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Saturday, August 5, 2023

अंतरराष्ट्रीय पत्रिका "गर्भनाल" में व्यंग्य संग्रह "पांचवा स्तम्भ" की डॉ (सुश्री) शरद सिंह द्वारा समीक्षा

प्रवासी भारतीयों की अंतरराष्ट्रीय पत्रिका "गर्भनाल" के अगस्त 2023 अंक में व्यंग्यकार एवं पत्रकार जयजीत अकलेचा के व्यंग्य संग्रह "पाचवां स्तम्भ" की मेरे द्वारा की गई समीक्षा का प्रकाशन...


हार्दिक धन्यवाद सुषमा शर्मा जी🌹
हार्दिक धन्यवाद आत्माराम शर्मा जी 🙏
हार्दिक बधाई भाई Jayjeet Jyoti Aklecha


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Tuesday, April 11, 2023

पुस्तक समीक्षा | शब्दों की छैनी से विसंगतियों को छीलता व्यंग्य संग्रह | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

प्रस्तुत है आज 11.04.2023 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई  डॉ नाथूराम राठौर के व्यंग्य संग्रह "कुत्ते बन गए श्वान" की समीक्षा... 
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पुस्तक समीक्षा
शब्दों की छैनी से विसंगतियों को छीलता व्यंग्य संग्रह
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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व्यंग्य संग्रह  - कुत्ते बन गए श्वान"
लेखक        - डॉ नाथूराम राठौर
प्रकाशक    - अयन प्रकाशन, जे 19/39, राजापुरी, उत्तम नगर, नई दिल्ली -110059
मूल्य       - 300/-
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04 जून 1944 को जिला दमोह के बांसा तारखेड़ा में जन्मे प्रोफेसर डॉ. नाथूराम राठौर ने उच्चशिक्षा विभाग में सेवाकार्य किया तथा शा. स्नातकोत्तर महाविद्यालय में प्रोफेसर, विभागाध्यक्ष एवं  प्राचार्य रहते हुए सेवानिवृत्त हुए। भाषाविज्ञान, ललित निबंध तथा व्याकरण पर उनकी पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। ‘‘कुत्ते बन गए श्वान’’ उनका व्यंग्य संग्रह है जिसमें कुल 40 व्यंग्य संग्रहीत हैं। इस संग्रह की भूमिका सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार डाॅ. सुरेश आचार्य तथा साहित्यकार डाॅ. रघुनंदन चिले ने लिखी है। ‘‘दुम हिलाने की संस्कृति’’ जैसे व्यंग्यसंग्रह के कृतिकार डाॅ. सुरेश आचार्य ने अपनी विशिष्ट शैली में डॉ. नाथूराम राठौर के इन व्यंग्यों पर टिप्पणी करते हुए लिखा है कि -‘‘‘‘प्रोफेसर एन. आर. राठौर के व्यंग्य- संग्रह ‘कुत्ते बन गए श्वान’ का मैंने आद्यंत और सांगोपांग अध्ययन किया है। चालीस व्यंग्य निबंधों का यह ‘चालीसा’ सचमुच विडंबनाओं, विद्रूपों, विसंगतियों और बेईमानियों के लिए ‘भूत भगाऊ’ रचना है। इन निबंधों के पढ़ने से प्रोफेसर राठौर के बहुपठ और बहुश्रुत विद्वत-व्यक्तित्व की जानकारी प्राप्त होती है। ऐसा रचनाकार जिसे पढ़कर आप अवाक् रह जाते हैं। श्री राठौर में गजब की व्यंग्य प्रतिभा है। उनके विकट अध्ययन-मनन ने उसे बहुत पैनी धार भी दी है, जिसे पढ़कर पाठक चिंतामग्न हो जाता है।’’
डाॅ. रघुनंदन चिले ने व्यंग्य शैली की व्याख्या करते हुए डाॅ राठौर के व्यंग्यों से परिचित कराया है। वे लिखते हैं कि-‘‘कुत्ता शब्द एक अनगढ़, गंवारू तथा खुरदरा शब्द लगता है पर वही बोला-सुना जाता है। कुत्तों को भी इस पर कोई आपत्ति नहीं थी.... नहीं है परन्तु अभिजात्य-पन का चस्का कुत्तों को भी लगने लगा है। वे श्वान की श्रेणी में अपने आप को अवस्थित करने में लगे हैं। अपनी अस्मिता तथा पहचान को लेकर कुत्ते भी जाग्रत हो गये हैं। समाज को उनके कुत्तेपन की अनदेखी कर उन्हें श्वान का दर्जा दे ही देना चाहिए क्योंकि व्यंग्यकारों की भी यही मंशा है।’’ वे आगे लिखते हैं कि ‘‘डॉ. नाथूराम राठौर की कलम-रवानी श्लाघनीय है। विषय-वस्तु का चयन विविधतापूर्ण है। मानव स्वभाव-व्यवहार तथा सामाजिक संरचना के ताने-बाने का वास्तविक ब्लू प्रिंट लेखक के मन-मस्तिष्क में रहता है। पठनीय तथा प्रवर्तनीय व्यंग्य पाठकों को सुखानुभूति तो करवायेंगे ही, साथ ही झकझोरेंगे भी। यह संकलन व्यंग्य के क्षेत्र में वैचारिक तरंगें निःसृत करेगा तथा समीक्षकों को समीक्षात्मक हस्तक्षेप के लिए आकर्षित भी करेगा।’’
