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Saturday, August 8, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | जे कछू आवारागर्दी बढ़त नईं जा रई अपने ई सहर में? | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टाॅपिक एक्सपर्ट
जे कछू आवारागर्दी बढ़त नईं जा रई अपने ई सहर में?
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
आजकाल तो कऊं कछू घटे ऊकी रपट तो पांछू लिखाई जाती आए, पैले ऊके वीडियो वायरल होन लगत आएं। ऐसईं पिछली एकई हप्ता में हमें सोसल मीडिया पे दो-चार वीडियो देखबे खों मिल गए। एक वीडियो में चार-छै लड़का एक मोड़ा की धुनाई कर रए हते। दूसरी वीडियो में दो मोड़ियां दो-चार मोड़ों से झगर रईं हतीं, वा बी बीच रोड पे। देखत-देखत में मोड़ा हरें मोड़ियन खों लपाड़े मारन लगे। जोई टाईप की एक औ वीडियो हती जीमें एक मोड़ा रोड कनारे एक मोड़ी खों पीट रओ तो। बा सब देख के हमें लगी के अपने ई सागर में जो का हो रओ? मोड़ियां रस्ता चलत पिट रईं! मनो हमें ज्यादा गम्म नईं खाने परो। काए से के दूसरे दिनां हमें अपने इते की बा वीडियो दिखा गई जीमें एक मोड़ी एक चौराए पे दो-तीन मोड़ों के संगे दिखा रई ती औ ऊके एक हात में छोटी सी तलवार घांई एक हथियार दिखा रओ थो। बा मोड़ी हथियार घुमा-घुमा के बतकाव कर रई हती। हमें लगो के अपने सहर में पिटत भईं दुखियारी मोड़ियां भर नोंई, ऐसी बीरंगनाएं सोई आएं जो खुले में हथियार लए मोड़ों के संगे घूम रईं। जा देख के हमें लगो के कछू ज्यादई स्मार्ट नईं होत जा रओ अपनों सहर। औ रई सई कसर पूरी कर देत आएं तला में कुद्दी मार के मरबे वारे। अब आप सोच रए हुइयो के का हम जेई टाईप की वीडियो देखत रैत आएं? सो ऐसो आए के सोसल मिडिया वारे अपने इते के लोकल चैनल वारे जे दिखात रैत आएं। सो दसा पता परत रैत आए। सो, अपने इते के कानून वारन खों बी जे आवारागर्दी पे तनक लगाम लगाओ चाइए। ने तो कोऊ दिनां कछू बड़ो घटहे तो पछतानों परहे। काए ठीक कई न!
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Saturday, July 25, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | तला में कूंदे से कछू हल निकलहे का, जिनगी इत्ती फालतू की नोंई | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली

टाॅपिक एक्सपर्ट
तला में कूंदे से कछू हल निकलहे का, जिनगी इत्ती फालतू की नोंई
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
   अभईं चार दिनां पैले हम घूमबे के लाने तनक देर को कारीडोर पे गए रए। ऊ दिनां तनक उमस हती सो कारीडोर पे तला की हवा खा के अच्छो सो लगो। उते रेलिंग पे कछू दूर लौं जाली लगी दिखानी सो बतकाव होन लगी के लोग इते से तला में कूंद-कूंद के अपनी जान देन लगे जेई से जाली लगाने पर रई। कारीडोर से तला को देखबे को मजा खराब हो जाहे। सो, हमने कई के ईसे का, जो इते जाली लगाई जाहे सो कूंदबे वारे उते से कूंद जाहें। कूंदने वारन खों का? मनों बात तो जे आए के जान काए खों दई जाए? जिनगी इत्ती फालतू की आए का? अरे, सबई की जिनगी में कोऊ ने कोऊ दुख पीरा लगी रैत आए। कभऊं-कभऊं ऐसो समै बी आत आए जबें मरबे को जी करन लगत आए। हमाई जिनगी में बी ऐसो समै आओ रओ, कोरोना के टेम पे। मनों हमने सोची के हमाई मताई औ दीदी ने अपनी जिनगी लगा दई हमें खुसी से राखने खों, तो अब उन ओरन के ने रैने पे का हमें सोई मर जाने चाइए? उनके किए-धरे पे पानी फेर दओ चाइए? कभऊं नईं। हमाए ऐसो करे से उनें दुख हुइए, बे जां बी हुइएं। संगे हमने जेबी सोची के जो हमाई घड़ी आ गई होती तो कोरोना से हम सोई निपट गए होते। जो ऊपरवारे ने हमें छोड़ दओ तो कछू सोच के छोड़ी हुइए। औ सई में, हमने जीने की हिम्मत करी तो मुतके लोगन ने हमाओ साथ दओ। सो, खुद को मारबे से कछू नई मिलत। जो खुद पे भरोसो राखो औ जीबे की हिम्मत करो, लोगन से बात करो, सो बा दुख, पीरा औ मुसीबत पांछे छूटत जात आए। अब तनक सोचियो के तुमने तो तला में कुद्दी लगा दई औ मर गए, मनों तुमाए पांछू रै गए मताई,बाप, बैन,भाई तुमाए लानें कित्ते कलपहें? सो, बहादुरी मरबे में नोंईं जीबे में आए। सो तला खों सुसाइड प्वाइंट ने बनाओ औ बहादुरी से जिंदा रओ!
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Saturday, January 11, 2020

शून्यकाल ...बुंदेली को जरूरत है एक सशक्त राजनीतिक आवाज़ की - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
मेरा कॉलम "शून्यकाल"... "दैनिक बुंदेली मंच" में... Please आप भी पढ़िए इसे🌿  (11.01.2020)


शून्यकाल ...

