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Tuesday, October 20, 2026

पुस्तक समीक्षा | भारतीय नारी की विकास यात्रा का साक्ष्य सहित आकलन | समीक्षक डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
भारतीय नारी की विकास यात्रा का साक्ष्य सहित आकलन  
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक  - नारी: रूपांतरण यात्रा और बुंदेलखंड
लेखिका  - वर्षा कौशल
प्रकाशक - साहित्य कलश पब्लिकेशन, 32/3, अमरशक्ति निवास, महिन्द्रा कॉलोनी, सामने महिन्द्रा कालेज, पटियाला - 147001
मूल्य       - 300/-
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भारतीय समाज में नारी की स्थिति सदा चिंतन के केन्द्र में रही है। साथ ही यह भी सच है कि समाज में नारी की स्थिति में गंभीर उतार-चढ़ाव आते रहे हैं। जहां प्राचीन भारतीय समाज में स्त्रियों को पढ़ने-लिखने और उच्च शिक्षा प्राप्त करने की अनुमति थी, वहीं मध्यकाल में आक्रांताओं के कारण उन्हें न केवल पढ़ने- लिखने से दूर कर दिया गया अपितु घर की चौखट के भीतर रह कर कठोर एवं अमानवीय नियमों को ढोने के लिए विवश किया गया जिसमें विधवा के रूप में तिरस्कृत जीवन जीने, पति की मृत्यु पर सती हो जाने तथा  युद्धकाल में जौहर करने तक की विवशता शामिल थी। इसे स्त्रियों का साहस कह कर भले ही महिमा मंडित किया जाए किन्तु वस्तुतः थी यह कुरीति ही। बुंदेलखंड के गांव-देहात में आज भी सती के पत्थर पाए जाते हैं जिनकी पूजा होती है। ऐसे विकट उतार-चढ़ाव भरे अतीत से आगे बढ़ कर आज समाज में स्त्रियों ने जो अपनी जगह बनाई है वह उसकी असली शक्ति, संघर्ष एवं अस्मिता की परिचायक है। स्त्रियों की इस रूपांतरण यात्रा को लेखिका वर्षा कौशल ने अपनी शोधात्मक पुस्तक ‘‘नारी : रूपांतरण यात्रा और बुंदेलखंड’’ में प्रस्तुत किया है।    

वर्षा कौशल की पुस्तक पर अपनी ‘‘सम्मति’’ देते हुए मणिकुंडल सेवा संस्थान कानपुर के संस्थापक, संरक्षक उमाशंकर गुप्ता ने ‘‘नारी की स्थिति पर शोधपरक कृति’’ शीर्षक से लिखा है कि-‘‘प्रस्तुत पुस्तक में कानपुर एवं बुंदेलखंड के जनपदों में जनसंपर्क, विद्यालयों से संपर्क करके सर्वेक्षण प्रस्तुत किया गया है। यह पुस्तक वास्तविकता को प्रस्तुत करती है और सरकार तथा समाज को चाहिए कि गंभीर चिंतन कर महिलाओं की स्थिति को सुधारने के लिए सार्थक प्रयास करें इस संदर्भ में श्रीमती वर्षा कौशल को धन्यवाद देते हुए आभार व्यक्त करता हूं कि उन्होंने इतने महत्वपूर्ण विषय पर अपनी लेखनी चलाई जिससे देश-प्रदेश में जन जागरण और उन्नति का एक नया अध्याय प्रारंभ होगा।’’

