पुस्तक समीक्षा
बुंदेली विरासत को सहेजती : आल्हा समर सारावली
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक - श्री ईश्वरीप्रसाद खरे कृत आल्हा समर सारावली
संपादक - संतोष कुमार पटैरिया
प्रकाशक - वीरेंद्र बहादुर खरे (पौत्र), ओल्ड मीनार, ई-125, सोपनी स्ट्रीट, भोपाल (म.प्र.), दूरभाष - 9753442700
मूल्य - 150/-
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आल्हा काव्य बुंदेली जनमानस में रचा-बसा है। इसमें आल्हा और ऊदल दो भाइयों के वीरता भरे युद्ध का रोचक विवरण है। जागनेर के राजा एवं कवि जगनिक की यह रचना है जिसमें दोनों वीरों के 52 युद्धों की काव्यात्मक कथा है। यह ऐसा काव्य है जिसका पाठ अथवा गायन करते समय भुजाएं फड़क उठती हैं। इसमें ‘‘आल्हा’’ नामक एक विशिष्ट मात्रिक छंद का प्रयोग होता है, जो ढोलक की थाप के साथ वीरगति और प्रवाह में गाया जाता है। आल्हा को मां शारदा (मैहर मध्यप्रदेश स्थित) का विशेष आशीर्वाद प्राप्त था। मान्यता है कि आज भी मंदिर का पट खुलने से पूर्व आल्हा मां शारदा देवी को पुष्प अर्पित करते हैं। ब्रिटिश काल के दौरान भी भारतीय सैनिकों में जोश और युद्ध-कुशलता भरने के लिए आल्हा खंड का प्रयोग किया जाता था। इसी आल्हा काव्य को सारावली के रूप में पहले उर्दू में ‘‘जुल्उतुमरमजिया’’ के नाम से मुंशी मोहम्मद खां पुलिस इंस्पेक्टर के सहयोग से मुंशी ईश्वरी प्रसाद ने लिखा था। यह कृति एक लंबे समय संज्ञान से बाहर रही। फिर महोबा के साहित्यकार संतोष कुमार पटेरिया ने ‘‘आल्हा समर सारावली’’ के नाम से अनुवाद कर प्रकाशित कराया। मुंशी ईश्वरी प्रसाद के अवदान के प्रति साहित्य समाज द्वारा की गई अवहेलना के संबंध में लेखक वीरेन्द्र बहादुर खरे ने पुस्तक के आरंभ में ही ‘‘मुंशी ईश्वरी प्रसाद की साहित्य साधना’’ के अंतर्गत स्पष्ट शब्दों में लिखा है कि ‘‘19वीं सदी में बुन्देलखण्ड में एक ही समय में दो ईश्वरी साहित्य साधना में रत थे। उनमें से एक फागों के ऋतुराज लोकगायक ईश्वरी थे, जो कम से कम बुन्देलखण्ड में परिचय के मोहताज नहीं हैं। पर मैं जिन मुंशी ईश्वरी प्रसाद खरे महोबा निवासी के साहित्य अवदान की बात कहने जा रहा हूँ। उनका उल्लेख पाठ्य पुस्तकीय हिन्दी साहित्य के इतिहास में उल्लेख नहीं है। यहाँ तक कि स्वतंत्रता के बाद के बुन्देली साहित्य पर शोध करने एवं बुन्देलखण्ड के अज्ञात कवियों को प्रकाश में लाने का श्रेय लूटने वाले विद्वानों ने अपने लेखों में इनका उल्लेख तक नहीं किया। जबकि 20वीं सदी के प्रारंभिक वर्षों में किये गये शोधकार्यों में इनका उल्लेख है। पण्डित श्याम बिहारी एवं सुखदेव बिहारी मिश्र बंधुओं के मिश्रबंधु विनोद में एवं दीवान प्रतिपाल सिंह के प्रकाशित बुन्देलखण्ड का इतिहास प्रथम खण्ड में उनका उल्लेख है। उनकी मृत्यु के लगभग 75 वर्ष बाद मुंशी ईश्वरी प्रसाद का उल्लेख छतरपुर के विद्वान डॉ. बहादुर सिंह परमार एवं डॉ. हरि सिंह घोष द्वारा संपादित एवं आदिवासी लोककला अकादमी द्वारा प्रकाशित बुन्देलखण्ड की छंदबद्ध काव्य परम्परा प्रकाशन वर्ष 2005 में किया गया है। मुंशी ईश्वरी प्रसाद श्रीवास्तव खरे का जन्म सन् 1829 में कन्नौज उ.प्र. में हुआ।’’
इस प्रकार ‘‘आल्हा समर सारावली’’ एक बार पुनः साहित्य जगत के संज्ञान में आई। मूल पुस्तक में इसके सृजन के संबंध में लिखा गया है कि ‘‘जाहिर महान की शूरता का कर्तव्य का सत्य बखान जिसको मुंशी ईश्वरी प्रसाद हेड मास्टर पेन्शिनियर वाल हमीरपुर व वर्तमान हाल निवासी महोबा ने अपनी किताब "जुल्दतुलरमजिया" जो कि आज्ञानुसार श्रीमान् जनाब मुंशी मोहम्मद खाँ सहिब इन्सपेक्टर पुलिस के जवान उर्दू में बनायी गई थी। उसका उल्था जबान हिन्दी में आज्ञानुसार श्रीमान् बनाफर वंश अवतंस जनाब ठाकुर सभासिंह साहिब रईस कस्बा कुलपहाड़ के प्रेमी स्वजन अवलोकन के हेतु किया।’’