जहां तक व्यंग्य लेखन का प्रश्न है तो वह अपने आप में समाज की वास्तविकता का ब्लूप्रिंट होता है। जो कुछ घटित हो रहा है, वह चाहे अच्छा हो या बुरा हो, व्यंग्यकार के लेखन का विषय बनता है क्योंकि एक व्यंग्यकार व्यवस्थाओं में निरंतर परिष्कार की अपेक्षा रखता है और इसीलिए वह शब्दों की धारदार छेनी से विसंगतियों को छीलता रहता है। यह छीलने की प्रक्रिया तब तक निरंतर जारी रहेगी जब तक कि व्यवस्थाएं सही आकार नहीं ले लेतीं। चाहे शरद जोशी हों या हरिशंकर परसाई हों, सभी व्यंग्यकारों ने शब्दों को ऐसा हथियार बना कर प्रहार किया जिससे चोट तो लगे लेकिन प्रक्रिया अहिंसात्मक रहे। वस्तुतः व्यंग्य चेतना को झकझोरने का काम करते हैं। प्रत्येक पाठक उसकी विषयवस्तु से स्वयं को सहमत पाता है।
‘‘कुत्ते बन गए श्वान’’ में संग्रहीत डाॅ नाथूराम राठौर के व्यंग्यों में विषय की विविधता और पर्याप्त पैनापन है। लेखक ने सामान्य से लगने वाले महत्वपूर्ण बिन्दुओं को अपने व्यंग्यों का विषय बनाया है। लेखक ने संग्रह की भूमिका में स्वयं लिखा है कि -‘‘ व्यंग्य क्या होता है? पिछले तीस-चालीस सालों में व्यंग्य का अर्थ खूब समझा गया है। खूब परिभाषाएं हुई हैं, व्याख्याएं हुई हैं। आचार्य क्षेमेन्द्र के चिंतन से उगता हुआ व्यंग्य काव्य की क्षमताओं का उन्नयन है। हर शब्द और वाक्य व्यंग्य की रंजकता से भरा होता है। भावक की सोच और समझ व्यंग्य को विमोचित करती है। वि़अंग = विकृत अंग या अंगों का निकट अनुभव व्यंग्य होता है। व्यंग्य एक लघुतर ध्वनि है, विकट घन-गर्जन नहीं। गर्जना तो सपाट बुद्धि वालों के लिए होती है। कुंभकर्णी निद्रा की तरह कितना ही पीटो गर्जो उन पर असर नहीं होता। व्यंग्य के तंतु अत्यंत कोमल और संवेदक होते हैं। वीणा की कोमल रागिनी की तरह उसे हृदयंगम किया जाता है। केवल धर्म की पर्तें छीलना व्यंग्य नहीं है या राजनीति की ऊबड़-खाबड़ भूमि को इधर-उधर कर देना भी व्यंग्य का सुकर्म नहीं है। समाज के घावों पर नमक छिड़ककर छोड़ देना भी व्यंग्य का लक्ष्य नहीं हो सकता। व्यंग्य तो बरसते पानी की तरह होता है जो हर ऊंची-नीची जमीन को समतल बना देता है। खाइयों को पाटना, शुष्कता में आर्द्रता और पर्यावरण का संतुलन बनाना व्यंग्य लेखन का बड़ा ध र्म होना चाहिए। पत्थर फेंककर मनःशांति प्राप्त करना या घृणा की जमी हुई मवाद को दूसरे पर उगलना कोई भी मानव धर्म नहीं हो सकता। जीवन जीने के लिए है। धर्म की अर्गलाएं उसे रुद्ध नहीं कर सकतीं और न समाज की सर्पीली फुंफकार उसे विमूर्छित कर सकती है। जीवन का मंगल-रथ सुचारु चलता रहे इसके लिए व्यंग्य उस रथ की धूल-कीचड़ को समाप्त करता है, पथ के कांटों को बटोरता है और धुरी की कर्कशता में स्नेह का आलेपन करता है। प्रस्तुत व्यंग्य-संग्रह में व्यंग्य की गिद्ध दृष्टि राम की विपदा पर भी है और रावण की संपदा पर भी। इसमें शुभ और अशुभ दोनों पक्षों पर नजर है।आसपास के जीवन और जगत को निकट से देखने का प्रयास है। समाज की भोग-जिह्वा, बाहुबलियों के नख, राजनेताओं के दंत, पाखंडियों की वाणी और बैठे-ठालों की टांगों को लथेड़ा गया है। इन सबके लौहधर्म में लगी जंग को छीलने का प्रयत्न है।’’
देखा जाए तो व्यंग्यकार ने अपने व्यंग्यों और पाठकों के मानस के बीच सेतु बनाते हुए भूमिका लिखी है। वे व्यंग्य की चाल, चेहरा, चरित्र - सबकुछ बता देना चाहते हैं, ताकि विधा को ले कर कोई, किसी भी प्रकार का संशय न रह जाए। इसके बाद आती है उनके व्यंग्यों की बारी। अपने व्यंग्य ‘‘फ्लैट का सुख’’ में लेखक ने महानगरीय आवासीय व्यवस्था पर कटाक्ष किया है। महानगरों में न तो इतनी जगह होती है और न सभी के पास इतना धन होता है कि वे स्वतंत्र बंगला खरीद सकें। अधिकांश लोगों को बहुमंजिला इमारत के फ्लैट्स में रहना पड़ता है। ज़मीन और आसमान दोनों से दूर, बीच में त्रिशंकु के समान। लेखक ने लिखा है कि -‘‘यहां फ्लैट के ऊपर फ्लैट हैं। पूर्णतः निरुद्ध। आकाश के कौए और गिद्ध कभी बीट नहीं कर सकते। चिड़ियों का शोरगुल कभी कान खराब नहीं कर सकता। यहां न धरती आपकी, न आकाश आपका। न हवा आपकी, न सूरज आपका।’’