अपनी पुस्तक ‘‘नारी: रूपांतरण यात्रा और बुंदेलखंड’’ की सामग्री को लेखिका ने कुल सात अध्यायों में विभक्त किया है। प्रथम अध्याय में अतीत में प्रेरक महिलायें सुकला, अपाला, दुर्गावती, रत्नावली, सारंध्रा गणिका, मदालसा के बारे में है। द्वितीय अध्याय बुंदेलखंड की नारी के अंतर्गत बुंदेलखंड शब्द की विकास यात्रा, बुंदेलखंड की स्मरणीय महिलायें, शिक्षा के क्षेत्र में नारी की स्थिति, वर्तमान की दुःस्थिति, सुखद भविष्य का भाव लेखबद्ध किया है। तृतीय अध्याय नारी सशक्तिकरण का है जिसमें बाल्यकाल, ऐतिहासिक महिलाओं का बाल्यकाल दुर्गावती, मैना, महिला के स्वरूप एवं भूमिका पर शिक्षा का प्रभाव, ईश भक्ति में रत महिलाओं का बाल्यकाल कर्माबाई, विमला कुमारी, मल्हना, समाज की दिशादात्री महिलाओं का बाल्यकाल अमृता शेरगिल, जेन एडम्स, डॉ मुथु लक्ष्मी रेड्डी के संबंध में जानकारी दी गई है। चतुर्थ अध्याय में ऐतिहासिक महिलायें हैं जिनमें महारानी लक्ष्मीबाई, भक्ति रस में मग्न महिलायें रानी रासमणि, समाज की पथ प्रदर्शिका महिलायें अन्ना चेण्डी, श्रीमती एलीनर रूजवेल्ट, श्रीमती धनवंती रामराव के व्यक्तित्व एवं उपलब्धियों पर प्रकाश डाला गया है। पंचम अध्याय में वर्तमान में सशक्तिकरण के संदर्भ में महिलाओं की स्थिति, अधिकार व अधिकार की सीमाएं महिला मानवाधिकार, हिंदू विवाह अधिनियम, मौलिक अधिकार, मूलाधिकार शोषण के विरुद्ध अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार, संस्कृति और शिक्षा विषयक अधिकार, संपत्ति का अधिकार, संवैधानिक उपचारों का अधिकार आदि की जानकारी दी गई है। छठां अध्याय स्त्रियों के समग्र अधिकारों पर दृष्टिपात का है जिसमें अतीत में महिलाओं का राजनैतिक योगदान, ग्रामीणांचल में राजनैतिक क्षेत्र में महिलाओं की स्थिति समस्यायें, समाधान, उपलब्धि, सामाजिक परिवर्तन में भूमिका, शिक्षा का क्षेत्र, व्यावसायिक शिक्षा, सामाजिक क्षेत्र, ग्रामीण क्षेत्र के आधार पर विवेचन किया गया है। सातवां और अंतिम अध्याय सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़ा है। इस अध्याय में बुंदेली लोक संस्कृति, जीवनयापन, भोजन, वस्त्र, परंपराओं का पालन, परिणाम, लोक संस्कृति विषयक महिलाओं की स्थिति, लोकगीत, लोकनृत्य का विवरण है। इसके बाद अंत में परिशिष्ट एवं संदर्भ ग्रंथ सूची रखी गई है। कुल मिला कर पुस्तक का स्वरूप अकादमिक शोध का है। संभवतः इसीलिए नारी की रूपांतरण यात्रा के कुछ महत्वपूर्ण पक्ष छूट गए हैं तथा बुंदेलखंड के परिचय की अपेक्षा बुंदेली स्त्रियों की दशा और दिशा को समुचित विस्तार नहीं मिल सका है क्योंकि अकादमिक शोध की अपनी सीमाएं होती हैं। वहीं स्वंतत्र शोध सीमाओं से परे जा कर भी विषय को खंगालता है। फिर भी लेखिका ने विषय को व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करने का पूरा एवं सफल प्रयास किया है।
नारी इंसाफ सेना परिवार के सहयोग से प्रकाशित इस पुस्तक की लेखिका वर्षा कौशल ने मास्टर ऑफ एक्सटेंशन एण्ड रुरल डेवलेपमेंट में एम. ए. तथा छत्रपति साहू जी महाराज वि. वि. कानपुर, योग शिक्षा में उपाधि प्राप्त की है। कानपुर निवासी वर्षा कौशल नारी इंसाफ सेना की राष्ट्रीय कमांडर हैं तथा वे भ्रष्टाचार व अनियमितताओं का विरोध एवं न्याय के पक्ष में आंदोलन व धरना प्रदर्शन करती हैं एवं समाज में गरीब व उपेक्षित समुदाय एवं जनमानस का अपेक्षित सहयोग करती हैं। इस प्रकार उन्होंने स्वयं को जमीनी यथार्थ से जोड़े रखा है।
अपनी पुस्तक के लेखन के संबंध में लेखिका वर्षा कौशल का कथन है कि ‘‘मुझे भी नारी इंसाफ सेना महिला संगठन के माध्यम से महिलाओं के बीच कार्य करने का अवसर मिला है। महिलाओं की समस्याओं को जानने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंची हूं कि नारी की सहायक नारी ही हो सकती है। कानून बना देने से ही सिर्फ नारी का हित नहीं हो सकता। नारी पगड़ी की तरह है जो कहने को तो शीश पर धारण की जाती है किंतु उस पगड़ी को बिखेरने के लिए समाज का अधिकांश वर्ग भिन्न-भिन्न वेश में प्रस्तुत होकर तत्पर है। कहावत है कि बेल (लता) और स्त्री बिना सहारे के नहीं रह सकती हैं और इस कहावत को चरितार्थ करने के लिए लोग विविध प्रसंगों और तर्कों से पुष्टि करने के लिए अपनी बुद्धि का उपयोग कर रहे हैं, तब मुझे लगा कि ऐसी कृति लिखी जाये जिसमें अतीत से वर्तमान तक की नारी की स्थिति रेखांकित हो सके और समाज में नारियों के योगदान की झांकी प्रस्तुत की जा सके। यह कृति आंकड़ों पर आधारित नहीं है क्योंकि आंकड़े और यथार्थ दोनों ही अलग-अलग हो चुके हैं।’’
सरस्वती बालिका विद्या मंदिर इंटर कॉलेज, बांदा की शिक्षिका शैलजा तिवारी ने ‘‘धरातलीय अभिव्यक्ति’’ शीर्षक से पुस्तक पर अपनी अभिव्यक्ति इस प्रकार दी है-‘‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता, हमारे समाज ने मनु स्मृति की इस सूक्ति को थोड़ा भी अपनाने का प्रयास किया होता तो शायद महिलाओं उत्पीड़न और अत्याचार से निजात मिल गई होती। लेकिन विडंबना है कि यह सूक्तियां सिर्फ हमारे धर्मग्रंथों तक ही सिमट कर रहा गईं हैं और नारी को सही मायने मे न्याय दिलाने के लिए कोई भी आगे नहीं आया। इस पुस्तक में नारियों द्वारा कई क्षेत्रों में किए गए कार्यों और संघर्षों का उल्लेख होने से उनसे प्रेरणा लेते हुए नारी में हीन भावना नहीं आ सकेगी।’’

‘‘नारी: रूपांतरण यात्रा और बुंदेलखंड’’ एक ऐसी पुस्तक है जिसमें अतीत से वर्तमान तक के नारी संघर्ष की सोदाहरण चर्चा करते हुए बुंदेलखंड की स्त्रियों की स्थिति पर भी चर्चा की गई है। लेखिका ने नारी की मनो एवं सामाजिक दशा तथा प्रतिक्रियाओं पर विवेचन करते हुए लिखा है कि ‘‘जो महिला उपलब्धि प्राप्त कर लेती है वह अतीत की घटनाओं व्यवहार से मिले तनाव से मुक्त हो जाती है जब वह अपने माध्यम से किसी की समस्या का हल करती है तब उसे बहुत आत्म संतोष होता है जब महिला की सहनशक्ति समाप्त हो जाती है तब वह प्रतिशोध की ज्वाला में जलते हुए एक नए रूप में आती है। फूलन देवी ऐसी महिला का उदाहरण है जब उसके साथ किए गए अनाचार पर कहीं पर ग्राम में सुनवाई नहीं हुई बल्कि उसे और अपमानित किया गया तब वह बंदूक लेकर बीह में चली गई और जिस बेहमई ग्राम में उसके साथ अनाचार हुआ था उस गांव में उसने जाकर लोगों को एक पंक्ति में खा कर मार दिया था। इसी प्रकार पारिवारिक शोषण के शिकार महिला जब समाज में महिला उत्थान के लिए निकलती है तब उसके अनुभवजन्य व्यक्तव्य श्रोताओं में रोमांच उत्पन्न कर देते हैं। नारी का स्वभाव होता है कि जब वह बोध विरोध में आती है तो उसके प्रतिशोध की कोई सीमा नहीं होती। सूर्पनखा में सुंदर युवती के रूप में राम के समक्ष प्रस्तुत होकर प्रणय निवेदन किया था किंतु जब उसके नाक कान काटे गए तब वह अपने वास्तविक रूप में आकर प्रतिशोध की ज्वाला में जलने लगी थी और उसने रावण के समक्ष बात रखी इसके परिणाम स्वरुप सीता का हरण हुआ इसी प्रकार दुर्योधन के आदेश पर दुःशासन ने द्रोपदी का चीर हरण किया था उसके परिणाम स्वरूप द्रौपदी ने दुशासन के शरीर के रक्त से अपने बाल धोये थे।’’
इसके साथ ही लेखिका ने महिलाओं को सशक्त बनाने में महिला समाख्या कार्यक्रम का अनुमोदन किया है-‘‘महिलाओं में चेतना या जागरूकता लाना वह प्रक्रिया है जिसमें महिलाओं को संगठित करके उन्हें प्रेरित करना है कि संसाधनों को प्राप्त करने के लिए उनके प्रति जो भेदभाव बढ़ता जा रहा है या जो भी बढ़े हैं वह उन्हें दूर कर सके। इसके लिए ‘‘महिला समाख्या’’ कार्यक्रम एक सशक्त माध्यम है।’’
लेखिका का प्रयास सराहनीय है तथा पुस्तक पठनीय है। विशेषरूप से शोधार्थियों के लिए उपयोगी है।                    
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Tuesday, September 29, 2026