बुंदेली को जरूरत है एक सशक्त राजनीतिक आवाज़ की
 - डॉ. शरद सिंह
       भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची भारत की भाषाओं से संबंधित है। इस अनुसूची में 22 भारतीय भाषाओं को शामिल किया गया है. इनमें से 14 भाषाओं को संविधान में शामिल किया गया था। सन 1967 ई. में, सिन्धी भाषा को अनुसूची में जोड़ा गया। इसके बाद, कोंकणी भाषा, मणिपुरी भाषा, और नेपाली भाषा को 1992 ई. में जोड़ा गया। हाल में 2003 में बोड़ो भाषा, डोगरी भाषा, मैथिली भाषा, और संथाली भाषा शामिल किए गए। भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में 38 अन्य भाषाओं को शामिल करने की मांग है जिनमें बुंदेली भी एक है। भाषा का दर्जा दिए जाने के का एक आधार यह भी निर्धारित किया गया है कि जिस बोली का अपना स्वतंत्र व्याकरण हो उसके भाषाई दर्जे के अधिकार पर गौर किया जा सकता है। इस दृष्टि से बुंदेली का अपना विशेष व्याकरण है और अपनी अलग शब्दावली है जो इसे स्वतंत्र पहचान देती है।  
बुंदेली को भाषा के रूप में आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने के लिए समय-समय पर मांग उठती रही है। यद्यपि कोई बड़ा प्रभावी आंदोलन नहीं छेड़ा गया। भोपाल के ही आंचलिक क्षेत्रों में, विदिशा, रायसेन, होशंगाबाद, सीहोर, राजगढ़ आदि जिलों में अथवा जबलपुर, ग्वालियर संभाग के जिलों में बोलीगत परिवर्तन के साथ बुंदेली ही बोलते हैं। बुन्देली समृद्ध भाषा है और इसमें साहित्य और लोकसाहित्य का अपार भण्डार है। बुन्देली बुन्देलखण्ड क्षेत्र में बहुतायत में प्रयोग की जाती है। बुन्देलखण्ड के आधार पर ही इसका नाम ’बुन्देली’ पड़ा। इसे ’बुन्देलखण्डी’ भी कहा जाता है। बुन्देली बुन्देलखण्ड की संस्कृति और अस्मिता की पहचान है। एक अनुमानित गणना के अनुसार सागर, जबलपुर, ग्वलियर, भोपाल और झांसी संभाग के जिलों के बुन्देली बोलने वालों की कुल संख्या लगभग पांच करोड़ के आसपास है। बुंदेली भाषा अति प्राचीन है लेकिन उसे हिंदी साहित्य के इतिहास में वह स्थान नहीं मिल पाया जिसकी वह हकदार है। बुंदेलखंड के अनेक विद्वानों द्वारा इस दिशा में प्रयास किया गया। अनेक संस्थाओं ने प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को पत्र लिखे किन्तु यह मांग जन आंदोलन का रूप नहीं ले सकी। संभवतः इसीलिए बुंदेली को भाषा का दर्जा दिलाने का प्रयास पिछड़ता रहा। यद्यपि बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झांसी और डॉ हरीसिंह केन्द्रीय विश्वविद्यालय, सागर में बुंदेली भाषा का स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर पर अध्ययन-अध्यापन हो रहा है और इसमें शोध भी किए जा रहे हैं।
Shoonyakaal Column of  Dr Sharad Singh in Dainik Bundeli Manch, 11.01.2020
            बुंदेली को भाषा का सम्मान दिलाने की दिशा में पृथक बुंदेलखण्ड की मांग को भी जोड़ कर देखा जाता रहा है। पृथक बुंदेलखण्ड राज्य की मांग करने वालों का यह मानना है कि यदि बुंदेलखण्ड स्वतंत्र राज्य का दर्जा पा जाए तो विकास की गति तेज हो सकती है। यह आंदोलन राख में दबी चिंनगारी के समान यदाकदा सुलगने लगता है। बुंदेलखंड राज्य की लड़ाई तेज करने के इरादे से 17 सितंबर 1989 को शंकर लाल मेहरोत्रा के नेतृत्व में बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा का गठन किया गया था। आंदोलन सर्व प्रथम चर्चा में तब आया जब मोर्चा के आह्वान पर कार्यकर्ताओं ने पूरे बुंदेलखंड में टीवी प्रसारण बंद करने का आंदोलन किया। यह आंदोलन काफी सफल हुआ था। इस आंदोलन में पूरे बुंदेलखंड में मोर्चा कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियां हुईं। आंदोलन ने गति पकड़ी और मोर्चा कार्यकर्ताओं ने वर्ष 1994 में मध्यप्रदेश विधानसभा में पृथक राज्य मांग के समर्थन में पर्चे फेंके। कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ा और वर्ष 1995 में उन्होंने शंकर लाल मेहरोत्रा के नेतृत्व में संसद भवन में पर्चे फेंक कर नारेबाजी की। तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव के निर्देश पर स्व. मेहरोत्रा व हरिमोहन विश्वकर्मा सहित नौ लोगों को रात भर संसद भवन में कैद करके रखा गया। विपक्ष के नेता अटल विहारी वाजपेई ने मोर्चा कार्यकर्ताओं को मुक्त कराया। वर्ष 1995 में संसद का घेराव करने के बाद हजारों लोगों ने जंतर मंतर पर क्रमिक अनशन शुरू किया, जिसे उमा भारती के आश्वासन के बाद समाप्त किया गया। वर्ष 1998 में वह दौर आया जब बुंदेलखंडी पृथक राज्य आंदोलन के लिए सड़कों पर उतर आए। आंदोलन उग्र हो चुका था। बुंदेलखंड के सभी जिलों में धरना-प्रदर्शन, चक्का जाम, रेल रोको आंदोलन आदि चल रहे थे। इसी बीच कुछ उपद्रवी तत्वों ने बरुआसागर के निकट 30 जून 1998 को बस में आग लगा दी थी, जिसमें जन हानि हुई थी। इस घटना ने बुंदेलखंड राज्य आंदोलन को ग्रहण लगा दिया था। मोर्चा प्रमुख शंकर लाल मेहरोत्रा सहित नौ लोगों को रासुका के तहत गिरफ्तार किया गया। जेल में रहने के कारण उनका स्वास्थ्य काफी गिर गया और बीमारी के कारण वर्ष 2001 में उनका निधन हो गया।  पृथक्करण की मांग ले कर राजा बुंदेला भी सामने आए। आज भी पृथक बुंदेलखण्ड की मांग सुगबुगाती रहती है। यह सच है कि पृथक बुंदेलखण्ड और बुंदेली को भाषाई दर्जे की बात एकरूप हो कर कभी नहीं उठी।
सन् 2017 में ओरछा में बुंदेलखण्ड साहित्य एवं संस्कृति परिषद, भोपाल के तत्वाधान में बुंदेली भाषा का दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया था। जिसमें मधुकर शाह, काशी हिंदू वि.वि. के प्रो. कमलेश कुमार जैन, बुंदेलखण्ड वि.वि. के कुलपति प्रो. सुरेन्द्र दुबे, जर्मनी के होमवर्ग वि.वि. की प्रो. तात्याना, बुंदेलखण्ड साहित्य एवं संस्कृति परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री कैलाश मड़वैया ने बुंदेली को भाषा का स्थान दिलाने के पक्ष में अपने विचार प्रकट किए थे। बुंदेली भाषा को पाठ्यक्रम में जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया गया था जिस पर बुंदेलखण्ड यूनीवर्सिटी द्वारा इस दिशा में सार्थक कदम उठाने का निश्चय प्रकट किया गया था। कैलाश मड़्वैया ने बुंदेली भाषा के शब्दों के संग्रह एवं मानकीकरण पर प्रस्तावना रखी थी। इस विषय पर गहन चर्चा हुई थी कि क्या बुंदेली भाषा शिक्षा का माध्यम बन सकती है? यह बात होम्वर्ग यूनीवर्सिटी, जर्मनी की प्रोफेसर तात्याना रखी थी। ओरछा के राष्ट्रीय सम्मेलन की भांति अलग-अलग मंचों से अनेक बार सम्मेलनों और सेमिनारों के जरिए बुंदेली को भाषाई दर्जा दिलाए जाने की आवाज़ उठाई गई। दुर्भाग्यवश एक सशक्त राजनीतिक आवाज़ की कमी ने बुंदेली के संघर्ष को बार-बार हाशिए पर धकेल दिया। यही गनीमत है कि छोटी-छोटी इकाइयों के रूप में संर्घष जारी है।  
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(छतरपुर, म.प्र. से प्रकाशित "दैनिक बुंदेली मंच", 11.01.2020)

