Thursday, October 8, 2026

बतकाव बिन्ना की | पितरों खों जिमाओ, मनों जियत भओ खों सोई पूछ लेओ करे | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की
पितरों खों जिमाओ, मनों जियत भओ खों सोई पूछ लेओ करे
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
      कल हमाई परोसन ने हमें अपने बेटा की वीडियो दिखाई। वीडियो दिखात समै बे बड़ी खुस हतीं।
‘‘हमाओ मोड़ा अमेरिका के अटलांटा में रैत आए, मनो बा उते रै के बी अपनी परंपरा ने भूलो। कल ऊने अपने घर के बैकयार्ड में... बैकयार्ड जानत हो?’’ बताउत-बताउत उन्ने हमसे पूछ लओ।
‘‘हऔ, खूब जानत आएं। पीछे को आंगन।’’ हमने कई। बाकी हमें उनकी जेई आदत नईं पुतास आए। हर बात पे बे जेई सोचत आएं के सामने वारो तो कछू जानतई नइयां। बे बात-बात में जेई पूछत आएं के ‘‘तुमने कभऊं देखो आए?’’, ‘‘तुमने कभऊं खाओ आए?’’ सो, उनकी बात सुन के हमाओ मूंड़ भिन्ना गओ।
‘‘हऔ, सो देखो तो कैसो अच्छो पितर जिमाओ आए ऊने।’’ कैत भईं बे हमें वीडियो दिखान लगीं। 
वीडियो में उनको मोड़ा अपने छोटो-सो मोड़ा के संगे ठाड़ो छोटी-सी लुटिया से जल ढार रओ तो। बाप-बेटा दोई ने सिली-सिलाई धुतिया पैन्ह रखी हती। औ सई बी आए। जबे इते रैत वारन से धुतिया बांधत नईं बनत तो बे उते अटलांटा में कां से धुतिया बांध पाहें? फेर दोई बाप-बेटा ने बरा घाईं कछू सामान एक प्लेट पे धरो। औ फेर हमाई परोसन को बेटा कैमरा में देखत भओ बोलो के,‘‘यहां काउ या कौआ नहीं मिलते हैं इसलिए ये सब बाद में कृष्णा मंदिर के डस्टबिन में डालना पड़ेगा।’’
कछू नईं, हमें पतो आए के उते आवारा पशु तो फिरत नइयां औ उते कोनऊं और पंछी उड़त हुइंए सो यां-वां मेक के फाईन भरबे से तो अच्छो आए के मंदिर के कचरापेटी में डार दओ जाए। काय से के ऊ कचरापेटी को कचरा कऊं तरीके से निपटाओ जात हुइए। बाकी मोए एक बात खटकी।
‘‘काए बुआ, आपको मोड़ा जो कर रओ बा तो भौतई नोनी बात आए, मनो संगे ऊके मोड़ा खों अबे नईं करो चाइए। बा उते ठाड़े हो के देख के सीख सकत आए।’’ हमने कई।
‘‘जेई तो बात आए। हमने सोई रात में मोड़ा से पूछी रई तो बा बोलो के कछू समै बाद तो ऊको मोड़ा बायरे कऊं औ पढ़बे चलो जैहे तो फेर बा देख के कां सीख बाहे सो अबई संगे ठाड़े कर के सिखा रए।’’ उन्ने हमें बताई।
‘‘बात तो सई आए। उते तो तनक बड़े होत सात बच्चा हरें घर से निकर परत आएं। औ अब तो आपको मोड़ा उतई को नागरिक आए औ ऊको मोड़ा तो उतई पैदा भओ आए सो उतई के हिसाब से चलहे। जो अच्छो आए के बा इते को रीत-रिवाज सीख रओ।’’ हमने सोई ऊकी तारीफ करी।
‘‘अरे ने पूछो, जब हम ओरें परकी साल अटलांटा गए रए उन ओरन से मिलबे के लाने तो ऊके मोड़ा ने मोए एक हिन्दी की पोएम सुनाई रई। तब तो औ लोहरो हतो। हमाए मोड़ा ने ऊको खास हम ओरन खों सुनाबे के लाने सिकाओ रओ।’’ बे भारी खुस होत भईं बोलीं।
‘‘आप ओरें इते अकेले काए डरे? ईसें तो अच्छो आए के आप दोई बी मोड़ा के पास चले जाओ। उतई रहियो। आपको पोता बी आप ओरन से कछू औ सीखहे।’’ हमने कई।
‘‘हमें तो इतई अच्छो लगत आए। औ इने तो उते पौंच के इते की औ ज्यादा याद आन लगत आए।’’ बे बोलीं। मनो, उनके बोलबे में दम ने हती। मों पे बी उदासी दिखान लगी।
‘‘सो का भओ? याद तो आपके मोड़ा को बी इते की आउत हुइए। मनो बा तो उते बस गओ आए। होत का आए के जो जां रैत रओ फेर उतई जी लगन लगत आए। औ फेर अपन ओरें कऊं बी रएं, रैहें तो दिल भारतीय ही।’’ हमने उने समझाई।
‘‘अब का कएं बिन्ना! तुमई एक आओ जोन से हम अपने जी की सब कछू कै लेत आएं। ऐसो आए के हमाओ मोड़ा नईं चात आए के हम ओरें ऊके पास रएं।’’ बे दुखी होत भई बोलीं।