पुस्तक की मूल सामग्री को इन शीर्षकों में प्रस्तुत किया गया है- चन्द्रब्रह्म का जन्म, चन्देलवंश की उत्पत्ति, बनाफर कौम की उत्पत्ति एवं कालिंजर, चंदेलवंश के राजा (राजा परमालदेव तक), माहिल परिहार का वृतान्त, चन्देलवंश के नियम भंग एवं मनियादेव, दस्सराज, वक्षराज, सैयद तालन का परिचय और करंगाराम का आक्रमण, मड़ौं की लड़ाई, पंडित ढौवा (ढेबा) का वृतांत और क्षत्रिय जाति की रीति, आल्हखण्ड में वर्णित अन्य युद्ध, राजा परमाल और पृथ्वीराज चैहान तृतीय के मध्य द्वेष, महोबा से आल्हा ऊदल का निष्कासन, अन्य युद्ध और आल्हा को कन्नौज से लाना, राजा समरजीत उर्फ रणजीत व अन्य जाति के राजवंश, बुन्देलवंश की उत्पत्ति और अर्जुनपाल, चम्पतराय आदि, सरदार दलेल खाँ का जगतराज पर आक्रमण, महोबा में पूर्व दिशा के स्थान, महोबा में पश्चिम दिशा के स्थान, महोबा बस्ती के अन्दर देव स्थान, शिलालेख व मूर्ति का चित्र, बनाफर वंशावली-स्व. दीवान प्रतिपाल सिंह।
पुस्तक के संपादक संतोष कुमार पटैरिया ने ‘‘भूमिका’’ में लिखा है कि ‘‘परम्परागत यह बात आती रही है कि बारहवीं शताब्दी में महोबा में चन्देल राजा परमर्दिदेव प्रथम उपाख्य परमाल (सन् 1165-1203 ई) के यहां जनकवि जगनिक ने आल्हखण्ड लिखा है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपने ‘‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’’ में जगनिक की कृति परमाल रासो का उल्लेख किया है। बाबू श्याम सुन्दरदास ने दो पाण्डुलिपियों के संकलन को परमाल रासो नाम दिया है जो नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी ने प्रकाशित किया है। आल्हखण्ड का कथानक भिन्न रूप में कई ग्रन्थों भविष्य महापुराण, जगतराज की दिग्विजय सहित आल्हा गायकों के गायन को लिपिबद्ध करके प्रकाशित पुस्तकों में भी मिलता है। पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर आल्हखण्ड की कथा की पुष्टि भी होती है। सन् 1881 में चौधरी घासीराम द्वारा लिखित आठ प्रसंग प्रकाशित हुये थे। सन् 1865 में फर्रुखाबाद के तत्कालीन जिलाधिकारी सर ईलियट ने आल्हखण्ड प्रकाशित कराया था जिसमें मुख्यतः कन्नौजी गायकी में कथानक निहित थे। फिर लगभग पैंतालीस वर्षों बाद सन् 1910 प्रस्तुत कृति आल्हा समरसारावली प्रकाशित हुई थी। कृतिकार श्री ईश्वरी प्रसाद खरे ने बचपन में कन्नौज में आल्हा गायन सुना। सन् 1872 व 1884 में जनरल कनिंघम ने बुन्देलखण्ड में पुरातात्विक स्थल व शिलालेख खोजे किन्तु उनका प्रकाशन न होने के कारण श्रद्धेय खरे जी को शिलालेखों में निहित इतिहास की जानकारी नहीं हो सकी। खरे जी ने आल्हखण्ड व महोबा के दर्शनीय स्थलों का वर्णन अपनी उर्दू में लिखी कृति जुल्द तुलरमजिया में मुहम्मद मुस्तफा खां पुलिस इंस्पेक्टर की प्रेरणा से किया फिर कुलपहाड़ के श्री सभा सिंह बनाफर की प्रेरणा से उसका हिन्दी में अनुवाद किया और ‘‘आल्हा समर सारावली’’ कृति को नाम दिया। ज्ञातव्य है कि उस समय श्री खरे जी कुलपहाड़ में सरकारी स्कूल में हेड मास्टर थे। उर्दू की पुस्तक के प्रकाशन का विवरण नहीं मिलता है।
