पुस्तक समीक्षा
पुरानी किताबों की भी प्रासंगिकता होती है जैसे ‘तिल के फूल तिली के दाने’
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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बाल गीत संग्रह - तिल के फूल तिली के दाने
कवि - रमेशदत्त दुबे
प्रकाशक - प्रमाण कम्प्यूटर्स, कटरा बाज़ार, सागर
मूल्य - 25/-
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रचनाकार पुराना हो जाता है। कालकवलित हो जाता है। वह अपनी अर्थवत्ता भी खो सकता है। किन्तु, उसका सृजन कभी अपना महत्व नहीं खोता है। पुरातन साहित्य की श्रेणी में गिना जाने वाला पंचतंत्र, जातक कथाएं, सिंहासन बत्तीसी, अरब की कहानियां, नाविक सिंदबाद की यात्राएं आदि आज भी उतनी ही रोचक लगती हैं जितनी उस समय के बाल श्रोताओं, पाठकों एवं उनके बड़ों को लगती रही होंगी। उनमें मौजूद शिक्षा आज भी प्रासंगिक है। पुरातन साहित्य अपने सृजन की तिथि के आधार पर पुरातन की श्रेणी में भले ही गिना जाए किन्तु उसकी अर्थवत्ता कभी पुरानी नहीं पड़ती है। जी हां, पुरानी किताबों की भी अर्थवत्ता होती है जैसे ‘‘तिल के फूल, तिली के दाने’’। यह बाल गीत संग्रह है। इसके रचयिता रमेशदत्त दुबे अब स्वर्गीय हो चुके हैं किन्तु उनकी अन्य कृतियों की भांति उनके बाल गीतों का यह संग्रह आज भी जब हाथों में आता है तो इसका महत्व स्वतः जागृत हो जाता है। फिर कई वर्षों से आधुनिक बाल साहित्य की कमी को शिद्दत से महसूस किया जा रहा है, विशेषरूप से हिन्दी में। अंग्रेजी में राईम्स के रूप में आयातित बाल काव्य अथवा उन पर आधारित देसी अंग्रेजी बाल काव्य तो उपलब्ध होता रहा है किन्तु हिन्दी का बाल साहित्य सिकुड़ता गया। इसका एक कारण यह है कि आज अधिकांश बच्चे अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ रहे हैं और दूसरा कारण कि बहुत-सी बाल पत्रिकाओं का प्रकाशन बंद हो गया। बाल साहित्य से संस्कारित करने वानी पत्रिकाएं जैसे नंदन, पराग आदि ने कम से कम दो पीढ़ियों को बाल साहित्य से जोड़े रखा था किन्तु अब उस स्तर की पत्रिकाएं नहीं के बराबर हैं।
रमेश दत्त दुबे सागर शहर के एक ऐसे साहित्यकार हुए जिन्होंने फक्कड़पन से जीवन व्यतीत करते हुए महत्वपूर्ण साहित्य रचा। उन्होंने उपन्यास, कहानियां, कविताएं एवं लेख भी लिखे। ‘‘तिल के फूल, तिली के दाने’’ बाल गीत संग्रह है जिसमें उनके 27 गीत संग्रहीत हैं। इन गीतों की विशेषता यह है कि इनमें मनोरंजन के साथ शिक्षा एवं सांस्कृतिक मूल्य समाहित हैं। इनमें से कुछ गीतों की ध्वनि खेल गीत की है जो बालमन को ऊर्जा का संचार करने में सक्षम हैं। यूं तो मैंने इस संग्रह को उनके जीवनकाल में पढ़ा था किन्तु विगत दिनों मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी के अंतर्गत बाल साहित्य अकादमी द्वारा बाल साहित्य पर शहर में चर्चा संगोष्ठी के दौरान रमेशदत्त दुबे जी के सुपुत्र ने इस बाल गीत संग्रह की प्रतियां आयोजन में वितरित कीं, जिससे एक बार फिर यह पुस्तक दृष्टि से गुज़री। एक बार फिर संग्रह की कविताओं को पढ़ने का सुअवसर मिला। वस्तुतः होता क्या है कि हम अपने जीवन में इतने व्यस्त होते जाते हैं कि पुस्तक का स्वरूप और नाम तो स्मृति में रहता है किन्तु कई बार उसका कलेवर धुंधला पड़ता जाता है। पुस्तक भी अन्य नवीन पुस्तकों के नीचे दबती चली जाती है। किन्तु जब कभी वह पुस्तक पुनः सामने आती है तो उसके स्वरूप और नाम की स्मृति के साथ उसका कलेवर भी पुनः ताज़ा हो जाता है। तब हमें लगता है कि यह तो अत्यंत महत्वपूर्ण पुस्तक है तथा इसकी प्रासंगिकता आज भी ज्यों की त्यों है। इसका कारण यह है कि इसके गीतों को समय की नब्ज़ पर उंगली रख कर लिखा गया है।
इस संग्रह का प्रथम गीत है ‘‘मुनिया’’। यह गीत उस परिस्थिति पर आधारित है जिसमें माता-पिता दोनों कामकाजी हैं और नन्हीं मुनिया जैसी बेटी घर में अकेली अपनी कल्पनाओं के अनुरुप खेल रचाा कर मन लगा रही है। इस गीत को पढ़ कर जहां बड़े एकाकी बालमन की दशा को समझ सकते हैं वहीं बच्चे अपना समय खेल-खेल में व्यतीत करने का गुर सीख सकते हैं। इस गीत की कुछ पंक्तियां देखिए -