पुस्तक समीक्षा | जीवन के विविध रंगों से गुज़रती कहानियों का संग्रह | समीक्षक डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा
जीवन के विविध रंगों से गुज़रती कहानियों का संग्रह  
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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कहानी संग्रह - ज़िंदगी के रंग अनेक
लेखिका     - आशा मुखारया
प्रकाशक    - पाथेय प्रकाशन, जबलपुर, मध्यप्रदेश
मूल्य       - 200/-
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समीक्ष्य कहानी संग्रह उन कहानियों का संग्रह है जिसमें मध्यमवर्गीय परिवारों से जुड़े कथानक हैं। ये कथानक अपने घर-परिवार तथा अपने आसपास के घरों की अंतर्कथा हैं। कहानी संग्रह का नाम है-‘‘ज़िंदगी के रंग अनेक’’। इसकी कहानीकार हैं आशा मुखारया। संग्रह की कहानियों पर दृष्टिपात करने से पहले लेखिका के भारतीय परिवेश और सामाजिक सरोकार को जान लेना आवश्यक है। लेखिका आशा मुखारया 5 जुलाई 1942 को जबलपुर (म.प्र.) में जन्मीं, वहीं उनकी शिक्षा-दीक्षा हुई, किन्तु सागर (म.प्र.) से भी उनका गहरा नाता है। सागर में उनके अनेक परिवारजन निवासरत् हैं। उनके पति डाॅ. प्रताप सिंह मुखारया इतिहास के प्रोफेसर रहे। पति की सेवा निवृत्ति के बाद उन्होंने अपने एकमात्र पुत्र विवेक मुखारया के पास अमेरिका के जैक्सनविल (फ्लोरिडा) में बसने का निर्णय लिया। वहीं आशा मुखारया को अपने पति का चिरविछोह सहना पड़ा किन्तु बेटे-बहू के अपनत्व से उन्हें सहारा दिया। अपनी इकलौती संतान अर्थात् पुत्र विवेक के साथ रहना उनका सही निर्णय था लेकिन भारत में मौज़ूद अपना गांव, घर, शहर हर प्रवासी भारतीय की तरह उनके दिल में भी बसा हुआ है। नागरिकता भले ही अमेरिका की हो लेकिन दिल है हिन्दुस्तानी। आशा मुखारया की प्रत्येक कहानी में इस तथ्य को शब्दशः अनुभव किया जा सकता है। समय-समय पर भारत में प्रवास के दौरान भारतीय समाज में तेजी से हो रहे परिवर्तन और स्मृतियों की तिजोरी में सुरक्षित पुराने अनुभव उनकी कहानियों में सजीव हो उठे हैं। सीधे-सरल शब्दों में, बिना किसी लाग-लपेट के लिखी गई ये कहानियां सहसा ही मन को छू जाती हैं। 
‘‘ज़िंदगी के रंग अनेक’’ संग्रह की कहानियों का आकार बड़ा नहीं हैं। ये सभी कहानियां छोटी-छोटी हैं। कुल अट्ठाईस कहानियां भारतीय परिवारों के अटठाईस रंग (शेड्स) दिखाती हैं। ‘‘निर्णय’’ शीर्षक कहानी पारिवारिक संबंधों में आती जा रही संवेदनहीनता को सामने रखती है। यह कहानी एक ऐसी स्त्री के बारे में है जो परिवार में बुआ का दर्ज़ा रखती है। अपने आरम्भिक जीवन में सारी सुख-सुविधाओं का आनन्द उठाती है। किन्तु जैसे-जैसे उसकी वृद्धावस्था आती है वह पारिवारिक उपेक्षा की शिकार बनने लगती है। इस कहानी का अंत लेखिका ने एक नाटकीय मोड़ के साथ रोचक बना दिया है। जो सुखद भी लगता है। ‘‘चंदा’’ शीर्षक कहानी को पढ़ते हुए यह अनुभव करना अच्छा लगता है कि लेखिका अपनी ज़मीन से यानी बुंदेलखण्ड से जुड़ी हुई हैं। उन्होंने कहानी में बुंदेली गीतों को पिरोया है। 
‘‘वरदान’’ कहानी एक ऐसे स्त्री पात्र के इर्द-गिर्द घूमती है जिसे परिस्थितिवश एक शक्की और क्रोधी व्यक्ति के साथ विवाह करना पड़ा और अनेक वर्ष घुटन भरा जीवन जीना पड़ा। किन्तु लंदन में बसे उसके बेटे ने उसका जीवन बदलने में मदद की और उसके हिस्से की खुशियां उसकी झोली में डाल दीं। यह एक ऐसी कहानी है जो स्त्री के पारिवारिक जीवन को एक नई पहचान देती है। इसे एक ज़रूरी-सी कहानी कहा जा सकता है। इस कहानी में स्त्री जीवन का वह पक्ष भी है जिसमें उसे निराधार लांछित किया जाता है। कहानी की नायिका दीपा का परिचय देते हुए लेखिका ने लिखा है-‘‘ये वही दीपा थी जो बचपन में मेरे यहां रोज़ ही आया करती थी। मेरी छोटी बहन की सहेली थी। ज़रूरत से ज़्यादा स्मार्ट और ख़ूबसूरत। महाराष्ट्रीयन परिवार से थी। पिता चीफ इंजीनियर थे। उसे किसी से भी बात करने में हिचक नहीं होती थी। उसकी इसी आदत को ले कर लोग तरह-तरह की बातें किया करते थे।जिन लोगों को लिफ्ट नहीं देती थी, वो उसके बारे में फ़ालतू बातें करते थे। पर वो एक बहुत अच्छे चरित्र वाली लड़की थी।’’ 
परिवारों में ज़ायदाद को ले कर होने वाले झगड़े और मनमुटाव आम बात है। मंा की मृत्यु पर बेटियों का उनके ज़ेवर को ले कर खींचातानी के सच्चे किस्से अकसर सुनने को मिल जाते हैं। यही मूल कथानक है, ‘‘मैं कहां हूं’’ कहानी का। इसी तरह ‘‘वापसी’’ कहानी उन माता-पिता की कहानी है जो विदेश में जा बसे अपने बच्चों के पास उत्साह से जाते हैं किन्तु वहां घोर उपेक्षा झेल कर अपने देश लौटने को विवश हो जाते हैं, जहां जीवन के नए अनुभव उनकी प्रतीक्षा में मुस्कुराते हुए खड़े हैं। 
‘‘वी आर जस्ट फ्रेंड्स’’ एक दिलचस्प कहानी है। यह एक फ्र्लट करने वाले लड़के के प्रेम में पड़ जाने वाली लड़की की कहानी है। ‘‘ज़िन्दगी के रंग अनेक’’ संवेदनात्मक कहानी है। अपनों के होते हुए भी एकाकी जीवन जीने को विवश स्त्री की कहानी। इस कहानी में मन को भिगो देने वाला एक प्रसंग है-‘‘अपना बुढ़ापा उन्होंने अपनी किताबों के साहारे काट दिया। अपने कष्टों को छुपा कर वो अपना अकेलापन काटती रहीं। अपनी ज़िन्दगी से और अपनों से कभी शिकायत नहीं की और एक दिन चुपचाप मौत के आगोश में खो गईं।’’
