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Friday, February 23, 2024

शून्यकाल | कुंती मेरे मन से जाती ही नहीं | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

दैनिक नयादौर में मेरा कॉलम.....        
शून्यकाल
कुंती मेरे मन से जाती ही नहीं
      - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                 
      “पत्तों में कैद औरतें” यही है मेरी वह पुस्तक जो 2010 में सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हुई । इस किताब को लिखने के सिलसिले में मैं तेंदूपत्ता तोड़ने और बीड़ी बनाने वाली सागर संभाग की अनेक स्त्रियों से मिली। उनके जीवन और उनकी कठिनाइयों को करीब से जाना। उसी दौरान मेरी भेंट कुंती से हुई। यह उसकी निजता को ध्यान में रखते हुए परिवर्तित नाम है, किन्तु घटना असली है, वह स्त्री असली है।
     यह बात उन दिनों की है जब मैं बीड़ी उद्योग से जुड़ी महिला श्रमिकों के जीवन की पड़ताल कर रही थी। भले ही यह उद्योग आर्थिक स्तर पर पुरुषों के हाथों में है लेकिन लगभग नब्बे प्रतिशत औरतें बोड़ी बनाने के काम से जुड़ी हुई हैं। मेरी पड़ताल का एक चरण पूरा हो चुका था, जिसमें मैंने बीड़ी बनाने के काम में आने वाले तेंदू पत्ते तोड़ने वाली औरतों के दुख दर्द को साझा किया था। अपनी पड़ताल के दूसरे नरण में मैंने उन स्त्रियों के बारे में पता किया जो बीड़ी बनाने का काम करती है। बुन्देलखण्ड में यह काम अधिकतर अपने अपने घरों में ही किया जाता है।
     मुझे पता चला कि मेरे शहर सागर के एक छोर पर अनुसूचित जाति के परिवारों की एक बस्ती सासन द्वारा बसाई गई है। इस बस्ती का नाम है अयोध्याबस्ती। इस अयोध्याबस्ती के हर घर की महिलाएं बीड़ी बनाने का काम करती हैं। मैंने उस बस्ती में जाने का निश्चय किया। मेरे शहर की होकर भी मेरे लिए वह बस्ती अपरिचित थी। शहर की सकरी गलियों से होती हुई, लोगों से पता पूछती हुई मैं बस्ती के एक सिरे पर पहुंची। अब समस्या यह थी कि मैं वहां किसी को जानती नहीं यी और न कोई मुझे जानता था। लक्ष्य चुनौती भरा था। 
       मैं अभी सोच ही रही थी कि किस दरवाजे की सांकल खटकाऊं कि अधेड़ उम्र की एक औरत ने मुझसे पूछा कि मैं किसे ढूंढ रही हूं?
'आप बीड़ी बनाती हो? मैंने बिना किसी लाग लपेट के सीधे प्रश्न कर दिया।
 'हऔ।’ उत्तर भी सीधा ही मिला।
''मुझे कुछ पूछना है ?' 
“काए के बारे में?” उसने भी पलटकर पूछा।
'बीड़ी बनाने के बारे में। आप कैसे बीड़ी बनाती हो ?' मैंने पूछा ।
'मोए टेम नइयां। आप उते, बा घर में कुंती से मिल लेओ।' कहती हुई यह औरत वहां से कूच कर गई। झक मारकर मैंने उस घर की ओर कदम बढ़ाए जिसकी ओर उसने इशारा किया था।
         गोबर से लिपा साफ सुथरा आंगन किसी ग्रामीण आंगन की तरह लग रहा या । आंगन से सटा हुआ खपरैली कच्चा घर था। घर से ठीक उल्टी दिशा में एक नीम का पेड़ था, औसत ऊंचाई का। घर की दीवार से नीम के पेड़ के बीच एक अलगनी बंधी हुई थी, जिस पर कपड़े टंगे भी थे और लदे भी थे। बच्चों के कपड़े टंगे सूखे रहे थे और एक फटी- सी कथरी अलगनी पर लदी हुई थी। संभवतः उसे रखने के लिए कोई बक्सा, खाट या ऐसी कोई वस्तु नहीं थी। ऐसा दृश्य मैं पहले भी कई बार ग्रामीण अंचलों में देख चुकी थी अतः मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ। बल्कि उस घर की माली हालत की एक छोटी-सी झलक जरूर मिल गई।
       'अम्मा अम्मा' कहता हुआ एक चिरकुट-सा बच्चा घर के भीतर की ओर दौड़ा। मेरा उसकी ओर ध्यान नहीं गया था, लेकिन वह मुझे अपने घर की ओर ताकता हुआ पाकर शायद घबरा गया था। बेटे की आवाज सुनकर उस घर से एक औरत बाहर आई। कहीं कोई चौबीस-पच्चीस वर्ष की रही होगी। उसने मुझसे मेरे आने का उद्देश्य पूछा। मैंने बताया कि मैं बीड़ी बनाने वाली औरतों पर एक किताब लिख रही हूं और जानना चाहती हूं कि बीड़ी कैसे बनाई जाती है? उनकी समस्याएं क्या हैं? उन्हें क्या सुविधाएं मिलती हैं? आदि-आदि ।
      उसने वहां आंगन में मेरे लिए एक बोरी बिछा दी। मैं बोरी पर बैठ गई। यह स्वयं मेरे सामने नंगी जमीन पर बैठ गई। 
      उसकी गोद में एक छोटी सी नन्ही बच्ची थी। उसने अपने बेटे से कहा कि नुक्कड़ की दूकान से मेरे लिए चाय ले आए। मैंने मना किया। मैंने पूछा 'दूकान' से क्यों मंगा रही हो? दूकान की चाय तो मंहगी होती है।
