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Friday, September 25, 2026

चर्चा प्लस | चिरस्थायित्व एवं अमरत्व के भ्रम में जीने वाले लोग | डॉ सुश्री शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
चिरस्थायित्व एवं अमरत्व के भ्रम में जीने वाले लोग 
 - डॉ (सुश्री) शरद सिंह 
   संत कबीर ने कहा है कि “कबीर कहा गरबियो, काल गहे कर केस। ना जानो कहां मारिसी, कै घर कै परदेस।।” अर्थात तुम अपने इस शरीर और जीवन पर इतना अहंकार क्यों करते हो? मृत्यु (काल) ने तुम्हारे बाल पकड़ रखे हैं। वह तुम्हें कब और कहाँ ले जाकर मार देगी यह कोई नहीं जानता। फिर भी कुछ लोग सोचते हैं कि मैं सर्वश्रेष्ठ हूं! मैं सर्वोत्तम हूं! मैं अजर अमर हो गया हूं! मेरे विचार अनंत काल तक प्रवाहित रहेंगे! क्या सचमुच ऐसा संभव है?
जब विचारधाराएं ही स्थाई नहीं रहती अमरत्व को प्राप्त नहीं कर पाती हैं, फिर भी कोई व्यक्ति सोचे कि मैं हमेशा रहूंगा, मेरा नाम हमेशा रहेगा, मेरा अस्तित्व हमेशा रहेगा, तो यह सबसे बड़ा भ्रम है। दुख और सुख भी स्थाई नहीं रहते हैं तो फिर कोई विचार कोई व्यक्ति या कोई संस्था स्थाई कैसे रह सकती है? 
भगवद्गीता के अध्याय 2 के श्लोक 14 में कहा गया है कि संसार में सुख-दुःख और परिस्थितियाँ स्थायी नहीं हैं-
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत।। 
अर्थात, हे कुन्ती पुत्र! सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख को देने वाले इंद्रियों और विषयों के संयोग केवल आने-जाने वाले और अनित्य (अस्थायी) हैं। हे भारत! तुम सहनशील बनो और उन्हें धैर्यपूर्वक सहन करो।
सहन करना यह एक बहुत बड़ी विशेषता है और जो इस विशेषता में पारंगत हो जाता है वह निर्विकार हो जाता है। किंतु सहन करने के भी अनेक अर्थ हैं। जो व्यक्ति निर्बल है उसके  द्वारा किसी भी प्रकार की अत्याचार को सहन करना निर्विकार की श्रेणी में नहीं आएगा। उसकी स्थिति दलित और पीड़ित की ही बनेगी। अल्पकाल के लिए सहन करना और अवसर प्राप्त होते ही अपने सहनशक्ति को एक और रख कर आक्रामक हो जाना यह अवसरवादी सहनशीलता होती है। ऐसे मामले अधिकांश राजनीति के क्षेत्र में देखे जाते हैं या फिर कार्यालय परिवेश में जहां परिस्थिति वश व्यक्ति प्रताड़ित करने वाले अथवा दबाव बनाने वाले व्यक्ति की हर बात को सहन करता रहता है सिर्फ इस प्रतीक्षा में कि एक दिन समय आने पर वह पलटवार करेगा और डट कर जवाब देगा। बहरहाल चर्चा सिर्फ सहनशक्ति की नहीं बल्कि स्थायित्व और अमरत्व के भ्रम की है। 
 जब व्लादिमीर लेनिन ने रूस में साम्यवाद की स्थापना की थी और सोवियत संघ ने अपना आकार पाया था तक किसने सोचा था कि उन्हें के वंशज एक दिन लेनिन की मूर्ति को तोड़कर फेंक देंगे उनके विचारों को कुचल देंगे और साम्यवाद से पूंजीवाद की ओर बढ़ जाएंगे। ठीक इसी तरह हमारे देश के पश्चिम बंगाल में भी उस समय तक किसी ने यह नहीं सोचा होगा कि वहां से साम्यवाद के निशान ढूंढ के मिटा दिए जाएंगे, जिस समय वहां साम्यवादी सरकार थी, साम्यवादी विचारधारा का बोलबाला था। समय बदल चुका है। पूरी दुनिया में साम्यवाद सिमट चुका है। पूंजीवाद और साम्यवाद के बीच एक नया पूंजीवादी साम्यवाद जन्म ले चुका है जिसे यदि राजनीतिक भ्रम कहा जाए तो गलत न होगा। किंतु इसकी किलकारी भी अभी दुनिया के बहुत कम देश में सुनाई देती है। हमारे देश भारत में स्थितियां बिल्कुल बदल चुकी हैं। पश्चिम बंगाल में कई सड़कों और पुलों के नाम बदलने की कवायद शुरू हो चुकी है। राज्य सरकार की 10 सदस्यीय कमेटी कोलकाता की प्रमुख सड़कें लेनिन सरणी, कार्ल मार्क्स, सरणी व हो-ची-मिन्ह सरणी के नाम बदलने में जुट गई है। यानी अंतिम निशान भी पोंछे जा रहे हैं। हमेशा यही होता है और यही होता रहेगा। जब हम वह कहावत सुनते हैं कि खंडहर बता रहे हैं इमारत बुलंद थी तो इससे यह भी सिद्ध हो जाता है कि कभी उस इमारत का दबदबा रहा होगा। लेकिन समय के साथ इमारत ढहने लगी और खंडहर में बदल गई। न जाने कितने शहरों, गलियों और चौराहों के नाम बदले जा चुके हैं। यहां तक कि दुनिया में कुछ देशों ने भी अपने नाम बदल दिए। यह यूं ही नहीं होता। जब एक विचार दूसरे विचार पर स्थापित हो जाता है तो वह अपने अनुरूप पूरे परिवेश को बदलने लगता है चाहे वह किसी स्थान का नाम हो या व्यक्ति के कार्य या कृतित्व की स्मृति हो। यह प्रभावी विचार का दम्भ ही होता है जो समसामयिक रूप से उसे स्थाई और अमर होने के भ्रम में डाल देता है। वह सोचने लगता है कि मैं सर्वोत्तम हूं। मैं श्रेष्ठ हूं। मेरे जैसा दूसरा नहीं। मुझे यह दुनिया युगों-युगों तक याद रखेगी। मैं अमर हो गया हूं। मेरे विचार अमर हो गए हैं। ऐसे समय में वह भूल जाता है कि जिन विचारों को कुचलकर वह स्थापित हुआ है उन विचारों ने भी यही भ्रम पाल था कि वह अमर हो गए हैं।
