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Wednesday, June 12, 2019

चर्चा प्लस ... और कितनी बेबी, कितनी गुड़िया, कितनी निर्भया? - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस ... 
और कितनी बेबी, कितनी गुड़िया, कितनी निर्भया?
 
- डॉ. शरद सिंह

आश्चर्य होता है कि किसी नन्हीं बच्ची के साथ कोई इतनी नृशंसता कैसे कर सकता है? अलीगढ़ के आंसू अभी सूखे नहीं थे कि भोपाल में एक ऐसी बच्ची हवस और मौत का शिकार बन गई जो पढ़ाई में अव्वल थी और एक लम्बा सुखद भविष्य उसके सामने था। लेकिन वहशी दरिंदे को उसकी योग्यता नहीं मात्र शरीर दिखा। हद तो यह है कि आज ढाई साल की बच्चियां भी सुरक्षित नहीं रह गई हैं। आए दिन ऐसे घृणित अपराध घटित हो रहे हैं मानो कानून का कोई भय उन अपराधियों को है ही नहीं। वस्तुतः यौनअपराधों से जुड़े कानूनों की एक बार फिर समीक्षा किए जाने की जरूरत है। 
चर्चा प्लस ... और कितनी बेबी, कितनी गुड़िया, कितनी निर्भया? - डॉ. शरद सिंह   Charcha Plus Column by Dr Sharad Singh
     भारत में पिछले साल जम्मू के एक रेप केस ने सबको हिलाकर रख दिया था। कठुआ ज़िले में ख़ानाबदोश समुदाय की एक बच्ची की बलात्कार के बाद हत्या कर दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर इस मामले की सुनवाई पंजाब में हुई जहां अदालत ने जम्मू-कश्मीर के कठुआ में पिछले साल जनवरी महीने में आठ साल की एक बच्ची के साथ गैंग रेप, प्रताड़ना और हत्या मामले में छह दोषियों में से तीन को अदालत ने उम्र क़ैद की सज़ा दी है। इस सनसनीखेज गैंग रेप के बाद देश भर में ग़ुस्सा देखा गया था। पूर्व सरकारी अधिकारी सांजी राम को इस मामले का मास्टरमाइंड माना जा रहा था। पठानकोट की फास्ट ट्रैक अदालत ने राम को भी उम्र क़ैद की सज़ा सुनाई है। सबूतों के अभाव में सांजी राम के बेटे को अदालत ने रिहा कर दिया है। इसके साथ ही दो पुलिस वालों को भी पांच-पांच साल की क़ैद की सज़ा सुनाई है। सांजी राम के अलावा परवेश कुमार, दो स्पेशल पुलिस ऑफिसर दीपक कुमार और सुरेंदर वर्मा, हेड कॉन्स्टेबल तिलक राज और सब-इंस्पेक्टर आनंद दत्ता को इस मामले में दोषी ठहराया गया है। पुलिसकर्मियों को सबूतों को मिटाने में दोषी ठहराया गया है। यह जान कर आश्चर्य होता है कि सांजी राम राजस्व विभाग के रिटायर्ड अधिकारी रहा है और दीपक खजुरिया स्पेशल पुलिस ऑफिसर। ऐसे जिम्मेदार पदों पर आसीन व्यक्तियों ने इतना घृणित कार्य किया कि मानवता और सांस्कृतिक मूल्यों का भी दिल दहल गया। कोर्ट के फ़ैसले के बाद पीड़िता की मां ने मुख्य अभियुक्त सांझी राम को फांसी देने की मांग की थी। सजा के संबंध में पीड़िता की मां का कहना है कि “मुझे राहत मिली है, लेकिन न्याय तब मिलेगा जब सांझी राम और विशेष पुलिस अधिकारी दीपक खजुरिया को फांसी दी जाएगी।“
पीड़िता पक्ष के वकील मुबीन फ़ारूकी ने कहा, “आज सच की जीत हुई है आज पूरे देश की जीत हुई है। पूरे देश ने यह लड़ाई मिल कर लड़ी थी। दीपक खजुरिया, प्रवेश कुमार और सांझी राम को 376डी, 302, 201, 363, 120बी, 343 और 376बी के तहत दोषी ठहराया गया है। वहीं तिलक राज, आनंद दत्ता और सुरिन्दर वर्मा को आईपीसी की धारा 201 के तहत दोषी ठहराया गया है। यह संवनैधानिक भावना की जीत है।’’
   लेकिन मां का हृदय अपनी बेटी की क्षत-विक्षत स्थिति को याद कर आज भी चीत्कार कर उठता है। वे कहती हैं कि “मेरी बेटी का चेहरा आज भी मुझे परेशान करता है और यह दर्द जीवनभर रहेगा। जब मैं उसकी उम्र के दूसरे बच्चों को खेलते देखती हूं तो मैं अंदर से टूट जाती हूं।“

चाहे अलीगढ़ की घटना हो या भोपाल की अथवा सागर की, ऐसी सभी वारदातों में एक बात की समानता होती है और वह है नाबालिग मासूम बच्चियों के साथ दरिंदगी। हाल ही में घटित अलीगढ़ की घटना ने तो एक बार फिर देश को स्तब्ध कर दिया। आश्चर्य होता है कि किसी नन्हीं बच्ची के साथ कोई इतनी नृशंसता कैसे कर सकता है? अलीगढ़ के आंसू अभी सूखे नहीं थे कि भोपाल में एक ऐसी बच्ची हवस और मौत का शिकार बन गई जो पढ़ाई में अव्वल थी और एक लम्बा सुखद भविष्य उसके सामने था। लेकिन वहशी दरिंदे को उसकी योग्यता नहीं मात्र शरीर दिखा। हद तो यह है कि आज ढाई साल की बच्चियां भी सुरक्षित नहीं रह गई हैं। आए दिन ऐसे घृणित अपराध घटित हो रहे हैं मानो कानून का कोई भय उन अपराधियों को है ही नहीं। वस्तुतः यौनअपराधों से जुड़े कानूनों की एक बार फिर समीक्षा किए जाने की जरूरत है। नाबालिग बच्चियों के साथ नृशंसतापूर्ण अपराध पर रोक न लग पाना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि कहीं न कहीं व्यवस्था में कमी जरूर है-सामाजिक व्यवस्था में भी और कानून व्यवस्था में भी। बच्चियों के साथ निरंतर हो रहे हादसों पर राजनीति का खेल खेलने के बजाए जरूरी है जन जागरूकता और कानून में कुछ जरूरी बदलाव पर ध्यान दिया जाना।
प्रायः पुलिस 24 घंटे से पहले गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखने से परहेज करती है क्योंकि कई बार गुमशुदा इंसान अपनी मर्जी से क्रोध में आ कर घर से निकल पड़ता है और क्रोध शांत होने पर स्वयं घर लौट आता है। यह धारणा आज के आपराधिक माहौल में मंहगी साबित हो रही है। जहां तक धारणा की बात है तो इस धारणा को भी बदलना होगा कि यदि कोई लड़की घर से गायब है तो प्रथमदृटष्या यह मान लिया जाए कि वह किसी के साथ भाग गई होगी। आज लड़कियों के घर से भागने के मामले नगण्य हो चले हैं जबकि उनके साथ यौनहिंसा के अपराध रिकार्ड तोड़ रहे हैं। ऐसी स्थिति में तत्काल रिपोर्ट लिख कर खोज आरम्भ कर देने से कई बच्चियों की जान बच सकती है।
हमारे जीवन की हमारे समाज का पारिवारिक ढांचा और सामाजिक सोच बुनियादी रूप से आत्मीयता भरी है। यहां अपरिचितों से दूरी बनाने के बजाए उनसे परिचय बढ़ा कर अपनापन स्थापित करने की परम्परा रही है। ऐसे वातावरण में छोटी बच्चियां दिन भर पड़ोसियों के आंगन और घर में खेलती रहती हैं। उनके माता-पिता भी यह सोच कर निश्चिन्त रहते हैं कि बच्ची अपने चाचा, मामा जैसे पड़ोसी के घर में ही तो खेल रही है। ऐसे पड़ोसी जब बच्ची को टॉफी-चॉकलेट देते हैं और बच्चियां अपने माता-पिता की ओर देखती हैं कि वो ‘अंकल जी’ से टॉफी-चॉकलेट ले या न ले तो उसके माता-पिता भी उसे प्रोत्साहित करते हैं कि ‘ले लो बेटी, अंकल टॉफी दे रहे हैं, ले लो!’
माता-पिता को विश्वास रहता है कि बच्ची के ‘अंकल जी’ बच्ची के प्रति वात्सल्यभाव रखते हैं और उसे किसी भी प्रकार की क्षति नहीं पहुंचाएंगे। लेकिन दिल्ली गुड़िया-कांड के अपराधियों ने न केवल माता-पिता के विश्वास को तोड़ा बल्कि एक ऐसे अविश्वास को जन्म दे डाला जिसके कारण अब माता-पिता अपनी बच्चियों को पड़ोसियों से दूर रखने का प्रयास करेंगे। यदि दूर नहीं भी रख सकेंगे तो मन ही मन दुश्चिन्ताओं से घिरे रहेंगे।
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के गांधीनगर इलाके में 15 अप्रैल 2013 को पांच साल की मासूम ‘गुड़िया’ का अपहरण के बाद किए गए दुराचार से पूरा देश स्तब्ध रह गया था। दिसम्बर 2012 में ‘दामिनी’ के साथ हुई घटना को लोग भूल भी नहीं पाए थे कि यह घटना सामने आ गई थी। दामिनी रेप कांड के बाद कुछ लोगों ने यह भी दोषारोपण किया कि लड़कियां पाश्चात्य वेशभूषा धारण करती हैं और अकेली या अपने मित्रों के साथ घूमती हैं इसलिए उनके प्रति बलात्कारी आकर्षित होते हैं। लेकिन चार-पांच साल की छोटी बच्चियों के बारे में भी क्या यही कहा जाएगा कि ये भी बलात्कारियों को आकर्षित करती हैं? ऐसी गैरजिम्मेदाराना सोच अनजाने में ही बलात्कारियों की पक्षधर बन जाती है।

