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Wednesday, December 22, 2021

चर्चा प्लस | लड़कियों के विवाह की न्यूनतम आयु और लैंगिक समानता | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस
लड़कियों के विवाह की न्यूनतम आयु और लैंगिक समानता
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

देर आयद- दुरुस्त आयद! बेटियों की भलाई के बारे में सोचने में वर्षों का अंतराल लगा दिया गया। शारदा एक्ट सन् 1929 में आया जिसमें लड़कियों के विवाह की न्यूनतम आयु 14 वर्ष की गई। लगभग 49 साल बाद सन् 1978 में शारदा एक्ट में संशोधन करके लड़कियों के विवाह की न्यूनतम आयु 18 वर्ष की गई और अब 43 साल बाद 21 वर्ष की जाने वाली है। यह संशोधन लैंगिक समानता की सोच को भी सुदृढ़ बनाएगा जिसकी सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक हर स्तर पर आज आवश्यकता भी है।  
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केन्द्र सरकार ने लड़कियों के विवाह की न्यूनतम कानूनी आयु को 18 साल से बढ़ाकर लड़कों के बराबर 21 साल करने का फैसला किया है। केंद्रीय कैबिनेट ने लड़कों और लड़कियों के लिए शादी की न्यूनतम उम्र एक समान, यानी 21 साल करने के विधेयक को मंजूरी दे दी है। अब इस विधेयक को कानून का रूप देने के लिए वर्तमान कानून में संशोधन किया जाएगा। यह नया कानून लागू हुआ तो सभी धर्मों और वर्गों में लड़कियों के विवाह की न्यूनतम उम्र बदल जाएगी। वर्तमान कानूनी प्रावधान के तहत लड़कों के विवाह लिए न्यूनतम आयु 21 साल और लड़कियों के लिए 18 साल निर्धारित है। विवाह से जुड़ी न्यूनतम आयु एक समान करने का यह निर्णय उस समय किया गया है जब इससे एक साल पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि सरकार इस बारे में विचार कर रही है कि महिलाओं के लिए न्यूनतम आयु क्या होनी चाहिए। यह निर्णय समता पार्टी की पूर्व अध्यक्ष जया जेटली की अध्यक्षता वाले कार्यबल की अनुशंसा के आधार पर लिया गया है। पूरी संभावना है कि सरकार बाल विवाह (रोकथाम) अधिनियम, 2006  को संशोधित करने संबंधी विधेयक संसद के मौजूदा शीतकालीन सत्र में ला सकती है। यह प्रस्तावित विधेयक विभिन्न समुदायों के विवाह से संबंधित पर्सनल लॉ में महत्वपूर्ण बदलाव का प्रयास कर सकता है ताकि शादी के लिए आयु एक समान सुनिश्चित की जा सके। इंडियन क्रिश्चियन मैरिज एक्ट 1872, पारसी मैरिज एंड डिवोर्स एक्ट 1936, स्पेशल मैरिज एक्ट 1954, मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) आवेदन अधिनियम, 1937, हिंदू मैरिज एक्ट 1955 और द हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट, 1956, सभी के अनुसार शादी करने के लिए लड़के की उम्र 21 साल और लड़कियों की 18 वर्ष होनी चाहिए। इसमें धर्म के हिसाब से कोई बदलाव या छूट नहीं दी गई है। फिलहाल बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006 लागू है, जिसके मुताबिक 21 और 18 से पहले की शादी को बाल विवाह माना जाएगा। ऐसा करने और करवाने पर 2 साल की जेल और एक लाख तक का जुर्माना हो सकता है।
विवाह की आयु में एकरूपता लाने का विचार कोई आज ही पैदा नहीं हुआ है। वर्ष 2021 के फरवरी माह में सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली और राजस्थान उच्च न्यायालयों में विवाह के लिये ‘‘समान न्यूनतम उम्र’’ घोषित करने के लंबित मामलों को अपने यहां स्थानांतरित करने की एक याचिका की जांच का फैसला किया था। भारत के मुख्य न्यायाधीश  की अगुवाई वाली एक बेंच ने ‘‘सुरक्षित लैंगिक न्याय, लैंगिक समानता और महिलाओं की गरिमा’’ के लिये दायर याचिका पर सरकार को नोटिस जारी किया। इस याचिका में विवाह की न्यूनतम आयु में विसंगतियों को दूर करने और इसको लिंग और धर्म से परे सभी नागरिकों के लिये एक समान बनाने के लिये केंद्र सरकार को निर्देश देने की मांग की गई थी। विवाह की न्यूनतम उम्र अभी तक लड़की के लिये 18 और लड़कों के लिये 21 वर्ष निर्धारित है। यह तर्क दिया गया था कि विवाह के लिये अलग-अलग उम्र मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 15 और अनुच्छेद 21) तथा महिलाओं के प्रति सभी प्रकार के भेदभावों को समाप्त करने हेतु अभिसमय पर भारत की प्रतिबद्धता के विरुद्ध है।
विवाह की न्यूनतम आयु में एकरूपता लाने के पीछे यह ठोस तर्क दिया गया था कि इससे मातृ मृत्यु दर में कमी आएगी। पोषण स्तर में सुधार हो सकेगा। इससे लडत्रकियों को को उच्च शिक्षा और आर्थिक प्रगति के अधिक अवसर प्राप्त होंगे। इस प्रकार एक अधिक समतावादी समाज का निर्माण हो सकेगा। विवाह की न्यूनतम आयु बढ़ने से उन लड़कियों को भी स्नातक तक पढ़ाई करने का अवसर मिल जाएगा जिनसे विवाह के आधार पर पढ़ाई छुड़ा दी जाती है। इसका सकारात्मक पहलू यह भी होगा कि स्नातक करने वाली युवतियों की संख्या में वृद्धि होगी जिससे महिला श्रम शक्ति भागीदारी के अनुपात में सुधार होगा। लड़का और लड़की दोनों आर्थिक तथा सामाजिक रूप से लाभान्वित होंगे। महिलाएं आर्थिक रूप से सशक्त होकर अपने हित में निर्णय ले सकेंगी।
नीति आयोग में जया जेटली की अध्यक्षता में साल 2020 में बने टास्क फोर्स की सिफारिश के अनुसार पहले बच्चे का जन्म देते समय उम्र 21 वर्ष होनी चाहिए। विवाह में देरी का परिवारों, महिलाओं, बच्चों और समाज के आर्थिक, सामाजिक और स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। उल्लेखनीय है कि इस टास्कफोर्स को मातृत्व की आयु से संबंधित मामलों, मातृ मृत्यु दर को कम करने, पोषण स्तर में सुधार और संबंधित मुद्दों की जांच करने के लिए गठित किया गया था। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 2020-21 के अपने बजट भाषण के दौरान टास्क फोर्स के गठन का जिक्र करते हुए कहा था, ‘‘1929 के तत्कालीन शारदा अधिनियम में संशोधन करके 1978 में महिलाओं की शादी की उम्र 15 साल से बढ़ाकर 18 साल कर दी गई थी। जैसे-जैसे भारत आगे बढ़ रहा है, महिलाओं के लिए उच्च शिक्षा और कैरियर बनाने के अवसर खुल रहे हैं। मातृ मृत्यु दर को कम करने के साथ-साथ पोषण स्तर में सुधार की अनिवार्यता है। एक लड़की के मातृत्व में प्रवेश करने की उम्र के पूरे मुद्दे को इसी रोशनी में देखने की जरूरत है।’’
देखा जाए तो लड़कियों की विवाह की न्यूनतम आयु की स्थिति सदियों से असंगत रही है। सन् 1927 में न्यायाधीश और समाज सुधारक राय साहब हरबिलास शारदा ने बाल विवाह रोकने के लिए संसद में विधेयक पेश किया था जिसमें लड़कों के लिए शादी की उम्र 18 और लड़कियों के लिए 14 तय की गई। न्यूनतम आयु की कोई सीमा न होने से एक सीमा होने की दिशा में ‘शारदा एक्ट’ एक महत्वपूर्ण कदम था लेकिन यह मातृत्व की शारीरिक क्षमता की दृष्टि से अनुपयुक्त था। इसके साथ ही इसमें दण्ड का प्रावधान भी बहुत कम था। कानून तोड़ने वाले को केवल 15 दिन जेल या हजार रुपये जुर्माना या दोनों हो सकते थे। यद्यपि उस जमाने में हज़ार रुपए की कीमत आज की मौद्रिक तुलना में बहुत अधिक थी, फिर भी दोषियों के लिए यह दण्ड हल्का ही था।
देश की स्वतंत्रता के लगभग 30 वर्ष बाद लड़कियों की मातृत्व वहन करने की शारीरिक क्षमता और स्वस्थ प्रसव के आधार पर शारदा एक्ट में संशोधन किए जाने पर विचार किया जाने लगा। सन् 1978 में शारदा एक्ट में संशोधन किया गया जिसके अंतर्गत लड़कों के लिए विवाह की न्यूनतम उम्र 21 और लड़कियों के लिए 18 तय की गई। जो आज तक लागू है। अब लड़कियों के विवाह की न्यूनतम आयु 18 से बढ़ा कर 21 किए जाने के प्रस्ताव पर सोशल मीडिया की ‘टाईमपास’ किस्म के लोगों द्वारा मताधिकार की आयु का तर्क दिया जा रहा है कि जब मतदान की आयु 18 वर्ष हो सकती है तो विवाह की आयु 21 वर्ष क्यों? इसका सीधा उत्तर यही है कि सरकार चुनने में यदि गलती हो जाए तो पांच साल बाद या मध्यावधि चुनाव के द्वारा सरकार बदली जा सकती है। किन्तु अपरिपक्व मातृत्व के जोखिम में पत्नी की मृत्यु होने पर, बेरोजगारी की स्थिति में परिवार न पाल सकने पर अथवा अपरिपक्व अवस्था में जन्मे कमजोर अथवा शारीरिक दोषपूर्ण बच्चे को आप कैसे बदलेंगे? लड़कियों की विवाह की न्यूनतम आयु वैज्ञानिक एवं आर्थिक दोनों दशाओं को ध्यान में रखते हुए तय किया जाना ही सबसे अच्छा कदम होगा।
जब लड़कियों के विवाह की न्यूनतम आयु की चर्चा की जाए तो इस बात को ध्यान में रखना जरूरी है कि यह विषय मात्र पढ़े-लिखे शहरी तबके से जुड़ा हुआ नहीं है। यह विषय उन लोगों के लिए भी है जो आदिवासी एवं ग्रामीण अंचलों में अत्यंत सीमित स्वास्थ्य सुविधाओं साथ रहते हैं। यह विषय उन लोगों से भी जुड़ा हुआ है जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं और जिनमें साक्षरता का प्रतिशत कम है। यह विषय उन लोगों से भी जुड़ा हुआ है जो बेटी को बोझ समझते हैं और उसकी शिक्षा पर ध्यान देने के बजाए उसका जल्द से जल्दी विवाह कर के ‘‘भारमुक्त’’ हो जाना चाहते हैं। समूचे समाज को ध्यान में रख कर ही ऐसे मुद्दों पर कानूनी संशोधन किए जाते हैं और तभी ऐसे संशोधन हितकारी सिद्ध होते हैं। यूं भी हमारे देश में दण्ड के भय के बिना स्वविवेक से पूर्ण सुधार संभव ही नहीं है। ऐसे लोगों का प्रतिशत कम ही है जो बेटी की वैवाहिक आयु को ले कर व्याकुल नहीं होते हैं वरन् समाज का एक बड़ा प्रतिशत बेटी के शीघ्र विवाह की हड़बड़ी में रहता है। ऐसे लोगों पर कानूनी बंदिश ही कारगर सिद्ध हो सकती है और बेटियों को बेटों के समान अपना व्यक्ति निर्मित करने का भरपूर अवसर मिल सकेगा। शारीरिक दृष्टि (बायोलाॅजिकली) भी वह मातृत्व धारण के करने और मातृत्व की जिम्मेदारी निभाने में अधिक सक्षम हो सकेगी। वर्तमान एकल परिवार पद्धति में यह और भी अधिक जरूरी है कि लड़की अपने विवाह और मातृत्व के बारे में निर्णय लेने के लिए मानसिक रूप से भी परिपक्व अर्थात् बालिग हो चुकी रहे। भावी स्वस्थ समाज की संरचना की दिशा में लड़कियों के विवाह की न्यूनतम आयु बढ़ाया जाना लाभप्रद ही रहेगा, साथ ही लैंगिक समानता की भावना का भी विकास करने में भी सहायक होगा।
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Wednesday, December 15, 2021

