Wednesday, December 22, 2021
चर्चा प्लस | लड़कियों के विवाह की न्यूनतम आयु और लैंगिक समानता | डाॅ शरद सिंह
Wednesday, December 15, 2021
चर्चा प्लस | सरदार वल्लभ भाई पटेल का पुराना नाता था बुंदेलखंड से | डाॅ शरद सिंह
Wednesday, December 1, 2021
चर्चा प्लस | सम्मान वाया राजनीतिक गलियारा | संदर्भ : डॉ हरीसिंह गौर को भारत रत्न देने की मांग | डाॅ शरद सिंह
Wednesday, November 24, 2021
चर्चा प्लस | एक गंभीर चूक बनाम पाक्सो एक्ट | डाॅ शरद सिंह
Wednesday, November 17, 2021
चर्चा प्लस | छात्र, छात्र जीवन और बदलता दौर | अंतर्राष्ट्रीय छात्र दिवस | डाॅ शरद सिंह
Friday, November 12, 2021
चर्चा प्लस | भारत को कितनी राहत देगी पीएम मोदी और स्कूली छात्रा विनीशा की ललकार | डाॅ शरद सिंह
Thursday, November 4, 2021
चर्चा प्लस | बुंदेली दीपावली से जुड़ी रोचक परंपराएं | डाॅ शरद सिंह
Wednesday, October 20, 2021
चर्चा प्लस | वाल्मीकि जयंती विशेष | महर्षि वाल्मीकि और रामकथा की वैश्विक महत्ता | डाॅ शरद सिंह
चर्चा प्लस
20 अक्टूबर: वाल्मीकि जयंती विशेष
महर्षि वाल्मीकि और रामकथा की वैश्विक महत्ता
- डाॅ. शरद सिंह
रामकथा के लिए समूचा विश्व महर्षि वाल्मीकि का ऋणी है। विश्व-इतिहास और विश्व-साहित्य में राम के समान अन्य कोई पात्र कभी नहीं रहा। रामकथा की अपनी एक वैश्विक सत्ता है, अपनी एक अलग पहचान है। लेकिन इसके मूल में वाल्मीकि की वही द्रवित अनुभूति है जो क्रौंच पक्षी के वध से उपजी थी। किसी पक्षी का बहेलिए द्वारा मारा जाना उस समय आम बात थी लेकिन पक्षी के वध को देख कर रामकथा लिख डालना अद्भुत घटना थी।
कौन जानता था कि एक पक्षी के मारे जाने से उपजी पीड़ा साहित्य और धर्म के लिए एक वरदान साबित होगी। हुआ यह कि एक दिन दोपहर को वाल्मीकि तमसा नदी के किनारे प्रकृति की सुंदरता का आनंद ले रहे थे। वाल्मीकि ने देखा कि क्रौंच पक्षी का एक जोड़ा नदी तट पर कल्लोल कर रहा है। इतने में नर क्रौंच को बहेलिए का तीर आ लगा और वह गिरकर छटपटाने लगा। देखते ही देखते उसने प्राण त्याग दिए। अपने साथी की यह दशा देखकर मादा क्रौंच बड़े करुण स्वर में रोने लगी। यह दृश्य देखकर वाल्मीकि का हृदय द्रवित हो उठा। उसी क्षण उनके हृदय की करुणा एक श्लोक के रूप में फूट पड़ी-
मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाष्वती समाः
यत् क्रौंच-मिथुनादेकमवधिः काम-मोहितम्
(हे निषाद ! तुझे नित्य निरंतर कभी भी शांति न मिले क्योंकि काम में मोहित हो रहे क्रौंच पक्षी के जोड़े में से तूने बिना अपराध ही एक ही हत्या कर डाली।) इस घटना के बाद वाल्मीकि ने ‘‘रामायण’’ की रचना की। सम्पूर्ण विश्व को रामकथा से परिचित कराने का प्रथम श्रेय महर्षि वाल्मीकि को ही जाता है। रामकथा को वैश्विक स्तर पर जो प्रतिष्ठा और लोकप्रियता मिली है वह इसकी मूल्यवत्ता को स्वतः सिद्ध करती है और महर्षि वाल्मीकि का ऋणी बनाती है। विश्व-इतिहास और विश्व-साहित्य में राम के समान अन्य कोई पात्र कभी नहीं रहा। रामकथा की अपनी एक वैश्विक सत्ता है, अपनी एक अलग पहचान है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि रामकथा मात्र एक कथा नहीं वरन् जीवन जीने की सार्वभौमिक शैली है। इसमें मानवीय पारिवारिक संबंधों से ले कर जड़ एवं चेतन के पारस्परिक संबंधों की भी समुचित व्याख्या की गई है। रामकथा की यह भी विशेषता है कि इस पृथ्वी का कोई ऐसा तत्व नहीं है जो प्राणिरूप में इसमें समावेशित नहीं किया गया हो। प्राणहीन पाषाण अहिल्या के रूप में जीवन्त हो उठता है तो मृतकों की देह को खाने