दामिनी बलात्कार कांड के बाद भी यही लगा था कि बलात्कार के अपराध पर लगाम लगेगी। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में एक मासूम बच्ची के साथ हुई बलात्कार व दरिंदगी की घटना को लेकर महिला संगठनों में एक बार फिर उबाल आया। इन संगठनों ने आरोपियों के अपराध स्वीकार करते ही उन्हें फांसी के तख्ते पर चढ़ा देने की मांग की। राष्ट्रीय और प्रादेशिक महिला जन संगठनों ने ‘दामिनी’ के साथ हुए सामूहिक बलात्कार की घटना के बाद एनसीआर में अप्रैल 2013 तक कुल 393 बलात्कार की घटनाएं घटने पर भी गहरा रोष व्यक्त किया। उन्होंने कहा था कि ‘दिल्ली जैसे इलाके में बलात्कार की घटनाओं से अंदाजा लगाया जा सकता है कि महिलाएं इस देश में सुरक्षित नहीं हैं, लिहाजा खुद उन्हें तीर-तलवार लेकर अपनी हिफाजत करनी पड़ेगी।’ कुछ महिला संगठनों की मांग थी कि ‘जिस अपराध के लिए जो सजा का प्रावधान कानून में निहित किया गया हो, उसकी सजा देने का अधिकार पीड़ित या उसके परिजनों को ही दिया जाए।’ निःसंदेह कठोर सजा जरूरी है। ऐसी सजा जो अन्य अपराधियों को अपराध में प्रवृत होने से रोक सके। उनके दिलों में भय जगा सके। किन्तु क्या इतना ही पर्याप्त होगा? भारतीय दण्ड संहिता में सजाओं के अनेक प्रावधान हैं। फिर भी अपराधी बेखौफ़ अपराध करते रहते हैं।
एक ओर दिल्ली की पांच वर्षीया नन्हीं गुड़िया दो वहशियों की शिकार बनी और दूसरी ओर मध्यप्रदेश के सिवनी जिले की नन्हीं बच्ची बलात्कारियों की शिकार बनी। शिकार हुई पांच वर्षीय मासूम ने 14 दिनों से जिंदगी और मौत से जंग लड़ने के बाद नागपुर के निजी अस्पताल में दम तोड़ दिया। दोनों स्थानों पर अलग-अलग दल की सरकारें। इसलिए राजनीतिक बयानबाज़ी का बाज़ार गर्म होना था और हुआ भी। दूसरी ओर एक और शर्मनाक प़क्ष सामने आया कि दिल्ली गुड़िया-रेप कांड में बच्ची के माता-पिता को अपना मुंह बंद रखने की एवज में दो हजार रुपए देने वाले आरोपी एक कांस्टेबल था। अर्थात् जिसे रक्षा के लिए तैनात किया गया वही भक्षकों का ‘सगावाला’ बन बैठा। जब कांस्टेबल पकड़ा गया तो उसने कथित तौर पर स्वीकार किया कि अपने सीनियर इंस्पेक्टर के कहने पर ही उसन दो हजार रुपए की पेशकश बच्ची के परिजनों को की थी। ऐसी दशा में दोषी किसे ठहराया जाए? भ्रष्ट और लचर कानून व्यवस्था को? राजनीतिज्ञों को? समाज के पुरुषवादी दृष्टिकोण को? या फिर तीनों को?
उन सभी बच्चियों को याद करते हुए जो आज जीवित होतीं अगर समाज में दरिंदे न होते....उन बच्चियों का मेरी ये पंक्तियां श्रद्धांजलि स्वरूप ....
आपराधिक हो चला वातावरण
हो चला संदिग्ध सबका आचरण
जब सुरक्षित ही नहीं हैं बच्चियां
उठ गया इंसानियत का आवरण
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 12.06.2019)
 

Thursday, February 14, 2019

चर्चा प्लस ... राजनीतिक झूले में झूलता ट्रिपल तलाक़ - डॉ. शरद सिंह

यूं तो वेलेंटाइन के दिन तलाक की चर्चा अटपटी लगती है लेकिन बात स्त्री के अधिकारों की हो तो मुझे हर दिन उचित लगता है...
      चर्चा प्लस ...
      राजनीतिक झूले में झूलता ट्रिपल तलाक़
        - डॉ. शरद सिंह
Dr (Miss) Sharad Singh
                                 राजनीतिज्ञ महिलाओं का सचमुच हित चाहते हैं या फिर सिर्फ़ दिखावा करते हैं, इनदिनों यह यक्षप्रश्न मुंह बाए खड़ा है। एक दल ने ट्रिपल तलाक के विरोध में आवाज़ उठाई तो दूसरा दल कह रहा है कि वह सत्ता पर आया तो ट्रिपल तलाक से संबंधित कानून को रद्द कर देगा। न पहले मुस्लिम महिलाओं से बहुमत लिया गया और न अब महिलाओं से पूछा जा रहा है। ट्रिपल तलाक का मुद्दा सफलता की पींगें भरेगा या औंधेमुंह गिरेगा, यह कहना अभी कठिन है लेकिन यह तो तय है कि इस संवेदनशील मुद्दे को राजनीति के झूले में जिस तरह झुलाया जा रहा है वह दुर्भाग्यपूर्ण है।       
 चर्चा प्लस .. राजनीतिक झूले में झूलता ट्रिपल तलाक़ - डॉ शरद सिंह ... Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in Sagar Dinkar Daily
     23 अगस्त 2017 ‘‘सागर दिनकर’’ के अपने इसी कॉलम ‘‘चर्चा प्लस’’ में मेरा लेख था- ‘‘आखिर मिल ही गया तीन तलाक से तलाक’’। जिसमें मैंने लिखा था कि -‘‘ 22 अगस्त 2017 का दिन भारतीय न्यायायिक इतिहास में हमेशा याद रखा जाएगा। यह तारीख गवाह रहेगी भारतीय मुस्लिम महिलाओं की उस जीत की जो उन्होंने अपने मानवीय अधिकारों पक्ष में हासिल की। यही वह तारीख है जब सुप्रीम कोर्ट ने ‘तीन तलाक’ की प्रथा को असंवैधानिक करार दिया। यह निर्णय उस मार्ग को भी प्रशस्त करता है जो एक दिन सभी भारतीय मुस्लिम महिलाएं को दुनिया की सभी प्रगतिशील महिलाओं की पंक्ति में ला खड़ा करेगा। ‘तीन तलाक’ की प्रथा के विरोध ने भले ही कड़ा संघर्ष झेला लेकिन अनेक चौंकाने वाली सच्चाइयां भी सामने आईं जिनसे स्वयं अधिकांश भारतीय मुस्लिम महिलाएं अनभिज्ञ थीं।

इससे पहले 30 मार्च 2016 को ‘‘सागर दिनकर’’ के अपने इसी कॉलम ‘‘चर्चा प्लस’’ में मेरा लेख था- ‘‘मुस्लिम महिलाओं का भविष्य’’। इस लेख में मैंने एक सर्वे के हवाले से आंकड़े देते हुए लिखा था कि -‘‘सर्वे में शामिल 525 तलाकशुदा महिलाओं में से 65.9 फीसदी का जुबानी तलाक हुआ।’’ इसी लेख में मैंने आगे जानकारी दी थी कि ‘‘भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन मुस्लिम महिलाओं के नेतृत्व में एक राष्ट्रीय मोर्चा है, जो पूरे समुदाय और विषेषरुप से मुस्लिम महिलाओं के नागरिक अधिकारों के लिए संघर्षरत है। यह ‘पाक कुरआन’ और भारतीय संविधान से मिले अधिकारों और निहित कर्तव्यों के लिए काम करता है। यह भारतीय संविधान में निहित न्याय , लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत को मानता है और ‘कुरआन’ के द्वारा मुस्लिम महिलाओं को मिले अधिकारों के लिए संघर्ष करता है। 13 राज्यों की 70 हजार मुस्लिम महिलाएं सदस्यों वाले राष्ट्रीय गठबंधन भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन ने मुस्लिम पर्सनल लॉ में सुधार किए जाने की जरूरत जताते हुए नवम्बर, 2015 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी समेत कई नेताओं को पत्र लिखा था तथा बराबरी के हक और लैंगिक न्याय की मांग की थी।’’