इस कृति में लेखक ने आल्हखण्ड के पात्रों के बारे में उस समय प्रचलित कथानक के आधार पर लिखा है उस समय इतिहासकार लाला भगवानदीन थे संभव है कि लेखक ने हरिकेश कृत जगतराज की दिग्विजय भी पढ़ी हो, और जिससे जो जानकारी मिली, खरे जी ने उस जानकारी का उपयोग किया। शिलालेखों के आधार पर चन्देल राजाओं का शासनकाल निश्चित किया गया। अतः सन् 1165 से सन् 1203 तक राजा परमर्दिदेव प्रथम के शासन काल में आल्हा ऊदल हुये। ऊदल का निधन वर्तमान जनपद जालौन के बैरागढ़ में हुई अन्तिम लड़ाई में हुआ जो कि सन् 1182-83 में हुआ था। जनपद ललितपुर के मदनपुर में सड़क के किनारे बने शिव मंदिर में उत्कीर्ण शिलालेख सम्वत् 1239 का है। इससे यह सिद्ध होता है कि महोबा में लगभग सत्रह वर्ष तक रहे इसी अवधि में उनका कन्नौज में रहने का काल सम्मिलित है। बैरागढ़ के युद्ध के पूर्व ही परमर्दिदेव प्रथम कालिर्जिर दुर्ग में चले गये जहाँ 27 अप्रैल 1203 में रज्जब की पहली तारीख सोमवार को उनका निधन हुआ। इन सत्रह वर्षों में ही युद्धों में आल्हा ऊदल, ताल्हन सैयद, मलखान, ढेवा आदि की सहभागिता रही। इसी मध्य आल्हा का पुत्र इन्दल हुआ। हर काल में लोक कवियों ने आल्ह खण्ड में वर्णित प्रसंगों को विस्तार दिया और युद्धों की संख्या 52 तक पहुँच गई। सन् 1182 के श्रावणमास के कीर्तिसागर तट पर हुये युद्ध को भुजरियों की लड़ाई भी कहा जाता है। पृथ्वीराज चौहान जो कि चन्देलकाल में थे उन्हें इतिहास में पृथ्वीराज चौहान तृतीय कहा जाता है। उनके किसी भी शिलालेख में महोबा में हुए युद्ध का वर्णन नहीं है और न ही महोबा विजय का उल्लेख है। केवल वर्तमान जनपद ललितपुर के पुराने मदनपुर में शीघ्रतावश उत्कीर्ण किये गये तीन लघु शिलालेख वर्तमान में आल्हा ऊदल की कचहरी कहे जाने वाले भवन की भीतरी दीवारों में है। इसमें एक शिलालेख में जेजाभुक्ति के स्थान पर जेजाकभुक्ति लिखा है। शीघ्रता में कोई तिथि नहीं लिखी गई। भाषा यह है- "ओम ! अरूणोराजस्य पौत्रना श्री सोमेश्वर सुनुना जेजाकभुक्ति देसोयम पृथ्वी राजना लुंठितः सम्वत् 1239।’’
दरअसल जब हम साहित्य और इतिहास की कृतियों को सहेजने में भेदभाव करने लगते हैं तो ‘‘जुल्उतुमरमजिया’’ उर्फ़ ‘‘आल्हा समर सारावली’’ जैसी महत्वपूर्ण कृतियां अवहेलना की चादर में ढंक कर रह जाती हैं और फिर धीरे-धीरे खो जाती हैं। ऐसी तमाम कृतियों को लुप्त अथवा नष्ट होने से बचाने के लिए आवश्यक है कि उनका पुनः प्रकाशन कराया जाए। यही महती कार्य किया है संतोष कुमार पटैरिया ने। उन्होंने ‘‘आल्हा समर सारावली’’ का संपादन करते हुए पुस्तक में स्व. श्री माधव प्रसाद स्वर्णकार का स्मरण करते हुए ‘‘महोबा नगर का मुकम्मिल इतिहास’’ तथा पं. हरिविष्णु अवस्थी का लेख भी रखा है।
वस्तुतः आल्हा ऊदल द्वारा लड़ी गई 52 लड़ाइयों के बारे में जानना एवं पढ़ना बुंदेलखंड के शौर्य एवं वीरता से स्वयं को जोड़ने के समान है। ये लड़ाइयां मात्र लड़ाइयां नहीं थीं यह भारतीय संस्कृति की वे मूल परिचायक थीं जिनमें आत्मसम्मान एवं स्वाभिमान की गाथा सिमटी हुई थी। प्रायः 52 युद्धों का काव्यात्मक इतिहास ‘‘आल्हा’’ पढ़ पाना सबके लिए संभव नहीं हो पाता है, ऐसे में ‘‘आल्हा समर सारावली’’ संक्षेप में और गद्य में उन चर्चित युद्धों का सम्पूर्ण विवरण संक्षेप में उपलब्ध कराता है, जिसे पढ़ कर ‘‘आल्हा’’ काव्य के कलेवर को जाना और समण जा सकता है। यह कृति बुंदेली विरासत को सहेजने की दिशा में अति महत्वपूर्ण है। यह पुस्तक न केवल पुरातन साहित्य को पुनः प्रकाश में लाने का कार्य करती है अपितु बुंदेला इतिहास के एक महत्वपूर्ण अंश को भी पुनः संरक्षित करती है।
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