Thursday, August 20, 2026

बतकाव बिन्ना की | काकरोच सोई तभईं होत आएं जो घरे गंदगी मच जाए | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की
काकरोच सोई तभईं होत आएं जो घरे गंदगी मच जाए 
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह


भैयाजी के इते तो मनो गदर मची हती। भैयाजी हाथ में दवा छिरकवे को स्प्रे लए हते और भौजी अपने हाथ में चप्पल ले के ठाड़ी हतीं।
‘‘जो का हो रओ भैयाजी?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘अरे, घरे मुतके काकरोच हो गए। जिते देखो उतई से मूंड़ निकार के झांकन लगत आएं।’’ भैयाजी दरवाज़ा की दरार में दवा छिरकत भए बोले। इत्तई में बा दरार से एक काकरोच बिलबिलात भओ बायरे निकरो। भौजी पे आव देखी ने ताव औ अपनी हाथ में लई चप्पल से चटाक दीनां ऊं काकरोच खों दे मारो। बा बिचारो उतई चपट गओ। हो गओ ऊको नाम नाम सत्त!
‘‘जो का करो भौजी? ऐसे काए मार दओ ऊको?’’ मैंने भौजी से पूछी।
‘‘काए ने मारो जाए? जे बिमारियन की जड़ आएं।’’ भौजी अपनी सफलता पे मुस्कुरात भईं बोलीं।
‘‘बा तो ठीक आए, पर भैयाजी तो सोई दवा छिरक रए। दवा से ई तो बा मर जातो।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘अरे जा कओ के हमने ऊको झट्टई मुक्ति दोआ दई, ने तो कछू देर तो बा छटपटात रैतो।’’ भौजी मुस्कात भईं बोलीं।
‘‘मनो भौजी आपकी जा हरकत कऊं काकरोच पार्टी वारन खों पता पर गई तो बे भौतई नाराज हुइएं।’’ मैंने भौजी को तनक डराओ।
‘‘बे काए खों नाराज हुइएं? हमने तो असली काकरोच मारो, बे तो नकली वारे ठैरे।’’ भौजी बोलीं।
‘‘अब चाए नकली होंए औ चाए असली, पर नांव तो धरे आएं काकरोच पार्टी। बा बी राजनीति वारी पार्टी। औ जां राजनीति घुसी उते दोंदरा मचत देर नई लगत। कओ कोऊ आपको ट््रोल करन लगे।’’ मैंने कई।
‘‘सो नांव धरे से का हुइए? का बे असली वारे काकरोच हो जैहैं का?’’ भौजी निष्फिकर भाव से बोलीं।
‘‘फेर बी!’’ मैंने कई।
‘‘फेर बी का? जे ठैरे घिनऊं से कीरा औ बा ठैरे आजकाल के ज्वान। उने जो पुसाओ बा उन्ने नांव धर लओ।’’ भौजी बोलीं।
‘‘मनो उनें कोऊ पसंद नई कर रओ।’’ मैंने कई।
‘‘ने करे, ऊसे का हुइए? उने जोन करने सो करहें।’’ भौजी बोलीं।
‘‘उते जंतर-मंतर में नईं देखो रओ का के बा काकरोच वारन ने कैसी दोंदरा मचाई हती?’’ अब के भैयाजी ने मोसे पूछी।
‘‘काए नईं देखी? जोन टीवी वारन ने ने दिखाई बा बी सोसल मीडिया वारन ने दिखा दई रई। औ सई कई जाए तो उन ओरन से जेन जी वारों खों दम मिलत रई।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘जे बात! जेई तो हम कए रए के बे ओरें ज्वान ठैरे। औ उन्ने नांव ऊंसई नईं धरो रओ, बा का आए के हमने कऊं पढ़ो रओ के कोऊ सयानपत्ती वारे ने बेरोजगारन खों काकरोच कए दओ रओ। बस, ओई से इन ओरन खों सूझी औ इन्ने काकरोच पार्टी नांव धर लओ।’’ भौजी बोलीं।
मोए भौजी की नालेज पे बड़ो प्राउड फील भओ।
‘‘भौजी, आप तो बड़ी अपडेट होत जा रईं।’’मैंने भौजी की तारीफ करी।
‘‘बा जो कंगना घांईं लुगाइयां भक्ति दिखाने के लाने बात बेबात फुदक रईं तो हम ओरन खों तो अपडेट भओ ई चाइए।’’ भौजी बोलीं।
‘‘उनकी फुदकवे की ने कओ भौजी, बे अपनी माननीय सांसद आएं।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘सो का, ईसे का हो गओ? उने तो एकई जने दिखा रओ। काए से बोई एक ठो खों गरिया-गरिया के अपनी भक्ति दिखाई जा सकत आए।’’ भौजी बोलीं।
‘‘तुम ओरें बी, कां की राजनीति की बतकाव ले बैठीं? अपन ओरन के बतकाव करे से कछू नईं भओ जा रओ।’’ भैयाजी बोले।
‘‘ने होए, का कछू होए जेई के लाने बतकाव करी जात आए?’’ भौजी भैयाजी से बोलीं। उने भैयाजी को ऐसो कैबो ने पुसाओ।
‘‘अब तुम काए काकरोच बनी जा रईं? तनक गम्म खाओ।’’ भैयाजी भौजी से बोले।
‘‘हम काए खों काकरोच बनहें? जो हमें कछू बनने हुइए तो हम जेन-जी बनहें, नें तो अल्फा-जी बनहें।’’ भौजी बोलीं।
‘‘ई उम्मर में जेन-जी?’’ भैयाजी भौजी को मजाक उड़ात भए बोले।
‘‘काए? जेन-जी खों आप उम्मर से जेई लाने जोर रए के बे सबरे पढ़ाई की उमर वारे मोड़ा-मोड़ी आएं। पर आप जे ने भूलो के उनके संगे उनके मताई-बाप सोई उते पौंच गए रए। सो का हम उने सपोर्ट कर के जेन-जी नईं कहा सकत?’’ भौजी बोलीं।
भौजी के जे तेवर देख के मोए भारी अचरज भओ। काए से के जंतर-मंतर को मामलो निपटे तो अब मुतको टेम हो गओ। मनो ऐसो लग रओ हतो के भौजी पे ऊको गहरो असर परो। तभईं तो बे जेन-जी होबे की बात कर रईं।
‘‘भौजी, मोए आप जेन-जी से कछू ज्यादई प्रभावित दिखा रईं। मोए नईं पतो रओ के उनको आप पे इत्तो गहरो असर परहे।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘काए हमाए पे परो असर भर तुम ओरन खों दिखा रओ औ उन ओरन पे परो असर नईं दिखा रओ जोन पैले गरियात फिरे औ फेर जेन-जी के जीततई साथ उने काकरोच से अलग बोल के उनकी जयकारे करत फिर रए।’’ भौजी तुरतईं बोलीं।
‘‘बात तो आप सई कए रईं भौजी! मोए का, खुद जेन-जी वारों को पतो ने रओ हुइए के एक दिनां उनईं खों तरीफ की जयमाल पहनाई जान लगहे।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘जेई तो राजनीति आए बिन्ना! राजनीति की थारी में गोल वारे भटईं-भटा रैत आएं। तनक में इते लुढ़के, तनक में उते लुढ़के। औ जोन लुढ़वो जानत आए बोई सफल रैत आए।’’ अब की भैयाजी मोसे बोले।
‘‘सई में भैयाजी, अपन ओरन खों लुढ़कवो ने आओ।’’ मैंने तनक दुखी होत भए कई।
‘‘अपन पब्लिक आएं बिन्ना! पैले तो अपन लुढ़कवो कभऊं सीख नईं सकत, औ दूसरो के जो सीख बी लें तो कां लुढ़कहें? अपन खों तो कोऊ तरफी जाओ कटनेई परहे।’’ भैयाजी ने बड़ो गंभीर उत्तर दओ।
‘‘ठीक कै रए भैयाजी! पर एक बात तो समझबे वारी आए के जे जो काकरोच वारे आएं उन्ने बड़ो सोच के जे नांव धरो। काए से काकरोच सोई तभई होत आएं जो घरे गंदगी मच जाए। राजनीति में काकरोच के पनपबे से समझ जाओ चाइए के ब्यवस्था में भौतई गंदगी मच गई आए।’’ मैंने कई।
‘‘जेई तो बात आए बिन्ना! ने पेपर लीक होतो औ ने काकरोच वारे मूंड उठाउते। बे तो मनो जताओ चात आएं के जो आप हमें नईं देखो चात हो तो जा ब्यवस्था की गंदगी साफ कर लेओ।’’ भौजी बोलीं। 
‘‘सई कई भौजी! ब्यवस्था में तो कुल्ल गदर मची आए। कऊं फोकट के पइसा बांटे जा रए तो कऊं एकई चीज पे चार दार टैक्स ले के खून चूसो जा रओ। ऊपे बी अपने एमपी में तो चाए डीजल-पेट््रोल होए, चाए चूला की गैस, दूसरे प्रदेसों से ज्यादई रैत आए।’’ मैंने कई।
‘‘जेई लाने तो अपने एमपी के लाने स्लोगन बनाओ गओ रओ के -‘एमपी अजब है,गजब है’। बा स्लोगन बनाबे वारो भौतई बुद्धिमान रओ। भले ऊने पयग्टन के लाने जे लिखो, मनो होत सबरी दसा पे फिट आए।’’ भैयाजी हंसत भए बोले।
इत्ते में एक काकरोच औ दरार से निकर आओ औ भौजी ने ऊको बी अपनी चप्पल से तिया-पांचा कर दओ।
सो, बे ओरे हो गए असली वारे काकरोच मारबे में बिजी औ मैंने अपनी दुकान उते से बढ़ा लई ने तो बा स्प्रे की बदबू से मोरो मूंड़ चकरान लगतो। 
ऐई साथ बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। मनो सोचियो जरूर ई बारे में के जो ब्यवस्था सुदर जाए तो काकरोच घांईं पार्टी रए पाहें? पर ईके पैले जे साई सोचने परहे के का सच्ची में ब्यवस्था सुदर पाहे?   
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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Wednesday, August 19, 2026

चर्चा प्लस | भाजपा की भावी चुनावी रणनीति और स्मृति ईरानी का राजनीतिक ग्राफ | सागर दिनकर


चर्चा प्लस
भाजपा की भावी चुनावी रणनीति और स्मृति ईरानी का राजनीतिक ग्राफ
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह 

 
        स्मृति ईरानी का संगठन में प्रभावशाली ढंग से कमबैक यानी पुनः आगमन को भाजपा की भावी रणनीति का एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। ऐसा क्या हुआ की स्मृति ईरानी की भजपा पार्टी संगठन एक बार फिर आवश्यकता महसूस हुई। राजनीतिक विशेषज्ञों की माने तो ज़ेन-जी के तीखे तेवर ने स्मृति ईरानी की पार्टी संगठन को याद दिला दी। अभिनय की दुनिया से राजनीति के मंच पर आईं स्मृति ईरानी कभी कद्दावर नेता के रूप में उभरीं तो कभी उन्हें बैकफुट में डाल दिया गया। फिर भी उनकी छाप स्थाई बनी रही। चलिए देखते हैं भारतीय जनता पार्टी की भावी रणनीति और स्मृति ईरानी का राजनीतिक ग्राफ जो अब तक अनेक उतार-चढ़ावों से भरा रहा है।


भारतीय जे़न-जी ने सारी दुनिया को बहुत कुछ सिखा दिया। रोजगार की तलाश में भटकते युवा, मल्टीनेशनल कंपनियों की चाकरी करने को तत्पर युवा, तमाम डिग्रियों के होते हुए परिवार का सहारा न बन पाने की गहरी निराशा से घिरा युवा इतना प्रखर आंदोलन भी कर सकता है, यह किसी ने भी नहीं सोचा होगा। आंदोलन का तरीका इतना नया होगा, यह भी किसी ने नहीं सोचा होगा। यदि तनिक भी अंदेशा रहता तो आंदोलन को समाप्त कराने में इतनी देर नहीं लगाई जाती। आंदोलन समाप्त हुआ लेकिन उसकी प्रतिध्वनियां आज भी राजनीतिक गलियारों में सुनी जा सकती हैं। इसका ताज़ा उदाहरण भारतीय जनता पार्टी के संगठन की नई कार्यकारिणी में स्मृति ईरानी की वापसी के रूप में देखा जा सकता है।  भारतीय जनता पार्टी की भावी रणनीति का मुख्य उद्देश्य आगामी विधानसभा चुनावों और 2029 के आम चुनावों के लिए संगठन को धार देना है। पार्टी युवा और अनुभवी चेहरों संतुलित रूप में स्थान देती दिखाई दे रही है। पार्टी को स्मृति ईरानी के तीखे तेवर भी चाहिए जो उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनावों पर भाजपा की पकड़ को मजबूत कर सके।
स्मृति ईरानी का राजनीतिक सफर एक लोकप्रिय टीवी अभिनेत्री से लेकर भारतीय जनता पार्टी की शीर्ष राष्ट्रीय नेतृत्व तक का रहा है। उतार-चढ़ाव से भरे इस सफर में उन्होंने कई महत्वपूर्ण पड़ाव तय किए हैं।