आज स्थितियां इतनी अधिक राजनीतिक हो गई हैं कि महिलाओं के हित के बजाएं ‘ट्रिपल तलाक कानून’ पुरुषों के विरुद्ध दिखाई देने लगा है। इस कानून में यदि कोई विसंगति है तो इसमें संशोधन किया जा सकता है। लेकिन इसके लिए भी बेहतर होगा कि संशोधन से पहले मुस्लिम महिलाओं से उस पर बहुमत लिया जाए। जिस राजनीतिक दल की पहचान सेक्यूलर के रूप में हमेशा रही हो, उसके तरफ से ऐसे बयान चौंकाने के लिए पर्याप्त हैं, वह भी लोक सभा चुनाव के ठीक पहले। जबकि एक साथ तीन तलाक़ को सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक करार दिया है। कोर्ट की पांच सदस्यीय बेंच में से तीन जजों ने तीन तलाक़ को असंवैधानिक माना। कोर्ट ने सरकार को इस पर कानून बनाने के लिए कहा। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा था कि सरकार संसद में इस पर कानून बनाए।
ट्रिपल तलाक कानून को लेकर कांग्रेस की तरफ से बड़ा बयान उस समय सामने आया जब कांग्रेस के अल्पसंख्यक महाधिवेशन में महिला कांग्रेस की अध्यक्ष सुष्मिता देव ने कहा, ’अगर हमारी सरकार आई, तो नरेंद्र मोदी सरकार के लाए ट्रिपल तलाक कानून को खत्म कर देंगे।“ उन्होंने यह भी कहा कि ये कानून मुस्लिम पुरुषों को जेल में भेजने की एक साजिश है। उस समय वे विगत 07 फरवरी 2019 को दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम में कांग्रेस अल्पसंख्यक मोर्चा सम्मेलन को संबोधित कर रही थीं। उल्लेखनीय है कि इस सम्मेलन में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी समेत अन्यम कार्यकर्ता भी मौजूद थे। जबकि 30 जनवरी 2019 की घटना है कि एटा की महिला को कथित तौर पर घर समय पर नहीं आने की वजह से उसके पति ने फोन पर ही तीन तलाक दे दिया। पीड़ित महिला ने समाचार एजेंसी एएनआई से कहा कि उसने अपने पति से वादा किया था कि वह तीस मिनट के भीतर लौट आएगी, मगर ऐसा नहीं करने पर उसे तुंरत तलाक दे दिया गया। महिला ने कहा कि ’मैं अपनी दादी मां को देखने अपने मायके गई थी. मेरे पति ने आधे घंटे के भीतर आने को कहा था। मैं दस मिनट लेट हो गई. उसके बाद उन्होंने मेरे भाई के मोबाइल पर फोन किया और तीन बार ’तलाक-तलाक-तलाक’ कहा. उनकी इस हरकत से मैं पूरी तरह से टूट गई।’

एक ओर महिला नेतृत्व प्रदान करती प्रियंका गांधी आपनी पूरी ताकत आगामी चुनाव में झोंक देने को दृढ़संकल्प हैं और इधर सुष्मिता देव अपने बयान पर अडिग हैं। कांग्रेस सांसद सुष्मिता देव  ने कहा है कि वह तीन तलाक विधेयक पर दिए अपने बयान पर कायम हैं। देव ने कहा था कि अगर कांग्रेस सत्ता में आती है तो पार्टी मुस्लिम समुदाय के भीतर चर्चा से निकले विकल्पों पर जाने के बजाए तीन तलाक विधेयक  को रद्द करेगी। सांसद देव ने बताया, “जो मैंने उस दिन (गुरुवार) बैठक में कहा था, वहीं मैंने संसद के अंदर भी कहा है। तीन तलाक को अपराध करार देने वाले सभी कानूनों को कांग्रेस बदार्श्त नहीं करेगी।” उन्होंने कहा, “और उसके बाद मैंने यह भी कहा था कि जो भी कानून महिला सशक्तिकरण के लिए हैं, हम उन कानून का समर्थन करेंगे। लेकिन हम (तलाक के) अपराधीकरण का समर्थन नहीं करेंगे।”
यह हठधर्मिता है या एक ऐसा तुष्टिकरण वाला कदम जो कम से कम मुस्लिम महिलाओं के हित में तो दिखाई नहीं दे रहा हैं। देखा जाए तो यह मुद्दा समान नागरिक संहिता से जुड़ा हुआ है। यदि इतिहास के पन्ने पलटे जाएं सन् 1993 में महिलाओं के खिलाफ होने वाले भेदभाव को दूर करने के लिए बने कानून में औपनिवेशिक काल के कानूनों में संशोधन किया गया। देखा जाए तो संशोधन की शुरुआत सन् 1772 की हैस्टिंग्स योजना से हुई और अंत शरिअत कानून के लागू होने से हुआ। यद्यपि सन् 1929 में, जमियत-अल-उलेमा ने बाल विवाह रोकने के खिलाफ मुसलमानों को अवज्ञा आंदोलन में शामिल होने की अपील की। इस बड़े अवज्ञा आंदोलन का अंत उस समझौते के बाद हुआ जिसके तहत मुस्लिम जजों को मुस्लिम शादियों को तोड़ने की अनुमति दी गई थी।
सन् 1985 में मध्य प्रदेश की रहने वाली शाह बानो को पति द्वारा तलाक़ दिए जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला किया कि उन्हें आजीवन गुजारा भत्ता दिया जाए। शाहबानो के मामले पर जमकर हंगामा हुआ और तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने संसद में ’मुस्लिम वीमेन (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स आफ डाइवोर्स) एक्ट पास कराया जिसने सुप्रीम कोर्ट के शाह बानो के मामले में दिए गए फैसले को निरस्त कर दिया और निर्वाह भत्ते को आजीवन न रखते हुए तलाक के बाद के 90 दिन तक सीमित रख दिया गया।
कुर्सी का लालच और मीडिया में बने रहने की चाह में डूबे कथित राजनीतिज्ञों को कम से कम एक बार उन तीन महिलाओं के संघर्ष को याद कर लेना चाहिए जो निरंतर जूझती रहीं तीन तलाक के विरुद्ध। पहली महिला - जयपुर की आफ़रीन रहमान जिन्हें एक चिट्ठी में तीन बार तलाक लिख कर तलाक दे दिया गया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में केस दायर किया लेकिन स्वयं के लिए नहीं बल्कि इस बात को ध्यान में रख कर कि “अपने पति पर निर्भर अन्य औरतों को ऐसी नाइंसाफ़ी का सामना ना करना पड़े।’’ दूसरी महिला - सहारनपुर, उत्तर प्रदेश की अतिया साबरी जिनके पति ने दस रुपए के स्टैम्पपे पर तीन तलाक लिख कर उनके मायके भेज कर उन्हें तलाक दे दिया था। निराश हो कर अतिया ने सुप्रीम कोर्ट से इस प्रथा को असंवैधानिक क़रार देने की अपील की। इसके साथ मांग की कि ऐसा क़ानून बनाया जाए जो मुसलमान महिलाओं को तलाक़ से जुड़े फ़ैसले लेने के समान अधिकार दे। तीसरी महिला - काशीपुर, उत्तराखंड की शायरा बानो जो अपने पति के तीन तलाक के निर्णय से आहत् हो कर सुप्रीम कोर्ट की शरण में गईं। अक्तूबर 2015 में जब पति ने शायरा  के पास तलाक़ वाली चिट्ठी भेजी तब उनका बेटा और बेटी उनके पति के पास ही थे जिनसे वे दोबारा कभी नहीं मिल सकती थीं। एक मां की तड़प के साथ उन्होंने कोर्ट से अपील की कि “मैं तो इस प्रथा का शिकार हुई लेकिन ये नहीं चाहती कि आने वाली पुश्तें भी इसे झेलें, इसीलिए मैंने सुप्रीम कोर्ट से अपील की है कि इसे असंवैधानिक क़रार दिया जाए।“
समान नागरिक अधिकार के मुद्दों को इस तरह राजनीतिक झूले पर झुलाते रहना जहां एक ओर लोकतंत्र के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है, वहीं दूसरी ओर यह महिला अधिकारों का भी हनन करता है।
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 14.02.2019)
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Wednesday, January 23, 2019

चर्चा प्लस ... सम्मान के संघर्ष में थर्ड जेंडर को संविधान, साहित्य और धर्म का समर्थन - डॉ. शरद सिंह

चर्चा प्लस ...             सम्मान के संघर्ष में थर्ड जेंडर को
Dr (Miss) Sharad Singh
संविधान, साहित्य और धर्म का समर्थन
- डॉ. शरद सिंह

प्रयागराज में हो रहे कुंभ में किन्नर अखाड़ा को पेशवाई में शामिल होने का अधिकार मिलना धार्मिक एवं सामाजिक सम्मान की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे पहले थर्ड जेंडर ने अपनी पहचान की लड़ाई लड़ी थी और कानूनी जीत हासिल की थी। वैसे भारतीय संविधान में थर्ड जेंडर को ऐसे कई अधिकार मिले हुए है जो उनके सम्मान रक्षा करने में समर्थ हैं किन्तु संविधान के दस्तावेज़ या कानून की किताबों से बाहर भी वे स्वयं को साबित करने के लिए संघर्षरत हैं। सुखद पक्ष यह कि बुद्धिजीवी वर्ग भी आज उनके समर्थन खड़ा होता जा रहा है। एक ओर साहित्यकार समुदाय उनके पक्ष में आवाज़ उठा रहा है तो दूसरी ओर जूना अखाड़े ने उनकी पेशवाई को स्वीकारा।
चर्चा प्लस ... सम्मान के संघर्ष में थर्ड जेंडर को संविधान, साहित्य और धर्म का समर्थन  - डॉ. शरद सिंह  Charcha Plus - Samman Ke Sangharsha Me Third Gender Ko Sanvidhan, Sahitya Aur Dharm Ka Samarthn -   -  Charcha Plus Column by Dr Sharad Singh
 संवैधानिक व्यवस्थाएं गणतांत्रिक मूल्यों को बनाए रखने में बहुत मददगार साबित होती हैं। भारतीय संविधान इस तरह बनाया गया जिससे गणतंत्र की रक्षा हो सके और सभी नागरिकों को उसके संवैधानिक अधिकार मिल सकें। जिस समाज में प्रत्येक नागरिक को संवैधानिक अधिकार प्राप्त हों वह समाज किसी भी तानाशाही का बखूबी विरोध कर सकता है। लेकिन समाज का एक ऐसा हिस्सा जो सबके लिए दुआएं देता है और स्वयं के जीवन को एक अभिशप्त जीवन की तरह जीने को विवश है क्योंकि उसे समाज में वह समानता आज भी नहीं मिली है जो समाज के अन्य सदस्यों को मिली हुई है। बेशक, समाज में औरतों की दशा भी उतनी बेहतर नहीं है जितनी कि संवैधानिक कानूनों के लागू होने के बाद हो जानी चाहिए थी। फिर भी औरतों की दशा के बारे में समाज भली-भांति परिचित तो है किन्तु थर्ड जेंडर तो अभी भी अपरिचय के धुंधलके में जी रहा है। यद्यपि थर्ड जेंडर समाज अपने ऊपर छाए धुंधलके को हटा देने के लिए अब दृढ़ प्रतिज्ञ हो चला है। जिसका उदाहरण है अप्रैल 2014 में भारत की शीर्ष न्यायिक संस्था सुप्रीम कोर्ट ने किन्नरों को तीसरे लिंग (थर्ड जेंडर) के रूप में पहचान दी। नेशनल लीगल सर्विसेस अथॉरिटी की अर्जी पर यह फैसला सुनाया गया था।