मुनिया ने देखा, आज पापा नहीं हैं
मुनिया ने पाया, आज माँ भी नहीं हैं
मुनिया ने पाया, घर बिल्कुल सूना छुआ
उसने वह सब, मना जिसको छूना
औरत की फोटो में मूंछें लगाई
राजा की फोटो में पूंछें लगाई
कहा उसने वह सब, जो था उसको कहना
सुना उसने सब कुछ, जो था उसको सुनना
गाना भी गाया, नची, कूदी-फांदी
गुड्डा और गुड़िया की, कर डाली शादी
छोटी सी मुनिया को बहुत सा काम है
दिन हो या रात, चैन न आराम है
़़़़़़़हाथी-घोड़ा-पालकी
हाथी, घोडा, पालकी
बातें हैं उस काल की
मोटर, साइकिल, प्लेन की
बातें हैं इस काल की
बच्चों की कल्पना में आज शेर, भालू से कहीं अधिक मोटर, साइकिल, प्लेन कौंधते हैं। यही टीवी आदि के चलित दृश्यों में उनकी नन्हीं आखों के आगे होते हैं तथा यही खिलौनों के रूप में उन्हें मिलते हैं। अतः गुड़िया के विवाह जैसे पारंपरिक खेल के साथ आधुनिक वस्तुओं को जोड़ कर गीत लिखने से गीत की समसामयिकता बढ़ गई है।
संग्रह में ‘‘कहानी’’ शीर्ष से भी एक गीत है जिसमें छोटी-छोटी तुकबंदी और सहज शब्दों के साथ मनोरंजन है। यह गीत सहज ही बच्चों की जुबान पर चढ़ जाने का गुण रखता है। गीत का एक अंश-
आमोती - दामोती रानी
अंधी भूरी कहे कहानी
एक कहानी दादी कहती
एक कहानी नानी
एक कहानी हरबोलों की,
खूब लड़ी मरदानी
अमोती-दामौती रानी
बुंदेलखंड का एक पुराना खेल गीत है जो आज भी सुदूर ग्रामीण अंचलों में गाया जाता है, जहां पारंपरिक ग्रामीण खेल खेले जाते हैं। यह खेल गीत है ‘‘पो संपा भई पो संपा’’। यह गीत संवादनात्मक है। एक बच्चा उसे प्रश्न के रूप में गाता है तो शेष बच्चे उसका उत्तर देते हैं। इस पारंपरिक गीत को आधार बना कर राजा-रानी के स्थान पर रेलगाड़ी और रेलमपेल जैसे उपमान रखे गए हैं जिससे यह बच्चों के लिए अधिक दृश्यात्मक हो जाता है। उदाहरण देखिए-
पो संपा भई पो संपा
पो संपा ने क्या किया ?
पो संपा ने रेल बनाई
रेल बनाकर खूब चलाई
अब तो रेल में जाना पड़ेगा
लटके, बैठे, खड़े-खड़े
साथ चलेंगे पेड़ खड़े
छुक-छुक करती चलती
रेल डिब्बों में है रेलमपेल
संग्रह का शीर्षक गीत ‘‘तिल के फूल, तिली के दाने’’ प्रकृति और जीवों से मिलाता है। इस गीत का अपना अलग ही सौंदर्य है तथा अलग ही रसात्मकता है।
तिल के फूल, तिली के दाने
खिलते फूल लगे मुरझाने
सूरज घबराया-घबराया
चिड़ियों ने गाना न गाया
बिल्ली बोली-न खेलूंगी
चुहिया बोली-न दौडूंगी
घोड़ा बैठ गया था थककर
मछली बैठी जल में छुपकर
चिडियों ने गाना न गाया
शेर न था बिल्कुल गुर्राया
- अर्थात एक नन्हा-सा तिल का फूल यदि मुरझा जाए तो पूरी प्रकृति और जीव-जन्तु उदास हो जाते हैं। इसलिए फूलों और पौधों की देखभाल करना चाहिए, उन्हें मुाझाने नहीं देना चाहिए। यही तो वह शिक्षा है जो खेल-खेल में, पांव के पंजो पर बिठा कर झूला झूलाते हुए, गीत गाते हुए एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को दे दी जाती थी। आज माता-पिता भौतिकता की दौड़ में इस तरह उलझ गए हैं कि उन्हें न तो स्वयं इस प्रकार के गीत याद हैं और न वे स्वयं गीत रच पाते हैं। वे अपने बच्चों को डिजिटल मीडिया के हवाले छोड़ कर उनके प्राकृतिक बचपन की आकांक्षा करते हैं जो पूरी तरह संभव नहीं है। दरअसल इस प्रकार के गीत ही है जो पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी के बीच संवेदना, आत्मीयता एवं ज्ञान के तार जोड़ते हैं। इसीलिए स्वर्गीय रमेशदत्त दुबे जी का यह बाल गीत संग्रह ‘‘तिल के फूल, तिली के दाने’’ आज भी गहरी अर्थवत्ता रखता है। आज के युवा माता-पिता को स्वयं ऐसे गीत पढ़ने चाहिए तथा अपने बच्चों को स्वयं सुनाने चाहिए। इस दृष्टि से यह पुस्तक सदा प्रासंगिक बनी रहेगी।
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वाह! कितने प्यारे बालगीत
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