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Wednesday, April 6, 2016

लिंग, धर्म और बहस का खूंटा ... इंडिया इन साइड (वामा) ... डॉ. शरद सिंह

India Inside, March 2016 -Dr Sharad Singh's Article


‘इंडिया इन साइड’ के March 2016 अंक में ‘वामा’ स्तम्भ में प्रकाशित मेरा लेख 
वामा
        लिंग, धर्म और बहस का खूंटा
                   - डॉ. शरद सिंह
भ्रूण के लिंग परीक्षण पर पाबंदी लगाए जाने के लगभग 20 साल बाद केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी मेनका ने बालिका भ्रूण हत्या रोकने के लिए भ्रूण के लिंग परीक्षण को अनिवार्य करने की जरूरत बताकर इस मुद्दे पर बहस छेड़ दी। यह इतना संवेदनशील मुद्दा है कि इस पर वाद-विवाद होना स्वाभाविक था। उस पर आईएमए ने मेनका गांधी के बयान के आधार पर संकेत दे दिया कि भ्रूण के लिंग परीक्षण पर लगी पाबंदी हट सकती है। उन्होंने इस मसले पर मंत्रालय की ओर से संबंधित पक्षों की ओर से रखी गई बात को ही आगे बढ़ाया है। हर गर्भधारण रजिस्टर किया जाए और भ्रूण का लिंग उसके माता-पिता को बता दिया जाए। यदि पेट में बच्ची पल रही है कि तो डिलीवरी को ट्रैक और रिकॉर्ड किया जा सकता है। इस संबंध में यह भी कहा गया कि मंत्रालय ने कोई औपचारिक प्रस्ताव नहीं भेजा है। यह सिर्फ एक सुझाव है, जिस पर बहस होनी चाहिए। आईएमए इस विषय पर मंत्री का समर्थन करता है। तर्क यह भी था कि यदि भ्रूण बालिका का हो तो उसकी उचित देख-भाल की जा सकती है। यह तर्क भी विवादास्पद। भला बालक-भ्रूण की क्या अवहेलना की जाएगी, फिर इसकी क्या गारंटी की बालिका भ्रूण होने पर कानूनी, गैरकानूनी तरीके से गर्भपात का प्रयास नहीं किया जाएगा, जिन अस्पतालों में बच्चे बदले जा सकते हैं वहां क्या ट्रैक और रिकॉर्ड तैयार नहीं किया जा सकता है।
बहुत से प्रश्न खड़े हो जाना स्वाभाविक था और हुए भी। इस बहस में भाग लेते हुए अभिनेत्री एवं राजनीतिज्ञ नगमा ने महत्वपूर्ण तर्क दिया कि गर्भ में कन्या-भ्रूण के होने का पता चलने पर, भले ही उस भ्रूण को न मारा जा सके किन्तु उस गर्भवती को अपने परिवाजन से नौ महीने तक जो असंख्य प्रताड़नाएं सहनी पड़ेंगी, उसका कौन जिम्मेदार होगा, यहां राजनीति के पक्ष को छोड़ दिया जाए तो एक स्त्री के नाते नगमा का तर्क खरा उतरता है। जिस समाज में बेटी पैदा करने वाली माताओं को अपने परिवार से जीवन भर ताने सुनने पड़ते हैं और यातनाएं सहनी पड़ती हैं, उस समाज में परिवार द्वारा अनचाहे गर्भ को अपनी कोख में रखने वाली गर्भवती को न जाने कितनी यातनाओं से गुज़रना पड़ेगा। जबकि गर्भवती होने की अवस्था वह अवस्था है जिसमें एक स़्त्री को भरपूर देखभाल की आवश्यकता होती है। उसे मानसिक एवं पारिवारिक सुखद वातावरण की आवश्यकता होती है। क्या विपरीत परिस्थितियों में उसे ऐसा सुखद वातावरण मिल सकेगा।   
भ्रूण परीक्षण केन्द्रों पर पाबंदी लगाए जाने के बाद पिछले दस वर्ष के आंकड़े बताते हैं कि पहले की अपेक्षा उन राज्यों में कन्या जन्म दर में अपेक्षित सुधार आया, जिन राज्यों में कन्या भ्रूण की जन्म दर तेजी से घट रही थी। ऐसी दशा में भू्रण के लिंग परीक्षण को वैध बनाना क्या उचित होगा। यह कटु सत्य है कि लड़का होने पर उस भ्रूणके  साथ कोई छेड़छाड़ नहीं होती, किंतु लड़की की इच्छा न होने पर उस भ्रूणसे छुटकारा पाने की प्रक्रिया अपनाई जाती है। चिकित्सकीय दृष्टि से अत्यावश्यक होने पर ही लिंग परीक्षण किया जाए, यह व्यवस्था ही वर्तमान सामाजिक परिवेश में उचित जान पड़ती है। इस दृष्टि से भ्रूण का लिंग शिशु के जन्म के पूर्व पता न लगने देना, उस भू्रण के प्रति मानवीय कदम होगा जो परीक्षण के बाद भेदभाव का शिकार बन सकता है। समाज की सोच अभी इतनी नहीं बदली है कि पुत्र और पुत्री में भेदभाव समाप्त हो गया हो। 