वाला गिद्ध पक्षी जटायु के रूप में श्रीराम और सीता की सहायता में दौड़ पड़ता है। समुद्र संवाद करता है तो जगत में उद्दण्ड प्राणी के रूप में पहचाने जाने वाले वानर रूपी बालि और सुग्रीव के रूप में न केवल शासनकत्र्ता के रूप में मिलते हैं वरन् समुद्र पर सेतु बांधने का अनुशासित कार्य भी करते दिखते हैं। स्त्री और पुरुष के इतने विविध रूप इस कथा में हैं जो किसी अन्य कथा में देखने को नहीं मिलते हैं। यह एक ऐसी कथा है जिसमें श्रीराम मर्यादा पुरुषोत्तम, आदर्श राजा, आज्ञाकारी पुत्र और आदर्श पति होने के साथ ही महान योद्धा भी हैं। वे धैर्यवान हैं तो भावुक भी हैं। राम एक ऐसे चरित्र हैं जिनकी दृष्टि में कोई छोटा या बड़ा नहीं है, कोई अस्पृश्य नहीं है और न ही कोई उपेक्षित है। रामकथा में श्रीराम के द्वारा अधर्म पर धर्म की और असत्य पर सत्य की विजय की जिस प्रकार स्थापना की गई है उससे समूचा विश्व प्रभावित होता आया है।
वाल्मीकि रचित रामायण अतिरिक्त भारत में जो अन्य रामायण लोकप्रिय हैं, उनमें ‘अध्यात्म रामायण’, ‘आनन्द रामायण’, ‘अद्भुत रामायण’, तथा तुलसीकृत ‘रामचरित मानस’ आदि विशेष उल्लेखनीय हैं। वाल्मीकिकृत रामायण के उपरान्त रामकथा में दूसरा प्राचीन ग्रन्थ है ‘अध्यात्म रामायण’। वाल्मीकिकृत रामायण में जहां हमें मानवीय तत्व अधिक दिखाई देता है, वहीं ‘अध्यात्म रामायण’ में राम का ईश्वरीय तत्व सामने आता है। इसीलिए ‘आध्यात्म रामायण’ को विद्वानों द्वारा ‘ब्रह्मांड-पुराण’ के उत्तर-खंड के रूप में भी स्वीकारा किया गया है। वहीं, ‘आनन्द रामायण’ में भक्ति की प्रधानता है। इसमें राम की विभिन्न लीलाओं तथा उपासना सम्बन्धी अनुष्ठानों की विशेष चर्चा है। ‘अद्भुत रामायण’ में रामकथा के कुछ नए कथा-प्रसंग मिलते हैं। इसमें सीता माता की महत्ता विशेष रूप में प्रस्तुत की गयी है। उन्हें ‘आदिशक्ति और आदिमाया’ बतलाया गया है, जिसकी स्तुति स्वयं राम भी सहस्रनाम स्तोत्र द्वारा करते हैं। लोकभाषा में होने के कारण तुलसीकृत ‘रामचरित मानस’ की लोकप्रियता आधुनिक समाज में सर्वाधिक है। इसने रामकथा को जनसाधारण में अत्यधिक लोकप्रिय बना दिया। इसमें भक्ति-भाव की प्रधानता है तथा राम का ईश्वरीय रूप अपनी समग्रता के साथ सामने आया है। वस्तुतः ‘रामचरित मानस’ उत्तर भारत में रामलीलाओं के मंचन का आधार बनी।
रामकथा ने भारतीय मात्र भू-भाग पर ही राज नहीं किया अपितु भारत की सीमाओं को लांघती हुई उसने विदेशों में भी अपनी सत्ता स्थापित की। राजनीतिक सत्ता को परिवर्तन यानी तख़्तापलट का भय होता है किन्तु ज्ञान की सत्ता को चिरस्थायी होती है, उसे किसी प्रकार का भय नहीं होता। इसीलिए जिन देशों में धार्मिक एवं राजनीतिक परिवर्तन हुए तथा भीषण रक्तपात हुए वहां भी रामकथा ने अपना प्रभाव सतत बनाए रखा। प्राचीन भारत और उसके निकटवर्ती क्षेत्रों में आर्य संस्कृति तथा उसके साथ रामकथा का जो प्रचार-प्रसार हुआ, वह आज भी यथावत स्थित है। युग, परिस्थिति और धर्म परिवर्तन के बावजूद विभिन्न क्षेत्रों में रामकथा के प्रभाव में कोई कमी नहीं आयी है। इसके विपरीत उसमें वृद्धि ही हुई है। मुस्लिम बहुल इंडोनेशिया में तो रामायण को राष्ट्रीय पवित्र पुस्तक का गौरव प्राप्त है। भारत के न्यायालयों में जो स्थान ‘भगवद्गीता’ को प्राप्त है, इंडोनेशिया में वहीं स्थान ‘रामायण’ को मिला हुआ है। वहां ‘रामायण’ पर हाथ रखकर सत्यता की शपथ ली जाती है। इंडोनेशिया में प्रचलित रामकथा के ग्रन्थ का नाम है ‘काकाविन रामायण’। इसमें 26 सर्ग तथा 2778 पद हैं। ‘काकाविन रामायण’ के आधार पर इंडोनेशिया में राम की अनेक प्राचीन प्रतिमाएं मिलती हैं।