वर्ष 2003 में स्मृति ईरानी ने आधिकारिक तौर पर भाजपा की सदस्यता ली। वर्ष 2004 में उन्होंने चांदनी चैक लोकसभा सीट से कपिल सिब्बल के खिलाफ चुनाव लड़ा, जिसमें उन्हें हार का सामना करना पड़ा। उन्हें महाराष्ट्र युवा मोर्चा का उपाध्यक्ष बनाया गया और बाद में पार्टी के राष्ट्रीय सचिव व वर्ष 2010 में भाजपा महिला मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली। वर्ष 2011 और 2017रू वह गुजरात से राज्यसभा सांसद चुनी गईं। मोदी सरकार (2014) के पहले मंत्रिमंडल में उन्हें सबसे कम उम्र के मंत्रियों में शामिल किया गया और मानव संसाधन विकास  जैसी अहम मंत्रालय की कमान सौंपी गई। इसके बाद उन्होंने कपड़ा मंत्रालय और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का दायित्व भी संभाला। जब नरेंद्र मोदी 2014 में सत्ता में आए थे तो उनके कैबिनेट में महत्वपूर्ण पदों पर नितिन गडकरी, सुषमा स्वराज, राजनाथ सिंह और अरुण जेटली जैसे अनुभवी लोग थे। साथ ही कैबिनेट में कुछ ऐसे चेहरे भी थे जिन्हें ज्यादा अनुभव नहीं था। फिर भी मोदी सरकार ने स्मृति ईरानी को एजुकेशन मिनिस्ट्री देकर सबको चैंका दिया। लेकिन स्मृति ईरानी विवादों की चपेट में आ गईं। ‘‘फेक डिग्री’’ विवाद से लेकर येल यूनिवर्सिटी में उनके कमेंट तक, केंद्रीय विद्यालयों में संस्कृत को तीसरी भाषा के तौर पर अनिवार्य बनाने और स्कूलों को 25 दिसंबर को ‘‘गुड गवर्नेंस डे’’ के तौर पर मनाने का निर्देश देने से लेकर रोहित वेमुला मामले तक स्मृति ईरानी समाचारों की सुर्खियां बनती रहीं और साशल मीडिया पर ट्र्ोल होती रहीं।
सन 2019 में लोकसभा चुनाव में उन्होंने उत्तर प्रदेश की हाई-प्रोफाइल अमेठी सीट से कांग्रेस नेता राहुल गांधी को हराकर ऐतिहासिक जीत दर्ज की। लेकिन सन 2024 में आम चुनावों में अमेठी सीट पर स्मृति ईरानी को कांग्रेस के किशोरी लाल शर्मा के हाथों हार का सामना करना पड़ा, जिसके कुछ समय बाद उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल से भी अलग होना पड़ा था।
स्मृति ईरानी का राजनीतिक ग्राफ उतने ही रंग बदलता दिखता है जितना कोई टीवी सीरियल के पात्र की भूमिका। 2016 के बीच में उनसे एचआरडी पोर्टफोलियो ले लिया गया, 2017 के बीच में उन्हें आई एण्ड बी मिनिस्ट्री में वापस लाया गया, और फिर कुछ और आरोपों के बाद उन्हें हटा दिया गया। भाजपा ने 2019 के लोकसभा चुनाव की तैयारी शुरू की, मगर तब तक ईरानी का प्रभाव समाप्त हो चला था। आखिर, उन्होंने कोई चुनाव नहीं जीता था, भले ही उन्होंने चांदनी चैक और अमेठी में जोरदार लड़ाई लड़ी थी किन्तु 2019 के चुनाव ने एक बार फिर सब बदल दिया। अमेठी में राहुल गांधी के खिलाफ उस एक जीत के साथ, ईरानी एक बड़ी ताकत बन गईं, एक ऐसी ताकत जिसकी भाजपा को जरूरत थी। सन् 2019 के चुनाव ने स्मृति ईरानी को भाजपा की जरूरत बना दिया। उन्हें एक ‘‘टूल’’ के रूप में भी तब-तब प्रयोग में लागा गया जब भजपा को राहुल गांधी पर हमला करना होता रहा, तो वह उन्हें तुरंत सामने लाया गया। ईरानी ने भाजपा को अमेठी में ऐसी जीत दिलाई जो पहले कभी नहीं मिली। भाजपा ने स्मृति ईरानी को 2014 में राहुल गांधी के मुकाबले अमेठी के चुनावी मैदान में उतरा तो स्मृति ने राहुल व गांधी व उनके परिवार को घर में ही घेरकर रखने की रणनीति पर कुछ ऐसा काम किया कि पूरा गांधी परिवार अमेठी-रायबरेली की राजनीति में उलझकर रह गया, जिसका लाभ भाजपा को भरपूर मिला। भाजपा लीडरशिप ने 2014 में स्मृति ईरानी को उनके राजनीतिक अनुभव से कहीं ज्यादा जिम्मेदारियां सौंपी गईं, जिससे वे लगभग असफल रहीं। इसके बाद उन्हें किनारे रखा गया।


मोदी 2.0 में स्मृति ईरानी को और अधिक मिलने की उम्मीद थी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। स्मृति ईरानी पिछले दो वर्ष से पार्टी को यह याद दिलाने में लगी रहीं कि उन्होंने भाजपा को एक बड़ी जीत दिलाई थी। लेकिन भाजपा मानो कुछ समय के लिए उनसे जुड़े विवादों से दूर रहने का मन बनाए बैठी थी। ऐसे में स्मृति ईरानी से एक पोर्टफोलियो छीना जाना स्वाभाविक था। यद्यपि उसी दौर भाजंपा नई काउंसिल में कुल 11 महिला मंत्रियों को रखने की बात कर रही थी।ं लेकिन फाइनेंस को छोड़कर, महिलाओं को जरूरी पोर्टफोलियो से दूर रखना भाजपा का ‘‘सेफ गेम’’ माना गया था।

अब मानो स्मृति ईरानी का राजनीतिक शक्ति की दृष्टि से ‘वनवास’ समाप्त हुआ है। भाजपा ने उन्हें राष्ट्रीय महासचिव  नियुक्त किया है। पार्टी ने उन्हें उत्तर प्रदेश के 2027 के विधानसभा चुनाव के संदर्भ में  संगठनात्मक कमान सौंप कर एक बड़ी जिम्मेदारी दी है। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो राहुल गांधी की बढ़ती तेजी औ ज़ेन-जी के आक्रामक तेवर ने पार्टी प्रमुखों को स्मृति ईरानी की याद दिला दी। यूं तो सांसद कंगना रानावत कई मौकों पर भाजपा की ओर से मोर्चा खोल देती हैं, किन्तु स्मृति ईरानी औ कंगना रानावत की छवि में बहुत अंतर है। स्मृति को अपने पूर्व के टीवी सीरियल की पारिवारिक छवि का भरपूर फायदा मिलता रहा है जबकि कंगना के पास ऐसी कोई मजबूत छवि नहीं है। कंगना आज भी स्मृति ईरानी की भांति मतदाताओं के दिल में जगह नहीं बना पाई हैं। इसीलिए पार्टी संगठन का स्मृति ईरानी पर भरोसा जताना स्वाभाविक है।

स्मृति ईरानी की अब तक की जीवन यात्रा भी किसी टीवी सीरियल की तरह रोचक रही है। स्मृति ईरानी का जन्म 23 मार्च 1976 को दिल्ली में हुआ और उन्होंने राष्ट्रीय राजधानी में ही शिक्षा ग्रहण की। अजय कुमार मल्होत्रा जो पंजाबी हैं, माता शिबानी बागची बंगाली हिंदू पृष्ठभूमि से हैं और जनसंघ से जुड़ी रहीं हैं। स्मृति ईरानी ने माॅडलिंग की और छोटी-मोटी नौकरियां भी कीं। वे मैकडॉनल्ड्स में वेट्रेस और क्लीनर के पद पर रहीं। स्विमवीयर में फोटोशूट भी किया। वे सन 1998 में फेमिना मिस इंडिया सौन्दर्य प्रतियोगिता के फाइनल में पहुंची, किन्तु विजेता नहीं बन पायी। बाद में वे मुम्बई चली गईं, जहां उन्होंने वर्ष 2000 में टेलीवीजन सीरियल ‘‘हम है कल आज कल और कल’’ से अपने करियर की शुरुआत की। लेकिन उन्हें एकता कपूर के टीवी धारावाहिक ‘‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’’ में ‘तुलसी’ का केन्द्रीय किरदार निभाया और लोकप्रियता हासिल की। उस दौर में वे हर घर की चहेती बन गईं। उस किरदार के लिए उन्होंने अपना वजन भी बढ़ाया।
स्मृति ईरानी ने सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए पांच भारतीय टेलीविजन अकादमी अवार्ड, चार इंडियन टेली अवार्ड और आठ स्टार परिवार पुरस्कार जीते हैं। वर्ष 2001 में उन्होने जीटीवी पर प्रसारित ‘‘रामायण’’ में सीता का किरदार भी निभाया था। वर्ष 2006 में उन्होने बालाजी टेलीफिल्मस के अन्तर्गत ‘‘थोड़ी सी जमीन और थोड़ा सा आसमान’’ टीवी सीरियल में सह निदेशक की भूमिका अदा की। वर्ष 2008 में उन्होंने डांस पर आधारिक टीवी सीरियल ‘‘ये हैं जलवा’’ को साक्षी तंवर के साथ होस्ट किया।

स्मृति ने सन 2001 में जुबिन ईरानी से विवाह किया, जो पारसी हैं। इसके बाद वे स्मृति मल्होत्रा से स्मृति ईरानी बन गईं। उनके दो बच्चे हैं - जोहर ईरानी और जोइश ईरानी। जुबिन ईरानी की पूर्व पत्नी से भी एक संतान है शेनियल ईरानी जो जुबिन और स्मृति के साथ रहती है। 
स्मृति ईरानी का राजनीतिक जीवन वर्ष 2003 में तब शुरू हुआ जब उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सदस्यता ग्रहण की और दिल्ली के चांदनी चौक लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ा। हालांकि वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उम्मीदवार और पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल से हार गईं। वर्ष 2004 में इन्हें महाराष्ट्र यूथ विंग का उपाध्यक्ष बनाया गया। इन्हें पार्टी ने पांच बार केंद्रीय समिति के कार्यकारी सदस्य के रूप में मनोनीत किया और राष्ट्रीय सचिव के रूप में भी नियुक्त किया। वर्ष 2010 में उन्हें भाजपा महिला मोर्चा की कमान सौंपी गई। वर्ष 2011 में वे गुजरात से राज्यसभा की सांसद चुनी गई। इसी वर्ष इनको हिमाचल प्रदेश में महिला मोर्चे की भी कमान सौंप दी गई।
भारतीय आम चुनाव, 2014 में स्मृति ने कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और आम आदमी पार्टी के नेता कुमार विश्वास के खिलाफ अमेठी संसदीय सीट से चुनाव लड़ा और उन्हें कड़ी चुनौती दी। यद्यपि वे यह भी चुनाव हार गईं, लेकिन राज्यसभा की सदस्य होने के नाते उन्हें भारत सरकार में मानव संसाधन विकास मंत्री बनाया गया। 2019 के लोक सभा चुनाव ने स्मृति बेन ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी को अमेठी में पराजित किया। लंबे समय तक राहुल गांधी को अमेठी में घेर कर रखने वाली स्मृति को भाजपा ने ऐसे समय में अपना महामंत्री बनाया है जब राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व गृह मंत्री अमित शाह पर सीधे तौर पर आक्रामक तेवर दिखा रहे हैं। इससे इस बात का भी कयास लगाया जा रहा है कि भावी चुनावों में कांग्रेस व भाजपा के बीच पार्टी-प्रतिष्ठा की लड़ाई का मैदान एक बार फिर अमेठी-रायबरेली ही रहेगा। यह भी माना जा रहा है कि अमेठी के साथ रायबरेली व सुलतानपुर में भाजपा को मजबूती मिलेगी।
आम चुनाव 2024 में हार के बाद कांग्रेस की सक्रियता को कम करने के लिए और 2027 विधान सभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन के लिए भाजपा ने भी धरातल पर काम करना शुरू कर दिया। पांच विधान सभा क्षेत्रों वाली अमेठी संसदीय सीट की सलोन सुरक्षित विधान सभा क्षेत्र भी रायबरेली का हिस्सा है तो जगदीशपुर विधान सभा का हलियापुर क्षेत्र सुलतानपुर का भूभाग है। 2014 से लेकर 2024 तक अमेठी में स्मृति ईरानी ने भाजपा के पक्ष में अपना प्रभाव स्थापित किया है। स्पष्ट है कि उनके इस प्रभाव का लाभ भजपा को आगामी चुनावों में भी मिलेगा।                                                 -----------------------