दूसरा मुद्दा महाराष्ट्र के शिंगणपुर के शनि मंदिर में स्त्रियों द्वारा पूजा के अधिकार का रहा। महाराष्ट्र के शनि शिंगणापुर मंदिर में एक महिला के शनिदेव को तेल चढ़ाने से विवाद शुरू हो गया है। यह मंदिर महाराष्ट्र में शिरडी के पास ही स्थित है। शनि भगवान की स्वयंभू मूर्ति काले रंग की है। 5 फुट 9 इंच ऊँची व 1 फुट 6 इंच चैड़ी यह मूर्ति संगमरमर के एक चबूतरे पर धूप में ही विराजमान है। लगभग तीन हजार जनसंख्या के शनि शिंगणापुर गांव में किसी भी घर में दरवाजा नहीं है। कहीं भी कुंडी तथा कड़ी लगाकर ताला नहीं लगाया जाता। इतना ही नहीं, घर में लोग आलीमारी, सूटकेस आदि नहीं रखते। लोग घर की मूल्यवान वस्तुएं, गहने, कपड़े, रुपए-पैसे आदि रखने के लिए थैली तथा डिब्बे या ताक का प्रयोग करते हैं। केवल पशुओं से रक्षा हो, इसलिए बांस का ढंकना दरवाजे पर लगाया जाता है। यहां पर कभी चोरी नहीं हुई। यहां आने वाले भक्त अपने वाहनों में कभी ताला नहीं लगाते।
मंदिर में शनि महाराज की शिला खुले में रखी गई है। वहां दूर से दर्शन होते हैं। चबूतरे के पास तक सिर्फ पुरुष जा सकते थे। कहा जाता है कि लगभग 400 वर्षों से इस मंदिर के भीतर महिला के पूजा की परंपरा नहीं रही है, ऐसे में महिला द्वारा मंदिर के चबूतरे पर चढ़कर शनि महाराज को तेल चढ़ाने पर पुजारियों ने मूर्ति को अपवित्र घोषित कर दिया। मंदिर प्रशासन ने छः सेवादारों को निलंबित कर दिया है और मूर्ति का शुद्धिकरण किया गया है। बढ़ते विवाद को देखते हुए जहां पूजा करने वाली महिला ने यह कहते हुए प्रशासन से माफी मांगी है कि उसे परंपरा की जानकारी नहीं थी। इसके बाद मूर्ति को अपवित्र मानते हुए मंदिर प्रशासन ने शनिदेव का दूध से प्रतिमा का अभिषेक किया। इस घटना के विरोध में समूचे देश के कोने-कोने से विरोध के स्वर फूट पड़े। ग्राम सभा ने घटना पर कार्रवाई करते हुए जहां छः सेवादारों को निलंबित कर दिया, वहीं घटना के विरोध में शनि शिंगणापुर में बंद का एलान भी किया गया। अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति की सदस्य रंजना गवांदे ने आगे आते हुए कहा कि जब देश में महिला-पुरुषों को बराबरी हासिल है तो कई मंदिरों में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी क्यों है? शनि शिंगणापुर में यह क्रांतिकारी घटना हुई है। इस पर राजनीति न हो और मंदिर को महिलाओं के लिए खोला जाए।
आध्यात्मिक गुरु श्रीश्री रविशंकर ने विवाद सुलझाने के लिए सुझाव दिया कि पुरुषों को भी पवित्र चबूतरे पर चढ़ने नहीं दिया जाए। भूमाता ब्रिगेड ने भी इस बात का समर्थन किया कि जब महिलाओं को  तेल चढ़ाने का अधिकार नहीं है तो पुरुषों को भी अधिकार नहीं होना चाहिए। उल्लेखनीय है कि लगभग 15 वर्ष पूर्व भी शनि शिंगणापुर मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध का विरोध हुआ था, तब जानेमाने रंगकर्मी डॉ. श्रीराम लागू भी महिलाओं के पक्ष में मुहिम से जुड़े थे।
तो ये रहा 21वीं सदी के दूसरे दशक के बीच का परिदृश्य। स्त्री आज भी अपने जीवन-अस्तित्व के लिए जूझ रही है और धार्मिक मंच पर अपना अधिकार ढूंढ रही है, ठीक उसी तरह जैसे 18 वीं और 19 वीं सदी में जूझती रही। स्त्री की प्रगति की डोर मानो बहस के उस खूंटे से बंधी है जहां लिंग और धर्म ही हमेशा ज्वलंत मुद्दा रहा है। सदियां बदल गईं लेकिन हमारी सामाजिक सोच इनसे आगे बढ़ ही नहीं पाई है। इन दोनों विवादों को देख कर यही लगता है, गोया -
             रास्ते खोए हुए, मंजि़ल गुमी जैसे कहीं
             चले थे हम जहां से, आ गए हैं फिर वहीं
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Tuesday, June 17, 2014

विवाहेत्तर संबंधों का राजनीतिक एपीसोड ....