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने ऐतिहासिक निर्णय के द्वारा इस समुदाय को न केवल ‘तृतीय लिंग’ की पहचान देने बल्कि उन्हें सभी ‘विधिक’ और ‘संवैधानिक-अधिकार’ भी प्रदान करने का निर्देश केंद्र सरकार एवं देश की राज्य सरकारों को दिया है। वस्तुतः में यह कार्य तो विधायिका का था, किंतु देश की स्वतंत्रता के छह दशक बाद भी ऐसा नहीं किया जा सका और अंततः इस कार्य को पूरा किया न्यायिक उच्चतम न्यायालय को। ‘राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण’ (नाल्सा) बनाम भारत संघ और अन्य (2014)के मामले में उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति के.एस. राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति ए.के. सीकरी की खंडपीठ ने यह निर्णय 15 अप्रैल, 2014 को दिया। इस कानून ने थर्ड जेंडर के अधिकारों को व्यापक बना दिया। उन्हें एक-दूसरे से शादी करने और तलाक देने का अधिकार भी मिल गया। इस निर्णय के बाद वे बच्चों को गोद लेने का अधिकार मिल गया। इसके साथ ही उन्हें उत्तराधिकार कानून के तहत वारिस होने तथा इससे संबंधित अन्य अधिकार भी मिल गए।
उच्चतम न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16, 19(1) (क) और 21 के अंतर्गत देश के व्यक्तियों/नागरिकों को प्रदत्त सभी मूल अधिकारों को किन्नरों के भी पक्ष में विस्तारित करते हुए यह निर्णय दिया कि - संविधान के अनुच्छेद 14 के अनुसार राज्य किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता या विधियों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा। यह अनुच्छेद ‘व्यक्ति’ को केवल ‘पुरुष’ और ‘स्त्री’ तक ही सीमित नहीं करता है। ‘हिजड़ा’ या ‘ट्रांसजेंडर’, जो न तो पुरुष हैं और न ही स्त्री, भी शब्द ‘व्यक्ति’ के अंतर्गत आते हैं। इसलिए राज्य के उन सभी क्षेत्र के कार्यों, नियोजन, स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा तथा समान सिविल और नागरिक अधिकारों, जिनका उपभोग देश के अन्य नागरिक कर रहे हैं, ये वर्ग भी विधियों का कानूनी संरक्षण प्राप्त करने का हकदार है। अतः उनके साथ लिंगीय पहचान या लिंगीय उत्पत्ति के आधार पर विभेद करना विधि के समक्ष समानता और विधि के समान संरक्षण का उल्लंघन करता है।
संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 संयुक्त रूप से लिंगीय पक्षपात या लिंगीय विभेद को प्रतिबंधित करते हैं। इनमें प्रयोग किया गया शब्द ‘लिंग’ केवल पुरुष या स्त्री के जैविक लिंग तक ही सीमित नहीं है बल्कि इसके अंतर्गत वे लोग भी शामिल हैं जो स्वयं को न तो पुरुष मानते हैं और न स्त्री। अतः ये वर्ग इन अनुच्छेदों के संरक्षण के साथ-साथ अनुच्छेद 15(4) एवं 16(4) के द्वारा प्रदत्त आरक्षण का भी लाभ प्राप्त करने का अधिकारी है, जिसे देने के लिए राज्य बाध्य है।

संविधान के अनुच्छेद 19(1) (क) का कथन है कि सभी नागरिकों को वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होगी और इसके अंतर्गत किसी नागरिक के अपने ‘स्व-पहचानीकृत लिंग को अभिव्यक्त करने का अधिकार भी सम्मिलित है, जिसे पहनावा शब्द, कार्य या व्यवहार अथवा अन्य रूप में दर्शित किया जा सकता है और संविधान के अनुच्छेद 19(2) में कथित प्रतिबंधों के सिवाय किसी ऐसे व्यक्ति की व्यक्तिगत प्रस्तुति या वेशभूषा पर अन्य कोई प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता है। अतः ट्रांसजेंडर समुदाय के सदस्यों की एकांतता का महत्त्व, स्व-पहचान, स्वायत्तता और व्यक्तिगत अखंडता अनुच्छेद 19(1) (क) के अंतर्गत प्रत्याभूत किए गए मूल अधिकार हैं और राज्य इन अधिकारों की रक्षा करने तथा उन्हें मान्यता प्रदान करने के लिए बाध्य है।

संविधान का अनुच्छेद 21 यह प्रावधान करता है कि ‘‘किसी व्यक्ति को, उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा अन्यथा नहीं’’। यह अनुच्छेद मानव जीवन की गरिमा, किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वायत्तता एवं किसी व्यक्ति की निजता के अधिकार को संरक्षण प्रदान करता है। किसी व्यक्ति की लिंगीय पहचान को मान्यता दिया जाना गरिमा के मूल अधिकार के हृदय में निवास करता है। इसलिए लिंगीय पहचान हमारे संविधान के अंतर्गत गरिमा के अधिकार और स्वतंत्रता का एक भाग है। स्व-पहचानीकृत लिंग या तो ‘पुरुष’ या ‘महिला’ या एक ‘तृतीय लिंग’ (थर्ड जेंडर) हो सकता है। ‘हिजड़ा’ तृतीय लिंग के रूप में ही जाने जाते हैं, न कि पुरुष अथवा स्त्री के रूप में। इसलिए इनकी अपनी लिंगीय अक्षमता को सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक समूह के कारण एक तृतीय लिंग के रूप में विचारित किया जाना चाहिए।
न्यायमूर्ति ए.के. सीकरी के हैं, जिन्होंने अन्य मामलों में इसके पूर्व न्यायमूर्ति के.एस. राधाकृष्णन के संपूर्ण तर्कों का समर्थन किया करते हुए इसी बात पर बल दिया था कि ट्रांसजेंडर समूह भी देश के नागरिक हैं और उन्हें थर्ड जेंडर के रूप में पहचान दी जानी चाहिए जिससे वे भी गरिमा और सम्मान के साथ जीवन-यापन कर सकें और देश के अन्य नागरिकों की भांति मतदान के अधिकार, संपत्ति अर्जन के अधिकार, विवाह के अधिकार, पासपोर्ट, राशन कार्ड, वाहन-चालन अनुज्ञप्ति इत्यादि के माध्यम से औपचारिक पहचान प्राप्त करने के अधिकार, शिक्षा, नियोजन एवं स्वास्थ्य इत्यादि के अधिकार का दावा कर सकें। क्योंकि इन अधिकारों से इस समूह को वंचित रखे जाने का कोई कारण नहीं है।

शबनम मौसी, कमला जान, आशा देवी, कमला किन्नर, मधु किन्नर और ट्रांसजेंडर एक्टिविस्ट लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी वे नाम हैं जिन्होंने चुनाव में बहुमत से विजय प्राप्त कर के विधायक और महापौर तक के पद सम्हाले। देश की पहली किन्नर प्राचार्य मानबी बंदोपाध्याय और पहली किन्नर वकील तमिलनाडु की सत्य श्री शर्मिला ने सिद्ध कर दिया कि किन्नर अथवा ‘थर्ड जे़ंडर’ किसी भी विद्वत स्त्री-पुरुष की भांति बुद्धिजीवी वर्ग की किसी भी ऊंचाई को छू सकते हैं। किन्नर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ने अपनी आत्मकथा लिखी ‘मैं हिजड़ा, मैं लक्ष्मी’। उन्होंने लम्बा संघर्ष किया। महामंडलेश्वर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी का कहना है कि ’हम सनातन धर्म के हैं, उपदेवता हैं। हमने सालों संघर्ष झेला है। आज उसी संघर्ष का परिणाम है कि स्वयं इस धर्म मेले ने हमें अपनाया। संगम ने गोद में खिलाया। आज जितने भी किन्नर संन्यासियों ने यहां स्नान किया है, उनकी ओर से मैं पूरे मानव समाज के हित की कामना और प्रयास करती हूं। यह सनातन धर्म की ही महिमा हो सकती है कि जहां सालों तक संस्कृति और समाज से अलग रखा, वहीं सबसे बड़े संस्कृति के मेले ने बांहें फैलाकर हमारा स्वागत किया।’

