘‘हऔ, बात तो आपकी सई आए। सो, तोरन-मोरन सोई मंगा लइयो। बाकी मैंने एक भैयाजी से कओ तो आए के मोय सोई रामलला वारो झंडा ला देओ, घरे लगाबी।’’ मैंने भौजी से कई। बात बे सई कैरई हतीं। 26 जनवरी के पैले सो 22 जनवरी आबे वारी, जोन दिनां अजोध्या में रामलला की प्रणप्रतिष्ठा करी जाने।
‘‘अपने इते जो मंदिर आए न, उते सोई ऊ दिना कथा औ यज्ञ हुइए, संगे प्रसादी सोई बांटी जाहे।’’ भौजी बतान लगीं।
‘‘हऔ, कोनऊं कै तो रओ हतो। बाकी मैंने तो सोची आए के ऊं टेम पे मैं टीवी में अजोध्या में होबे वारी प्राणप्रतिष्ठा को सीधो प्रसारण देखबी, फेर ऊंके बाद मंदिर वारे कार्यक्रम शामिल होबी। अब आपई सोचो के घरे बैठे जो उते को सजीवन हाल देखबे को मिल रओ होय तो ऊको काय छोड़ो जाए?’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘हऔ, तुमाए भैया सोई जेई प्लानिंग कर रए हते। बे तो हमसे कैन लगे के तुम तो 21 तारीख लौं गुड़ के लड़ुआ बांध लेओ और तनक खुरमा-बतियां बना लेओ। 22 तारीख के लाने कछू ने राखियो। काय से के उने लग रओ के हमाओ टेम चैका-चूला में उरझ ने जाए। पर उने का पतो के हमने पैलई से सब सोच रखो आए। ऐसो करियो बिन्ना के तुम सोई इतई आ जइयो। अपन ओरें सगे बैठ के टीवी पे उते की प्राणप्रतिष्टा देखबी, फेर संगे मंदिर चलबी।’’ भौजी ने मोसे कई।
‘‘हऔ भौजी, जे ठीक रैहे। अकेले बैठ के देखबे में मजो बी ने आहे।’’ मैंने भौजी की बात तुरतईं मान लई।
‘‘का हो रओ, ननद भौजी की बतकाव चल रई?’’ इत्ते में भैयाजी बाहरे से आए औ हम ओरन खों बतकाव करत देख के बोल परे।
‘‘हऔ! हम दोई 22 तारीख के लाने प्लानिंग कर रए।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘कित्तो अच्छो लग रओ न! सबई जांगा जेई-जेई बतकाव चल रई।’’ भैयाजी खुश होत भए बोले।
‘‘रामधई भैयाजी! मोय तो अब समझ में आन लगो के ऊं टेम पे अजोध्यावासी में कित्ते खुश भए हुइएं। बा टेम की खुशी को अंदाजा आज लगाओ जा सकत आएं।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘मनो बो टेम औ अब के टेम में भौतई फरक आए बिन्ना!’’ भैयाजी बोले।
‘‘कैसो फरक?’’
‘‘ऐसो फरक के ऊं टेम पे अकेली अजोध्या नोईं, पूरी एशिया में हिन्दुअई हिन्दू रैत्ते। भगवान ब्रह्मा, बिष्णु, महेश खों पूजबे वारे, मनो आज के टेम पे सबई धर्म के लोग अजोध्या में बी रै रये। मनो देखो तो सबई में कित्तो उत्साह दिखा रओ। है न ऊं टेम औ ई टेम में फरक?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘हऔ, आप बिलकुल सांची कै रए। अबई ऊं दिनां अपने मोहल्ला के कारसेवक हरें अक्षत ले के आए रए, ऊंमें हिन्दू हते, मुसलमान हते, सिख औ जैन सोई हते। सबरे भैया-बैन ऐसे बुलौवा दे रए हते मनो उन्हई के इते कोनऊं डस्टोन मनाओ जाने होय। भैयाजी जेई तो आए अपन ओरन की अनेकता में एकता।’’ मैंने सोई भैयाजी से कई औ कैत-कैत मोरो मन जोश से भर गओ।
‘‘चलो आओ तुम दोई इते औ हमाओ हाथ बंटाओ।’’ भौजी हम दोई से बोलीं।
भौजी ने मोरे हाथ में रुई थमा दई औ बोलीं,‘‘ईकी फूलबतियां बना डारो।’’
‘‘औ, आप इते बैठो औ जे माला गूंथ डारो।’’ भौजी ने भैयाजी खों गेंदा के बे नकली वारे फूल और पत्ते पकरा दए।
‘‘जे वारे काय गुंथवा रईं? हमने तो कई आए के ऊं दिना असली वारे लान दैहें।’’ भैयाजी बोले।
‘‘जे घर की सजावट के लाने आए। बाकी पूजा और तोरन के लाने एक दिनां पैलई हमाए लाने लान दइयो। उनको हम फ्रिज में रख देबी सो बे ताजा बने रैंहें। काय से के, कओ ऊं दिनां बजार में फूलई ने मिलें। सबई बढ़ा जाएं।’’ भौजी बोलीं। बे दूर की सोचत आएं।
‘‘सई कई तुमने!’’ भैयाजी ने बी उनकी बात को समर्थन करो।
‘‘तो चलो अपन ओरें बधाई गाबे की प्रेक्टिस सोई कर लैबें।’’ कैत भईं भौजी आंगन के किनारे-किनारे चूना से ढिग धरत भईं मधुरला गान लगीं। भैयाजी औ मैंने सोई उनके संगे गाबो शुरू कर दओ। बाकी जोन खों नई पतो सो जान लेओ के बुंदेलखंड में मधुरला संतान होबे के दसवें दिन डस्टोन मनाबे के समै गाओ जात आए-
अरे हां-हां मधुरला, हां रे मधुरला
बाजे मधुर औ सुहावनों,
मोरे अंगना में आए मोरे राम, मधुरला राम
मधुरला, हां रे मधुरला ....
अरे हां रे मधुरला, गउअन के गोबर मंगाइयो
अरे ढिग धर आँगन लिपइयो, मधुरला लिपइयो
मधुरला, हां रे मधुरला ....
अरे हां रे मधुरला, मुतियन चौक पुराइयो
अरे चंदन की पटली धरइयो मधुरला धरइयो
मधुरला, हां रे मधुरला ....
अरे हां रे मधुरला, कंचन कलश रखाइयो
अरे चौमुख दियल जरइयौ, मधुरला जरइयौ
मधुरला, हां रे मधुरला ....
सो हम ओरें काम करत-करत मधुरला, बधाइयां, सबई कछू गात रए। मोय तो जेई उत्साह सबई तरफी दिखा रओ। राम धई! मनो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। जैराम जी की!!!
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Thursday, January 11, 2024

बतकाव बिन्ना की | भौजी की धमकी औ सकरायत के लड़ुआ | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | प्रवीण प्रभात

बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | सा. प्रवीण प्रभात
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बतकाव बिन्ना की
भौजी की धमकी औ सकरायत के लड़ुआ
        - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
       दो दिनां हो गए, जबै भैयाजी के दोरे से कढ़ो सो कभऊं तिली भुंजबे की सुगंध मिली तो कभऊं आटो भुनबे की। मोय समझ में आ गई के भौजी सकरायत के लाने लड़ुआ बना रईं। भौतई अच्छो लड़ुआ बनाउत आएं भौजी। गुड़-मोमफली की पट्टी सोई बड़ी नोनी बनाउत आएं। मैंने सोची के बे बेचारी अकेली लड़ुआ बांध रई हुइएं, सो चलो तनक उनको हाथ बंटा दओ जाए। काए से के लड़ुआ खाबे के लाने सो मोय उनईं के इते जाने, सो लड़ुआ बंधाबे के लाने सोई जाबो चाइए, ऐसी मोय लगी। सो मैं भौजी के इते पौंची। उते जा के जे देख के मोय भौतई अच्छो लगो के भैयाजी सोई उनको हाथ बंटा रए हते। भौजी ने जो मोमफली भूंज के धरी हतीं, उने भैयाजी सूपा पे से फटकारत जा रए हते, जोन से मोमफली के छिलका अलग हो जाएं।
‘‘राम-राम भौजी! मोय सोई कछू काम बताओ।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘कछू नईं बिन्ना, सब बनत जा रए।’’ भौजी बोलीं।
मोय जे देख के सोई बड़ो मजो आओ के बे आंगन में लकड़िया वारे चूला पे जे सब काम कर रईं हतीं। ने तो आजकाल तो सबई जनीं गैस के चूला पे बनाउती हैं, मनो अगर बनाने होय तो! ने तो इत्ते माॅल खुल गए, के उते हर त्योहार पे सब कछू मिल जात आए। मनो उनमें घर के बने को स्वाद कां मिलने?
सो मैं सोई चूला के बाजू से बैठ गई औ हाथ तापन लगी। ऊंसई दो-चार दिनां से कोहरा-सो छाओ रओ, सो जड़कारो घनो हो चलो आए। सच्ची, चूला में हाथ तापे में भौतई अच्छो लगत आए।
‘‘चलो जो लो तुमाए भैया मोंमफली साफ़ कर रए, तब लौं चाय बना लई जाए।’’ भौजी बोलीं।
‘‘हौ, अच्छो अदरक डारियो!’’ भैयाजी बोल परे।
‘‘हौ, जैसे आपखों मिली जा रई? इते दो कप बन रई। एक हमाए लाने औ एक बिन्ना के लाने।’’ भौजी आंखें दिखात भईं भैयाजी से बोलीं।
मोय जे सुन के अचरज भओ। काए से के इते आ के मोय लग नई रओ हतो के भैयाजी और भौजी के बीच कोनऊं रार चल रई हुइए।
‘‘का हो गओ भौजी? भैयाजी से काय खफा हो?’’ मैंने भौजी से पूछी।
‘‘इनई से पूछो! हम एक तो फायदे की बात कर रए औ इने कछू समझ ने आ रई।’’ भौजी भैयाजी खों फटकारत भई बोलीं।
‘‘का हो गओ भैयाजी? हमाई भौजी खों काय नाराज कर दओ?’’ अब की बेर मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘अब का कहें बिन्ना! तुमाई भौजी को न जाने कां-कां की सूझत आए। इन्ने आज भुनसारे अखबार में न्यूज पढ़ लई के महिला किसानों के लाने सम्मान निधि 6 हजार रुपइया से बढ़ा के 12 हजार रुपइया करी जा रई, बस, तभई से हमाए पांछू लगीं आएं के हमाए लाने खेत खरीद देओ, चाय दो-चार एकड़ को होय। अब तुमई बताओ बिन्ना के जे पैले घरई तो सम्हार लें, फेर खेत सम्हारहें। का करबी खेत खरीद के?’’ भैयाजी बोले।
‘‘अच्छा! औ बैठे-बिठाए के 12 हजार रुपए तुमें धतूरा से लग रए? अरे हमाए नांव पे खेत हुइए सो हम कहलाबी महिला किसान औ हमें मिलहे सम्मान राशि 12 हजार रुपए। का सुनी? तनक समझो। तनक हिसाब-किताब करो! पढ़े-लिखे आओ!’’ भौजी ने भैयाजी से कई।
  ‘हम तो समझ रए, बाकी तुम नईं समझ पा रईं।
‘‘हम का नईं समझ पा रए?’’ भौजी बमक परीं।
‘‘जेई, के जे सब में बाद में पतो परत आए के कोन खों मिलने औ कोन खों नईं मिलने। काय का तुमें लाड़ली बहना वारो पइसा मिलो?’’ भैयाजी ने भौजी खों याद कराई।
‘‘बा बात अलग हती।’’ भौजी बोलीं। उने तो खेत खरीदबे की धुन सवार दिखा रई हती।
‘‘अलग काय को हती? अबई ईमें सोई देखियो को कोन सो क्राइटेरिया बनाओ जात आए?’’ भैयाजी भौजी से बोले। फेर मोसे कहन लगे-‘‘बिन्ना हमें तो जेई समझ में आ रई के अपनो एमपी वारो फार्मूला उते केन्द्र वारन को सोई पोसा गओ। उन्ने देखी के लुगाइयन खों साध लेओ, सो सब सध जाने। अखीर लाड़ली बहना योजना नेई तो इते जीत दिलाई।’’
‘‘हऔ, बात ने टालो! हमें खेती वारी जमीन देवा देओ। देखों, मनो जो हमें सम्मान वारो पइसा ने बी मिलो तो अपनो खेत तो कऊं जाहे नईं। काय बिन्ना, हम ठीक कै रै न!’’ भौजी ने मोसे पूछी।
‘‘हऔ, आप बिलकुल ठीक कै रईं।’’ मैंने भौजी की बात को समर्थन करो, सो भैयाजी मोय गुस्सा में घूरन लगे।
‘‘हमाई बिन्ना पे गुस्सा ने दिखाओ! ने तो हम आपके लाने ऐसो लड़ुआ बनाबी के जो आपके मूंड़ पे मारो जाए तो आपको मूंड़ई फूट जाए।’’ भौजी ने भैयाजी खों धमकाओ औ मोय उनकी धमकी सुन के हंसी आ गई। मनो लड़ुआ ने भए तोप के गोला भए।    
अब जे तो बाद में पता परहे के कोन ने कोन की बात राखी। मनो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम! औ अबई से हैप्पी सकरायत!
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Thursday, January 4, 2024

बतकाव बिन्ना की | काए नए साल के लाने का प्लानिंग करी? | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | प्रवीण प्रभात

बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | सा. प्रवीण प्रभात
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बतकाव बिन्ना की
काए नए साल के लाने का प्लानिंग करी?
        - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
           नए साल के पैलई दिनां ने चाय ने भजिया की पूछी औ पूछन लगे के ‘‘काय बिन्ना, तुमने नए साल के लाने का सोची? का प्लानिंग करी?’’
‘‘का सोचिए, नए साल को मोरो महूरत खराब भओ जा रओ!’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘माने?’’
‘‘माने जे के इत्तो अच्छो जड़कारो आए। के कां तो आप मोए भजिया खवाउते सो पूछ रए के नए साल के लाने का सोची? अरे मोए कोन चुनाव लड़ने के कछू सोचो जाए। जोन-जोन खों ई साल चुनाव में ठाड़े होने बे सोचें। मने बे सोई सोचें जिनके लाने अबे लौं कछू मनचाओ विभाग नई मिलो। मोए काए को सोचने?’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘अरे, हमाओ मतलब बा ने हतो। तुमें भजिया खाने सो ऐसे कओ! हम अभईं बनवा देत आएं।’’ भैयाजी ने कई औ भौजी खों टेर लगा दई।
‘‘सो आप को मतलब का हतो?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘हम सो जे पूछो चा रए हते के ई मईना उते अजोध्या में रामलला की मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा करी जाने है, सो तुमने उते जाने को प्लान बनाओ का?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘नईं! इत्ते जड़कारे में उते को जा रओ? ऊपे उते मुतकी भीड़ पड़हे। ने रेल में जागां मिलहे औ ने उते ठैरबे के लाने कछू मिल पैहे। मोए तो अबे नई जाने, बाकी एक अजोध्या वारे सज्जन से हमने बिनती कर तो रखी आए के जे कार्यक्रम के बाद मोए लिवा ले चलियो। अब जो बे लेवा जैहें सो उने पुन्न मिलहे ने तो बाकी रामजी जानें।’’ मैंने भैयाजी खों अपनी योजना बताई।
‘‘सोची तो तुमने नोनी आए। काए से के उतई के रैबे वारे कोनऊं होय तो अच्छे से दरसन हो जैहें। काए से अब तो उते सबई कछू बदल गओ। जब हम दसेक साल पैले गए हते तो उते काम लगो परो हतो। औ बस्ती सोई ऊंसई हती, मनो अब तो हमने सुनी के उते सबई कछू बदल गओ।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ, सुनी का, टीवी में नईं देखी का? ऊमें सो रोजई दिखा रए। बा देख-देख के मोरो सोई जी करन लगो है के एक दार उते जा के सजीवन देख लओ जाए।’’ मैंने अपने जी की बात भैयाजी से कै दई।
‘‘तुमाई भौजी सो चैबिसोई घंटा ठेन दे रईं के अजोध्या लेवा ले चलो। बाकी तुमने सई सोची। हम सोई तुमाई भौजी खों समझाबी के अभईं ठैर जाओ, तनक प्राणप्रतिष्ठा हो जाए फेर आराम से चलबी।’’ भैयाजी को मोरी बात जंच गई।
‘‘औ का, एक दफे रामलला उते पधार जाएं फेर तो उतई रैंहे। फेर कोन उनको कऊं जाने? मनो जो ई जड़कारे में अपन ओरें उते धक्का खात जाएं औ कऊं बिमार पर गए सो उतई रामनाम सत्त हो जैहे। उते तो औ ठंड परत आए। उते से अपने इते तो कछू कम रैत आए। मनो भैयाजी जे सोचो के जेई जड़कारे में जब कुंभ को मेला भरो रओ इलाहाबाद वारो, सो सबरे जने गए रए उते। मनो जो मन में जोश होय सो जड़कारो को होश नईं रैत।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘औ का! ऊंसई देख लेओ के पूनो-अमावस में बरफ घांईं पानी में सबरे मजे से डुबकी लगा लेत आएं। इते तो बाल्टी के पानी में छिगरियां लो नई डारी जात। बे ओरें को जाने कैसे बुड़की लगा लेत आएं? वा बी एक नोईं तीन-तीन बेर।’’ भैयाजी सोचत भए बोले।
‘‘भैयाजी मोय तो एक बात पतो आए के मन चंगा सो कठौती में गंगा।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘का मतलब ईको?’’ भैयाजी को मोरी बात समझ में ने आई।
‘‘काय, आपने रैदास जू की जे बात कभऊं नईं सुनी का?’’ मोए तनक अचम्भो भओ।
‘‘सुनी तो आए, मनो अब भूल से रए।’’ भैयाजी झेंपत भए बोले।
‘‘चलो मैंने आपके लाने शाॅर्ट में जे किसां सुनाए दे रई। का भओ के आप जानत हो के रैदास जू बड़े अच्छे कवित्त रचत रए। संगे पेट भरबे के लाने जूता सियत को काम सोई करत रए। अब उनको इत्ती फुर्सत ने मिल पाती रई के बे रोज-रोज गंगा मईया के दरसन करबे जा सकें। एक पंडतजी रए बे उने रोज ठेन करत्ते के तुम जो जे गंगा मैया के दरसन करने नई जात आओ, सो तुमाओ जनम बिरथा भओ जा रओ। एक दिना रैदास जू ने उन पंडतजी से पूछ लओ, के उते नदी पे जा के गंगाजी के दरसन ने करबे से का हुइए? पंडतजी उने डरात भए बोले के तुमाओ अगलो जनम लो मिट जैहे। जा सुन के रैदास जू मुस्काए और उन्ने जूता सिलत के टेम काम में आबे वारो पानी जो लकड़िया के कटोरा में रखो हतो, ऊमें अपनो हाथ डारो औ गंगा मैया को मनई मन जपत भए बोले- मन चंगा तो कठौती में गंगा। रैदास जू ने इत्तो