अपने नाम एवं कार्यों के अमरत्व की भावना से प्रेरित होकर टाइम कैप्सूल भी भूमि में गाड़े गए। भारत में सबसे चर्चित सरकारी टाइम कैप्सूल (काल पात्र) 15 अगस्त 1973 को तत्कालीन प्रधानमंत्री द्वारा लाल किले के पास जमीन से 32 फीट नीचे गाड़ा गया था। इसे आज़ादी के 25 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में रखा गया था।  लाहौरी गेट के पास दबाए गए इस टाइम कैप्सूल को ‘‘काल पात्र’’ नाम दिया गया था। इसे लेकर देश में काफी लंबा राजनीतिक विवाद चला।इसमें भारत की आज़ादी के शुरुआती 25 वर्षों का घटनाक्रम, संघर्ष और देश की उपलब्धियों का विवरण था। इसके भीतर लगभग 10,000 शब्दों की एक पांडुलिपि  को तांबे की प्लेटों पर उकेरा गया था ताकि वह हजारों सालों तक सुरक्षित रहे। यह टाइम कैप्सूल 1,000 साल तो दूर, अपनी जगह पर मात्र 4 साल ही रह सका। आपातकाल  के बाद जब 1977 में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार सत्ता में आई, तो उन्होंने इस कैप्सूल को जमीन से बाहर निकलवा लिया। सरकार बदलने के बाद इसे निकाला और खोला तो गया, लेकिन इसके अंदर मिली सामग्री की पूरी रिपोर्ट को कभी भी आधिकारिक तौर पर सार्वजनिक नहीं किया गया।
        मेरे एक परिचित प्रोफेसर थे हिंदी विषय के। एक बार उन्होंने अपने शोध कार्य के संबंध में चर्चा करते हुए यह कहा कि मैंने फलां साहित्यकार पर शोध करके, उन पर सेमिनार करवा कर उन्हें अमर कर दिया है। उनकी लिखी सारी किताबें लाइब्रेरी में खरीदवा दी हैं। उन पर लिखी मेरी सारी किताबें भी लाइब्रेरी में  हमेशा रहेंगी। फिर उन्होंने यहां तक कह दिया कि मेरे नाम से उन्हें यानी उन फलां साहित्यकार को जाना जाएगा। मुझे उस समय आश्चर्य हुआ था यह सुनकर क्योंकि मैं इतिहास की विद्यार्थी थी और मैं यही पढ़ रही थी कि किस प्रकार बिस्मार्क, हिटलर, मुसोलिनी आदि काल की गर्त में समा गए। उनके विचार इतिहास की विषय वस्तु बन कर रह गए। उस कालखंड की तमाम विशेषताओं से हम विद्यार्थी सिर्फ अक्षरों के द्वारा ही ज्ञान प्राप्त कर रहे थे अन्यथा उसकी कल्पना हमारे लिए कठिन थी कि वह युग कैसा रहा होगा। मुझे उस समय भी लगा था कि आज प्रोफेसर जो कह रहे हैं कल इन्हें भी कोई याद रखने वाला रहेगा या नहीं क्योंकि यह इतिहास बनाने का भ्रम पाल रहे हैं लेकिन इनका व्यक्तित्व इतिहास में दर्ज होने योग्य भी नहीं है। हुआ भी यही है आज उन्हें कोई याद नहीं करता है उनकी लिखी किताबों के बारे में तो कोई जानता भी नहीं है और जिस साहित्यकार को अपनी लेखनी के द्वारा अमरत्व दिलाने का दावा उन्होंने किया था, वे जरूर एकेडमिक तबके में कभी-कभार याद कर लिए जाते हैं। अमरत्व उनके नाम को भी नहीं मिला।
कुछ साहित्यकारों को यह भ्रम होता है कि उनकी रचना यदि सिलेबस में शामिल हो जाएगी तो वह अमर हो जाएंगे, आने वाली पीढ़ी उन्हें याद रखेगी। जबकि हर पीढ़ी की व्यवस्था अलग होती है। हर पीढ़ी में अपने एक मौलिक विचार विकसित होते हैं। सिलेबस में दर्ज हर बात हमेशा याद नहीं रहती है। परीक्षा उत्तीर्ण करने और उपाधि प्राप्त करने के साथ ही सिलेबस की पुस्तकों के अनेक पन्ने स्मृति से गायब हो जाते हैं। ऐसा होना स्वाभाविक है क्योंकि उन पन्नों में दर्ज़ ज्ञान और विचार व्यवहारिक जीवन के लिए अनुपयोगी हो जाते हैं और अनुपयोगी तत्वों से कोई भी अपना वास्ता नहीं रखना चाहता है, मस्तिष्क भी नहीं। 
    शाश्वत सत्य यही है कि जो आज है वह कल नहीं होगा और जो कल होगा वह परसों नहीं रह जाएगा। समय,परिस्थितियां और विचार परिवर्तनशील होते हैं। कुछ बुनियादी वैचारिक तत्व ही स्थाई रहते हैं जो यह बार-बार याद दिलाते हैं कि जीवन स्थाई नहीं है, सामान्य विचार अथवा कुविचार स्थाई नहीं हैं। यदि कुछ स्थाई है तो वह अच्छे विचार और नश्वरता का स्मरण।
स्वयं को सर्वोच्च और सर्वशक्तिमान मानने वालों को देखते हुए कबीर दास जी का यह दोहा याद आ जाता है-
माटी कहै कुम्हार सों, तू क्या रौंदे मोए।
एक दिन ऐसा होएगा, मैं रौंदूगी तोए।।           -----------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 24.09.2026 को प्रकाशित)  
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Wednesday, September 16, 2026