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Tuesday, January 7, 2020

बुंदेली को जरूरत है एक सशक्त राजनीतिक आवाज़ - डॉ. शरद सिंह - नवभारत, 07.01.2019 में प्रकाशित

बुंदेली को जरूरत है एक सशक्त राजनीतिक आवाज़ की

            - डॉ. शरद सिंह

(नवभारत, 07.01.2019 में प्रकाशित)


भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची भारत की भाषाओं से संबंधित है। इस अनुसूची में 22 भारतीय भाषाओं को शामिल किया गया है. इनमें से 14 भाषाओं को संविधान में शामिल किया गया था। सन 1967 ई. में, सिन्धी भाषा को अनुसूची में जोड़ा गया। इसके बाद, कोंकणी भाषा, मणिपुरी भाषा, और नेपाली भाषा को 1992 ई. में जोड़ा गया। हाल में 2003 में बोड़ो भाषा, डोगरी भाषा, मैथिली भाषा, और संथाली भाषा शामिल किए गए। भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में 38 अन्य भाषाओं को शामिल करने की मांग है जिनमें बुंदेली भी एक है। भाषा का दर्जा दिए जाने के का एक आधार यह भी निर्धारित किया गया है कि जिस बोली का अपना स्वतंत्र व्याकरण हो उसके भाषाई दर्जे के अधिकार पर गौर किया जा सकता है। इस दृष्टि से बुंदेली का अपना विशेष व्याकरण है और अपनी अलग शब्दावली है जो इसे स्वतंत्र पहचान देती है।  
बुंदेली को भाषा के रूप में आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने के लिए समय-समय पर मांग उठती रही है। यद्यपि कोई बड़ा प्रभावी आंदोलन नहीं छेड़ा गया। भोपाल के ही आंचलिक क्षेत्रों में, विदिशा, रायसेन, होशंगाबाद, सीहोर, राजगढ़ आदि जिलों में अथवा जबलपुर, ग्वालियर संभाग के जिलों में बोलीगत परिवर्तन के साथ बुंदेली ही बोलते हैं। बुन्देली समृद्ध भाषा है और इसमें साहित्य और लोकसाहित्य का अपार भण्डार है। बुन्देली बुन्देलखण्ड क्षेत्र में बहुतायत में प्रयोग की जाती है। बुन्देलखण्ड के आधार पर ही इसका नाम ’बुन्देली’ पड़ा। इसे ’बुन्देलखण्डी’ भी कहा जाता है। बुन्देली बुन्देलखण्ड की संस्कृति और अस्मिता की पहचान है। एक अनुमानित गणना के अनुसार सागर, जबलपुर, ग्वलियर, भोपाल और झांसी संभाग के जिलों के बुन्देली बोलने वालों की कुल संख्या लगभग पांच करोड़ के आसपास है। बुंदेली भाषा अति प्राचीन है लेकिन उसे हिंदी साहित्य के इतिहास में वह स्थान नहीं मिल पाया जिसकी वह हकदार है। बुंदेलखंड के अनेक विद्वानों द्वारा इस दिशा में प्रयास किया गया। अनेक संस्थाओं ने प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को पत्र लिखे किन्तु यह मांग जन आंदोलन का रूप नहीं ले सकी। संभवतः इसीलिए बुंदेली को भाषा का दर्जा दिलाने का प्रयास पिछड़ता रहा। यद्यपि बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झांसी और डॉ हरीसिंह केन्द्रीय विश्वविद्यालय, सागर में बुंदेली भाषा का स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर पर अध्ययन-अध्यापन हो रहा है और इसमें शोध भी किए जा रहे हैं।
Navbharat -  Bundeli Ko Jarurat Hai Ek Sashakta Rajnitik Awaz Ki  - Dr Sharad Singh, 07.01.2020
  बुंदेली को भाषा का सम्मान दिलाने की दिशा में पृथक बुंदेलखण्ड की मांग को भी जोड़ कर देखा जाता रहा है। पृथक बुंदेलखण्ड राज्य की मांग करने वालों का यह मानना है कि यदि बुंदेलखण्ड स्वतंत्र राज्य का दर्जा पा जाए तो विकास की गति तेज हो सकती है। यह आंदोलन राख में दबी चिंनगारी के समान यदाकदा सुलगने लगता है। बुंदेलखंड राज्य की लड़ाई तेज करने के इरादे से 17 सितंबर 1989 को शंकर लाल मेहरोत्रा के नेतृत्व में बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा का गठन किया गया था। आंदोलन सर्व प्रथम चर्चा में तब आया जब मोर्चा के आह्वान पर कार्यकर्ताओं ने पूरे बुंदेलखंड में टीवी प्रसारण बंद करने का आंदोलन किया। यह आंदोलन काफी सफल हुआ था। इस आंदोलन में पूरे बुंदेलखंड में मोर्चा कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियां हुईं। आंदोलन ने गति पकड़ी और मोर्चा कार्यकर्ताओं ने वर्ष 1994 में मध्यप्रदेश विधानसभा में पृथक राज्य मांग के समर्थन में पर्चे फेंके। कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ा और वर्ष 1995 में उन्होंने शंकर लाल मेहरोत्रा के नेतृत्व में संसद भवन में पर्चे फेंक कर नारेबाजी की। तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव के निर्देश पर स्व. मेहरोत्रा व हरिमोहन विश्वकर्मा सहित नौ लोगों को रात भर संसद भवन में कैद करके रखा गया। विपक्ष के नेता अटल विहारी वाजपेई ने मोर्चा कार्यकर्ताओं को मुक्त कराया। वर्ष 1995 में संसद का घेराव करने के बाद हजारों लोगों ने जंतर मंतर पर क्रमिक अनशन शुरू किया, जिसे उमा भारती के आश्वासन के बाद समाप्त किया गया। वर्ष 1998 में वह दौर आया जब बुंदेलखंडी पृथक राज्य आंदोलन के लिए सड़कों पर उतर आए। आंदोलन उग्र हो चुका था। बुंदेलखंड के सभी जिलों में धरना-प्रदर्शन, चक्का जाम, रेल रोको आंदोलन आदि चल रहे थे। इसी बीच कुछ उपद्रवी तत्वों ने बरुआसागर के निकट 30 जून 1998 को बस में आग लगा दी थी, जिसमें जन हानि हुई थी। इस घटना ने बुंदेलखंड राज्य आंदोलन को ग्रहण लगा दिया था। मोर्चा प्रमुख शंकर लाल मेहरोत्रा सहित नौ लोगों को रासुका के तहत गिरफ्तार किया गया। जेल में रहने के कारण उनका स्वास्थ्य काफी गिर गया और बीमारी के कारण वर्ष 2001 में उनका निधन हो गया।  पृथक्करण की मांग ले कर राजा बुंदेला भी सामने आए। आज भी पृथक बुंदेलखण्ड की मांग सुगबुगाती रहती है। यह सच है कि पृथक बुंदेलखण्ड और बुंदेली को भाषाई दर्जे की बात एकरूप हो कर कभी नहीं उठी।
सन् 2017 में ओरछा में बुंदेलखण्ड साहित्य एवं संस्कृति परिषद, भोपाल के तत्वाधान में बुंदेली भाषा का दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया था। जिसमें मधुकर शाह, काशी हिंदू वि.वि. के प्रो. कमलेश कुमार जैन, बुंदेलखण्ड वि.वि. के कुलपति प्रो. सुरेन्द्र दुबे, जर्मनी के होमवर्ग वि.वि. की प्रो. तात्याना, बुंदेलखण्ड साहित्य एवं संस्कृति परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री कैलाश मड़वैया ने बुंदेली को भाषा का स्थान दिलाने के पक्ष में अपने विचार प्रकट किए थे। बुंदेली भाषा को पाठ्यक्रम में जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया गया था जिस पर बुंदेलखण्ड यूनीवर्सिटी द्वारा इस दिशा में सार्थक कदम उठाने का निश्चय प्रकट किया गया था। कैलाश मड़्वैया ने बुंदेली भाषा के शब्दों के संग्रह एवं मानकीकरण पर प्रस्तावना रखी थी। इस विषय पर गहन चर्चा हुई थी कि क्या बुंदेली भाषा शिक्षा का माध्यम बन सकती है? यह बात होम्वर्ग यूनीवर्सिटी, जर्मनी की प्रोफेसर तात्याना रखी थी। ओरछा के राष्ट्रीय सम्मेलन की भांति अलग-अलग मंचों से अनेक बार सम्मेलनों और सेमिनारों के जरिए बुंदेली को भाषाई दर्जा दिलाए जाने की आवाज़ उठाई गई। दुर्भाग्यवश एक सशक्त राजनीतिक आवाज़ की कमी ने बुंदेली के संघर्ष को बार-बार हाशिए पर धकेल दिया। यही गनीमत है कि छोटी-छोटी इकाइयों के रूप में संर्घष जारी है।  
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डाॅ. शरद सिंह, नवभारत, बुंदेली, बुंदेलखंड