इसी तरह वर्तमान स्थिति को व्यक्त करता हुआ लेख है-‘‘ नारी तुम विज्ञापन हो’’। आज विक्रय की वस्तु चाहे जो भी हो, अर्थात चाहे जूता, चप्पल, जांघिया, शेविंगक्रीम, कोल्डड्रिंक या फिर मोटरकार-हर विज्ञापन में एक महिला माॅडल का होना आवश्यक है। बाज़ार के लिए महिला मानो नुमाइश की वस्तु है। इस प्रवृत्ति पर प्रहार करते हुए लेखक ने चुटीले अंदाज़ में लिखा है कि -‘‘‘‘नारी तुम ‘केवल श्रद्धा हो’ कहने वाले कवि को तो तुम जानते ही होगे। यदि नहीं जानते तो भी कोई अन्तर नहीं पड़ता। कविता की आश्काई में पड़कर जिसने अपने बाप का नाम और काम डुबा दिया हो ऐसे आदमी को जानकर क्या करियेगा। और उसने ऐसा सपूत भी तो नहीं जन्मा जो अपने बाप का नाम उजागर करता। नेता या अभिनेता कुछ तो बनता दोनों खानदान को तिलक लगा देते हैं। खैर! ये नारी पूजक प्रसाद थे। जैसे पेशेवर प्रेमियों की नजर नारी के दृश्य अंगों पर नहीं अदृश्य अंगों पर होती है वैसे ही प्रसाद जी भी कुछ भीतर-भीतर टटोलते रहे। यह भेद तो तब खुला जब उन्होंने स्त्री शरीर के भीतर श्रद्धारन की स्थापना कर दी। नारी फूल उठी। आखिर इस यशस्विनी को चाहिये ही क्या प्रेम के पुल और प्रशंसा के बांध । उमड़कर शीघ्र बंध जाती है। सो प्रसाद ने उसकी विवशता का फायदा उठाया। उसे मधु का आधार दे दिया। शहद की पुतली बना दिया। फिर क्या था रस-ग्राहकों की भीड़ लग गई। होल-सोल एजेंट प्रसाद के माल की खूब बिक्री हुई तथा फैक्टरी में ग्रंथों का भारी उत्पादन हुआ। कितना फायदेमंद है नारी का विज्ञापन। आखिर कीमत नारी अंग के समानुपाती जो होती है।’’
संग्रह में एक व्यंग्य है-‘‘ अबे! तेंदू के पत्ते’’। इसकी आरंभिक पंक्तियां पढ़ते ही कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की ‘‘कुकरमुत्ता’’ कविता याद आने लगती है। इस व्यंग्य लेख का स्वर निराला की कविता की भांति है। यह अंश देखिए-‘‘रे तेंदू के पत्ते! तू महान है, श्रेष्ठ है, अनुपम है। तू ईश्वर की अद्भुत कृति है। तेरी सुन्दर कनकाम देह को लाखों ओंठ और करोड़ों अंगुलियां छूने दौड़ती हैं। तू उद्योगपतियों और नेताओं द्वारा पूजित है। मजदूर और मालिक सभी तुझे समान आदर देते हैं। तू संसार भर के मादक योजकों में उत्तम, सहजोपलब्ध और आभिजात्य का है। जब तम्बाखू के पत्तों का ताम्रचूर्ण तेरे स्वर्णगात में आलिप्त हो जाता है तब तू कनकछरी सी देह लेकर बीड़ी के नाम से विज्ञापित होता है। बीड़ी बनकर तू जन-जन के अधरों पर नाचता-फुदकता रहता है।’’
एक बहुप्रचलित दोष है ‘श्रीमती’ शब्द मं छोटी ई की मात्रा लगा कर ‘श्रीमति’ लिखना। इस दोष को आड़े हाथों लेते हुए व्यंग्यकार डाॅ राठौर ने ‘‘श्रीमति?’’ व्यंग्य में लिखा है कि ‘‘मैं श्रीमति से परेशान हूं। श्रीमति लिखने वालों से हैरान हूँ। तमाम श्रीमति वालों से पीड़ित हूं। इन श्रीमति धारकों से प्रपीड़ित इसलिए हूं कि मेरे द्वारा धारित श्रीमती से इनकी बिल्कुल रास नहीं पटती। मेरी श्रीमती बड़े शरीर वाली है। उसमें बड़ी ‘ई’ की मात्रा लगती है। जबकि श्रीमति में छोटी ‘इ’ होती है। अर्थात मेरी श्रीमती बड़ी है उन सबकी श्रीमति छोटी है। यह ‘ती’ और ‘ति’ का भेद श्रीमतियां नहीं जानतीं। पर जबसे मेरी श्रीमती को पता चला कि वह भाषाविदों द्वारा प्रमाणित सच्ची इकाई है तबसे उसका अहं बोलने लगा है। श्रीमती को पता है कि वह अमुक श्रीमान की पत्नी है, वह तीसरे आसमान पर है।’’
संग्रह का शीर्षक व्यंग्य ‘‘कुत्ते बन गए श्वान’’ राजनीतिक व्यंग्य की श्रेणी का है। इसमें मनुष्य की प्रकृति, पद और प्रतिष्ठा के त्रिकोणीय संबंध को उजागर किया गया है। लेखक ने लिखा है-‘‘एक पखवाड़े में ही एक बड़ी सभा बुलाई गई। नियत तारीख को दूरदराज के नामी गिरामी कुकर बिरादरी के सदस्य उपस्थित हो गए। सभी अपनी-अपनी विशेष मुद्रा में बैठे। सबसे पहले यह तय किया गया कि श्वान अधिपति के चित्र को मंच पर रखकर माल्यार्पण किया जावे। प्रश्न उठा कि आदि श्वान कौन है? जिसका चित्र आसंदी पर रखा जावे। पुराणों और इतिहास में खोजने की बात आ गई। किसी ने कहा कि महाराज युधिष्ठिर का श्वान प्रथम पूज्य है जिसने मार्गदर्शक बनकर पांडवों को स्वर्ग तक पहुँचा दिया था। अतः युधिष्ठिर का कुत्ता ही हमारा आदि प्रवर्तक होगा। दूसरों ने आपत्ति की कि इसे अपना प्रवर्तक मानने से तो युधिष्ठिर की ही आराधना हो जाएगी श्वान की नहीं। अतः और कोई नाम सुझाया जावे। विवाद में मामला अनसुलझा ही रह गया।’’ 
डाॅ. नाथूराम राठौर के इस संग्रह ‘‘कुत्ते बन गए श्वान’’ के 40 व्यंग्यों को पढ़ने के बाद यह निःसंकोच कहा जा सकता है कि वे एक समर्थ व्यंग्यकार हैं। उनकी लेखनी में व्यंग्यविधा के अनुरूप पैनापन है। भाषा सरल, सहज और प्रवाहपूर्ण है। विषय में सहजता और जागरूकता का आग्रह है। यह व्यंग्य संग्रह हरिशंकर परसाई और डाॅ सुरेश आचार्य की व्यंग्य परंपरा को आगे बढ़ाने में बखूबी सक्षम है।  
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Tuesday, December 27, 2022