चर्चा प्लस | श्रीगणेश के हर नाम के पीछे मौजूद है एक रोचक कहानी | डॉ सुश्री शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस 
श्रीगणेश के हर नाम के पीछे मौजूद है एक रोचक कहानी 
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह
                                                              एकदंत, मोहासुरपति, विध्नराज, धूम्रवर्ण, गजानन आदि 108 नाम हैं श्री गणेश के जिन्हें प्रथम पूज्य देवता माना जाता है। जिा देवता का अवतरण ही अत्यंत रोचक ढंग से हुआ हो और जिन्होंने एक अलग ही स्वरूप पाया, ऐसे देव श्रीगणेश के हर नाम के पीछे एक कहानी मौजूद है। ये कहानियां श्रीगणेश के स्वरूप को तो समझाती ही है, साथ ही इस बात से भी आगाह करती हैं कि चाहे कोई व्यक्ति किसी भी रूप, रंग या व्यवसाय को हो उससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है। हर व्यक्ति अपने गुणों के कारण पूज्य बन सकता है।  

हिन्दू संस्कृति में श्रीगणेश एकमात्र ऐसे देवता है जिनका मुख हाथी का तथा शेष शरीर मनुष्यों  अथवा देवताओं जैसा है। उनका यह स्वरूप मानव और वन्यजीवन के बीच घनिष्ठ अटूट संबंधों को दर्शाता है। वन्य पशुओं में हाथी को सबसे अधिक बलशाली, सबसे अधिक बुद्धिमान, सबसे अधिक स्मरणशक्ति वाला तथा सबसे अधिक धैर्यवान माना जाता है। हाथी तब तक किसी पर प्रहार नहीं करता है जब तक कि उसके परिवार अथवा उस पर संकट न आए। हाथी दीर्घायु होता है तथा विशुद्ध शाकाहारी होता है। अलौकिक शक्ति के धनी होते हुए भी श्रीगणेश में समस्त गजतत्व मौजूद हैं। सृष्टि की योग्य कृति मानव तथा वन्य समुदाय की सर्वश्रेष्ठ रचना गज के सम्मिश्रण वाले श्री गणेश की शक्तियों का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। पौराणिक कथा के अनुसार गणेश जी ने ही महाभारत को अबाधगति से लिपिबद्ध किया था।
गजाननं भूतगणादि सेवितं, कपित्थ जम्बूफलसार भक्षितं।
उमासुतं शोक विनाशकारणं, नमामि विघ्नेश्वर पादपंकजं।।
श्रीगणेश के एक नहीं अपितु 108 नाम हैं, जिनका जाप किया जाता है। प्रत्येक नाम का अपना एक अलग महत्व है। जैसे - अखुरथ- जिनके पास रथ के रूप में एक चूहा है, अलमपता- सदा सनातन भगवान, अमितःअतुलनीय प्रभु, अनंतचिद्रुपमयं- अनंत और चेतना-व्यक्तित्व, अवनीश- पूरी दुनिया के भगवान, अविघ्न- सभी बाधाओं को दूर करने वाला, बालगणपति- प्रिय और प्यारा बच्चा, भालचंद्र- चंद्रमा-कलक वाले भगवान, भीम- विशाल और विशाल, भूपति- देवताओं के स्वामी, भुवनपति - जगत के स्वामी, बुद्धिनाथ- ज्ञान के देवता, बुद्धिप्रिया- ज्ञान और बुद्धि को प्यार करने वाले भगवान, बुद्धिविधता- ज्ञान और बुद्धि के देवता, शूपर्णकर्ण- बड़े कान वाले भगवान, शुबनः सर्व मंगलमय प्रभु, शुभगुणकानन- वह जो सभी गुणों का स्वामी है, श्वेता- वह जो सफेद रंग की तरह पवित्र हो, सिद्धिधाता- सफलता और सिद्धियों के दाता, सिद्धिप्रिया- वह जो इच्छाओं और इच्छाओं को पूरा करती है, सिद्धिविनायक- सफलता के दाता, स्कंदपुर्वजा- स्कंद (भगवान मुरुगन) के बड़े भाई, सुमुख- जिसका मुख प्रसन्न है, सुरेश्वरम- सभी प्रभुओं के भगवान, स्वरूप - सौंदर्य के प्रेमी, तरुण- अजेय भगवान, उद्दंड- बुराइयों और दोषों की दासता, उमापुत्र- देवी उमा (पार्वती) के पुत्र, वक्रतुंड - घुमावदार सूंड वाले भगवान, वरगणपति - वरदानों के दाता, वरप्रदा- इच्छाओं और इच्छाओं का दाता, वरदविनायक - सफलता प्रदान करने वाले, वीरगणपति- वीर प्रभु, विद्यावारिधि- ज्ञान और बुद्धि के देवता, विघ्नहर्ता- विघ्नों का नाश करने वाले, विघ्नराज- सभी बाधाओं के भगवान, विघ्नस्वरूप- विघ्नों का रूप धारण करने वाले, विकट- विशाल और राक्षसी, विनायक- सभी लोगों के भगवान आदि।
श्रीगणेश के कुछ नामों की रोचक कथाएं भी देख ली जाएं। ये ही तो हमारी पौराणिक विरासत हैं-