‘‘ऐं? ऐसो काएं’’ मोए अचरज भओ। 
‘‘ई लाने के कऊं हम ओरन की संगत में ऊको मोड़ा ने बिगर जाए। फेर हम ओरें उते के ढंग-ढार में ढल नईं पाउत आएं।’’ बे अपने अंसुवां पोंछत भईं बोलीं। 
‘‘चलो कछू नईं, बे ओरे तो उते खुस आएं। आप ओरें तो इतई हम ओरन के संगे रओ। इते कोन कोऊ की कमी आए। इत्ते रिस्तेदार तो उते ने मिलहें जित्ते इते मिल जात आएं। घर से निकरे नईं के जिज्जी, माई, फुआ, बुआ सबई कछू सुनबे खों मिल जात आए।’’ हमने उनको तसल्ली दई।
‘‘मनो मोड़ा तो मोड़ा होत आए।’’ बे सुबकती भईं बोलीं।
‘‘अरे जी ने छोटो करो! कओ कभऊं बा बुला ले उते।’’ हमने उनखों ढाढस बंधाई।
बे अंसुवां पोछत भईं कछू देर इते-उते की बात करत रईं फेर चली गईं।
उनके जाबे के बाद हम सोस में पर गए के जे कोन सो तरीका आए? के बे उते पितरो खों तो जिमा रए औ जिंदा मताई-बाप को संगे नईं राख रए। औ जे खाली उनको नोंई, आजकाल जेई किसां हर घर की। मोड़ा-मोड़ी चाए दूसरे देस में होंए चाए इतई अपने देस में, उने मताई-बाप खों संग राखने में लाज आउत आए। बे पितरों खों जल ढार के अपनो संस्कारी होबे को वीडियो बना के भेज सकत आएं, सोसल मीडिया पे डार सकत आएं, मनो जियत भए अपने मताई-बाप खों एक कटुरिया पानी ने पिया सकत आएं।
अबई परों कोऊ बता रओ तो के एक डुकरिया को ऊके बेटा-बहू ने ऊ टेम लौं पानी पीबे खों नईं दओ जब लौं उन्ने पूरी कथा ने करा लई। बा डुकरिया खों डीहाईड्रेशन हो गओ, ऊको हस्पताल ले जाने परो। जब ऊको दो बोतलें चढाई गईं तब कऊं चेत आओ। चक्कर जे हतो के पंडज्जजी ने कई रई के कथा पूरी होत लौं पूरे परिवार खों निर्जला रैने परहे। अब पंडज्जी खों का पतो के बे ओरें अपनी बूढ़ी मताई खों प्यासे मारहें। बे सोई अपनो मूंड़ पीटत बैठे रए। काए से कऊं बा डुकरिया निपट जाती तो दोस पंडज्जी के मूंड़े बी धरो जातो। 
भओ का आए के हम अपने रीत-रिवाज तो मनाओ चात आएं, मनों उत्तई जित्ते में हमाओ संस्कार को ढिंढोरा पिटत रए। बाकी हमें मताई-बाप की सेवा करनी नईं पुसात। आजकाल के बच्चा हरो खों अपने मताई-बाप ओल्ड फैशन के लगत आएं। काय से के मताई-बाप को दाल-दलिया उनके पिज्जा-बर्गर में फिट नईं बैठत आए। मनों पूरो दोस आजकाल के मोड़ा-मोड़ी को बी ने आए। जो उन्ने अपने मताई-बाप से सीको बेई बे अपने तरीका में ढाल के चला रए। उन्ने अपने मताई-बाप खों दादा-दादी, नाना-नानी खों भगात देखो आए सो बे अपने मताई-बाप से पीछा छुड़ाए फिरत आएं। जेई हमाई परोसन खों देख लेओ। उन्ने अपनी सास खों कभऊं अपने संगे ने रखो, फेर अपने मोड़ा खों पढ़ाई औ कैरियर के लाने अपने से दूर दूसरे सहरन में डारे रखो, सो अब उनके मोड़ा को अपने मताई-बाप से वैसो मोह नइयां, जैसो के होने चाइए। दिखाबो ज्यादा आए, सचाई कम। जेई सीखहे अब ऊको मोड़ा। बा बी बड़ो हो के पुरखन के लाने जिमा दैहे, मनो मताई-बाप खों संगे ने राखहे। जब के हमाई असली संस्कृति तो सरवन कुमार की रई, जोन ने अपने अंधरा मताई-बाप खों अपने कंधा पे रख के तीरथ कराओ। चाहतो तो बा बी नौकरन के संगे अपने मताई बाप खों तीरथ के लाने पठा देतो। सो, हमें अपने संस्कारन को ढोल पीटे के पैले ले देखो चाइए के हम अपने संस्कारन खों कित्तो समझ पाए?
रई बतकाव की तो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लौं जुगाली करो जेई की। मनो सोचियो जरूर ई बारे में के पितरों को जिमाबे में ज्यादा पुन्न मिलहे के जियत भए मताई-बाप की सेवा करे में? का दोई काम बरोबरी से संगे नईं करो चाइए? तनक सोचियो!  
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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