     'पर हमाए इते की चाय..... कहकर वह चुप हो गई। उसके इस संकोच को देखकर मुझे बेहद दुख हुआ।
      'तुम तो मुझे बस, पानी पिला दो। चाय-वाय रहने दो।”
      मुझे प्यास नहीं लगी थी फिर भी मैंने पानी मांगा, ताकि उसे विश्वास हो जाए कि मैं किसी जाति-धर्म की डोर से बंधी कठपुतली नहीं बल्कि उसी की तरह एक इंसान हूं। एक स्त्री हूं। मेरी यह पहल कारगर साबित हुई। उसने अपने बेटे से पानी मंगाकर मुझे पानी पिलाया और फिर उत्साहपूर्वक बातें करने लगी। मैं उससे बातें कर रही थी लेकिन कहीं न कहीं मेरे मन में यह कचोट उठ रही थी कि मैं भी उसी समाज का एक हिस्सा हूं जहां जातिगत भेद-भाव आज भी जिन्दा हैं। फिर उसने जब अपने जीवन के बारे में बताया तो मैं यह जानकर अवाक रह गई कि चौबीस-पचीस साल की एक युवती एक साथ कितने संकट झेल रही है, और वह भी धैर्य के साथ। उसकी जगह कोई और औरत होती तो शायद कब को टूट चुकी होती।
        उसने बताया कि पति द्वारा छोड़े जाने से पूर्व यह चार बच्चों की मां बन चुकी है। दो लड़के हैं और दो लड़कियां। सबसे बड़ी बेटी है फिर दो बेटे और फिर सबसे छोटी बेटी जो अभी गोद में है। कुंती ने बेटों को जन्म दिया फिर भी उसके पति ने उसे छोड़ दिया क्योंकि यह किसी और को रखना चाहता था। कुंती अपने चारों बच्चों सहित मायके आ तो गई लेकिन उसके विवाह के समय से अब तक उसके मायके की दशा में बहुत परिवर्तन हो चुका था। मायके में उसे पनाह नहीं मिली। बल्कि मोतियाबिन्द से पीड़ित लगभग अंधी मां को भी उसके सुपुर्द कर दिया गया। छोटे-छोटे चार बच्चों और अंधी मां को लेकर कुंती ने अयोध्याबस्ती में शरण ली। इसमें उसकी एक बहन ने उसकी मदद की। इस पर भी दुर्भाग्य ने उसका पीछा नहीं छोड़ा। कुंती ससुराल छोड़ने से पहले गर्भवती थी। अयोध्याबस्ती में आकर उसने पांचवी संतान के रूप में एक बेटी को जन्म दिया।
           कुंती की बहन ने उसे बीड़ी बनाना सिखाया। फिर उसे अपने साथ ले जाकर बीड़ी सट्टेदार से मिलाया। बीड़ी सट्टेदार ने कुंती से बीड़ी लिपटवाकर उसकी परीक्षा ली। कुंती के कौशल को देखकर उसे काम देना स्वीकार कर लिया, जिससे आमदनी का एक बहुत छोटा सा स्रोत बन गया। अब कुंती पर अपने पांच बच्चों और अंधी मां का दायित्व या लेकिन उसने हार नहीं मानी। अब कुंती अपनी झोपड़ी के सामने गोबर लिपी भूमि पर बैठकर दिन के चौबीस घंटों में सोलह घंटे बीड़ियां लपेटा करती है। उसके पास दीवार से टिककर उसकी अंधी मां बैठी रहती है। उसकी अंधी मां के इर्द-गिर्द चारों बच्चे खेलते रहते हैं। सबसे छोटा बच्चा उसकी गोद में लेटा रहता है। जब वह किसी काम से उठती है तो उसे अपनी गोद से उठाकर अपनी मां की गोद में लिटा दिया करती है। अंधी मां पूरे जतन से उसे दुलारती और संभालती है। यह स्त्री के भीतर मौजूद ममता के प्रकटीकरण का एक अनोखा, मर्मस्पशों दृश्य होता है। बस दुख की बात यह थी कि कुंती और उसकी मां दोनों इस बात से अनजान थीं कि गोद में लेटी हुई बेटी की सांसों में तंबाकू के पार्टीकल्स समाते जा रहे हैं जो किसी दिन उसके प्राणों पर भारी पड़ सकते थे। मैंने उसे समझाया भी, वह समझी भी। फिर भी मुझे इस बात का एहसास था कि वह मेरी बातों पर पूरी तरह अमल नहीं कर सकेगी मजबूरियों ने उसे जाकड़ जो रखा था।
     आज भी जब कुंती याद आती है तो मेरा मन उसके साहस और उसकी जीवटता के आगे नतमस्तक हो जाता है। एक साहसी स्त्री। उसके जीवन की तस्वीर मेरे मन में इस तरह समा चुकी है कि कुंती मेरे मन से जाती ही नहीं है और कभी जाएगी भी नहीं।
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Thursday, June 20, 2013

कुंती मेरे मन से जाती ही नहीं .....



 17.06.2013 को ‘‘दैनिक जागरण’’ के सप्तरंग, साहित्यिक पुनर्नवा परिशिष्ट में मेरा संस्मरणात्मक रेखाचित्र प्रकाशित हुआ है जिसे मै आप सब से शेयर कर रही हूं ....

आप इसे नीचे दिए लिंक पर भी पढ़ सकते हैं......

http://www.facebook.com/photo.php?fbid=530722380319781&set=a.140525269339496.24558.100001460713556&type=1&theater


http://samkalinkathayatra.blogspot.in/


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