पुस्तक समीक्षा
‘नीरद’ की ग़ज़लों के सरोकार का विस्तार है मन से जन तक
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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ग़ज़ल संग्रह - सांझ के घुंधलके
कवि - अशोक कुमार ‘नीरद’
प्रकाशक - न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, सी-515, बुद्ध नगर, इंद्रपुरी, नई दिल्ली-110012
मूल्य - 299/-
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हिंदी साहित्य की काव्य विधा में समकालीन हिंदी ग़ज़ल ने अपना विशेष स्थान बना लिया है। अनेक वर्षों की लंबी यात्रा करने के उपरांत हिंदी ग़ज़ल के कर्म में नित नए नाम जुड़ते गए हैं। जिनमें से कुछ समर्पित ग़ज़लकारो का नाम वरिष्ठता क्रम में लिया जाता है तो कुछ का कनिष्ठ के रूप में। किंतु इन सभी का योगदान हिंदी ग़ज़ल को समृद्ध करने में रहा है। वरिष्ठ ग़ज़लकारों में एक नाम अशोक कुमार नीरद का भी है। इन्होंने सन 1968 से ही ग़ज़लों से अपना नाता जोड़ लिया था। ग़ज़ल में सब समय प्रयोग धर्मिता को अपनाते हुए अपनी ग़ज़ल की कहानी में इन्होंने निरंतर परिवर्तन लाया जिससे आज भी इनकी ग़ज़लें समसामयिक मूल्य तथा वर्तमान परिवेश में सटीक बैठती हैं।
ग़ज़ल विधा के लिए समर्पित भाव से कार्यरत वरिष्ठ ग़ज़लकार हरेराम समीप जी अशोक कुमार नीरद के सृजन के संबंध में कहते हैं कि “अशोक कुमार ‘नीरद’ की ग़ज़लों से गुज़्रते हुए अनेक मर्मस्पर्शी अशआर मिलते हैं, तब लगता है जैसे उन्होंने शेर-दर-शेर अपना दिल उतार कर रख दिया है। उनकी ग़ज़लों में अनुभूतियों की अनेक परतें मिलती हैं। उनकी ग़ज़लों में जीवन के सभी पक्ष मौजूद हैं। कुछ भी नहीं छूटा है। चाहे वे सामाजिक और राजनीतिक विसंगतियाँ हों, असुरक्षा और आतंक का अँधेरा हो, या प्रेम और प्रतिरोध का उजास। चाहे टूटते रिश्ते, अकेलापन या भूख, गरीबी, शोषण, उत्पीड़न या कमरतोड़ महँगाई। इतना ही नहीं, आज के समाज में व्याप्त उपभोक्तावाद पर भी नीरद की कलम ने अनूठे अशआर ईजाद किए हैं। नीरद की ग़ज़लें वास्तव में आम आदमी की ग़ज़लें हैं। नीरद अपनी ग़ज़लों में उस बेजुबान तक पहुँचना चाहते हैं जो अपना दुःख और परेशानी किसी से नहीं कह पा रहा है। इस तरह वे दुखी जन के अधिवक्ता की तरह वंचित के आत्मसंघर्ष में उसके साथ खड़े रहना चाहते हैं।”
समकालीन हिंदी ग़ज़लों को लेकर अशोक कुमार नीरद का दृष्टिकोण स्पष्ट है। वे हिंदी ग़ज़ल को आमजन की अभिव्यक्ति के रूप में एक सशक्त विद्या मानते हैं। उनके अद्यतन गजल संग्रह सांझ के धुंधलके के आरंभिक पृष्ठों में मुंबई के साहित्यकार अनिल गौड़ द्वारा उनसे लिया गया साक्षात्कार है जिसमें हिंदी ग़ज़ल पर विस्तृत चर्चा की गई है। इस साक्षात्कार के बानगी के तौर पर कुछ प्रश्नोत्तर देखें जिनमें उन्होंने हिंदी ग़ज़ल सार्वभौमिक कैसे बन सकती है इसकी चर्चा की है -
अनिल गौड़- आप हिंदी ग़ज़ल किसे मानते हैं?
नीरद - ग़ज़ल एक फॉर्मेट है और विधा भी। ग़ज़ल उर्दू से ही हिन्दी में आयी है। जाहिर है उसका कलेवर और पिंगल तो वही रहेगा जो उर्दू में है। उर्दू के पिंगल का अनुपालन करते हुए हिन्दी की कहन, प्रकृति, शिल्प, सौष्ठव और मुहावरेबंदी करके कही गयी हिन्दी संस्कारों से संपृक्त ग़ज़ल को ही हिन्दी ग़ज़ल कहेंगे।
अनिल गौड़ - हिंदी ग़ज़ल को अपनी पहचान विकसित करने के लिए क्या करना चाहिए? विषय, भाषा, कथन शैली में नवीनता कैसे आ सकती है?