एकदंत की कथा
श्रीगणेश के एकदंत होने की कई कथाएं मिलती हैं-
एक कथा- एक बार विष्णु के अवतार परशुराम शिव से मिलने कैलाश पर्वत पर आए। उस समय शिव ध्यानावस्थित थे तथा वे कोई व्यवधान नहीं चाहते थे। शिवपुत्र गणेश ने परशुराम को रोक दिया और मिलने की अनुमति नही दी। इस बात पर परशुराम क्रोधित हो उठे और उन्होंने श्री गणेश को युद्ध के लिए चुनौती दे दी। श्रीगणेश ने चुनौती स्वीकार कर ली। दोनों के बीच घनघोर युद्ध हुआ। इसी युद्ध में परशुरामजी के फरसे से उनका एक दांत टूट गया।
दूसरी कथा- भविष्य पुराण में कथा है जिसके अनुसार कार्तिकेय ने श्रीगणेश का दन्त तोडा था। श्रीगणेश अपनी बाल अवस्था में अति नटखट हुआ करते थे। एक बार उन्होंने खेल-खेल में अपने ज्येष्ठ भाई कार्तिकेय को परेशान करना शुरू कर दिया। कार्तिकेय को श्रीगणेश पर गुस्सा आ गया और वे गणेश से लड़ पड़े। इसी लड़ाई-झगड़े में गणपति का एक दांत टूट गया।
तीसरी कथा- एक अन्य कथा के अनुसार महर्षि वेदव्यास जी को महाभारत लिखने के लिए किसी बुद्धिमान लेखक की जरुरत थी। उन्होंने इस कार्य के लिए श्रीगणेश को चुना। श्रीगणेश इस कार्य के लिए मान तो गए। पर उन्होंने एक शर्त रखी कि महर्षि वेदव्यास महाभारत लिखाते समय रुकेंगे नहीं और न ही बोलना बंद करेंगे। वेदव्यास ने शर्त स्वीकार कर ली। तब श्री गणेश जी ने अपने एक दांत को तोड़कर उसकी कलम बना ली और उसी से वेद व्यास जी के वचनों पर महाभारत लिखी।
चौथी कथा- गजमुखासुर नामक एक महाबलशाली असुर हुआ जिसने अपनी घोर तपस्या से यह वरदान प्राप्त कर दिया की उसे कोई अस्त्र शास्त्र मार नही सकता। यह वरदान पाकर उसने तीनो लोको में अपना प्रभुत्व जमा लिया। सब उससे भयभीत रहने लगे। तब उसका वध करने के लिए सभी देवताओं ने श्रीगणेश को मनाया। गजानंद ने गजमुखासुर को युद्ध के ललकारा और अपना एक दांत तोड़कर हाथ में पकड़ लिया। गजमुखासुर को अपनी मृत्यु नजर आने लगी। वह मूषक रूप धारण करके युद्ध से भागने लगा। गणेशजी ने उसे पकड़ लिया और अपना वाहन बना लिया।

मोहासुरपति
जब कार्तिकेय ने तारकासुर का वध कर दिया तो दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने मोहासुर नाम के दैत्य को देवताओं को प्रताड़ित करने के लिए भेजा। मोहासुर से मुक्ति के लिए देवताओं ने गणेश की उपासना की। तब गणेश ने महोदर अवतार लिया। महोदर का उदर यानी पेट बहुत बड़ा था। वे मूषक पर सवार होकर मोहासुर के नगर में पहुंचे तो मोहासुर ने बिना युद्ध किये ही गणपति को अपना इष्ट बना लिया। तभी से श्रीगणेश मोहासुरपति कहलाए।