एशिया के अनेक देशों में रामकथा प्रचलित है जिसमें वहां की जीवन, धर्म, संस्कृति की दलग ही छाप है। जिसके कारण रामकथा को एक वैश्वि स्वरूप मिला है। जिन देशों में लगभग सौ वर्ष से भी पहले पहले राम-कथा पहुंची, उसमें चीन, तिब्बत, जापान, इण्डोनेशिया, थाईलैंड, लाओस, मलेशिया, कम्बोडिया, श्रीलंका, फिलीपिन्स, म्यानमार, रूस आदि देश प्रमुख हैं।
जापान में 12वीं शताब्दी में रचित ‘होबुत्सुशु’ नामक ग्रन्थ में रामायण की कथा जापानी में मिलती है। लेकिन ऐसे प्रकरण भी हैं, जिनसे कहा जा सकता है कि जापानी इससे पूर्व भी राम-कथा से परिचित थे। वैसे आधुनिक अनुसंधानों से यह ज्ञात हुआ कि विगत एक हजार वर्ष से प्रचलित ‘दोरागाकु’ नाट्य-नृत्य शैली में राम-कथा मिलती है। 10 वीं शताब्दी में रचे ग्रन्थ ‘साम्बो-ए-कोताबा’ में दशरथ और श्रवणकुमार का प्रसंग मिलता है। ‘होबुत्सुशु’ की राम-कथा और ‘रामायण’ की कथा में भिन्न है। जापानी कथा में शाक्य मुनि के वनगमन का कारण निरर्थक रक्तपात को रोकना है। वहां लक्ष्मण साथ नहीं है, केवल सीता ही उनके साथ जाती है। सीता-हरण में स्वर्ण-मृृग का प्रसंग नहीं है, अपितु रावण योगी के रूप में राम का विश्वास जीतकर उनकी अनुपस्थिति में सीता को उठाकर ले जाता है। रावण को ड्रैगन (सर्पराज)-के रूप में चित्रित किया गया है, जो चीनी प्रभाव है। यहां हनुमान के रूप में शक्र (इन्द्र) हैं और वही समुद्र पर सेतु-निर्माण करते हैं। कथा का अन्त भी मूल राम-कथा से भिन्न है।
इंडोनेशिया में बाली का हिंदू और जावा-सुमात्रा के मुस्लिम, दोनों ही राम को अपना नायक मानते हैं। जाकार्ता से लगभग 15 मील की दूरी पर स्थित प्राम्बनन का मंदिर इस बात का साक्षी है, जिसकी प्रस्तर भित्तियों पर संपूर्ण रामकथा उत्कीर्ण है।
थाईलैंड में रामकथा को इस तरह आत्मसात किया गया कि उन्हें धीरे-धीरे यह लगने लगा कि राम-कथा की सृजन उनके ही देश में हुआ था। वहां जब भी नया शासक राजसिंहासन पर आरूढ़ होता है, वह उन वाक्यों को दोहराता है, जो राम ने विभीषण के राजतिलक के अवसर पर कहे थे। यह मान्यता है कि वहां राम के छोटे पुत्र कुश के वंशज सम्राट “भूमिबल अतुल्य तेज” राज्य कर रहे हैं, जिन्हें नौवां राम कहा जाता है। थाईलैंड में “अजुधिया” “लवपुरी” और “जनकपुर” जैसे नाम वाले शहर हैं। सन् 1340 ई. में राम खरांग नामक राजा के पौत्र थिवोड ने राजधानी सुखोथाई (सुखस्थली) को छोड़कर ‘अयुधिया’ अथवा ‘अयुत्थय’ (अयोध्या) की स्थापना की थी। उल्लेखनीय है कि राम खरांग के पश्चात् राम प्रथम, राम द्वितीय के क्रम में नौ शासकों के नाम राम-शब्द की उपाधि से विभूषित रहे। थाईलैंड में रामकथा पर आधारित ग्रंथ ‘रामकियेन’ है। ‘रामकियेन’ का अर्थ होता है राम की कीर्ति। भारतीय ‘रामलीला’ की भांति ‘रामकियेन’ नाट्यरूप में भी लोकप्रिय है।
यह बात अकाट्य रूप से कही जा सकती है कि रामकथा की वैश्विकसत्ता अद्वितीय है और वैश्विक जनमानस को जिस कथा ने सर्वाधिक प्रभावित किया है वह रामकथा ही है। यह भी उतना ही अकाट्य है कि यदि महर्षी वाल्मीकि ने ‘‘रामायण’’ लिख कर रामकथा को महाकाव्य में निबद्ध नहीं किया होता तो शायद आज विश्व रामकथ से इतनी समग्रता से परिचित नहीं हो पाता क्यों कि दुनिया भर की रामकथाएं वाल्मीकिकृत ‘‘रामायण’’ पर ही आधारित हैं।
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(सागर दिनकर, 20.10.2021)
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Wednesday, October 13, 2021
चर्चा प्लस | स्त्रीशक्ति का प्रतीक हैं माता दुर्गा | डाॅ शरद सिंह