(दैनिक, सागर दिनकर में 19.08.2026 को प्रकाशित) 
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पुस्तक समीक्षा | संवेदनाओं से उपजे नवगीत जो बार-बार पढ़े जाने का आग्रह करते हैं | समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

पुस्तक समीक्षा    

संवेदनाओं से उपजे नवगीत जो बार-बार पढ़े जाने का आग्रह करते हैं                              

 - समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह - आवाज़ मौसम की
कवि       - राजेन्द्र गौतम
प्रकाशक    - अनुज्ञा बुक्स, 1/10206, लेन नं. 1ई, वेस्ट गोरख पार्क, शाहदरा, दिल्ली- 110 032
मूल्य       - 400/-
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राजेन्द्र गौतम हिन्दी की नवगीत विधा के एक वरिष्ठ और स्थापित नाम हैं। उनका ताज़ा नवगीत संग्रह ‘‘आवाज़ मौसम की’’ मात्र 61 नवगीतों का संग्रह नहीं है वरन यह अपने-आप में नवगीत की गीतात्मक यात्रा की कथा है। यह यात्रा राजेन्द्र गौतम के लगभग 1972-73 के नवगीतों से आरम्भ होती है। इनसे नवगीत की उस समय की प्रकृति एवं प्रवृत्ति को समझा जा सकता है जब नवगीत विधा अपने स्वर्णकाल में विस्तार पा रही थी। हिन्दी साहित्य में गीत विधा पहले से विद्यमान थी, फिर भी नवगीत के शिल्प की आवश्यकता को अनुभव किया गया और इस विधा को भरपूर लोकप्रियता भी मिली। नवगीत में गीत की अपेक्षा कुछ छूटें ली गई थीं जिससे इसके कथ्य को चहुंमुखी दिशाएं मिलीं। सन् 2012 में नवगीत विधा पर नवगीतकार वीरेन्द्र आस्तिक का एक लंबा लेख प्रकाशित हुआ था जो आज भी ‘‘पूर्वाभास’’ की इन्टरनेट साईट पर पढ़ा जा सकता है। अपने इस महत्वपूर्ण लेख में वीरेन्द्र आस्तिक ने नवगीत की तत्कालीन सृदृढ़ स्थिति एवं संभावनाओं के साथ ही आवश्यकताओं पर भी प्रकाश डाला था। लेख का शीर्षक था-‘‘नवगीत का संक्षिप्त इतिहास और उसकी मौजूदा समस्याएं’’। अपने इस लेख में उन्होंने एक वाक्य लिखा था-‘‘आज नवगीत एक समृद्ध विधा है। बल्कि मुझे तो ऐसा लगता है कि भविष्य में नवगीत का सुनहरा युग आने वाला है।’’
निश्चित रूप से वह सुनहरा युग आया। यूं तो शंभूनाथ सिंह को नवगीत का प्रणेता माना जाता है, वहीं कुछ लोग राजेन्द्र प्रसाद सिंह को नवगीत का प्रवर्तक मानते हैं। बहरहाल, आरंभ जिसने भी किया हो किन्तु इसे सोपान चढ़ाया उन अनेक नवगीतकारों ने जिनमें से कुछ प्रमुख नाम हैं- त्रिलोचन शास्त्री, केदारनाथ सिंह, गोपालदास नीरज, धर्मवीर भारती, रवीन्द्र भ्रमर, रमेश रंजक, कुमार शिव, वीरेन्द्र मिश्र, कुंवर नारायण, देवेन्द्र शर्मा इन्द्र, बालस्वरूप राही, रामदरश मिश्र, नरेश सक्सेना, ओम प्रभाकर, बुद्धिनाथ मिश्र, अनूप अशेष, नईम, राजेन्द्र प्रसाद सिंह, उमाकांत मालवीय आदि। लेकिन फिर कुछ ऐसा हुआ कि नवगीत को नेपथ्य में धकेला जाने लगा। इस संदर्भ में मैं फिर वीरेन्द्र आस्तिक के लेख का एक अंश दे रही हूं जिसमें उन्होंने नवगीत के नेपथ्य मे जाने के भावी कारण की मानो पहले ही घोषणा कर दी थी-‘‘यहां मैं आलोचना पर जोर क्यों दे रहा हूं? विगत में डॉ नामवर सिंह जैसे गद्य कविता के आलोचक यह कहते आए हैं कि ‘गीत आलोचना की वस्तु नहीं है।’ यह कहकर वे एक तीर से दो निशाने साधते रहे हैं। एक- गीत इस लायक नहीं कि उसकी आलोचना हो और दो- शैक्षिक जगत में, गद्य कविता का एकाधिकार बरकरार रहे। मेरा मानना है कि यदि गीत पर विमर्श नहीं होगा तो वह मूल्यांकित भी नहीं होगा और यदि उसका मूल्यांकन नहीं होगा तो पाठ्यक्रमों आदि में प्रवेश का रास्ता भी नहीं बन पाएगा। यहां पर मैं बड़े आदर के साथ उन सभी आलोचकों-समीक्षकों को याद करता हूं जिनकी महती भूमिका से नवगीत समृद्ध हुआ। लेकिन बात वहीं की वहीं है कि नवगीत आज साहित्य की मुख्य धारा में नहीं है जिसका वह हकदार है, क्योंकि उसकी वकालत के लिए हमारे पास बड़े आलोचक नहीं है।’’

एक कारण और भी रहा है जिसका अनुमान लेख लिखने के समय आस्तिक जी को नहीं रहा होगा कि भविष्य में साहित्य सृजन के प्रति श्रम में घोर कमी आने लगेगी। नवगीत भी श्रम की मांग करता है अर्थात् नवगीत सृजन उन कवियों के लिए धैर्य चुका देने वाला कार्य था जो रातों-रात कवि कहलना जाना चाहते हैं। नवगीतकार  माहेश्वर तिवारी ने नवगीत की खूबी बताई थी कि-‘‘नवगीत अपने समय की आधुनिकता बोध से सम्पन्न संपृक्त छांदसिक रचना है।’’
संग्रह में अपने गीतों को राजेन्द्र गौतम ने पांच उपशीर्षकों में विभक्त किया है- लपटों भरा आकाश, मेघदूत आया, शरद की भोर, शीत लहर, नंगी डालें तथा देह थिरकती है मौसम की। सभी नवगीतों में प्रकृति की प्रधानता है। कवि ने प्रकृति को लक्ष्य कर के अपनी तमाम अभिव्यक्ति को शब्दबद्ध किया है। एक नवगीत है ‘‘दहकते छन्द’’। इसमें समसामयिक व्यंजना को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है-
बचा कर भी
कहां ले जायें
हम ये झुलसती कलियां
सुलगती आग है अब झील-तल में
या कमल-वन में।
हुआ सम्बन्ध गहरा
आंधियों से
और अब इसका
तवे-सी तप रही जो
जेठ की दोपहर पल-पल है
क्षितिज पर
दूर धुंधले में
विवश मंडरा रहीं चीलें
न जाने कब गिरे भू पर भू
थका हर पंख निर्बल है
घटाओं के सपन ढोता फिरे
आकाश बंजारा
रचें पर दग्ध तलवे रेत की छुवनें,
चुभन तन में।

राजेन्द्र गौतम समय की नब्ज़ को पकड़ना बखूबी जानते हैं। वे स्थितियों पर कटाक्ष करते हैं, दुख प्रकट करते हैं, असंतोष जताते हैं। इन सबमें उनके शब्दों का चयन अपनी महत्ता स्वयं प्रकट कर देता है। उदाहरण के लिए संग्रह का नवगीत ‘‘पथरा चुकीं झीलें’’ को ही लें-
कभी मौसम के पड़ें कोड़े
कभी हाकिम जड़े सांटे खाल मेरे गांव की
कब तक दरिन्दों से
यहाँ खिंचती रहेगी!
दूर तक जो
भूख से सहमे हुए
सीवान ठिठके हैं
कान में उनके सुबकतीं
प्यास से पथरा चुकीं झीलें
रेत के विस्तार में
यों ठूंठ दिखते हैं करीलों के
ज्यों ठुकीं गणदेवता की
काल-जर्जर देह में कीलें

नवगीत की यह विशेषता रही है कि उसने जहां यथार्थवाद के गुणों को अपनाया, वहीं छायावाद के प्रकृति के मानवीय करण को भी आत्मसात किया। इससे नवगीत में कठोरता और कोमलता संतुलित रूप में एक साथ बनी रही। आंचलिक भाषा एवं बोलियों को भी नवगीत में पर्याप्त स्थान मिलता रहा है ताकि उनका लोक एवं जनमूल्य बना रहे। राजेन्द्र गौतम के नवगीत ‘‘हिम-सी जमी है’’ के एक बंद से नवगीत की इन खूबियों को भली-भांति समझा जा सकता है-
ओस की
बूंदों सरीखी की
दूब पातों पर उतरती
जा रही है नम उदासी
एक-
अनजानी विकलता
साथ अपने खे रही है
यह नदी क्यों विफलता-सी
ये बुरुसों
की कतारें
दूर तक हिलतीं, डुलातीं-
हों तटों को ज्यों बिजलियां।

‘‘आवाज़ मौसम की’’ संग्रह की भूमिकाएं वेद प्रकाश शर्मा ‘‘वेद’’ तथा डाॅ. कुसुम सिंह ने लिखी हैं। नवगीतकार राजेन्द्र गौतम का यह नवगीत संग्रह नवगीत के भाषिक संस्कार, शिल्प के सौष्ठव एवं प्रवाह लहरियों से ठीक उसी प्रकार परिचित कराता है, मानो नवगीत की सुरम्य घाटियों में भावनाओं की बांसुरी का सप्तक स्वर गूंज रहा हो जिसमें अव्यवस्था के प्रति रोष का भारी मंद सप्तक स्वर भी है और प्रकृति के सौंदर्य का पंचम मधुर सप्क स्वर भी। वस्तुतः नवगीत विधा के शोधार्थियों तथा नवगीत सृजनधर्मियों के लिए यह एक महत्वपूर्ण संग्रह है।      
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Saturday, August 15, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | उते नमक कानून तोड़ो गओ औ इते गानों गा के साथ दओ गओ रओ | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टाॅपिक एक्सपर्ट 🇮🇳

उते नमक कानून तोड़ो गओ औ  इते गानों गा के साथ दओ गओ रओ 🇮🇳

- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

अंग्रेजन की गुलामी से आजादी के लाने सागर में अपने सागर वारन ने बी कोनऊं कसर ने छोड़ी रई। सबसे पैले तो बात करी जाए 1842 की जबे बुंदेलखंड को पैलो संग्राम भओ। मधुकर शाह बुंदेला जू ने अंग्रेजन खों छठीं को दूद याद करा दओ तो। बा तो ठठरी के बंधे गद्दार ने उनें सोऊत में पकरवा दओ। मधुकर शाह बुंदेला जू खों इतई सागर की जेल में रखो गओ औ इतई उने फांसी दई गई। जे खबर जेसईं सागर वारों खों लगी, बे कसम खान लगे के अब तो अंग्रेजन खों भगा के रैबी। सो, जब-जब बायरे कछू कोसिस करी गई तो सागर वारों ने उनको साथ दओ। भौत जने जेल गए, गोलियां औ लट्ठ खाए। राजाराम बोहरे, सेठ प्यारेलाल जैन शाहगढ़ वारे, साबूलाल जू घांई मुतके रए जोन ने आगूं आ के लड़ाई लरी। बलेह गांव के तो सबई जने आजादी के लाने कूंद परे हते। 
     कओ जात आए के गांधी जू सोई सागर आए रए। ऊंसई बी जबे गांधी जू ने उते दांडी में नमक कानून तोड़ो, सो ऊ टेम पे इते सागर में गाने गा-गा के लुगाइन लौं ने साथ दओ रओ-
सुन लेओ जालिम हमें सोई 
नमक तोड़बे  जाने है
गांधी जू को संग निभाने है,
अंग्रेजन खों मार भगाने हैं....