Thursday, December 12, 2019

बुंदेलखंड में कहां से आई बुंदेली? - डाॅ. शरद सिंह - नवभारत, 12.12.2019 में प्रकाशित

Dr (Miss) Sharad Singh
बुंदेलखंड में कहां से आई बुंदेली?
       - डाॅ. शरद सिंह
(#नवभारत, 12.12.2019 में प्रकाशित)
       बुंदेली बोली है या भाषा? बुंदेलखंड में कहां से आई बुंदेली? बुंदेलखंड के पढ़के-लिखे तबके को बुंदेली बोलना चाहिए या नहीं? जैसे गहन-गंभीर प्रश्न कभी-कभी चाय की चुस्कियों के साथ चर्चा एवं विचार-विमर्श के विषय बन जाते हैं। प्रत्येक बुंदेलखंडी को अपनी बुंदेली पर गर्व है और वह इसे भाषा के रूप में मान्यता दिलाने की प्रबल इच्छा रखता है। लेकिन का स्वरूप क्या है? यह सारी चर्चा एक छोटे से विचार-विमर्श के रूप में उभरी जब मैं, मेरी दीदी डाॅ वर्षा सिह और स्थानीय कवि वीरेन्द्र प्रधान हिन्दी साहित्य और क्षेत्रीय साहित्य पर चर्चा करते हिन्दी से बुंदेली की चिंतन-यात्रा पर निकल पड़े। चाय की चुस्कियों के समापन तक वार्ता का विषय बदल गया किन्तु मेरे मानस में बुंदेली का अस्तित्व उथल-पुथल मचाता रहा। मुझे अपने वे दिन याद आ गए जब मैंने खजुराहो की मूर्तिकला पर पीएच. डी. करने के दौरान बुंदेलखंड की प्राचीनता का अध्ययन कर रही थी। अभी दो माह पहले मेरे मानस में बुंदेलखंड की प्राचीनता के वे पन्ने एक बार फिर खुल गए थे जब मैं अपना चैथा उपन्यास लिख रही थी। 