पुस्तक समीक्षा | कुन्जीदाऊ की शादी की पचासवीं वर्षगांठ | समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


प्रस्तुत है आज 27.12.2022 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई लेखक आर. के. तिवारी के व्यंग्य संग्रह "कुन्जीदाऊ की शादी की पचासवीं वर्षगांठ" की समीक्षा... 
पुस्तक समीक्षा
अनुभूत घटनाओं से उपजे मौलिक व्यंग्य  
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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व्यंग्य संग्रह  - कुन्जीदाऊ की शादी की पचासवीं वर्षगांठ
लेखक   - आर. के. तिवारी
प्रकाशक - स्वयं लेखक (द्वारिका विहार काॅलोनी के पीछे, कैला माता मंदिर के पास, तिली वार्ड, सागर म.प्र.-140002)
  मूल्य      - 175/-
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यूं तो साहित्य की कोई भी विधा आसान नहीं होती है, उस पर व्यंग विधा तो और भी आसान नहीं है। व्यंग लेखन एक दुरूह कार्य है। व्यंग्य में हास-परिहास के साथ आलोचना का पुट भी रहता है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने व्यंग्य की सटीक परिभाषा दी है- ‘‘व्यंग्य कथन की एक ऐसी शैली है जहां बोलने वाला अधरोष्ठों में मुस्करा रहा हो और सुनने वाला तिलमिला उठे।’’ यानी व्यंग्य तीखा व तेज-तर्रार कथन होता है जो हमेशा सोद्देश्य होता है और जिसका प्रभाव तिलमिला देने वाला होता है। वहीं हरिशंकर परसाई ने व्यक्ति व समाज में उपस्थित विसंगति को लोगों के सामने लाने में व्यंग्य को सहायक माना है। उनके अनुसार, ‘‘व्यंग्य जीवन से साक्षात्कार करता है, जीवन की आलोचना करता है, विसंगतियों, मिथ्याचारों और पाखण्डों का पर्दाफाश करता है।’’
हिन्दी में व्यंग्य लेख का बहुत लम्बा इतिहास नहीं है किन्तु जब से हिन्दी में व्यंग्य लेखन का आरम्भ हुआ तब से उसने उत्तरोत्तर लोकप्रियता पाई है। वस्तुतः व्यंग्य की धारा पद्य से गद्य की ओर बही है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि व्यंग्य विधा ने पद्य का साथ छोड़ दिया हो। आज भी गद्य और पद्य दोनों में समान रूप से असरदार व्यंग्य लिखे जा रहे हैं। व्यंग्य विधा आज साहित्य की केन्द्रीय विधाओं के समीप आ गई है। व्यंग्य विधा के बारे में ज्ञान चतुर्वेदी का यह कथन बहुत गहन अर्थ रखता है-‘‘वैसे इन दिनों बहुत सारा व्यंग्य ऐसा लिखा भी जा रहा है कि पूछने की तमन्ना तो हमारी भी होती है कि ऐसा व्यंग्य किसलिए? पर मैं उम्मीद करता हूं कि सम्पादक इतना कड़वा सवाल करने से कतराएगा. सहृदय सम्पादक का काम ऐसे प्रश्नों से आखें मींचे रहना है जिनसे सामना करने से स्वयं व्यंग्यकार छुपते फिर रहे हैं. तो क्या सम्पादक आश्चर्य कर रहा है कि यह आजकल क्या चल रहा है कि व्यंग्य इतना लिखा जा रहा है यह विधा साहित्य के केंद्र में न भी आ गयी हो पर यह ‘सेंटरस्टेज’ के आसपास तो मंडराने ही लगी है. वह दौर कब का जा चुका है जब इस बात का स्यापा पीटा जाता था कि हाय, व्यंग्य स्पिरिट मात्र है और लोग इसे फालतू ही विधा मनवाने पर आमादा हैं. व्यंग्य को तो परसाई जैसे लोग ही विधा का दर्जा दिलाकर चले गये जो कदाचित, संकोच में ही इसे मात्र स्पिरिट कहते रहे।’’
वैसे जिन्होंने हिन्दी साहित्य में व्यंग्य के गद्य लेखन को पहचान दिलाई उनमें कुछ प्रमुख नाम हैं- हरिशंकर परसाई, श्रीलाल शुक्ल, शरद जोशी, प्रेम जन्मेजय, के.पी. सक्सेना, रवीन्द्र नाथ त्यागी, डॉ सुरेश आचार्य ज्ञान चतुर्वेदी, गिरीश पंकज, विवेकरंजन, पंकज प्रसून, जयजीत ज्योति अकलेचा आदि। इस श्रृंखला में अनेक नवोदित व्यंग्यकारों की कड़ियां जुड़ती जा रही हैं। इसी क्रम में व्यंग्यविधा का एक नवोदित नाम है आर.के. तिवारी।