चर्चा प्लस | सरदार वल्लभ भाई पटेल का पुराना नाता था बुंदेलखंड से | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस 
पुण्यतिथि 15 दिसम्बर विशेष
सरदार वल्लभ भाई पटेल का पुराना नाता था बुंदेलखंड से
 - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
  सरदार वल्लभ भाई पटेल भारतीय राजनीति के एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने कठोर निर्णयों पर अमल करते हुए देश का राजनीतिक नक्शा ही बदल दिया। रियासतों में बंटा देश एक झंडे अर्थात् तिरंगे के तले आ गया। बारडोली कस्बे में सत्याग्रह करने के लिए ही उन्हंे पहले ‘बारडोली का सरदार’ और बाद में केवल ‘सरदार’ कहा जाने लगा। इसके बाद वे समूचे जनमानस के ‘सरदार’ बन कर देश की सेवा करते रहे। बुंदेलखंडवासी इस पर गर्व कर सकते हैं कि ऐसे लौह व्यक्तित्व का  बुंदेलखंड से पुराना नाता रहा है।  
   बुंदेलखंड से लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल का नाता उनके पिता झावेर भाई के समय से रहा। सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर, 1875 को गुजरात के नाडियाड स्थित एक साधारण कृषक परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम झावेरभाई और माता का नाम लाडभाई था। उनके पिता पूर्व में करमसाड में रहते थे। वल्लभ भाई के पिता मूलतः कृषक होते हुए भी एक कुशल योद्धा एवं शतरंज के श्रेष्ठ खिलाड़ी थे। सन् 1857 के पूर्व ही अंग्रेजों के विरुद्ध विभिन्न राज्यों में सुगबुगाहट आरम्भ हो चुकी थी। मराठा नाना साहब एवं झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों की असम्मानजनक शर्तें मानने से स्पष्ट मना कर दिया था। धीरे-धीरे युद्ध की स्थितियां निर्मित होती जा रही थीं। उत्तर भारत तथा महाराष्ट्र से नाडियाड आने वाले व्यापारियों के माध्यम से इस सम्बन्ध में छिटपुट समाचार झावेर भाई को मिलते रहते थे। वे भी अंग्रेजों द्वारा भारतीय कृषकों के साथ किए जाने वाले भेद-भाव से अप्रसन्न थे। एक दिन उन्हें पता चला कि उनके कुछ मित्र नाना साहब की सेना में भर्ती होने जा रहे हैं। झावेर भाई ने भी तय किया कि वे भी सेना में भर्ती होकर अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध लड़ेंगे। वे जानते थे कि उनके परिवारजन इसके लिए उन्हें अनुमति नहीं देंगे। अतः एक दिन वे बिना किसी को बताए घर से निकल पड़े।
नाना साहब की सेना में भर्ती होने के उपरांत उन्होंने सैन्य कौशल प्राप्त किया। उस समय तक झांसी की रानी ने ‘अपनी झांसी नहीं दूंगी’ का उद्घोष कर दिया था। सन् 1857 में अंग्रेजों ने झांसी पर आक्रमण कर दिया। रानी लक्ष्मीबाई की सहायता करने के लिए नाना साहब अपनी सेना लेकर झांसी की ओर चल दिए। उनकी सेना में झावेर भाई भी थे।
नाना साहब ने अपनी सेना की एक टुकड़ी रानी लक्ष्मीबाई की सेना में शामिल कर दी। इस टुकड़ी में झावेर भाई थे जो रानी लक्ष्मी बाई की सेना के साथ अंग्रेजों से लोहा लेते हुए झांसी से ग्वालियर की ओर बढ़ रहे थे। उस दौरान झावेर भाई ने बुंदेलखंड में एक योद्धा के रूप में अनेक दिन बिताए। दुर्भाग्यवश, रानी लक्ष्मी बाई अंग्रेजों से घिर गयीं और वीरगति को प्राप्त हुईं तथा झावेर भाई को इन्दौर के महाराजा की सेना ने बंदी बना लिया। अपनी चतुराई और शतरंज के कौशल के सहारे झावेर भाई महाराजा इन्दौर की क़ैद से आजाद हुए।
स्वतंत्रता आन्दोलन में वल्लभ भाई का सबसे पहला और बड़ा योगदान खेड़ा आन्दोलन में था। गुजरात का खेड़ा जिला उन दिनों भयंकर सूखे की चपेट में था। किसानों ने अंग्रेज सरकार से लगान में छूट की मांग की। जब यह स्वीकार नहीं किया गया तो वल्लभ भाई ने महात्मा गांधी के साथ पहुंच कर किसानों का नेतृत्व किया और उन्हें कर न देने के लिए प्रेरित किया। अंततः सरकार को उनकी मांग माननी पड़ी और लगान में छूट दी गयी। यह सरदार पटेल की पहली सफलता थी। इसके बाद उन्होंने बोरसद और बारडोली में सत्याग्रह का आह्वान किया। बारडोली कस्बे में सत्याग्रह करने के लिए ही उन्हंे पहले ‘बारडोली का सरदार’ और बाद में केवल ‘सरदार’ कहा जाने लगा। यह एक कुशलतापूर्वक संगठित आन्दोलन था जिसमें समाचारपत्रों, इश्तिहारों एवं पर्चों से जनसमर्थन प्राप्त किया गया था तथा सरकार  का विरोध किया गया था। इस संगठित आन्दोलन की संरचना एवं संचालन वल्लभ भाई ने किया था। उनके इस आन्दोलन के समक्ष सरकार को झुकना पड़ा था।
महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए असहयोग आन्दोलन के दौरान सरकारी न्यायालयों का बहिष्कार करने आह्वान करते हुए स्वयं का उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए वल्लभ भाई ने सदा के लिए वकालत का त्याग कर दिया। इस प्रकार का कर्मठताभरा त्याग वल्लभ भाई ही कर सकते थे। महात्मा गांधी और मोतीलाल नेहरू दोनों ही बल्लभ भाई पटेल पर अगाध विश्वास करते थे। महात्मा गांधी ने दांडी यात्रा के बाद अपने एक भाषण में स्वीकार किया था कि -‘‘वल्लभ भाई दांडी में मेरे साथ उपस्थित नहीं हो सके क्यों कि सरकार ने उन्हें बंदी बना कर जेल में डाल दिया था, लेकिन उनका उत्साह और उनकी आशाएं दांडी में जनसमूह के रूप में मेरे साथ थीं। यदि मैं नमक कानून तोड़ने में सफल रहा तो इस सफलता की जमीन वल्लभ भाई द्वारा तैयार की गई थी।’’
वल्लभ भाई महात्मा गंाधी को जितना आदर देते थे, महात्मा गांधी भी उन्हें उतनी ही स्नेह करते थे। वे प्रत्येक मामले में एक बार वल्लभ भाई से सलाह ले लेना उचित समझते थे। महात्मा गांधी जानते थे कि वल्लभ भाई व्यवहारिक दृष्टि से उचित सलाह देंगे। जब से वल्लभ भाई ने स्वदेशी वस्त्रों को अपने पहनावे के रूप में अपनाया था तब से ही महात्मा गंाधी का लगाव वल्लभ भाई के प्रति बढ़ गया था। वे समझ गए थे कि वल्लभ भाई कोई अवसरवादी नेता नहीं हैं, वरन् उनमें नेतृत्व और त्याग की क्षमता जन्मजात है। दांडी-यात्रा की सफलता ने महात्मा गांधी के मन में वल्लभ भाई की छवि को और अधिक प्रखर बना दिया।
सरकार एक आर्डीनेंस निकालकर कांग्रेस की समस्त संगठन को गैर कानूनी घोषित कर चुकी थी और कांग्रेस के अध्यक्ष होने के नाते पं. जवाहरलाल नेहरू और उनके पिता पं. मोतीलाल नेहरू गिरफ्तार किए जा चुके थे। पं. मोतीलाल जी जेल जाते हुए सरदार पटेल जी को अपना स्थानापन्न नियुक्त कर गए थे। इसलिए 26 जून 1930 को जेल से बाहर आते ही वल्लभ भाई कांग्रेस संगठन को सुदृढ़ करने और सत्याग्रह-संग्राम को तीव्र करने में संलग्न हो गए।
सरदार पटेल ने अपना महत्वपूर्ण योगदान 1917 में खेड़ा किसान सत्याग्रह, 1923 में नागपुर झंडा सत्याग्रह, 1924 में बोरसद सत्याग्रह के उपरांत 1928 में बारदोली सत्याग्रह में देकर अपनी राष्ट्रीय पहचान कायम की। इसी बारदोली सत्याग्रह में उनके सफल नेतृत्व से प्रभावित होकर महात्मा गांधी और वहां के किसानों ने वल्लभ भाई पटेल को ‘‘सरदार’’ की उपाधि दी। वहीं 1922, 1924 तथा 1927 में सरदार पटेल अहमदाबाद नगर निगम के अध्यक्ष चुने गये। 1930 के गांधी के नमक सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा आन्दोलन की तैयारी के प्रमुख शिल्पकार सरदार पटेल ही थे। 1931 के कांग्रेस के कराची अधिवेशन में सरदार पटेल को अध्यक्ष चुना गया। सविनय अवज्ञा आन्दोलन में सरदार पटेल को जब 1932 में गिरफ्तार किया गया तो उन्हें गांधी के साथ 16 माह जेल में रहने का सौभाग्य हासिल हुआ। 1939 में हरिपुरा कांग्रेस अधिवेशन में जब देशी रियासतों को भारत का अभिन्न अंग मानने का प्रस्ताव पारित कर दिया गया तभी से सरदार पटेल ने भारत के एकीकरण की दिशा में कार्य करना प्रारंभ कर दिया तथा अनेक देशी रियासतों में प्रजा मण्डल और अखिल भारतीय प्रजा मण्डल की स्थापना करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रजा मण्डल की संकल्पना को अपनाते हुए बुंदेलखंड में भी इसकी इकाइयां गठित की गई थीं। लगातार कठोर परिश्रम ने वल्लभ भाई पटेल के स्वास्थ्य को प्रभावित किया था। स्वास्थ्य खराब होने के बाद भी परिस्थितिवश उन्हें अनेक यात्राएं करनी पड़ीं। लगातार दौरों और विपरीत परिस्थितियों में परहेज संभव नहीं हो पाता था। इन सबका दुष्प्रभाव उनके शरीर पर पड़ता गया। 15 दिसम्बर 1950 को प्रातः वल्लभ भाई पटेल के सीने में दर्द उठा। तत्काल चिकित्सकों को बुलाया गया। चिकित्सकों ने हरसंभव प्रयास किया किन्तु दुर्भाग्यवश  9 बजकर 37 मिनट पर हृदयगति रुकने से उनका निधन हो गया। सरदार पटेल के निधन का समाचार विद्युतगति से पूरे देश में फैल गया और समूचा राष्ट्र गहरे शोक में डूब गया। उसी दिन सायंकाल उनके एकमात्र पुत्र डाह्याभाई पटेल ने उनके शव को अग्नि को समर्पित किया। शोक संतप्त राष्ट्र ने ‘लौह पुरुष’ को श्रद्धांजलि अर्पित की।
समूचा बुंदेलखंड वल्लभ भाई पटेल का स्मरण करता ही है तथा चैक-चैराहों, तिराहों में उनकी प्रतिमाएं स्थापित हैं। इसी प्रकार सागर संभागीय मुख्यालय की रजाखेड़ी नगरपालिका के बजरिया तिराहे पर भी सरदार वल्लभ भाई पटेल की एक प्रतिमा स्थापित है। यह प्रतिमा सरदार पटेल के व्यक्तित्व और विचारों का बुंदेलखंड पर प्रभाव का प्रतीक है क्योंकि इस प्रतिमा का निर्माण सन् 2015 में लगभग 6 लाख रुपए के निजी खर्च पर कराया गया। इससे पूर्व लगभग साल भर पहले से प्रतिमा के लिए प्लेटफार्म का निर्माण शुरू कर दिया गया था। प्रतिमा जयपुर से बनवाई गई। इस प्रतिमा का निर्माण एवं स्थापना कुर्मी समाज युवा संगठन के जिलाध्यक्ष विजय पटेल ने अपने पिता स्व. शिब्बू दाऊ पटेल की स्मृति में कराया। विजय पटेल इसका कारण बताते हैं कि वे सदा सरदार पटेल के विचारों से प्रभावित रहे जिसकी प्रेरणा उन्हें अपने पिता से मिली। इसीलिए अपने पिता की स्मृति में उन्होंने सरदार पटेल की प्रतिमा स्थापित कराने का निर्णय लिया। वास्तव में वल्लभ भाई पटेल आधुनिक भारत के शिल्पी थे, उनके विचार आज भी बुंदेलखंड की विकासयात्रा का पथप्रदर्शन कर रहे हैं।
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Wednesday, December 1, 2021

चर्चा प्लस | सम्मान वाया राजनीतिक गलियारा | संदर्भ : डॉ हरीसिंह गौर को भारत रत्न देने की मांग | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस
सम्मान वाया राजनीतिक गलियारा
संदर्भ : डॉ हरीसिंह  गौर को भारत रत्न देने की मांग
 - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
    डाॅ हरीसिंह गौर ने अपना तन, मन, धन दे कर इसलिए विश्वविद्यालय की स्थापना नहीं की थी कि उन्हें कोई सम्मान चाहिए था। वे तो मात्र इतना चाहते थे कि क्षेत्र और क्षेत्रवासियों का बौद्धिक तथा शैक्षिक विकास हो। उनके द्वारा स्थापित विश्वविद्यालय में पढ़ कर भी हम आज अपने उस महान दानवीर को ‘‘भारत रत्न’’ दिलाने के लिए राजनीतिक गलियारों की खाक छान रहे हैं या इस बात से व्यथित हैं कि भोपाल का मिंटोहाॅल उनके नाम पर क्यों नहीं किया जा रहा है? शायद हमारी इच्छाशक्ति में ही कोई कमी रह गई है जो हम वर्षों बाद भी डाॅ. गौर को ‘‘भारत रत्न’’ नहीं दिला सके हैं।  
सागर विश्वविद्यालय के छात्र रहे प्रदेश भाजपा प्रवक्ता रजनीश अग्रवाल ने भोपाल की पुरानी विधानसभा मिंटो हाॅल का नाम डॉ  हरीसिंह गौर के नाम पर किए जाने की मांग की। सागरवासियों एवं विश्वविद्यालय से किसी न किसी रूप से जुड़े हर व्यक्ति को यह मांग स्वागत योग्य लगी। इसके साथ ही कानूनविद, शिक्षाविद, साहित्यकार, दार्शनिक और सागर विश्वविद्यालय के संस्थापक अर्थात् बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी डॉ  हरीसिंह गौर को भारत रत्न देने की मांग पहले भी कई बार उठ चुकी है। या यूं कहा जाना चाहिए कि हर साल गौर जयंती पर यह मांग उठती है और फिर वार्षिक सुप्तावस्था में चली जाती है। सभी जानते हैं कि डॉ हरीसिंह गौर भारत के एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने अपने जीवन की पूरी कमाई बुंदेलखंड जैसे पिछड़े क्षेत्र में आजादी के पहले विश्वविद्यालय स्थापित करने के लिए दान कर दी थी। लेकिन उन्हें ‘‘भारत रत्न’’ दिलाने के पक्ष में ज़ोरदार पहल करते हुए कोई अपने पद से त्यागपत्र देने की घोषणा करने की भी वीरता आज तक नहीं दिखा पाया है।  
दिलचस्प बात है कि मिंटो हाल का नाम डॉ हरीसिंह गौर के नाम पर करने की मांग सागर विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र और मध्य प्रदेश भाजपा के प्रवक्ता रजनीश अग्रवाल ने भोपाल स्थित पुरानी विधानसभा के मिंटो हाल का नाम महान शिक्षाविद, सागर में विश्वविद्यालय के संस्थापक डॉ हरीसिंह गौर के नाम पर करने का आग्रह मुख्यमंत्री शिवराज सिंह से कर के एक अच्छी पहल की। लेकिन इसके साथ ही राजनीतिक होड़ शुरू हो गई। ऐसा प्रतीत होने लगा कि यदि मिंटो हाल का नाम डाॅ. गौर के नाम पर कर दिया गया और उन्हें ‘‘भारत रत्न’’ दे दिया गया तो श्रेय किसके झोली में आएगा। यानी परिदृश्य यह कि सूत न कपास और जुलाहों में लट्ठमलट्ठ।
मिंटोहाॅल का नाम डाॅ. गौर के नाम पर रखे जाने को कई राजनीतिज्ञ डॉ हरीसिंह गौर की हस्ती के मुकाबले इसे बहुत छोटी मांग मान रहे हैं। तो बड़ी मांग अब तक पूरी क्यों नहीं हुई? इस प्रश्न का उत्तर भी उनके पास नहीं है। इधर कांग्रेस के प्रवक्ता संदीप सबलोक का कहना है कि ‘‘सागर विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र और मेरे मित्र रजनीश अग्रवाल की भावनाओं का मैं सम्मान करता हूं। डॉ हरीसिंह गौर हमारी आस्था का केंद्र हैं। लेकिन भारतीय जनता पार्टी उनके नाम के सहारे जो एजेंडा चला रही है, मैं इसको गलत मानता हूं। बेहतर होगा कि डॉ हरिसिंह गौर के नाम पर शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में कार्य किए जाएं, ताकि बुंदेलखंड क्षेत्र के युवाओं को रोजगार हासिल हो. डॉ हरीसिंह गौर को भारत रत्न देने का प्रस्ताव मध्यप्रदेश की विधानसभा में पारित कर केंद्र सरकार को भेजा जाए। डॉ गौर को भारत रत्न देने का प्रस्ताव पास करे सरकार।’’

सागर विश्वविद्यालय के छात्रों और पूर्व छात्रों के संगठन गौर यूथ फोरम के संयोजक विवेक तिवारी का कहना है कि ‘‘डॉ गौर एक ऐसे व्यक्तित्व थे, कि उन्हें अभी तक भारत रत्न मिल जाना चाहिए था। संविधान सभा के उपसभापति रहने के अलावा उन्होंने देश और दुनिया में कानून के क्षेत्र में बहुत नाम कमाया है। उन्होंने अपना सर्वस्व दान कर सागर विश्वविद्यालय बनाकर देश का इकलौता उदाहरण पेश किया है। डॉक्टर गौर को भारत रत्न दिए जाने के लिए गौर यूथ फोरम सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने जा रही है।’’

26 नवम्बर 1870 को जन्मे डॉ. हरिसिंह गौर सागर विश्वविद्यालय के संस्थापक, शिक्षाशास्त्री, ख्यति प्राप्त विधिवेत्ता, न्यायविद्, समाज सुधारक, साहित्यकार तथा महान दानी एवं देशभक्त तो थे ही, साथ ही वे बीसवीं शताब्दी के सर्वश्रेष्ठ शिक्षाविद एवं कानूनवेत्ता थे। लेकिन डाॅ. गौर चांदी का चम्मच मुंह में ले कर पैदा नहीं हुए थे। उनका आरम्भिक जीवन संघर्षमय रहा। डॉ. गौर बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे। प्राइमरी के बाद इन्होनें दो वर्ष मेँ ही आठवीं की परीक्षा पास कर ली जिसके कारण इन्हेँ सरकार से 2 रुपये की छात्र वृति मिली जिसके बल पर ये जबलपुर के शासकीय हाई स्कूल गये। लेकिन पारिवारिक उलझनों के कारण ठीक से पढ़ाई नहीं कर सके और मैट्रिक में फेल हो गए। इस कारण इन्हें वापिस सागर आना पड़ा। दो साल तक काम के लिये भटकते रहे फिर जबलपुर अपने भाई के पास गये जिन्होने इन्हें फिर से पढ़ने के लिये प्रेरित किया।
डॉ. गौर फिर मैट्रिक की परीक्षा में बैठे और इस बार ना केवल स्कूल मेँ बल्कि पूरे प्रान्त में प्रथम आये। इन्हें 50 रुपये नगद एक चांदी की घड़ी एवं बीस रूपये की छात्रवृति मिली। आगे की शिक्षा के लिये वे हिस्लाॅप कॉलेज में भर्ती हुये। पूरे कॉलेज में अंग्रेजी एव इतिहास मेँ ऑनर्स करने वाले ये एकमात्र छात्र थे। इसके बाद पढ़ने कैम्ब्रिज गए। वहां उन्हें रंगभेद का सामना करना पड़ा। एक बार तो ऐसा भी हुआ कि गणित और अंग्रेजी कविताओं की प्रतियोगिताओं में वे प्रथम आए, पर रंगभेद की नीति के चलते इन प्रतियोगिताओं के परिणाम रोक लिए गए।

लंदन में डाॅ. गौर ने कानून की पढ़ाई की और वहीं से डीलिट की डिग्री भी हासिल की। उन दिनों दादाभाई नौरोजी ब्रिटेन में भारतीय मूल के पहले सांसद निर्वाचित हुए थे। सांसद के चुनाव के लिए हरि सिंह गौर ने उनके पक्ष में प्रचार किया था। भारत आने के बाद डाॅ. गौर कुछ महीने के लिए वे डिप्टी कलेक्टर की नौकरी पर रहे। फिर वकालत करने के लिए नौकरी छोड़ दी और इलाहाबाद, मध्य प्रांत तथा कलकत्ता के उच्च न्यायालयों में वकालत की। बकालत के दौरान ही डाॅ. गौर ने सन् 1918 में नागपुर नगरपालिका का चुनाव लड़ा। चुनाव में विजयी हुए और अध्यक्ष बने। सन् 1920 में उन्होंने इंडियन नेशनल कांग्रेस की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। तब वे पार्टी के नरम दल के समर्थक थे। 1921 से लेकर 1935 तक डाॅ. गौर सेंट्रल असेंबली के सदस्य रहे। उसी दौरान साइमन कमीशन भारत आया था। डाॅ. गौर ने कमीशन के सामने भारत को डोमिनियन दर्जा देने का प्रस्ताव रखा। इसका अर्थ यह था कि आंतरिक मामलों में भारतीयों को स्वशासन का अधिकार दिया जाए। ब्रिटिश सरकार को यह किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं था। अतः ब्रिटिश सरकार ने इसे नामंजूर कर दिया।
भारतीय दंड संहिता की तुलनात्मक विवेचना पर डाॅ. गौर के द्वारा लिखी गई पुस्तक अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हुई। लगभग 3000 पृष्ठ की दो भागों में विभाजित यह पुस्तक अंग्रेजी भाषा में इस विषय पर लिखी पहली पुस्तक थी जो आज भी बकीलों के उपयोग में आती है। हिंदू कोड बिल पर उनका काम आज भी एक प्रामाणिक दस्तावेज माना जाता है। इस किताब में उन्होंने लगभग 500 अन्य किताबों और लगभग सात हजार केसों का हवाला दिया है। ऐसा कोई हिंदू शास्त्र और केस नहीं छोड़ा, जो इसमें नहीं मिलता हो। हिंदू की परिभाषा से लेकर विवाह, संपत्ति, तलाक सहित वे सारी बातें जो किसी हिंदू के जीवन में घटित हो सकती हैं, उनका कानूनी पक्ष इस किताब में मिलता है। उस दौर में बहुविवाह को लेकर हिंदू पुरुष और महिलाओं के बीच अंतर था। डाॅ. गौर ने पुरुषों के लिए बहुविवाह जायज और महिलाओं के लिए गैरकानूनी माना था।

