Wednesday, October 7, 2026

चर्चा प्लस | अपने पर खोलना चाहती हैं किताबों में दबी तितलियां | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस
अपने पर खोलना चाहती हैं किताबों में दबी तितलियां 
डॉ (सुश्री) शरद सिंह

तितलियां ही तो है रंग-बिरंगी, नाज़ुक। बटरफ्लाई कैचर नेट में पकड़ने लायक़, पारदर्शी बोतल में कर क़ैद कर लेने लायक़ और किसी ट्रॉफी की तरह किताब के पन्नों में दबाकर रख लेने के लायक़। जिन्हें जब चाहे तब देख कर अपनी शक्ति का एहसास किया जा सके। जब शहरों में, गांव में, कस्बों में बहुत से बगीचे हुआ करते थे, बहुत से फूल खिला करते थे तब बहुत सी तितलियां उड़ा करती थीं। तब भी यही सुलूक होता था उनके साथ। आज बगीचे कम हैं, फूल कम हैं लेकिन सुलूक बदला नहीं है। मुट्ठी पर तितलियां भी किसी चौक- चौराहे पर जुड़ जाए तो टूट पड़ते हैं लोग उन पर। मगर तितलियों का साहस तो देखिए वे किताबें से निकल कर अपने पर खोलना चाहती हैं।

बचपन में बहुत से नसमझी वाले काम हो जाते हैं जैसे टिड्डे की टांग में धागा बांधकर उसे उचकाना, मेंढक की टांग में धागा बांधकर उसे लटका देना, किसी चीटें को पारदर्शी गिलास में बंद कर उसे छटपटाते हुए देखना और सुंदर, नाज़ुक तितलियों को  पकड़ कर कभी उनके पंख नोच लेना तो कभी उन्हें जीते जी किताबों के पन्नों में दबाकर, भविष्य में देखने के लिए दफ़्न कर देना। बचपन की यही बचकानी नसमझ भरी गलतियां किसी किसी पर ऐसा प्रभाव डालती है कि वह बड़े होने पर भी तितली जैसी खूबसूरत हर चीज को अपने कब्जे में कर लेना चाहते हैं, मिटा देना चाहते हैं, दबा देना चाहते हैं। इसे चाहे तो साइकोलॉजिकल डिसऑर्डर भी कह सकते हैं जिसकी नींव इंसान के बचपन में ही नहीं बल्कि पीढ़ियों पहले से पड़ चुकी रहती है। उसे पीढ़ी से जिसमें पूर्वजों ने वन्य पशुओं के सिर काटकर अपनी ड्राइंग रूम में ट्रॉफी बनाकर सजाने का चलन चलाया था। परिणाम यह हुआ कि शिकार हुए पशुओं की प्रजाति ही खतरे में पड़ गई। पूरी दुनिया को चिंता करनी पड़ी के लुप्त होने की कगार में खड़ी प्रजाति को कैसे बचाया जाए? कुछ दुर्भाग्यशाली प्रजातियां तो अब इतिहास के पन्नों भर में हैं। वैश्विक स्तर पर प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ (इंटरनेशनल यूनियन ऑफ कंजर्वेशन नेचर)  के अनुसार, कुछ विशिष्ट तितली प्रजातियाँ ही पूरी तरह विलुप्त हो चुकी हैं, जिनमें लिब्याथी सिनिरास (1866 में), मोरेंट्स ब्लू (1879 में), यूरेनिया स्लोनस (20 वीं सदी के आरंभ में) और ज़ेरसेस ब्लू (1941 में) विलुप्त हो चुकी हैं।  पर्यावरण प्रदूषण, वनों की कटाई और जलवायु परिवर्तन के कारण लगभग 20% मूल्यांकित प्रजातियों पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।
हां, मनुष्य का स्वास्थ्य बढ़ जाता है और वह प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करने लगता है तो प्रजातियों पर संकट आना स्वाभाविक है।