चर्चा प्लस
स्त्रीशक्ति का प्रतीक हैं माता दुर्गा
- डाॅ. शरद सिंह
नवरात्रि...नौ दिन देवी दुर्गा के नौ रूपों की स्तुति... दुर्गा जो स्त्रीशक्ति का प्रतीक हैं, असुरों का विनाश करने की क्षमता रखती हैं... किन्तु इस बात पर विश्वास करना ही र्प्याप्त है क्या? सिर्फ़ सोचने या मानने से नहीं बल्कि करने से कोई भी कार्य पूरा होता है। इसलिए यदि आज स्त्री प्रताड़ित है, अपराधों का शिकार हो रही है तो उसे अपनी शक्ति को पहचानते हुए स्वयं दुर्गा की शक्ति में ढलना होगा। डट कर समाना करना होगा स्त्रीजाति के विरुद्ध की समस्त बुराइयों का और स्त्री का सम्मान करना सीखना होगा समस्त पुरुषों को, तभी नवरात्रि का अनुष्ठान सार्थक होगा।
या देवि सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।
मां दुर्गा की उपासना करते समय जिस स्त्रीशक्ति का बोध होता है वह उपासना के बाद स्मरण क्यों नहीं रहता? न स्त्रियों को और न पुरुषों को। समाचारपत्रों में आए दिन स्त्री के विरुद्ध किए गए जघन्य अपराधों के समाचारों भरे रहते हैं। कभी तेजाब कांड तो कभी दहेज हत्या तो कभी बलात्कार और बलात्कार के बाद नृशंसतापूर्वक हत्या। ये घटनाएं हरेक पाठक के दिल-दिमाग़ को झकझोरती हैं। बहुत बुरा लगता है ऐसे समाचारों को पढ़ कर। समाज में आती जा रही चारित्रिक गिरावट को देख कर अत्यंत दुख भी होता है लेकिन सिर्फ़ शोक प्रकट करने या रोने से समस्या का समाधान नहीं निकलता है। देवी दुर्गा का दैवीय चरित्र हमें यही सिखाता है कि अपराधियों को दण्डित करने के लिए स्वयं के साहस को हथियार बनाना पड़ता है। जिस महिषासुर को देवता भी नहीं मार पा रहे थे उसे देवी दुर्गा ने मार कर देवताओं को भी प्रताड़ना से बचाया। नवरात्रि के दौरान लगभग हर हिन्दू स्त्री अपनी क्षमता के अनुसार दुर्गा के स्मरण में व्रत, उपवास पूजा-पाठ करती है। अनेक महिला निर्जलाव्रत भी रखती हैं। पुरुष भी पीछे नहीं रहते हैं। वे भी पूरे समर्पणभाव से मां दुर्गा की स्तुति करते हैं। नौ दिन तक चप्पल-जूते न पहनना, दाढ़ी नहीं बनाना आदि जैसे सकल्पों का निर्वाह करते हैं। लेकिन वहीं जब किसी स्त्री को प्रताड़ित किए जाने का मामला समाने आता है तो अधिकांश स्त्री-पुरुष तटस्थ भाव अपना लेते हैं। उस समय गोया यह भूल जाते हैं कि आदि शक्ति दुर्गा के चरित्र से शिक्षा ले कर अपनी शक्ति को भी तो पहचानना जरूरी है।
किसी भी प्रकार की प्रताड़ना या हिंसा का स्त्रीसमाज पर शारीरिक, मानसिक तथा भावनात्मक दुष्प्रभाव पड़ता है। इसके कारण महिलाओं के काम तथा निर्णय लेने की क्षमता पर प्रभाव पड़ता है। परिवार में आपसी रिश्तों और आसपड़ौस के साथ रिश्तों व बच्चों पर भी इस हिंसा का सीधा दुष्प्रकभाव देखा जा सकता है। इससे स्त्रियों की सार्वजनिक भागीदारी में बाधा पड़ती है और वे स्वयं को अबला समझने लगती हैं। जबकि इसके विपरीत मां दुर्गा का चरित्र उन्हें दृढ़ और सबल होने का संदेश देता है।
हिन्दुओं के शाक्त साम्प्रदाय में भगवती दुर्गा को ही दुनिया की पराशक्ति और सर्वोच्च देवता माना जाता है। उल्लेखनीय है कि शाक्त साम्प्रदाय ईश्वर को देवी के रूप में मानता है। वेदों में तो दुर्गा का व्यापाक उल्लेख है। उपनिषद में देवी दुर्गा को “उमा हैमवती“ अर्थात् हिमालय की पुत्री कहा गया है। वहीं पुराणों में दुर्गा को आदिशक्ति माना गया है। वैसे दुर्गा शिव की अर्द्धांगिनी पार्वती का एक रूप हैं, जिसकी उत्पत्ति राक्षसों का नाश करने के लिये देवताओं की प्रार्थना पर पार्वती ने धारण किया था देवी दुर्गा के और भी कई रूपों की कल्पना की गई है। दुर्गा सप्तशती में दुर्गा के कई रूप भी बताए गए है, जैसे- ब्राह्मणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, नरसिंही, ऐन्द्री, शिवदूती, भीमादेवी, भ्रामरी, शाकम्भरी, आदिशक्ति, रक्तदन्तिका।