वामा 
                                                                                         - डॅा. (सुश्री) शरद सिंह

 कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने टीवी पत्रकार अमृता राय के साथ अपने रिश्ते की बात ट्विटर पर स्वीकार की तो लोग भैचक्के रह गए। उनका यह ट्वीट उनकी कुछ निजी तस्वीरों के सार्वजनिक होने के बाद आया। दिग्विजय सिंह के वेरिफाइड अकाउंट से ट्वीट किया गया कि मुझे अमृता राय के साथ अपने रिश्ते को स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं है। अमृता राय ने अपने पति के साथ तलाक के लिए अर्जी दाखिल कर दी है।साथ ही उन्होंने आगे लिखा कि एक बार ये तय हो जाए तो हम इस रिश्ते को औपचारिक रूप दे देंगे। लेकिन मैं अपनी निजी जिंदगी में ताकझांक की निंदा करता हूं।
वहीं दूसरी ओर अमृता राय ने ट्वीट किया, ‘मैं अपने पति से अलग हो चुकी हूं। हमने तलाक के लिए अर्जी दे दी है। इसके बाद मैंने दिग्विजय सिंह से शादी करने का फैसला किया है।
India Inside, June 2014, Page 19

दिग्विजय सिंह के प्रेम संबंध के इस खुलासे के बाद राजनीतिक समाज में मानो बवाल मच गया। आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली के पूर्व मंत्री सोमनाथ भारती ने दिग्विजय सिंह के ट्वीट पर प्रतिक्रिया देते हुए ट्वीट किया कि यह घृणित और खतरनाक है।भारती के इस ट्वीट ने समाजशास्त्रियों के लिए एक ज्वलंत चिन्तन सामने ला पटका कि विवाहेत्तर संबंध क्या सचमुच चरित्रहीनता की निशानी है? यदि आम नागरिक के संदर्भ में यह प्रश्न उठता तो बेझिझक हांमें ही उत्तर होता। किन्तु जिन्हें समाज को दिशा देने वाला माना जाता है यदि वे यानी राजनेता ही विवाहेत्तर संबंधों में लिप्त हों तो उत्तर ढूंढना जरूरी हो जाता है। इससे पहले शशि थरूर और सुनन्दा पुष्कर का प्रकरण सामने आया था जिसका दुखद अंत हुआ।
अपनी संदेहास्पद मृत्यु से ठीक दो दिन पहले ट्विटर पर अपने पति व केन्द्रीय मानव संसाधन राज्यमंत्री शशि थरूर और पाकिस्तानी महिला पत्रकार मेहर तरार के प्रेम प्रसंग को सार्वजनिक करने वाली सुनन्दा पुष्कर होटल लीला के कमरा नंबर 345 में संदिग्ध हालातों में मृत पाई गई। ट्विटर पर सुनन्दा द्वारा की गई टिप्पणियों से स्पष्ट था कि वह थरूर और मेहर तरार के बीच पैदा हुई नजदीकियों से बेहद आहत थी। मृत्यु से दो दिन पूर्व सुनन्दा ने ट्विटर पर लिखा था कि शशि थरूर बेवफा हो गए हैं और उन्हें पाकिस्तानी महिला मेहर तरार से प्यार हो गया है।
वर्ष 2010 में भी केन्द्रीय विदेश राज्यमंत्री होते हुए भी शशि थरूर के प्रेम संबंधों के चर्चे उस समय सुर्खियों में आए थे जब उन्होंने आईपीएल टीमों की नीलामी के समय केरला टीम में सुनन्दा पुष्कर को मुफ्त में हिस्सेदारी दिलाई थी। उस समय शशि थरूर का नाम खुल कर सुनन्दा पुष्कर से जुड़ा था। विवादों के बीच थरूर को मंत्री पद त्यागना पड़ा था, लेकिन कुछ समय बाद उन्होंने सुनन्दा से विवाह कर उन तमाम खबरों को सच साबित कर दिया जिसमें उनके और सुनन्दा के बीच प्रेम प्रसंग को प्रमुखता दी गई थी। थरूर ने सुनन्दा के साथ विवाह कर तीसरी बार दाम्पत्त्य जीवन की शुरूआत की थी, जबकि इससे पहले वह दो बार इस रिश्ते को निभाने में असफल रहे थे। किन्तु विवाह में परिवर्तित हुए इस प्रेम संबंध का ऐसा अंत हुआ जिसके बारे में किसी ने सोचा भी नहीं था।
चूंकि शशि थरूर का नाम प्रेम प्रसंगों के संदर्भ में प्रायः आता रहा था इसलिए सुनंदा और फिर मेहर के साथ उनके नामों को लिए जाने में आश्चर्य कम और चटखारे अधिक थे। किन्तु दिग्विजय सिंह की एक गंभीर किस्म के व्यक्ति की छवि रही अतः लोगो का चैंकना स्वाभाविक था। 67 साल के दिग्विजय सिंह की पत्नी आशा सिंह का पिछले साल कैंसर से निधन हो चुका है। वहीं 43 साल की अमृता राय के पति आनंद प्रधान आईआईएमसी में एसोसिएट प्रोफेसर हैं। दिग्विजय और अमृता के संबंधों का समाचार सामने आते ही सबका ध्यान आनंद प्रधान की ओर गया कि एक पति होते हुए वे अपनी पत्नी के विवाहेत्तर संबंध के बारे में क्या सोचते हैं? जल्दी ही आनंद प्रधान ने फेसबुक पर पोस्ट लिखकर अपनी बात रखीं. उन्होंने अपनी फेसबुक पोस्ट में यह लिखा-‘‘एक बड़ी मुश्किल और तकलीफ से गुजर रहा हूं। यह मेरे लिए परीक्षा की घडी है। मैं और अमृता लम्बे समय से अलग रह रहे हैं और परस्पर सहमति से तलाक के लिए आवेदन किया हुआ है। एक कानूनी प्रक्रिया है जो समय लेती है लेकिन हमारे बीच सम्बन्ध बहुत पहले से ही खत्म हो चुके हैं। अलग होने के बाद से अमृता अपने भविष्य के जीवन के बारे में कोई भी फैसला करने के लिए स्वतंत्र हैं और मैं उनका सम्मान करता हूं। उन्हें भविष्य के जीवन के लिए मेरी शुभकामनाएं हैं।’’
Cover Page India Inside June 2014