कऔ भर के उनके बा कटोरा में गंगा मैया साक्षात प्रकट हो गईं। अब पंडतजी चकराए। बे गंगा मैया से बोले के जो हम रोज आप के इते मों अंधेरे बुड़की लगाऊत आएं सो आपने हमें तो कभऊं दरसन ने दए औ जे जो रैदास कभऊं आपके लिंगे नईं पौंचत, ईके कटोरा में आप प्रकट हो गईं, जे का लीला आए? तब गंगा मैया ने पंडत जी को समझाई के सच्चे मन से जो हमें, ने तो चाए कोनऊं भगवान खों याद करे, ऊको दरसन घरे बैठे मिल जात आएं। जे हमाओ परम भक्त आए। अपनो काम करत रैत आए औ काम करत बेरा हमाओ नांव जपत रैत आए। जेई से हम ईकी कठौती में प्रकट भए। गंगा मैया की बातें सुन के पंडतजी की आंखें खुल गईं। सो जे किसां आए कठौती में गंगा वारी।’’ मैंने उने शाॅर्ट में पूरी किसां सुना दई, जोन मैंने अपने लरकपन से सुन रखी आए।
‘‘हऔ बड़ी नोनी किसां आए। औ सई तो आए के जब सहूलियत होय सो दरसन कर आओ, भैराने से फिरबे में का लाभ? देखियो अब जेई किसां सुना के हम तुमाई भौजी खों समझाबी।’’ भैयाजी बोले।
‘‘सो जे कहाए ज्ञान खों दुरुपयोग। जो आप ऐसो करहो सो मनो अपने स्वारथ में आप ईको काम में लाहो।’’ मैंने भैयाजी खों तनक फटकारो।
‘‘अरे अब ऐसो तो ने कओ! आजकाल सब चलत आए। देख नई रईं के सोचत्ते के चुनाव के पैले साग-सब्जी कछू सस्ती हो जैहे मगर देखो तनक, कित्ती मैंगी आ रई। बस, आलू-प्याज तनक सस्ते कहाने, ने तो बाकी सबई हरी सब्जियां मैंगी चल रईं। बटरा को दाम सोई कम नई हो रए।’’ भैयाजी बात पलटत भए बोले।
‘‘जेई तो आए भैयाजी! इंसान की जान सबसे सस्ती चल रई, बाकी सब मैंगोई मैंगो आए। उते देखों नईं के उते गुना में कैसो गजब भओ? बा घटना के बाद दोपहिया तक की चैकिंग होन लगी। मनो जे भैया हरें कोनऊं बड़े हादसे को इंतजार करत रैत आएं। जो पैले से गाड़ियन की चैकिंग होत रैती तो इत्ते लोगन की जान ने जाती। बिचारन की ठठरी लौं ने मिल पाई। सोच केई फुरूरी सी होत आए। रामजी दुस्मन के साथ बी ऐसो ने करें।’’ मैंने कई।
‘‘हऔ बिन्ना! हम ओरन को सोई जी दुखत रओ। अब नए साल में इन ओरन खों कछू ढंग-ढार से करो चाइए। जोन बसें चलबे के जोग ने होंय उने कबाड़ में पौंचा दओ चाइए। हमाओ बस चले तो हम तो एक-एक की अकल ठिकाने लगा देबें।’’ भैयाजी दुखी होत भए बोले।
‘‘हऔ, गुस्सा तो आउत है भैयाजी! मनो अपन ओरें का कर सकत आएं? जोन के करबे के काम आएं, उन ओरन खों ईमानदारी से करो चाइए। बाकी मैंने तो सोच रखी आए के अब देखियो जो कभऊं तला की सफाई के लाने जाबे की बेरा आई सो मैं तो कभऊं ने जैहों। लाखों रुपैया बरबाद करबे के लाने बे ओरें, औ सफाई करबे के लाने अपन ओरें? भौत नाइंसाफी आए।’’ मैंने ‘‘शोले’’ फिलम को डायलाग सोई बोल दओ।
मोरी बात सुन के भैयाजी खों हंसी आ गई। ‘‘शोले’’ के डायलाग को बुंदेली वर्जन उने भौतई मजेदार लगो।
‘‘बाकी तुमने बताई नईं के तुमने नए साल के लाने का सोचो आए? कछू तो प्लानिंग करी हुइए?’’ भैयाजी ने फेर पूछी।  
‘‘लोकसभा के चुनाव हो जान देओ, फेर बताबी।’’ मैंने हंस के कई। इत्ते में गरम भजिया ले के भौजी आ गईं। सो हम ओरें सारी प्लानिंग-वालिंग भूले भजिया मसकबे में जुट गए।
आप ओरें सोई भजिया खात जाओ औ जे पढ़त जाओ। मनो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता मनो अगली साल करबी बतकाव, तब लों भजिया के संगे जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!
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Thursday, December 28, 2023

बतकाव बिन्ना की | जाड़ो, गुरसी औ जाती साल की बतकाव | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | प्रवीण प्रभात

बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | सा. प्रवीण प्रभात
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बतकाव बिन्ना की
जाड़ो, गुरसी औ जाती साल की बतकाव
        - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
       आज सात बजे भुनसारे पैले सूरज देव ने दरसन दए औ फेर साढ़े सात लौं देखतई-देखत कोहरा सो छा गओ। घंटा खांड़ सूरज देव गुल रए। मनो उने सोई जाड़ो लगो औ बे जा के फेर के पल्ली में दुबक गए। बा तो पानी भरने परत आए, ने तो मैं सोई आठ बजे के पैले कभऊं ने उठती। मनो अलारम सो छः बजे से हर पंद्रा मिनट बाद बजत रैत आए औ घड़ी खों टरकात-टरकात सात तो बजाई लऔ जात आए। एक दिनां एक जने मोय सलाह देन लगे के जे जड़कारे के दिनां सेहत बनाबे के लाने अच्छे रैत आएं। भुनसारे जल्दी उठा करे औ मार्निंग वाक पे जाए करे। हमने उनसे कई के भले मानुस, काय तुमने बा कहनात सुनी नई का के जान आए तो जहान आए! जो जड़कारे में हमई टें बोल गए सो सेहत कोन की बनहे? मोरो जवाब सुन के बे अपनो सो मों ले के रै गए।  
 