 बेटी बचाओ आंदोलन भी कुछ इन्हीं कारणों से चलाया गया। भारतीय समाज में बेटों की ललक इतनी अधिक बढ़ती चली गई की बेटियां कोख में ही मारी जाने लगीं। पुरुषों और महिलाओं का अनुपात गड़बड़ा गया। आज भी देश में कई स्थान ऐसे हैं जहां पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं की कमी है। विवाह के लिए भी लड़कियां नहीं मिलती हैं। वे दूसरे राज्यों से खरीद कर लड़कियां लाते हैं ताकि वैवाहिक जीवन बिता सके और अपना वंश चल सकें। मनुष्य एक बुद्धिमान प्रजाति है। मनुष्यों में ही कुछ लोग समझ गए कि यदि बेटियों को इसी तरह कोख में मारा जाता रहा तो स्त्री प्रजाति ही संकट में पड़ जाएगी। भारत में पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों की संख्या सबसे कम (सबसे कम लिंगानुपात) वर्ष 1991 की जनगणना में पाई गई थी जो ऐतिहासिक रूप से सबसे कम दर्ज किया गया था। इसके बाद शासकीय स्तर पर प्रयास शुरू किए गए।
देश में कन्या भ्रूण हत्या और गिरते लिंगानुपात को रोकने के लिए भारत की संसद द्वारा पूर्व गर्भाधान और प्रसव पूर्व निदान तकनीक अधिनियम, 1994 के रूप में एक संघीय कानून पारित किया गया। इस अधिनियम से प्रसव पूर्व लिंग निर्धारण पर प्रतिबंध लगा दिया गया। प्री-नेटल डायग्नोस्टिक टेक्निक ‘पीएनडीटी’ एक्ट 1996, के तहत जन्म से पूर्व शिशु के लिंग की जांच पर पाबंदी की गई। ऐसे में अल्ट्रासाउंड या अल्ट्रासोनोग्राफी कराने वाले जोड़े या करने वाले डाक्टर, लैब कर्मी को तीन से पांच साल सजा और 10 से 50 हजार जुर्माने की सजा का प्रावधान रखा गया। प्रत्येक आनुवांशिक परामर्श केंद्र, आनुवांशिक प्रयोगशाला या आनुवांशिक क्लिनिक परामर्श देने या प्रसव पूर्व निदान तकनीकों का संचालन करने में लगे हुए, जैसे कि गर्भाधान से पहले और बाद में लिंग चयन की संभावनाओं के साथ इन विट्रो फर्टिलाइज़ेशन (आईवीएफ) पीसीसीपीटी अधिनियम के दायरे में आता है, इस पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इसके बाद स्थिति में सुधार हुआ तथा पुरुषों के अनुपात में स्त्रियों की संख्या फिर बढ़ने लगी। देखा जाए तो इससे स्त्री प्रजाति विलुप्ति के पन्नों में दर्ज़ होने से बच गई। फिर भी यह बहुत खुश होने वाली बात नहीं कहीं जा सकती है क्योंकि प्रतिबंधों की बाड़ उसके इर्द-गिर्द सदियों से खड़ी की जाती रही है।
स्त्रियों के लिए सबसे बड़ा प्रतिबंध रहा उसके साथ होने वाले अत्याचारों के विरुद्ध खामोशी को अपनाने का। यदि राह चलते छेड़छाड़ की जाए तो वह प्रतिकार न करें सर झुका कर निकल जाए। यदि उसके साथ बलात्कार जैसी जागने वारदात हो तभी वह खामोश रहे क्योंकि समाज बलात्कार पीड़िता स्त्री को ही दोषी ठहराएगा। यदि जबरदस्ती प्रेम के नाम पर धोखा देकर उसे गर्भवती कर दिया जाए तो भी खामोश रहे क्योंकि उसे ही बदचलन ठहराया जाएगा। यदि घर की चौखट के भीतर परिवार के किसी पुरुष द्वारा उसे यौन अपराध का शिकार बनाया जाए तो भी वह मौन धारण किए रहे, क्योंकि इसमें भी स्त्री को ही दोषी ठहराया जाएगा। यही कारण है कि बलात्कार पीड़िता के प्रति उसके परिजन भी सहानुभूति रखने के बजाय भयभीत हो उठते हैं। यदि पीड़िता पुलिस में शिकायत करना भी चाहे तो परिजन उसे ऐसा करने से रोकते हैं। यदि परिजन साथ दे भी दें, तो समाज उन परिजन को भी कटघरे में खड़ा कर देता है कि “क्या आवश्यकता थी ढिंढोरा पीटने की जो हो गया सो हो गया।”
अपराधी बेटों को दोष नहीं किंतु पीड़िता बेटी को दोषी ठहराया जाना समाज की सबसे बड़ी कमजोरी रही है। इसीलिए आज भी यह स्थिति है कि रात को कोई लड़की, कोई स्त्री घर से बाहर अकेली नहीं जाना चाहती है। जो लड़कियां शिक्षा अपने या नौकरी करने के लिए दूसरे शहरों में जाकर रहती हैं उन्हें भी कोई पुरुष सहारे के रूप में ढूंढना पड़ता है फिर चाहे वह सहारा ही उनके लिए मुसीबत क्यों न बन जाए।
नौकरी पेशा स्त्री यो का जीवन भी दोधारी तलवार पर चलता रहता है। स्त्री के लिए नौकरी करने का मतलब सिर्फ नौकरी करना नहीं होता है साथ में उसे घर की पूरी जिम्मेदारियां वहन करनी पड़ती हैं। एक पुरुष यदि नौकरी करके घर लौटता है तो घर में मौजूद स्त्री चाहे वह पत्नी, बहन या मां हो, चाय नाश्ता बना कर देती है। वहीं, यदि एक स्त्री काम करके कार्यस्थल से घर लौटती है तो उसे घर लौट कर सबके लिए न केवल चाय नाश्ता बल्कि रात का खाना भी बनाना पड़ता है। बहुत सी कामकाजी महिलाएं ऐसी हैं जिन्हें कार्य स्थल पर आपत्तिजनक टीका टिप्पणी अथवा अनचाहे दबाव का सामना करना पड़ता है और ठीक वहीं दूसरी ओर घर में ताने सुनने पड़ते हैं। यह तमाम बातें पूरे समाज को विदित है। कुछ भी छुपा हुआ नहीं है फिर भी स्त्री की स्थिति में परिवर्तन कोई नहीं चाहता है।