दुर्गा सप्तशती में कुल 13 अध्याय हैं, जिसमें 700 श्लोकों में देवी-चरित्र का वर्णन है। मुख्य रूप से ये तीन चरित्र हैं, प्रथम चरित्र (प्रथम अध्याय), मध्यम चरित्र (2-4 अध्याय) और उत्तम चरित्र (5-13 अध्याय)। प्रथम चरित्र की देवी महाकाली, मध्यम चरित्र की देवी महालक्ष्मी और उत्तम चरित्र की देवी महासरस्वती मानी गई है। यहां दृष्टव्य है कि महाकाली की स्तुथति मात्र एक अध्याय में, महालक्ष्मी की स्तुति तीन अध्यायों में और महासरस्वती की स्तुति नौ अध्यायों में वर्णित है, जो सरस्वती की वरिष्ठता, काली (शक्ति) और लक्ष्मी (धन) से अधिक सिद्ध करती है। मां दुर्गा के तीनों चरित्रों से संबंधित तीन रोचक कहानियां भी हैं जो
प्रथम चरित्र - बहुत पहले सुरथ नाम के राजा राज्य करते थे। शत्रुओं और दुष्ट मंत्रियों के कारण उनका राज्य, कोष सब कुछ हाथ से निकल गया। वह निराश होकर वन से चले गए, जहां समाधि नामक एक वैश्य से उनकी भेंट हुई। उनकी भेंट मेधा नामक ऋषि के आश्रम में हुई। इन दोनों व्यक्तियों ने ऋषि से पूछा कि यद्यपि हम दोनों के साथ अपने लोगों (पुत्र, मंत्रियों आदि) ने दुर्व्यवहार किया है फिर भी उनकी ओर हमारा मन लगा रहता है। मुनिवर, क्या कारण है कि ज्ञानी व्यक्तियों को भी मोह होता है। ऋषि ने कहा कि यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है, भगवान विष्णु की योगनिद्रा ज्ञानी पुरुषों के चित्त को भी बलपूर्वक खींचकर मोहयुक्त कर देती है, वहीं भगवती भक्तों को वर देती है और ’परमा’ अर्थात ब्रह्म ज्ञानस्वरूपा मुनि ने कहा, ’नित्यैव सा जगन्मूर्तिस्तया सर्वमिद ततम्’ अर्थात वह देवी नित्या है और उसी में सारा विश्व व्याप्त है। प्रलय के पश्चात भगवान विष्णु योगनिद्रा में निमग्न थे तब उनके कानों के मैल से मधु और कैटभ नाम के दो असुर उत्पन्न हुए। उन्होंने ब्रह्माजी को आहार बनाना चाहा। ब्रह्माजी उनसे बचने के लिए योगनिद्रा की स्तुति करने लगे। तब देवी योगनिद्रा उन दोनों असुरों का संहार किया।
मध्यम चरित्र - इस चरित्र में मेधा नामक ऋषि ने राजा सुरथ और समाधि वैश्य के प्रति मोहजनित कामोपासना द्वारा अर्जित फलोपभोग के निराकरण के लिए निष्काम उपासना का उपदेश दिया है। प्राचीनकाल में महिषासुर सभी देवताओं को हराकर स्वयं इन्द्र बन गया और सभी देवताओं को स्वर्ग से बाहर निकाल दिया। वे सभी देवता- ब्रह्मा, विष्णु और शंकर के पास सहायतार्थ गए। उनकी करुण कहानी सुनकर विष्णु और शंकर के मुख से तेज प्रकट हुआ। इसी प्रकार का तेज अन्य देवताओं के शरीर से भी निकला। यह सब एक होकर देवी रूप में परिणित हुआ। इस देवी ने महिषासुर और उनकी सेना का नाश किया। देवताओं ने अपना अभीष्ट प्राप्त कर, देवी से वर मांगा। ’जब-जब हम लोगों पर विपत्तियां आएं, तब-तब आप हमें आपदाओं से विमुक्त करें और जो मनुष्य आपके इस चरित्र को प्रेमपूर्वक पढ़ें या सुनें वे संपूर्ण सुख और ऐश्वर्यों से संपन्न हों।’ महिषासुर को मार कर देवी ‘महिषासुरमर्दिनी’ कहलाईं।