बुंदेलखंड प्राचीन काल में वत्स तथा मध्ययुग में जेजाकभुक्ति के नाम से जाना जाता था। बुन्देलखंड नाम की प्राचीनता भले ही संक्षिप्त है, किन्तु इस भू-भाग की प्राचीनता मानव सभ्यता के विकास के प्राक्युग से जुड़ी हुई है। पूर्व पाषाण युगीन मानव के उपकरण सागर, दमोह तथा बुन्देलखंड के अन्य क्षेत्रों में मिले हैं। ये बिल्लौर पत्थर, बलुआ पत्थर तथा सोपानाश्म (ट्रप) के बने हुए हैं। इनका काल लगभग पांच लाख ईस्वी पूर्व माना गया है। ये सामग्री उस सभ्यता की धरोहर है जब मनुष्य बड़े, भोथरे औजार-उपकरण बनाता था। अर्थात् बुंदेलखंड प्रगैतिहासिक मनुष्यों का निवास स्थान रहा। रहा भाषा का सवाल तो महाकाव्य काल के दो प्रसिद्ध ग्रंथों ‘रामायण’ एवं ‘महाभारत’ के रचयिता बुन्देलखण्ड की धरती से जुड़े थे। इन ग्रंथों में चेदि, दशार्ण एवं कारुष के रूप में बुंदेलखंड का ही उल्लेख है। बुंदेलखंड में अनेक जनजातियां निवास करती थीं। इनमें कोल, निषाद, पुलिन्द, किरार, नाग आदि थे जिनकी अपनी स्वतंत्र भाषाएं थी। जहां संस्कृत विद्वानों की भाषा थी वहीं जनपदीय भाषा ‘विंध्येली’ थी। विंध्य पर्वत श्रृखंला के कारण यह नाम पड़ा। भरतमुनि के ‘नाट्य शास्त्र’ में ‘विंध्येली’ का उल्लेख है। भाषाविदों का मानना है कि भवभूति ‘उत्तर रामचरित’ के ग्रामीणजनों की भाषा ’विंध्येली’ वस्तुतः प्राचीन बुन्देली ही थी। प्राचीन बुन्देली अर्थात् ‘विंध्येली’ के ‘काल्पी सूत्र’ काल्पी में प्राप्त हुए हैं। माना जाता है कि चन्देल नरेश गण्डदेव (सन् 940 से 999 ई.) तथा उसके उत्तराधिकारी विद्याधर (सन् 999 ई. से 1025 ई.) के काल में बुन्देली भाषा के रूप में सामने आई। बुंदेली भाषा रासो काव्य धारा के माध्यम से विकसित हुई। जगनिक ‘आल्हखण्ड’ तथा ‘परमाल रासो’ प्रौढ़ भाषा की रचनाएं हैं।
भाषा काव्य की परम्परा दशवीं शती से प्रारम्भ हो गई थी। बुन्देली के आदि कवि के रुप में प्राप्त सामग्री के आधार पर जगनिक एवं विष्णुदास सर्वमान्य हैं जो बुन्देली की समस्त विशेषताओं से मण्डित हैं। पं. किशोरीलाल वाजपेयी लिखित हिन्दी ‘शब्दानुशासन’ के अनुसार - ‘‘हिन्दी एक स्वतंत्र भाषा है, उसकी प्रकृति संस्कृत तथा अपभ्रंश से भिन्न है। जबकि बुन्देली की जननी प्राकृत (शौरसेनी) तथा संस्कृत भाषा है। दोनों भाषाओं में जन्मने के उपरांत भी बुन्देली भाषा की अपनी चाल, अपनी प्रकृति तथा वाक्य विन्यास को अपनी मौलिक शैली है।’’
बुंदेलखंड में कहां से आई बुंदेली? - डाॅ. शरद सिंह, नवभारत, 12.12.2019 में प्रकाशित

बुंदेलखंड के यशस्वी राजा महाराज छत्रसाल के समय बुंदेली को राजभाषा का दर्ज़ा प्राप्त था। स्वयं महाराज छत्रसाल के राजकीय पत्र बुंदेली में मिलते है। तो प्रश्न उठता है कि जो बुंदेली महाकाव्यकाल से आकार लेने लगी थी और अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने लगी थी, जो बुंदेली एक समय राजभाषा का दर्ज़ा रखती थी, जो बुंदेली जगनिक से ईसुरी तक यह साहित्य सृजन का भाषाई आधार बनी रही। वह भाषा के पद से अपदस्थ कब हो गई? तो इसका एक उत्तर बुंदेलखंड के राजनीतिक और आर्थिक इतिहास में मिलता है। स्वाभिमानी बुंदेलों ने आक्रमणकारियों के आगे कभी घुटने नहीं टेके। चाहे वह शेरशाह सूरी का समय हो अथवा अहमद शाह अब्दाली का। अंग्रेजों के आगे घुटने टेकने का तो प्रश्न ही नहीं था। अंग्रेजों को टक्कर देने का कार्य सबसे पहले बुंदेलों ने किया। इतिहास में दर्ज़ सन् 1842 का ‘बुंदेला विद्रोह’ इसका प्रमाण है। इसी का दूसरा पक्ष भी है कि जब राजनीतिक स्थिरता नहीं रहती है तो आर्थिकतंत्र छिन्न-भिन्न हो जाता है। भुखमरी और ग़रीबी छाने लगती है और आमतौर पर भूखा पेट श्रम कराता है, पढ़ाई नहीं। अंग्रेजी, संस्कृत, उर्दू और क्रमशः खड़ीबोली के बीच बुंदेली भाषा से बोली बन कर रह गई। अनपढ़ों या कम पढ़े-लिखों की बोली। लेकिन आज बुंदेली के भाषाई अतीत को पुनस्र्थापित करने के लिए अनेक सार्थक प्रयास किए जा रहे हैं। बुंदेली बुंदेलखंड में ही जन्मी, यहीं बुंदेली ने राज किया और भविष्य में भी यह बुंदेलखंड की जातीय पहचान को बनाए रखती हुई एक बार फिर भाषा का दर्ज़ा पा ही लेगी।
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#नवभारत #बुंदेलखंड #शरदसिंह #बुंदेली

Friday, July 26, 2019

बुंदेलखंड के बाहर भी बोलबाला है बुंदेली का - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह ... 'नवभारत' में प्रकाशित

Dr (Miss) Sharad Singh
'नवभारत' में प्रकाशित मेरा लेख "बुंदेलखंड के बाहर भी बोलबाला है बुंदेली का" ... आप भी पढ़िए...
🙏धन्यवाद #नवभारत🙏
(26 जुलाई 2019)

बुंदेलखंड के बाहर भी बोलबाला है बुंदेली का
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह 