वैवाहिक संबंध हो तो दहेज का दानव लड़की के कंधे पर बिठा दिया जाता है। जिससे मां-बाप उसके पैदा होने के साथ ही इस चिंता में डूब जाते हैं कि कल यह जब बड़ी होगी तो इसके लिए ढेर सारे दहेज का इंतजाम करना पड़ेगा। यदि ढेर सारा दहेज नहीं दिया गया तो लालची ससुराल वाले तरह-तरह से परेशान करेंगे और हो सकता है कि उसे मौत के घाट ही उतार दें। यह सब भी पूरा समाज जानता है। दहेज विरोधी कानून भी देश में लागू है लेकिन दहेज की प्रथा आज भी जारी है, सिर्फ तरीका बदल गए हैं। परंपरा रही कि दूल्हा बारात लेकर आता था लेकिन अब कई वैवाहिक बंधन के दौरान दुल्हन को “बारात” लेकर जाना पड़ता है।
नई पीढ़ी की लड़कियों को यह बंधन मंजूर नहीं हैं। उनका यही कहना है कि यह हमारा अपना जीवन है और इसे हमें अपनी तरह से जीने दो। हमें हमारे शहर में वे सड़क दो जिस पर हम निर्भय होकर चल सकें। हमें वह समाज दो जो हमारी प्रताड़ना के समय हमारे साथ खड़ा हो और हमें समर्थन दे। वे  पुरुष प्रजाति की विरोधी नहीं हैं, वे सिर्फ उन पुरुषों की विरोधी हैं जो उनको किसी न किसी रूप में मानसिक एवं शारीरिक के प्रताड़ना देते हैं।