उत्तम चरित्र - उत्तम चरित्र में परानिष्ठा ज्ञान के बाधक आत्म-मोहन, अहंकार आदि के निराकरण का वर्णन है। पूर्व काल में शुंभ और निशुंभ नामक दो असुर हुए। उन्होंने इन्द्र आदि देवताओं पर आधिपत्य कर लिया। बार-बार होते इस अत्याचार के निराकरण के लिए देवता दुर्गा देवी की प्रार्थना हिमालय पर्वत पर जाकर करने लगे। देवी प्रकट हुई और उन्होंने देवताओं से उनकी प्रार्थना करने का कारण पूछा। कारण जानकर देवी ने परम सुंदरी ’अंबिका’ रूप धारण किया। इस सुंदरी को शुंभ-निशुंभ के सेवकों चंड और मुंड ने देखा। इन सेवकों से शुंभ-निशुंभ को सुंदरी के बारे में जानकारी मिली और उन्होंने सुग्रीव नामक असुर को अंबिका को लाने के लिए भेजा। देवी ने सुग्रीव से कहा, ’जो व्यक्ति युद्ध में मुझ पर विजय प्राप्त करेगा, उसी से मैं विवाह करूंगी।’ दूत के द्वारा अपने स्वामी की शक्ति का बार-बार वर्णन करने पर देवी उस असुर के साथ नहीं गई। तब शुंभ-निशुंभ ने सुंदरी को बलपूर्वक खींचकर लाने के लिए धूम्रलोचन नामक असुर को आदेश दिया। धूम्रलोचन देवी के हुंकार मात्र से भस्म हो गया। फिर चंड-मुंड दोनों एक बड़ी सेना लेकर आए तो देवी ने असुर की सेना का विनाश किया और चंड-मुंड का शीश काट दिया, जिसके कारण देवी का नाम ’चामुंडा’ पड़ा। असुर सेना का विनाश करने के बाद देवी ने शुंभ-निशुंभ को संदेश भेजा कि वे देवताओं को उनके छीने अधिकार दे दें और पाताल में जाकर रहें, परंतु शुंभ-निशुंभ मारे गए। रक्तबीज की विशेषता थी कि उसके शरीर से रक्त की जितनी बूंदें पृथ्वी पर गिरती थीं, उतने ही रक्तबीज फिर से उत्पन्न हो जाते थे। देवी ने अपने मुख का विस्तार करके रक्तबीज के शरीर का रक्त को अपने मुख में ले लिया और असुर का सिर काट डाला। इसके पश्चात शुंभ और निशुंभ भी मारे गए और तब देवताओं ने स्तुति की-
सर्वाबाधा प्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरी।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरी विनाशम्।।
हमें यह विचार करना ही होगा कि पूजा-अर्चना द्वारा हम देवी के इन चरित्रों का आह्वान करते हैं तो फिर देवी के इन चरित्रों से प्रेरणा ले कर उन लोगों पर शिकंजा क्यों नहीं कस पाते हैं जो असुरों जैसे कर्म करते हैं? क्या हम इन प्रेरक कथाओं के मर्म को समझ नहीं पाते हैं अथवा समझना ही नहीं चाहते हैं? बहरहाल, एक और रोचक कथा है- राजा सुरथ और समाधि वैश्य दोनों ने देवी की आराधना की। देवी की कृपा से सुरथ को उनका खोया राज्य और वैश्य का मनोरथ पूर्ण हुआ। उसी प्रकार जो व्यक्ति भगवती की आराधना करते हैं उनका मनोरथ पूर्ण होता है। ऐसी मान्यता है कि दुर्गा सप्तशती के केवल 100 बार पाठ करने से सर्वार्थ सिद्धि प्राप्त होती है। इस मान्यता को व्यवहारिकता में ढालते हुए यदि स्त्रियों के हित में अपनी शक्ति को पहचान कर अपराधों का प्रतिकार किया जाए तो यह मां दुर्गा की सच्ची स्तुति होगी।
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(सागर दिनकर, 13.10.2021)
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Wednesday, October 6, 2021
चर्चा प्लस | जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए स्मार्ट समाधान है शहरी वन | डाॅ शरद सिंह
चर्चा प्लस
जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए स्मार्ट समाधान है शहरी वन
- डाॅ. शरद सिंह
शहर में मनुष्यों की आबादी कितनी है, यह जनसंख्या गणना से हमेशा पता चलता रहता है। लेकिन शहर में वृक्षों की संख्या कितनी है? इस बारे में न कोई पूछता है और न कोई जानना चाहता है। सड़कें चैड़ी करने के लिए वृक्ष कटते हैं, रिहायशी और व्यावसायिक भवन बनाने के लिए वृक्ष काटे जाते हैं। बदले में कितने वृक्ष शहर के अन्दर लगाए जाते हैं? आंकड़ा पता नहीं। जबकि बेतहाशा कार्बन उत्सर्जन और बढ़ते तापमान की हानि से कोई बचा सकता है तो सिर्फ़ वृक्ष। इसीलिए सरकार ने ‘शहरी वन’ की योजना बनाई। किन्तु कहां हैं वे शहरी वन?