‘‘कुन्जीदाऊ की शादी की पचासवीं वर्षगांठ’’ लेखक आर के तिवारी की छठीं पुस्तक ए्वं पहला व्यंग्य संग्रह है। लेखक आर के तिवारी एक्सीडेंटल व्यंग्यकार नहीं हैं, उनकी कहानियों और उपन्यास में भी उनकी व्यंजनाशक्ति स्पष्ट दिखाई देती है। दिलचस्प बात यह है कि उनके व्यंग्यों में कथा साहित्य का आनन्द लिया जा सकता है। अर्थात् आर.के. तिवारी के व्यंग्य कथात्मक शैली के हैं। यही कारण है कि उनके कुछ व्यंग्य लेख के बजाए व्यंग्य कथा का भान देने लगते हैं। फिर भी इन व्यंग्यों की सब से बड़ी विशेषता यह है कि ये सुनी-सुनाई घटनाओं के आधार पर नहीं बल्कि अनुभूत घटनाओं के आधार पर लिखे गए हैं। जब व्यंग्य यथार्थपरक होते हैं तो उनका असर भी गहरा और व्यापक होता है। ऐसे व्यंग्यों में दृश्यात्मकता भी अधिक होती है। उदाहरण के लिए इस संग्रह के नाम के शीर्षक वाला व्यंग्य ही ले लिया जाए- ‘‘कुन्जीदाऊ की शादी की पचासवीं वर्षगांठ’’। इस व्यंग्य में लेखक ने एक ऐसे वैवाहिक वर्षगांठ समारोह का रोचक विवरण प्रस्तुत किया है जो पचासवीं वर्षगांठ के रूप में मनाया जा रहा है। वे गोया आंखों देखा हाल बताते हुए लिखते हैं कि ‘‘मेरा पूरा ध्यान मंच पर चल रहे कार्यक्रम पर था। मैंने देखा दादू आज बहुत खुश लग रहे थे शायद पुरानी यादों में खो रहे थे, या मन में लड्डू फूट रहे थे फिर मैंने गौर से अम्मा दुलैया को देखा। अम्मा दुलैया ही कहेंगे। लगा, आज इनके लड़कों ने इन्हें भी ब्यूटी पार्लर की सैर करा दी। इसीलिए ही चेहरा बहुत चमक रहा था पर मेरी नजर गले पर पड़ गई, जहां की काली स्याही-सी गर्दन साफ दिखाई दे रही थी। हां, लाल बढ़िया साड़ी में जरूर खूब जंच रही थीं। यह बात अलग थी कि वह एक चलती फिरती पुतरिया सी भले ही लग रही थीं, पर बहुत खुश दिख रही थीं।’’
इसी व्यंग्य में वे खुद पर व्यंग्य करने से भी नहीं चूके हैं। लेखक के साथ समारोह में पहुंचे उनके गुरुवर मित्र कटाक्ष करते हैं कि -‘‘तुम क्या समझे, तुम साठ के हो कर लाल बाल कर के लड़का बन जाहो?’’
स्वयं पर कटाक्ष के बहाने व्यंग्यबाण चलाने की कला इस संग्रह के अन्य व्यंग्यों में भी देखी जा सकती है।
संग्रह में कुल इकतालीस व्यंग्य हैं। इनमें कई व्यंग्य साहित्यिक आयोजनों जैसे पुस्तक लोकार्पण, कविगोष्ठी आदि को आईना दिखाते हैं। लेखक ने एक श्रोता और दर्शक की भांति इन आयोजनों के परिदृश्य को देखा, अनुभव किया और आकलन करते हुए अपने व्यंग्यों में इनका कच्चा-चिट्ठा खोला है कि सभागार में उपस्थित लोग किस प्रकार समयखाऊ उद्बोधनों से बोर होते हैं। वहीं श्रोता भी वक्ताओं को सुनने के बजाए वहां से जाने का समय ढूंढते रहते हैं। यहां तक कि कुछ श्रोता तो इस बात की ताक में रहते हैं वे आयोजक की दृष्टि में आ जाएं ताकि दूसरे दिन समाचार में उनका नाम जुड़ जाए।
एक व्यंग्य है ‘‘नौ-दो ग्यारह’’। जिसमें व्यंग्यकार ने मूल विषय को छोड़ कर इधर-उधर की चर्चा करने और अनावश्यक उदाहरणों द्वारा अपनी विद्वता के झंडे गाड़ने का प्रयास करने वाले वक्ताओं पर कटाक्ष किया है। व्यंग्यकार अपने जिस साथी के साथ एक पुस्तक लोकार्पण कार्यक्रम में पहुंचा है, वह साथी व्यंग्यकार को समीक्षक वक्ता के बारे में जानकारी देता है कि ‘‘अभी जिन समीक्षक का नाम लिया गया है, दो घंटे तो उन्हीं को समीक्षा में लगेंगे शायद आप वाकिफ नहीं हो।’’ इसके बाद व्यंग्यकार ने उक्त समीक्षक के संबंध में लिखा है कि ‘‘जब वे शुरू करते हैं तो लगता है हिंदी भाषा चल रही है। तभी लगने लगता है संस्कृत भाषा है। फिर थोड़ी देर में बीच-बीच में उर्दू की शेरो-शायरी करते हुए एक-दो कहावतें बुंदेली भाषा की भी कहने लगते हैं, और फिर जब समीक्षा अपने चरम पर पहुंचती है तो वह पुराने दादी मां के किस्से कहानी पर विचरण करती हुई, काव्य का रूप ले लेती है। पर इसमें भी एक विडंबना यह कि वे काव्य उस बेचारे कवि की पुस्तक के नहीं होते।’’
आर. के. तिवारी ने अपने व्यंग्यों में मुहावरों का रोचक प्रयोग किया है। व्यंग्य ‘‘फांकुओं की बैठक’’ में वे लिखते हैं-‘‘कम से कम इन्हें छठी का दूध याद आ जाएगा कि मुंह बजाना और गोली चलाना अलग बात है।’’
इसी तरह व्यंग्य ‘‘नहले पर दहला’’ में कहावत का दिलचस्प प्रयोग देखें-‘‘अरे आप क्या कह रहे हैं गुरुवर? क्या समीक्षा की पुस्तक का प्रकाशन हो रहा है उनका! मेरी बात सुन कर गुरुवर बोले, अरे भाई रामलाल आप आश्चर्य क्यों कर रहे हैं? मैंने कहा, आश्चर्य की ही तो बात है, वह इसलिए कि जहां तक मुझे ज्ञात है मैंने उनको समीक्षा करते कभी नहीं देखा-सुना! तब गुरूवर बोले, क्या हुआ भाई! एक कहावत है कि शादी भले नहीं हुई, पर बारातें खूब की हैं।’’