क्या यह सामाजिक नैतिकता का प्रश्न होने के साथ अपराध की श्रेणी में आता है? भारतीय दण्ड संहिता में किसी विवाहित गैरतलाशुदा स्त्री से शारीरिक संबंध रखा जाना अपराध की श्रेणी में आता है यदि इस संबंध में वह स्त्री, उसका प्रेमी या उसका पति कानूनी आधार पर आपत्ति करे। इसी तथ्य को आधार बना कर भाजपा प्रवक्ता मीनाक्षी लेखी ने कहा था कि ‘‘गुप्त विवाह संभव नहीं है। एक वकील के नाते मैं कह सकती हूं कि अभी तलाक नहीं हुआ है और मामला यौन संबंधों का है।’’ मीनाक्षी लेखी ने कहा था कि इस मामले में दिग्विजय सिंह को सजा भी हो सकती है और ऐसा करना उक्त महिला पत्रकार के पति के अधिकार क्षेत्र में आता है। पति चाहे तो दग्विजय पर केस कर सकते हैं।
विवाहेत्तर संबंधों के मामले में चाहे इसमें स्त्री की प्रवृत्ति हो या पुरुष की प्रवृत्ति, यदि इस प्रेम त्रिकोण में तीनों की सहमति हो तो क्या इसे कानूनी जामा पहनाए बिना भी वैधानिक माना जा सकता है? यह एक बड़ा प्रश्न है। एक ऐसा प्रश्न जिसका उत्तर आमजन और रसूख वालों के लिए एक-सा होना चाहिए। अन्यथा यह भी अन्य अपराधों की तरह क्रीमीलेयरके लिए मान्य और सामान्य तबके के लिए अमान्य समझा जाता रहेगा। यदि पति-पत्नी में परस्पर निर्वाह संभव नहीं रह गया हो तो कानून भी तलाक लेने को गलत नहीं ठहराता है किन्तु तलाक लेने से पूर्व किसी अन्य व्यक्ति को अपना पति या पत्नी मान और उससे दैहिक संबंध बनाना किस हद तक उचित है? क्या समाज को इस खुलेपन को सहज भाव से अपना लेना चाहिए या इसे उच्चवर्गीयअधिकारों के रूप में ही छोड़ देना चाहिए? दिग्विजय सिंह और अमृता राय के परस्पर विवाहेत्तर संबंध के इस राजनीतिक एपीसोड के बाद इस तरह के कई प्रश्न उठ खड़े हुए हैं जिनका उत्तर  समाजशास्त्रियों, कानूनविदों और बुद्धिजीवियों को ढूंढना ही होगा।