एसईं एक औ गानो गाओ जात रओ -
मैंहगो नमक हमें नई खाने
अंग्रेजन को सबक सिखाने
आए हमाए ऐंगर गांधी
जेई बात हमखों समझाने…
 सो, का बच्चा, का बुड्ढा औ का लुगाइयां सबई ने गुलामी से आजादी पाबे के लानें अपनी जान लड़ा दई रई। तब कऊं जा के जा आजादी मिली। सो ई आजादी को मोल समझो चाइए औ ईको सम्मान करो चाइए। सो सबई जने याद राखियो के हमें अपनी आजादी की इज्जत राखने है, ईको दुरुपयोग नईं करने। सबई खों स्वतंत्रता दिवस की हमाई भौत-भौत बधाई पौंचे!
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Wednesday, August 12, 2026

चर्चा प्लस | कालिदास के साहित्य में जीवंत है प्रकृति और पर्यावरण | सागर दिनकर


चर्चा प्लस
कालिदास के साहित्य में जीवंत है प्रकृति और पर्यावरण
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह 
                                                        v.  महान संस्कृत कवि कालिदास की रचनाओं जैसे ‘मेघदूत’, ‘रघुवंश’, ‘ऋतुसंहार’ और ‘कुमारसंभव’ में मानवीय भावनाओं और प्रवृत्तियों का अद्भुत वर्णन मिलता है। इसी तरह, इन महाकाव्यों में पर्यावरण और उसके संरक्षण के प्रति जो चिंतन प्रकट किया गया है, वह भी अद्वितीय है। कालिदास के महाकाव्यों को पढ़ते समय हम प्रायः पर्यावरण से जुड़े पहलू को अनदेखा कर देते हैं और मुख्य कथा पर ही ध्यान केंद्रित करते हैं। यद्यपि इन महाकाव्यों के अन्य पक्षों पर भी ध्यान दिया जाता है, लेकिन हम पाएंगे कि कालिदास ने अपनी हर रचना में पर्यावरण के प्रति गहरा प्रेम व्यक्त किया है। इसके साथ ही, पर्यावरण के संरक्षण और पर्यावरण में असंतुलन के कारण होने वाली प्राकृतिक आपदाओं या कष्टों की ओर भी ध्यान आकर्षित किया गया है।


कालिदास को प्रकृति का कवि कहा जाता है। संस्कृत साहित्य में महान कवि और नाटककार कालिदास का एक महत्वपूर्ण स्थान है। उनकी रचनाओं की शाश्वत सुंदरता और उनकी बेजोड़ महानता के कारण उन्हें न केवल भारत में बल्कि पूरी दुनिया में ‘‘प्रकृति के कवि’’ का सम्मानजनक खिताब मिला है। कालिदास का पूरा साहित्य पर्यावरण संरक्षण की भावना से ओत-प्रोत है। कालिदास ने अपनी कविताओं के माध्यम से प्रकृति के प्रति अपने प्रेम और पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपनी जागरूकता को व्यक्त किया है। महान संस्कृत कवि कालिदास की रचनाओं जैसे ‘मेघदूत’, ‘रघुवंश’, ‘ऋतुसंहार’ और ‘कुमारसंभव’ में मानवीय भावनाओं और प्रवृत्तियों का अद्भुत वर्णन मिलता है। इसी तरह, इन महाकाव्यों में पर्यावरण और उसके संरक्षण के प्रति जो चिंतन प्रकट किया गया है, वह भी अद्वितीय है। कालिदास के महाकाव्यों को पढ़ते समय हम प्रायः पर्यावरण से जुड़े पहलू को अनदेखा कर देते हैं और मुख्य कथा पर ही ध्यान केंद्रित करते हैं। यद्यपि इन महाकाव्यों के अन्य पक्षों पर भी ध्यान दिया जाता है, लेकिन हम पाएंगे कि कालिदास ने अपनी हर रचना में पर्यावरण के प्रति गहरा प्रेम व्यक्त किया है। इसके साथ ही, पर्यावरण के संरक्षण और पर्यावरण में असंतुलन के कारण होने वाली प्राकृतिक आपदाओं या कष्टों की ओर भी ध्यान आकर्षित किया गया है।
संस्कृत साहित्य के प्रसिद्ध कवि, महान कवि कालिदास की रचनाओं में प्रकृति के प्रति विशेष प्रेम दिखाई देता है। अपने महाकाव्यों में प्रकृति के वर्णन के माध्यम से, कालिदास ने न केवल प्रकृति की सुंदरता को उजागर किया है, बल्कि अपने नायक-नायिकाओं के माध्यम से आम जनता को प्रकृति संरक्षण के प्रति जागरूक करते हुए उन्हें नुकसान न पहुँचाने का संदेश भी दिया है। प्रकृति की विशेषताओं और महत्व का वर्णन करते हुए उन्होंने ‘‘ऋतुसंहार’’, ‘‘कुमारसंभव’’ और ‘‘रघुवंश’’ की रचना की है। अपने विश्व-प्रसिद्ध नाटक ‘‘अभिज्ञानशाकुंतलं’’ के मंगलाचरण में प्रकृति के मूल तत्वों (जल, अग्नि, सूर्य, चंद्रमा, आकाश, पृथ्वी, वायु) की ‘‘अष्टमूर्ति देव’’ के रूप में स्तुति करते हुए उन्होंने प्रकृति के दैवीय स्वरूप को भी प्रस्तुत किया है।
कालिदास ‘‘कुमारसंभव’’ की शुरुआत हिमालय के प्राकृतिक वर्णन से करते हैं-
अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराजः।
पूर्वापरौ तोयनिधीवगाह्य स्थितः पृथिव्या इव मानदण्डः।।

‘‘कुमारसंभव’’ में बताया गया है कि पार्वती ने शिव को पति के रूप में पाने के लिए गौरी शिखर पर्वत पर जाकर तपस्या करने के लिए अपनी कुटिया बनाई। वहाँ उन्होंने सबसे पहले पौधे लगाए और अपने बच्चों की तरह ही रोज़ दूध जैसे पानी से उन्हें सींचा और उनकी देखभाल की। यह काम उनकी तपस्या का ही एक हिस्सा था, जैसे यज्ञ वगैरह। इसी तरह, ‘‘रघुवंश महाकाव्य’’ में सिंह और दिलीप के बीच बातचीत के दौरान, सिंह दिलीप को एक पेड़ के बारे में बताता है और कहता है कि ‘‘हे राजा! यह वही देवदार का पेड़ है जिसे शिव और पार्वती ने मिलकर अपने पुत्र की तरह पाला-पोसा था और जब हाथी ने रगड़कर उसकी छाल हटा दी, तो पार्वती को वैसा ही दर्द हुआ जैसा उन्हें राक्षसों के साथ लड़ाई में अपने बेटे कार्तिकेय के घायल होने पर हुआ था। कालिदास ने लिखा है कि पार्वती खुद पेड़ से गिरी हुई पत्तियाँ ही खाने के तौर पर लेती थीं ताकि हरी पत्तियाँ तोड़ने से पेड़ को तकलीफ़ न हो।
यह प्रकृति के प्रति मानवीय संबंधों की गहनता का द्योतक है कि कालिदास ने एक वृक्ष की पीड़ा से ठीक उसी प्रकार व्यथित होते हुए पार्वती को वर्णित किया जिस प्रकार एक माता अपने पुत्र की पीड़ा से व्यथित हो उठती है। कातिदास द्वारा किया गया यह वर्णन प्रकृति के प्रति तत्कालीन संवेदना को प्रमाणित करता है।
महाकवि कालिदास से जुड़ी हुई बहुप्रचलित  रोचक कथा में भी प्रकृति से जीवन के मूल्यों को सीखने की शिक्षा दी गई है जिसमें बताया गया है कि जब राजा के सभासद किसी मूर्ख व्यक्ति को ढूढने निकले तो उन्हें एक ऐसा युवक दिखाई दिया जो एक वृक्ष की ऐसी डाल को काट रहा था जिस पर वह स्वयं बैठा हुआ था। इसी कथा से ही वह कहावत विकसित हुई कि ‘‘उस डाल को मत काटो जिस तुम स्वयं बैठे हो।’’ इस कथा की सत्यता की गहराई को छोड़ कर यदि इसके प्रकृति के पक्ष को देखा जाए तो इसमें प्रकृति के द्वारा जीवन की शिक्षा दे दी गई है। जबकि हमने इस शिक्षा को लगभग भुला दिया है। इसीलिए हम जिस पृथ्वी पर रहते हैं लगातार उसे क्षति पहुंचा रहे हैं। डाल कटने पर डाल सहित से गिरने पर तो चोट ही लगेगी किन्तु पृथ्वी का संतुलन बिगड़ने पर पृथ्वी से जीवन का अस्तित्व ही मिट जाएगा। 
कवि कालिदास का पौधों के प्रति लगाव इस बात से भी साबित होता है कि वे कहते हैं कि अगर कोई ज़हरीला पेड़ अपने-आप उग आए, तो उसे काटना नहीं चाहिए - ‘‘विषवृक्षोऽपि संवर्ध्य स्वयं छेत्तुमसाम्प्रतं’’। वे आगे कहते हैं कि यह ज़हरीला पेड़ जीवों को नुकसान पहुँचाने के बजाय उनके लिए फ़ायदेमंद ही होगा।
वस्तुतः चाहे वनस्पति कितनी भी विषाक्त क्यों न हो, उसमें कोई न कोई औषधीय गुण अवश्य होता है। जैसे धतूरा विषैला होता है किन्तु औषधीय तत्वों से भरपूर होता है। हमारे पूर्वजों, ऋषि-मुनियों ने वैदिक ग्रथों में धतूरे को भगवान शिव का प्रिय बता कर उसके अस्तित्व को सुरक्षित करने का महत्वपूर्ण कार्य किया।
‘‘रघुवंश’’ में ऋषियों की पत्नियों द्वारा हिरणों की अपने बच्चों की तरह देखभाल करने का वर्णन है। दूसरी ओर, कालिदास ‘‘कुमारसंभव’’ में लिखते हैं कि पार्वती की तपस्या के कारण तपोवन में एक-दूसरे के दुश्मन जानवर भी अपनी दुश्मनी भूल गए और बिना किसी बैर-भाव के प्यार से साथ रहने लगे। तपोवन में आकर, ब्रह्मचारी पार्वती से पूछते हैं कि ‘‘क्या बेलों और पेड़ों में नई कोंपलें ठीक से फूट रही हैं, क्या कोई रुकावट तो नहीं है? क्या जंगल का पानी आपके नहाने लायक है? क्या वे दूषित तो नहीं हैं?’’
कालिदास ने गर्मी के मौसम का वर्णन करते हुए, पशुओं के जीवन में पानी की ज़रूरत और पानी न होने पर उनके जीवन की भयावहता को दिखाया है। वे लिखते हैं कि ‘‘कितनी भीषण गर्मी है, सूरज की तेज़ धूप में सूखी घाटी में पानी की बूँदें मिलना भी मुश्किल है।श् तेज़ धूप और ज़बरदस्त प्यास से बेहाल हाथी पानी की चाह में यह भी भूल जाते हैं कि शेर उन्हें मार डालेगा। प्यास से व्याकुल होकर पानी की तलाश में वे शेर से भी नहीं डरते।’’
कवि कालिदास द्वारा वर्णित यह दृश्य प्रायः नेशनल जियोग्राफी अथवा बीबीसी अर्थ के कार्यक्रमों में दिखाई दे जाता है जिसमें आफ्रिका के मसाईमारा के जंगलों में सिमटे हुए जलस्रोत पर सभी प्रकार के वन्य पशु एक साथ पहुचते हैं पानी पीने। यह जियो या मरो का प्रश्न होते हुए भी चरितार्थ होता है। आखिर पानी जीवन का अति आवश्यक तत्व है।
कालिदास प्रकृति के कुशल चितेरे हैं। उनका प्रकृति वर्णन सूक्षम और यथार्थ है प्रकृति को जितना महत्त्व पूर्ण स्थान कालिदास के काव्य में मिला है उतना परवर्ती साहित्य में नहीं। नारी सौंदर्य एवं नायिकाओं के अलंकरण के लिए भी वे प्राकृतिक उपादानों का ही ग्रहण करते हैं। जैसे वसंत पुष्पों से अलंकृत पार्वती दृ
”अशोकनिर्भत्सितपद्मरागमाकृष्टहेमद्युतिकर्णकारम् द्य
मुक्ताकलापीकृत्सिन्दुवारं वसन्तपुष्पाभरणं वहन्ती द्यद्य” (कुमारसम्भवम् 3/53)
अर्थात अशोक के पुष्प से पद्मराग मणि का तिरस्कार करने वाले, सोने की कान्ति को ग्रहण करने वाले हार के समान किये गये निर्गुण्डी के पुष्पों वाले ऐसे वसन्त ऋतु के फूल रूप भूषण को धारण करति हुई (पर्वतराज कन्या दिखाई पड़ी।)
‘ऋतुसंहारं’ में एक श्लोक में कवि ने कहा है-
“विपांडूरं कीटरजस्त्रिन्नावितमं भुजंग्वाद्रकगतिप्रसपिर्तम”।
- अर्थात जब बरसात का पानी घरों के दीवारों से प्रथम बार टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें बनाता हुआ पीले-पीले के सूखे पत्तों को हटाता हुआ ऐसा प्रतीत होता है, मानो काला भुजंग वन में विचरण कर रहा हो।
‘‘मेघदूत’’ में भी प्रकृति के अनुपम वर्णन की छटा हमें बहुत ही प्रभावित करती है, कोई यक्ष जब पहाड़ी ढलान पर मेघ को देखता है तो वह यह मेघ से अत्यंत प्रभावित हो जाता है और उसी समय वह यक्ष कह उठता है- “धूमो ज्योतिः सलिलमरुतां संनिपातः क्व मेघः”।
इस प्रकार धुँआ, अग्नि, जल और वायु के समन्वित रूप मेघ का ऐसा आकार कालिदास चित्रित करते हैं, मानो आकाश में मेघ स्वयं ही पर्वतशिखर- जैसा सजीव हो उठता है, न केवल मेघ अपितु मानचित्र से हिमालय की तराई में बसी अलका तक के वर्णन में कालिदास ने प्रकृति के विभिन्न क्षेत्रों का अत्यंत सजीव वर्णन किया है।
‘‘ऋतुसंहारम’’ छह ऋतुओं का संग्रह है जो एक प्रेमी द्वारा देखी जाने वाली अलग-अलग ऋतुओं के वर्णन के रूप में हैं। कालिदास का ‘‘ऋतुसंहारम’’ छह भागों में विभाजित है। सभी भाग 144 छंदों के साथ छह ऋतुओं से जुड़े हुए हैं। कविता में छह भारतीय ऋतुओं के लिए छह सर्ग हैं- ग्रिस्मा (ग्रीष्म), वर्षा (बरसात), शरत (शरद ऋतु), हेमंत (जाड़ा), सिसिर (शीतकालीन), वसंत (वसंत)। प्रत्येक ऋतु को दो महीनों में विभाजित किया गया है; सभी ऋतुएँ प्रकृति के चक्र के रूप में एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं। यह उस तालिका ऋतु का कालक्रम है, जिसे हिंदू चंद्र कैलेंडर में भारतीय 12 महीनों के छह मौसमों में विभाजित किया गया है।
‘‘मेघदूतम’’ में कालिदास ने पर्यावरण के लगभग सभी घटकों - अग्नि, वायु, जल, आकाश, पृथ्वी, सूर्य, चंद्रमा, औषधि और वनस्पति आदि को प्रस्तुत किया है। ये सदैव बिना बदले की इच्छा के हमारी सहायता करते हैं, इसलिए ये देवताओं के समान हैं। इसके अधिकांश छंदों में पर्यावरणीय तत्वों का स्मरण किया गया है और यह संदेश दिया गया है कि प्रकृति के विरुद्ध कार्य नहीं करना चाहिए। पूर्वी मेघ में बाह्य प्रकृति का सबसे सुंदर रूप चित्रित किया गया है। एक ओर गंधावती, गंभीरा, चर्मण्वती, रेवा, जाह्न्वी, मंदाकिनी, यमुना, देवगंगा, सरस्वती जैसी नदियाँ हैं तो दूसरी ओर अलका, अवंती, विदिशा, कुरूक्षेत्र और उज्जयिनी ऊँची नगरियाँ हैं। कहीं रामगिरि, अमरकूट, देवगिरि, निचारगिरि जैसे पर्वत और पठार दिखाई देते हैं तो कहीं विशाल हिमालय, विंध्य और कैलाश। कहीं रामगिरि का पवित्र जल से भरा सरोवर है तो कहीं हंसों का प्रिय विश्व प्रसिद्ध मानसरोवर। कालिदास के काव्य में प्रकृति का सौंदर्य और प्रकृति के तत्व ही जीवन और संवेदनाओं के पर्याय हैं। इस प्रकार कालिदास का काव्य पर्यावरण और उसकी सुरक्षा के प्रति जागरूक प्रतीत होता है, हम बस इसे समझने की जरूरत है।                                                            
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(दैनिक, सागर दिनकर में 12.08.2026 को प्रकाशित) 
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पुस्तक समीक्षा | ज़िन्दगी के सवालों के खूबसूरती से ज़वाब ढूंढती ग़ज़लें समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