उस समय बड़ा सुखद अनुभव होता है जब अपने गांव, नगर, क्षेत्र से बाहर कोई व्यक्ति अपनी बोली बोलता हुआ मिलता है। मन प्रफुल्लित हो उठता है और नए शहर में महसूस होने वाला परायापन पल भर में दूर हो जाता है। यह तब होता है जब क्षेत्रीय भाषा अथवा बोली अपनी भौगोलिक सीमाओं से निकल कर चलन में आने लगती हैं। आज की मुंबइया भाषा में भोजपुरी के शब्दों के साथ ही बुंदेली के शब्दों का भी समावेश हो गया है। यह बुंदेली की लोकप्रियता को भी चिन्हित करता है। वैसे प्रत्येक लोकभाषा अथवा बोली का अपना महत्व होता है। उसकी अपनी उपादेयता होती है। बोली में लोकसंस्कृति निहित होती है और लोकसंस्कृति वे जड़ें होती हैं जिन पर लोक सभ्यता का वृक्ष फूलता-फलता है। लोकसंस्कृति बचपन से ले कर वृद्धावस्था तक मनुष्य को जीवन जीने की कला सिखाती है। बुन्देली लोकसंस्कृति भी जीवन के अनुरुप मनुष्य को ज्ञान प्रदान करने में सक्षम रही है। किसी भी क्षेत्र के विकास में उस क्षेत्र की संस्कृति की अहम् भूमिका रहती है। संस्कृति में ऐतिहासिक विरासत, लोकसाहित्य, लोकविश्वास, जनजीवन की परम्पराएं एवं लोकाचार आदि के साथ-साथ उस क्षेत्र की भाषा, बोली भी निबद्ध रहती है। इसी के साथ किसी भी लोकभाषा अर्थात् बोली की अपनी एक जातीय पहचान होती है। यह जातीय पहचान ही उस बोली को अन्य बोलियों से अलग कर के स्वतंत्र अस्तित्व का स्वामी बनाती है। प्रत्येक बोली की अपनी एक भूमि होती है जिसमें वह पलती, बढ़ती और विकसित होती है। बुंदेली बोली की भी अपनी मूल भूमि है जिसे बुंदेलखण्ड के नाम से पुकारा जाता है।
Navbharat -  Bundelkhand Ke bahar Bhi Bolbala Hai Bundeli Ka - Dr Sharad Singh
      महाराज छत्रासाल के समय बुन्देली बुन्देलखण्ड राज्य की राजभाषा का दर्जा रखती थी। बुंदेली बोली का विस्तार वर्तमान मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश के विभिन्न ज़िलों में है। इनमें मध्यप्रदेश के प्रमुख ज़िले हैं- पन्ना, छतरपुर, सागर, दमोह, टीकमगढ़ तथा दतिया। उत्तर प्रदेश में झांसी, जालौन, ललितपुर, हमीरपुर, बांदा तथा महोबा में बुंदेली अपने शुद्ध रूप में बोली जाती है। बुंदेली बोली में भी विभिन्न बोलियों का स्वरूप मिलता है जिन्हें बुंदेली की उपबोलियां कहा जा सकता है। ये उपबोलियां हैं- मुख्य बुंदेली, पंवारी, लुधयांती अथवा राठौरी तथा खटोला। दतिया तथा ग्वालियर के उत्तर पूर्वी क्षेत्रों में पंवार राजपूतों का वर्चस्व रहा। अतः इन क्षेत्रों में बोली जाने वाली बुंदेली को पंवारी बुंदेली कहा जाता है। इनमें चम्बल तट की बोलियों का भी प्रभाव देखने को मिलता है। हमीरपुर, राठ, चरखारी, महोबा और जालौन में लोधी राजपूतों का प्रभाव रहा अतः इन क्षेत्रों की बुंदेली लुधयांती या राठौरी के नाम से प्रचलित है। यहां बनाफरी भी बोली जाती है। पन्ना और दमोह में खटोला बुंदेली बोली जाती है। जबकि सागर, छतरपुर, टीकमगढ़, झांसी तथा हमीरपुर में मुख्य बुंदेली बोली जाती है। सर जार्ज ग्रियर्सन ने सन् 1931 ईस्वी में जनगणना के आधार पर बुंदेली का वर्गीकरण करते हुए मानक बुंदेली (मुख्य बुंदेली), पंवारी, लुधयांती , खटोला तथा मिश्रित बुंदेली का उल्लेख किया था।
जहां संस्कृति को लिपिबद्ध रूप से सहेजा नहीं गया हो वहां बोलियों में निबद्ध लोकगीत, लोककथा, लोकनाट्य आदि के द्वारा वाचिक स्रोतों से संस्कृति का समुचित ज्ञान प्राप्त हो जाता है। बुन्देली बोली संस्कृति के लगभग सभी रूप अपने भीतर समेटे हुए है। इसमें लोक चेतना, लोक वेदना, लोक सम्वेदना, लोकाचार तथा ऐतिहासिक घटनाओं का ब्यौरा भी विद्यमान है। जन्म से ले कर मृत्यु तक के संस्कारों का परिचय बुन्देली लोकगीतों में समाया हुआ है। प्रत्येक बोली का अपना एक अलग साहित्य होता है जो लोक कथाओं, लोकगाथाओं, लोक गीतों, मुहावरों, कहावतों तथा समसामयिक सृजन के रूप में विद्यमान रहता है। अपने आरंभिक रूप में यह वाचिक रहता है तथा स्मृतियों के प्रवाह के साथ एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में प्रवाहित होता रहता है। बुंदेली में साहित्य का आरंभ लगभग बारहवीं शताब्दी से माना जाता है। खड़ी बोली में भी बुंदेली कथानकों का प्रयोग सदा होता रहा है। उल्लेखनीय है कि हिन्दी कथा सम्राट प्रेमचंद ने अपनी दो कहानियां बुंदेली कथानकों पर लिखी थीं। ये कहानियां हैं-‘राजा हरदौल’ और ‘रानी सारंध्रा’।
बोलियां जीवन में संस्कार और पारस्परिक संबंधों की नींव को मजबूत करती ही हैं साथ ही बोलियां अपने-आप में रीति-रिवाज़, लोकाचार, लोक संस्कार, लोक मान्यताओं के साथ ही तत्कालीन परिस्थितियों का भी लेखा-जोखा प्रस्तुत करती हैं। जैसे बुन्देली के सुप्रसिद्ध लोककवि ईसुरी ने अपनी फाग कविताओं में जहां प्रेम को रीतिकालीन शैली में वर्णित किया है वहीं उस अकाल की पीड़ा का भी वर्णन किया है जिसने बुन्देलखण्ड के जनजीवन को विकट रूप में प्रभावित किया था।
यही बुंदेली आज बुंदेलखंड की सीमाओं को लांघ कर देश-विदेश की प्रिय बोली बनती जा रही है। भाषा के समान समृद्ध बुंदेली बोली को सिनेमा और टीवी धारावाहिकों में स्थान दिया जाने लगा है। ‘चाइनागेट’ फिल्म से पहले भी बुंदेली बोली में फिल्मी संवाद लिखे गए तथा फिल्में भी बनीं। निर्देशक तथा अभिनेता शिवकुमार ने बुंदेली में फिल्में बनाईं जिनकी शूटिंग ओरछा तथा उसके आस-पास के क्षेत्रों में की गई। फिल्म अभिनेता राजा बुंदेला ने भी बुंदेली बोली और संस्कृति को बॉलीवुड तक पहुंचाने में अपना योगदान दिया। वैसे यह कहना भी गलत नहीं होगा कि राजा बुंदेला बॉलीवुड को बुंदेलखंड तक ले आए। फिल्मों के साथ ही टीवी धारावाहिकों में भी झांसी, कानपुर, आदि में बोली जाने वाली बुंदेली को पर्याप्त लोकप्रियता मिल रही है। यूं तो सागर जिले के परिवेश में बना एक धारावाहिक ‘फिर सुबह होगी’ में भी बुंदेली बोली के संवाद थे किन्तु कथानक त्रुटिपूर्ण एवं भ्रामक होने के कारण यह धारावाहिक लोकप्रिय नहीं हो सका और चैनल द्वारा उसे समापन के पहले ही बंद कर दिया गया। फिर भी बोली के प्रयोग की दृष्टि से इस धारावाहिक का अपना अलग महत्व रहा। वर्तमान में भी विभिन्न टीवी चैनल्स पर बुंदेली संवादों वाले अनेक धारावाहिक दिखाए जा रहे हैं।
बुंदेलखंड के वे युवा जो पढ़-लिख कर विदेशों में रह रहे हैं, वे अपने साथ अपनी बोली और संस्कृति को सात समंदर पार पहुंचा रहे हैं। अब बुंदेलखंड के बाहर भी बुंदेली का बोलबाला है। बुंदेली बोली को जो विस्तार और सम्मान मिलना चाहिए था, वह अब उसे मिलने लगा है।
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( नवभारत, 26 जुलाई 2019 )
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Wednesday, October 17, 2018