पैले जाड़ा आबे के पैलई घरों में गुरसी बनन लगत्ती। जोन के इते गुरसी बनात नई बनत्ती उनके इते बनी बनाई ले लई जात्ती। मनो सब के घरे एक ठइयां गुरसी जरूर होत्ती। अब गुरसी को चलन खतमई सो हो गओ आए। आजकाल के बच्चा तो जानतई नईंयां के गुरसी का कहाउत आए। हां, बे ओरें जानत आएं जो अबे लों गांव से जुड़े आएं। उने पतो के गुरसी माअी की बनत आए औ ऊमें चैलियां, कंडा, छोटी लकरियां जलाई जात आएं। पैले ऊमें चूला के अंगरा सोई भर लए जात्ते। फेर संझा से घर के सबई जने बा गुरसी खों घेर के बैठ जात्ते। ढेर सारी बतकाव चलत्ती। ऊ टेम पे जा टीवी-मीवी ने आई हती, जे मोबाईल फोन तो बिलकुलई नई हते। सो सब जने आपस में बतकाव करत्ते। हंा, कोऊ के घरे रेडियो सोई चलत रैत्तो। जीमें बिनाका गीतमाला सुनी जात्ती। ऊ टेम पे अमीन सयानी को नांव सबई कोऊ जानत्ते। यां लो के रिक्शा पे चढ़ के एनाउंसमेंट करबे वारे उनई की आवाज की नकल में बोलत्ते। जे मोरे लोहरे समै की बात आए। ऊ टेम पे घर के भीतरे की चौपाल गुरसी के ऐंगर लगत्ती। उतई चाय बना के लाई जात्ती। मोड़ा-मोड़ियन खों तो ने मिलत्ती, बाकी हम ओरन खों चाउने बी ने रैत्ती। आज बी कोनऊं-कोनऊं घर में भूले-भटके गुरसी दिखा जात आए। खासतौर पे ऊ घरों में जां गांव वारे बूढ़े-ठाड़े रैत आएं औ उनकी घर में कछू चलत आए, ने तो सबई अपने-अपने कमरा में हीटर औ एसी लगा के टीवी औ मोबाईल पे लगे रैत आएं। कां की गुरसी औ कां की चौपाल?

बाकी ई साल को जड़कारो कछू अलगई टाईप को चल रओ। नई-नई! मैं कोनऊं क्लाईमेंट चेंज की बात नई कर रई। मैं तो कै रई सरकार चेंज की बात। नओ चुनाव भओ। पर्टी भली पुरानी जीती, मनो सरकार नई बनी। अपने नए सीएम बने। उनको नओ मंत्रीमंडल बनो। राजनीति में जो ऐसो फेरबदल होय तो घनो जड़कारों में बी लू-लपट चलन लगत आए। बा तो कओ के ऐसी पार्टी ठैरी जोन में सबई सहूरी बांधे रैत आएं, ने तो अबे कोनऊ दूसरी पार्टी होती सो सबई एक-दूसरा के कपड़ा फाड़त दिखात। मनो बतकाव की गरम हवाएं सो चलई रई आएं। जोन ने पैलई दौर में बाजी मार लई बे फूले नई समा रै औ जोन खों अबे पूछो नई गओ बे अपनो जी मसोस के टेम काट रए। मनो, अब तो दूसरी बेरा पे उन सब ओरन की टकटकी बंधी दिखा रई जो जे पैली बेरा में छूंछे रै गए। राजनीति में रैं औ कोनऊं पद ने होय तो काय की राजनीति? को पूछ रओ फेर? जोन के दुआरे भीड़ ठाड़ी रैत्ती, उनके दुआरे आज सूने डरे। अब उनके दिल से पूछो तनक के उनपे का गुजर रई हुइए। मनो पब्लिक तो ईकी आदी आए। पांच साल में एक दफा मों दिखा के, चरन पखार के जात आएं सो अगली चुनाव लों उनको ऐरो लौं नई मिलत।
 
खैर, मैंने सोची कि ई जात की साल में तनक भैयाजी को हाल ले लओ जाए। तनक उनसे बतकाव कर लई जाए, सो मैं भैयाजी के घरे जा पौंची।
‘‘आओ बिन्ना! हम भौतई बोर हो रए हते। तुम अच्छी आ गईं। अब हमाओ कछू अच्छो टाईम पास हो जैहे।’’ भैयाजी मोय देखई सात चहक परे।
‘‘सो काय भैयाजी, आपने मोय टाईमपास मोमफली समझ रखो का, जोन ऐसे कै रए?’’ मोय गुस्सा सी आ गई।
‘‘अरे नईं बिन्ना, तुमने गलत समझ लई। हम तो जे कै रए हते के हम टीवी पे एकई सी बतकाव सुन-सुन के, देख-देख के बोर हो गए रए, सो हमें लग रई हती के जो तुम आ जाओ सो हम भैया-बैन कछू अच्छी सी बतकाव करें।’’ भैयाजी सफाई देत सी बोले।
‘‘हऔ,चलो ठीक!’’मैंने कई। फेर भैयाजी से पूछी,‘‘मनो, भौजी नईं दिखा रईं। कऊं गई हैं का?’’
‘‘हऔ! अब का है के पंद्रा-बीस दिनसं में सकरात आई जा रई, सो बे तिली-मिली लाने बजारे कढ़ गईं। उनको कैनो रओ के अबई से ला के, धो-सुको के तैयारी कर लेबी, सो सई समै पे लड़ुआ बन पैहें।’’ भैयाजी ने बताई। लड़ुआ की बात सुन के मोरे मों में पानी आ गओ।
‘‘काय भैया, जीतबे वारन ने आप खों लड़ुआ ख्वाओ के नईं?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘लूघरा! उन्ने पलट के मों ने दिखाओ औ तुम लड़ुआ की बात कर रईं? तुमें मिले का?’’ भैयाजी ने मोसे पूछ लओ।
‘‘अरे कां? जो आप को कोनऊं ने नई पूछो सो मोय को पूछ रओ?’’ मैंने हंस के कई।
‘‘हऔ! जे नेता हरें कोनऊं के सगे नोंई।’’ भैयाजी तिनक के बोले।
‘‘अब ऐसो ने कओ!’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘काय ने कओ? जे ओरें मैंगाई सो रोक नई पा रए, एकाद लड़ुआई ख्वा देते, सो तनक मन लगो रैतो।’’ भेयाजी अनमने से बोले।
‘‘जे कोन टाईप की बात कर रै आप? आप सो ऐसे बोल रए मनो जीत को लड़ुआ ने भओ, हनुमानजी की मड़िया के दुआरे को भोग हो गओ। के आप दुआरे पे बैठे रए के कोनऊं भक्त भोग चढाहे औ एकाद टुकड़ा आप खों सोई दे जाहे। मोय जम नईं रई आप की जे बात।’’ सच्ची मोय भैयाजी की जे बात जमी नोईं। काय से के भैयाजी जे टाईप के नोईं।
‘‘अरे हम कोनऊं टुकड़ा की बात नईं कर रए। हम जे कै रए के जे आजकाल के नेता हरें कैसे निठुरा से हो गए के पलट के पूछतईं नईंयां। वोट मांगने होय सो पांवन पे लोट-लोट जात आएं। दद्दा, भैया, बहना, भौजी सबरे रिश्ता निकार लेत आएं औ चुनाव खतम सो रिश्ता खतम। का पैले सोई ऐसई होत रओ?’’ भैयाजी ने मोसे पूछी।
‘‘अब मोय का पतो? जे तो कोनऊं बब्बा हरें बता पैंहें जोन ने पैले को जमानो देखो होय।’’ मैंने कई।
‘‘सई कै रईं। अपन ओरन खों सो ऐसई टाईप के नेता मिलत रै। मनो देखियो अगली चुनाव में जो कोनऊं वोट मांगने आहे, हम ऊसे कैबी के पैले लड़ुआ ख्वाओ, फेर वोट मांगियो।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ, चाय बो चुनाव जीते के ने जीते?’’ मैंने हंस के कई।
‘‘औ का? जो उने हमाई ने परी, सो हम उनकी काए सोचें? जो हमें लड़ुआ ख्वाहे, हम ओई खों वोट देबी।’’ भैयाजी भिनकत से बोले।
‘‘जे तो गलत आए भैयाजी! वोट देबे में ऐसी रिश्वतखोरी करहो सो लोकतंत्र कां बचहे?’’ मैंने भैयाजी खों टोंको।
 ‘‘काय को लोकतंत्र? उते संसद में देखो नईं का, के मुतके सांसद एक संगे सस्पेंड कर दए गए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘तो का? उन्ने कछू रार करी हुइए।’’ मैंने कई।
‘‘संसद में सो रार हमेसई से होत रई। मनो जे छोड़ो, ऊकी सोचो के बा प्रस्ताव मान लओ गओ के मरीज ईलाज करात भओ मर जाए सो ऊमें डाक्टर की कोनऊं जिम्मेदारी ने मानी जैहे। भला जे का बात भई?’’ भैयाजी बोले।
‘‘सुनो भैयाजी! जोन को टेम आ जात आए उनको कोनऊं नई बचा सकत।’’ मैंने कई रई हती के मोरी बात काटत भए भैयाजी झुंझलात भए बोल परे।
‘‘तुम कोन तरफी हो? हमें तुमाई कछू समझ में नईं आ रई।’’
‘‘मैं खुदई की तरफी ठाड़ी!’’ मैंने हंस के कई। फेर मैं बोली, ‘‘भैयाजी! आप सोई ने भिनको! नओ साल आओ जा रओ, सो कछू औ नओ-नओ देखबे को मिलहे। बस, दो-चार दिनां की बात आए। तनक सहूरी राखो!’’    
भैयाजी खों सोई समझ में आ गई औ बे सोई हंसन लगे। मनो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता मनो अगली साल करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम! औ अबई से हैप्पी न्यू ईयर!
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Thursday, December 14, 2023