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Wednesday, April 23, 2014

राजनीति के समीकरण में महिलाओं का गणित


चुनावी संदर्भ पर विशेष ......
Dr Sharad Singh

मित्रो, ‘इंडिया इन साइड’ के April 2014 अंक में ‘वामा’ स्तम्भ में प्रकाशित मेरा लेख आप सभी के लिए ....
पढ़ें, विचार दें ....आपका स्नेह मेरा उत्साहवर्द्धन करता है.......
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वामा (प्रकाशित लेख...Article Text....)......
राजनीति के समीकरण में महिलाओं का गणित 
- डॅा. (सुश्री) शरद सिंह

राजनीति के समीकरण में महिलाओं के गणित को हर बार इतनी चतुराई से रखा जाता है कि मानो चुनाव परिणाम आते ही यह गणित भी हल हो जाएगा। हर बार की तरह 2014 के लोकसभा चुनाव में भी प्रत्येक राजनीतिक दलों ने अपनी जीत सुनिष्चित करने के लिए महिलाओं रिझाने का हर संभव प्रयास कर किया। किसी ने तैंतीस प्रतिषत आरक्षण का पुराना राग अलापा तो किसी ने रसोई गैस सिलेंडरों की सब्सिडी और गैर सब्सिडी संख्या के पासे फेंके। ग्रामीण एवं पिछड़े वर्ग की महिलाओं को अपने दल के प्रति आकर्षित करने के लिए टी.वी. टॉकशोनुमा कार्यक्रम भी किए गए। कुल मिला कर निचोड़ यही कि प्रत्येक पार्टी की यह मंषा रही है कि महिलाओं के सारे के सारे वोट उनकी झोली में आ कर गिरें। पूरे के पूरे शत-प्रतिशत । लेकिन यही गणित टिकट वितरण के समय नहीं रहता है। चाहे 2004 का आम चुनाव हो या 2009 का, महिला उम्मीदवारों की संख्या पुरुष उम्मींदवारों से बहुत कम रही। यदि प्रत्याशी का चुनाव करने, वोट दे कर उन्हें सांसद या विधायक बनवाने की योग्यता महिलाओं में देखी जाती है लेकिन ऐसा लगता है कि महिला प्रत्याशी के मामले में यह विष्वास कहीं भटक जाता है।

स्वतंत्रता से पहले ही देश में पहली बार 1917 में महिलाओं को राजनीति में भागीदारी की मांग उठी थी, जिसके बाद वर्ष 1930 में पहली बार महिलाओं को मताधिकार मिला। हमारे देश में महिलाएं बेशक राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, लोकसभा में विपक्ष की नेता और लोकसभा अध्यक्ष के साथ-साथ अन्य कई महत्वपूर्ण राजनीतिक पदों पर आसीन रही हैं, लेकिन राजनीति में महिलाओं की भागीदारी में अधिक सुधार नहीं हुआ। इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि संसद में 33 प्रतिशत आरक्षण दिलाने के लिए लाया गया महिला आरक्षण विधेयक कुछ पार्टियों के रवैये के चलते सालों से लंबित पड़ा है। इससे ज्यादा दुख की बात है कि राष्ट्रीय दल भी 10.15 प्रतिशत से अधिक महिलाओं को लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए टिकट नहीं देते हैं। 
एक समय था जब महिलाओं को सक्रिय राजनीति में आने नहीं दिया जाता था। इसलिए नहीं कि महिलाओं में राजनीति की समझ नहीं थी बल्कि इसलिए कि राजनीतिक गलियारों को महिलाओं के योग्य नहीं माना जाता था। निःसंदेह इक्कीसवीं सदी के आरम्भ तक परिदृश्य कहुत कुछ बदला। पंचायतों से ले कर संसद तक महिलाओं की पहुंच दिखाई देने लगी। मगर प्रश्न वही कि इन महिलाओं का प्रतिशत पुरुषों की तुलना में कितना रहा... दस प्रतिशत, बीस प्रतिशत या तीस प्रतिशत। पंचायतों पंच, सरपंच के रूप में क्रियाशील दिखाई देने वाली महिलाओं के सिक्के के दो पहलू हैं। एक पहलू में वे महिलाएं हैं जो अपने दम-खम से पंचायत के निर्णय लेती हैं और गांवों के विकास के ढांचे तैयार करती हैं। दुर्भाग्य से ऐसी महिलाओं का प्रतिशत बहुत ही कम है। अधिसंख्या उन महिलाओं की है जो -महिलाओं के लिए आरक्षित सीट- होने के कारण चुनाव में खड़ी कर दी गईं। परिवार के पुरुषों के दांवपेंच ने उन्हें जिताया और चुनाव जीतने के बाद वे एक बार फिर अपने घर की चैखट के भीतर सिमट कर रह गईं। इसके बाद उनके नाम से उनके -सरपंच पति- उनका काम सम्हालने लगे। जब भी निचले स्तर पर राजनीति में महिलाओं की भागीदारी के आंकड़े सामने रखे जाते हैं तो उन आंकड़ों में यह विभाजनरेखा नहीं होती है। अतः जमीनी सच्चाई से परे ये सुनहरे आंकड़े राजनीति में महिलाओं की तरक्की के शंखनाद करते नज़र आते हैं।