पुस्तक समीक्षा
ज़िन्दगी के सवालों के खूबसूरती से ज़वाब ढूंढती ग़ज़लें
 समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
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ग़ज़ल संग्रह- चलो ढूंढें जवाब अपने 
कवि       - कृष्ण बक्षी 
प्रकाशक  - बोधी प्रकाशन, सी-46, सुदर्शनपुरा इंडस्ट्रियल एरिया एक्सटेंशन, नाला रोड, 22 गोदाम, जयपुर - 302006
मूल्य      - 150/-  
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हिन्दी ग़ज़ल की दुनिया में कृष्ण बक्षी की एक विशेष पहचान है। जीवन से उनके गहरे सरोकार रहे हैं जो उनकी ग़ज़लों में साफ़ देखे जा सकते हैं। यूं भी ग़ज़ल साहित्य की एक ऐसी काव्य विधा है जिसके प्रत्येक शेर अपनी लयात्मकता के साथ स्वतंत्र संवाद करता है। इसलिए एक ग़ज़ल ही अपने आप में जीवन की पूरी कथा कह सकती है बशर्ते कहने वाले ने ग़ज़ल को पूरी तरह साधा हो। कृष्ण बक्षी वे ग़ज़लकार हैं जिन्होंने ग़ज़ल को न केवल साधा बल्कि उस पर अपनी छाप भी छोड़ी। ‘‘चलो ढूंढें जवाब अपने’’ कृष्ण बक्षी का एक ऐसा ग़ज़ल संग्रह है जिसमें उनकी ग़ज़लें जीवन के अनुत्तरित रह जरने वाले सवालों के जवाब ढूंढती दिखाई देती हैं। आधुनिक जीवन में जटिलताओं की कमी नहीं है। रोजी-रोटी की समस्या, सिर पर छत की समस्या, बच्चों के लालन-पालन की समस्या। उस पर भी कुछ समस्याएं इंसान स्वयं पैदा कर लेता है जैसे जाति, धर्म, रंग और समुदाय के भेद की समस्या। ऐसा क्यों होता है? इंसान सुकून पाना चाहता है लेकिन अपनी मुश्क़िलें भी खुद ही बढ़ाता है। ऐसा क्यों होता है? ऐसे ही ‘क्यों’ का जवाब ढूंढती है कृष्ण बक्षी की यह ग़ज़ल-

न दरिया में  रवानी है चलो ढूंढे जवाब अपने 
कहीं ठहरा सा पानी है चलो ढूंढे जवाब अपने 
अलहदा कैसे कर दोगे रगों में सबकी बहता है 
जो खूं हिंदोस्तानी है चलो ढूंढे जवाब अपने
अज़ब हालात में उलझा के रख दी है जवां पीढ़ी 
भटकती-सी जवानी है चलो ढूंढे जवाब अपने
 - ये अशआर हैं शायर कृष्ण बक्षी की गजल ‘‘चलो ढूंढे जवाब अपने’’ से। यह ग़ज़ल उनके जिस ताजा ग़जल संग्रह में संग्रहीत है, उसका नाम भी है ‘‘चलो ढूंढे जवाब अपने’’।
 वर्तमान परिदृश्य देखते हुए कवि कृष्ण बक्षी महसूस करते हैं कि समाज में हर स्तर पर हर ओर प्रश्नों का अंबार लगा हुआ है, जिनका जवाब ढूंढें बिना हल नहीं निकाला जा सकता है। जो प्रश्न अव्यवस्थाओं को देखकर, असंवेदनाओं को देखकर और विसंगतियों को देखकर मन में उमड़ते-घुमड़ते हैं, वही व्याकुलता का कारण बनते हैं। इसलिए भी उनका जवाब ढूंढना ज़रूरी है। यूं भी प्रश्नों से घिरा हुआ समाज कभी सही ढंग से विकास नहीं कर पाता है।
ग़म ही रह जाते हैं अक्सर गुनगुनाने के लिए 
छोड़ देता है कोई जब टूट जाने के लिए
छीन कर के चुलबुल आपन ले गए सारी हंसी
तुमने छोड़ी  तक खुशी न मुस्कुराने के लिए

इसी ग़ज़ल में जो कि आरंभ में इश्क़िया गजल होने का एहसास कराती है, वहीं आगे के शेर ज़िंदगी की पथरीली सच्चाइयों से सामना कराते हैं। जैसे ये शेर हैं-
पी गया है चिमनी यों का उनको जहरीला धुआं 
घर से जो  मजदूर  निकले  कारखाने के लिए 
खूब  इस्तेमाल  तुमने  कर लिया  आवाम का
काम आया है  फ़क़त  जो सर झुकाने के लिए

कवि ने सत्ता के खोखले वादों और दावों पर जहां तंज कसा हैं, वहीं सत्ता के इर्द-गिर्द झूठ के मायाजाल को भी उजागर किया है। एक ऐसा मायाजाल जो आमजन को वोटर संख्या अथवा सभाओं की भीड़ से अधिक कुछ नहीं मानती है। कवि कृष्ण बक्षी की गजलों में भाषाई समृद्धि स्पष्ट दिखाई देती है। प्रचलन में मौजूद शब्दों और मुहावरों को बड़ी सुंदरता से और सटीकता से अपने शेरों में पिरो देते हैं। जैसे यह गजल है ‘‘सभाओं ने हमें’’ -
हर कसौटी पर कसा है विपदाओं ने हमें
खूब जांचा खूब परखा आपदाओं ने हमें
सिर्फ हम मोहरे रहे जलसे, जुलूसों के 
दांव पर रक्खा हमेशा ही सभाओं ने हमें
साजिशों वाली अंधेरी कोठरी में क्यूं
बांध रक्खा है अभी तक बादशाहों ने हमें

इस संग्रह की ग़ज़लें अपने प्रश्नों के जवाब मांगने के साथ ही हमारे आसपास रच-बस गए झूठ को बखूबी रेखांकित करता है। और हमें आगाह करने का प्रयास करता है कि हमें ज़रूरत है अपने स्वार्थ की गहरी नींद से जागने की। यूं तो शायरी का नाता प्यार-मोहब्बत, ग़म, शिक़ायत, दोस्ती, दुश्मनी आदि इन सब से बहुत क़रीब कर रहा है। लेकिन जब कृष्ण बक्षी अपनी शायरी में दोस्ती दुश्मनी की बात करते हैं तो उनका अंदाज निराला होता है बानगी देखिए -
दर्द अक्सर जब  मुझे पहचान लेता है 
बिन सबूतों के ही दुश्मन मान लेता है
बात उठते ही वो मेरे इन सवालों की 
पांव से सर तक वो चादर तान लेता है
यह व्यवस्था ही बहुत है जान लेने को
जहर का तू किसलिए एहसान लेता है

दर्द पर ही एक ग़ज़ल के कुछ और शेर देखिए जिनमें आंतरिक पीड़ा के साथ ऐतिहासिक उद्धरण का सुंदर सामंजस्य है-
ज़ख्म मेरे आज  मुझसे बात करने पर तुले हैं 
और उस पर दर्द तहक़ीक़ात करने पर तुले हैं
सांझ के सूरज बचा कर रख ज़रा सी रोशनी 
वक्त से  पहले सितारे  रात करने पर तुले हैं
वह  हमारे  दौर का  ही  आम सा इंसान है
आप आखिर क्यों उसे सुकरात करने पर तुले हैं