 व्यंग्यकार ने राजनैतिक, सामाजिक, सार्वजनिक और आर्थिक सहित लगभग हर क्षेत्र की विद्रुपताओं, विसंगतियों पर अपनी पारखी नजर डाली है। आज नवोदित रचनाकारों का ध्यान अपने रचनाकर्म को साधने के बजाए सम्मानपत्र प्राप्त करने के जुगाड़ में लगा रहा है। इस प्रवृति पर लेखक ने तंज़ यिका है। ‘‘गफ़लत’’ शीर्षक व्यंग में आर के तिवारी लिखते हैं- ‘‘आलोचना शब्द ही अपने आप में बुरा सा लगता है, जिसे कोई नहीं सुनना चाहता। आने वाली हमारी पीढ़ी कविताएं नहीं तुकबंदी और चुटकुले तक ही सीमित रह जाएंगी। कभी घरों में पुस्तकों के कारण अलमारियों में जगह नहीं रहती थी, पर अब तो वह जगह सम्मान पत्रों ने ले ली है। और एक दिन आने वाली पीढ़ी उन्हें भी पुस्तकों की तरह रद्दी में बेच देगी उनसे उन्हें कुछ हासिल नहीं होगा।’’
इस व्यंग्य संग्रह में हिन्दी के साथ ही लेखक के बुंदेली व्यंग्य भी शामिल हैं। इन व्यंग्यों में आंचलिकता की मिठास और चुटीलापन है। जैसे एक व्यंग्य है-‘‘पर्यावरण को ढोल: गदिया पे आम नईं जमत’’। लेखक ने लिखा है कि -‘‘सरकार की सबरी योजनाएं धरी रईं। नें नए-नए जंगल लगे और जो लगे सो बे जमतई मरत गए, काए उनखों टेम पे पानी नईं मिलो। पानी देबे वारो पानी के घूंट सबरो पइसा शराब में पी गओ। कोनऊं-कोनऊं पेड़ तो कागजों में लगे, तो कोनऊं भटारों पे लगे, जिने पानी तक नईं मिलो। बे मरत गए, भटारें मुंडी की मुंडी बनी रईं।’’
पर्यावरण पर केन्द्रित यह व्यंग्य समस्या को अपनी दृष्टि से व्याख्यायित करता है। व्यंग्य का दीर्घकाय शीर्षक है-‘‘कल चमन था आज एक सहरा हुआ/अब वहां जंगल कि मेवा कहां’’। इसमें लेखक ने गांवों के शहरीकरण और असली जंगल की जगह कांक्रीट के जंगल पर अपनी पीड़ा व्यक्त की है। एक अंश देखिए-‘‘ हमारी ससुराल से कोसों दूर तक एक भी पेड़ दिखाई नहीं देते हैं। बस, एक दो मुंडी (टीले), पहाड़ियों की चोटियां ही बच पाई है, जहां अब भी इंसान अपनी पोक मशीनों और जेसीबी मशीनों से घात लगाए इंतजार कर रहा है कि कब मौका मिले और वह उसको भी समतल कर नेस्तनाबूद कर दें।’’
जहां तक व्यंग्यकार आर. के. तिवारी की शैली का प्रश्न है तो वह रोचकता लिए हुए है किन्तु उसमें जो कमी है भूमिका में ही उनके संज्ञान में लाया गया है। व्यंग्य विधा के पुरोधा डॉ सुरेश आचार्य ने संग्रह की भूमिका लिखते हुए निष्पक्षता का परिचय दिया है तथा लेखक की  व्यंगशैली की विशेषताओं और कमियों दोनों को रेखांकित किया है। डॉ आचार्य लिखते हैं कि ‘‘श्री आर के तिवारी अपने आसपास की गड़बड़ियों और विडंबना से भली भांति परिचित है। उनकी निरीक्षण शक्ति सूक्ष्म और बैठक है। उनकी रचनात्मक ऊर्जा हमें प्रभावित करती है। हां, उनमें एक प्रकार की एकरसता दिखाई देती है जो कदाचित वातावरण के चित्रण की दृष्टि से आवश्यक हो। कुल मिलाकर उनके नए व्यंग संग्रह का देश, समाज और हिंदी जगत में स्वागत होगा। उनसे यह आग्रह जरूर करूंगा कि व्यंग निबंध थोड़ा विस्तृत हो। यह मंगलमय होगा।’’
इसमें कोई संदेह नहीं कि व्यंग्य संग्रह ‘‘कुन्जीदाऊ की शादी की पचासवीं वर्षगांठ’’ के लगभग सभी व्यंग्य रोचक हैं और मनन-चिंतन जगाने वाले हैं। पुस्तक का आमुख आकर्षक है और पाठक को पुस्तक पढ़ने के लिए आमंत्रित करता प्रतीत होता है। निमिष आर्ट्स एण्ड पब्लिकेशन का मुद्रण साफ-सुथरा और सुरुचिपूर्ण है। लेखक ने आत्मकथ्य में आरम्भ में ही अपनी अभिलाषा व्यक्त करते हुए यह पंक्ति लिखी है कि-‘‘अभी हसरत और बाकी है, कुछ और कर गुज़रने की।’’ तो लेख की यह अभिलाषा पूर्ण हो तथा वे पाठकों के लिए शीघ्र ही अपना अगला व्यंग्य संग्रह लाएं, यही कामना है। यूं भी वर्तमान परिवेश मौलिक हास्य और परिमार्जन से दूर होता जा रहा है और यह कमी व्यंग्यविधा ही पूरी कर सकती है क्योंकि व्यंग्य में हास्य भी होता है और कटाक्ष के द्वारा परिमार्जन का रास्ता भी दिखा दिया जाता है। प्रस्तुत संग्रह के लेख समाज को आइना दिखाने में समर्थ हैं। इन र लेखों की सम्प्रेषणीयता आश्वस्त करती है कि ये लेख पाठकों से जुड़कर उनकी चेतना को झकझोरेंगे। इस दृष्टि से आर. के. तिवारी के व्यंग्य न सिर्फ रोचक हैं अपितु हर व्यक्ति सेे आत्मावलोकन एवं आत्मनिरीक्षण का आग्रह करते हैं। ये व्यंग्य संग्रह न केवल पठनीय हैं बल्कि असरदार भी हैं।
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Tuesday, August 3, 2021