संग्रह में एक कहानी है-‘‘ऐसी भी बहू’’। रोचक और सकारात्मक कहानी है जो ज़िदगी के एक ख़ास रंग को सामने रखती है। कहानी में एक ऐसी बहू का वर्णन है जो विखंडित होते आधुनिक परिवार की परिपाटी को अनदेखा कर के अपने परिवार के प्रति समर्पित रहने के लिए कृतसंकल्प है। ‘‘तीसरी पीढ़ी’’ उस पारिवारिक व्यवस्था को उजागर करती है जिसमें बेटियों को चाहे कितनी भी छूट दी जाए लेकिन जब विवाह की बात आती है तो माता-पिता पारम्परिक रुख अपना लेते हैं। लड़की चाहे विदेश में रह रही हो लेकिन उसके लिए विशुद्ध भारतीय दूल्हा और वह भी भारत में रह रहा हो तो और अच्छा है तथा दान-दहेज वाली शादी तय करने की मशक्कत शुरू हो जाती है। इस बात को अनदेखा कर दिया जाता है कि एक अलग परिवेश में रह रही लड़की ठेठ परंपरावादी परिवार या पति के साथ कैसे सुखी रह पाएगी? ऐसी लड़की की स्थिति ठीक उस पतंग की भांति होती है जिसे खुले आकाश में ऊचे- बहुत ऊंचे तक उडज्ञने दिया जाता है तथा अपनी खुशी प्रकट कर के उसका उत्साह बढ़ाया जाता है। जब वह लड़की समझने लगती है कि वह अपने जीवन का निर्णय लेने का अधिकार पा चुकी है, ऐन उसी समय उसकी डोर तेजी से लपेटे जानी लगती है। उड़ान समाप्त, स्वतंत्रता समाप्त, बाहरी दुनिया समाप्त, उसके निर्णय लेने का अधिकार समाप्त। उस पर माता-पिता अपने निर्णय को थोपना शुरू कर देते हैं तथा बाध्य करते हैं कि वह लड़की उनके निर्णय को माने। इस ट्रेजडी को कहानी की इन पंक्तियों में देखिए-‘‘इस बीच रिया को भी अपने साथ काम करने वाले एक जर्मन लड़के से प्यार हो गया और फिर इतिहास अपने को दोहराने लगा। और तीसरी पीढ़ी की कहानी शुरू हो गई। भारत में रिया के मां-बाप उसके लिए लड़का ढूंढने लगे।’’
संग्रह की एक और कहानी है जो समाज के बदलते माहौल की ओर संकेत करती है। कहानी का शीर्षक है-‘‘यहां से वहां’’। मेहमानों के चरित्र पर बुनी गई यह कहानी एक अलग ही खाका रचती है। कहानी के आरम्भिक पैरा देखिए- ‘‘आज के जमाने में लोग मेहमान-नवाज़ी से घबराने लगे हैं। पहले कैसे लोग मेहमान को भगवान मानते थे। ‘अतिथि देवो भवः’। पअ अब तो रात को घंटी बजते ही लोग घबराने लगते हैं कि पता नहीं कौन आ गया।’’
इसी कहानी के अगले पैरा में मेहमानों के बारे में भी लेखिका ने दिलचस्प विवरण दिया है-‘‘पर मुझे लगता है कि आज के मेहमान भी आरामपरस्त होते जा रहे हैं। जिसके घर भी जाएंगे, पांव पसार कर बैठ जाएंगे। बच्चों पर हुकंम चलाएंगे-पानी ले आओ, पेपर ले आओ, सिगरेट ले आओ। ये नहीं सोचते कि जिसके घर जाते हैं तो उसके काम में हााि बंटाएं जिससे मेहमान का आना न अखरे।’’
अमेरिका में बसे भारतियों के परिवेश का लेखा-जोखा है कहानी ‘‘सिद्धपुरुष’’ में। भारतीय संस्कृति और धर्म विदेश में भी भारतीयों को संबल प्रदान करता है। इस कहानी का एक अंश है-‘‘कई सालों से हम लोग अमेरिका के न्यूयार्क शहर में अपने बेटे के पास सेटिल हो गए थे। कई लोग हम लोगों से पहले वहां रहते थे। इसी से हमउम्र लोगों से काफी जान-पहचान हो गई थी। वहां पर बहुत बड़ा व सुंदर मंदिर है। हम सब सीनियर सिटीजन महीने में एक बार मिलते हैं और आपस में दुनिया-जहान की बातें करते हैं। उसमें धार्मिक बातों के अलावा जनरल, कुछ घरेलू समस्याओं पर भी बातें होती हैं।.... हम बुजुर्गों के पास समय काटने का बस यही एक तरीका था। सोमवार से शुक्रवार तक हमारे बच्चे अपनी नौकरी में काफी व्यस्त रहते हैं फिर भी उनकी कोशिश रहती है कि हम लोगों को भी समय दें। यहां पार्टियां बहुत होती हैं तो वो हम लोगों को पार्टियों में ले जाते हैं। वहां तरह-तरह के लोग मिलते हैं। बच्चों के सभी दोस्त बहुत अच्छे हैं।’’
विदेश में रहते हुए देश के अस्तित्व को अपने भीतर जगाए रखना और अपनत्व की तलाश में आपस में जुड़ते रहना हर प्रवासी भारतीय के जीवन का अभिन्न पक्ष होता है। अपने अतीत और अपने वर्तमान के बीच तुलना करना, अपने अतीत को याद रखना और पराए परिवेश में रच-बस जाना प्रवासी भारतीयों की खूबी होती है। यही विशेषता लेखिका आशा मुखारया की कहानियों देखा जा सकता है। उनकी कहानियां प्रत्येक पाठक से संवाद करने में सक्षम हैं। संग्रह का आमुख जबलपुर निवासी वरिष्ठ साहित्यकार एवं पूर्व संपादक डाॅ. राजकुमार ‘सुमित्र’ ने लिखा है-‘‘लेखिका ने मध्यमवर्गीय परिवारों की रचना, स्थिति और मनःस्थितियों का सटीक चित्रण किया है। बेटे से बेटी भली, परिवारों की टूटन, वृद्धों की उपेक्षा और परदेश में देश की याद को बड़ी मार्मिकता से उकेरा है।’’ अपने कहानी लेखन के बारे में लेखिका आशा मुखारया ने स्वयं लिखा है कि ‘‘कई बार कई घटनाएं और पात्र अपनी छाप छोड़ जाते हैं जो सालों तक मन को सालते रहते हैं और जो अंत में काग़ज़ पर उतर कर कहानियों का रूप ले लेते हैं। चाहते हुए भी और न चाहते हुए भी लिख जाते हैं। कई सालों से अपने मन के भावों को काग़ज़ पर उतारती रही और अंत में देखा कि इन कहानियों ने कहानी संग्रह का रूप धारण कर लिया है।’’
कुलमिला कर यह कहा जा सकता है कि यह छोटी कहानियों का जीवन्त रोचक संग्रह है जिसे अवश्य पढ़ा जाना चाहिए। 
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Monday, December 26, 2022

समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह पुस्तक लोकार्पण समारोह में

25.12.2022...आदर्श संगीत महाविद्यालय का सभागार... श्यामलम संस्था के द्वारा स्व. शंकरदत्त चतुर्वेदी स्मरण पर्व वा शिक्षक सम्मान समारोह... लेखक आर.के.तिवारी जी की पुस्तक व्यंग्य-संग्रह "कुन्जी दाऊ की शादी की पचासवीं वर्षगाँठ" का विमोचन... मुख्य अतिथि विधायक श्री शैलेन्द्र जैन, कार्यक्रम अध्यक्ष  प्रोफेसर श्री सुरेश आचार्य, समीक्षक  डॉ (सुश्री) शरद सिंह यानी मैं... स्व. चतुर्वेदी की पुत्री डॉ अंजना चतुर्वेदी तिवारी, दामाद एडवोकेट अमित तिवारी, दोनों परिवारों के परिजन, श्यामलम सदस्य तथा नगर के बुद्धिजीवी। 
यादगार पल....🌷
📸 तस्वीरों के लिए हार्दिक धन्यवाद भाई मुकेश तिवारी एवं भाई माधवचंद्र चंदेल 🙏
📖 हार्दिक धन्यवाद श्यामलम एवं प्रिय बहन अंजना 🙏

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Tuesday, December 28, 2021

पुस्तक समीक्षा | बाल कविताओं का बालोपयोगी संग्रह | समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह

प्रस्तुत है आज 28.12. 2021 को आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई कवि वृंदावन राय 'सरल' के काव्य संग्रह "मैं भी कभी बच्चा था" की समीक्षा... 
आभार दैनिक "आचरण" 🙏
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पुस्तक समीक्षा
बाल कविताओं का बालोपयोगी संग्रह
 समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह   - मैं भी कभी बच्चा था
कवि         - वृंदावन राय ‘सरल’
प्रकाशक      - मध्यप्रदेश लेखक संघ, इकाई सागर म.प्र.
मूल्य         - 60/-
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बाल साहित्य का अपना एक अलग महत्व है। बड़ों का साहित्य शिक्षाप्रद होने का स्पष्ट आग्रह नहीं रखता है किन्तु बाल साहित्य का मूल आधार ही शिक्षाप्रद होना है। ऐसा साहित्य जो रोचकता के साथ खेल-खेल में बच्चों को जीवन से जुड़ी शिक्षा दे डाले, वही सार्थक बालसाहित्य है। बाल साहित्य की भाषा ऐसी हो जो बच्चों को सुगमता से समझ में आ जाए। दृश्यात्मकता इतनी हो कि बच्चे कल्पनालोक में विचरण करने लगें। जैसे वह कविता है जिसे हम सभी ने अपने बचपन में सुनी है, पढ़ी है और अनेक बार सुनाई है-‘‘मछली जल की रानी है/जीवन उसका पानी है/हाथ लगाओ डर जाएगी/बाहर निकालो मर जाएगी।’’
यह छोटी-सी कविता मछली के अस्तित्व को बालमन में इस तरह बिठा देती है कि व्यक्ति जीवनपर्यंत उसे भूल नहीं पाता है। कुछ समय पहले कोल्डड्रिंक का एक जिंगल चला था जिसमें ‘‘ठंडा’’ शब्द आते ही पूरा जिंगल मस्तिष्क में ताज़ा हो उठता था। कहीं भी ‘‘ठंडा’’ शब्द चर्चा में आता तो आगे के शब्द स्वतः ज़बान पर आ जाते। यह जिंगल था- ‘‘ठंडा यानी कोेकाकोला’’। इस कामर्शियल जिंगल की तरह मछली शब्द बोलते ही ‘‘जल की रानी... जीवन जिसका पानी...’’ शब्द समूह मस्तिष्क में जाग उठते हैं। यही विशेषता होती है एक अच्छे, सटीक बाल साहित्य की। वह किसी कामर्शियल जिंगल की तरह उसे बालमन पर दस्तक देने और पैंठ जाने की क्षमता रखता हो। एक और कविता थी जो बचपन में कोर्स की किताब ‘‘बालभारती’’ में पढ़ी थी, जिसका शीर्षक था ‘‘नागपंचमी’’- 
इधर उधर जहां कहीं, दिखी जगह चले वहीं।
कमीज को उतार कर, पचास दंड मारकर।
अजी अजब ही शान है, अरे ये पहलवान है।
- इस कविता को पढ़ने के बाद पहलवानों की छाप दिमाग में ऐसी बैठी कि आज भी नागपंचमी आने पर अथवा पहलवानों की चर्चा होने पर इस कविता की प्रथम दो पंक्तियां स्वतः कौंध जाती हैं।
हिन्दी साहित्य में बाल कविताओं की दीर्घ परंपरा नहीं मिलती है। आधुनिककाल में अवश्य भरपूर बाल कविताएं लिखी गईं। नंदन, पराग, चंपक आदि बाल पत्रिकाओं के प्रकाशन ने भी इसे बढ़ावा दिया। साथ ही प्रत्येक पारिवारिक पत्रिका तथा समाचारपत्र में बच्चों के लिए पन्ना तथा कोना निर्धारित हो गया जिसने बाल साहित्य को बच्चों तक पहुंचाने की दिशा में सरल मार्ग बना दिया। बालमुकुन्द गुप्त, मैथिलीशरण गुप्त, अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’, महादेवी वर्मा, सुमित्रानंदन पंत, सुभद्राकुमारी चैहान आदि सभी ने बड़ों के लिए साहित्य सृजन करने के साथ ही बच्चों के लिए भी कलम चलाई। ये बाल कविताएं बच्चों के भीतर कोमल भावनाओं का विकास करने में सक्षम थीं। इनका उद्देश्य देश के ऐतिहासिक व सांस्कृतिक गौरव से परिचित कराने के साथ ही देश प्रेम की भावना जगाने तथा नैतिक शिक्षा देने का था। फिर भी ये कविताएं बोझिल नहीं थी वरन रोचक थीं। कवि प्रदीप का वह गीत जो फिल्म के लिए रिकाॅर्ड होने के बाद बच्चे-बच्चे की ज़बान पर चढ़ गया-‘‘आओ बच्चो तुम्हें दिखाएं झांकी हिन्दुस्तान की/ इस मिट्टी से तिलक करो, ये मिट्टी है बलिदान की।’’ यह कविता बच्चों को संबोधित कर के लिखी गई लेकिन यह थी बच्चों के लिए ही। कहने का आशय यह है कि इससे कोई विशेष अंतर नहीं पड़ता है कि कविता बच्चों के लिए लिखी गई अथवा बच्चों को आधार बना कर लिखी गई। ‘‘मैंया मोरी मैं नहीं माखन खायो’ कवि सूरदास ने बच्चों के लिए नहीं लिखा किन्तु बच्चों में इसकी सदा भरपूर लोकप्रियता रही है। क्योंकि यह कविता बालमन का एक ऐसा दर्पण प्रस्तुत करता है, जिसमें हर बच्चा अपना प्रतिबिम्ब देख सकता है। पुस्तक समीक्षा के अंतर्गत इस लम्बी भूमिका का औचित्य यह है कि इस बार जो पुस्तक समीक्ष्य है वह बालकविताओं का संग्रह है। इस पुस्तक का नाम है-‘‘मैं भी कभी बच्चा था’’। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट हो रहा है कि इस संग्रह की कविताएं अपने बालपन के अनुभवों एवं संस्मरण के बहाने बच्चों से सीधा काव्यात्मक संवाद करने का प्रयास है। यह संग्रह है कवि वृंदावन राय ‘‘सरल’’ का जिन्होंने आरंभ में ही अपने विचार रखते हुए बताया है कि उन्होंने कवि दीनदयाल बालार्क जी से प्रेरणा ले कर बाल कविताएं लिखना शुरू कीं। कवि दीनदयाल बालार्क सागर नगर के वरिष्ठ कवियों में रहे हैं तथा उनके बालगीत बहुत चर्चित रहे हैं। 
‘‘मैं भी कभी बच्चा था’’ काव्य संग्रह में दो परिचयात्मक भूमिकाएं हैं। प्रथम भूमिका प्रो. सुरेश आचार्य की है जिन्होंने वृंदावन राय ‘‘सरल’’ की सृजनात्मकता पर टिप्पणी करने हुए लिखा है कि ‘‘यदि बालगीतकार के रूप में इनकी अद्भुत प्रतिष्ठा है और देशव्यापी ख्याति है तो इसका मूल कारण उनकी रचनात्मकता है जो बाल जिज्ञासा को समझने के साथ-साथ उसे नए रास्ते सुझाने, नीति युक्त जीवन हेतु तैयार करने और पर्यावरण की रक्षा के लिए प्रेरित करते हुए एक अच्छे मनुष्य के रूप में एक श्रेष्ठ जीवन बिताने की शिक्षा देती है।’’
  दूसरी भूमिका कवि स्व. निर्मल चंद निर्मल की हैं। वृंदावन राय ‘‘सरल’’ की कविताओं की विशेषता को रेखांकित करते हुए उन्होंने लिखा है कि -‘‘ ‘‘आज का बालक प्रगतिशील हैं जो आठ पंक्तियों को कंठस्थ कर सकते हैं। मैं सरल जी के इन बाल गीतों की सराहना करता हूं। बाल रुचि को यह रचनाएं भाएंगी और विश्वास करता हूं कि इस ओर अन्य कवि भी अपने कदम बढ़ाएंगे। बाल बुद्धि के लिए बाल गीतों की आवश्यकता है।’’
वृंदावन राय ‘‘सरल’’ की कविताओं में दृश्यात्मकता भी है, ज्ञान भी है और रोचकता भी है। उनकी यह कविता देखिए-
बारहसिंगा, तेंदुआ, 
है जंगल की जान।
दोनों की अद्भुत गति
जैसे हवा समान।
ख़तरनाक़ है भेड़िया
उस पर है चालाक।
खा जाए ख़रगोश को 
तोड़े उसकी नाक।

जहां कवि ‘‘सरल’’ अपनी कविता के माध्यम से वन्य पशुओं से परिचित कराते हैं, वहीं वृक्षों के महत्व को भी बालमन में स्थापित करने का सुंदर प्रयास करते हैं। यह बालगीत देखिए - 
वृक्ष हमारे देवता
नदियां देवी रूप
आओ इनको रोक लें
हम होने से कुरुप
वृक्षों को हम मान लें 
माता-पिता समान
इनके ही आशीष से 
मिलता जीवनदान।

वृक्ष पर्यावरण चक्र की एक महत्वपूर्ण कड़ी हैं। उनसे हमें आॅक्सीजन मिलती है तथा छाया, फल, फूल, रुई, लकड़ी, औषधि आदि अनेक चीज मिलती हैं। ऐसे महत्वपूर्ण तत्व के प्रति बच्चों को जागरुक करने की दिशा में यह कविता विशेष महत्व रखती है। इसी तारतम्य में एक और छोटी-सी कविता है-
जंगल जीवन का आधार
करना होगा इससे प्यार
इसकी रक्षा बहुत ज़रूरी
खुशियां इससे मिलें अपार
जंगल जीवन का आधार।