समाज किसी भी परिवर्तन को एक झटके में स्वीकार नहीं करता है। वह दीर्घकालिक प्रक्रिया से गुज़रता है परिवर्तन को आत्मसात करने के लिए। हिन्दी साहित्य को ही ले लीजिए। थर्ड जेंडर के जीवन तथा मनोदशा पर कहानियां, कविताएं, उपन्यास और लेख लिखे जाते रहे। किन्तु थर्ड जेंडर के साहित्यिक विमर्श को खड़े होने में भी लगभग डेढ़ दशक से अधिक समय लग गया। लेकिन अब बहुत कुछ सकारात्मक हुआ। नईदिल्ली के सामयिक प्रकाशन ने अपनी पत्रिका ‘सामयिक सरस्वती’ के अप्रैल-सितम्बर 2018 के संयुक्तांक को ‘थर्ड जेंडर विशेषांक’ के रूप में प्रकाशित करने का निर्णय लिया। इस पत्रिका की कार्यकारी संपादक के रूप में मैंने और संपादक महेश भारद्वाज ने अपने इस इरादे पर अमल किया। विशेषांक छप कर आया तो पाठकों, समीक्षकों और शोधकर्ताओं ने इसे हाथों-हाथ लिया। इसके बाद विचार आया कि क्यों न थर्ड जेंडर के इतिहास से ले कर वर्तमान और भविष्य तक की चर्चा को एक ही ज़िल्द में सहेज कर एक किताब पाठकों को सौंपी जाए और परिणामतः प्रकाशित हुई मेरी पुस्तक ‘‘थर्ड जेंडर विमर्श’’। दरअसल, मुझे व्यक्तिगततौर भी लगता है कि थर्ड जेंडर के संघर्ष को हर स्तर पर चाहे वह साहित्य हो या संविधान हो, उसे वैचारिक संमर्थन एवं प्रोत्साहन यानी विमर्श की जरूरत है। शेष समाज का समर्थन ही थर्ड जेंडर को समाज में वह समतापूर्ण सम्मान दिला सकता है जो स्त्रियों और पुरुषों को प्राप्त है। कानून भी तभी असरकारक होते हैं जब विचारों में सकारात्मकता हो और यह सकारात्मकता साहित्य के पन्नों से मानस तक पहुंचती है। लिहाजा, कानून भी जरूरी है और साहित्य भी।
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 23.01.2019)

Friday, January 18, 2019

चर्चा प्लस ... संक्रांति के राजनीतिक लड्डुओं में चार्जशीट का कंकड़ - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस ...
संक्रांति के राजनीतिक लड्डुओं में चार्जशीट का कंकड़
- डॉ. शरद सिंह


मुद्दा राष्ट्र के मान और अपमान का करार दिया जाए और फिर भी चार्जशीट दायर करने में देरी हो तो सवाल उठेंगे ही। इधर संक्रांति के लड्डुओं की मिठास मुंह में घुल ही रही थी कि जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार समेत 10 आरोपियों पर राजद्रोह के आरोप में मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट के समक्ष चार्जशीट दाखिल कर दी गई। चार्जशीट दाखिले में तीन साल लग गए और दाखिल किया गया तो लोकसभा चुनाव से ठीक पहले। लिहाजा, इस बार लोकसभा चुनाव के पहले बांधे जा रहे राजनीतिक लड्डुआें में ‘जेएनयू राजद्रोह’ मामले की चार्जशीट दाखिल किया जाना मेवे का काम करेगा या कंकड़ का यह तो आने वाला समय ही बताएगा।

चर्चा प्लस ... संक्रांति के राजनीतिक लड्डुओं में चार्जशीट का कंकड़ - डॉ. शरद सिंह  Charcha Plus - Sankranti Ke Rajnitik Ladduon Me Charge Sheet Ka Kankar  -  Charcha Plus Column by Dr Sharad Singh
 तीन साल पहले का वह दृश्य जो टेलीविजन के पर्दे पर दिखा था, आज भी भूलता नहीं है। संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरू को फांसी पर लटकाए जाने के विरोध में वर्ष 2016 में जेएनयू कैंपस में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था। कार्यक्रम के दौरान कथित रूप से देश विरोधी नारे लगाए गए थे। इसके बाद बीजेपी सांसद महेश गिरी और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) की शिकायत पर वसंत कुंज (उत्तर) पुलिस थाने में 11 फरवरी 2016 को अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए तथा 120बी के तहत एक मामला दर्ज किया गया था। राजद्रोह एक गंभीर अपराध है और इसके लिए अधिकतम आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान है।
जब सभी मकर संक्रांति मनाने में मग्न थे उसी दौर में जेएनयू राजद्रोह केस का जिन्न उठ खड़ा हुआ। वैसे मकर संक्रांति देश के प्रमुख पर्वो में से एक है। अलग-अलग राज्यों में स्थानीय परंपराओं के अनुसार इसे मनाया जाता है। इसी दिन से गंगा नदी के किनारे माघ मेला या गंगा स्नान का आयोजन किया जाता है। कुंभ के पहले स्नान की शुरुआत भी इसी दिन से होती है। मकर संक्रांति त्योहार विभिन्न राज्यों में अलग-अलग नाम से मनाया जाता है। उत्तर प्रदेश में मकर संक्रांति को खिचड़ी पर्व कहा जाता है. सूर्य की पूजा की जाती है। चावल और दाल की खिचड़ी खाई और दान की जाती है। गुजरात और राजस्थान में उत्तरायण पर्व के रूप में मनाया जाता है। पतंग उत्सव का आयोजन किया जाता है। आंध्रप्रदेश में संक्रांति के नाम से तीन दिन का पर्व मनाया जाता है। तमिलनाडु में किसानों का ये प्रमुख पर्व पोंगल के नाम से मनाया जाता है। महाराष्ट्र में लोग गजक और तिल के लड्डू खाते हैं और एक दूसरे को भेंट देकर शुभकामनाएं देते हैं। पश्चिम बंगाल में हुगली नदी पर गंगा सागर मेले का आयोजन किया जाता है। असम में भोगली बिहू के नाम से इस पर्व को मनाया जाता है। पंजाब में एक दिन पूर्व लोहड़ी पर्व के रूप में मनाया जाता है। सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में जाने को ही संक्रांति कहते हैं। संक्रांति में दाल-चावल की खिचड़ी पकाई और खिलाई जाती है। इस बार लोकसभा चुनाव के पहले बांधे जा रहे राजनीतिक लड्डुआें में ‘जेएनयू राजद्रोह’ मामले की चार्जशीट दाखिल किया जाना मेवे का काम करेगा या कंकड़ का यह तो आने वाला समय ही बताएगा।
यह किसी से छिपा नहीं है। छोटे-छोटे विवादों और मामूली अपराधों के मामलों की सुनवाई में अरसा लग जाता है। देश में निचली अदालतों का कमोबेश यही हाल है, जहां मुकदमे बरसों-बरस घिसटते रहते हैं। दीवानी मुकदमे तो पीढ़ियों तक भी खिंच जाते हैं। न्याय में देरी के मामले न्याय प्रणाली में मौजूद विसंगतियों और गंभीर खामियों की तरफ ही इशारा करते हैं। अदालतों की कार्यप्रणाली कछुआ चाल वाली है। पर केवल अदालतों को दोष क्यों दें, कार्यपालिका भी कम दोषी नहीं है, क्योंकि न्यायिक ढांचे के पर्याप्त विस्तार के लिए संसाधन मुहैया कराना उसी की जिम्मेवारी है। पर सरकारें इस तरफ से उदासीन ही रही हैं। निचली अदालतों से लेकर सर्वोच्च अदालत तक, कुल मिलाकर तीन करोड़ से ज्यादा मुकदमे लंबित हैं। लेकिन राजद्रोह के मामले में चार्जशीट दाखिल करने में तीन साल का समय लग जाना शायद किसी और देश में संभव नहीं है।

तीन साल बाद दाखिल की गई चार्जशीट में कन्हैया कुमार, उमर खालिद और अनिर्बन समेत 10 आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए (राजद्रोह), 323 (किसी को चोट पहुंचाने के लिए सजा), 465 (जालसाजी के लिए सजा), 471 (फर्जी दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को वास्तविक के तौर पर इस्तेमाल करना), 143 (गैरकानूनी तरीके से एकत्र समूह का सदस्य होने के लिए सजा), 149 (गैरकानूनी तरीके से एकत्र समूह का सदस्य होना), 147 (दंगा फैलाने के लिए सजा) और 120बी (आपराधिक षडयंत्र) के तहत आरोप लगाए गए हैं। पुलिस ने दावा किया कि उसके पास अपराध को साबित करने के लिये वीडियो क्लिप है, जिसकी गवाहों के बयानों से पुष्टि हुई है। पुलिस का कहना है कि कन्हैया कुमार जुलूस की अगुवाई कर रहे थे और उन्होंने जेएनयू परिसर में फरवरी 2016 में देश विरोधी नारे लगाए जाने का कथित तौर पर समर्थन किया था। पुलिस ने यह भी बताया कि आरोपपत्र में भाकपा नेता डी राजा की पुत्री अपराजिता, जेएनयूएसयू की तत्कालीन उपाध्यक्ष शहला राशिद, राम नागा, आशुतोष कुमार और बनोज्योत्सना लाहिरी सहित 36 अन्य लोगों के नाम हैं क्योंकि इन लोगों के खिलाफ सबूत अपर्याप्त हैं।
घटना के दौरान कन्हैया कुमार अखिल भारतीय छात्र परिषद को नेता था। यह अखिल भारतीय छात्र परिषद भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्टूडैंट विंग है। कन्हैया कुमार को सन् 2015 में जेएनयू (जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय) छात्रसंघ के अध्यक्ष पद के लिए चुना गया था। फरवरी 2016 में जेएनयू में एक कश्मीरी अलगाववादी, 2001 में भारतीय संसद पर हमले के दोषी, मोहम्मद अफजल गुरु को फांसी दिए जाने के खिलाफ एक छात्र रैली में राष्ट्रविरोधी नारे लगाने के आरोप में देशद्रोह का मामला दर्ज किया गया था। कन्हैया कुमार को तब दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार भी किया था। फिर 2 मार्च 2016 में अंतरिम जमानत पर रिहा कर दिया गया था, क्योंकि राष्ट्र विरोधी नारों में भाग लेने का पुलिस द्वारा कन्हैया कुमार का कोई सबूत प्रस्तुत नहीं किया गया। उल्लेखनीय है कि जेएनयू के कुलपति द्वारा गठित एक अनुशासन समिति ने भी विवादास्पद घटना की जांच की। वहीं, प्रारंभिक जांच रिपोर्ट के आधार पर, कन्हैया कुमार और सात अन्य छात्रों को अकादमिक तौर पर वंचित कर दिया गया। कन्हैया कुमार पर राजद्रोह का मुकादमा चलाया गया। इस बीच कन्हैया कुमार की आटोबायोग्राफिक किताब भी छपी जिसका नाम है- ‘बिहार टू तिहार’।