नीरद -हिन्दी ग़ज़ल की सार्वभौमिक पहचान तब ही बनेंगी जब वो अपने प्रांजल और परिष्कृत रूप में पाठकध्श्रोता के सामने आए और पढ़ते-सुनते ही हृदय में उतर कर विभोर कर सके। इसके लिए जो ग़ज़लें कही जा रही हैं उनपर खुले मन से विमर्ष होना चाहिए ताकि ग़ज़लकारों को ये समझ आ सके कि वो कहाँ खड़े हैं। निरंतर चर्चा-परिचर्चा का परिणाम निश्चित रूप से सकारात्मक होगा। रहा भाषा का प्रश्न तो भाषा ऐसी सहज, सरल होनी चाहिए जो जनसामान्य बोलता समझता है यानि हिन्दी ग़ज़ल की भाषा का जनतांत्रिक होना ही ग़ज़ल के उत्कर्ष, नयेपन ओर प्रसार का निश्चित रूप से कारक होगा। रही विषय और कथन-शैली की बात तो यह ग़ज़लकार की रुचि और सामथ्र्य पर, उसके अध्ययन, मनन, चिंतन और दृष्टिकोण पर आधारित है।
‘‘सांझ के घुंधलके’’ ग़ज़ल संग्रह में 101 गजलें हैं। सभी ग़ज़लें गहरी कहन रखती हैं। वस्तुतः ‘नीरद’ के अनुभव का दायरा विस्तृत है और संवेदनाओं से सरोकार अनंत, इसीलिए उनकी ग़ज़लें मन से जन तक विस्तार पाती हैं। उनकी ग़ज़लों की भाषा आम बोलचाल की भाषा है इसलिए इनकी संप्रेषणीयता स्पष्ट है। इस संबंध में इसी संग्रह में ‘‘साँझ के धुँधलके - भारतीय समाज के अंतर्विरोधों का मुखर प्रतीक’’ शीर्षक से दिल्ली के साहित्यकार वीरेन्द्र कुमार शेखर ने ‘नीरद’ की ग़ज़लों बुनावट और भाषा पर कुछ इस प्रकार टिप्पणी की है- ‘‘नीरद की भाषा में न तो कोई बनावटीपन है, न कोई बौद्धिक दुरूहता। वे सीधे, स्पष्ट और सशक्त शब्दों में लिखते हैं-क्योंकि वे मानते हैं कि कविता को यदि आत्मा से निकलना है, तो उसे कृत्रिम लहजे की ज़रूरत नहीं। इसी कारण से उनकी रचनाएँ दुरूहता से नहीं, बल्कि सरस बौद्धिकता और भावबोध से भरपूर हैं। वे कठिन बातों को सहज ढंग से कह पाने की विलक्षण क्षमता रखते हैं- जो किसी भी श्रेष्ठ साहित्यिक प्रतिभा की निशानी होती है।’’
यही भाषाई खूबी हिन्दी ग़ज़ल को समसामयिक बनाती है। संग्रह की पहली ग़ज़ल में ग़ज़लकार ‘नीरद’ उस सांझ के धुंधलके की बात करते हैं जिसमें सूरज भी विवश दिखाई देता है। शेर देखिए-
साँझ के धुँधलके ही दीखते क्षितिज पर हैं
जिनको कहते सूरज हम किस क़दर वो कातर हैं
क्यों रहस्य से आखि़र आवरण नहीं उठता
क्यों नहीं सवालों का पार पाते उत्तर हैं
‘नीरद’ पारस्परिक संबंधों में घुलती जा रही स्वार्थपरता पर भी उंगली रखते हैं। यह स्वार्थ ही तो है जिसमें हर व्यक्ति दूसरे से आगे निकल जाने की होड़ में है, चाहे वह घनिष्ठ मित्र ही क्यों न हो। इसी होड़ के चलते मित्रघात भी आम बात हो चती है।
बिजुरिया नीड़ पर मेरे गिराई है
मुहिम यह दोस्तों ने ही चलाई है
जहां अपने बिरानेपन को जीते हों
वो रिश्ते भूलने में ही भलाई है
अशोक कुमार ‘नीरद’ ने अपनी ग़ज़लों में यथोचित मुहावरों का भी प्रयोग किया है। यह प्रयोग कथ्य को और अधिक सहज और कटाक्ष पूर्ण बना देता है। आज जीवन में आए दिन ऐसे मामले उत्पन्न हो जाते हैं जिन्हें देख कर, सुन कर या उनसे गुज़र का हमारे हाथों के तोते उड़ जाते हैं, यानी हम ठगे से रह जाते हैं। हाथों से तोते उड़ने के मुहावरे का यह उम्दा प्रयोग देखिए-