1921 में जब दिल्ली विश्वविधालय की स्थापना हुई तो डॉ. गौर इसके प्रथम कुलपति बने 1924 तक वो इस पद पर रहे। 1928 एवं 1936 में वह नागपुर विश्वविधालय के कुलपति रहे। इंग्लैंड में ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत आने वाले 27 विश्वविधालयों का महाधिवेशन भी उनकी अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ। लेकिन उनके मन में अपनी जन्मभूमि और समूचे बुंदेलखंड में शिक्षा की अलख जगाने की ललक थी। अतः उन्होंने अपनी निजी संपत्ति दान कर डाॅ. गौर ने सागर विश्वविद्यालय की स्थापना की। इस विश्वविद्यालय के संस्थापक, उपकुलपति तो थे ही। डॉ. सर हरीसिंह गौर एक ऐसा विश्वस्तरीय अनूठा विश्वविद्यालय है, जिसकी स्थापना एक शिक्षाविद् के द्वारा दान द्वारा की गई थी। उन्होंने इसका नामकरण ‘‘सागर विश्वविद्यालय’’ इसलिए किया था क्योंकि वे इसे कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय की भांति शिक्षा का उच्चकेन्द्र बनाना चाहते थे। वर्ष 1983 में इसका नाम डाॅ. गौर के नाम पर ‘‘डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय’’ कर दिया गया। अब यह विश्वविद्यालय केन्द्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा पा चुका है।
चर्चित लेखक पी राजेश्वर राव ने अपनी किताब ‘द ग्रेट इंडियन पेट्रियट्स’ में डाॅ. गौर के बारे में बिलकुल सही लिखा है कि ‘‘कुछ ही लोग अपने औचित्य को साबित कर पाते हैं, कानूनविद डॉ. हरि सिंह गौर उनमें से एक थे।’’ ऐसे महान व्यक्तित्व को ‘‘भारत रत्न’’ दिलाने के लिए केवल सामयिक प्रयास और राजनीतिक बवाल की नहीं अपितु एक ऐसी दृढ़ इच्छाशक्ति की ज़रूरत है जो ‘‘भारत रत्न’’ घोषित कर दिए जाने पर ही शिथिल हो।
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Wednesday, November 24, 2021

चर्चा प्लस | एक गंभीर चूक बनाम पाक्सो एक्ट | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस
एक गंभीर चूक बनाम पाक्सो एक्ट
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
     कई बार एक कानूनी चूक एक ग़लत नज़ीर बन कर अनेक अपराधियों के बच निकलने का रास्ता जरूर बना देती है। यह तो गनीमत कि महाराष्ट्र सरकार, राष्ट्रीय महिला आयोग और अटॉर्नी जनरल ने अपील दायर की और सुप्रीम कोर्ट ने बाॅम्बे हाई कोर्ट के फ़ैसले को ख़ारिज कर के पीड़ित को न्याय दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया। बच्चों को नृशंस अपराधों से बचाने के लिए तथा उन्हें न्याय दिलाने के लिए आम जनता को भी पाक्सो एक्ट की जानकारी होनी चाहिए क्योंकि कानून की जानकारी अपराध का विरोध करने की शक्ति देती है।
सन् 2012 में बच्चों को यौनहिंसा से बचाने के लिए और अपराधियों को दंड देने के लिए एक कानून बनाया गया। जिसे ‘‘पाक्सो एक्ट’’ ( प्रोटेक्शन आफ चिल्ड्रेन फ्राम सेक्सुअल अफेंसेस एक्ट) के नाम से जाना जाता है। इसका आशय ही है कि बच्चों को हर तरह की यौन हिंसा से बचाना। लेकिन यह कानून कमजोर पड़ गया जब बॉम्बे हाई कोर्ट ने ‘‘स्किन टू स्किन कॉन्टेक्ट’’ न होने के आधार पर अपराधी को दोषमुक्त करार दे दिया। लेकिन जो मामले निचली अदालतों में या हाईकोर्ट में लड़खडा जाते हैं उन्हें सर्वोच्च न्यायालय में ही पहुंच कर न्याय मिलता है। इस मामले में भी यही हुआ। कानून बॉम्बे हाई कोर्ट की ओर से रेप केस को लेकर दिए स्किन टू स्किन कॉन्टेक्ट वाले फैसले को 2021,नवम्बर के दूसरे सप्ताह में सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया। उच्च न्यायालय के इस फैसले को लेकर विवाद खड़ा हो गया था। हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा था कि पॉक्सो एक्ट के तहत यौन उत्पीड़न का अपराध तभी माना जा सकता है, जब आरोपी और पीड़िता के बीच स्किन कॉन्टेक्ट हुआ हो। अदालत के इस फैसले के खिलाफ महाराष्ट्र सरकार, राष्ट्रीय महिला आयोग और अटॉर्नी जनरल ने अपील दायर की थी। इस पर सुनवाई करते हुए ही जस्टिस उदय उमेश ललित, जस्टिस एस. रविंद्र भट और जस्टिस बेला एम. त्रिवेदी की बेंच ने फैसले को खारिज कर दिया है। जस्टिस बेला त्रिवेदी ने हाई कोर्ट के फैसले को बेतुका बताते हुए साफ़ शब्दों में कहा कि ‘‘पॉक्सो एक्ट के तहत अपराध मानने के लिए फिजिकल या स्किन कॉन्टेक्ट की शर्त रखना हास्यास्पद है और इससे कानून का मकसद ही पूरी तरह से खत्म हो जाएगा, जिसे बच्चों को यौन अपराधों से बचाने के लिए बनाया गया है।’’ कोर्ट ने कहा कि इस परिभाषा को माना गया तो फिर दस्ताने पहनकर रेप करने वाले लोग अपराध से बच जाएंगे। यह बेहद अजीब स्थिति होगी। शीर्ष अदालत ने कहा कि नियम ऐसे होने चाहिए कि वे कानून को मजबूत करें न कि उनके मकसद को ही खत्म कर दें। इस तरह कोर्ट ने अपने आदेश में साफ कर दिया कि यौन उत्पीड़न के मामले में स्किन टू स्किन कॉन्टेक्ट के बिना भी पॉक्सो एक्ट लागू होता है।
दरअसल, बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने यौन उत्पीड़न के एक आरोपी को यह कहते हुए बरी कर दिया गया था कि नाबालिग के निजी अंगों को स्किन टू स्किन संपर्क के बिना टटोलना पॉक्सो एक्ट के तहत नहीं आता। अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने इस मुद्देे को सुप्रीम कोर्ट में उठाया था। सुप्रीमकोर्ट ने हाईकोर्ट के इस फैसले को बदलते हुए ये फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कर दिया कि सेक्सुअल मंशा से शरीर के सेक्सुअल हिस्से का स्पर्श पॉक्सो एक्ट का मामला है। यह नहीं कहा जा सकता कि कपड़े के ऊपर से बच्चे का स्पर्श यौन शोषण नहीं है। ऐसी परिभाषा बच्चों को शोषण से बचाने के लिए बने पॉक्सो एक्ट के मकसद ही खत्म कर देगी।
महिला और बाल विकास मंत्रालय ने पॉक्सो एक्ट-2012 को बच्चों के प्रति यौन उत्पीड़न और यौन शोषण और पोर्नोग्राफी जैसे जघन्य अपराधों को रोकने के लिए बनाया गया था। वर्ष 2012 में बनाए गए इस कानून के तहत अलग-अलग अपराध के लिए अलग-अलग सजा तय की गई है। जिसका कड़ाई से पालन किया जाना भी सुनिश्चित किया गया है। इस अधिनियम की धारा 4 के तहत वो मामले शामिल किए जाते हैं जिनमें बच्चे के साथ दुष्कर्म या कुकर्म किया गया हो। इसमें सात साल सजा से लेकर उम्रकैद और अर्थदंड भी लगाया जा सकता है।
पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के अधीन वे मामले लाए जाते हैं जिनमें बच्चों को दुष्कर्म या कुकर्म के बाद गम्भीर चोट पहुंचाई गई हो। इसमें दस साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा हो सकती है और साथ ही जुर्माना भी लगाया जा सकता है। पॉक्सो अधिनियम की धारा 7 और 8 के तहत वो मामले पंजीकृत किए जाते हैं जिनमें बच्चों के प्राईवेटपार्ट से छेडछाड़ की गई हो। इस धारा के आरोपियों पर दोष सिद्ध हो जाने पर पांच से सात साल तक की सजा और जुर्माना हो सकता है। पॉक्सो एक्ट की धारा 3 के तहत पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट को भी परिभाषित किया गया है। जिसमें बच्चे के शरीर के साथ किसी भी तरह की हरकत करने वाले शख्स को कड़ी सजा का प्रावधान है। दरअसल, 18 साल से कम उम्र के बच्चों से किसी भी तरह का यौन व्यवहार इस कानून के दायरे में आ जाता है। यह कानून लड़के और लड़की को समान रूप से सुरक्षा प्रदान करता है। इस कानून के तहत पंजीकृत होने वाले मामलों की सुनवाई विशेष अदालत में होती है। पॉक्सो एक्ट लागू किए जाने के बाद बारह वर्ष से कम उम्र की बच्चियों के साथ दुष्कर्म में फांसी की सजा का प्रावधान रखा गया था, किन्तु बाद में अनुभव किया गया कि बालकों को भी इस एक्ट के तहत न्याय दिए जाने की व्यवस्था होनी चाहिए। इसीलिए एक्ट में संशोधन किया गया और बालकों को भी यौन शोषण से बचाने और उनके साथ दुराचार करने वालों को फांसी की सजा का प्रावधान तय किया गया। इसके अंतर्गत केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने लड़की-लड़कों दोनों यानी बच्चों को यौन उत्पीड़न से बचाने के बाल यौन अपराध संरक्षण कानून (पॉस्को) 2012 में संशोधन को मंजूरी दे दी। संशोधित कानून में 12 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के साथ दुष्कर्म करने पर मौत की सजा तक का प्रावधान है। इसके अलावा बाल यौन उत्पीड़न के अन्य अपराधों की भी सजा कड़ी करने का प्रस्ताव है। केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने लड़की-लड़कों दोनों यानी बच्चों को यौन उत्पीड़न से बचाने के बाल यौन अपराध संरक्षण कानून (पॉक्सो) 2012 में संशोधन को मंजूरी दी है। इस संशोधित कानून में 12 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के साथ दुष्कर्म करने पर मौत की सजा तक का प्रावधान है। इसके अलावा बाल यौन उत्पीड़न के अन्य अपराधों की भी सजा कड़ी करने का प्रस्ताव भी रखा गया है।
पाक्सो एक्ट के अन्तर्गत मीडिया के लिए विशेष दिशा निर्देश (प्रावधान) हैं-
1. धारा 20 के अनुसार मीडिया किसी बालक के लैंगिक शोषण संबंधी किसी भी प्रकार की सामग्री जो उसके पास उपलब्ध हो, वह स्थानीय पुलिस को उपलब्ध करायएगा। ऐसा ना करने पर यह कृत्य अपराध की श्रेणी में माना जाएगा।
2. कोई व्यक्ति किसी भी प्रकार के मीडिया या स्टूडियों या फोटोग्राफी सुविधाओं से पूर्ण और अधिप्रमाणित सूचना के बिना किसी बालक के सम्बन्ध में कोई रिपोर्ट या उस पर कोई टिप्पणी नहीं करेगा, जिससे उसकी प्रतिष्ठा हनन या उसकी गोपनीयता का उल्लंघन होता हों।
3. किसी मीडिया से कोई रिपोर्ट बालक की पहचान जिसके अन्तर्गत उसका नाम, पता, फोटोचित्र परिवार के विवरणों, विधालय, पङौसी या किन्हीं अन्य विवरण को प्रकट नहीं किया जायेगा।
4. परन्तु ऐसे कारणों से जो अभिलिखित किये जाने के पश्चात सक्षम विशेष न्यायालय की अनुमति प्राप्त कर किया जा सकेगा यदि उसकी राय में ऐसा प्रकरण बालक के हित में है।
5. मीडिया स्टूडियों का प्रकाशक या मालिक संयुक्त रूप से और व्यक्तिगत रूप से अपने कर्मचारी के कार्यों के किसी कार्य के लिए उत्तरदायी होगा। इन प्रावधानों का उल्लंघन करने पर 6 माह से 1 वर्ष के कारावास या जुर्माने या दोनों से दण्डित किया जायेगा।
पॉक्सो एक्ट में मेडिकल जांच के लिए निर्देश है कि पीड़ित का मामला 24 घंटो के अन्दर बाल कल्याण समिति के सामने लाया जाए। जिससे पीड़ित की सुरक्षा के लिए जरुरी कदम उठाये जा सके। इसके साथ ही बच्चे की मेडिकल जाँच करवाना भी अनिवार्य हैं । ये मेडिकल परीक्षण बच्चे के माता-पिता या किसी अन्य व्यक्ति की उपस्थिति में किया जायेगा जिस पर बच्चे का विश्वास हो और पीड़ित अगर लड़की है तो उसकी मेडिकल जांच महिला चिकित्सक द्वारा ही की जानी चाहिए।
पाक्सो अधिनियम की प्रमुख विशेषताएं हैं कि इस अधिनियम में बच्चों को 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्तियों के रूप में परिभाषित किया गया है।यह अधिनियम लिंग तटस्थ है, इसका अर्थ यह है कि अपराध और अपराधियों के शिकार पुरुष, महिला या तीसरे लिंग हो सकते हैं। यह एक नाबालिग के साथ सभी यौन गतिविधि को अपराध बनाकर यौन सहमति की उम्र को 16 साल से 18 साल तक बढ़ा देता है। अधिनियम में यह भी बताया गया है कि यौन शोषण में शारीरिक संपर्क शामिल हो सकता है या शामिल नहीं भी हो सकता है। अधिनियम बच्चे के बयान को दर्ज करते समय और विशेष अदालत द्वारा बच्चे के बयान के दौरान जांच एजेंसी द्वारा विशेष प्रक्रियाओं का पालन करता है। सभी के लिए अधिनियम के तहत यौन अपराध के बारे में पुलिस को रिपोर्ट करना अनिवार्य है, और कानून में गैर-रिपोर्टिंग के लिए दंड का प्रावधान शामिल किया गया है। इस अधिनियम में यह सुनिश्चित करने के प्रावधान हैं कि एक बच्चे की पहचान जिसके खिलाफ यौन अपराध किया जाता है, मीडिया द्वारा खुलासा नहीं किया जायेगा। बच्चों को पूर्व-परीक्षण चरण और परीक्षण चरण के दौरान अनुवादकों, दुभाषियों, विशेष शिक्षकों, विशेषज्ञों, समर्थन व्यक्तियों और गैर-सरकारी संगठनों के रूप में अन्य विशेष सहायता प्रदान की जाए। बच्चे अपनी पसंद या मुफ्त कानूनी सहायता के वकील द्वारा कानूनी प्रतिनिधित्व के हकदार हैं। इस अधिनियम में पुनर्वास उपाय भी शामिल हैं, जैसे कि बच्चे के लिए मुआवजे और बाल कल्याण समिति की भागीदारी शामिल है।
कई बार एक कानूनी चूक एक ग़लत नज़ीर बन कर अनेक अपराधियों के बच निकलने का रास्ता जरूर बना देती है। यह तो गनीमत कि महाराष्ट्र सरकार, राष्ट्रीय महिला आयोग और अटॉर्नी जनरल ने अपील दायर की और सुप्रीम कोर्ट ने बाॅम्बे हाई कोर्ट के फ़ैसले को ख़ारिज कर के पीड़ित को न्याय दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया। बच्चों को नृशंस अपराधों से बचाने के लिए तथा उन्हें न्याय दिलाने के लिए आम जनता को भी पाक्सो एक्ट की जानकारी होनी चाहिए क्योंकि कानून की जानकारी अपराध का विरोध करने की शक्ति देती है।
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Wednesday, November 17, 2021

चर्चा प्लस | छात्र, छात्र जीवन और बदलता दौर | अंतर्राष्ट्रीय छात्र दिवस | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस 
छात्र, छात्र जीवन और बदलता दौर
(17 नवम्बर, अंतर्राष्ट्रीय छात्र दिवस)
 - डाॅ. शरद सिंह                                                            
हर व्यक्ति के लिए उसका छात्रजीवन बहुत महत्वपूर्ण होता है। पढ़ाई के लाख दबाव के बावज़ूद उसे अपने लिए सपने देखने और उन सपनों के लिए प्रयास करने का अवसर मिलता है। नई-नई संगत उन्हें जीवन के नए अनुभव देती है। एक अनुभव छात्रसंघ के चुनाव का भी हुआ करता था। जिसे मेरी जैसी पूर्व छात्रा का इस ‘‘विश्व छात्र दिवस’’ पर स्मरण किया जाना स्वाभाविक है। वस्तुतः ये चुनाव राजनीति, नेतृत्व, सहयोग और संघर्ष की पाठशाला हुआ करते थे। ‘‘विश्व छात्र दिवस’’ भी तो छात्रों के एक संघर्ष का समरण दिवस ही है।
प्रति वर्ष 17 नवम्बर को मनाया जाता है ‘‘अन्तर्राष्ट्रीय छात्र दिवस’‘। एक ऐसा दिवस जो छात्रशक्ति और छात्रों के साहस को याद करने का दिवस है। इस वर्ष के लिए अंतर्राष्ट्रीय छात्र दिवस की थीम है-‘‘लोगों, ग्रह, समृद्धि और शांति के लिए सीखना’’।