बतकाव बिन्ना की | जो हुइए, अच्छो ई हुइए ! | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | प्रवीण प्रभात

"जो हुइए, अच्छो ई हुइए !" - मित्रो, ये है मेरा बुंदेली कॉलम "बतकाव बिन्ना की" साप्ताहिक #प्रवीणप्रभात , छतरपुर में।
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बतकाव बिन्ना की
जो हुइए, अच्छो ई हुइए !
        - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
       टीवी पे अपने नए मुख्यमंत्री जू खों शपथ लेत देखो। संगे, दोई छुटकल सीम हरों मने डिप्टी सीएम हरों खों को सोई शपथ लेत भए देख लओ। मनो रओ तो जरा सो टेम को काम, पर भीतरे बैठे में जड़कारों लगन लगो हतो। अब आप ओरें कछू गलत ने सोचियो के मैं डिप्टी सीएम हरों खों छुटकल काए बोल रई? छुटकल बोलो, लोहरे बोलो कछू बी बोलो जा सकत लाड़-प्यार में। कभऊं-कभऊं घर के कक्का, दद्दा, जिज्जी कोनऊं बी लोहरे हरों खों बोल देत आएं के ‘‘काय रे नासमिटो! तुमें समझ में ने आ रई?’’ सो, ईको मतलब जे नोईं के बे ओरें उन लोहरे हरों को नासमिटत देखबो चात आएं। जे ऐसे बोल लाड़ में सोई बोले जात आएं। सो आप ओरें कछू औ ने समझियो, ने तो सोचो के मिटत जा रई पार्टी की हवा लग गई मोय। ऐसो कछू नइयां।
मनो मंच पे सबई जने बड़े नोने से लग रए हते। लाड़ली बैनों के भैया सोई उते मंच पे सहूरी बांधे बैठे दिखा रए हते। बाकी जैसे पैले दरबार में नवरतन होत्ते, ऊंसई छै ठइयां राज्य के मुख्यमंत्री हरें औ बड़े वारे नेता हरें, सबई मंच पे जंच रए हते। मोय तो सुन्ने रई अपने मोदी जी के दो बोल, मनो बे बिना बोले कढ़ गए। मोरे जैसे ने जाने कित्ते उने सुनबे के लाने उते मैदान में बैठे रए हुइएं औ ने जाने कित्ते मोए जैसे टीवी के आंगू धुनी रमाए हुइएं। मनो उन्ने सो जे दिसम्बर के जड़कारे खों सरप्राईजन से गरमाने की ठान रखी आए। पैले उन्ने उने ने बनाओ जिनके लाने सबई खों उम्मीद लगी हती। फेर आए, औ ऊंसई से कढ़ गए। माईक मनो छूंछो सो ठाड़ो रओ गओ। अब का कओ जाए, उनकी लीला बेई जाने, मोरी तो इत्ती बु़द्धि नोंई के जे इत्ती बड़ी वारी बातें मोरी समझ में आएं। सो मैंने सोची के तनक भैयाजी के लिंगे पौंचो जाए। बे मोसे ज्यादा सयाने ठैरे। बे कछू बताहें। औ उते उनके आंगन में तनक धूप सोई सेकों जा सकत आए। मैं निकर परी भैयाजी के इते के लाने। अपने घरे के दुआरे पे तारा डारो औ कुची अपने पैजामा की खींसा में रख लई। मनो अब जे सई व्यवस्था हो गई आए के लुगाइयन के पैजामा औ सलवार में सोई खींसा (जेबें) बनाए जान लगे। ने तो कुची तो मानो कऊं फेर बी खोंस लेओ, पर आजकाल के मोबाईल, बे सो कऊं समाई नईं सकत। उनके लानेई जे खींसा बनाए जान लगे। पनना वारे किशोरजी भली करें बे डिजाइनर हरों की!
सो जो मैं भैयाजी के इते पौंची, सो बे धूप में पलका डारे बैठे दिखाने।
‘‘काए बिन्ना, अब तुमें अपने भैयाजी की याद आई? अब लौं कां रईं?’’ भैयाजी ने मोय तानो मारो।
‘‘कऊं नईं घरे टीवी  देख रई हती। मैंने सोची के अपने नए वारे मुख्यमंत्री जू शपथ ले लेवें फेर आप के इते पौंचो जाए।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘काय, तो का हमाए इते टीवी नइयां, के हम टीवी देखत नईं जानत? के जो तुम अपने घरे टीवी ने देखतीं तो नए वारे मुख्यमंत्री जू शपथ ने लेते़?’’ भैयाजी ने औरई खिंचाई करी।
‘‘अरे, ऐसो कछू नईं! बस तनक आलस सी हो रई हती, सो बिस्तर पे लेटे-लेटे बा प्रोग्राम देखों, मनो उत्तेपेई जड़कारो लगन लगो। बाहरे उत्ती समझ नईं परत, मनो भीतरे ज्यादा ठंड लगत आए।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘चलो ठीक रओ! हमने सोई पूरो प्रोग्राम देखो। वैसे सांची कैं सो पैले उते को जंका-मंका देख के लग रओ हतो के प्रोग्राम लंबो चलहे। मनो पीएम के आतई सात तीनोई खों शपथ दिला दओ गओ औ फेर तुरतईं अपने पीएम जू छत्तीसगढ़ के लाने निकर गए। बाकी हम तो उनको सुनबे के लाने तरस गए।’’ भैयाजी ने बोई बात कै दई जो मोय लगी हती।
‘‘हऔ भैयाजी! मोय सोई दुख भओ, काय के उनको भाषण अच्छो सो लगत आए।’’ मैंने सोई अपने मन की बात कै दई। अपने पीएम सोई जेई पक्ष के आएं के अपने मन की बात कै दओ चाइए। सो मैंने सोई अपने मन की बात भैयाजी से कै दई।
‘‘अरे सुनो बिन्ना, काल बड़े मजे की बात भई! ’’ भैयाजी तनक चहक के बोले।
‘‘का बात भई?’’ मैंने पूछी।
‘‘ भई जे के तुम उनको जानत हो, बे पंडज्जी ढाना वारे! जो कभऊं-कभऊं हमाए इते आऊत रैत आएं।’’ भैयाजी ने मोसे पूछी।
‘‘हऔ! का भओ उनको?’’ मैंने पूछी।
‘‘उनको कछू नई भओ। बे काल हमाए इते आए रए दुफैरी में, जेई टेम पे। उने गल्लामंडी में कोनऊं काम रओ। उनको काम तनक जल्दी निपट गओ सो बे जात बेरा हमसे मिलबे खों चल आए रए। तुमाए लाने सोई पूछ रए हते।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ, एक-दो दारे उनसे आपई के इते भेंट भई रई। सज्जन आदमी आएं।’’ मैंने कई।
‘‘हऔ! औ मजाकिया सोई ठैरे। काल बे कैन लगे के भैया अपन ओरें तो झटका खा गए। हमने पूछी काय को झटका? सो बे कैन लगे के झटका ईको के अपन ओरन ने वोट दओ रओ बिही के लाने औ अपन ओरन खों पकरा दओ गओ अमरूद। सो हमने कई पंडज्जी, जे बताओ के बिही औ अमरूद में कोन सो फर्क आए जो तुम इत्ते बिलाप कर रए? सो बे बोले के भैया तनक ध्यान से सुनियो! जो बिही कई जाए सो बचपन की जानी-पैचानी सी चीज लगत आए। मनो बोई बिही खों जो अमरूद कै दओ जाए तो कछू बाहरे की चीज लगन लगत आए। कछू ज्यादई पढ़ी-लिखी सी चीज। पंडज्जी की बात सुन के मोय कछू समझ ने परी। सो मैंने कई के कछू खुल के बोलो, हमें समझ ने पर रई। सो बे बोले के अच्छा चलो जे छोड़ो। हम तुमें दूसरे ढंग से बता रए के तनक सोचो के भौजी ने चाय बनाई औ तुमाए लाने ला के ई स्टूल पे रख दई। इत्ते में तुमाओ मकान मालिक आओ औ ऊने बा चाय को मग्गा उठा के दूसरे किराएदार खों पकरा दओ। मनो अब तुम ऊसे का कैहो? जो तुम कछू कैहो सो बा बोलहे के जैसे तुम हमाए किराएदार, ऊंसई जे हमाओ किराएदार। हम जे चाए तुमें पीने देंवे या चाए ईको पिवाएं, जे हमाई मरजी।’’ भैयाजी बोलई रै हते के मैंने उने टोंक दओ।
‘‘जे कोन सी बात भई? बा चाय मकान मालिक की थोड़े हती, बा तो भौजी ने बनाई हती, वा बी आपके लाने। बे ऐसो कैसे कर सकत आएं?’’ मोसे कै आई।
‘‘जेई तो! ठीक जेई हमने पंडज्जी से कई के तुम जे ठीक एक्जाम्पल नईं दे रए। सो हमाई बात सुन के पंडज्जी बोले के तुमें एक्जाम्पल की परी, औ इते जेई सब कछू हो बी गओ। तनक देर से, मनो जब हमें समझ में आई सो हम दंग रै गए के जे पंडज्जी खों कां-कां की बातें सूझत रैत आए? सो हमने उने चाय-माय पिला के बिदा करी। अरे, कोनऊं जे सब सुन के कछू और समझ लेवे, सो हमें लेबो को देबो पर जाए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘सई कई भैयाजी! जमानो खराब आए। तिल को ताड़ बनबे में देर नईं लगत। मनो जे सोचो के जो हुइए, अच्छो ई हुइए।’’ मैंने कई।
भैयाजी ने सोई अपनी मुंडी हिलाई औ तनक चैन की सांस लई। मनो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!
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#बतकावबिन्नाकी #डॉसुश्रीशरदसिंह  #बुंदेली #batkavbinnaki #bundeli  #DrMissSharadSingh #बुंदेलीकॉलम  #bundelicolumn