जहां एक ओर राजनीति में अपराध की घुटपैंठ को रोकने की बात की जाती है वहीं संदिग्ध आरोपी को राजनीतिक प्रचार करने की छूट दी जाती है। या तो पहले क्लीनचिट दी जाती फिर चुनाव प्रचार से रोका जाना चाहिए था। क्योंकि मामला मामूली नहीं देश के मान-सम्मान का था। दूसरी ओर यदि कन्हैया कुमार राजनीति करने की आजादी थी तो शेष आजादी से उसे क्यों वंचित रखा गया? स्वाभाविक है कि इस तरह के प्रश्न प्रकरण को कमजोर बना सकते हैं। चार्जशीट दाखिल किए जाने के बाद कन्हैया कुमार ने आरोप पत्र को ’राजनीति से प्रेरित’ बताते हुए लोकसभा चुनाव से कुछ महीने पहले इसे दायर किए जाने पर इसके समय को लेकर सवाल उठाया। कन्हैया कुमार ने मीडिया से यह भी कहा, ’मुझे कोई समन या अदालत से कोई सूचना नहीं मिली है। लेकिन अगर यह सही है तो हम पुलिस और प्रधानमंत्री मोदी के शुक्रगुजार हैं कि आखिरकार तीन साल बाद जब उनके और उनकी सरकार के जाने का वक्त आ गया है तो आरोपपत्र दायर किया गया है। लेकिन लोकसभा चुनाव से ठीक पहले आरोपपत्र का दायर किया जाना प्रासंगिक है।’’ कन्हैया कुमार ने यह भी कहा कि ‘‘इस मामले में सनी देओल की फिल्म की तरह तारीख पर तारीख न दी जाए। उन्होंने कहा कि कोर्ट में स्पीडी ट्रायल चलाया जाए और फैसला सुनाया जाए। उन्होंने कहा कि मैं निर्दोष हूं, मुझे देश की न्याय व्यवस्था पर पूरा विश्वास है। कन्हैया ने बेगूसराय में कहा कि सरकार के पास कोई मुद्दा ही नहीं बचा है इसलिए वो ऐसे मामले को तूल दे रही है। केंद्र सरकार सिर्फ पाकिस्तान, मंदिर और हिंदू-मुसलमान की बात कर रही है। उन्होंने कहा कि सरकार पूरी तरह डिप्रेशन के दौर में आ गई है और दोबारा सत्ता पाने के लिए वह किसी भी हद से गुजरने को तैयार है।’’
वहीं, उमर खालिद ने बेंगलुरू में सेंट जोसेफ कॉलेज में छात्रों के एक समूह को ‘संविधान की रक्षा में युवकों की भूमिका’ विषय पर संबोधित किया। खालिद ने कहा कि हम आरोपों को खारिज करते हैं। कथित घटना के तीन साल बाद आरोपपत्र दाखिल करने का कदम चुनावों के ठीक पहले ध्यान भटकाने का एक प्रयास है। शहला राशिद ने कहा कि यह पूरी तरह से एक फर्जी मामला है जिसमें अंततः हर कोई बरी हो जाएगा। चुनावों के ठीक पहले आरोपपत्र दाखिल किया जाना दर्शाता है कि किस प्रकार भाजपा इससे चुनावी फायदा उठानी चाहती है। मैं घटना के दिन परिसर में भी नहीं थी। वहीं, भाकपा नेता डी राजा ने कहा कि यह राजनीति से प्रेरित है। तीन साल बाद दिल्ली पुलिस इस मामले में आरोपपत्र दाखिल कर रही है। हम इसे अदालत में और अदालत के बाहर राजनीतिक रूप से लड़ेंगे।

राजनीति में स्वार्थ साधने की कला में सभी माहिर होते हैं। हर दल अपने-अपने ढंग से मामले का व्याख्याकार बन बैठता है। कन्हैया के समर्थन में तेजस्वी भी आ गए। उन्होंने यह भी कहा कि बीजेपी के खिलाफ मुंह खोलने वालों को सीबीआई, इडी, इनकम टैक्स जैसी एजेंसियों से डराया जाता है। इसके अलावा उन्होंने यूपी की राजनीति पर कहा कि हम चाहते हैं कि बीजेपी के खिलाफ पूरे देश में गठबंधन बने। कुल मिला कर राजद्रोह मामले की रेलगाड़ी को एक बार फिर राजनीति की पटरी पर चलाने की जोड़-तोड़ गरमाने लगी है। बहरहाल, जेएनयू राजद्रोह मामले में आरोपपत्र का संज्ञान लेना या नहीं लेना मुख्य मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट पर निर्भर करेगा। लेकिन संक्रांति के लड्डुओं के बीच चार्जशीट का कंकड़ तो आ ही गया है।
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 17.01.2019)
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Thursday, December 20, 2018

चर्चा प्लस ... बड़ी कठिन है डगर ( एम.पी. में ) सी.एम. की - डॉ. शरद सिंह

Dr Sharad Singh
चर्चा प्लस ...
बड़ी कठिन है डगर ( एम.पी. में ) सी.एम. की
- डॉ. शरद सिंह
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कमलनाथ द्वारा मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के साथ ही कांग्रेस को एक बार फिर प्रदेश की सत्ता सम्हालने का अवसर मिला है । कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कमलनाथ के मुख्यमंत्री बनने के पूर्व ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थकों ने अपने हठ का प्रदर्शन किया किन्तु समझाइश के बाद वे मान भी गए। यूं तो, अंत भला सो सब भला। लेकिन क्या सचमुच सब कुछ भला ही भला है? सरकारी खजाना संकटग्रस्त है, विरोधी कमर कसे हुए हैं, साथी भी छींटाकशी से बाज नहीं आ रहे हैं और उस पर 10 दिन में किसानों का कर्जमाफ करने की घोषणा का दबाव। बड़ी कठिन है डगर सी.एम. की। 