दुर्भाग्य से आज भी स्थिति यह है कि जब बेटियां अपने विरुद्ध होने वाली अपराध के बारे में साहस करके आवाज उठाती हैं तो समाज दो फड़ में बंट जाता है। कोई उनके कपड़ों पर उंगली उठाता है तो कोई उनके आवाज उठाने पर उंगली उठाता है तो कोई उन्हें बदचलन ही ठहर देता है। गोया स्त्रियों को अपनी फट होने वाले किसी भी अपराध को लेकर आवाज उठाने या अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने का अधिकार नहीं है। की अगुवाई में हुई थी। ओलंपिक स्तर की भारतीय महिला पहलवानों विनेश फोगाट और साक्षी मलिक द्वारा यौन शोषण के विरुद्ध पहली बार आधिकारिक तौर पर 18 जनवरी 2023 को आवाज़ उठाई गई थी। इस दिन देश के शीर्ष पहलवानों ने नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना प्रदर्शन शुरू किया था। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद दिल्ली पुलिस ने अप्रैल 2023 के आखिर में बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ केस दर्ज किया और जून 2023 में कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की। अगस्त 2026 में, दिल्ली की एक अदालत (राउज़ एवेन्यू कोर्ट) ने पर्याप्त सबूतों के अभाव का हवाला देते हुए बृजभूषण शरण सिंह को इन आरोपों से बरी कर दिया गया। एक सीधी चोट स्त्री समाज पर की जब विश्व स्तर की महिला खिलाड़ियों को न्याय नहीं मिल सकता तो एक सामान्य स्त्री को न्याय कैसे मिलेगा?

अपने जीवन में कभी ना कभी यौन शोषण का शिकार हुई महिलाओं ने “#मी टू” की मुहिम चलाई। यह विश्व व्यापी मुहिम थी। अनेक महिलाओं ने अपनी पीड़ा खुलकर बयान की। अनेक नामचीन पुरुष बेनकाब हुए। फिर भी वह हर स्त्री सामने नहीं आ सकी जो कभी ना कभी प्रताड़ना का शिकार बनी थी। सदियों के डर और बंधन का पहाड़ एक झटके में बिखर नहीं सकता था।
तितलियां पंख लेकर पैदा होती हैं। प्रकृति या कहें, ईश्वर भी उन्हें उनकी सुंदरता के साथ निर्भय होकर उड़ते हुए देखना चाहता है। युवा पीढ़ी की लड़कियां भी अपने अधिकारों को पाना चाहती हैं। जिस तरह तितली अपने पंख फैला कर उड़ना शुरू करती है, इसी तरह लड़कियां भी खुलकर सामने आकर अपनी बात रखने का साहस कर रही हैं। जो पहले कभी देखा न गया हो और अचानक दिखाई देने लगे तो समाज में अनेक लोगों को परेशानी का अनुभव होने लगता है। बेशक यह भी सही है कि जो पहले कभी किया न हो और अचानक किया जाने लगे तो उसमें कुछ गड़बड़ियां भी होती हैं, कुछ अनाड़ीपन भी होता है और कुछ आक्रोश की अधिकता भी रहती है। फिर भी ऐसा लगता है की आज की तितलियां किताब में एक स्मृति चिन्ह की तरह दबाकर अपना जीवन खोने के बजाय पंख खोलकर उड़ने का विकल्प चुनना चाहती हैं। इसी संदर्भ में निदा फ़ाज़ली का यह शेर याद आता है-


बाग़ में जाने के आदाब हुआ करते हैं,
किसी तितली को न फूलों से उड़ाया जाए।        
-----------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 07.10.2026 को प्रकाशित) 
------------------------
#DrMissSharadSingh
#डॉसुश्रीशरदसिंह #चर्चाप्लस #सागरदिनकर #charchaplus  #sagardinkar 

No comments:

Post a Comment