‘शहरी वन’ की आवश्यकता पर चर्चा करने से पहले ज़रा याद करिए अक्टूबर 2019 की वह घटना जब उपनगरीय मुंबई की आरे मिल्क कॉलोनी, जिसे शहर के ‘ग्रीन लंग’ के रूप में जाना जाता रहा है, शहरी विकास का शिकार हुई। दरअसल मुंबई मेट्रो रेल कॉरपोरेशन ने ट्रेन डिपो के लिए मार्ग प्रशस्त करने के लिए इस क्षेत्र में 3,000 पेड़ों को काट दिया। एक वैज्ञानिक रिपोर्ट के अनुसार, यह जगह तितलियों की 86 प्रजातियों, मकड़ियों की 90 प्रजातियों, सरीसृपों की 46 प्रजातियों, जंगली फूलों की 34 प्रजातियों और नौ तेंदुओं का घर है। इसको लेकर सार्वजनिक आक्रोश सामने आया। सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार से हस्तक्षेप करने के लिए कहा। लेकिन तब तक मुंबई मेट्रो ने आवश्यक भूमि को खाली करने के लिए पर्याप्त पेड़ काट दिए थे। हम सभी नागरिक विकास और हरियाली में तालमेल की बात करते हैं लेकिन सच तो ये है कि आज भी हम में हरित क्षेत्रों और प्राकृतिक बुनियादी ढांचे के रूप में जंगलों के मूल्य की बहुत कम समझ है जो शहर के निवासियों को स्वच्छ हवा, भूजल पुनर्भरण, बाढ़ नियंत्रण, वन्यजीव आवास और प्राकृतिक मनोरंजन क्षेत्रों जैसे पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएं प्रदान करता है। विडंबना यह कि वन विभाग, जिनके पास यह समझ है, उसकी हैसियत राज्यों और शहरों के टाउन प्लानिंग वाले विभागों की तुलना में कम है। यूं भी शहरों के फैलाव से वनपरिक्षेत्र सिकुड़ता जा रहा है।
आम नागरिकों को यह बात लगभग पता ही नहीं है कि भारत सरकार शहरों के विकास और बदलाव की प्रक्रिया को सतत और पर्यावरण हितैषी बनाने के लिये अत्याधुनिक तकनीक पर आधारित ‘स्मार्ट समाधान’ को बढ़ावा देने पर जोर दे रही है। पर्यावरणीय प्रबंधन और जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने के लिये समाज के सभी वर्गों, संगठनों और सरकारी संस्थाओं के समन्वित प्रयासों की जरूरत को महसूस कर रही है। केन्द्र सरकार का पूरा ध्यान उन योजनाओं को बढ़ावा देने पर है जो पर्यावरण हितैषी हों। जिससे शहरों को जलवायु परिवर्तन के संभावित परिणामों के अनुकूल बनाया जा सके। इसके लिये सरकार अत्याधुनिक तकनीक आधारित ‘स्मार्ट समाधान’ को बढ़ावा दे रही है।
सन् 2016 में, भारत के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने मुंबई के बोरीवली में संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान में एक समारोह में शहरी वन परियोजना योजना शुरू की थी। ऐसा कोई सरकारी आंकड़ा भी उपलब्ध नहीं है जिससे यह पता चल सके कि 2016 से 2020 के बीच 200 सिटी फॉरेस्ट वाली योजना ने कितना लक्ष्य प्राप्त किया। इसके बाद पिछले वर्ष, 5 जून 2020 को यानी विश्व पर्यावरण दिवस को एक वर्चुअल उत्सव के दौरान मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने शहरी वन परियोजना की एक बार फिर शुरुआत की। इस योजना का लक्ष्य अगले पांच वर्षों में देश भर के 200 शहरों में शहरी वन क्षेत्र विकसित करना है।
देखा जाए तो शहरी वन योजना जलवायु परिवर्तन की गति को धीमा करने और शहरी प्रदूषण को कम करने की दिशा में बहुत ही कारगर योजना है। शहरी वन शहरों के जलवायु को सुधार सकते हैं। शहरों में तापमान को कम करने में वृक्ष सबसे अधिक मदद करते हैं। शहरों में कंक्रीट से बनी इमारतों और सड़कों से निकलने वाली गर्मी उन्हें आसपास के देहात के इलाकों की तुलना में अधिक गर्म बना देती है। वे ओजोन, सल्फर डाइऑक्साइड और पार्टिकुलेट मैटर के स्तर को भी कम कर देते हैं। इसके अलावा वायुमंडल से बड़ी मात्रा में कार्बन डाइ ऑक्साइड को हटाकर ऑक्सीजन देते हैं। इस कार्बनडाई आॅक्साईड को सोख कर आॅक्सीजन बढ़ाने का काम करते हैं वृक्ष। ये वृक्ष शहरी वन के रूप में याहरों के जीवन की अभिन्न हिस्सा बन सकते हैं। वनपरिक्षेत्रों के घटने से जो नुकसान हो रहा है उसकी भरपाई भी शहरी वन कर सकते हैं। दुनिया भर में बड़े शहरों में इस प्रकार के शहरी वन बहुत तेजी से विकसित किये जा रहे हैं। सियोल, सिंगापुर और बैंकॉक ने अपने शहर के निवासियों के जीवन में सुधार करते हुए प्रकृति और वन्य जीवन के लिए जगह प्रदान करने वाले ग्रीन कॉरिडोर्स बनाए हैं।