चर्चा प्लस ... रोचक परम्पराओं से जुड़ा है बुंदेली दशहरा - डॉ. शरद सिंह


Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस …
रोचक परम्पराओं से जुड़ा है बुंदेली दशहरा
- डॉ. शरद सिंह

बुंदेलखंड में दशहरा मनाने की भी अपनी अलग परम्पराएं हैं। इस दिन सुबह से नीलकंठ के दर्शन करना अच्छा माना जाता है। इसी तरह मछली को देखना भी शुभ माना जाता है। इसीलिए कुछ लोग मछली ले कर भी घर-घर जाते हैं और मछली के दर्शन करा कर नेंग मांगते हैं। दशहरे पर पान के बीड़े के बिना तो काम ही नहीं चलता है। सागर नगर में सागरझील यानी लाखा बंजारा झील में रावण को नाव पर स्थापित कर के दहन किए जाने की परम्परा रही है। दरअसल, कई रोचक परम्पराएं त्योहारों को भी अधिक रोचक बना देती हैं और कभी-कभी कुछ परम्पराएं जानबूझ कर छोड़ दी जाती हैं, ताकि त्योहार अच्छे और अहिंसक संदेश दे सकें। 
चर्चा प्लस ... रोचक परम्पराओं से जुड़ा है बुंदेली दशहरा - डॉ. शरद सिंह  ... Column of Dr (Miss) Sharad Singh in Sagar Dinkar News Paper