दरअसल, ‘‘अन्तर्राष्ट्रीय छात्र दिवस’‘ मनाए जाने के पीछे एक हृदयविदारक फासीवादी घटना का हाथ है। हुआ यह था कि 28 अक्टूबर, 1939 को नाजी कब्जे वाले चेकोस्लोवाकिया की राजधानी ‘‘प्राग’’ में वहां के छात्रों और शिक्षकों ने अपने देश की स्थापना की वर्षगांठ के अवसर पर एक प्रदर्शन का आयोजन किया था। नाज़ियों ने इस प्रदर्शन पर गोलियां चलाईं, जिसके परिणामस्वरूप मेडिकल फेकल्टी का एक छात्र, जिसका नाम जॉन ओपलेटल था, मारा गया। उस छात्र के अंतिम संस्कार के समय भी एक विरोध प्रदर्शन किया गया। तब दर्जनों प्रदर्शनकारी छात्र-छात्राओं को गिरफ्तार कर लिया गया। बाद में 17 नवम्बर की सुबह नाजियों ने छात्रों के होस्टल को घेरकर 1200 से अधिक छात्रों को गिरफ्तार किया और एक यातना शिविर में बंद कर दिया। नाजियों द्वारा यातनाएं देने के बाद नौ छात्रों को फांसी पर लटका दिया गया। जिसके बाद उन्हें फांसी दी गई। नाजियों के सैनिकों की इस घटना ने चेकोस्लोवाकिया के सभी छात्रों को उद्वेलित कर दिया परिणामस्वरूप सभी कॉलेज, यूनिवर्सिटीज़ को छात्रों ने बंद करा दिया। इस घटना के 2 साल बाद यानी 1941 में लंदन में एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन बुलाया गया। यह सम्मेलन फाॅसीवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाले छात्रों का था। सम्मेलन में नाज़ियों द्वारा शहीद किए गए छात्रों को याद करने के लिए हर साल 17 नवंबर को अंतर्राष्ट्रीय छात्र एकता दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया। पूरी दुनिया में यह दिन छात्रों की शक्ति, एकता और बलिदान के स्मरण के रूप में मनाया जाता है।
 छात्र जीवन बड़ा ही लुभावना होता है। उत्साह से भरा हुआ। बहुत कुछ कर गुज़रने के मंसूबों वाला। विशेषरूप से महाविद्यालयीन अथवा विश्वविद्यालयीन छात्र जीवन। स्कूली स्तर पर तो बंधा-बंधाया जीवन होता है जिसमें तराजू के एक पलड़े पर होमवर्क होता है तो दूसरे पलड़े पर परिजन, अभिभावक और शिक्षकों की ढेर सारी नसीहतें। उच्चशिक्षा के परिसर में पांव रखते ही युवाओं को एक खूबसूरत आज़ादी का अनुभव होने लगता है। मानो सारे बंधन स्कूल यूनीफार्म के साथ स्कूली दिनों में पीछे छूट गए हों। एक नई दुनिया। उस पर यदि को-एजुकेशन काॅलेज हो तो सोने पे सुहागा। ग्यारहवीं कक्षा से मैं को-एजुकेशन में ही पढ़ी, इसलिए यह कह सकती हूं कि को-एजुकेशन में छात्र-छात्राओं के बीच एक अच्छी समझ पैदा होती है जो जीवन-पर्यन्त उनके काम आती है।

‘‘कोरोना काल’’ और उससे उत्पन्न समसामयिक कारणों को छोड़ दें तो विगत कुछ दशकों में छात्रजीवन भी बड़ी तेजी से बदला है। इसका मूल कारण यह नहीं है कि हम ग्लोबल हो गए हैं या सूचनाओं के विस्फोट में जी रहे हैं। क्योंकि ग्लोबल तो मेरी पीढ़ी के छात्र भी थे। बेशक़ वह दौरा समाजवाद और पूंजीवाद पर बहसों का दौर था। लगभग अस्सी प्रतिशत छात्र समाजवादी विचारधारा से प्रभावित हुआ करते थे। खुद को काॅमरेड कहलाना अच्छा लगता था। क्योंकि हम सभी छात्र उसमें आर्थिक स्तर पर सामाजिक समता देखते थे। ‘‘पेरेस्त्रोइका’’ के पहले विश्व का राजनीतिक परिदृश्य भी आज से भिन्न था। लेकिन भारतीय छात्र जीवन में इससे भी कोई बहुत बड़ा परिवर्तन नहीं हुआ है। एक चीज है जो आज के छात्र जीवन से ‘‘मिसिंग’’ यानी कहीं खो गई लगती है, वह है छात्रसंघों का गर्माहट भरा चुनाव। महाविद्यालय और विश्वविद्यालयों के चुनावों ने न जाने कितने प्रखर राजनीतिक चेहरे दिए भारतीय राजनीति को। ग़ज़ब का उत्साह होता था छात्रसंघ चुनावों के दौरान। मुझे याद आता है अपने काॅलेज का प्रथम वर्ष। मैं पन्ना के छत्रसाल स्नातकोत्तर महाविद्यालय की बी.ए. प्रथम वर्ष की छात्रा थी। इससे पहले का मेरा छात्र जीवन बड़ा बंधा-बंधाया रहा था। दसवीं कक्षा तक उस स्कूल की छात्रा रही जहां मेरी मां डाॅ. विद्यावती ‘मालविका’ हिन्दी की व्याख्याता थीं, यानी मनहर उच्चतर माध्यमिक शासकीय कन्या विद्यालय। फिर ग्यारहवीं कक्षा में (उस समय 10+2 नहीं था) मुझे कमल सिंह मामाजी के पास बिजुरी (जिला शहडोल) जाना पड़ा। वहीं आदिवासी शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में मामाजी व्याख्याता थे और मैं उसी स्कूल की छात्रा। यानी मेरी शिक़ायत किए जाने की जो तलवार पन्ना में मेरे सिर पर लटकती रहती थी, उससे बिजुरी आ कर भी पीछा नहीं छूटा। उसी स्कूल की एक व्याख्याता की बेटी या भांजी होना कितना बंधनकारी होता है, यह मेरी जैसी छात्रा (या छात्र) ही समझ सकती है। अतः बिजुरी से वापस पन्ना पहुंचने पर छत्रसाल महाविद्यालय में दाखिला और वह भी कला संकाय में, मेरे लिए आजादी का एक बड़ा प्रतिशत ले कर आया। पूरी आजादी तो नहीं थी क्योंकि अवचेतन में सदा यह बात रही कि कोई भी काम ऐसा न करूं कि जिससे मां को लज्जित होना पड़े। यूं भी मैं खिलंदड़े स्वभाव की थी। ‘दादागिरी’ में विश्वास रखने वाली। काॅलेज के अपने प्रथम वर्ष में ही मैंने छात्रसंघ के चुनावों को समझने का प्रयास करना शुरू कर दिया। चुनाव में मुझे खुद खड़ा होने में कतई दिलचस्पी नहीं थी लेकिन कोई ‘‘अपना केंडिडेट’’ चुनाव जीते, इसका महत्व समझ में जल्दी ही आ गया। मेरी वर्षा दीदी भी उसी काॅलेज की छात्रा रहीं लेकिन एक तो वे विज्ञान संकाय की थीं और दूसरे कि मेरी तुलना में बिलकुल भी उत्पाती नहीं थीं। उन्हें तो काॅलेज में पढ़ाई और बेडमिंटन खेलने के अलावा और कोई लेना-देना नहीं रहता था। बहरहाल, उस वर्ष मेरे सीनियर छात्र (जो बी.ए. फाईनल में थे शायद) चतुर सिंह परिहार उपाध्यक्ष पद के लिए चुनाव में खड़े हुए। मैंने भी ज़ोरदार केनवासिंग कीे। परिणाम ज़बर्दस्त रहा। परिहार चुनाव जीत गए। उस दौर में मुझे पहली बार छात्रसंघ के चुनाव की गर्मजोशी का अहसास हुआ। इसके बाद बी.ए. तृतीय वर्ष के दौरान एक बार फिर छात्रसंघ चुनाव का अनुभव हुआ। एक वर्ष मुझे मुझे दमोह में रहना पड़ा। जहां शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय में मैं बी.ए. तृतीय वर्ष की छात्रा रही। उन दिनों मुकेश नायक वहां सीनियर छात्र थे। अध्यक्ष पद के लिए उम्मीदवार थे। बहुत उत्साही। वे एक-एक छात्र-छात्रा से व्यक्तिगत संपर्क कर के अपने लिए वोट मांगा करते थे। एक अलग ही जुनून था जो वहां उम्मीदवार छात्र-छात्राओं में देखने को मिलता था। लेकिन दुर्भाग्यवश काॅलेज की एक छात्रा ने आत्महत्या कर ली जिसके कारण उस वर्ष छात्रसंघ का चुनाव स्थगित कर दिया गया। सभी उम्मींदवारों की मेहनत पर पानी फिर गया किन्तु अपनी साथी के जाने के दुख के चलते सभी ने प्रशासन के निर्णय को स्वीकार कर लिया।            

इन दोनों अनुभवों ने आगे चल कर मुझे राजनीति के अनेक दांव-पेंच समझने में मदद की। वस्तुतः छात्रसंघ के चुनाव छात्रों में राजनीतिक समझ के साथ ही दायित्वबोध और नेतृत्व की क्षमता भी जगाते थे। इसके बाद परिपाटी बदलती गई और परीक्षा में आए उच्च प्राप्तांकों के आधार पर छात्रसंघ के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष बनाए जाने लगे। यही से ‘‘चुने जाने’’ और ‘‘बनाए जाने’’ का अन्तर आरम्भ हो गया। आज स्थितियां और भी बदल गई हैं। आज छात्रसंघ के वैसे चुनावों की कहीं झलक भी दिखाई नहीं पड़ती है। आज छात्र जीवन को सबसे अधिक यदि किसी ने प्रभावित किया है तो वह है अर्थतंत्र। हर छात्र की बुनियाद में उसके कैरियर का खूंटा गाड़ दिया जाता है। बहुत कम ही छात्र ऐसे हैं जो स्वयं को इस खूंटे से अलग कर के देख पाते हैं। मल्टीनेशनल कंपनी और उनके भरी-भरकम पैकेज़ के सपनों में लिपटा छात्र ‘‘कोचिंग’’ और ‘‘पढ़ाई की सोचिंग’’ के अलावा और कुछ कर ही नहीं पाता है। वैसे छात्रों के जीवन से छात्रसंघ के चुनाव जैसी गतिविधियां ‘इरेज़’ होने का एक कारण यह भी है कि इन चुनावों में धीरे-धीरे बाहुबलियों का वर्चस्व बढ़ने लगा था और कई विश्वविद्यालयों के चुनाव खूनी खेल में ढलने लगे। जिससे इन पर अंकुश लगाया जाना ज़रूरी हो गया था। लेकिन अफ़सोस की बात है कि छात्रसंघ चुनावों में बहुबलियों की घुसपैंठ को रोकने के बजाए चुनावों पर ही बंदिशें लगा दी गईं। अब आज वह सारी गतिविधियां बहुत पीछे छूट चुकी हैं, बिलकुल किसी कपोलकल्पित परिकथा जैसी। लेकिन 17 नवंबर का ‘‘विश्व छात्र दिवस’’ आज भी ज़ारी है, यह अच्छी बात है।
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Friday, November 12, 2021