पुस्तक समीक्षा | परसाईं एवं आचार्य परम्परा के रोचक व्यंग्यों का संग्रह | समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

प्रस्तुत है आज 03.08. 2021 को #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई लेखक डॉ. राजेश दुबे के व्यंग्य संग्रह "बबूल की छांव" की  समीक्षा...
आभार दैनिक "आचरण" 🙏

पुस्तक समीक्षा
परसाईं एवं आचार्य  परम्परा के रोचक व्यंग्यों का संग्रह
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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व्यंग्य संग्रह - बबूल की छांव
लेखक     - डाॅ. राजेश दुबे
प्रकाशक    - अद्वैत प्रकाशन, ई-17, पंचशील गार्डन, नवीन शहदरा, दिल्ली-110032
मूल्य       - 275/-
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आज जिस व्यंग संग्रह की समीक्षा कर रही हूं, उसका नाम है ‘‘बबूल की छांव में’’। जहां तक व्यंग्य विधा का प्रश्न है तो व्यंग विधा यूं भी चुनौती भरी विधा है, जो लिखे उसके लिए, जो पढ़े उसके लिए और जिस पर लिखा जाए उसके लिए तो चुनौती है ही। मेरे विचार से व्यंग आलेख वह आलेख होता है जो कथात्मक स्वरूप रखते हुए अपने चुटीलेपन से आक्रोश उत्पन्न करने की क्षमता रखता है।  यही व्यंग की सबसे बड़ी खूबी होती है। साहित्य की शक्तियों अभिधा, लक्षणा, व्यंजना में हास्य अभिधा यानी सपाट शब्दों में हास्य की अभिव्यक्ति के द्वारा क्षणिक हंसी तो आ सकती है, लेकिन स्थायी प्रभाव नहीं डाल सकती। व्यंजना के द्वारा प्रतीकों और शब्द-बिम्बों के द्वारा किसी घटना, नेता या विसंगितयों पर प्रतीकात्मक भाषा द्वारा जब व्यंग्य किया जाता है, तो वह चिर स्थायी प्रभाव डालता है। हिन्दी के प्रमुख व्यंग्यकार हैं- हरिशंकर परसाई, शंकर पुणतांबेकर, नरेंद्र कोहली, गोपाल चतुर्वेदी, विष्णुनागर, प्रेम जन्मेजय, ज्ञान चतुर्वेदी, विष्णुनागर, सूर्यकांत व्यास, आलोक पुराणिक, सुरेश आचार्य आदि। इन व्यंग्यकारों ने हिन्दी साहित्य में व्यंग्य विधा को नई स्थापना दी।

वर्तमान समाज में व्याप्त अव्यस्थाओं को देखकर कभी-कभी मन व्यथित हो जाता है, चाहे वह अव्यवस्था सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक या धार्मिक हो मन इन अव्यवस्थाओं का प्रतिकार करना चाहता है परन्तु किन्हीं व्यक्तिगत कारणों से हम इनका प्रतिकार नहीं कर पाते और ये भावनाएं मन के किन्ही कोने में संचित होने लगती है। व्यंग्यकार इन्ही संचित भावनाओं को व्यंग्य के माध्यम से समाज में लाने का प्रयास करता है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार, ‘‘व्यंग्य वह है, जब सुनने वाला अधरोष्ठों में हंस रहा हो किन्तु भीतर तिलमला उठा हो और फिर भी कहने वाले को जवाब देना उसके लिए अपने को और भी उपहास का पात्र बनाना हो जाता है।’’

डॉ. बरसाने लाल चतुर्वेदी के अनुसार, ‘‘आलम्बन के प्रति तिरस्कार, उपेक्षा या भत्र्सना की भावना लेकर बढने वाला हास्य व्यंग्य कहलाता है।” शरद जोशी के अनुसार, ‘‘व्यंग्य की पहचान है कि ऐसा साहित्य जो कष्ट सहती सामान्य जिन्दगी के करीब है या उससे जुड़ा है। यदि ऐसा न हो तो कहीं गड़बड़ है।” हरिशंकर परसाई के अनुसार, व्यंग्य जीवन से साक्षात्कार करता है, जीवन की आलोचना करता है, विसंगतियों, मिथ्याचारों और पाखण्डों का पर्दाफाश करता है।’’

इन परिभाषाओं की छांव में देखा जाए तो डॉक्टर राजेश दुबे का व्यंग संग्रह ‘‘बबूल की छांव’’ सटीक बैठता है। इस संग्रह में कुल 36 व्यंग हैं। जैसे की प्रस्तावना में डॉ. सुरेश आचार्य ने बड़े मार्के की बात कही है कि-‘‘व्यंग संशोधन या सुधार नहीं बदलाव चाहता है।’’ यानी थोड़े-बहुत से समझौता करना व्यंग्य की प्रवृत्ति नहीं है। वह पूर्ण परिवर्तनगामी होता है। इसी परिवर्तन की आकांक्षा रखते हुए डॉ राजेश दुबे ने अपने 36 व्यंग्यों को अपने संग्रह में संग्रहीत किया है। यह ठीक वैसे ही है कि जैसे सुव्यवस्था चाहने वालों और इन व्यंग्यों के 36 के 36 गुण आपस में मिल जाए तो अव्यवस्था की जड़ें आसानी से खोदी जा सकती हैं और अव्यवस्था को समूल नष्ट किया जा सकता है। बालेन्दु शेखर तिवारी ने व्यंग्य को प्रयोजनशील अभिव्यक्ति का साधन माना है, उनके अनुसार, ‘‘व्यंग्य किसी लेखक की निजी टिप्पणी नहीं है। वह प्रयोजनशील सघनता से निःसृत यथार्थ की अभिव्यक्ति है। व्यंग्य परिवेश की बहुस्तरीय जटिलताओं को उघाड़ते हुए उस बिन्दु तक अपने पाठकों को पहुंचाने में समर्थ हैं, जहां छद्मपराण तौर-तरीकों के बीच अपने होने का एहसास पाठक को बुरी तरह आन्दोलित कर डाले।’’
पतनोन्मुख व्यक्ति व समाज व्यंग्यकार के लिए पीड़ा का विषय है। वह इस पीड़ा का अनुभव करता है तथा उसे अपनी रचना द्वारा उस पतन को समाज के समक्ष लाता है। इस संग्रह में एक व्यंग है ‘‘तेरे द्वार खड़ा भगवान’’ भी आचार संहिता की शानदार परिभाषा की गई है- ‘‘हमारे वाग्वीर जनप्रतिनिधि जो जन के नहीं, निधि के प्रति समर्पित रहते हैं। अपने भविष्य के सुंदर सपने देखने में व्यस्त रहते हैं। राजनीति का विषदंत धारण किए हुए रहते हैं, कालियादह के इन वंशजों को आज भारतीय निर्वाचन आयोग के सपेरे ने उन्हें दंत विहीन आचार की जिस पिटारी में बंद कर दिया है उस पिटारी को आचार संहिता कहते हैं।’’