लंबोदर
समुद्रमंथन के समय भगवान विष्णु ने जब मोहिनी रूप धरा तो शिव उन पर मोहित हो गए। भावावेश में उनका स्खलन हो गया, जिससे एक काले रंग के दैत्य की उत्पत्ति हुई। इस दैत्य का नाम क्रोधासुर था। क्रोधासुर ने सूर्य की उपासना करके उनसे ब्रह्मांड विजय का वरदान ले लिया। क्रोधासुर के इस वरदान के कारण सारे देवता भयभीत हो गए। वो युद्ध करने निकल पड़ा। तब गणपति ने लंबोदर रूप धरकर उसे रोक लिया। क्रोधासुर को समझाया और उसे ये आभास दिलाया कि वो संसार में कभी अजेय योद्धा नहीं हो सकता। क्रोधासुर ने अपना विजयी अभियान रोक दिया और सब छोड़कर पाताल लोक में चला गया।

विकट
भगवान विष्णु ने जलंधर के विनाश के लिए उसकी पत्नी वृंदा का सतीत्व भंग किया। उससे एक दैत्य उत्पन्न हुआ, उसका नाम था कामासुर। कामासुर ने शिव की आराधना करके त्रिलोक विजय का वरदान पा लिया। इसके बाद उसने अन्य दैत्यों की तरह ही देवताओं पर अत्याचार करने शुरू कर दिए। तब सारे देवताओं ने भगवान गणेश का ध्यान किया। तब भगवान गणपति ने विकट रूप में अवतार लिया। विकट रूप में भगवान मोर पर विराजित होकर अवतरित हुए। उन्होंने देवताओं को अभय वरदान देकर कामासुर को पराजित किया।

विघ्नराज
एक बार पार्वती अपनी सखियों के साथ बातचीत के दौरान जोर से हंस पड़ीं। उनकी हंसी से एक विशाल पुरुष की उत्पत्ति हुई। पार्वती ने उसका नाम मम (ममता) रख दिया। वह माता पार्वती से मिलने के बाद वन में तप के लिए चला गया। वहीं उसकी भेंट शम्बरासुर से हुई। शम्बरासुर ने उसे कई आसुरी शक्तियां सीखा दीं। उसने मम को गणेश की उपासना करने को कहा। मम ने गणपति को प्रसन्न कर ब्रह्मांड का राज मांग लिया। शम्बर ने उसका विवाह अपनी पुत्री मोहिनी के साथ कर दिया। शुक्राचार्य ने मम के तप के बारे में सुना तो उसे दैत्यराज के पद पर विभूषित कर दिया। ममासुर ने भी अत्याचार शुरू कर दिए और सारे देवताओं के बंदी बनाकर कारागार में डाल दिया। तब देवताओं ने गणेश की उपासना की। गणेश विघ्नराज के रूप में अवतरित हुए। उन्होंने ममासुर का मान मर्दन कर देवताओं को छुड़वाया।

धूम्रवर्ण
एक बार भगवान ब्रह्मा ने सूर्यदेव को कर्म राज्य का स्वामी नियुक्त कर दिया। राजा बनते ही सूर्य को अभिमान हो गया। उन्हें एक बार छींक आ गई और उस छींक से एक दैत्य की उत्पत्ति हुई। उसका नाम था अहम। वह शुक्राचार्य के पास गया और उन्हें गुरु बना लिया। वह अहम से अहंतासुर हो गया। उसने खुद का एक राज्य बसा लिया और भगवान गणेश को तप से प्रसन्न करके वरदान प्राप्त कर लिए। उसने भी बहुत अत्याचार और अनाचार फैलाया। तब गणेश ने धूम्रवर्ण के रूप में अवतार लिया। उनका वर्ण धुंए जैसा था। वे विकराल थे। उनके हाथ में भीषण पाश था जिससे बहुत ज्वालाएं निकलती थीं। धूम्रवर्ण ने अहंतासुर का पराभाव किया। उसे युद्ध में हराकर अपनी भक्ति प्रदान की।

श्रीगणेश अन्य देवताओं की भांति शारीरिक दृष्टि से सुंदर नहीं हैं किन्तु उनकी अपरिमित बुद्धि के कारण उन्हें प्रथमपूज्य देवता का पद प्राप्त है। यही वह बात है जिसे हम मनुष्यों को सीखना चाहिए कि जाति, धर्म, आकार, प्रकार, सुंदरता, असुंदरता का कोई अर्थ नहीं है, यदि किसी चीज का अर्थ है तो वह है सर्वकल्याण। यही तो सत्य मौजूद है श्रीगणेश के स्वरूप में और यही सत्य हमारे जीवन में उनके अस्तित्व को रोचक बनाता है।


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(दैनिक, सागर दिनकर में 16.09.2026 को प्रकाशित) 
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Wednesday, September 9, 2026