वन और वन्य पशु-पक्षियों के प्रति जागरूकता जगाता एक छोटा-सा बालगीत है जिसमें वन्य पक्षियों तथा उनके साथ ग्रामीणजन का व्यवहार का वर्णन किया गया है। चूंकि आज मनुष्यों की रिहायशी बस्तियां फैल रही हैं और जंगल में मनुष्यों कर घुसपैंठ बढ़ गई है अतः वन्यजीवन और मनुष्यों के बीच मुटभेड़ होना तय है। इस प्रकार के टकराव में मनुष्य को ही धैर्य और मनुष्यता का परिचय देना होगा। यह बात इस गीत में स्पष्टरूप से देखा जा सकता है -
जंगल में देखे बहुत
तोता, मैंना  मोर
कानों को भाता बहुत
जिनका अद्भुत शोर
इनका भी अब गांव में
करते लोग शिकार
इनको मिलना चाहिए
जीने का अधिकार

कवि ‘‘सरल’’ ने भालू पर एक बहुत सुंदर कविता लिखी है जो इस संग्रह में मौज़ूद है। इस कविता में उन्होंने भालू की दिनचर्या और बंदर से उसकी दोस्ती का वर्णन किया है। इस कविता का महत्व यह है कि यदि बच्चे अपनी बालावस्था से ही वन्यप्राणियों स्नेह और अपनत्व रखेंगे तो बड़े होने पर वन्य पशुओं के संरक्षण पर पूरा ध्यान दे सकेंगे। कविता इस प्रकार है-
शहद ढूंढता वन में भालू
मगर नाम है उसका कालू
जंगल में बंदर भी लालू
दोनों अक्सर खाएं आलू
शहद ढूंढता वन में भालू
मगर नाम है उसका कालू

इस संग्रह में आपसी भाईचारे और कौमी एकता पर भी कविता है जिसमें बच्चों को सभी प्रकार के भेद-भाव से ऊपर उठ कर, मिलजुल कर रहने का संदेश दिया गया है-
प्रेम भाव से मिल कर रहना
लेकिन कोई जुल्म न सहना
हिन्दू मुस्लिम सिख इसाई
सबको अपना भाई कहना
सत्य और ईमान की दौलत
यही हमारा असली गहना
अपने घर को महल बनाने
निर्धन के घर कभी न ढहना
भारत के कल्याण की ख़ातिर
हिन्दू मुस्लिम मिल कर रहना

कवि वृंदावन राय ‘‘सरल’’ की बाल कविताओं का यह संग्रह इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है कि आज बच्चों के लिए साहित्य कम रचा जा रहा है। गुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर का यह कथन आज एक कसौटी की तरह है कि -‘‘बच्चों के कोमल, निर्मल और साफ मस्तिष्क को वैसे ही सहज तथा स्वाभाविक बाल साहित्य की आवश्यकता होती है।’’ कवि टैगोर द्वारा दी गई इस कसौटी पर वृंदावन राय ‘‘सरल’’ बालकविताएं एवं गीत खरे उतरते हैं।
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Tuesday, December 21, 2021

पुस्तक समीक्षा | स्त्री स्वर को मुखर करता एक उम्दा काव्य संग्रह | समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह

प्रस्तुत है आज 21.12. 2021 को #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई संपादक अनुभूति गुप्ता द्वारा संपादित काव्य संग्रह "स्त्री स्वर" की समीक्षा...
आभार दैनिक "आचरण" 🙏
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पुस्तक समीक्षा
स्त्री स्वर को मुखर करता एक उम्दा काव्य संग्रह
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह   - स्त्री स्वर
संपादक      - अनुभूति गुप्ता
प्रकाशक     - उदीप्त प्रकाशन, लखीमपुर खीरी, (उ.प्र.)
मूल्य        - 100/-
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‘‘स्त्री स्वर’’ यह एक साझा काव्य संकलन है। इसका संपादन अनुभूति गुप्ता ने किया है। इस संकलन में पंद्रह कवि एवं कवयित्रियों की वे काव्य रचनाएं सम्मिलित की गई हैं जिनमें स्त्री स्वर मुखर हुआ है। इस सम्वेत संकलन में डॉ भारती वर्मा बौड़ाई, अजय कुमार मिश्र ‘‘अजयश्री’’ वीणा मावर, डॉ सुरेंद्र निशब्द, आनंद वर्धन शर्मा, डॉ शम्मी श्रीवास्तव, रामेश्वर प्रसाद गुप्त, शिवमंगल सिंह, त्रिवेणी मिश्रा, वीरेंद्र प्रधान, प्रभु दयाल खट्टर, गिरीश चावला, संजय सनातन, जितेंद्र कुमार वैष्णव और विनोद कुमार की कविताएं संग्रहित की गई है। इन सभी कविताओं में स्त्री जीवन के संघर्ष दशाओं और क्षमताओं की चर्चा की गई है।
वर्तमान समाज में भी स्त्री पूर्णतया सुरक्षित नहीं है, न तो घर में और न ही बाहर। वह अपने अस्तित्व को साबित करने के लिए निरंतर संघर्ष करती रहती है। इसके बावजूद उसे प्रताड़ना भी सहना पड़ता है लेकिन उसके भीतर की शक्ति उसे सशक्त बनाए रखती है और वह बिना डरे बिना थके जूती रहती है। कवयित्री डॉ भारती वर्मा बौड़ाई ने अपनी कविता ‘‘मैं नव विहान हूं’’ में स्त्री के सशक्त पक्ष को सामने रखा है। पंक्तियां देखिए-
मेरी ओर /बढ़ते हुए ये
असंख्य राक्षसी हाथ
पर नहीं कोई /हाथ ऐसा
जो रक्षा के लिए /उठता दिखे
पर नहीं /किंचित भी
भयभीत मैं /मेरे दोनों हाथ
समर्थ है पूर्णतया /मेरे लिए,
अब कितने भी /उठें वहशी हाथ मेरी ओर
तोड़ डालूंगी उन्हें स्वयं
करूंगी अब न्याय स्वयं
क्योंकि मैं समर्थ और शक्तिवान हूं
मैं नव विहान हूं।