सितंबर मास आते ही हिंदी के प्रति हमारा प्रेम और हमारी जागरूकता अचानक बढ़ जाती है। बड़े-बड़े आयोजन समारोह होने लगते हैं। चर्चा-परिचर्चा परिसंवाद सभी कुछ होने लगता है और उस मास सप्ताह यह दिवस में हिंदी के प्रति सारी चिंताएं सारी संभावनाएं और सुखद भविष्य की कल्पनाएं की जाने लगती हैं। मौसमी चिंता पर कटाक्ष करते हुए अपने व्यंग्य ‘‘हिंदी का हाजमा’’ में व्यंग्यकार में लिखा है कि ‘‘हिंदी दिवस पर भांग खाए लोगों ने अपने उद्बोधनों में हिंदी के खूब प्रशस्ति गान गाय हैं। हिंदी भाषियों ने, हिंदी भाषियों को, हिंदी भाषा में सुनाया कि हिंदी को अब बैसाखियों की जरूरत नहीं है। अब वह अपने पैरों पर खड़ी है।’’
हमारे दैनिक जीवन में बाज़ारवाद ने हमें बुरी तरह प्रभावित कर रखा है। कभी हम उसके रंग में रंगे हुए दिखाई देते हैं तो कभी भयाक्रांत। बाज़ारवाद का असर अंतरिक्ष पर भी जा पहुंचा है। वहां भी बाज़ार के मोल भाव और बंटवारे होने लगे हैं। लेकिन बाजार तभी बाज़ार होता है, जबकि ग्राहक मौजूद हो और ग्राहक को लुभाने के लिए बाज़ार हर हथकंडे अपनाता है। ग्राहक भी सब कुछ जानते समझते उन हथकंडों में आसानी से फंस जाता है और फिर भी मुस्कुराता रहता है जैसे कि कुछ हुआ ही न हो।  बाजार और ग्राहकी इस प्रवृत्ति पर कटाक्ष करते हुए लेखक ने लिखा है-‘‘आजकल सब बाजार में व्यस्त हैं। अभी भी मेनका विश्वामित्र को रिझाने में लगी हैं और शकुंतला की अंगूठी हो गई है। इतना सब कुछ होते हुए भी हमारे जीवन में अंतःसलिला सरस्वती प्रवाह मान है।’’

हमारे कर्मों और प्रयासों में भ्रष्टाचार इस तरह रच बस गया है कि हम उससे अलग होकर जीवन जीने की कल्पना ही नहीं कर पाते हैं। हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में भ्रष्टाचार में लिप्त होता है। चाहे वह एक कप चाय पिला कर अपना काम करवाने का भ्रष्टाचार क्यों ही न करें,  भ्रष्टाचारी तो कहलाएगा ही। इस भ्रष्टाचार में नोटों का सबसे अधिक महत्व होता है नोटों का लेन-देन ही भ्रष्टाचार के आधार का काम करता है। जिस पर तंज करते हुए राजेश दुबे अपने व्यंग्य ‘‘भ्रष्टाचार हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है’’ में लिखते हैं-‘‘गांधीजी ने जिस रास्ते पर हमें चलने का संदेश दिया है हम उन्हें लेकर ही आगे बढ़ा सकते हैं। जब गांधी जी हमारे पास होते हैं। जब वे हमारे जेब में होते हैं, वह हमारे बैंक खातों में होते हैं, वे हमारी तिजरियों में रहते हैं, तब हम सुखी रहते हैं।’’

व्यंग्यकार अपने व्यंग्य रचना द्वारा भ्रष्टाचार, साम्प्रदायिकता, अशिक्षा पर व्यंग्य कर नैतिक मूल्यों को पुनस्र्थापित करने का प्रयास करता है। व्यंग्यकार शिक्षा, राजनीति या धार्मिक सभी क्षेत्र में आई अनावश्यक विसंगति को समाज के समक्ष लाने का प्रयास करता है। नैतिक मूल्यों की रक्षा के लिए व्यंग्यकार अनैतिक पक्षों को समाज व पाठकों के समक्ष रखता है। इस संदर्भ में ‘‘लोकतंत्र की नाव’’ व्यंग्य इस संग्रह का एक महत्वपूर्ण व्यंग है जिसमें लोकतंत्र की बहुत ही पैनी परिभाषा दी गई है। हम लोकतंत्र में रहते हैं हमें गर्व है कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र हमारा लोकतंत्र है लेकिन इस लोकतंत्र के करो को बनाए रखने के लिए शायद हम सचेत नहीं रहते हैं इसीलिए लोकतंत्र अक्सर कटघरे में खड़ा दिखाई देता है इसी तथ्य को आधार बनाते हुए लेखक ने लोकतंत्र को इन शब्दों में परिभाषित किया है- ‘‘लोकतंत्र, धृतराष्ट्र की सभा में खड़ी द्रोपदी है। जिसे सब लोलुप निगाहों से भोगने को आतुर हैं।’’ लोकतंत्र को परिभाषित करने के बाद लेखक ने आगे लिखा है कि -‘‘कितने धीर वीर अपने सिंहासन पर बैठे मौन हैं। सारे उपस्थित महानुभावों के बीच उठे सारे निवेदन के स्वर, न्याय पूर्ण कथन और सिफारिशों ने आत्महत्या कर ली है। परिणामतः लोकतंत्र की दयनीय हो रही स्थिति पर हम शर्मसार हैं। राजनीतिक अराजकता की इस परिस्थिति में हम छेद वाली नाव में सवार हैं और वैतरणी पार करने के हौसले बनाए हुए हैं।’’ वस्तुतः व्यंग्य की भाषा उसकी प्रहारक क्षमता को दुगुना करता है। व्यंग्य विसंगतियों के प्रति सहानुभूति नहीं दिखाता बल्कि वह कठोर व तीक्ष्ण भाषा का प्रयोग करता है।

‘‘बबूल की छांव’’ के कुछ व्यंग्यों में बुंदेली शब्दों का भी प्रयोग किया गया है। जिसे लोकतत्व का रोचक समावेश माना जा सकता है। जैसे एक व्यंग्य है-‘‘ डूबते जहाज के तैरते यात्री’’। इस व्यंग्य का एक अंश देखिए-‘‘ अपनो घर आंगन छोड़ कें पराय मंडप भात खा रय हैं। काय का घरबारों ने लात मार कें भगा दओ का। अरे कल्लू कैसी बात करत हो। इते राजा की मान मर्यादा का सवाल है और दरबारियों की निष्ठा का सवाल है।’’

व्यंगकार राजेश दुबे के व्यंग हरिशंकर परसाई और डॉक्टर सुरेश आचार्य की परंपरा के व्यंग है। यह एक पठनीय व्यंग संग्रह है इसे पढ़कर आनंद की अनुभूति के साथ ही विचारों का उद्वेलन होना सुनिश्चित है।
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