चर्चा प्लस | भारत को कितनी राहत देगी पीएम मोदी और स्कूली छात्रा विनीशा की ललकार | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस
भारत को कितनी राहत देगी
पीएम मोदी और स्कूली छात्रा विनीशा की ललकार
 - डाॅ. शरद सिंह                                                                           
 ‘‘बातें बहुत हो चुकीं, अब काम करना आरम्भ करें!’’ यही तो कहा दुनिया भर के देशों से भारतीय छात्रा विनीशा उमाशंकर ने। यह सिर्फ़ उसकी आवाज़ नहीं बल्कि हर युवा की आवाज़ है जो खुली हवा में सांस लेना चाहता है और स्वस्थ तथा लम्बा जीवन जीना चाहता है। कार्बन के बेतहाशा उत्सर्जन ने हवा का दम घोंट रखा है। इसी चिंता को ले कर ग्लास्गो में कोप 26 सम्मेलन आयोजित किया गया। सम्मेलन में पीएम मोदी ने भी इसके लिए सभी देशों से आह्वान किया। आशा की जानी चाहिए कि सम्मेलन में लिए गए निर्णय भारत की जलवायु-दशा में भी सुधार लाएंगे। 
15 साल की तमिलनाडु में पढ़ने वाली भारतीय स्कूली छात्रा विनीशा उमाशंकर ने कोप-26 सम्मेलन में अपने भाषण में कहा कि ‘‘मैं केवल भारत की लड़की नहीं हूं बल्कि मैं इस धरती की बेटी हूं। मैं और मेरी पीढ़ी आज आपके कार्यों के परिणामों को देखने के लिए जीवित रहेंगे। फिर भी आज हम जो चर्चा करते हैं, उनमें से कोई भी मेरे लिए व्यावहारिक नहीं है। आप तय कर रहे हैं कि हमारे पास रहने योग्य दुनिया में रहने का मौका है या नहीं। हम लड़ने लायक हैं या नहीं? अब वक्त आ गया है कि हम बातें करना बंद करें और काम करना शुरू करें।’’
विनीशा के भाषण पर टिप्पणी करते हुए प्रिंस चाल्र्स ने कहा कि विनीशा ने जो कुछ कहा उससे हम युवापीढ़ी के आगे लज्जित हैं। हमें अपने पृथ्वी को बचाने की दिशा में प्रयासों पर ध्यान देना होगा। ग्लासगो में आयोजित ‘‘वल्र्ड लीडर समिट ऑफ कोप-26’’ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत का पक्ष दुनिया के सामने रखा. क्लाइमेट चेंज पर इस वैश्विक मंथन के बीच पीएम ने पंचामृत की सौगात दी।
ग्लासगो में पीएम मोदी ने अपने संबोधन में कहा कि आज मैं आपके बीच उस भूमि का प्रतिनिधित्व कर रहा हूं जिस भूमि ने हजारों वर्षों पहले ये मंत्र दिया था ‘‘संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम’’ आज 21वीं सदी में ये मंत्र और भी ज्यादा प्रासंगिक हो गया है। ये सच्चाई हम सभी जानते हैं कि क्लाइमेट फाइनेंस को लेकर आज तक किए गए वादे, खोखले ही साबित हुए हैं। जब हम सभी क्लाइमेट एक्शन पर अपने एम्बीशन बढ़ा रहे हैं, तब क्लाइमेट फाइनेंस पर विश्व के एम्बीशन वहीं नहीं रह सकते जो पेरिस अग्रीमेंट के समय थे। क्लाइमेट चेंज पर इस वैश्विक मंथन के बीच मैं भारत की ओर से इस चुनौती से निपटने के लिए पांच अमृत तत्व रखना चाहता हूं, पंचामृत की सौगात देना चाहता हूं।
पहला- भारत, 2030 तक अपनी नाॅन फाॅसिल इनर्जी केपीसिटी को 500 गीगावाट तक पहुंचाएगा। 
दूसरा- भारत, 2030 तक अपनी 50 प्रतिशत इनर्जी की जरूरत को ‘‘गैर-जीवाश्म ऊर्जा’’ रिनीवल इनर्जी से पूरी करेगा।
तीसरा- भारत अब से लेकर 2030 तक के कुल प्रोजेक्टेड कार्बन एमिशन में एक बिलियन टन की कमी करेगा। 
चौथा- 2030 तक भारत, अपनी अर्थव्यवस्था की कार्बन इंटेन्सिटी को 45 प्रतिशत से भी कम करेगा।
पांचवा- वर्ष 2070 तक भारत, नेट जीरो का लक्ष्य हासिल करेगा।
         ये सच्चाई हम सभी जानते हैं कि क्लाइमेट फाइनेंस को लेकर आज तक किए गए वादे, खोखले ही साबित हुए हैं। जब हम सभी क्लाइमेट एक्शन पर अपनी महत्वकांक्षा बढ़ा रहे हैं, तब क्लाइमेट फाइनेंस पर विश्व की महत्वकांक्षा वही नहीं रह सकते जो पेरिस अग्रीमेंट के समय थे। मेरे लिए पेरिस में हुआ आयोजन, एक समिट नहीं, सेंटीमेंट था, एक कमिटमेंट था। भारत वो वादे विश्व से नहीं कर रहा था, बल्कि वो वादे सवा सौ करोड़ भारतवासी अपने आप से कर रहे थे। पीएम ने कहा कि दुनिया को एडप्टेशन पर ध्यान देना चाहिए, लेकिन एडप्टेशन पर ध्यान नहीं दिया गया। जलवायु पर वैश्विक बहस में एडप्टेशन को उतना महत्व नहीं मिला है। ये उन विकासशील देशों के साथ अन्याय है जो जलवायु परिवर्तन से ज्यादा प्रभावित हैं। एडप्टेशन के तरीके चाहे लोकल हों पर पिछड़े देशों को इसके लिए ग्लोबल सहयोग मिलना चाहिए। लोकल एडप्टेशन के लिए ग्लोबल सहयोग के लिए भारत ने कोएलिशन फॉर डिजास्टर रेजिस्टेंस इंफ्रास्ट्रक्चर पहल की शुरूआत की थी। मैं सभी देशों को इस पहल से जुड़ने का अनुरोध करता हूं। पीएम मोदी ने कहा कि भारत में नल से जल, स्वच्छ भारत मिशन और उज्जवला जैसी परियोजनाओं से हमारे जरूरतमंद नागरिकों को अनुकूलन लाभ तो मिले ही हैं उनके जीवन स्तर में भी सुधार हुआ है। कई पारंपरिक समुदाय में प्रकृति के साथ सद्भाव में रहने का ज्ञान है। हमारी अनुकूलन नीतियों में इन्हें उचित महत्व मिलना चाहिए। स्कूल के पाठ्यक्रम में भी इसे जोड़ा जाना चाहिए।
भारत की अर्थव्यवस्था वर्ष 2070 तक कार्बन न्यूट्रल हो जाएगी, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को ग्लासगो में कोप 26 जलवायु शिखर सम्मेलन में घोषणा की।  मोदी ने यह भी कहा कि भारत ‘‘गैर-जीवाश्म ऊर्जा’’ की स्थापित क्षमता के लिए अपने 2030 के लक्ष्य को 450 से बढ़ाकर 500 गीगावाट करेगा।
ग्लासगो में पीएम मोदी के अपने संबोधन में कहा कि भारत एकमात्र ऐसा देश है जो पेरिस समझौते के तहत जलवायु परिवर्तन से निपटने की प्रतिबद्धताओं को अक्षरशः पूरा कर रहा है।  मेरे लिए, पेरिस का कार्यक्रम एक शिखर सम्मेलन नहीं बल्कि एक भावना, एक प्रतिबद्धता थी और भारत दुनिया से वादे नहीं कर रहा था, बल्कि 125 करोड़ भारतीय खुद से वादे कर रहे थे।  मुझे खुशी है कि भारत जैसा विकासशील देश करोड़ों लोगों को गरीबी से बाहर निकालने का काम कर रहा है।  जब मैं पहली बार क्लाइमेट समिट के लिए पेरिस आया था, तो दुनिया भर के अन्य वादों में अपना खुद का वादा जोड़ने का मेरा कोई इरादा नहीं था।  ‘‘सर्वे सुखिनः भवन्तु’’ का संदेश देने वाली संस्कृति के प्रतिनिधि के रूप में मैं मानवता की चिंता के साथ आया था।  कई विकासशील देशों के अस्तित्व के लिए जलवायु परिवर्तन एक बड़ा खतरा है।  हमें दुनिया को बचाने के लिए बड़े कदम उठाने चाहिए।  यह समय की मांग है और यह इस मंच की प्रासंगिकता को साबित करेगा।  मुझे उम्मीद है कि ग्लासगो में लिए गए फैसले हमारी अगली पीढ़ियों के भविष्य को बचाएंगे। भारत को उम्मीद है कि विकसित देश जल्द से जल्द 1 ट्रिलियन डॉलर का जलवायु वित्त उपलब्ध कराएंगे।  आज जलवायु वित्त को ट्रैक करना महत्वपूर्ण है जैसे हम जलवायु शमन की प्रगति को ट्रैक करते हैं।  उन देशों पर दबाव बनाना उचित न्याय होगा जो जलवायु वित्त के अपने वादों को पूरा नहीं करते हैं। दुनिया आज स्वीकार करती है कि जलवायु परिवर्तन में जीवनशैली की प्रमुख भूमिका है।  मैं आप सभी के सामने एक शब्द आंदोलन का प्रस्ताव करता हूं।  यह शब्द ‘‘जीवन’’ है जिसका अर्थ है पर्यावरण के लिए जीवन शैली।  आज जरूरत है कि हम सब एक साथ आएं और जीवन को एक आंदोलन के रूप में आगे बढ़ाएं।’’
उल्लेखनीय है कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने सितंबर में कहा था कि उनका देश 2060 तक कार्बन उत्सर्जन को नेट जीरो करने के लक्ष्य को हासिल कर लेगा। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भी 2060 तक शून्य कार्बन उत्सर्जन हासिल करने का वादा किया है। भारत ने 2070 तक का लक्ष्य रखा है।
नेट जीरो का अर्थ है कार्बन डाइऑक्साइड के घातक उत्सर्जन को पूरी तरह से ख़त्म कर देना जिससे धरती के वायुमंडल को गर्म करनेवाली ग्रीनहाउस गैसों में इसकी वजह से और वृद्धि न हो। भारत, इंडोनेशिया, फिलीपींस और दक्षिण अफ्रीका कोयले से होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के 15 फीसदी के लिए जिम्मेदार हैं। इस योजना का मकसद उत्सर्जन में कटौती की गति तेज करना है ताकि 2050 तक नेट जीरो उत्सर्जन हासिल करने के लक्ष्य के और करीब पहुंचा जा सके।
इंडोनेशिया के ऊर्जा मंत्री अरिफिन तसरीफ ने कहा कि उनका देश कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्रों को बंद कर उनकी जगह नवीकरणीय ऊर्जा संसाधनों पर निर्भरता बढ़ाने को लेकर प्रतिबद्ध है। एक बयान जारी कर उन्होंने कहा, जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक चुनौती है जिससे निपटने के लिए सभी पक्षों उदाहरण पेश करने होंगे। सीआईएफ ने कहा कि एक्सलरेटिंग कोल ट्रांजीशन (एसीटी) योजना के तहत सबसे पहले ऐसे विकासशील देशों को लक्ष्य किया जा रहा है जिनके पास कोयले पर निर्भरता कम करने के लिए समुचित साधन नहीं हैं। दक्षिण अफ्रीका ने मंगलवार को कहा था कि वह एसीटी से लाभान्वित पहला देश होगा। सीआईएफ के अनुसार इस नई योजना को सात सबसे विकसित समर्थन दे रहे हैं और अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, कनाडा और डेनमार्क ने इसके लिए वित्तीय समर्थन दिया है। डेनमार्क ने कहा है कि वह इस योजना के लिए 1.55 करोड़ डॉलर यानी लगभग एक अरब 15 करोड़ रुपये का अनुदान देगा ताकि ष्कोयला बिजली संयंत्रों को खरीदकर बंद किया जा सके और नए ऊर्जा स्रोतों में निवेश किया जा सके। डेनमार्क के विदेश मंत्री येप्पे कोफोड ने कहा, कोल ऊर्जा संयंत्रों को बंद करने के लिए हमें एक स्थायी और स्थिर योजना की जरूरत होगी। मिसाल के तौर पर हमें यह सुनिश्चित करना होगा स्थानीय आबादी के लिए वैकल्पिक रोजगार और उन्हें दोबारा ट्रेनिंग उपबल्ध हो।
वैसे प्रधानमंत्री मोदी कार्बन उत्सर्जन पर काबू पाने की दिशा में ठोस कदम उठाएंगे ही पर हमें याद रखना चाहिए कि पृथ्वी को बचाने का विनीशा का आह्वान हर देश, हर नागरिक के लिए है। भारतवासी और पृथ्वीवासी होने के नाते विनीशा का समर्थन करना हमारा नैतिक कर्तव्य है।
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Thursday, November 4, 2021

चर्चा प्लस | बुंदेली दीपावली से जुड़ी रोचक परंपराएं | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस
बुंदेली दीपावली से जुड़ी रोचक परंपराएं
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
कुछ परंपराएं भले ही छूट रही हों, कुछ मान्यताएं भले ही बदल रही हों किन्तु बुंदेलखंड का विस्तृत भू-भाग आज भी दीपावली के लुप्त हो चले अनेक रिवाजों को अपने सीने से लगाए हुए है और उन्हें संरक्षित करने के लिए सतत् प्रयत्नशील है। ये परंपराएं अत्यंत रोचक हैं। यह याद रखने की बात है कि प्रकृति, समाज और प्रसन्नता से जुड़ी परंपराएं न तो कभी हानिकारक होती हैं और न कभी पुरानी पड़ती हैं, अपितु ये परंपराएं हमारे जातीय स्वाभिमान को बचाए रखती हैं। जब तक दीपावली के दीपक जगमगाते रहेंगे, हमारी परंपराएं भी हमारे साथ चलती रहेंगी।
        भारत का सबसे जगमगाता त्योहार है दीपावली। इस एक त्योहार के मनाए जाने के कारणों की बात करें से इससे जुड़ी अनेक कथाएं सुनने को मिल जाती हैं। मान्यता अनुसार इसी दिन भगवान राम 14 वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटे थे। इस दिन भगवान विष्णु ने राजा बलि को पाताल लोक का स्वामी बनाया था इसलिए दक्षिण भारत के लोगों के लिए यह महत्वपूर्ण दिन है। इस दिन के ठीक एक दिन पहले श्रीकृष्ण ने नरकासुर नामक राक्षस का वध किया था। इस खुशी के मौके पर दूसरे दिन दीप जलाए गए थे। कहते हैं कि दीपावली का पर्व सबसे पहले राजा महाबली के काल से प्रारंभ हुआ था। विष्णु ने तीन पग में तीनों लोकों को नाप लिया। राजा बली की दानशीलता से प्रभावित होकर भगवान विष्णु ने उन्हें पाताल लोक का राज्य दे दिया, साथ ही यह भी आश्वासन दिया कि उनकी याद में भू लोकवासी प्रत्येक वर्ष दीपावली मनाएंगे। तभी से दीपोत्सव का पर्व प्रारंभ हुआ। यह भी माना जाता हैं कि दीपावली यक्ष नाम की जाति के लोगों का ही उत्सव था। उनके साथ गंधर्व भी यह उत्सव मनाते थे। मान्यता है कि दीपावली की रात्रि को यक्ष अपने राजा कुबेर के साथ हास-विलास में बिताते व अपनी यक्षिणियों के साथ आमोद-प्रमोद करते थे। सभ्यता के विकास के साथ यह त्योहार मानवीय हो गया और धन के देवता कुबेर की बजाय धन की देवी लक्ष्मी की इस अवसर पर पूजा होने लगी, क्योंकि कुबेर जी की मान्यता सिर्फ यक्ष जातियों में थी पर लक्ष्मीजी की देव तथा मानव जातियों में। कई जगहों पर अभी भी दीपावली के दिन लक्ष्मी पूजा के साथ-साथ कुबेर की भी पूजा होती है।
दीपावली दीपों का त्योहार है। यह ‘‘अन्धकार पर प्रकाश की विजय’’ को दर्शाता है। दीपावली का उत्सव 5 दिनों तक चलता है। पहले दिन को धनतेरस कहते हैं। दीपावली महोत्सव की शुरुआत धनतेरस से होती है। इसे धन त्रयोदशी भी कहते हैं। धनतेरस के दिन मृत्यु के देवता यमराज, धन के देवता कुबेर और आयुर्वेदाचार्य धन्वंतरि की पूजा का महत्व है। इसी दिन समुद्र मंथन में भगवान धन्वंतरि अमृत कलश के साथ प्रकट हुए थे और उनके साथ आभूषण व बहुमूल्य रत्न भी समुद्र मंथन से प्राप्त हुए थे। दूसरे दिन को नरक चतुर्दशी, रूप चैदस और काली चैदस कहते हैं। इसी दिन नरकासुर का वध कर भगवान श्रीकृष्ण ने 16,100 कन्याओं को नरकासुर के बंदीगृह से मुक्त कर उन्हें सम्मान प्रदान किया था। इस उपलक्ष्य में दीयों की बारात सजाई जाती है। तीसरे दिन दीपावली होती हैं। दीपावली का पर्व विशेष रूप से मां लक्ष्मी के पूजन का पर्व होता है। कार्तिक माह की अमावस्या को ही समुद्र मंथन से मां लक्ष्मी प्रकट हुई थीं जिन्हें धन, वैभव, ऐश्वर्य और सुख-समृद्धि की देवी माना जाता है। इसी दिन श्रीराम, सीता और  लक्ष्मण 14 वर्षों का वनवास समाप्त कर घर लौटे थे। चैथे दिन अन्नकूट या गोवर्धन पूजा होती है। कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को गोवर्धन पूजा एवं अन्नकूट उत्सव मनाना जाता है। इसे पड़वा या प्रतिपदा भी कहते हैं। पांचवां दिन इस दिन को भाई दूज और यम द्वितीया कहते हैं। भाई दूज, पांच दिवसीय दीपावली महापर्व का अंतिम दिन होता है। भाई दूज का पर्व भाई-बहन के रिश्ते को प्रगाढ़ बनाने और भाई की लंबी उम्र के लिए मनाया जाता है।
दीपावली के कई दिन पहले से ही घर की दीवारों की रंगाई-पुताई, आंगन की गोबर से लिपाई और लिपे हुए आंगन के किनारों को ‘‘ढिग’’ धर का सजाना यानी चूने या छुई मिट्टी से किनारे रंगना। चैक और सुराती पूरना। गुझिया, पपड़ियां, सेव-नमकीन, गुड़पारे, शकरपारे के साथ ही एरसे, अद्रैनी आदि व्यंजन बनाया जाना। एरसे त्यौहारों विशेषकर होली और दीपावली पर बनाये जाते हैं। ये मूसल से कूटे गए चावलों के आटे से बनते हैं। आटे में गुड़ मिला कर, माढ़ कर इन्हें पूड़ियों की तरह घी में पकाते हैं। घी के एरसे ही अधिक स्वादिष्ट होते है। इसी तरह अद्रैनी प्रायः त्यौहारों पर बनाई जाती है। आधा गेहूं का आटा एवं आधा बेसन मिलाकर बनाई गई पूड़ी अद्रैनी कहलाती है। इसमें अजवायन का जीरा डाला जाता है। इन सारी तैयारियों के साथ आगमन होता है बुंदेली-दिवाली का।
बुंदेलखंड में दीपावली का त्यौहार पांच दिनों तक मनाया जाता है। यह त्यौहार धनतेरस से शुरु होकर भाई दूज पर समाप्त होता है। बुंदेलखंड में दीपावली के त्यौहार की कई लोक मान्यताएं और परंपराएं हैं जो अब सिमट-सिकुड़ कर ग्रामीण अंचलों में ही रह गई हैं। जीवन पर शहरी छाप ने अनेक परंपराओं को विलुप्ति की कगार पर ला खड़ा किया है। इन्हीं में से एक परंपरा है- घर की चैखट पर कील ठुकवाने की। दीपावली के दिन घर की देहरी अथवा चैखट पर लोहे की कील ठुकवाई जाती थी। मुझे भली-भांति याद है कि पन्ना में हमारे घर भोजन बनाने का काम करने वाली जिन्हें हम ‘बऊ’ कह कर पुकारते थे, उनका बेटा लोहे की कील ले कर हमारे घर आया करता था। वह हमारे घर की देहरी पर जमीन में कील ठोंकता और बदले में मेरी मां उसे खाने का सामान और कुछ रुपए दिया करतीं। एक बार मैं उसकी नकल में कील ठोंकने बैठ गई तो मां ने डांटते हुए कहा था-‘‘यह साधारण कील नहीं है, इसे हर कोई नहीं ठोंकता है। इसे मंत्र पढ़ कर ठोंका जाता है।’’ मेरी मां दकियानूसी कभी नहीं रहीं और न ही उन्होंने कभी मंत्र-तंत्र पर विश्वास किया लेकिन परंपराओं का सम्मान उन्होंने हमेशा किया। आज भी वे दीपावली पर पूछती हैं कि कील ठोंकने वाला कोई आया क्या? लेकिन शहरीकरण की दौड़ में शामिल काॅलोनियों में ऐसी परंपराएं छूट-सी गई हैं। दीपावली के दिन गोधूलि बेला में घर के दरवाजे पर मुख्य द्वार पर लोहे की कील ठुकवाने के पीछे मान्यता थी कि ऐसा करने से साल भर बलाएं या मुसीबतें घर में प्रवेश नहीं कर पातीं हैं। बलाएं होती हों या न होती हों किन्तु घर की गृहणी द्वारा अपने घर-परिवार की रक्षा-सुरक्षा की आकांक्षा की प्रतीक रही है यह परंपरा।
        दीपावली की पूजा के लिए दीवार पर सुराती बनाने की परंपरा रही है। आज पारंपरिक रीत-रिवाजों को मानने वाले घरों अथवा गांवों में ही दीपावली की पूजा के लिए दीवार पर सुराती (सुरैती) बनाई जाती है। सुराती स्वास्तिकों को जोड़कर बनाई जाती है। ज्यामिति आकार में दो आकृति बनाई जाती हैं, जिनमें 16 घर की लक्ष्मी की आकृति होती है, जो महिला के सोलह श्रृंगार दर्शाती है। नौ घर की भगवान विष्णु की आकृति नवग्रह का प्रतीक होती है। सुराती के साथ गणेश, गाय, बछड़ा व धन के प्रतीक सात घड़ों के चित्र भी बनाये जाते हैं। दीपावली पर हाथ से बने लक्ष्मी - गणेश के चित्र की पूजा का भी विशेष महत्व है। जिन्हें बुंदेली लोक भाषा में ‘पना’ कहा जाता है। कई घरों में आज भी परंपरागत रूप से इन चित्रों के माध्यम से लक्ष्मी पूजा की जाती है।
बुंदेलखंड में दशहरा-दीपावली पर मछली के दर्शन को भी शुभ माना जाता है। इसी मान्यता के चलते चांदी की मछली दीपावली पर खरीदने और घर में सजाने की मान्यता भी बुंदेलखंड के कुछ इलाकों में है। बुंदेलखंड के हमीरपुर जिला से लगभग 40 किमी. दूर उपरौस, ब्लॉक मौदहा की चांदी की विशेष मछलियां बनाई जाती हैं। कहा जाता है कि चांदी की मछली बनाने का काम देश में सबसे पहले यहीं शुरू हुआ था। उपरौस कस्बे में बनने वाली इन मछलियों को मुगलकाल के बादशाह भी पसंद करते थे। अंग्रेजों के समय रानी विक्टोरिया भी इसकी कारीगरी देखकर चकित हो गयी थीं। जागेश्वर प्रसाद सोनी उसे नयी ऊंचाई पर ले गये। मछली बनाने वाले जागेश्वर प्रसाद सोनी की 14वीं पीढ़ी की संतान राजेन्द्र सोनी के अनुसार इस कला का उल्लेख इतिहासकार अबुल फजल ने अपनी किताब ‘‘आइने अकबरी’’ में भी किया है। उन्होंने लिखा है कि यहां के लोगों के पास बढ़िया जीवन व्यतीत करने का बेहतर साधन है, इसके बाद उन्होंने चांदी की मछली का उल्लेख किया और इसकी कारीगरी की प्रशंसा भी की है। इसके बाद सन् 1810 में रानी विक्टोरिया भी इस कला को देखकर आश्चर्यचकित हो गयी थीं। उन्होंने सोनी परिवार के पूर्वज स्वर्णकार तुलसी दास को इसके लिए सम्मानित भी किया था। राजेंद्र सोनी के अनुसार दीपावली के समय चांदी की मछलियों की मांग बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। क्योंकि मछली को लोग शुभ मानते हैं और चांदी को भी। उनके अनुसार धीरे-धीरे ये व्यापार सिमटता जा रहा है। कभी लाखों रुपए में होने वाला ये कारोबार अब संकट में है और चांदी की मछलियों की परंपरा समापन की सीमा पर खड़ी है।
कुछ परंपराएं भले ही छूट रही हों, कुछ मान्यताएं भले ही बदल रही हों किन्तु बुंदेलखंड का विस्तृत भू-भाग आज भी दीपावली के लुप्त हो चले अनेक रिवाजों को अपने सीने से लगाए हुए है और उन्हें संरक्षित करने के लिए सतत् प्रयत्नशील है। ये रोचक परंपराएं हमें हमारे सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़े रखती हैं और हमारी सांस्कृतिक विशिष्टता को संजोए रखती हैं। यह याद रखने की बात है कि प्रकृति, समाज और प्रसन्नता से जुड़ी परंपराएं न तो कभी हानिकारक होती हैं और न कभी पुरानी पड़ती हैं, अपितु ये परंपराएं हमारे जातीय स्वाभिमान को बचाए रखती हैं। दीपावली पर खुले आंगन में गोबर की लिपावट की सोंधी गंध भले ही सिमट रही हो किन्तु उस पर पूरे जाने वाले चैक, सातियां, मांडने आज भी आधुनिक बुंदेली घरों के चिकने टाईल्स वाले फर्श पर राज कर रहे हैं। जब तक दीपावली के दीपक जगमगाते रहेंगे, हमारी परंपराएं भी हमारे साथ चलती रहेंगी।
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Wednesday, October 20, 2021