Thursday, December 7, 2023

बतकाव बिन्ना की | बे आए, उन्ने लड़ो... औ बे हार गए! | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | प्रवीण प्रभात

"बे आए, उन्ने लड़ो... औ बे हार गए!" - मित्रो, ये है मेरा बुंदेली कॉलम "बतकाव बिन्ना की" साप्ताहिक #प्रवीणप्रभात , छतरपुर में।
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बतकाव बिन्ना की
बे आए, उन्ने लड़ो... औ बे हार गए!
        - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
       अब आप कैहो के जे कोन टाईप को शीर्षक आए के - ‘‘बे आए, उन्ने लड़ो औ बे हार गए!’’ लड़ाई में सो हार-जीत लगई रैत आए। जब दो जने लड़हें सो उनमें एक जीतहे औ एक हारहे। हऔ, बिलकुल सई बात! पर जे तो सोचबे की बात आए के बे आए तो हते लड़बे खों मनो सामने वारे से लड़बे से कऊं ज्यादा तो बे आपसई में लड़त रए। सो मोय सो जे नईं समझ परी के लड़बे कोन से आए रए, सामने वारे से के अपनई वारे से? आप सोच रए हुइए के मैं कां की बतकाव कर रई? सो भैया-बैन हरों, अबई तो चुनाव भए अपन ओरन के इते विधान सभा के लाने, अबे तो मईना खांड़ ओई की बतकाव चलत रैहे।
चुनाव के पैले कोनऊं-कोनऊं कैत्ते के अब कुल्ल दिनां हो गए, अब कछू बदलाव भओ चाइए। मने हमें तो लगत आए के जोन के जा टाईप के विचार हते बे सोई बदलाव छोड़ के दोहराव पे आ गए। काय से के उने लगो हुइए के जिन ओरन खों आपसई में लड़बे से फुंर्सत नईयां बे जनता के लाने का कर पाहें? सांची कई जाए तो ई बेर के चुनाव ने बा किसां याद करा दई, बा लकरिया वारी। कौन सी? अरे आप ओरन ने सोई सुन रखी आए। अरे बोई वारी किसां के एक रओ बब्बा। ऊके रए छै ठइयां लरका। बे छै के छै रैत तो संगे हते मनो उनकी आपस में खटापटी चलत रैत्ती। एक दफा उनपे कर दओ दुस्मन ने हमला। बब्बा ने कई के बेटा हरों, जाओ औ जा के दुस्मन खों धूरा चटा आओ। बे छै के छै अपने बब्बा के पांव पर के घरे से निकरे। दुस्मन के लिंगा पौंचत-पौंचत उनमें आपसई में खटापटी होन लगी। एक कैन लगो के देखियो हम कैसे कूटबी दुस्मन खों, सो दूजो बोलो तुम का उखाड़ लैहो? दुस्मन खों तो हम दाई-मताई सबई याद करा दैहें। तीसरे ने अपनी दई, सो चैथे ने अपनी दई। पांचवों सो ऐसो दिखान लगो के मनो ऊने जंग जीतई लई होय औ छठे की तो पूछोई नई। छठां कैन लगो के हम तो जीतई कहाय, अब तुम ओरें हमाऐ गोंड़े दबाव। सो, जे टाईप से बे छै के छै अपसई में लड़त-लड़त दुस्मन के आगूं जा ठाड़े भए। दुस्मन सोई छै-सात भैया हते। बाकी बे ओरें सामने वारे से लड़बे की फुल तैयारी कर के आए हते। उन्ने देखी के बब्बा के जे छै मोड़ा सो आपई में उलझ रए, सो उनको काम आसान हो गओ। उन्ने छै के छै को एक-एक ठूंसा मारो औ कर दओ चारो खाने चित्त।
छैओ भैया कूट-पिट के घरे लौटे। बब्बा ने उनकी दसा देखी सो बे चकरा गए। उन्ने पूछी के तुम ओरे तो दुस्मन खों धूरा चटाबे खों गए रए, औ खुदई धूरा चाट आए, जे कैसे भओ?’’
‘‘ईमें हमाई कोनऊं गलती नोईं, जे बड़े भैया की गलती आए।’’ सबसे छोटो वारो बोलो।
‘‘हमाई का गलती? तुमई तो फंकाई दे रए हते के तुम सब कछू कर सकत आओ।’’ बड़ो वारो बमकत भओ बोलो।
मने जेई टाईप से छै के छै एक-दूसरे खों गरियान लगे। उनके बब्बा ने देखी सो उनकी खपड़िया भिन्ना गई।
‘‘चोप्प! बिलकुल चोप्प!!! तुम ओरे कभऊं ने सुधरहो। ऊंसई तो आपस में गिचड़ कर रैत आओ, मनो हमने सोची हती के दुस्मन के आगूं पौंच के तो मिल के लरहो, मनो तुम ओरन को कछू नईं हो सकत। हमें तो लगत आए के तुम ओरे हमाए मोड़ा नोंई, कोनऊं लड़इया के पिल्ला आओ।’’ बब्बा को मत्था फिर गओ। उन्ने अपने छैओ मोड़ा हरों को आड़े हाथ लओ। बे छैओ अपनों मों बंाध के सुनत रए। औ सुनत नईं, सो का करते? करमई ऐसो कर के आए हते। उनके दुस्मन ने उन ओरन की ऐसी ठुकाई करी हती के हाड़-गोड़ सबई चींख-चींख के गवाई दे रए हते।
बब्बा को जब तनक गुस्सा ठंडो भओ तो उन्ने सोची के जे ओरें एक दफा कुट-कुटा के चले आए, सो बा दुस्मन सो गर्रात फिरहे औ कभऊं बी फेर के अटैक कर सकत आए। ईसे अच्छो के इन छैओ निकम्मों खों तनक सिखा-सुखू के पैलई दुसमन खों ललकारो जाए। 
    सो बब्बा ने उठाई छै ठइयां लकरियां और पकरा दई एक-एक ठइयां उन सबई खों। फेर उनसे बोली के अपनी-अपनी लकरिया खों तोड़ के दिखाओ। उन छै के छै ने अपनी-अपनी लकरिया तोड़ के दिखा दई। फेर बब्बा ने छै ठइयां लकरियां औ उठाईं, औ उने एक पतरी सी रस्सी से आपस में संगे बंाध दई। फेर अपने छैओ मोड़ा से कई के अब तुम ओरें एक-एक कर के लकरियन को जे गट्ठा तोड़ के दिखाओ। पैले बड़े ने कोसिस करी। बा फेल हो गओ। दूसरे वारे ने कोसिस करी, बा सोई ने तोड़ पाओ। तीसरे ने हाथ आजमाओ, बा सोई फिस्स हो गओ। चैथे को तो पसीना मार गओ मनो ऊसे गट्ठा ने टूटो। पांचवे ने औ दम लगाई, पर बा सोई थक के उतई बैठ गओ। सबसे छोटो मने छठे वारे ने कोसिस करी, बा बी ने तोड़ पाओ।
‘‘तुम ओरें ने तोड़ पाए जे गट्ठा? काए?’’ बब्बा ने लरकन से पूछी।
‘‘नईं! काय से के जे लकरियां संगे बंधी आएं, जो अलग-अलग होतीं तो हम कब के चटका चुके होते।’’ बड़े वारे मोड़ा ने कई।
‘‘जेई तो बात आए समझबे की नईं, नासमिटो? अबे तुम ओरें दुस्मन के आगूं जा के ठाड़े भए पर आपस में लड़त रए। जोन को फायदा मिलो दुस्मन को। उन ओरन खों तो कछू मेनत करनेई ने परी हुइए औ तुम ओरन की कुटाई कर के चले गए। जो तुम ओरे जे गट्ठा घाईं संगे मिल के अपने दुस्मन से लड़ते तो मनो इत्ते तो ने कुटते।’’ बब्बा ने छैओ को समझाई।
‘‘हऔ बब्बा जू! आप सांची कै रए। हम ओरें अब कभऊं ऐसो ने करहें। जो कोनऊं से लरने परो सो हम सब मिल के ऊसे लरहें।’’ मंझलो वारो बोलो।
‘‘सो चलो, चिंता ने करो! जल्दई फेर के लड़बो को टेम आन वारो आए, तनक दिखा दइयो अपनो संगठन।’’ बब्बा खुस होत भए बोले। उने समझ में आ गई के उनके मोड़ा हरें सबक सीख गए।
    मनो जे तो रई एक फेमस किसां। जे हर भाषा-बोली में पाई जाती आए औ हर जुग में सुनाई गई। मनो फेर बी कछू जने जे किसां भूला के अपनी लुटिया डुबान लगत आएं। ऊमें बी बब्बा की उमर के बूढ़े-पुराने सयाने। हऔ, जेई तो भओ ई दफा के चुनाव में। एक तो दो अषाढ़, ऊपर से दूबरे औ ऊपे बी आपसी गिचड़। चुनाव के लाने टिकट के देबे के टेम पेई दिखा गओ रओ के बे ओरें आपसई में कोन टाईप से उलझ रए। दो बब्बा हरें आपसई में लड़त रै गए के हमाए आदमियन खों टिकट मिलो चाइए, के हमाए आदमियन खों टिकट मिलो चाइए। उने जोन से लड़ने रओ, बा सोई देख-देख के मुस्कात रओ के जो का हो रओ? ऊके लाने सो अच्छोई हतो। जोन में संगठन नांव की चिरैया ने होय बा संगठन वारे से का खा के लरहे?
   बा हती किसां, सो ऊमें बब्बा के लरका हरों को अपने बब्बा की बात समझ में आ गई रई, मनो इते तो बब्बा हरें ईं आपस में लड़त रए। अब उनके लाने को समझा सकत आए? कऊं ऐसो ने होय के अगली बेरा औरई सफाया हो जाए। बाकी जोन खों जीतबे खों मौका मिलो, उनके लाने जेई कओ जा सकत आए के उन ओरन की संगठन की ताकत ने उने जिताओ आए। बाकी धनी-धोरियन खों सोई उनसे कछू सीखो चाइए के भैया हरों आपस में ने लड़ो, कभऊं-कभऊं पब्लिक खों अपनी सकल दिखा दओ करे, कभऊं- कभऊं कछू पब्लिक को बी हाल पूछ लओ करे। मनो मोय पतो के बे मोरी बात कोन सुनहें, बे सो खुदई खों मिटाबे को कमिटमेंट करे बैठे आएं, तभई तो खुद अपनई नईं सुन रए।
    खैर, सो अब तो आप ओरने खों जा शीर्षक समझ में आ गओ हुइए के ‘‘बे आए, उन्ने (आपस में) लड़ो औ बे (बिरोधी से) हार गए!’’            
    बाकी जो आए सो अच्छे आए, औ जो गए सो अच्छे गए। मनो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!
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#बतकावबिन्नाकी #डॉसुश्रीशरदसिंह #बुंदेली #BatkavBinnaKi #Bundeli #DrMissSharadSingh #बुंदेलीकॉलम #bundelicolumn

Thursday, November 30, 2023

बतकाव बिन्ना की | काय भैया हरों धुकधुकी हो रई के नईं? | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | प्रवीण प्रभात