यह माना जाता है कि बड़े बहर की ग़ज़लें कहने से अधिक कठिन होता है छोटी बहर की ग़ज़लें कहना। सच भी है कि कम से कम शब्दों में सब कुछ कह देना एक साहित्यिक कला ही तो है। जो इस कला में पारंगत हो जाता है, वह आसानी से छोटे बहर की सटीक ग़ज़लें भी कह लेता है। इस संग्रह में बड़े बहर के साथ छोटे बहर की भी कई खूबसूरत गजलें हैं। जैसे यह एक गजल है ‘‘रोज़ मरते हैं’’ -
    हम जिसे  बहुत  प्यार करते हैं 
    उसकी  नाराज़गी  से डरते हैं 
    जिनको होता है खौफ लहरों का 
    सिर्फ  पानी  में  वो उतरते हैं 
    चल मोहब्बत से पूछ कर देखो 
    हम ही करते हैं कि वो भी करते हैं

छोटी बहर की ही एक और ग़ज़ल है जो आजकल के अव्यवस्था भरे माहौल पर तीखा कटाक्ष करती है। शेर देखें -
नए-नए रास्ते निकाल के 
ढूंढ रहे हैं हल सवाल के 
ग्रामसभा से  लौटे हैं वो 
कुछ ताजा मुद्दे उछाल के 
आपके घर के बदलो बंधु 
बूढ़े  कैलेंडर  दीवाल के

कवि कृष्ण बक्षी का गीत गजल की दुनिया में एक लंबा अनुभव रहा है। वे अपनी गजल में जो कुछ कहना चाहा उसे बखूबी कहने की महारत रखी। भाषा भी सरल है, आमबोलचाल की भाषा। इसीलिए कृष्ण बक्षी की गजलें, उसे पढ़ने या सुनने वाले से सीधा संवाद करने की ताकत रखती है। ‘‘चलो ढूंढे जवाब अपने’’ संग्रह की तमाम ग़ज़लें शिल्प के लिहाज़ से मुक़म्मल हैं, विचारों को उद्वेलित करती हैं और पठनीय हैं।
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Saturday, August 8, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | जे कछू आवारागर्दी बढ़त नईं जा रई अपने ई सहर में? | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टाॅपिक एक्सपर्ट
जे कछू आवारागर्दी बढ़त नईं जा रई अपने ई सहर में?
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
आजकाल तो कऊं कछू घटे ऊकी रपट तो पांछू लिखाई जाती आए, पैले ऊके वीडियो वायरल होन लगत आएं। ऐसईं पिछली एकई हप्ता में हमें सोसल मीडिया पे दो-चार वीडियो देखबे खों मिल गए। एक वीडियो में चार-छै लड़का एक मोड़ा की धुनाई कर रए हते। दूसरी वीडियो में दो मोड़ियां दो-चार मोड़ों से झगर रईं हतीं, वा बी बीच रोड पे। देखत-देखत में मोड़ा हरें मोड़ियन खों लपाड़े मारन लगे। जोई टाईप की एक औ वीडियो हती जीमें एक मोड़ा रोड कनारे एक मोड़ी खों पीट रओ तो। बा सब देख के हमें लगी के अपने ई सागर में जो का हो रओ? मोड़ियां रस्ता चलत पिट रईं! मनो हमें ज्यादा गम्म नईं खाने परो। काए से के दूसरे दिनां हमें अपने इते की बा वीडियो दिखा गई जीमें एक मोड़ी एक चौराए पे दो-तीन मोड़ों के संगे दिखा रई ती औ ऊके एक हात में छोटी सी तलवार घांई एक हथियार दिखा रओ थो। बा मोड़ी हथियार घुमा-घुमा के बतकाव कर रई हती। हमें लगो के अपने सहर में पिटत भईं दुखियारी मोड़ियां भर नोंई, ऐसी बीरंगनाएं सोई आएं जो खुले में हथियार लए मोड़ों के संगे घूम रईं। जा देख के हमें लगो के कछू ज्यादई स्मार्ट नईं होत जा रओ अपनों सहर। औ रई सई कसर पूरी कर देत आएं तला में कुद्दी मार के मरबे वारे। अब आप सोच रए हुइयो के का हम जेई टाईप की वीडियो देखत रैत आएं? सो ऐसो आए के सोसल मिडिया वारे अपने इते के लोकल चैनल वारे जे दिखात रैत आएं। सो दसा पता परत रैत आए। सो, अपने इते के कानून वारन खों बी जे आवारागर्दी पे तनक लगाम लगाओ चाइए। ने तो कोऊ दिनां कछू बड़ो घटहे तो पछतानों परहे। काए ठीक कई न!
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Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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Thursday, August 6, 2026

बतकाव बिन्ना की | जो बुंदेली की कटक गाथाएं ने पढ़ीं, सो मनो कछू ने पढ़ो | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की  
जो बुंदेली की कटक गाथाएं ने पढ़ीं, सो मनो कछू ने पढ़ो
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
      अपने बुंदेलखंड में भौतई पैले से साहित्त रचो जा रओ। इते की कवित्त किसाओं की सो बातई कछू औ ठैरी। इनें सुन के, पढ़ के बांहें फड़कन लगत आएं। इमें बहादुरी की बात जो होत आए। बुंदेला ऊंसई अपनी बहादुरी के लाने जाने जाऊत रहे। बे न मुगलों से डराने औ ने अंग्रेजन से। दोई खों छठी को दूद याद करा दओ रओ। जे ई कोई 12 मीं सताब्दी से 20 मीं सताब्दी लौं खास-खास तीन तरां के बहादुरी के साहित्त रचे गए। जोन में पैलो हतो रासो, दूसरो, कटक औ तीसरो राछरे। बाकी जे तीनोईं मों जबानी गाए जात्ते। बा तो बाद में कछू बिद्वान जनों ने इनखों इकट्ठो के, छपा के इतिहास घांईं पक्को कर दओ। मने लिखे में ले आए। ने तो पैले जे खाली गाए जात्ते। औ जे सोचो के जोन इनको सुनत्तो, ऊको जे याद रै जात्ते औ फेर बा याद रखे वारे गाऊत्ते। जीको साहित्त की भासा में ‘‘वाचिक परम्परा’’ कओ जात आए। माने मों बोले की परम्परा।  
  
बुंदेली की बहादुरी की कवित्त किसां में सबसे फेमस रई जगनिक को लिखों गओ ‘‘आल्हाखंड’’। आज बी ईको बड़े मन से गाओ जात आए। जोन जगनिक ने ‘‘आल्हाखंड’’ लिखो उनईं ने ‘‘विजयपाल रासो’’ सोई लिखो। ‘‘विजयपाल रासो में राजा विजयपाल राठौर के शिकार पे जाबे की किसां आए। होत का आए के राजा विजयपाल राठौर शिकार पे जात आएं औ उते उनें राजा पृथ्वीराज के सैनिक टकरा जात आएं। दोई में भिड़ परत आएं। पृथ्वीराज जा खबर पा के खोखियां जात आए औ कन्नौज पे हमला बोल देत आए। ऊ टेम पे जगनिक जू दोई राजा में सुलह कराबे की कोसिस करत आएं। रासो तो मानों कई ठों लिखी गईं। एक आए ‘वीर सहदेव चरित’। ईको कवि केशवदास ने लिखो रओ। रासो की जेई परंपरा में जोगीदास भांडेरी को ‘दलपत राव रासो’, लाल कवि को ‘छत्र प्रकाश’, कवि सबसुख को ‘‘भगवंत सिंह रासो’’, गुलाब चतुर्वेदी को ‘करहिया का रासो’, श्रीधर को ‘पारीछत रासो’ औ आनंद सिंह कुड़रा को ‘बाघाट रासो’ गिनाएं जा सकत आएं। 
बहादुरी की कबित्त किसां मने कटक गाथाएं सोई रासो एवं राछरे  घांई आएं। इनमें सोई राजा-महाराजा की बहासदुरी की किसां कही गईं। पन्ना के महाराज छत्रसाल के समै पे एक कवि भए जिनको नांव रओ कवि दान। उन्ने जो छत्रसाल जू की बड़वारी में बहादुरी को जो कवित्त रखे आए ऊको नांव आए ‘‘छत्रसाल जू देव कौ कटक बंध’’। ई कटक में महाराज छत्रसाल औ मोहम्मद खान के बीच भए जुद्ध को पूरो विवरन आए। ईमें महाराजा छत्रसाल औ बुंदेली सैनिकों की बहादुरी को बखान करो गओ आए। दतिया के बिद्वान स्व. बाबूलाल गोस्वामी जू ने ‘छत्रसाल जूदेव कटक बंध’ को संपादन करो औ 1992 में भानु प्रिंटर्स दतिया से इको छपाओ।

भग्गी दाऊजू श्याम ने सोई कटक लिखो। साल 1900 में भग्गी दाऊ ने ‘झांसी कौ कटक’ लिखी। ईको 1969 में डॉ. भगवान दास महौर जू ने ‘लक्ष्मी बाई रासो’ के संगे ईको छपाओ। भग्गी दाऊजू श्याम झांसी के जनकवि कहाऊत्ते। उन्ने 1857 की लड़ाई सोई लड़ी रई। जेई से उन्ने ‘झांसी कौ कटक’ में रानी लक्ष्मीबाई की बहादुरी के गुन गाए। बाकी अपने बुंदेलखंड में 1857 से पैले बी अंग्रेजन को तगड़ो विरोध करो गओ रओ। ईको प्रमान ‘‘पारीछत कौ कटक’’ में मिलत आए। ई कटक में जैतपुर के महाराज पारीछत औ अंग्रेजों के बीच भओ जुद्ध को ब्यौरा दऔ गऔ आए। जा जुद्ध 1841 में भओ रओ। बेरमा नदी के किनारे बिलगांव में महाराज पारीछत ने अंग्रेजन खों से जुद्ध कर के उनको मजा चखा दओ रओ। जे बात औ आए के कछू जनों की गद्दारी के मारे राजा पारीछत जीत ने पाए औ पकर के जेल में डार दए गए। उनें बंदी बना के कानपुर की जेल में रखो गओ जां 1853 में उनें फांसी दे दई गई। जो मानो जात आए के ‘पारीछत कौ कटक’ कवि बृजकिशोर ने लिखो रओ। तनक ईकी कछू लकीरें देखो-
कर कूंच जैतपुर से बगौरा में मेले।
चौगान पकर गये मन्त्र अच्छौ खेले।।
बकसीस भई ज्वानन खाँ पगड़ी सेले।
सब राजा दगा दै गये नृप लड़े अकेले।।
कर कुमुक जैतपुर पै चढ़ आऔ फिरंगी।
हुसयार रहो राजा दुनियाँ है दुरंगी।।
जब आन परी सिर पै कोऊ न भऔ संगी।
अर्जन्ट खात जक्का है राजा जौ जंगी।।
एक कोद अर्जन्ट गऔ, एकवोर जन्डैल।
डांग बगोरा की घनी, भागत मिलै न गैल।।

भैरोंलाल को लिखो ‘भिलसांय कौ कटक’ में बघेल राजा ठाकुर रणमत सिंह औ अंग्रेजों के मध्य पुटरा नांव की जांगा 1857 में भए जुद्ध को हाल लिखो गओ आए। ऊ टेम पे, मने 1857 में ठा. रणमत सिंह की रीवा जागीर पन्ना रियासत में आत्ती। रणमत सिंह बघेल क्षत्रिय हते। मनों कोनऊं के लगाई-बुझाई से पन्ना औ रीवा रियासतन में इन गई। सन् 1850 में दोनों रियासतें लड़बे खों ठाड़ी हो गईं मनो अंगरेजन के कारन लड़ाई टल गई। ईके बाद रणमत सिंह जू जागीर छोड़कर अपने कुछ साथियों के संगे सागर आ गए। जां वे अंग्रेजी सेना में भरती हो के लेफ्टिनेंट हो गए। कछू दिनां बाद उने परमोशन पे नौगांव भेज दओ गओ। जां उने केप्टन के बना दओ गओ। तभईं 1857 की लड़ाई छिड़ गई। अंगरेजन ने उने आदेस दओ के बे बुंदेला क्रांतिकारी बख्तबली औ मर्दन सिंह खों पकड़बे को काम करें। मनों रणमत सिंह जू ने ऐसो कछू ने करो औ उन ओरन खों पकरबे के लाने यां-वां भगत फिरबे को ढोंग करत रए। मगर जे बात कां लौं छिपती, सो रणमत सिंह जू औ उनके सिपाइयों को बर्खास्त कर कर दओ गओ। संगे उनकी गिरफ्तारी को आदेश जारी कर दओ गओ। अंग्रेज फौज में रैते भए रणमत सिंह जू ने जेई कोई 300 लोगों की अपनी एक टुकड़ी बना लई रई। सो जब बे ओरे सेना से निकारे गए सो उन सबई ने खुल के बुंदेलन को साथ दओ। मगर अपने इते तो जित्ती बहादुरी की किसां आएं उत्तई धोखा की किसां मिलत आए। मे राणमत सिंह जू खों सोई धोखे से बंदी बना के बांदा जेल भेज दओ गओ। जां उनें 1 अगस्त 1859 को फांसी दे दी गई। जे पूरी किसां ‘‘भिलसांय कौ कटक’ में मिलत आए। 