चर्चा प्लस | ‘‘हिमालय है तो हम हैं’’- यही तो थीम है हिमालय दिवस की | डॉ सुश्री शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस 
9 सितंबर हिमालय दिवस पर विशेष:
‘‘हिमालय है तो हम हैं’’- यही तो थीम है हिमालय दिवस की
  - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह 
                                                                               कहा जाता है कि धरती पर एक पत्ता भी हिलता है तो नक्षत्रों तक उसका प्रभाव होता है, फिर हिमालय तो इसी पृथ्वी पर है और संकटों से घिरता जा रहा है। हिमालय पर गहराने वाले संकट हमारे अस्तित्व के लिए स्पष्ट चेतावनी हैं। हाल ही में नेपाल में आई बाढ़ इसका ताज़ा उदाहरण है। कभी भूस्खलन तो कभी ग्लेशियर्स के पिघलने से आने वाली बाढ़ हमें निरंतर चेतावनी दे रही है। हिमालय के संरक्षण के प्रति जागरूकता लाने के लिए ही मनाया जाता है ‘‘हिमालय दिवस’’। इसकी इस बार की थीम है-‘‘हिमालय है तो हम हैं’’। इस थीम की गहराई में उतरना जरूरी है।   

युग-युग से है अपने पथ पर,

देखो कैसा खड़ा हिमालय
डिगता कभी न अपने प्रण से
रहता प्रण पर अड़ा हिमालय
जो-जो भी बाधाएं आएं,
उन सबसे ही लड़े हिमालय
इसलिए तो दुनिया भर में,
हुआ सभी से बड़ा हिमालय

- कवि सोहनलाल द्विवेदी की ‘‘हिमालय’’ शीर्षक कविता की ये पंक्तियां हिमालय पर्वत की विशालता, अडिगता एवं उपादेयता का सम्मानजनक वर्णन करती है। मात्र काव्यात्मक नहीं बल्कि भौगोलिक रूप से हिमालय हमारे देश के लिए गहन पर्यावरणीय महत्व रखता है। हम भारतवासियों को ही नहीं अपितु समूची दुनिया को इसकी उच्चता और विशालता पर गर्व रहा है। हिमालय की उच्चतम चोटी तक पहुंचने की चुनौती ने हमेशा पर्वतारोहियों को आकर्षित किया है। आज हमारा यही हिमालय जलवायु परिर्वतन के संकट से जूझ रहा है। पृथ्वी के बढ़ते हुए तापमान ने जिस प्रकार दुनिया के सभी तत्वों को प्रभावित करना शुरू कर दिया है, उसी प्रकार हिमालय के ग्लेशियर्स भी उस तापमान के कारण अपनी स्थिरता को अपेक्षाकृत तेजी से खो रहे हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार अभी हाल ही में नेपाल में आई भूस्खलन वाली बाढ़ का मूल कारण ग्लेशियर्स का तेजी से पिघलना ही था। हिमालय पर जमी बर्फ हवाओं के मापमान को नियंत्रित कर के ऋतुओं में परिवर्तन लाती है। इस बर्फ का असमय पिघलने लगना ऋतुओं के पैटर्न को भी प्रभावित करने लगा है।
हिमालय दिवस प्रतिवर्ष 9 सितंबर को मनाया जाता है। इस दिवस की पहली बार आधिकारिक घोषणा उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत द्वारा सन 2014 में की गई थी। यह दिवस घोषित करने का उद्देश्य था हिमालय के पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण के बारे में जागरूकता बढ़ाना। इसके पीछे कारण था सन 2010 की अचानक आई बाढ़ और 2013 की केदारनाथ त्रासदी जैसी भीषण प्राकृतिक आपदा। इनके बाद पहाड़ों की बढ़ती पारिस्थितिक संकट के प्रति सभी का ध्यान आकर्षित करने तथा जागरूकता लाने के लिए ‘‘हिमालय दिवस’’ घोषित किया गया।

हिमलय प्राचीनतम भू-संरचनाओं में से एक है। इस विशाल पर्वत श्रृंखला का निर्माण लगभग 40 से 50 मिलियन वर्ष पहले शुरू हुआ था, जब टेक्टानिक प्लेटों की गति के कारण दो बड़े भू-भाग, भारतीय भूभाग और यूरेशिया, आपस में टकरा गए थे और हिमालय का उदय हुआ था। प्राचीन भारतीय ग्रंथों में हिमालय का उल्लेख मिलता है। शिवपुराण में हिमालय को जहां शिवस्थली कहा गया है वहीं उसे देवी पार्वती के के पिता के रूप में भी वर्णित किया गया है। भारतीय संस्कृति में हिमालय सदा ही पूज्य रहा है। किन्तु मानवीय लालच एवं लापरवाहियों के कारण हिमालय संकट के कगार पर आ पहुंचा है। इसीलिए इस वर्ष के लिए थीम रखी गई है-‘‘हिमालय है तो हम हैं’’। यह थीम संकट की गंभीरता को दर्शाती है।