चर्चा प्लस ... बड़ी कठिन है डगर ( एम.पी. में ) सी.एम. की - डॉ. शरद सिंह  Charcha Plus column of Dr (Miss) Sharad Singh
 मध्यप्रदेश में नई सरकार ने शपथग्रहण कर लिया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कमलनाथ के मुख्यमंत्री बनने के पूर्व ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थकों ने अपने हठ का प्रदर्शन किया किन्तु समझाइश के बाद वे मान भी गए। अंत भला सो सब भला। कांग्रेस नेताओं की उपस्थिति में कमलनाथ ने ली मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली। लेकिन क्या सचमुच सब कुछ भला ही भला है? कदापि नहीं। नए मुख्यमंत्री के लिए मध्यप्रदेश यानी एम. पी. की डगर आसान नहीं होने वाली है। नमूना शपथग्रहण समारोह के दौरान ही दिखाई दे गया। भारतीय जनता पार्टी ने 1984 में हुए सिख विरोधी दंगों के मामले में सज्जन कुमार को सोमवार को सुनाई गई। उम्रकैद की सजा को कांग्रेस के लिए बड़ा झटका बताते हुए कहा कि इस पार्टी को इसी नरसंहार के आरोपी कमलनाथ के खिलाफ भी कार्रवाई करनी चाहिए। सिख विरोधी दंगों पर आए फैसले से जुड़ी एक प्रतिक्रिया में आम आदमी पार्टी का कहना है कि कमलनाथ को मध्य प्रदेश का सीएम नहीं बनाया जाना चाहिए। खैर इस राजनीतिक जुमलेबाजी को एक तरफ रख दिया जाए तो सबसे गंभीर मसला है कांग्रेस द्वारा की गई घोषणाओं के पूरा किए जाने का। विपक्ष ने पहले ही चेतावनी दे दी है कि वे ‘दस दिन’ अपनी उंगलियों पर गिनते रहेंगे।
उल्लेखनीय है कि विधानसभा चुनावों के परिणाम आने के बाद 11 दिसंबर को प्रेस से बात करते हुए राहुल गांधी ने कहा था कि कांग्रेस राज्य के किसानों की कर्जमाफी की घोषणा 10 दिन के अंदर करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। इस हिसाब से मध्यप्रदेश में हालत इतनी सुगम नहीं है। सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार लगभग 41 लाख किसानों ने 56,377 करोड़ रुपए का कर्ज ले रखा है। इनमें भी 21 लाख ऐसे किसान हैं जिहोंने 14,300 करोड़ रुपये का कर्ज लिया है और उनकी कर्ज अदा करने वाली तारीख भी निकल चुकी है। वहीं दूसरी ओर किसान कर्ज माफी को उचित नहीं इहराते हुए रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर उर्जित पटेल समेत डिप्टी गवर्नर एस.एस. मूंदड़ा ने कहा था कि इससे कर्ज लेने और देने वाले के बीच अनुशासन बिगड़ता है। इतना ही नहीं, स्अेट बैंक ऑफ इंडिया की 2017 में चेयरपर्सन रहीं अरुंधति भट्टाचार्य ने भी किसान कर्जमाफी का विरोध किया था। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि कर्ज लेने वाले कर्ज चुकाने के बजाय अगले चुनाव का इंतजार करने लगते हैं।
बैंक के कड़े रवैये के कारण राज्य सरकार को किसान कर्जमाफी के लिए आरबीआई से लोन लेना कठिन होगा। बैंक के कड़े दिशा-निर्देशों के कारण राज्य सरकार बहुत अधिक लोन नहीं ले पाएगी। नए नियमों के अनुसार कर्ज की सीमा एक हजार करोड़ रुपये अधिकतम कर दी गई है। उस मुसीबत यह कि रिजर्व बैंक एवं स्टेट बैंक की आपत्तियों के बावजूद मध्यप्रदेश की पिछली सरकार ने 5 अक्टूबर, 12 अक्टूबर और 9 नवंबर को क्रमशः 500 करोड़, 600 करोड़ और 800 करोड़ रुपये का कर्ज लिया था। इसके बाद 4 दिसंबर को भी लोन लिया गया था। जहां प्रदेश सरकार के पास खुद के कर्ज चुकाने के लाले पड़ने वाले हों, वहां किसानों की कर्जमाफी कैसे हो सकेगी, यह देखने का विषय रहेगा।
यह तो तय है कि कांग्रेस सरकार खजाने की हालत जनता को बताने के लिए श्वेतपत्र लाएगी। नए मुख्यमंत्री के लिए वित्तीय स्थिति को आमजनता के सामने रखना जरूरी है। इसके लिए सभी विभागों को अपनी-अपनी स्थिति को लेकर रिपोर्ट तैयार करने के निर्देश पहले ही दे दिए गए हैं।
यहां समाचार न्यूज चैनल एनडीटीवी की 10 जुलाई 2018 की उस रिपोर्ट को याद करना जरूरी है जिसमें खुलासा किया था कि -‘‘ओवरड्राफ्ट की स्थिति के बावजूद चुनावी साल में शिवराज लगा रहे घोषणाओं की झड़ी । वित्तमंत्री बेफिक्र होकर कहते हैं कि चुनावी साल में घोषणाएं कौन सी सरकार नहीं करती. कांग्रेस कह रही है सरकार घबराहट में ऐलान कर रही है। 30 मई को मंदसौर में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री ने गरीबों को घर, तेंदूपत्ता संग्राहकों के लिये चप्पल-साड़ी का ऐलान किया, कहा कि सरकार ने अभी तक गरीबों में 20000 करोड़ बांट दिये. तो वहीं 14 मई को भोपाल में बच्चों से कहा कि 12वीं के बाद सारी फीस उनके मामा भरेंगे, 75 फीसद लाने पर लैपटाप मिलेगा।’’ एनडीटीवी की इसी रिपोर्ट में कहा गया था कि-‘‘ 12 फरवरी को भोपाल के जंबूरी मैदान में धड़ाधड़ ऐलान करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा, ’सरकार 5 साल में खेती पर 38,000 करोड़ रुपये खर्चेगी। चुनावी साल में गरीबों के बिजली के पुराने बिल माफ करने के लिए बिजली बिल समाधान योजना तो मजदूरों के लिये संबल योजना, किसानों के लिये किसान समृद्धि योजना जैसे कई ऐलान ताब़ड़तोड़ कर डाले, ये भूलकर कि इन योजनाओं ने सरकार की आर्थिक हालत खराब कर दी है। राज्य पर एक लाख 82000 करोड़ का कर्ज है, 15 साल बाद ओवर ड्राफ्ट के हालात हैं लेकिन वित्त मंत्री निश्चिंत हैं। वित्त मंत्री जयंत मलैया ने कहा, “हम संवदेनशील हैं, खजाने में कुछ दे दें तो क्या दिक्कत है, साढ़े 14 साल रेवेन्यू सरप्लस रहा है हमें कोई दिक्कत नहीं है, खजाना भले खाली हो जाए, गरीब की आंखों में आंसू नहीं देख सकते, क्या फर्क पड़ता है ओवरड्राफ्ट से।’’ तो, इस तरह भावुकता भरे बयान तत्कालीन सरकार की ओर से आते रहे।
एनडीटीवी ने जो आंकड़े दिए थे उन पर भी नज़र डालना जरूरी है- पिछली सरकार ने संबल योजना में 2500 करोड़ रुपए, बिजली बिल समाधान योजना में 3000 करोड़ रुपए, सरकारी कर्मचारियों को दिये गये सातवें वेतनमान में 1500 करोड़ रुपए, किसानों को पुराने साल की खरीद के बोनस में 2050 करोड़ रुपए, कृषक समृद्धि योजना में 4000 करोड़ रुपए और शिक्षकों को एक विभाग में समायोजित करने में 2000 करोड़ रुपए का खर्चा सरकारी खजाने पर पड़ा। सरकार ने 11 हजार करोड़ का अनुपूरक बजट लाकर हालत सुधारने की सोचा किन्तु मात्र 5000 हजार करोड़ रुपयों की ही व्यवस्था हो पाई।
मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव 2018 में कांग्रेस ने समर्थन के आधार पर बहुमत पा कर अपनी सरकार बना ली है लेकिन कर्ज में डूबा मध्यप्रदेश का सरकारी खजाना कांग्रेस सरकार के लिए कांटों भरा रास्ता है नई सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती सरकार के खराब वित्तीय हालात हैं। प्रदेश के ऊपर पौने दो लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का कर्ज है। कर्मचारियों को सातवां वेतनमान और एरियर देने, अध्यापकों के संविलियन, भावांतर भुगतान, किसानों को प्रोत्साहन राशि देने, संबल योजना सहित अन्य योजनाओं के चलते सरकार का खर्च बहुत बढ़ गया है। जीएसटी लागू होने और पेट्रोल-डीजल पर वैट कम करने से आय घटी है। विकास योजनाओं के खर्च की पूर्ति के लिए रिजर्व बैंक के जरिए बाजार से लगातार कर्ज लिया गया है। जीएसटी के कारण टैक्स लगाने के क्षेत्र बेहद सीमित हो गए हैं। पिछली सरकार के द्वारा दी जाने वाली वित्तीय छूटों के विरुद्ध समय-समय पर विरोध भी किए जाते रहे किन्तु जयकारों के स्वर में विरोध के स्वर दबते चले गए। अंततः यही विरोध भाजपा को हार के रूप में झेलना पड़ा। भाजपा सरकार चली गई और प्रदेश की कर्ज तले दबी वित्तीय स्थिति कांग्रेस के रास्ते का रोड़ा बन गई है। फिर भी यह प्रश्न उभरता है कि यदि पिछली सरकार फिर सत्ता पर आती तो इस प्रदेशिक सरकारी कर्ज से कैसे कांग्रेस सरकार को अपने वचन पूरा करने के लिए अतिरिक्त वित्तीय संसाधन की जरूरत होगी। ऐसे में एक पार पाती? जनता को दिखाए गए सारे सपने क्या 2019 के चुनाव के बाद सरकार द्वारा खुद ही छीन लिए जाते ताकि वह सरकारी खजाने को बचा सके या फिर कर्ज का सिलसिला अनवरत चलता रहता जो कि अर्थशास्त्रियों के अनुसार घातक सिद्ध होता। बहरहाल, नई सरकार खजाने के लिए धन जुगाड़ने को एक कदम यह भी उठा सकती है कि सरकार खर्चों में कटौती की जाए।
राहुल गांधी द्वारा किए गए किसानों की कर्जमाफी के वादे को मध्यप्रदेश सरकार हर संभव पूरा करने के लिए कटिबद्ध है और अब कर्जमाफी के आदेश पर मुख्यमंत्री के हस्ताक्षर भी हो चुके हैं। इससे बढ़ने वाले आर्थिक भार के संदर्भ में यह मानना चाहिए कि इसके लिए कांग्रेस ने कोई न कोई बैकअप प्लान तय कर रखा होगा क्योंकि राहुल गांधी इस तरह की लुभावनी घोषणा नहीं करते। वह भी ऐसे समय में जब मध्यप्रदेश में विपक्ष बलशाली है और 2019 का चुनाव बाट जोह रहा है और प्रदेश की वित्तीय दशा अत्यंत कमजोर है।
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 20.12.2018)
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Friday, August 31, 2018

चर्चा प्लस ... ‘इंडिया’ क्यों? सिर्फ़ ‘भारत’ क्यों नहीं ? - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh

चर्चा प्लस ...
‘इंडिया’ क्यों? सिर्फ़ ‘भारत’ क्यों नहीं ?
- डॉ. शरद सिंह

विदेशों में हम भारतीयों से जब हमारी नागरिकता पूछी जाती है तो हम गर्व से कहते हैं-‘आई एम इंडियन’। इसी बात को जब हिन्दी में कहने की बारी आती है तो ‘मैं इंडियन हूं’ कहने में गर्व का अनुभव करते हैं। गोया ‘भारतीय’ कहना कोई लज्जाजनक बात हो। इसका सबसे बड़ा कारण है हमारे देश के तीन नामों का होना। दुनिया का कोई भी देश ऐसा नहीं है जिसके तीन नाम एक साथ क्रियाशील हों। अब समय आ गया है कि इस विचित्र स्थिति से उबरते हुए देश का आधिकारिक रूप से एक नाम और वह भी मूल प्राचीन नाम ‘भारत’ मान्य कर दिया जाए।
‘इंडिया’ क्यों? सिर्फ़ ‘भारत’ क्यों नहीं ? - डॉ. शरद सिंह ... चर्चा प्लस .. Column of Dr (Miss) Sharad Singh in Sagar Dinkar News Paper