कवि अजय श्री ने अपनी कविता में साहित्य के उस पक्ष को सामने रखा है जिसमें एक विज्ञापन के समान स्त्री का वर्णन करके वाहवाही लूटने का प्रयास किया जाता है। कतिपय साहित्यकारों का प्रिय विषय गांव का वर्णन और स्त्री की देह मात्र इसलिए होता हैकि उसके द्वारा उन्हें पाठकवर्ग अथवा श्रोताओं की प्रशंसा मिल जाती है। ऐसे कवियों पर कटाक्ष करते हुए अजयश्री ने अपनी कविता ‘‘लेखन का प्रिय विषय’’ के अंतर्गत लिखा है-
गांव की माटी/और औरत की देह !
खूब दोहन करते हैं
जिनका नहीं है सरोकार ।
शहर के किचन में
पकती है गांव की रसोई
गर्भाधान से लेकर श्मशान तक
अनुसंधान करते हैं/परत दर परत।
शहर की रौनक/जब उतरती है
खेतों में बुवाई के लिए
जोड़ती है कछोटामार/खेतीहरनों से,
एक एक शब्द उगता है/किसी आलीशान बंगले में
करीने से सजाएं स्टडी टेबल पर
रखे लैपटॉप पर।

भारतीय संस्कृति यूं तो दुनिया में सदा गौरव का विषय रही है किंतु कुछ ऐसे हादसे हुए हैं जिन्होंने संस्कृति और समाज दोनों को लज्जित किया है। ऐसी ही एक घटना रही है निर्भया कांड। जब भी उस नृशंस घटना की स्मृति जागती है तो समाज में बेटियां असुरक्षित दिखाई देने लगती हैं और समाज को उसकी भीरुता के लिए ललकारने का मन करने लगता है। इसी भावभूमि पर है कवयित्री वीणा मावर की कविता ‘‘निर्भया’’। अंश देखिए-
कहां गए वो समाज सुधारक
गए कहां राममोहन और विद्यासागर जुल्मों के खिलाफ
भुजा जिनकी थी फड़की
करी खिलाफत फिर पूरे समाज की
हुई सुरक्षित जिससे फिर हर अबला
तुमसे तो अच्छा बैटिंग ही निकला
था फिरंगी पर अपना निकला
सती प्रथा को खत्म जो कर गया
था हुमायूं भी एक विदेशी
लगी देर पर पहुंचा वह भी
रखी लाज उसने भी राखी की
राह तक रहे तुम किस पल की?

नारी शक्ति की ही बात करती कविता है डॉ शम्मी श्रीवास्तव की, जिसका शीर्षक ही है ‘‘नारी शक्ति’’। अपनी इस कविता में कवयित्री ने स्त्री की उस क्षमता का स्मरण कराया है जब वह अन्याय के विरुद्ध हथियार उठा लेती है और प्रताड़ना का प्रतिरोध करती है। कवयित्री ने देश के स्वतंत्रता संग्राम में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के योगदान का भी स्मरण कराया है -
जब-जब अधर्म पड़ा है अन्याय ने मचाई तबाही है
नारी शक्ति ने आगे बढ सदैव धूम मचाई है
उठो ! आज फिर जगाओ अपनी शक्ति का एहसास
भूल गई? तुमने ही बदला भारत का इतिहास
अगर न तुमने चिंगारी भड़काई होतीं
देश ने कैसे इस साल 73 वीं वर्षगांठ मनाई होती
मत भूलो नारी ने किया है बार-बार चमत्कार
शक्ति शौर्य की है यह देवी जाने कुल संसार।

कवि शिवमंगल सिंह ने अपनी कविता ‘‘पेड़ जैसी होती है स्त्रियां’’ में स्त्री जीवन के विविध पक्षों को अपनी कविता में निबद्ध किया है। जिस प्रकार एक पेड़ सभी तरह के झंझावात  सहन करके भी अपने फल, फूल, पत्तों की रक्षा करता है, उसी प्रकार एक स्त्री सारे दुख कष्ट सहती हुई अपने परिवार के प्रति समर्पित रहती है। स्त्री जीवन की पेड़ से तुलना करती हुए यह कविता उल्लेखनीय है-
पेड़ जो /तेज आंधियों में भी
झुक झुक कर /चुपचाप
उसके थपेड़ों को सह लेता है
ग्रीष्म के तपन में भी
धरती पर शीतल छांव देता है
बरसात में भीग कर/मुस्कुराहट बिखेर देता है
शरद ऋतु में रात रात भर ठिठुर कर
शांत रहता है /मौसम के तमाम
झंझावात को चुपचाप सहन कर लेता
स्त्रियों भी /पेड़ की तरह
अपने जीवन की तमाम वेदना को /सह लेती हैं
विपरीत परिस्थितियों में भी /मुस्कुराती हैं
खिलखिलाती हैं /धरती पर स्वर्ग बिखेर देती हैं ।

कवि वीरेंद्र प्रधान मैं समाज में नारी के महत्व को स्थापित करते हुए उसकी उपस्थिति की महत्ता को रेखांकित किया है। उनकी कविता ‘‘नारी’’ स्त्री शक्ति का आह्वान करने में सक्षम है। कविता देखिए-
पुत्री भगिनी जननी तो पत्नी किसी की
तू नारी तू ही तो है संचालक परिवार की
तेरे बिना घर सूना, जग सूना, सब सूना
फिर भी तुझे समस्या है अपने अधिकार की
इनके भी दिल है, दिमाग है, दो हाथ हैं
नहीं किसी मायने में नर से कम नारियां
नारी की कीमत को कमतर आंकता है नर
उस पे थोपता अपने ऐब और मक्कारियां
अपना अधिकार तुझे लेकर ही रहना है
‘‘मेरी आवाज सुनो’’ नर से यह कहना है
पथ से विचलित न हो जाये कभी तेरा नर
उसको मर्यादित कर सीता स्वयं बनना है

यूं तो इस संग्रह की प्रत्येक कविता में स्त्री स्वर मुखरित हुआ है किंतु एक और कविता है इस संग्रह में जिसका उल्लेख किया जाना जरूरी है। कविता का शीर्षक है ‘‘बस स्टॉप पर खड़ी अकेली लड़की’’। यह कविता कवि संजय सनातन की है जिसमें उन्होंने दैनिक जीवन में एक लड़की के आत्मसम्मान को चोट पहुंचाने वाली कुचेष्टाओं की ओर ध्यान आकर्षित किया है। कविता देखिए -
वह तन्हा लड़की और सिमटती जाती है
उसे पीठ पीछे भी /निगाहों की कटारें चुभने लगती हैं
तभी अचानक उसकी बस आ जाती है
और वह अपने गंतव्य की ओर चली जाती है
लेकिन हवा में टंगी रह जाती है
अश्लील हंसी की ध्वनियां /और वो असभ्य इशारे
बस स्टॉप पर /आने वाली किसी दूसरी लड़की के लिए।

अनुभूति गुप्ता ने स्त्री के पक्ष में लिखी गई कविताओं को एक संग्रह के रूप में प्रकाशित कर प्रशंसनीय कार्य किया है। यह पुस्तक पठनीय है तथा एक सार्थक स्त्री विमर्श रचती है।
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