हिमालय उपमहाद्वीप के लिए एक प्राकृतिक जलवायु अवरोधक के रूप में कार्य करता है और मौसम के पैटर्न को नियंत्रित करता है। इन पहाड़ों में अद्वितीय वनस्पतियां, जीव-जंतु और प्रमुख नदी प्रणालियां मौजूद हैं जो लाखों लोगों की आजीविका का सहारा हैं। इन सभी पर संकट का अर्थ है हिमालय पर संकट। इसीलिए हिमालय दिवस पर आयोजित होने वाले कार्यक्रम हिमालय के पर्वतीय क्षेत्रों में खराब शहरी नियोजन, वनों की कटाई, प्लास्टिक प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ते भूस्खलन जैसी समस्याओं से निपटने पर केंद्रित रहते हैं।
हिमलय पर गहराते जलवायु संकट से निपटने के लिए ठोस योजनाएं बनाई गई हैं जिनका सही क्रियान्वयन हिमालय के अस्तित्व को बचाए रख सकता है। दशकों से भारतीय हिमालयी क्षेत्र में विकास ने पहाड़ों को बाधाओं के रूप में या मानकीकृत किए जाने वाले भूदृश्यों के रूप में माना है। लेकिन हिमालय न तो एकसमान है और न ही सुगम है। इसकी भौगोलिक विविधता एवं महत्ता को ध्यान में रखते हुए ‘‘विश्व पृथ्वी दिवस 2026’’ को एक श्वेत पत्र जारी किया गया था जिसमें कहा गया था कि हिमालय में संकट केवल पर्यावरणीय ही नहीं बल्कि व्यवस्थागत भी है। जलवायु परिवर्तन के पैटर्न में बदलाव, जल प्रणालियों की अनिश्चितता और शासन व्यवस्था के खंडित रहने के कारण यह क्षेत्र एक नाजुक मोड़ पर खड़ा है। रिपोर्ट में अधिक डेटा या तीव्र विस्तार की मांग नहीं की गई है, बल्कि पहाड़ों के साथ हमारे सोचने, योजना बनाने और निर्माण करने के तरीके में मौलिक बदलाव की बात कही गई। ‘‘हिमालय का भविष्य: विकास और लचीलेपन पर पुनर्विचार’’ शीर्षक वाली यह रिपोर्ट, सीपी कुकरेजा फाउंडेशन फॉर डिजाइन एक्सीलेंस द्वारा भारतीय हिमालयी क्षेत्र में व्याप्त व्यवस्थागत संकटों के समाधान हेतु प्रस्तुत की गई थी। इंजीनियरिंग, पारिस्थितिकी, शासन और सामाजिक विज्ञान के विशेषज्ञों की भागीदारी वाली हिमालयी गोलमेज सम्मेलन से प्राप्त अंतर्दृष्टियों पर आधारित इस रिपोर्ट में यह स्पष्ट शब्दों में कहा गया था कि हिमालय क्षेत्र एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है जहां पारंपरिक विकास मॉडल अब व्यवहारिक नहीं रह गए हैं।
इस श्वेत पत्र में हिमालयी क्षेत्र के महत्व पर बल दिया गया। इस ओर भी ध्यान दिलाया गया कि हिमालय वैश्विक आबादी के लगभग एक चैथाई हिस्से, यानी लगभग दो अरब लोगों को सीधे तौर पर प्रभावित करता है, जो जल, खाद्य सुरक्षा और पारिस्थितिक संतुलन के लिए इस क्षेत्र पर निर्भर हैं। इसमें क्षेत्र में विकास और लचीलेपन के पुनर्मूल्यांकन की तत्काल आवश्यकता पर प्रकाश डाला गया है। विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ तर्क देते हैं कि वर्तमान अवसंरचना और शहरी विकास अक्सर पारिस्थितिक सीमाओं और भूवैज्ञानिक अस्थिरता की अनदेखी की गई है। इस रिपोर्ट में जलवायु परिवर्तन, बदलते जलवैज्ञानिक पैटर्न और खंडित शासन व्यवस्था के कारण उत्पन्न व्यवस्थागत विफलताओं और बढ़ते आपदा जोखिमों पर विस्तार से प्रकाश डाला गया। एक सतत भविष्य सुनिश्चित करने के लिए, इसमें एकीकृत, डेटा-आधारित नियोजन की ओर संक्रमण का प्रस्ताव रखा गया, जो जलक्षेत्र की सीमाओं का सम्मान करता है और स्थानीय सांस्कृतिक ज्ञान को समाहित करता है। यह मानकीकृत इंजीनियरिंग से हटकर संदर्भ-विशिष्ट डिज़ाइन की ओर बढ़ने का आह्वान करता है जिसमें दीर्घकालिक पर्यावरणीय स्थिरता को प्राथमिकता दी गई है।
रिपोर्ट का मूल सिद्धांत यह है कि हिमालय को अलग-थलग पारिस्थितिक या इंजीनियरिंग समस्याओं के समूह के बजाय एक परस्पर जुड़ी प्रणाली के रूप में समझा जाना चाहिए। वैज्ञानिकों ने इस ओर ध्यान दिलाया कि यद्यपि क्षेत्र के भूविज्ञान और जलविज्ञान के ज्ञान में विस्तार हुआ है, फिर भी जमीनी स्तर पर परिणाम असंगत और अक्सर विनाशकारी हुए हैं। 2013 और 2023 के बीच हुई गंभीर घटनाओं, जैसे कि केदारनाथ बाढ़, चमोली आपदा और जोशीमठ का धंसना, को असामान्य ही घटना नहीं, बल्कि मानवीय हस्तक्षेप और भू-दृश्य की अंतर्निहित संवेदनशीलता के बीच संरचनात्मक असंतुलन के अनुमानित परिणामों के रूप में देखा गया है। जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा और बाढ़ के पूर्व पैटर्न अब भविष्य की स्थितियों का पूर्वानुमान नहीं लगा सकते। 1950 के दशक से वर्षा की तीव्रता में लगभग 15 से 20 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, और कम समय में भारी वर्षा होना अब आम बात हो गई है।
हिमालय की भौगोलिक संरचना में परिवर्तन उसके साथ की जा रही छेड़छाड़ है। हिमालय में 70 प्रतिशत से अधिक सड़कें पहाडियों को काटकर बनाई जाती हैं, जिनमें ढलान को स्थिर करने के लिए उचित उपाय नहीं किए जाते। ढलान गिरने की कई घटनाएं पानी के कारण होती हैं। जब निर्माण कार्य प्राकृतिक जल निकासी को अवरुद्ध कर देता है, तो पानी जमा हो जाता है, मिट्टी में दबाव बढ़ जाता है और भूस्खलन हो जाता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि पर्वतीय क्षेत्रों में, जल प्रवाह का प्रबंधन संरचना से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।