भारत षासन के एक सर्वेक्षण के अनुसार आम चुनाव 2009 में महिलाओं की सबसे बड़ी संख्या 59 लोकसभा में आई थी, जबकि उसके पहले सदन में महिला सदस्यों की संख्या 45 थी। 15वीं लोकसभा में महिलाओं की सदस्यता 10.86 प्रतिशत थी और 13वीं लोकसभा भी 9.02 प्रतिशत सदस्यता के साथ इसके काफी करीब थी। 1996 से निचले सदन में सदैव कम से कम 40 महिलाएं चुनी जाती रही है। महिलाओं की सबसे कम संख्या लोकसभा में 1977 में थी जब मात्र 19 सदस्य ही निचले सदन में पहुंच पायी थी, जो कि लोकसभा की कुल सीटों का महज 3.50 प्रतिशत ही था। इसके अतिरिक्त इतिहास में और कोई दूसरा अवसर नहीं है जिसमें की महिलाएं 20 संख्या तक भी नहीं पुहंच पायी। महिलाओं के चुनाव लड़ने के संबंध में महिला प्रतिभागियों की सर्वाधिक संख्या 1996 के चुनाव में 599 थी जिसके बाद 2009 में 556 महिला उम्मीदवारों की संख्या और 2004 में 355 थी। यह 1980 की सातवीं लोकसभा थी जब महिला उम्मीदवारों ने 100 के आंकड़े को पार किया। उससे पहले महिला उम्मीदवारों की संख्या हमेशा 100 के नीचे ही रही थी। चुनाव लड़ने में महिलाओं की भागीदारी पुरूषों की तुलना में काफी कम हैं। 9वें आम चुनाव तक महिलाओं की भागीदारी पुरूषों से 30 गुना कम थी। जबकि, 10वें आम चुनाव से इस भागीदारी में सुधार हुआ। 

राजनीति में महिलाओं के स्वतंत्र अस्तित्व के न्यून आंकड़ों के पीछे कहीं राजनीति और अपराध की परस्पर भागीदारी तो जिम्मेदार नहीं है, इस प्रश्न को टटोलना भी जरूरी है। यदि विगत कुछ दशकों के पन्ने पलटे जाएं तो कए भयावह दृश्य आंखों के समाने उभरने लगता है। एक चेहरा उभरता है नैना साहनी का जो दिल्ली प्रदेश युवा कांग्रेस की महासचिव थी। नैना के पति सुशील शर्मा उसी दल में प्रदेश युवक कांग्रेस अध्यक्ष थे। सुशील शर्मा नैना को तंदूर में जलाने के अभियुक्त पाए गए। नैना की तरह सुषमा सिंह भी जघन्य अपराध की शिकार हुई। सुषमा सिंह को मगरमच्छ को खिला दिया गया था। इसी तरह मधुमिता शुक्ला, गीतिका शर्मा, पूर्णिमा सिंह, शहला मसूद आदि अनेक ऐसे नाम हैं जो राजनीति की सीढि़यां चढ़ ही रही थीं कि उनके अस्तित्व को ही मिटा दिया गया। यह राजनीति का हिंसात्मक रूप ही है जो आम महिलाओं को राजनीति की ओर मुड़ने से संभवतः रोकता है। इसके परे वही दूसरा तथ्य कि राजनीतिक दलों में पुरुषों का वर्चस्व व्याप्त है। अपराधी प्रवृत्ति के पुरुषों को यह नागवार गुजरता होगा कि कोई महिला उनसे आगे कैसे बढ़ रही है। 
भारतीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी पुरुषों के बराबर होनी चाहिए लेकिन ऐसा तभी संभव है जब प्रत्याशी के रूप में भी महिलाओं की योग्यता पर उतनी ही विश्वास किया जाए जितना कि एक मतदाता के रूप में किया जाता है। 2014 के आम चुनाव में जिस तरह प्रत्येक दलों ने महिला मतदाताओं को रिझाने का प्रयास किया, उसी तरह प्रत्याशी का टिकट देते समय भी किया गया होता तो इस चुनाव में ही महिला उम्मीदवारों की संख्या बढ़ गई होती। महिलाओं के हित में योजनाओं के निर्माण और क्रियान्वयन के लिए सक्रिय राजनीति में महिलाओं की अधिक से अधिक भागीदारी आवश्यक है।

India Inside, April 2014-page-017

Saturday, March 8, 2014

विधवाओं की दुर्दशा कब तक?