बुंदेलखंड की कटक खों नओ मंच देबे के लाने 2013 में बॉलीवुड के हीरो औ नाटकों के निरदेशक गोविंद नामदेव जू ने एनएसडी, अथग औ सागर विश्वविद्यालय के संगे मिल के एक वर्कशाप करो। ऊके बाद गोविंद नामदेव जू के डायरेक्सन में, 30 दिसंबर 2013 को लगातार तीन दिनां को मंचन करो। ई कटक में बुंदेला वीर मधुकर शाह बुंदेला की की बीरता को बखान आए। ललितपुर जिला के नाराहट में पैदा भए बुंदेला वीर मधुकर शाह जू ने अंगरेजन के बिरुद्ध बुन्देला विद्रोह छेड़ दओ रओ। बे खूब लड़े। मनों मधुकर शाह खों सोई सोऊत में धोके से पकरवा दओ गओ। उने सागर की बड़ी जेल में रखो गऔ औ ऊतई फांसी दे दी गई। ऊ टेम बे केवल 21 बरस के रए। 

ऐसे बीरन के बारे में लिखो गओ आए कटक। सो इनखों जरूर पढ़ो जाओ चाइए। बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के अपने बुंदेलखंड को इतिहास कित्तो गजब को आए, बो चाए बहादुरी को होए चाए कटक घांईं साहित्त को होए। सो अपनों जै बुंदेलखंड!!    
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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हम सभी को ऐसे तत्वों का सभी मंचों पर सक्रिय विरोध करना चाहिए जो क्षत्रिय समाज व समाज की नारीशक्ति के इतिहास को गलत तरीके से प्रस्तुत कर भ्रांतियां फैलाने का काम करते हैं। - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

🚩 "हम सभी को ऐसे तत्वों का सभी मंचों पर सक्रिय विरोध करना चाहिए जो क्षत्रिय समाज व समाज की नारीशक्ति के इतिहास को गलत तरीके से प्रस्तुत कर भ्रांतियां फैलाने का काम करते हैं।" सम्मान समारोह को संबोधित करते हुए मैंने (डॉ सुश्री शरद सिंह ने) मैंने कहा। अवसर था क्षत्रिय महासभा जिला सागर की महिला विंग द्वारा आयोजित क्षत्रिय महिला सम्मान समारोह का।
      🚩जिस समाज में महिलाओं का सम्मान होता है, वह समाज अधिक संगठित, समृद्ध और सुरक्षित बनता है। क्षत्रिय समाज की प्रगति भी नारीशक्ति के सम्मान और सहभागिता पर निर्भर है। अगले वर्ष 101 बेटियों का सामूहिक निशुल्क कन्यादान समारोह आयोजित किया जाएगा।" यह उद्गार क्षत्रिय महासभा जिला सागर की महिला विंग द्वारा आयोजित क्षत्रिय महिला सम्मान समारोह को संबोधित करते हुए वरिष्ठ संरक्षक पूर्व गृहमंत्री, खुरई विधायक श्री भूपेन्द्र सिंह ने व्यक्त किए। 
    🚩 होटल दीपाली के कोहिनूर हॉल में आयोजित इस कार्यक्रम में क्षत्रिय समाज की उन महिला सदस्यों का सम्मान किया जिन्होंने विगत दिनों क्षत्रिय महासभा सागर द्वारा समाज की 21 बेटियों के सामूहिक कन्या विवाह आयोजन में योगदान किया और सक्रिय भूमिका निभाई। 
     कार्यक्रम का आभार क्षत्रिय महासभा जिला सागर की महिला विंग की अध्यक्ष श्रीमती प्रीति सिंह ने किया। मंच संचालन वंदना सिंह ने किया। कार्यक्रम में मंच पर साहित्यकार सुश्री शरद सिंह, श्रीमती प्रमिला सिंह, क्षत्रिय महासभा के अध्यक्ष लखन सिंह, अभिषेक गौर उपस्थित रहे।
🚩इनका हुआ सम्मान 👇

पूर्व गृहमंत्री, खुरई विधायक श्री भूपेन्द्र सिंह ने क्षत्रिय समाज की जिन बहिनों को प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया उनमें डॉ सुश्री शरद सिंह, श्रीमती प्रमिला सिंह, श्रीमती प्रीति सिंह, श्रीमती सीमा ठाकुर बन्नाद, श्रीमती सीता ठाकुर घूघर, श्रीमती नेहा राजपूत बरकोटी, श्रीमती नंदिनी हरिसिंह खुरई, श्रीमती मनीषा सिंह खुरई, श्रीमती रुचि सिंह खुरई, श्रीमती श्रद्धा सिंह सागर, श्रीमती ज्योति चौहान मकरोनिया, श्रीमती अंशु सिंह, श्रीमती ऋतु सिंह ठाकुर, श्रीमती सीमा चौहान, श्रीमती मंजू सिंह महुआखेड़ा, श्रीमती अनीता भरत सिंह केसली, श्रीमती सुमन राजपूत, श्रीमती अर्चना सिंह भैंसा, श्रीमती राजबाला सिंह, श्रीमती रेखा ठाकुर खुरई, श्रीमती अनुपमा राजपूत, श्रीमती साक्षी सिंह भैंसा, श्रीमती रेशु सिंह सागर, श्रीमती रीना बैस सागर, श्रीमती वंदना सिंह, श्रीमती निरुपमा गौर, श्रीमती आरती सिंह बंडा शामिल हैं।
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प्रिय प्रीति सिंह जिस प्रकार तत्परता कर्मठता और उत्साह पूर्वक आयोजन करती हैं तथा समाज की सभी महिलाओं को परस्पर जोड़े रखा है वह प्रशंसा योग्य है। मुझे पूरा विश्वास है कि उनके नेतृत्व में क्षत्रिय महिला समाज निरंतर प्रगति करेगा तथा समाज की महिलाओं में सक्रियता की भावना जागृत होगी।
     आदरणीय भाई साहब भूपेंद्र सिंह जी के निर्देशन में इस अत्यंत सफल एवं ऊर्जावान आयोजन के लिए मैं प्रीति सिंह जी को हार्दिक बधाई देती हूं तथा उनके उज्जवल भविष्य की कामना करती हूं। - डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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Wednesday, August 5, 2026

चर्चा प्लस | समय रहते समझना ही होगा ऊर्जा संरक्षण के महत्व और तरीकों को | सागर दिनकर

चर्चा प्लस
समय रहते समझना ही होगा ऊर्जा संरक्षण के महत्व और तरीकों को
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                
          जब लाईट चली जाती है तो हम झुंझला उठते हैं। यदि सरकार के द्वारा विद्युत कटौती की जाने लगती है तो हमारा क्रोध और बढ़ जाता है। डीजल-पेट्रोल के दाम बढ़ते हैं तो हम घबरा उठते हैं। लेकिन क्या हम ऊर्जा के इन स्रोतों की बचत के बारे में व्यक्तिगत स्तर पर कभी गंभीरता से विचार करते हैं? जीवाश्म ईंधन का उपयोग कम करने के लिए इलेक्ट्रिक गाड़ियां आ गईं लेकिन बिजली उत्पादन के लिए भी तो कोयला जैसा जीवाश्म ईंधन लगता है। यानी आगे चल कर हमें अपनाना होगा बिजली के पारंपरिक स्रोत का विकल्प। तो वह, अभी से क्यों नहीं? इस पर विचार करना जरूरी है।
   सन 2006 में भारत बुक सेंटर, लखनऊ से मेरी एक पुस्तक प्रकाशित हुई थी-‘‘सस्ता और सुरक्षित ऊर्जा स्रोतरू सौर तापीय ऊर्जा’’। इस पुस्तक के प्राक्कथन में मैंने लिखा था-‘‘वर्तमान समय ऊर्जा और उसके स्रोतों पर चिंतन करने का समय है। हम ऊर्जा संकट के जिस दौर से गुज़र रहे हैं, वह हमें अपने परंपरागत ऊर्जा स्रोतों पर पुनः दृष्टिपात करने का आग्रह कर रहा है। लकड़ी, कोयला, पनबिजली, गैस, खनिज तेल आदि हमारे परंपरागत ऊर्जा स्रोत मानव के द्वारा उस समय से काम में लाए जा रहे हैं जबसे इन स्रोतों की जानकारी मनुष्य को हुई। हजारों वर्षों से इन ऊर्जा स्रोतों के निरंतर काम में आने, जनसंख्या के दबाव बढ़ने तथा इन ऊर्जा स्रोतों की भावी उपलब्धता की गंभीरता की ओर स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं। परंपरागत ऊर्जा स्रोतों को न तो पुनर्जीवित किया जा सकता है और न पुनर्निर्मित किया जा सकता है। इनका भंडार समाप्त हो जाने पर हम ऊर्जाहीन हो जाएंगे। अतः समय रहते परंपरागत ऊर्जा स्रोतों के एक ऐसे विकल्प को अपना लेना आवश्यक है जो हमारी भावी आवश्यकताओं को सुचारू रूप से पूरा कर सके। वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत के रूप में जिन परंपरागत स्रोतों को अपनाया जा सकता है, वे हैं- 1.सौर ऊर्जा 2.पवन ऊर्जा 3.ज्वारीय ऊर्जा 4.भू-तापीय ऊर्जा। इन परंपरागत ऊर्जा स्रोतों में सौर ऊर्जा अथवा सौर तापीय ऊर्जा सबसे उत्तम ऊर्जा स्रोत है। यह सूर्य से प्राप्त होने वाली ऊर्जा है और इसीलिए इसकी उपलब्धता सतत एवं अक्षुण्ण है। सौर तापीय ऊर्जा सब जगह उपलब्ध हो सकती है। इसको उपयोग में लाना भी आसान है। सौर तापीय ऊर्जा के क्षेत्र में निरंतर अनुसंधान हो रहे हैं तथा यह भविष्य की विश्वसनीय ऊर्जा के रूप में स्वीकार की जा चुकी है। सुदूर ग्रामीण अंचलों के लिए भी सौर तापीय ऊर्जा के द्वारा ईंधन एवं विद्युत की आपूर्ति की जा सकती है जो अन्य किसी स्रोत से दीर्घकाल तक संभव नहीं है। इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए, मैंने सौर तापीय उर्जा के बारे में जैसे-जैसे अध्ययन किया, वैसे-वैसे मैंने इसे एक सशक्त विश्वसनीय और उपयोग में आसान ऊर्जा स्रोत के रूप में पाया। मुझे लगता है कि सौर तापीय ऊर्जा भारत जैसे विकासशील देश में समाज के प्रत्येक स्तर के नागरिकों द्वारा अपनाया जाना चाहिए। इससे देश की राष्ट्रीय आय के एक बड़े भाग की बचत हो सकेगी, जो परंपरागत ऊर्जा को आयात करने में व्यय हो जाती है। सौर तापीय ऊर्जा को अपना कर न केवल ईंधन अपितु विद्युत आपूर्ति से संबंधित संकटों से भी हम उबर सकेंगे। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सकेंगे।’’

तब से अब तक ऊर्जा के संबंध में स्थितियां बेहतर नहीं हुई हैं बल्कि और अधिक बिगड़ी हैं। आज फिर वही शब्द लिखने पड़ रहे हैं जो मैंने उस समय लिखे थे कि आमजन जीवन में सौर ऊर्जा को अपनाए जाने की जरूरत है।
कोयले की उपलब्धता पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं और कोयला बिजली उत्पादन में सबसे बड़ी भूमिका निभाता है। कोयले की उपलब्धता के भावी संकट को देखते हुए जर्मनी ने अपने देश में कोयला खनन का काम बंद कर चुका है। अन्य देश भी इस दिशा में अपनी योजनाएं बना रहे हैं। भारत जैसे विकासशील देश के लिए एकदम से कोयले का उपयोग बंद कर देना संभव नहीं है अतः उसने जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में सन् 2030 से 2050 तक का समय मांगा है। लेकिन क्या यह हमारे लिए सन 2030 तक संभव है? हम यदि रेलवे लाईन के पास पहुंच कर देखें तो कुछ ही देर में कोयले से भरी मालगाड़ी सामने से गुज़रती हुई दिखाई दे जाएगी। वह पचासों बोगियों में भरा हुआ कोयला कारखानों और विद्युत तापगृहों में पहुंच कर ऊर्जा उत्पादन का काम करता है। वर्षों से इस प्रकार कोयला खनन किया जा रहा है। हजारों वर्ष में तैयार यह कोयला जिस तेजी से और जिस बड़े पैमाने में हमने उपयोग में लाया है, उससे भूमि के नीचे मौजूद कोयले का भंडार अपना अस्तित्व खोता जा रहा है। कोयले का पुर्नउत्पादन इतनी तेजी से नहीं हो सकता है कि हम खोदते जाएं, कोयला निकालते जाएं और पृथ्वी हमें कोयला बना-बना कर देती जाए। यह हजारों वर्ष की प्राकृतिक प्रक्रिया से निर्मित होता है। इस बात को जानते हुए भी हमने यह अनदेखी की कि कोयला एक दिन पूरी तरह समाप्त हो सकता है। इसीलिए स्थिति इस गंभीरता तक आ पहुंची है कि कोयले का उपयोग बंद किए जाने का वैश्विक स्तर पर प्रयास आरम्भ करना पड़ रहा है।