मुझे अच्छी तरह से याद है, जब मैं छोटी थी तो दशहरे का उत्साह किस तरह चारों ओर व्याप्त हो जाता था। उन दिनों मैं सागर संभाग के पन्ना नगर में रहती थी। वह मेरी जन्मस्थली भी है। हिरणबाग कहलाती थी वह कॉलोनी जहां गिनती के छः सरकारी क्वार्टर्स थे। उन्हीं में दायीं ओर का आखिरी क्वार्टर मेरी मां के नाम एलॉट था। मेरी मां डॉ. विद्यावती ‘मालविका’ पन्ना में मनहर गर्ल्स हायर सेंकेंड्री स्कूल में हिन्दी की व्याख्याता थीं। मेरी मां का बचपन मालवा में बीता था। वे मालवा की बेटी रहीं और मैं बुंदेलखंड की बेटी। दो अंचलों की संस्कृतियों के प्रभाव में मेरा आरम्भिक बचपन बीता। लेकिन पैदायशी ही बुंदेलखंड का पानी तो मेरी रगों में खून बन कर दौड़ने लगा था। मुझे अच्छा लगता था अपने शहर का दशहरा उत्सव। बहुत ही भव्य आयोजन होता था। छत्रसाल पार्क के सामने वाले बड़े से मैदान में बहुत बड़ा रावण बनाया जाता था। उस समय की मेरी दो-ढाई फुट के क़द के हिसाब से रावण कुछ ज़्यादा ही बड़ा दिखता रहा होगा मुझे। बहरहाल, घर की दीवारों पर ‘व्हाईटवॉश’ (जो कि पी.डब्ल्यू. डी. की कृपा से होता था) और आंगन में गोबर से लिपाई जो कि मां स्वयं अपने हाथों से करती थीं, जिसमें मैं भी हाथ बंटाने का प्रयास करती और डांट खाती थी। इन सबके बीच प्रतीक्षा रहती थी दशहरे की उस रात की जिसमें रावण दहन किया जाता था। रामलीला वाले राम और लक्ष्मण धनुष ले कर आते थे। पन्ना राजपरिवार से तत्कालीन महाराज नरेन्द्र सिंह आते थे। अच्छा-खासा मेला भर जाता था। तरह-तरह की दूकानें, झूले और हम बच्चों के लिए ढेर सारा आकर्षण। दशहरा मैदान मेरे घर से लगभग पचास कदम की दूरी पर था। यानी कॉलोनी के कैम्पस से निकलो और दशहरा मैदान सामने नज़र आता था। छोटे शहरों के यही तो फायदे होते हैं। सब कुछ आस-पास।
मैं और मेरी दीदी वर्षा सिंह अपने मामा कमल सिंह की उंगली पकड़ कर दशहरा मैदान पहुंचते थे। फिरकी, गुब्बारे, सीटी, चूड़ी और न जाने क्या-क्या ले डालते थे हम लोग। उस जमाने की हमारी गंभीर शॉपिंग होती थी हम दोनों बहनों की। नहीं, विशेष रूप से मेरी। मेरी तुलना में वर्षा दीदी को शॉपिंग का शौक़ हमेशा कम ही रहा है। आज भी वे मुझसे पीछे रहती हैं। मुझे आज भी याद है कि किस तरह पन्ना महाराज राम और लक्ष्मण का तिलक करते थे और फिर राम बना रामलीला का कलाकार धनुष में तीर चढ़ता था। जब तीर के नुकीले सिरे पर आग लगा दी जाती थी तो वह जलता हुआ तीर रावण के पुतले की ओर छोड़ देता था। तीर लगते ही रावण का पुतला धू-धू कर के जल उठता था और हम सभी बच्चे प्रफुल्लित हो कर तालियां बजाने लगते थे।
घर लौटने पर मां आरती की थाली सजा कर मामा जी की आरती उतारती थीं, यह कहती हुईं कि -‘‘मेरा भाई रावण को मार कर आया है।’’ इसके बाद हमारे घर में परम्परागत शस्त्रपूजा होती थी। मुझे उस तलवार की धुंधली स्मृति है जो मेरे बचपन में शस्त्र के रूप में पूजी जाती थी लेकिन बाद में मेरे नानाजी जो गांधीवादी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे, घर में शस्त्रपूजन बंद करा दिया और उस तलवार को हंसिए में ढलवा दिया गया जो वर्षों तक रसोईघर में सब्ज़ी काटने के काम आता रहा। हमारे परिवार में मांसाहार नानाजी के समय से ही बंद कर दिया गया था। वे घोर अहिंसावादी थे। इसलिए बलि के प्रतीक स्वरूप कुम्हड़े को काटा जाता था किन्तु बाद में यह भी उचित नहीं लगा। नानाजी को लगा कि भले ही हम कुम्हड़े को काट रहे हैं किन्तु मन में बलि की कल्पना होने से हिंसा की भावना तो बनी रहेगी। अतः वह परम्परा भी समाप्त कर दी गई। बस, परस्पर पान की बीड़ा दिए जाने की परम्परा यथावत चलती रही।
यह सारी बातें मुझे इसलिए याद आ रही हैं क्यों कि पिछले दिनों झांसी प्रवास के दौरान मुझे हमीरपुर के विदोखर गांव के दशहरे के बारे में पता चला। कोई दशहरा इतना रक्तरंजित भी हो सकता है, यह जान कर मुझे हैरानी हुई। विदोखर में दशहरा मनाने की अपनी एक अलग ही परम्परा है। विदोखर में दशकों पहले हजारों लोग सवा मन सोना लुटाकर दशहरा मनाते थे। इस गांव में वह कुआं और राहिल देव मंदिर आज भी मौजूद है, जहां नरसंहार के बाद सोना लुटाए जाने की परंपरा शुरू हुई थी। यहां उन्नाव के गांव डोंडियाखेड़ा के लोग सोना लुटाने में अहम भूमिका निभाते थे। आपको याद दिला दूं कि यह वही जगह है जहां दो-तीन साल पहले संत शोभन सरकार ने सोने का खजाना जमीन में दबे होने का दावा किया था और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर भारी हंगामा छाया रहा था।
स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि औरंगजेब के समय विदोखर के ठाकुरों को बलात् मुसलमान बनाया गया था। जिन्हें बगरी ठाकुर कहा जाता था। लगभग 530 वर्ष पहले उन्नाव के डोंडियाखेड़ा से ठाकुर बड़ी संख्या में यहां व्यापार के लिए जाते थे। ठाकुरों का यह जत्था एक बार हमीरपुर के इसी विदोखर गांव से गुजर रहे था, तभी कुआं देख पानी पीने के लिए रुक गए। इसी दौरान बगरी ठाकुर समाज के कुछ युवक यहां पहुंच गए। बगरी ठाकुर युवकों ने डोंडियाखेड़ा के ठाकुरों को कुए से पानी नहीं पीने दिया और मारपीट कर डाली। अपने अपमान से हो कर डोंडियाखेड़ा के ठाकुरों ने बगरी ठाकुरों को सबक सिखाने की ठान ली। विदोखर में बगरी ठाकुर और आसपास के 24 गांवों के ठाकुर एकत्र होकर दशहरे का जश्न मनाते थे। इसी दौरान उन्नाव के डोंडियाखेड़ा के ठाकुरों ने योजना के साथ बगरी ठाकुरों पर हमला बोल दिया। अचानक हमले से दशहरे के जश्न में डूबे बगरी ठाकुर संभल नहीं सके और इस भीषण युद्ध में सैकड़ों की संख्या में मारे गए। डोंडियाखेड़ा के ठाकुरों ने युद्ध जीत लिया और विदोखर के आसपास मौजूद 24 गांवों पर कब्जा कर लिया। युद्ध के बाद इन ठाकुरों ने बगरी ठाकुर के घरों से सोना-चांदी लूट लिया। इस दौरान उन्होंने लूटा हुआ सोना लुटाते हुए जमकर जीत का जश्न मनाया। बस, उसी समय से वहां सोना लुटाए जाने की परंपरा का आरम्भ हुआ। लगभग पांच दशक पहले तक विदोखर गांव के आसपास के 24 गांवों के ठाकुर एकत्रित होते थे। इसके बाद अनोखे ढंग से दशहरा मनाते हुए लोग सवा मन सोना इकट्ठा कर लुटाते थे। जितना सोना जिसके हाथ लगता था, वे अपने घर ले जाता था। अब मंहगाई के जामने में सवा मन सोना लुटाने की कल्पना भी कोई नहीं कर सकता है, इसलिए प्रतीक रूप में रत्ती भर सोना लुटाया जाता है। आज भी 24 गांवों के ठाकुर एकत्र होकर मिट्टी के गोले बनाते हैं और इन्हीं में रत्ती भर सोना डालकर लुटाते हैं। जिसके हाथ सोने वाला मिट्टी का गोला लगता है, उसे सौभाग्यशाली माना जाता है।
हो सकता था कि भविष्य में मेरे नानाजी की तरह किसी को यह परम्परा हिंसक घटना की याद दिलाने वाली लगे और इसे वह बंद करवा दे। यदि ऐसा होता है तो भी विदोखर में दशहरे का आनंद कम नहीं होगा। उत्सव वही है जो मन को आनन्दित करे, उत्साह से भर दे। उत्सव में आडंबर का कोई महत्व नहीं होता। दशहरा तो यूं भी असत्य पर सत्य की विजय और बुराई पर अच्छाई की जीत का त्यौहार है। इसे तो सद् विचारों और सद्परम्पराओं के साथ ही मनाया जाना चाहिए। हमेशा दस सिर वाला रावण मारा जाए, एक सिर वाला इंसान नहीं।
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( सागर दिनकर, 17.10.2018)