Dr Sharad Singh
महिला दिवस पर विशेष ......
मित्रो, ‘इंडिया इन साइड’ के March 2014 अंक में ‘वामा’ स्तम्भ में प्रकाशित मेरा लेख आप सभी के लिए ....
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आपका स्नेह मेरा उत्साहवर्द्धन करता है.......

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 (प्रकाशित लेख...Article Text....)......
                                                                                                    
                                                            - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह


हे र्इश्वर!
तू मुझे अगले जन्म में भी औरत ही बनाना
पर नहीं होने देना विधवा
नहीं भेजना मथुरा, वृन्दावन
नहीं देना अपनों का परायापन
मुझे हर जन्म में औरत होना ही क़बूल है
बस, तू मुझे रखना मनुष्यों के नहीं
मनुष्यता के बीच.....
मुझे हर जन्म में औरत होना ही क़बूल है....

मुझे याद आ रही है 'एक प्रार्थना शीर्षक की अपनी एक कविता। मार्च का महीना है न, और इस मार्च के महीने में 08 मार्च को 'महिला दिवस मनाया जाता है। हम मानने और मनाने में अग्रणी हैं। हम स्त्री को देवी मानते हैं और देवी तो काल्पनिक होती है। किसी भी देवी को किसी ने देखा नहीं है। फिर स्त्री का देवी रूप काल्पनिक ही तो हुआ न!
'एक प्रार्थना कविता में मथुरा या वृन्दावन में रहने वाली विधवा स्त्री की वेदना है। एक विधवा जिसे अपनों ने त्याग दिया और छोड़ दिया कहीं भी जा कर मरने को। ऐसी ही विधवाओं को सहारा मिलता है मथुरा, वृन्दावन के विधवाश्रमों में। चाहे सरकारी संस्थान हों या गैरसरकारी, वहां के सुव्यवस्थाओं और कुव्यवस्थाओं के ब्यौरे में जाने की आवश्यकता नहीं है। क्यों कि यह किसी से छिपा नहीं है। यदि करोड़ों की राशि खर्च कर के हम 40 साल पुरानी सैन्य-पनडुब्बी को 'अपडेट करते रहने का दम भर सकते हैं तो किसी विधवा-आश्रम में आर्थिक अनियमितता या कुव्यवस्थाएं तो बहुत छोटी बात हैं। ग़रीब आटोरिक्शा चालकों को हर दस साल में विवश किया जाता है कि वे अपने आटोरिक्शा बदल दें ताकि दुर्घटना को न्योता देने वाले पुराने वाहन सड़क से हट जाएं। वहीं चालीस साल पुरानी, छब्बीस साल पुरानी टेक्नालाजी वाली पनडुबिबयों को कैसे 'अपडेट किया जाता रहा? इतने पुराने स्कूटर्स तक के पाटर्स बाज़ार में नहीं मिल पाते हैं। लिहाजा जब देश की सुरक्षा पर भ्रष्टाचार के दांव खेले जा सकते हैं तो बेसहारा विधवाओं के लिए सुव्यवस्था की उम्मीद कैसे की जा सकती है। 
क्या हम कठोर हो गए हैं या हमारे आंसू सूख गए हैं? जबकि बी.बी.सी. के संवाददाता एंथोनी डेंसलोव का दिल रो पड़ा वृन्दावन की विधवाओं की दशा देख कर और उसने एक रिपोर्ट लिखी -'' कृष्ण के वृंदावन में अब गोपियाँ नहीं विधवाएं मिलती हैं। यह रिपोर्ट 25 मार्च 2013 को सामने आर्इ  थी। अपनी रिपोर्ट में एंथोनी डेंसलोव ने लिखा था कि -'' भारत में हर साल हजारों विधवाएं उत्तर प्रदेश के वृंदावन का रुख़ करती हैं. परिवारवालों ने उन्हें छोड़ दिया है और अब इस दुनिया में वे अकेली हैं। इनमें से कुछ तो सैकड़ों मील का सफ़र तय करने के बाद वृंदावन पहुंचती हैं लेकिन कोई नहीं जानता कि वो ऐसा क्यों करती हैं। भारत में मंदिरों और र्धामिक स्थलों की भरमार है। लेकिन यमुना के तट पर सिथत वृंदावन का खास महत्व है क्योंकि ये कृष्ण की नगरी है। वृंदावन में सैकड़ों मंदिर हैं और यहां हर किसी की जुबान पर कृष्ण और