शहरी वन विकसित करने में प्राइवेट सेक्टर की सहभागिता महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। इसके लिए पुणे में वारजे शहरी वन के मॉडल को अपनाया जा सकता है। यह महाराष्ट्र की पहली शहरी वानिकी परियोजना है जिसे टेरी द्वारा विकसित किया गया था, जो एक गैर-लाभकारी संस्था है। इसको टाटा मोटर्स के साथ एक सार्वजनिक-निजी भागीदारी मॉडल के तहत एक कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी पहल के तहत इसे विकसित किया गया था। झुग्गियों और बिल्डरों द्वारा वन विभाग की 16 हेक्टेयर बंजर जमीन का अतिक्रमण कर लिया गया था जिसे जैव विविधता के सम्पन्न रमणीय स्थल में तब्दील कर दिया गया। यह 10,000 से अधिक स्वदेशी पौधों की प्रजातियों, 29 स्थानीय पक्षी प्रजातियों, 15 तितली प्रजातियों, 10 सरीसृप प्रजातियों और तीन स्तनपायी प्रजातियों की मेजबानी करता है। कई अन्य अच्छे उदाहरण हैं। शिमला में लगभग 1,000 हेक्टेयर के एक अभ्यारण्य है जो 1890 के दशक में नगर निकाय द्वारा प्रबंधित शिमला पेयजल जलग्रहण वन के रूप में शुरू हुआ था। दक्षिण-पूर्व दिल्ली में, असोला भट्टी वन्यजीव अभयारण्य को गांव की आम भूमि से आरक्षित वन क्षेत्र में ले जाया गया और फिर इसे एक अभयारण्य के रूप में तब्दील कर दिया गया। दिल्ली के अरावली और यमुना जैव विविधता पार्क ने भी शहर में इन क्षेत्रों के प्राकृतिक आवासों और पारिस्थितिकी प्रणालियों को सफलतापूर्वक दोबारा स्थापित किया है। इसी तरह, गुड़गांव के अरावली जैव विविधता पार्क को नगर निगम, नागरिक समाज, निगमों और निवासियों के बीच एक अनूठी साझेदारी द्वारा वनों को देशी प्रजातियों के लिए एक आश्रय के रूप में तब्दील गया था। अब इसमें लगभग 200 पक्षी प्रजातियों को आकर्षित करने वाले सैकड़ों फूल, पेड़ और झाड़ियां हैं।
शहरी वन परियोजना के लिए जापान की मियावाकी पद्धति को एक अच्छे मौडल के रूप में देखा जा रहा है। इसे जापानी वनस्पति शास्त्री अकीरा मियावाकी द्वारा निर्देशित किया गया है। इसे स्थानीय परिस्थितियों के लिए स्वदेशी प्रजातियों के साथ अनुकूलित किया जा सकता है। मियावाकी वन एक उष्णकटिबंधीय वर्षावन की प्रतिकृति बनाते हैं। इसमें छोटे वृक्ष नीचे और ऊंची-ऊंची छतरियों वाली प्रजातियां ऊपर होती हैं। पारंपरिक वानिकी में, एक एकड़ में लगभग 1,000 पेड़ उगाए जाते हैं। हम मियावाकी के तहत इतने ही क्षेत्र में 12,000 पौधे लगाते हैं, जो 10 वर्षों में 100 साल पुराने जंगल का लाभ पैदा करता है।
अब बात मध्यप्रदेश के सागर जैसे मझोले कद के शहरों की की जाए तो यह शहर फिलहाल औद्योगिक प्रदूषण से दूर है लेकिन आर्थिक विकास के लिए हमेशा उद्योगों से दूर नहीं रहा जा सकता है। इस शहर ने भवन निर्माण, सड़कों के चैड़ीकरण आदि में अपने अनेक वृक्षों को गंवाया है। सागर जैसे शहरों में आबादी और वाहनों की तुलना में वृक्षों की संख्या न्यूनतम है। जब से स्मार्टसिटी योजना लागू हुई है तब से कचरा प्रबंधन की ओर तत्परता से ध्यान दिया जाने लगा है। गाड़ियों से होने वाले प्रदूषण पर भी जागरूकता आई है। लेकिन इतना पर्याप्त नहीं है। हम वैश्विक स्तर प्रदूषण के जिस प्रतिशत से जूझ रहे हैं, उसमें इतना पर्याप्त नहीं है। भविष्य के विकास को ध्यान में रखते हुए भी शहरी वन योजना को एक स्मार्ट समाधान के रूप में तेजी से अमल में लाने की जरूरत है। वृक्ष एक दिन में बढ़ कर इतने तैयार नहीं हो जाते हैं कि वे प्रदूषण से जूझ सकें। कुछ मनोरंजन पार्क बना देने या सड़क डिवाईडर पर फूलों के पौधे लगा देने से वायु प्रदूषण एवं तापमान के स्तर को हम नहीं काट सकते हैं। इसके लिए जरूरी है कि शहरी वन के लिए क्षेत्र चिन्हित कर के वे वृक्ष लगाएं जाएं जो सघन होते हैं और वायु एवं ग्लोबल वार्मिंग की मात्रा को कम करने में मदद कर सकते हैं। इस दिशा में जनजागरूकता अभियान चलाना भी जरूरी है जिससे नागरिक शहरी वन योजना को अज्ञानवश क्षति न पहुंचाएं। वस्तुतः शहरी वन छोटे-बड़े, मंझोले सभी तरह के शहरों के लिए जरूरी हैं। यह हमेशा याद रखना चाहिए कि वृक्ष हैं तो ऑक्सीजन है और ऑक्सीजन है तो संासे हैं। शहर के इको सिस्टम को भी बनाए रखने में भी शहरी वन अपनी महती भूमिका निभा सकते हैं।
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(सागर दिनकर, 06.10.2021)
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Wednesday, September 22, 2021
चर्चा प्लस | बढ़ती कीमतें यानी जबरा मारे और रोेने न दे! | डाॅ शरद सिंह
इसके कारण बढ़ती महंगाई को देख कर तो अब लगता है ‘डायन’ भी शरमा कर कहीं जा छुपी है। डीजल-पेट्रोल के दाम 100 रुपए का आंकड़ा पार कर चुके हैं और रसोई गैस 1000 रुपए को छूने की तैयारी में है। अब तो महंगाई को ‘जबरा’ कहा जाना चाहिए। क्योंकि महंगाई की जबरा मार से जनता का घरेलू बजट तेजी से बिगड़ता चला जा रहा है मगर जनता बेचारी ठीक से रो भी नहीं पा रही है।