हम दैनिक जीवन में विद्युत ऊर्जा का बेहद उपयोग करते हैं। अब तो ई-बाईक, ई-कार आदि के रूप में उपयोग बढ़ता जा रहा है। इस ‘ई’ का मतलब है इलेक्ट्रिक या बिजली। तो जब तक बिजली पारंपरिक स्रोतों पर निर्भर है और हमारे पारंपरिक स्रोत समाप्त नहीं हुए हैं तब तक हमें बिजली प्राप्त होती रहेगी। लेकिन उसके बाद? क्या हम अंधकारयुग में जीने को तैयार हैं? कदापि नहीं। इसकी कल्पना भी हम नहीं करना चाहते हैं। तो फिर क्यों न समय रहते ऊर्जा के अपने स्रोत को पारंपरिक से बदल कर वैकल्कि पर ‘‘स्विच’’ कर दिया जाए। यानी हम जीवाश्म ईंधन के बदले सौर ऊर्जा को स्रोत के रूप में पूरी तरह से अपना लें।

यूं तो देश में हर वर्ष राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण दिवस मनाया भी जाता है। यह ऊर्जा खपत के महत्व और हमारे दैनिक जीवन में इसके उपयोग और वैश्विक पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिति पर इसके प्रभाव का आकलन करने के लिए मनाया जाता है। भारत में राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण दिवस मनाने का उद्देश्य रहता है, लोगों को ऊर्जा के महत्व, ऊर्जा की बचत, और ऊर्जा संरक्षण के बारे में जागरुक किया जा सके। ऊर्जा संरक्षण का सही अर्थ है ऊर्जा के अनावश्यक उपयोग को कम करके कम ऊर्जा का उपयोग कर ऊर्जा की बचत की जाए। लेकिन यह दिवस भी अन्य दिवसों की भांति एक दिन का समारोह बन कर रह जाता है। 
   कुशलता से ऊर्जा का उपयोग भविष्य में उपयोग के लिए इसे बचाने के लिए बहुत आवश्यक है। यह सच है कि विद्युत जैसी ऊर्जा को बचा कर उसका भंडारण नहीं किया जा सकता है, लेकिन उसके उत्पादन में लगने वाले कोयला जैसे स्रोत बचाए जा सकते हैं और मंहगी बिजली के विरुद्ध सौर ऊर्जा को अपना कर अपने घरेलू बजट को भी सम्हाला जा सकता है।

यह सच है कि वर्तमान में हमारे देश में सौर उपकरण घर में लगवाने मंहगे पड़ते हैं किन्तु आरंभिक खर्च के बाद न्यूनतम खर्च उसे बैलेंस कर देता है। यदि इस दिशा में सरकार कारगर सब्सिडी लागू कर दे तो सौर ऊर्जा के घरेलू उपकरण हर नागरिक के लिए सस्ते और आसानी से उपलब्ध हो सकेंगे। इस दिशा में चीन ने हमारे देश के बाजार को आकर्षित करने में कसर नहीं छोड़ी है। ऑनलाईन बाजार में कम से कम कीमत में उसने ऐसे उत्पाद उतार दिए हैं जो दिन भर सौर ऊर्जा ग्रहण करते हैं और रात भर घर, लॉन, सड़क आदि को रोशन करते हैं। बेशक ये उपकरण बिना गारंटी के होते हैं किन्तु इनकी कम कीमत इनके ‘‘यूज एंड थ्रो’’ की क्वालिटी के आड़े नहीं आती है। यदि खाना पकाने के सोलर कुकर, चूल्हे और घरेलू बिजली के उपकरणों को सब्सिडी के साथ खुले बाजार में उपलब्ध कराया जाए तो इसे सभी लोग खरीदना पसंद करेंगे। इसका अनुमान बिजली बचाने वाले बल्बों, पंखों आदि की खरीदी के प्रति रुझान को देख कर लगाया जा सकता है। क्योंकि सुविधा पाने के साथ-साथ पैसे की बचत हर कोई करना चाहता है।  

यह भी सच है कि हमें ऊर्जा की बचत की आदत नहीं है। यह आदत हमें अपनानी होगी। कोई भी ऊर्जा की बचत इसकी गंभीरता से देखभाल करके कर सकता है। दैनिक उपयोग के बहुत से विद्युत उपकरणों को जैसे- बिना उपयोग के चलते हुए पंखों, बल्बों, एसी, हीटर आदि को बंद कर के विद्युत की बचत की जा सकती है। इस तरह ऊर्जा की बचत का तरीका ऊर्जा संरक्षण अभियान में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। जीवाश्म ईंधन, कच्चे तेल, कोयला, प्राकृतिक गैस आदि दैनिक जीवन में उपयोग के लिए पर्याप्त ऊर्जा उत्पन्न करते हैं लेकिन दिनों-दिन इनकी बढ़ती मांग प्राकृतिक संसाधनों के कम होने का भय पैदा करने लगा है। ऊर्जा संरक्षण ही केवल एक ऐसा रास्ता है जो ऊर्जा के गैर-नवीनीकृत साधनों के स्थान पर नवीनीकृत साधनों को प्रतिस्थापित करता है। ऊर्जा उपयोगकर्ताओं को ऊर्जा की कम खपत करने के साथ ही कुशल ऊर्जा संरक्षण के लिये जागरुक करने के उद्देश्य से विभिन्न देशों की सरकारों ने ऊर्जा और कार्बन के उपयोग पर कर लगा रखा है। उच्च ऊर्जा उपभोग पर कर ऊर्जा के प्रयोग को कम करने के साथ ही उपभोक्ताओं को एक सीमा के अन्दर ही ऊर्जा का प्रयोग करने के लिये प्रोत्साहित करता है। किन्तु इससे अधिक नागरिक हित का तरीका है सौर ऊर्जा को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना।

भवन निर्माण के समय थर्मल इंसुलेशन का प्रयोग हमारे देश में नहीं किया जाता है किन्तु इस दिशा में ऊर्जा के बचत वाले निर्माण को बढ़ावा दिया जा सकता है जिससे ठंड की ऋतु में ऊर्जा की बचत की जा सके। अन्यथा, ठंड के मौसम में हीटर, ब्लोअर आदि उपकरणों पर बड़े पैमाने पर ऊर्जा खर्च करनी पड़ती है। थर्मल पर्दें, स्मार्ट खिड़कियां इस दिशा में कारगर साबित हो रही हैं। ऊर्जा की एक बड़ी मात्रा को प्राकृतिक रोशनी और कॉम्पैक्ट फ्लोरोसेंट लैंप या सीएफएल से और अन्य साधनों के द्वारा ऊर्जा खपत कम की जा सकती है। साथ ही फ्लोरोसेंट बल्ब, रैखिक फ्लोरोसेंट, सौर स्मार्ट टॉर्च, स्काई लाइट, खिड़कियों से प्रकाश व्यवस्था और सौर लाइट का प्रयोग करके बचाया जा सकता है। जल संरक्षण भी बेहतर ऊर्जा संरक्षण का कार्य करता है। लोगों के द्वारा हर साल लगभग हजारों गैलन पानी बर्बाद किया जाता है जिसकी विभिन्न संरक्षण के साधनों जैसे- 6 जीपीएम या कम से कम प्रवाह वाले फव्वारों, बहुत कम फ्लश वाले शौचालय, नल जलवाहक, खाद शौचालयों का प्रयोग करके बचत की जा सकती है।

 राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण अभियान भारत में ऊर्जा संरक्षण की प्रक्रिया को सुविधाजनक बनाने के लिए विद्युत मंत्रालय द्वारा शुरू किया गया। भारत में पेट्रोलियम संरक्षण अनुसंधान एसोसिएशन वर्ष 1977 में भारत सरकार द्वारा भारतीय लोगों के बीच ऊर्जा संरक्षण और कुशलता को बढ़ावा देने के लिए स्थापित किया गया था। ये ऊर्जा का संरक्षण महान स्तर पर करने के लिये भारत सरकार द्वारा उठाया गया बहुत बड़ा कदम है। बेहतर ऊर्जा कुशलता और संरक्षण के लिए भारत सरकार ने एक अन्य संगठन ऊर्जा दक्षता ब्यूरों को भी 2001 में स्थापित किया गया।

ऊर्जा संरक्षण दिवस वस्तुतः एक राष्ट्रीय जागरूकता अभियान दिवस है। लेकिन जैसा कि हमारी प्रवृत्ति है कि चाहे व्यक्तिगत स्तर पर हो या सरकारी स्तर पर, दिवस मनाने के बाद हम अपने सारे संकल्प भूल जाते हैं और सारी योजनाएं ठंडे-बस्ते में बांध देते हैं। लेकिन अब वह समय आ ही गया है कि हमें ऊर्जा की उपलब्धता एवं ऊर्जा स्रोतों के प्रति गंभीर होना होगा। हमें लापरवाही और अनदेखा करने की अपनी प्रवृत्ति को बदला होगा। हम अपनी आने वाली पीढ़ी को खाली कोयला खदानें और तेल के रिक्त कुए सौंपने के बजाए उन्हें सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, भू-तापीय ऊर्जा, सागरीय ऊर्जा के कभी न खाली होने वाले भंडार सौंप कर जाएं। विशेष रूप से सौर ऊर्जा का वह भंडार, जिससे दैनिक जीवन में भी सस्ती और सुगम ऊर्जा मिलती रहे।                                                
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(दैनिक, सागर दिनकर में 05.08.2026 को प्रकाशित)  
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धार्मिक पर्यटन के क्षेत्र में रोजगार के असीमित अवसर हैं। - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

"पर्यटन के क्षेत्र में रोजगार  के असीमित अवसर हैं जैसे टूर गाइड, ट्रैवल एजेंट और होटल मैनेजमेंट हैं। विशेष रूप से धार्मिक पर्यटन के क्षेत्र में तो नारियल या पूजा के सामग्री बेचने वाली एक दुकान से लेकर होटल या रिसोर्ट तक के रूप में रोजगार पाया जा सकता है। आजकल तो महिलाएं भी टूर गाइड का काम करती हैं। बस, प्राथमिक जरूरत यही है कि हम अपने पर्यटन क्षेत्र को स्वच्छ, सुविधायुक्त और सुरक्षित बनाएं, ताकि अधिक से अधिक पर्यटक आएं, अधिक दिन तक रुकें और जब लौट कर जाएं तो उसके बारे में अन्य लोगों से सकारात्मक चर्चा करें। परिवहन के पर्याप्त साधन भी पर्यटकों को उपलब्ध कराना आवश्यक है। तभी पर्यटन क्षेत्र का विस्तार होगा और जब पर्यटन क्षेत्र का विस्तार होगा तो रोजगार के अवसर निरंतर बढ़ते जाएंगे।" - बतौर मुख्य वक्ता मैंने (डॉ सुश्री शरद सिंह ने) उपस्थित छात्र-छात्राओं को संबोधित करते हुए कहा। अवसर था पंडित दीनदयाल उपाध्याय आर्ट एंड कॉमर्स पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज सागर द्वारा पीएम उषा परियोजना के सहयोग से आयोजित "बुंदेलखंड - पर्यटन के क्षेत्र में रोज़गार के अवसर" विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के प्रथम सत्र का।
    इस प्रथम सत्र का विषय था "बुंदेलखंड में धार्मिक एवं आध्यात्मिक पर्यटन के क्षेत्र में रोजगार के अवसर"। 
🚩महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ सरोज गुप्ता के ऊर्जावान एवं उत्साही प्रयासों से इस प्रकार के आयोजन लगातार महाविद्यालय में आयोजित हो पा रहे हैं जिसके लिए वे तथा उनकी टीम बधाई की पात्र हैं।💐
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