उनकी प्रेमिका राधा का ही नाम है। हर साल दुनियाभर से लाखों की संख्या में कृष्ण भक्त यहां पहुंचते हैं। लेकिन इस सबसे दूर वृंदावन का एक स्याह पहलू भी है। इसे विधवाओं के शहर के नाम से भी जाना जाता है। मंदिरों के बाहर आपको सादी सफेद साड़ियां पहने ये विधवाएं भीख मांगते मिल जाएंगी। इनमें से अधिकांश उम्रदराज होती हैं। भारत में विधवाएं अब सती नहीं होती हैं लेकिन जिंदगी अब भी उनके लिए बदतर है। विधवाओं को अशुभ माना जाता है. तमाम कानूनों के बाद आज भी उन्हें पति की संपतित से बेदखल कर दिया जाता है और वे दर-दर भटकने के लिए मजबूर हो जाती हैं। धार्मिक ज्ञान से भरे लोग हो या समाजशास्त्री इस सवाल का ठोस जवाब किसी के पास नहीं है कि वृंदावन में ऐसा क्या है कि पूरे भारत से खासकर बंगाल से विधवाएं यहां का रुख़ करती हैं। केवल वृंदावन में ही छह हजार विधवाएं हैं और आसपास के इलाक़ों में भी बड़ी संख्या में विधवाओं ने अपना ठिकाना बना रखा है। दूर दूर से विधवाएं वृंदावन में आकर रहती हैं। इनमें से कई तो अपनी बची खुची जिंदगी को राधा कृष्ण की सेवा में लगाने के इरादे से यहां पहुंचती है जबकि बाकी अपने परिजनों की बेरुखी और ज्यादतियों से बचने के लिए वृंदावन का रुख करती हैं। ये भारतीय समाज का ऐसा पहलू है जिसे सरकार दुनिया की नज़रों से छिपाना चाहेगी क्योंकि लाख कोशिशों के बावजूद ये समस्या सुलझाई नहीं जा सकी। 
एंथोनी डेंसलोव आगे लिखते हैं कि ''इनमें से कुछ पश्चिम बंगाल से 100 मील से भी अधिक दूरी तय करके यहां पहुंची हैं. कई बार वे खुद यहां पहुंचती हैं और कई बार उनके परिजन उन्हें यहां छोड़ जाते हैं। सैफ अली दास 60 साल की हैं लेकिन जमाने की मार ने उन्हें वक्त से पहले ही बूढ़ा बना दिया है. उन्होंने कहा कि उनके पति पियक्कड़ थे और 12 साल पहले उनका देहांत हो गया था। उनकी एक बेटी थी जो अस्पताल में चल बसी और बेटे का संपत्ति विवाद में खून हो गया। बेटे की मौत के बाद उनकी दुनिया वीरान हो गई और उन्होंने बाकी का जीवन वृंदावन में बिताने का फैसला किया। वहीं सोंदी 80 साल की हैं. उनके पति का जवानी में ही निधन हो गया था. उनके बच्चे हैं लेकिन जीवन की सांध्य बेला में बहू ने उन्हें बेघर कर दिया। बहुत सी विधवाएं मंदिरों में भजन गाती हैं या फिर भीख मांग कर गुजारा करती हैं। विधवाओं के लिए चार आश्रम संचालित किए जा रहे हैं लेकिन अधिकांश किराए के मकान में रहती हैं और किराया चुकाने के लिए भीख मांगती हैं।’’

संस्कृति के धनी इस भारत देश में लोग अभी भी इतने निर्मम हैं कि जो स्त्री एक परिवार को संवारने के लिए अपने माता-पिता, घर, गांव को छोड़ कर विवाहिता के रूप में आती है। उसे विधवा होते ही लांछन और प्रताड़ना कर शिकार बना देते हैं। उसे घर से धक्के मार कर निकाल देते हैं। भले ही उसके पास जीने, रहने का कोर्इ आसरा न हो। इस 21वीं सदी में भारतीय स्त्री की प्रगति का दंभ करने से पहले एक बार गंभीरतापूर्वक खंगालना खहिए उन कारणों को जो विधवाओं को आश्रमों में शोषित होने के लिए विवश कर रहे हैं। आवश्यकता है इस विषय पर समाज के हर वर्ग को आत्मावलोकन की।
जिस दिन विधवाएं सामाजिक एवं पारिवारिक प्रताड़ना के कारण आश्रमों में तिल-तिल कर मरने को विवश नहीं होंगी और उन्हें अपने समाज तथा परिवार में भरपूर आत्मीयता मिलेगी, सम्मान मिलेगा तभी कोर्इ अर्थ रहेगा 'महिला दिवस उत्सव के रूप में मनाने में। है न! 
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