हमारे हाथों के उड़ते ही रोज़ तोते हैं
किसी भी हाल में लेकिन कभी न रोते हैं
जिसे थे लोग दिया करते बद्दुआ हरदम
मुराद पाने अब उसके मुरीद होते हैं
कि जिनको भोग नई पौध तृप्ति पाएगी
फलों के ऐसे ही हम बीज आज बोते हैं
लेखन का दीर्घकालीन अनुभव भी सृजन में सटीकता ला देता है। 21 नवंबर 1945 को मध्यप्रदेश के ऐतिहासिक नगर बुरहानपुर में जन्मे अशोक कुमार ‘नीरद’ ने सन 1968 में सागर विश्वविद्यालय से विज्ञान में स्नातक उपाधि प्राप्त की। जीवन के उतार-चढ़ावों से गुज़रते हुए 2012 में मुंबई पहुंचे और तब से अँधेरी (पूर्व), मुंबई में ही निवासरत हैं। ‘नीरद’ ने बारह वर्ष की उम्र से लेखन प्रांरभ, प्रायः गीत, गजल, मुक्तक, दोहा, छंद, आदि सभी विधाओं में, सन् 1968 से हिन्दी-ग़ज़लें कहना आरंभ कर दिया था। उनके छह ग़ज़ल संग्रह हैं- जुगनू को सूरज का भ्रम है (सन् 2008), ग़ज़ल के स्वर (सन् 2012), दीवारों के जाल (सन् 2022), अंकुर बोलते हैं (सन् 2024), पैमाने नये आये (सन् 2025) एवं साँझ के धुँधलके (सन् 2026) में। पहला गीत संग्रह ‘‘विश्वास का सवेरा’’ 2012 में तथा दूसरा गीत संग्रह ‘‘आशा के अक्षत’’ सन् 2025 में प्रकाशित हुआ। उनकी ग़ज़लों की स्वीकार्यता पाठ्यक्रमों में भी देखी जा सकती है। मुंबई विश्वविद्यालय के बी ए के पाठ्यक्रम में कुछ बर्षों से कुछ ग़ज़लें सम्मिलित। कवयित्री बहिणाबाई चैधरी उत्तर महाराष्ट्र विश्वविद्यालय, जलगाँव के बी ए के पाठ्यक्रम में भी कुछ ग़ज़लों का समावेश किया गया है।
अनिल गौड़ को साक्षात्कार देते हुए हिंदी ग़ज़ल के भविष्य के प्रति आश्वस्ति प्रकट करते हुए ‘नीरद’ कहते हैं कि ‘‘आज का युग अति व्यस्तता का युग है। साहित्य के प्रति लोगों का रुझान कम होता जा रहा है। ग़ज़ल का सबसे धनात्मक पहलू यह है कि शेर के दो मिसरे वो बात कह जाते है जो दो पेज की कविता नहीं कह पाती। निस्संदेह हिन्दी ग़ज़ल का भविष्य उज्जवल है। आनेवाले समय में हिन्दी- ग़ज़ल हिन्दी की प्रमुख विधा के आसन पर विराजेगी।’’
यद्यपि उस प्रकार के सृजन के प्रति उनके मन में खिन्नता भी जागती है जो सतही तौर पर किया जाता है। जिस प्रकार वे साहित्य के नाम पर परोसी जा रही विकृति की भत्र्सना करते हैं ठीक उसी प्रकार हिंसा को वीरता का नाम दिए जाने को भी वे धिक्कारते हैं-
देखकर नूतन सृजन को सर बहुत चकरा रहा है
नाम पर साहित्य के क्या-क्या परोसा जा रहा है
क्रूर हिंसा लग रही है वीरता अब आदमी को
बुजदिली पर अपनी सीना तान कर इठला रहा है
फिर भी वे आशावादी हैं और उस पक्ष को रेखांकित करते हैं जो अभी हारा नहीं है तथा सतत संघर्षरत है।
हो भले ही त्रस्त, बेचारा नहीं है
हारकर भी आदमी हारा नहीं है
टस से मस होना नहीं सीखा है
इसने ये मेरा ईमान है, पारा नहीं है
इस प्रकार देखा जाए तो ग़ज़ल संग्रह ‘‘सांझ के धुंधलके’’ की सभी ग़ज़लें सशक्त है तथा विचारों को उद्वेलित करने में सक्षम हैं। इस प्रकार की गहन विश्लेष्णात्मक कलेवर की ग़ज़लें ग़ज़ल विधा के भविष्य के प्रति भी आश्वस्त करती हैं।
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