चर्चा प्लस | वाल्मीकि जयंती विशेष | महर्षि वाल्मीकि और रामकथा की वैश्विक महत्ता | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस
20 अक्टूबर: वाल्मीकि जयंती विशेष
महर्षि वाल्मीकि और रामकथा की वैश्विक महत्ता
  - डाॅ. शरद सिंह
      रामकथा के लिए समूचा विश्व महर्षि वाल्मीकि का ऋणी है। विश्व-इतिहास और विश्व-साहित्य में राम के समान अन्य कोई पात्र कभी नहीं रहा। रामकथा की अपनी एक वैश्विक सत्ता है, अपनी एक अलग पहचान है। लेकिन इसके मूल में वाल्मीकि की वही द्रवित अनुभूति है जो क्रौंच पक्षी के वध से उपजी थी। किसी पक्षी का बहेलिए द्वारा मारा जाना उस समय आम बात थी लेकिन पक्षी के वध को देख कर रामकथा लिख डालना अद्भुत घटना थी।


कौन जानता था कि एक पक्षी के मारे जाने से उपजी पीड़ा साहित्य और धर्म के लिए एक वरदान साबित होगी।  हुआ यह कि एक दिन दोपहर को वाल्मीकि तमसा नदी के किनारे प्रकृति की सुंदरता का आनंद ले रहे थे। वाल्मीकि ने देखा कि क्रौंच पक्षी का एक जोड़ा नदी तट पर कल्लोल कर रहा है। इतने में नर क्रौंच को बहेलिए का तीर आ लगा और वह गिरकर छटपटाने लगा। देखते ही देखते उसने प्राण त्याग दिए। अपने साथी की यह दशा देखकर मादा क्रौंच बड़े करुण स्वर में रोने लगी। यह दृश्य देखकर वाल्मीकि का हृदय द्रवित हो उठा। उसी क्षण उनके हृदय की करुणा एक श्लोक के रूप में फूट पड़ी-

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाष्वती समाः
यत् क्रौंच-मिथुनादेकमवधिः काम-मोहितम्
(हे निषाद ! तुझे नित्य निरंतर कभी भी शांति न मिले क्योंकि काम में मोहित हो रहे क्रौंच पक्षी के जोड़े में से तूने बिना अपराध ही एक ही हत्या कर डाली।)  इस घटना के बाद वाल्मीकि ने ‘‘रामायण’’ की रचना की। सम्पूर्ण विश्व को रामकथा से परिचित कराने का प्रथम श्रेय महर्षि वाल्मीकि को ही जाता है। रामकथा को वैश्विक स्तर पर जो प्रतिष्ठा और लोकप्रियता मिली है वह इसकी मूल्यवत्ता को स्वतः सिद्ध करती है और महर्षि वाल्मीकि का ऋणी बनाती है। विश्व-इतिहास और विश्व-साहित्य में राम के समान अन्य कोई पात्र कभी नहीं रहा। रामकथा की अपनी एक वैश्विक सत्ता है, अपनी एक अलग पहचान है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि  रामकथा मात्र एक कथा नहीं वरन् जीवन जीने की सार्वभौमिक शैली है। इसमें मानवीय पारिवारिक संबंधों से ले कर जड़ एवं चेतन के पारस्परिक संबंधों की भी समुचित व्याख्या की गई है। रामकथा की यह भी विशेषता है कि इस पृथ्वी का कोई ऐसा तत्व नहीं है जो प्राणिरूप में इसमें समावेशित नहीं किया गया हो। प्राणहीन पाषाण अहिल्या के रूप में जीवन्त हो उठता है तो मृतकों की देह को खाने वाला गिद्ध पक्षी जटायु के रूप में श्रीराम और सीता की सहायता में दौड़ पड़ता है। समुद्र संवाद करता है तो जगत में उद्दण्ड प्राणी के रूप में पहचाने जाने वाले वानर रूपी बालि और सुग्रीव के रूप में न केवल शासनकत्र्ता के रूप में मिलते हैं वरन् समुद्र पर सेतु बांधने का अनुशासित कार्य भी करते दिखते हैं। स्त्री और पुरुष के इतने विविध रूप इस कथा में हैं जो किसी अन्य कथा में देखने को नहीं मिलते हैं।  यह एक ऐसी कथा है जिसमें श्रीराम मर्यादा पुरुषोत्तम, आदर्श राजा, आज्ञाकारी पुत्र और आदर्श पति होने के साथ ही महान योद्धा भी हैं। वे धैर्यवान हैं तो भावुक भी हैं। राम एक ऐसे चरित्र हैं जिनकी दृष्टि में कोई छोटा या बड़ा नहीं है, कोई अस्पृश्य नहीं है और न ही कोई उपेक्षित है। रामकथा में श्रीराम के द्वारा अधर्म पर धर्म की और असत्य पर सत्य की विजय की जिस प्रकार स्थापना की गई है उससे समूचा विश्व प्रभावित होता आया है।
वाल्मीकि रचित रामायण अतिरिक्त भारत में जो अन्य रामायण लोकप्रिय हैं, उनमें ‘अध्यात्म रामायण’, ‘आनन्द रामायण’, ‘अद्भुत रामायण’, तथा तुलसीकृत ‘रामचरित मानस’ आदि विशेष उल्लेखनीय हैं। वाल्मीकिकृत रामायण के उपरान्त रामकथा में दूसरा प्राचीन ग्रन्थ है ‘अध्यात्म रामायण’। वाल्मीकिकृत रामायण में जहां हमें मानवीय तत्व अधिक दिखाई देता है, वहीं ‘अध्यात्म रामायण’ में राम का ईश्वरीय तत्व सामने आता है। इसीलिए ‘आध्यात्म रामायण’ को विद्वानों द्वारा ‘ब्रह्मांड-पुराण’ के उत्तर-खंड के रूप में भी स्वीकारा किया गया है। वहीं, ‘आनन्द रामायण’ में भक्ति की प्रधानता है। इसमें राम की विभिन्न लीलाओं तथा उपासना सम्बन्धी अनुष्ठानों की विशेष चर्चा है। ‘अद्भुत रामायण’ में रामकथा के कुछ नए कथा-प्रसंग मिलते हैं। इसमें सीता माता की महत्ता विशेष रूप में प्रस्तुत की गयी है। उन्हें ‘आदिशक्ति और आदिमाया’ बतलाया गया है, जिसकी स्तुति स्वयं राम भी सहस्रनाम स्तोत्र द्वारा करते हैं। लोकभाषा में होने के कारण तुलसीकृत ‘रामचरित मानस’ की लोकप्रियता आधुनिक समाज में सर्वाधिक है। इसने रामकथा को जनसाधारण में अत्यधिक लोकप्रिय बना दिया। इसमें भक्ति-भाव की प्रधानता है तथा राम का ईश्वरीय रूप अपनी समग्रता के साथ सामने आया है। वस्तुतः ‘रामचरित मानस’ उत्तर भारत में रामलीलाओं के मंचन का आधार बनी।
रामकथा ने भारतीय मात्र भू-भाग पर ही राज नहीं किया अपितु भारत की सीमाओं को लांघती हुई उसने विदेशों में भी अपनी सत्ता स्थापित की। राजनीतिक सत्ता को परिवर्तन यानी तख़्तापलट का भय होता है किन्तु ज्ञान की सत्ता को चिरस्थायी होती है, उसे किसी प्रकार का भय नहीं होता। इसीलिए जिन देशों में धार्मिक एवं राजनीतिक परिवर्तन हुए तथा भीषण रक्तपात हुए वहां भी रामकथा ने अपना प्रभाव सतत बनाए रखा। प्राचीन भारत और उसके निकटवर्ती क्षेत्रों में आर्य संस्कृति तथा उसके साथ रामकथा का जो प्रचार-प्रसार हुआ, वह आज भी यथावत स्थित है। युग, परिस्थिति और धर्म परिवर्तन के बावजूद विभिन्न क्षेत्रों में रामकथा के प्रभाव में कोई कमी नहीं आयी है। इसके विपरीत उसमें वृद्धि ही हुई है। मुस्लिम बहुल इंडोनेशिया में तो रामायण को राष्ट्रीय पवित्र पुस्तक का गौरव प्राप्त है। भारत के न्यायालयों में जो स्थान ‘भगवद्गीता’ को प्राप्त है, इंडोनेशिया में वहीं स्थान ‘रामायण’ को मिला हुआ है। वहां ‘रामायण’ पर हाथ रखकर सत्यता की शपथ ली जाती है। इंडोनेशिया में प्रचलित रामकथा के ग्रन्थ का नाम है ‘काकाविन रामायण’। इसमें 26 सर्ग तथा 2778 पद हैं। ‘काकाविन रामायण’ के आधार पर इंडोनेशिया में राम की अनेक प्राचीन प्रतिमाएं मिलती हैं।
एशिया के अनेक देशों में रामकथा प्रचलित है जिसमें वहां की जीवन, धर्म, संस्कृति की दलग ही छाप है। जिसके कारण रामकथा को एक वैश्वि स्वरूप मिला है। जिन देशों में लगभग सौ वर्ष से भी पहले पहले राम-कथा पहुंची, उसमें चीन, तिब्बत, जापान, इण्डोनेशिया, थाईलैंड, लाओस, मलेशिया, कम्बोडिया, श्रीलंका, फिलीपिन्स, म्यानमार, रूस आदि देश प्रमुख हैं।
जापान में 12वीं शताब्दी में रचित ‘होबुत्सुशु’ नामक ग्रन्थ में रामायण की कथा जापानी में मिलती है। लेकिन ऐसे प्रकरण भी हैं, जिनसे कहा जा सकता है कि जापानी इससे पूर्व भी राम-कथा से परिचित थे। वैसे आधुनिक अनुसंधानों से यह ज्ञात हुआ कि विगत एक हजार वर्ष से प्रचलित ‘दोरागाकु’ नाट्य-नृत्य शैली में राम-कथा मिलती है। 10 वीं शताब्दी में रचे ग्रन्थ ‘साम्बो-ए-कोताबा’ में दशरथ और श्रवणकुमार का प्रसंग मिलता है। ‘होबुत्सुशु’ की राम-कथा और ‘रामायण’ की कथा में भिन्न है। जापानी कथा में शाक्य मुनि के वनगमन का कारण निरर्थक रक्तपात को रोकना है। वहां लक्ष्मण साथ नहीं है, केवल सीता ही उनके साथ जाती है। सीता-हरण में स्वर्ण-मृृग का प्रसंग नहीं है, अपितु रावण योगी के रूप में राम का विश्वास जीतकर उनकी अनुपस्थिति में सीता को उठाकर ले जाता है। रावण को ड्रैगन (सर्पराज)-के रूप में चित्रित किया गया है, जो चीनी प्रभाव है। यहां हनुमान के रूप में शक्र (इन्द्र) हैं और वही समुद्र पर सेतु-निर्माण करते हैं। कथा का अन्त भी मूल राम-कथा से भिन्न है।
इंडोनेशिया में बाली का हिंदू और जावा-सुमात्रा के मुस्लिम, दोनों ही राम को अपना नायक मानते हैं। जाकार्ता से लगभग 15 मील की दूरी पर स्थित प्राम्बनन का मंदिर इस बात का साक्षी है, जिसकी प्रस्तर भित्तियों पर संपूर्ण रामकथा उत्कीर्ण है।
थाईलैंड में रामकथा को इस तरह आत्मसात किया गया कि उन्हें धीरे-धीरे यह लगने लगा कि राम-कथा की सृजन उनके ही देश में हुआ था। वहां जब भी नया शासक राजसिंहासन पर आरूढ़ होता है, वह उन वाक्यों को दोहराता है, जो राम ने विभीषण के राजतिलक के अवसर पर कहे थे।  यह मान्यता है कि वहां राम के छोटे पुत्र कुश के वंशज सम्राट “भूमिबल अतुल्य तेज” राज्य कर रहे हैं, जिन्हें नौवां राम कहा जाता है। थाईलैंड में “अजुधिया” “लवपुरी” और “जनकपुर” जैसे नाम वाले शहर हैं। सन् 1340 ई. में राम खरांग नामक राजा के पौत्र थिवोड ने राजधानी सुखोथाई (सुखस्थली) को छोड़कर ‘अयुधिया’ अथवा ‘अयुत्थय’ (अयोध्या) की स्थापना की थी। उल्लेखनीय है कि राम खरांग के पश्चात् राम प्रथम, राम द्वितीय के क्रम में नौ शासकों के नाम राम-शब्द की उपाधि से विभूषित रहे। थाईलैंड में रामकथा पर आधारित ग्रंथ ‘रामकियेन’ है। ‘रामकियेन’ का अर्थ होता है राम की कीर्ति। भारतीय ‘रामलीला’ की भांति ‘रामकियेन’ नाट्यरूप में भी लोकप्रिय है।
यह बात अकाट्य रूप से कही जा सकती है कि रामकथा की वैश्विकसत्ता अद्वितीय है और वैश्विक जनमानस को जिस कथा ने सर्वाधिक प्रभावित किया है वह रामकथा ही है। यह भी उतना ही अकाट्य है कि यदि महर्षी वाल्मीकि ने ‘‘रामायण’’ लिख कर रामकथा को महाकाव्य में निबद्ध नहीं किया होता तो शायद आज विश्व रामकथ से इतनी समग्रता से परिचित नहीं हो पाता क्यों कि दुनिया भर की रामकथाएं वाल्मीकिकृत ‘‘रामायण’’ पर ही आधारित हैं।
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(सागर दिनकर, 20.10.2021)
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Wednesday, October 13, 2021

चर्चा प्लस | स्त्रीशक्ति का प्रतीक हैं माता दुर्गा | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस 
स्त्रीशक्ति का प्रतीक हैं माता दुर्गा
  - डाॅ. शरद सिंह                            
नवरात्रि...नौ दिन देवी दुर्गा के नौ रूपों की स्तुति... दुर्गा जो स्त्रीशक्ति का प्रतीक हैं, असुरों का विनाश करने की क्षमता रखती हैं... किन्तु इस बात पर विश्वास करना ही र्प्याप्त है क्या? सिर्फ़ सोचने या मानने से नहीं बल्कि करने से कोई भी कार्य पूरा होता है। इसलिए यदि आज स्त्री प्रताड़ित है, अपराधों का शिकार हो रही है तो उसे अपनी शक्ति को पहचानते हुए स्वयं दुर्गा की शक्ति में ढलना होगा। डट कर समाना करना होगा स्त्रीजाति के विरुद्ध की समस्त बुराइयों का और स्त्री का सम्मान करना सीखना होगा समस्त पुरुषों को, तभी नवरात्रि का अनुष्ठान सार्थक होगा।