"काय भैया हरों धुकधुकी हो रई के नईं?" - मित्रो, ये है मेरा बुंदेली कॉलम "बतकाव बिन्ना की" साप्ताहिक #प्रवीणप्रभात , छतरपुर में।
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बतकाव बिन्ना की
काय भैया हरों धुकधुकी हो रई के नईं?
        - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
       कुल्ल दिनां बाद भैयाजी के घरे रौनक सी दिखानी। काय से के चुनाव के टेम पे तो बे ऐसे बिजी भए के मनो बे खुदई चुनाव में ठाड़े भये होंय। दो दिना से ऊंसई बदरा ऊंदें आएं। तनक-मनक बौछारें सी सोई पड़ गईं। मनो मावठे को पानी खेती के लाने सो अच्छो रैत आए पर जड़कारो सोई शुरू हो गओ कहाओ। खैर, बात हो रई हती भैयाजी की। पिछले कछू दिनां बे चुनाव के काम में बिजी रए। कोनऊं की केनवासिंग करी, तो कोनऊं के लाने झंडा टांगत फिरे। वोई टेम पे मोए एक दिना एक पार्टी को झंडा लगाउत दिखा गए रए। मैंने देखी के बे डंडा पे जोन झंडा बांध रए हते ऊपे पार्टी को निसान बनो हतो औ संगे निसान के नैचे अंग्रेजी में पार्टी को पूरो नांव लिखो हतो। मैने भैयाजी से पूछी के ‘‘काय भैयाजी, जोन जे मोहल्ला में आप जो झंडा लगा रए का इते इत्ते पढ़े-लिखे लोग आएं के जे पार्टी को नांव अंग्रजी में पढ़ लैंहें?’’
‘‘बे का पढ़ पाहें? जेई सो तो संगे निसान छापो गओ आए के लोग जे निसान देख के पैचान लेवें।’’ भैयाजी बोले हते।
‘‘मनो इते जे अंग्रेजी वारे झंडा भेजबे की जरूरतई का हती?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘को जाने? हमें तो लगत आए के जे उतई दिल्ली-मिल्ली से बन के आए हुइएं। ने तो इते होतो तो हिन्दी में लिखो जातो।’’ भैयाजी ने अपनी राय दई।
‘‘ठीक कओ आपने! मनो ऐसी पार्टी को का हुइए, मोय तो जे समझ में नई आ रई? जोन को इत्तई नई पतो के कोन सी जांगा पे कोन टाईप से प्रचार करो जाओ चाइए।’’ मैंने कई हती।
बाकी जा बात अब हो गई पुरानी। अब तो रिजल्ट को इंतजार आए। मैंने सोची के ई बारे में भैयाजी से तनक बतकाव करी जाए। सो मैं भैयाजी के घरे जा पौंची।
‘‘का हो रओ भैया जी?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘होने को का आए? कारवां सो कढ़ गओ अब गुबार की धूरा फांक रए।’’ भैयाजी तनक कविताई करत भए बोले।
‘‘सो अब का होबे जा रओ?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘का मतलब?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘मतलब जे, के जोन जे भैया हरें चुनाव में ठाड़े भए हैं, औ बैनजी हरें सोई, सबई की धुकधुकी हो रई हुइए के को जीतहे, को हारहे!’’ मैंने कई।
‘‘सो तो है! अभई परों बा एक उम्मींदवार मिले हतो। हमने उसे कई के आप तो जीत हो ई। सो बे कैन लगे के का पतो, जा जनता कोन खों चुनहे? मने उनको खुदई भरोसो सो नई दिखा रओ हतो के बे जीतहें के नईं। अब ऐसे में धुकधुकी सो हुइए ई।’’ भैयाजी बोले।
‘‘आप को का लग रओ के कोन की बनहे सरकार? कछू उलटफेर हुइए का?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘अब जे हमसे ने पूछो! जे सब के लाने बे टीवी वारे ई भौत आएं। बे सो सुभै से रात लों जेई अटकलें घालत रैत आएं के ई दफे बा आहे, ई दफे जा आहे। मनो बे वोट देबे वारन के पेट में सो घुसे बैठे जो उने सब पतो होय!’’ भैयाजी टीवी वारन पे भड़कत भए बोले।
‘‘अब बे ओरे बी का करें, उने सोई अपनी टीआरपी बढ़ाने रैत आए, सो बे ई टाईप के डिबेट कराउत आएं, एक्जिट पोल बताउत आएं औ मनो जोन सी बी नौटंकी करने परत है सो करत हैं। का करें, उने सोई अपनों पेट पालने परत आए।’’ मैंने टीवी वारन को पक्ष लओ।
‘‘तुमें बड़ी दया आ रई उन ओरन पे? औ बे जब खंडहर को रहस्य, भूत वारो कुआ जैसी रपट दिखात आएं सो तुमई गरियात आओ उनकों। बा सब बी तो बे अपनो पेट की खातिर दिखात आएं। तबे काय नईं आत दया तुमें उनपे?’’ भैयाजी को मौका मिल गओ मोरी टांग खिचाईं करबे को।
‘‘बा अंधविश्वास फैलाबे वारी बात आए। ऊको ई से काए जोड़ रए?’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘काय ने जोड़ें? जो बा गलत सो जा गलत। औ जो जा सई, सो बा बी सई।’’ भैयाजी बहस करत भए बोले। आखिर चुनाव टेम पे नेता हरों के संगे फिरबे को कछू तो असर हुइए ई।
‘‘हऔ, चलो दोई सई औ दोई गलत। अब काय गिचड़ रए उन ओरन के नांव पे?’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘हऔ सई कै रईं बिन्ना! उन ओरन को का? अपनी ड्यूटी बजाउत बेरा इते-उते की बतकाव करी, चिंचिंया-चिंचिंया के दो-चार खबरें सुनाईं औ फेर कोनऊं पब-फब में बैठ के दो-चार बाटलें चढ़ाईं औ घरे जा के पर रए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘जे जो आप उन ओरन के बारे में बोल रए, जे कछू ज्यादा नईं हो गई?’’ मैंने भैयाजी खों टोको।
‘‘चलो छोड़ो! अपन ओरें सोई कां से कां पौंच गए? बात शुरू भई रई उम्मीदवारन से औ जा पौंची टीवी वारन लों। औ तुम बताओ के तुमाओ का चल रओ?’’ भैयाजी ने मोसे पूछी।
‘‘मोरो का चलने? चलत तो उनकी आए जोन के पास लुटाबे खों पइसा होय, सोर्स-सिफारिश होय, उनसे सबई की अटकत होय! मैं सो ठैरी ऊंसई, सो मोरी का चलने।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘अरे, तुम तो इमोशनल भई जा रईं! हमने सो ऊंसई पूछी रई। हम तुमाओ दिल नईं दुखाओ चात्ते।’’ भैयाजी बोले।
‘‘मोय पतो आए। आपई ओंरे सो हो जो मोरो दुख-दरद समझत हो, ने तो बाकी के पास सो टेम लो नईयां के कभऊं हाल-खबर पूछ लेंवें।;’’ कैत भए मोय सांची में दुख सो लगो।
‘‘अरे, तुम काय दुखी हो रईं? जे दुनिया सो ऐसई चलत आए। इते कोनऊं खों कोनऊं की नईं परी। अभईं देखियो, तनक चुनाव को रिजल्ट तो आन देओ। जोन जे अपने उम्मींदवार के पांछू-पांछू फिरकी बने घूम रए हते, जो कऊं उनको उम्मीवार हार गओ, सो ऊके घरे झांकबे ने जाहें। जे जो अबे जैकारे लगात फिर रए हते, बे ऊसे हल्लो-हाय लों ने करहें। सो तुम अपनो जी ने दुखाओ। जोन को जो करने, सो करन दो।’’ भैयाजी मोय समझात भए बोले।
‘‘हऔ भैया! मैंने सोई गौर करी आए के कछू जने सो चुनाव टेम पे खाली प्रचार को पइसा खाबे खों आगे-आगे हो दिखात आएं। जो चुनाव हो गओ, सो बे सोई डकार लए बिगैर अपने घरे पर रैत आएं। आप सांची कै रए के बड़ी स्वारथ की दुनिया आए।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘जे स्वारथ सोई राजनीति वारन ने ई अपन ओरन खों सिखाओ आए। उनको झूठ बोलत देख के अपन ओरें झूठ बोलबो सीख गए। उनको स्वारथपना देख के अपन ओरें स्वारथ की बतकाव करन लगें। जे राजनीति वारे सो आएं जो जात-धरम को भेद मिटाबे की जांगा भेद बढ़ात जा रए। पैले धरम की सल्ल रई औ अब जात-बिरादरी के सल्ल लों बात पौंचा दई। हमें सो जे सब अच्छो नईं लगत, मनो का करो जाए? एक हमाए सुधारे से सबरे थोड़ईं सुधरहें।’ भैयाजी सोई इमोशनल होत भए कैन लगे।
‘‘अब आप अपनो जी ने दुखाओ भैयाजी!’’ अबकी मैंने भैयाजी खों सहूरी बंधावे की कोशिश करी।
‘‘हऔ, हम तो जा सोचत आएं के कोनऊं जीते, मनो बा सबई के लाने अच्छो काम करे।’’ भैयाजी बोले।
‘‘ कछू ज्यादई उम्मींद नईं लगा रए आप?’’ मैंने भैयाजी खों टोंकी, ‘‘काय से के इते कोनऊं हमाम नोईं, इते तो खुल्ला घाट आएं ईमें सबई खुल्ला नहाऊत आएं। कोनऊं खों कोनऊं से शरम नोई। तभई तो ने तो पार्टी बदलत में देर लगत आए औ ने भ्रष्टाचार को कांड करे में कोनऊं शरम आऊत आए।’’
‘‘सांची कई। बाकी अब का सोचन लगीं?’’ भैयाजी ने मोसे पूछी।
‘‘सोच नई रई कछू! बाकी जो जी कर रओ के चुनाव में ठाड़े नेता हरों से जा के पूछो जाए के काय भैया हरों धुकधुकी हो रई के नईं?’’ मैंने मुस्का के भैयाजी से कई।
‘‘सो चलो, संगे चलत हैं! एकाध से तो पूछ ई सकत आएं।’’ कैत भए भैयाजी सांची में ठाड़े हो गए। मैंने बी सोची के चलों जा करबे में तनक मूड अच्छो सो हो जेहे। ऊंसई अबे तो नेता हरें फेर बी बतकाव कर लैंहें। औ जो कऊं एक बेरा जीत गए सो हम ओरन को मों देखबे को उनके पास टेम नई रैने। सो हम दोई निकर परे टीवी वारन घांईं चिटपिया सवाल धर के। मनो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!
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