विश्व का सबसे बड़ा गणतंत्र का दर्ज़ा रखने वाला देश - भारत, हिन्दुस्तान या इंडिया। एक देश जिसके तीन नाम। आधिकारिक तौर पर दो नाम हैं-इंडिया और भारत। बार-बार इस बात की मांग उठती रही है कि देश का एक नाम रहे-‘भारत’। अभी कुछ अरसा पहले विश्वविख्यात जैन संत आचार्य विद्यासागर ने ‘इंडिया’ शब्द की व्याख्या करते हुए देश का नाम ‘भारत’ रखे जाने पर तार्किक पक्ष रखे हैं और ‘भारत बोलो’ मुहिम का आह्वान किया है।

भारत या इंडिया, क्या नाम है इस देश का? हिन्दुस्तान सिर्फ़ बोलचाल में है अथवा पुराने अभिलेखों में किन्तु ‘इंडिया’ और ‘भारत’ आज भी समान रूप से प्रयोग में लाया जा रहा है। सन् 2012 में लखनऊ की सामाजिक कार्यकर्ता उर्वशी शर्मा ने केंद्र सरकार से यह प्रश्न किया था। सूचना के अधिकार के अंतर्गत उर्वशी शर्मा ने पूछा था कि सरकारी तौर पर भारत का नाम क्या है? उन्होंने अपने प्रश्न पूछे जाने का कारण बताते हुए उल्लेख किया िा कि “इस बारे में हमारे बीच काफी असमंजस है। बच्चे पूछते हैं कि जापान का एक नाम है, चीन का एक नाम है लेकिन अपने देश के दो नाम क्यूं हैं।“ इसीलिए वे यह जानना चाहती हैं कि वे बच्चों को सही-सही उत्तर दे सकें और आने वाली पीढ़ी के बीच इस बारे में कोई संदेह न रहे। उर्वशी ने कहा कि “हमें सुबूत चाहिए कि किसने और कब इस देश का नाम भारत या इंडिया रखा? कब ये फैसला लिया गया?“

उर्वशी का तर्क था कि यह एक भ्रम की स्थिति है जो सरकारी स्तर पर भी देश के दो नामों का प्रयोग किया जाता है। इसी आधार पर उन्होंने कहा कि ‘‘मैं केवल ये जानना चाहती हूं कि भारत का सरकारी नाम भारत है या इंडिया क्योंकि सरकारी तौर पर भी दोनों नाम इस्तेमाल किए जाते हैं।“ उल्लेखनीय है कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना में लिखा है- ’इंडिया दैट इज़ भारत’। अर्थात् देश के दो नाम हैं। सरकारी कामकाज में ’गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया’ और ’भारत सरकार’ दोनों का प्रयोग किया जाता है। अंग्रेजी में भारत और इंडिया दोनों का इस्तेमाल किया जाता है जबकि हिंदी में भी इंडिया कहा जाता है. उर्वशी ने कहा था कि वे इस मुद्दे को गंभीरता से लेती हैं क्योंकि ये देश की पहचान का सवाल है।

उर्वशी को प्रधानमंत्री कार्यालय से जवाब मिला जिसमें कहा गया कि उनके आवेदन को गृह मंत्रालय के पास भेजा गया हैं। किन्तु गृह मंत्रालय में इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं था। इसलिए इसे संस्कृति विभाग और फिर वहां से राष्ट्रीय अभिलेखागार भेजा गया, जहां जानकारी की ढूंढ-खोज शुरू हुई। राष्ट्रीय अभिलेखागार 300 वर्षों के सरकारी दस्तावेज़ों का खज़ाना है। आज भी उर्वशी को अपने प्रश्न के उत्तर की प्रतीक्षा है।

देश के नामों को ले कर उच्चतम न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर करके मांग की जा चुकी है कि ‘इंडिया’ का नाम बदल कर भारत किया जाना चाहिए। याचिका में कहा गया था कि महाराजा परीक्षित, कुरु वंश के अंतिम दुर्जेय सम्राट की मृत्यु तक, पूरी दुनिया भारतवर्ष के रूप में जाना जाता था। इसके अलावा दुनिया के एक महान सम्राट का शासन था । भारत ऋग्वेद में उल्लेख किया है। इस पर उच्चतम न्यायालय ने केंद्र और राज्यों से जवाब मांगा। यह याचिका को महाराष्ट्र के सामाजिक कार्यकर्ता निरंजन भटवाल ने दायर की थी। मुख्य न्यायाधीश एच एल दत्तू और न्यायाधीश अरूण मिश्रा की पीठ ने सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को इस जनहित याचिका पर नोटिस भी जारी किया। इस याचिका में केंद्र को किसी सरकारी उद्देश्य के लिए और आधिकारिक पत्रों में इंडिया नाम का उपयोग करने से रोकने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता निरंजन भटवाल ने आग्रह किया कि न केवल सरकारी अपितु गैर सरकारी संगठनों और कॉरपोरेट्स को भी सभी आधिकारिक और अनाधिकारिक उद्देश्यों के लिए देश का नाम ‘भारत’ का उपयोग करने का निर्देश दिया जाना चाहिए। दुर्भाग्यवश लगभग छह माह बाद भी याचिकाकर्ता को कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिला।

भारत का इतिहास सदियों से काफी गौरवशाली रहा है। भारत का नाम प्राचीन वर्षों में ‘भारतवर्ष’ था। इसके पूर्व भारत नाम जम्बूदीप था। देश का नाम भारत होने के संबंध में एक सर्वमान्यकथा प्रचलित है कि कुरूवंशीय राजा दुष्यंत और शकुंतला के प्रतापी पुत्र भरत के नाम पर ही देश का नाम भारतवर्ष पड़ा। यद्यपि कई आधुनिक विद्वान इस कथा को प्रमाण के अभाव में खारिज़ करते हैं किन्तु पुराणों में ‘भारतवर्ष’ नाम का उल्लेख नकारा नहीं जा सकता है। ‘वायु पुराण’ में इस बात की पुष्टि होती है कि देश का नाम भारतवर्ष क्यों पड़ा। इस संदर्भ में ‘वायु पुराण’ का यह श्लोक ध्यान देने योग्य है जिसमें कहा गया है कि हिमालय पर्वत से दक्षिण का वर्ष अर्थात क्षेत्र भारतवर्ष है-

हिमालयं दक्षिणं वर्षं भरताय न्यवेदयत्।

तस्मात्तद्भारतं वर्ष तस्य नाम्ना बिदुर्बुधाः।

इंडिया नाम तो अंग्रेजों की गुलामी के साथ आयाजबकि पुराणों में भारत के प्राचीन नाम जम्बूद्वीप का भी उल्लेख मिलता है। जम्बूदीप का अर्थ है समग्र द्वीप। भारत के प्राचीन धर्म ग्रंथों में हर जगह जम्बूदीप का उल्लेख आता है। उस समय भू-भाग एक विस्तृत द्वीप था जिसे आगे चल कर भारतीय उपमहाद्वीप कहा गया। ‘वायु पुराण’ में ही दी गई एक अन्य कथा के अनुसार त्रेता युग में देश का नाम भारतवर्ष पड़ा। ‘वायु पुराण’ के अनुसार त्रेता युग के प्रारंभ में स्वंयभू मनु के पौत्र और प्रियव्रत के पुत्र ने भरत खंड को बसाया था। लेकिन राजा प्रियव्रत के कोई भी पुत्र नहीं था इसलिए उन्होंने अपनी पुत्री के पुत्र अग्नींध्र को गोद ले लिया था जिसका पुत्र नाभि था। नाभि की एक पत्नी मेरू देवी से जो पुत्र पैदा हुआ उसका नाम ऋषभ था और ऋषभ के पुत्र का नाम भरत था और भरत के नाम पर ही देश का नाम भारतवर्ष पड़ा था। उस वक्त राजा प्रियव्रत ने अपनी कन्या के दस पुत्रों में से सात पुत्रों को पूरी धरती के सातों महाद्वीपों का अलग-अलग राजा नियुक्त किया था। इस तरह राजा प्रियव्रत ने जम्बू द्वीप का शासक अग्नींध्र को बनाया था। इसके बाद राजा भरत ने जो अपना राज्य अपने पुत्र को दिया वही भारतवर्ष कहलाया। ‘वायु पुराण’ में यह कथा इस प्रकार है-

व्याख्या सप्तद्वीपपरिक्रान्तं जम्बूदीपं निबोधत। अग्नीध्रं ज्येष्ठदायादं कन्यापुत्रं महाबलम।। प्रियव्रतोअभ्यषिञ्चतं जम्बूद्वीपेश्वरं नृपम्।। तस्य पुत्रा बभूवुर्हि प्रजापतिसमौजसः। ज्येष्ठो नाभिरिति ख्यातस्तस्य किम्पुरूषोअनुजः।। नाभेर्हि सर्गं वक्ष्यामि हिमाह्व तन्निबोधत। (वायु 31-37, 38)

विचारणी है कि जब कम्बोडिया अपना नाम बदल कर मोलिक नाम कम्पूचिया कर सकता है, सिलोन अपने मौलिक नाम श्रीलंका को अपना सकता है तो इंडिया सिर्फ़ भारत क्यों नहीं हो सकता है। एक देश, एक नाम, एक पहचान - यह जरूरी है देश के वैश्विक गौरव के लिए।
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( सागर दिनकर, 31.08.2018)