या देवि सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।
मां दुर्गा की उपासना करते समय जिस स्त्रीशक्ति का बोध होता है वह उपासना के बाद स्मरण क्यों नहीं रहता? न स्त्रियों को और न पुरुषों को। समाचारपत्रों में आए दिन स्त्री के विरुद्ध किए गए जघन्य अपराधों के समाचारों भरे रहते हैं। कभी तेजाब कांड तो कभी दहेज हत्या तो कभी बलात्कार और बलात्कार के बाद नृशंसतापूर्वक हत्या। ये घटनाएं हरेक पाठक के दिल-दिमाग़ को झकझोरती हैं। बहुत बुरा लगता है ऐसे समाचारों को पढ़ कर। समाज में आती जा रही चारित्रिक गिरावट को देख कर अत्यंत दुख भी होता है लेकिन सिर्फ़ शोक प्रकट करने या रोने से समस्या का समाधान नहीं निकलता है। देवी दुर्गा का दैवीय चरित्र हमें यही सिखाता है कि अपराधियों को दण्डित करने के लिए स्वयं के साहस को हथियार बनाना पड़ता है। जिस महिषासुर को देवता भी नहीं मार पा रहे थे उसे देवी दुर्गा ने मार कर देवताओं को भी प्रताड़ना से बचाया। नवरात्रि के दौरान लगभग हर हिन्दू स्त्री अपनी क्षमता के अनुसार दुर्गा के स्मरण में व्रत, उपवास पूजा-पाठ करती है। अनेक महिला निर्जलाव्रत भी रखती हैं। पुरुष भी पीछे नहीं रहते हैं। वे भी पूरे समर्पणभाव से मां दुर्गा की स्तुति करते हैं। नौ दिन तक चप्पल-जूते न पहनना, दाढ़ी नहीं बनाना आदि जैसे सकल्पों का निर्वाह करते हैं। लेकिन वहीं जब किसी स्त्री को प्रताड़ित किए जाने का मामला समाने आता है तो अधिकांश स्त्री-पुरुष तटस्थ भाव अपना लेते हैं। उस समय गोया यह भूल जाते हैं कि आदि शक्ति दुर्गा के चरित्र से शिक्षा ले कर अपनी शक्ति को भी तो पहचानना जरूरी है।
किसी भी प्रकार की प्रताड़ना या हिंसा का स्त्रीसमाज पर शारीरिक, मानसिक तथा भावनात्मक दुष्प्रभाव पड़ता है। इसके कारण महिलाओं के काम तथा निर्णय लेने की क्षमता पर प्रभाव पड़ता है। परिवार में आपसी रिश्तों और आसपड़ौस के साथ रिश्तों व बच्चों पर भी इस हिंसा का सीधा दुष्प्रकभाव देखा जा सकता है। इससे स्त्रियों की सार्वजनिक भागीदारी में बाधा पड़ती है और वे स्वयं को अबला समझने लगती हैं। जबकि इसके विपरीत मां दुर्गा का चरित्र उन्हें दृढ़ और सबल होने का संदेश देता है।
हिन्दुओं के शाक्त साम्प्रदाय में भगवती दुर्गा को ही दुनिया की पराशक्ति और सर्वोच्च देवता माना जाता है। उल्लेखनीय है कि शाक्त साम्प्रदाय ईश्वर को देवी के रूप में मानता है। वेदों में तो दुर्गा का व्यापाक उल्लेख है। उपनिषद में देवी दुर्गा को “उमा हैमवती“ अर्थात् हिमालय की पुत्री कहा गया है। वहीं पुराणों में दुर्गा को आदिशक्ति माना गया है। वैसे दुर्गा शिव की अर्द्धांगिनी पार्वती का एक रूप हैं, जिसकी उत्पत्ति राक्षसों का नाश करने के लिये देवताओं की प्रार्थना पर पार्वती ने धारण किया था देवी दुर्गा के और भी कई रूपों की कल्पना की गई है। दुर्गा सप्तशती में दुर्गा के कई रूप भी बताए गए है, जैसे- ब्राह्मणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, नरसिंही, ऐन्द्री, शिवदूती, भीमादेवी, भ्रामरी, शाकम्भरी, आदिशक्ति, रक्तदन्तिका।
दुर्गा सप्तशती में कुल 13 अध्याय हैं, जिसमें 700 श्लोकों में देवी-चरित्र का वर्णन है। मुख्य रूप से ये तीन चरित्र हैं, प्रथम चरित्र (प्रथम अध्याय), मध्यम चरित्र (2-4 अध्याय) और उत्तम चरित्र (5-13 अध्याय)। प्रथम चरित्र की देवी महाकाली, मध्यम चरित्र की देवी महालक्ष्मी और उत्तम चरित्र की देवी महासरस्वती मानी गई है। यहां दृष्टव्य है कि महाकाली की स्तुथति मात्र एक अध्याय में, महालक्ष्मी की स्तुति तीन अध्यायों में और महासरस्वती की स्तुति नौ अध्यायों में वर्णित है, जो सरस्वती की वरिष्ठता, काली (शक्ति) और लक्ष्मी (धन) से अधिक सिद्ध करती है। मां दुर्गा के तीनों चरित्रों से संबंधित तीन रोचक कहानियां भी हैं जो
प्रथम चरित्र - बहुत पहले सुरथ नाम के राजा राज्य करते थे। शत्रुओं और दुष्ट मंत्रियों के कारण उनका राज्य, कोष सब कुछ हाथ से निकल गया। वह निराश होकर वन से चले गए, जहां समाधि नामक एक वैश्य से उनकी भेंट हुई। उनकी भेंट मेधा नामक ऋषि के आश्रम में हुई। इन दोनों व्यक्तियों ने ऋषि से पूछा कि यद्यपि हम दोनों के साथ अपने लोगों (पुत्र, मंत्रियों आदि) ने दुर्व्यवहार किया है फिर भी उनकी ओर हमारा मन लगा रहता है। मुनिवर, क्या कारण है कि ज्ञानी व्यक्तियों को भी मोह होता है। ऋषि ने कहा कि यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है, भगवान विष्णु की योगनिद्रा ज्ञानी पुरुषों के चित्त को भी बलपूर्वक खींचकर मोहयुक्त कर देती है, वहीं भगवती भक्तों को वर देती है और ’परमा’ अर्थात ब्रह्म ज्ञानस्वरूपा मुनि ने कहा, ’नित्यैव सा जगन्मूर्तिस्तया सर्वमिद ततम्’ अर्थात वह देवी नित्या है और उसी में सारा विश्व व्याप्त है। प्रलय के पश्चात भगवान विष्णु योगनिद्रा में निमग्न थे तब उनके कानों के मैल से मधु और कैटभ नाम के दो असुर उत्पन्न हुए। उन्होंने ब्रह्माजी को आहार बनाना चाहा। ब्रह्माजी उनसे बचने के लिए योगनिद्रा की स्तुति करने लगे। तब देवी योगनिद्रा उन दोनों असुरों का संहार किया।
मध्यम चरित्र - इस चरित्र में मेधा नामक ऋषि ने राजा सुरथ और समाधि वैश्य के प्रति मोहजनित कामोपासना द्वारा अर्जित फलोपभोग के निराकरण के लिए निष्काम उपासना का उपदेश दिया है। प्राचीनकाल में महिषासुर सभी देवताओं को हराकर स्वयं इन्द्र बन गया और सभी देवताओं को स्वर्ग से बाहर निकाल दिया। वे सभी देवता- ब्रह्मा, विष्णु और शंकर के पास सहायतार्थ गए। उनकी करुण कहानी सुनकर विष्णु और शंकर के मुख से तेज प्रकट हुआ। इसी प्रकार का तेज अन्य देवताओं के शरीर से भी निकला। यह सब एक होकर देवी रूप में परिणित हुआ। इस देवी ने महिषासुर और उनकी सेना का नाश किया। देवताओं ने अपना अभीष्ट प्राप्त कर, देवी से वर मांगा। ’जब-जब हम लोगों पर विपत्तियां आएं, तब-तब आप हमें आपदाओं से विमुक्त करें और जो मनुष्य आपके इस चरित्र को प्रेमपूर्वक पढ़ें या सुनें वे संपूर्ण सुख और ऐश्वर्यों से संपन्न हों।’ महिषासुर को मार कर देवी ‘महिषासुरमर्दिनी’ कहलाईं।
उत्तम चरित्र - उत्तम चरित्र में परानिष्ठा ज्ञान के बाधक आत्म-मोहन, अहंकार आदि के निराकरण का वर्णन है। पूर्व काल में शुंभ और निशुंभ नामक दो असुर हुए। उन्होंने इन्द्र आदि देवताओं पर आधिपत्य कर लिया। बार-बार होते इस अत्याचार के निराकरण के लिए देवता दुर्गा देवी की प्रार्थना हिमालय पर्वत पर जाकर करने लगे। देवी प्रकट हुई और उन्होंने देवताओं से उनकी प्रार्थना करने का कारण पूछा। कारण जानकर देवी ने परम सुंदरी ’अंबिका’ रूप धारण किया। इस सुंदरी को शुंभ-निशुंभ के सेवकों चंड और मुंड ने देखा। इन सेवकों से शुंभ-निशुंभ को सुंदरी के बारे में जानकारी मिली और उन्होंने सुग्रीव नामक असुर को अंबिका को लाने के लिए भेजा। देवी ने सुग्रीव से कहा, ’जो व्यक्ति युद्ध में मुझ पर विजय प्राप्त करेगा, उसी से मैं विवाह करूंगी।’ दूत के द्वारा अपने स्वामी की शक्ति का बार-बार वर्णन करने पर देवी उस असुर के साथ नहीं गई। तब शुंभ-निशुंभ ने सुंदरी को बलपूर्वक खींचकर लाने के लिए धूम्रलोचन नामक असुर को आदेश दिया। धूम्रलोचन देवी के हुंकार मात्र से भस्म हो गया। फिर चंड-मुंड दोनों एक बड़ी सेना लेकर आए तो देवी ने असुर की सेना का विनाश किया और चंड-मुंड का शीश काट दिया, जिसके कारण देवी का नाम ’चामुंडा’ पड़ा। असुर सेना का विनाश करने के बाद देवी ने शुंभ-निशुंभ को संदेश भेजा कि वे देवताओं को उनके छीने अधिकार दे दें और पाताल में जाकर रहें, परंतु शुंभ-निशुंभ मारे गए। रक्तबीज की विशेषता थी कि उसके शरीर से रक्त की जितनी बूंदें पृथ्वी पर गिरती थीं, उतने ही रक्तबीज फिर से उत्पन्न हो जाते थे। देवी ने अपने मुख का विस्तार करके रक्तबीज के शरीर का रक्त को अपने मुख में ले लिया और असुर का सिर काट डाला। इसके पश्चात शुंभ और निशुंभ भी मारे गए और तब देवताओं ने स्तुति की-
सर्वाबाधा प्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरी।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरी विनाशम्।।
हमें यह विचार करना ही होगा कि पूजा-अर्चना द्वारा हम देवी के इन चरित्रों का आह्वान करते हैं तो फिर देवी के इन चरित्रों से प्रेरणा ले कर उन लोगों पर शिकंजा क्यों नहीं कस पाते हैं जो असुरों जैसे कर्म करते हैं? क्या हम इन प्रेरक कथाओं के मर्म को समझ नहीं पाते हैं अथवा समझना ही नहीं चाहते हैं? बहरहाल, एक और रोचक कथा है- राजा सुरथ और समाधि वैश्य दोनों ने देवी की आराधना की। देवी की कृपा से सुरथ को उनका खोया राज्य और वैश्य का मनोरथ पूर्ण हुआ। उसी प्रकार जो व्यक्ति भगवती की आराधना करते हैं उनका मनोरथ पूर्ण होता है। ऐसी मान्यता है कि दुर्गा सप्तशती के केवल 100 बार पाठ करने से सर्वार्थ सिद्धि प्राप्त होती है। इस मान्यता को व्यवहारिकता में ढालते हुए यदि स्त्रियों के हित में अपनी शक्ति को पहचान कर अपराधों का प्रतिकार किया जाए तो यह मां दुर्गा की सच्ची स्तुति होगी।
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(सागर दिनकर, 13.10.2021)
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Wednesday, October 6, 2021

चर्चा प्लस | जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए स्मार्ट समाधान है शहरी वन | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस 
जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए स्मार्ट समाधान है शहरी वन
- डाॅ. शरद सिंह                            
शहर में मनुष्यों की आबादी कितनी है, यह जनसंख्या गणना से हमेशा पता चलता रहता है। लेकिन शहर में वृक्षों की संख्या कितनी है? इस बारे में न कोई पूछता है और न कोई जानना चाहता है। सड़कें चैड़ी करने के लिए वृक्ष कटते हैं, रिहायशी और व्यावसायिक भवन बनाने के लिए वृक्ष काटे जाते हैं। बदले में कितने वृक्ष शहर के अन्दर लगाए जाते हैं? आंकड़ा पता नहीं। जबकि बेतहाशा कार्बन उत्सर्जन और बढ़ते तापमान की हानि से कोई बचा सकता है तो सिर्फ़ वृक्ष। इसीलिए सरकार ने ‘शहरी वन’ की योजना बनाई। किन्तु कहां हैं वे शहरी वन?

‘शहरी वन’ की आवश्यकता पर चर्चा करने से पहले ज़रा याद करिए अक्टूबर 2019 की वह घटना जब उपनगरीय मुंबई की आरे मिल्क कॉलोनी, जिसे शहर के ‘ग्रीन लंग’ के रूप में जाना जाता रहा है, शहरी विकास का शिकार हुई। दरअसल मुंबई मेट्रो रेल कॉरपोरेशन ने ट्रेन डिपो के लिए मार्ग प्रशस्त करने के लिए इस क्षेत्र में 3,000 पेड़ों को काट दिया। एक वैज्ञानिक रिपोर्ट के अनुसार, यह जगह तितलियों की 86 प्रजातियों, मकड़ियों की 90 प्रजातियों, सरीसृपों की 46 प्रजातियों, जंगली फूलों की 34 प्रजातियों और नौ तेंदुओं का घर है। इसको लेकर सार्वजनिक आक्रोश सामने आया। सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार से हस्तक्षेप करने के लिए कहा। लेकिन तब तक मुंबई मेट्रो ने आवश्यक भूमि को खाली करने के लिए पर्याप्त पेड़ काट दिए थे। हम सभी नागरिक विकास और हरियाली में तालमेल की बात करते हैं लेकिन सच तो ये है कि आज भी हम में हरित क्षेत्रों और प्राकृतिक बुनियादी ढांचे के रूप में जंगलों के मूल्य की बहुत कम समझ है जो शहर के निवासियों को स्वच्छ हवा, भूजल पुनर्भरण, बाढ़ नियंत्रण, वन्यजीव आवास और प्राकृतिक मनोरंजन क्षेत्रों जैसे पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएं प्रदान करता है। विडंबना यह कि वन विभाग, जिनके पास यह समझ है, उसकी हैसियत राज्यों और शहरों के टाउन प्लानिंग वाले विभागों की तुलना में कम है। यूं भी शहरों के फैलाव से वनपरिक्षेत्र सिकुड़ता जा रहा है।
आम नागरिकों को यह बात लगभग पता ही नहीं है कि भारत सरकार शहरों के विकास और बदलाव की प्रक्रिया को सतत और पर्यावरण हितैषी बनाने के लिये अत्याधुनिक तकनीक पर आधारित ‘स्मार्ट समाधान’ को बढ़ावा देने पर जोर दे रही है। पर्यावरणीय प्रबंधन और जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने के लिये समाज के सभी वर्गों, संगठनों और सरकारी संस्थाओं के समन्वित प्रयासों की जरूरत को महसूस कर रही है। केन्द्र सरकार का पूरा ध्यान उन योजनाओं को बढ़ावा देने पर है जो पर्यावरण हितैषी हों। जिससे शहरों को जलवायु परिवर्तन के संभावित परिणामों के अनुकूल बनाया जा सके। इसके लिये सरकार अत्याधुनिक तकनीक आधारित ‘स्मार्ट समाधान’ को बढ़ावा दे रही है।
सन् 2016 में, भारत के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने मुंबई के बोरीवली में संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान में एक समारोह में शहरी वन परियोजना योजना शुरू की थी। ऐसा कोई सरकारी आंकड़ा भी उपलब्ध नहीं है जिससे यह पता चल सके कि 2016 से 2020 के बीच 200 सिटी फॉरेस्ट वाली योजना ने कितना लक्ष्य प्राप्त किया। इसके बाद पिछले वर्ष, 5 जून 2020 को यानी विश्व पर्यावरण दिवस को एक वर्चुअल उत्सव के दौरान मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने शहरी वन परियोजना की एक बार फिर शुरुआत की। इस योजना का लक्ष्य अगले पांच वर्षों में देश भर के 200 शहरों में शहरी वन क्षेत्र विकसित करना है।
देखा जाए तो शहरी वन योजना जलवायु परिवर्तन की गति को धीमा करने और शहरी प्रदूषण को कम करने की दिशा में बहुत ही कारगर योजना है। शहरी वन शहरों के जलवायु को सुधार सकते हैं। शहरों में तापमान को कम करने में वृक्ष सबसे अधिक मदद करते हैं। शहरों में कंक्रीट से बनी इमारतों और सड़कों से निकलने वाली गर्मी उन्हें आसपास के देहात के इलाकों की तुलना में अधिक गर्म बना देती है। वे ओजोन, सल्फर डाइऑक्साइड और पार्टिकुलेट मैटर के स्तर को भी कम कर देते हैं। इसके अलावा वायुमंडल से बड़ी मात्रा में कार्बन डाइ ऑक्साइड को हटाकर ऑक्सीजन देते हैं। इस कार्बनडाई आॅक्साईड को सोख कर आॅक्सीजन बढ़ाने का काम करते हैं वृक्ष। ये वृक्ष शहरी वन के रूप में याहरों के जीवन की अभिन्न हिस्सा बन सकते हैं। वनपरिक्षेत्रों के घटने से जो नुकसान हो रहा है उसकी भरपाई भी शहरी वन कर सकते हैं। दुनिया भर में बड़े शहरों में इस प्रकार के शहरी वन बहुत तेजी से विकसित किये जा रहे हैं। सियोल, सिंगापुर और बैंकॉक ने अपने शहर के निवासियों के जीवन में सुधार करते हुए प्रकृति और वन्य जीवन के लिए जगह प्रदान करने वाले ग्रीन कॉरिडोर्स बनाए हैं।
शहरी वन विकसित करने में प्राइवेट सेक्टर की सहभागिता महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। इसके लिए पुणे में वारजे शहरी वन के मॉडल को अपनाया जा सकता है। यह महाराष्ट्र की पहली शहरी वानिकी परियोजना है जिसे टेरी द्वारा विकसित किया गया था, जो एक गैर-लाभकारी संस्था है। इसको टाटा मोटर्स के साथ एक सार्वजनिक-निजी भागीदारी मॉडल के तहत एक कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी पहल के तहत इसे विकसित किया गया था। झुग्गियों और बिल्डरों द्वारा वन विभाग की 16 हेक्टेयर बंजर जमीन का अतिक्रमण कर लिया गया था जिसे जैव विविधता के सम्पन्न रमणीय स्थल में तब्दील कर दिया गया। यह 10,000 से अधिक स्वदेशी पौधों की प्रजातियों, 29 स्थानीय पक्षी प्रजातियों, 15 तितली प्रजातियों, 10 सरीसृप प्रजातियों और तीन स्तनपायी प्रजातियों की मेजबानी करता है। कई अन्य अच्छे उदाहरण हैं। शिमला में लगभग 1,000 हेक्टेयर के एक अभ्यारण्य है जो 1890 के दशक में नगर निकाय द्वारा प्रबंधित शिमला पेयजल जलग्रहण वन के रूप में शुरू हुआ था। दक्षिण-पूर्व दिल्ली में, असोला भट्टी वन्यजीव अभयारण्य को गांव की आम भूमि से आरक्षित वन क्षेत्र में ले जाया गया और फिर इसे एक अभयारण्य के रूप में तब्दील कर दिया गया। दिल्ली के अरावली और यमुना जैव विविधता पार्क ने भी शहर में इन क्षेत्रों के प्राकृतिक आवासों और पारिस्थितिकी प्रणालियों को सफलतापूर्वक दोबारा स्थापित किया है। इसी तरह, गुड़गांव के अरावली जैव विविधता पार्क को नगर निगम, नागरिक समाज, निगमों और निवासियों के बीच एक अनूठी साझेदारी द्वारा वनों को देशी प्रजातियों के लिए एक आश्रय के रूप में तब्दील गया था। अब इसमें लगभग 200 पक्षी प्रजातियों को आकर्षित करने वाले सैकड़ों फूल, पेड़ और झाड़ियां हैं।
शहरी वन परियोजना के लिए जापान की मियावाकी पद्धति को एक अच्छे मौडल के रूप में देखा जा रहा है। इसे जापानी वनस्पति शास्त्री अकीरा मियावाकी द्वारा निर्देशित किया गया है। इसे स्थानीय परिस्थितियों के लिए स्वदेशी प्रजातियों के साथ अनुकूलित किया जा सकता है। मियावाकी वन एक उष्णकटिबंधीय वर्षावन की प्रतिकृति बनाते हैं। इसमें छोटे वृक्ष नीचे और ऊंची-ऊंची छतरियों वाली प्रजातियां ऊपर होती हैं। पारंपरिक वानिकी में, एक एकड़ में लगभग 1,000 पेड़ उगाए जाते हैं। हम मियावाकी के तहत इतने ही क्षेत्र में 12,000 पौधे लगाते हैं, जो 10 वर्षों में 100 साल पुराने जंगल का लाभ पैदा करता है।
अब बात मध्यप्रदेश के सागर जैसे मझोले कद के शहरों की की जाए तो यह शहर फिलहाल औद्योगिक प्रदूषण से दूर है लेकिन आर्थिक विकास के लिए हमेशा उद्योगों से दूर नहीं रहा जा सकता है। इस शहर ने भवन निर्माण, सड़कों के चैड़ीकरण  आदि में अपने अनेक वृक्षों को गंवाया है। सागर जैसे शहरों में आबादी और वाहनों की तुलना में वृक्षों की संख्या न्यूनतम है। जब से स्मार्टसिटी योजना लागू हुई है तब से कचरा प्रबंधन की ओर तत्परता से ध्यान दिया जाने लगा है। गाड़ियों से होने वाले प्रदूषण पर भी जागरूकता आई है। लेकिन इतना पर्याप्त नहीं है। हम वैश्विक स्तर प्रदूषण के जिस प्रतिशत से जूझ रहे हैं, उसमें इतना पर्याप्त नहीं है। भविष्य के विकास को ध्यान में रखते हुए भी शहरी वन योजना को एक स्मार्ट समाधान के रूप में तेजी से अमल में लाने की जरूरत है। वृक्ष एक दिन में बढ़ कर इतने तैयार नहीं हो जाते हैं कि वे प्रदूषण से जूझ सकें। कुछ मनोरंजन पार्क बना देने या सड़क डिवाईडर पर फूलों के पौधे लगा देने से वायु प्रदूषण एवं तापमान के स्तर को हम नहीं काट सकते हैं। इसके लिए जरूरी है कि शहरी वन के लिए क्षेत्र चिन्हित कर के वे वृक्ष लगाएं जाएं जो सघन होते हैं और वायु एवं ग्लोबल वार्मिंग की मात्रा को कम करने में मदद कर सकते हैं। इस दिशा में जनजागरूकता अभियान चलाना भी जरूरी है जिससे नागरिक शहरी वन योजना को अज्ञानवश क्षति न पहुंचाएं। वस्तुतः शहरी वन छोटे-बड़े, मंझोले सभी तरह के शहरों के लिए जरूरी हैं। यह हमेशा याद रखना चाहिए कि वृक्ष हैं तो ऑक्सीजन है और ऑक्सीजन है तो संासे हैं। शहर के इको सिस्टम को भी बनाए रखने में भी शहरी वन अपनी महती भूमिका निभा सकते हैं।
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(सागर दिनकर, 06.10.2021)
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Wednesday, September 22, 2021

चर्चा प्लस | बढ़ती कीमतें यानी जबरा मारे और रोेने न दे! | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस  
बढ़ती कीमतें यानी जबरा मारे और रोेने न दे!
   - डाॅ. शरद सिंह                                                                                
    डीजल-पेट्रोल के निरंतर बढ़ते दाम और
इसके कारण बढ़ती महंगाई को देख कर तो अब लगता है ‘डायन’ भी शरमा कर कहीं जा छुपी है। डीजल-पेट्रोल के दाम 100 रुपए का आंकड़ा पार कर चुके हैं और रसोई गैस 1000 रुपए को छूने की तैयारी में है। अब तो महंगाई को ‘जबरा’ कहा जाना चाहिए। क्योंकि महंगाई की जबरा मार से जनता का घरेलू बजट तेजी से बिगड़ता चला जा रहा है मगर जनता बेचारी ठीक से रो भी नहीं पा रही है।  
अब वह जमाना आ गया है कि मांएं अपने बच्चों को डरा कर चुप कराने के लिए कहेंगी-‘‘रो मत नहीं तो रातो-रात महंगाई बढ़ जाएगी।’’ या फिर यह कहा जाए कि अब जनता रोना ही भूल गई है। उसके आंसू सूख गए हैं। उसे पता है कि महंगाई सर्वशक्तिमान है, कठोर हृदय है, उसके आगे रोने से कुछ नहीं होने वाला है। जब कोई जबस्र्दस्त ताकतवर व्यक्ति किसी कमजोर को मारता-पीटता है तो यही कह कर धमकाता है-‘‘चुप-चुप! रोना नहीं। रोया तो और धुनाई कर दूंगा।’’ यही हाल अब महंगाई और आमजनता के रिश्ते का हो गया है। महंगाई की बढ़त कोई आज का ताज़ा मुद्दा नहीं है। अब तो यह बारहमासी मुद्दा बन चुका है। ज़रा याद करिए 20 फरवरी 2021 को महंगाई के मुद्दे पर बिहार के पर्यटन मंत्री नारायण प्रसाद ने विधानसभा परिसर में पत्रकारों से बात करते हुए क्या कहा था? उन्होंने महंगाई पर एक बहुत ही दिलचस्प और हैरतअंगेज़ टिप्पणी की थी कि- ‘‘महंगाई की आदत लोगों को हो जाती है, इससे आम जनता परेशान नहीं है। वैसे भी आम जनता गाड़ी से नहीं बस से चलती है, इसलिए आम लोगों को बढ़े हुए दामों से कोई परेशानी नहीं हो रही है। मंत्री नारायण प्रसाद ने कहा कि बजट आता है तो थोड़ी महंगाई होती ही है, इससे खास असर नहीं होता है और लोगों को धीरे-धीरे आदत हो जाती है। आम जनता पर इसका आंशिक असर होता है।’’
महंगाई ने हमारी स्मरण शक्ति अतनी कमजोर कर दी है कि हम बहुत जल्दी भूल जाते हैं कि महंगाई के पिछले हंगामें के दौरान क्या टीका-टिप्पणी की गई थी और दामों में कितना ईजाफ़ा हुआ था। अब महंगाई के रोज़ बढ़ते आंकड़ों को हम भला कैसे याद रख सकते हैं? यह सब याद रखने और आकलन करने के लिए शेयर मार्केट वाले, आर्थिक नीति निर्धारक और आर्थिक सलाहकार हैं न। यदि आमजनता महंगाई पर चिंतन करने लगेगी तो इन सब की ड्यूटी का क्या होगा? महंगाई से जुड़े दांव-पेंच वाले भरी-भरकम शब्दावली का क्या होगा? गर्व-सा महसूस होता है जब जीडीपी की बात होती है। जीडीपी यानी ग्रास डोमेस्टिक प्रोडक्ट अर्थात् सकल घरेलू उत्पाद अर्थव्यवस्था के आर्थिक प्रदर्शन का एक बुनियादी माप है, यह एक वर्ष में एक राष्ट्र की सीमा के भीतर सभी अंतिम माल और सेवाओं का बाजार मूल्य है। यही संक्षिप्त परिभाषा है जीडीपी। वस्तुतः इसे समझ पाना सबके बस की बात नहीं है कि इसका महंगाई से क्या ताल्लुक है? इसी तरह एक शब्द समूह है सीपीआई। सीपीआई यानी कंज्यूमर प्राईज़ इंडेक्स यानी उपभोक्ता मूल्य सूचकांक मुद्रास्फीति को निर्धारित करने के लिए एक मीट्रिक है। यह समय की अवधि में घरों द्वारा खपत आवश्यक उत्पादों और सेवाओं की कीमतों में परिवर्तन पर नजर रखने के द्वारा गणना की जाती है। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक खुदरा स्तर पर परिवहन, भोजन, चिकित्सा देखभाल, शिक्षा, आदि जैसी वस्तुओं के एक निश्चित सेट में मुद्रास्फीति को दर्शाता है। अब सीपीआई की गणना कैसे की जाती है? तो थोक मूल्य सूचकांक की तरह, सीपीआई की भी आधार वर्ष के संदर्भ में गणना की जाती है। सीपीआई को आधार वर्ष में मूल्य के साथ चालू वर्ष में वस्तुओं की टोकरी की लागत को विभाजित करके और परिणाम को 100 के साथ गुणा करके आसानी से गणना की जा सकती है। सीपीआई में वार्षिक प्रतिशत परिवर्तन का उपयोग मुद्रास्फीति का आकलन करने के लिए किया जाता है। वैसे यह अर्थशास्त्रियों के लिए अथवा आर्थिक अंकक्षकों के लिए आसान हो सकता है, आमजन के लिए नहीं। मैंने भी बीए तक अर्थशास्त्र की पढ़ाई की थी लेकिन मेरे लिए भी इसे समझ पाना कठिन होता है। समाचारपत्रों के बाज़ार वाले पन्ने पर अथवा टीवी समाचारों में जीडीपी और सीपीआई में बढ़त और गिरावट की ख़बरें पढ़ने-सुनने को प्रायः मिलती रहती हैं। आमजन यह समझने की कोशिश करते-करते थक चुका है कि आखिर महंगाई बढ़ती ही क्यों जा रही है? उसने घटने का रास्ता गोया एकदम सील-पैक कर दिया है।
यह सच है कि कोरोनाकाल में देश को भारी आर्थिक क्षति उठानी पड़ी। लेकिन इसके बाद आर्थिक नीति निर्धारकों ने स्थिति सुधरने का दावा किया। वही जीडीपी और सीपीआई जैसे शब्दों का प्रयोग करते हुए लेकिन महंगाई में लगातार उछाल जारी है। खाने-पीने की चीजें, आवास, कपड़े, परिवहन, इलाज, शिक्षा आदि पर आधारित सीपीआई पर नज़र डालें तो महंगाई जून 2019 में 3.8 प्रतिशत से लगभग दोगुनी बढ़कर जून 2021 में 6.26 फीसद हो चुकी थी। यह लगातार दूसरा महीना था जब महंगाई भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की 6 प्रतिशत की सीमा से ऊपर थी। फिर यह जुलाई में कुछ कम होकर तीन माह के निचले स्तर 5.59 फीसद पर आ गई। खाने-पीने की चीजों विशेष रूप से दलहन और तेल से लेकर ईंधन और बिजली तक सभी चीजों के दाम बढ़े। केंद्रीय उद्योग और वाणिज्य मंत्रालय के बयान में कहा गया कि जुलाई 2021 में महंगाई की ऊंची दर मुख्यतः निचले आधार प्रभाव और कच्चे तेल तथा प्राकृतिक गैस के साथ खनिज तेल, बुनियादी धातुओं, खाद्य उत्पादों, कपड़ों, रसायनों और रासायनिक उत्पादों सहित दूसरी चीजों के दाम में बढ़ोतरी के कारण थी।
इतना तो आमजन भी जानता है कि महंगाई डीजल-पेट्रोल की कीमतों की पटरी पर दौड़ती है। डीजल-पेट्रोल मंहगा होता है तो सामानों का परिवहन मंहगा हो जाता है। जिससे सामानों की कीमतों में उछाल आना तय रहता है। तो जब इतना जरूरी है डीजल-पेट्रोल के दामों का नियंत्रित रहना फिर डीजल-पेट्रोल के दाम नियंत्रित क्यों नहीं हो पा रहे हैं? तो इस प्रश्न का उत्तर पाने के लिए ज़रा पीछे मुड़ कर देखना होगा। जून 2010 तक सरकार पेट्रोल की कीमत निर्धारित करती थी और हर 15 दिन में इसे बदला जाता था, लेकिन 26 जून 2010 के बाद सरकार ने पेट्रोल को कीमतों का निर्धारण ऑइल कंपनियों के ऊपर छोड़ दिया। इसी तरह अक्टूबर 2014 तक डीजल की कीमत भी सरकार निर्धारित करती थी, लेकिन 19 अक्टूबर 2014 से सरकार ने ये काम भी ऑइल कंपनियों को सौंप दिया। अर्थात् पेट्रोलियम प्रोडक्ट की कीमत निर्धारित करने में सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है। ये काम ऑइल मार्केटिंग कंपनियां करती हैं। ऑइल कंपनियां अंतरराष्ट्रीय मार्केट में कच्चे तेल की कीमत, एक्सचेंज रेट, टैक्स, पेट्रोल-डीजल के ट्रांसपोर्टेशन का खर्च और बाकी कई चीजों को ध्यान में रखते हुए रोजाना पेट्रोल-डीजल की कीमत निर्धारित करती हैं। पेट्रोल-डीजल की कीमत को जीएसटी में लाने पर नियंत्रित किया जा सकता है लेकिन इन्हें जीएसटी में नहीं लाने का सबसे बड़ा कारण है राजस्व में कमी होने का भय। पेट्रोल-डीजल को जीएसटी में लाने से सरकारों को राजस्व का नुकसान होगा और सरकार अपनी कमाई के किसी भी सोर्स में कोई बदलाव नहीं करना चाहती। जबकि ऐसा करने से डीजल-पेट्रोल की कीमतों में 20 से 26 रुपए तक की कमी आ सकती है और यह आमजन की जेबों के लिए भारी राहत होगी।
रहा सवाल रसोई गैस की कीमत का तो उसे भी नियंत्रण में लाना जरूरी है। क्योंकि आज बड़े से ले कर छोटे शहरों तक भोजन पकाने का एकमात्र साधन रसोई गैस (एलपीजी) है। आज देश के अधिकांश घरों में रसोई गैस के माध्यम से ही खाना पकाया जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में भी लोगों ने पारंपरिक चूल्हों पर लकड़ी से खाना पकाना छोड़ दिया है। घरेलू गैस सिलेंडर पर उपभोक्ताओं को मिलने वाली सब्सिडी भी लंबे समय से बंद है।  उस पर पिछले 15 महीनों में ही सरकार ने घरेलू गैस सिलेंडर पर 300 रुपयों से अधिक की बढ़ोतरी कर हो चुकी है। घरेलू बजट को राहत देने के लिए सरकार को घरेलू गैस सिलेंडर की बढ़ती कीमतों पर हर हाल में नियंत्रण करना चाहिए। चाहे यह काम सब्सीडी बहाल कर के ही क्यों न हो।
प्रश्न उठता है कि सरकारें राजस्व किसके लिए कमाती हैं? विकास कार्यों के लिए जो आमजन के हित में हों। तो पेट्रोल-डीजल की कीमत को जीएसटी में ला कर नियंत्रित करना भी तो जनहित का कार्य होगा। महंगाई कम होगी तो विकास की दर अपने-आप बढ़ेगी। लेकिन सरकारें अभी चिंतन-मनन में हैं कि ऐसा किया जाए या नहीं? जबकि महंगाई जबरा बन कर मार रही है और त्रस्त आमजन रो भी नहीं पा रहा है। जबकि यही समय है कि राज्य सरकारें महंगाई से ऊपर जनहित को दर्ज़ा दें।
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(सागर दिनकर, 22.09.2021)
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