पर्वतीय क्षेत्र में वन एक आवश्यक प्राकृतिक संरचना के रूप में कार्य करते हैं और भूस्खलन के खतरे को 30 से 40 प्रतिशत तक कम कर सकते हैं। यद्यपि जनसंख्या के बदलते पैटर्न इन भू-भागों पर असमान दबाव डाल रहे हैं। लोग उच्च ऊंचाई वाले क्षेत्रों से दूर जा रहे हैं, जबकि निचले इलाकों में स्थित शहर अधिक भीड़-भाड़ वाले होते जा रहे हैं।

पर्यटन को भी हिमालय के पर्यावरण को क्षति पहुंचाने वाला कारण माना गया है। शिमला और मनाली जैसे स्थानों में मौसमी जनसंख्या वृद्धि वहां की स्थायी जनसंख्या से पांच से दस गुना अधिक होती है। इससे अपशिष्ट उत्पादन स्थानीय प्रणालियों की क्षमता से दो से तीन गुना अधिक हो जाता है। रिपोर्ट में दबाव कम करने और अधिक संतुलित आर्थिक अवसर पैदा करने के लिए पर्यटन को विभिन्न क्षेत्रों में फैलाने का सुझाव दिया गया है।
हिमालय भारतीय उपमहाद्वीप की जलवायु और करोड़ों लोगों को जीवनदायिनी जल संसाधन प्रदान करता है। हिमालय को ‘‘एशिया का जल स्तंभ’’ कहा जाता है। यह भारत की जलवायु और पर्यावरण को प्रभावित करने वाली सबसे महत्वपूर्ण भौगोलिक विशेषताओं में से एक है। उत्तरी भारत और पड़ोसी देशों में फैली यह विशाल पर्वत श्रृंखला मौसम के पैटर्न को नियंत्रित करने, नदी प्रणालियों को बनाए रखने, कृषि को सहारा देने और जैव विविधता को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। हिमालय का महत्व केवल इसके मनमोहक दृश्यों तक ही सीमित नहीं है। यह क्षेत्र मीठे पानी की आपूर्ति, पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने और कृषि उत्पादकता को बढ़ावा देकर लाखों लोगों के जीवन को प्रभावित करता है। यह क्षेत्र जैविक और आनुवंशिक विविधता का समृद्ध भंडार भी है, जो इसे वैज्ञानिक अनुसंधान और जैव प्रौद्योगिकी के लिए अत्यंत मूल्यवान बनाता है। यद्यपि जलवायु परिवर्तन और मानवीय गतिविधियों के कारण हिमालय लगातार पर्यावरणीय दबावों का सामना कर रहा है। बढ़ते तापमान, ग्लेशियरों का पिघलना, पर्यावासों का क्षरण और चरम मौसम की घटनाएं इस नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र को बदल रही हैं। भारत में पर्यावरणीय स्थिरता और जलवायु परिवर्तन से निपटने की क्षमता सुनिश्चित करने के लिए हिमालय की भूमिका और उसके सामने आने वाली चुनौतियों को इस बार हिमालय दिवस पर समझना अत्यंत आवश्यक है।
एवरेस्ट विजेता सर एडमंड हिलेरी ने कहा था-‘‘हिमालय मैंने जैसे तुम्हें देखा है, तुम सदा वैसे ही रहना।’’        
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(दैनिक, सागर दिनकर में 09.09.2026 को प्रकाशित) 
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Wednesday, September 2, 2026

चर्चा प्लस | कृति सेनन के ब्रालेट से ज्यादा चिंता करिए प्राकृतिक चेतावनी की | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  

कृति सेनन के ब्रालेट से ज्यादा चिंता करिए प्राकृतिक चेतावनी की
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह 


        एक कामर्शियल विज्ञापन में अभिनेत्री कृति सेनन के ब्रालेट पहनने पर पक्ष और विपक्ष में जितनी तलवारें खिंची यदि उसकी आधी भी बहस प्राकृति संकट को ले कर होती तो नेपाल जैसी विभीषिका से बचा जा सकता था। हम इंसानों के द्वारा प्रकृति के असंतुलित दोहन से स्थितियां दिन पर दिन बदतर हो रही हैं। जोशी मठ हासदे से ले कर हाल ही में नेपाल में आई कीचड़ की बाढ़ ने जता दिया कि प्रकृति नाराज़ है और वह बार-बार चेतावनी दे रही है किन्तु हमारी वर्तमान राष्ट््रीय चिंता तो एक विज्ञापन में पहना गया ब्रालेट है। विज्ञापन को नकारने के बजाए उसे पूरी पब्लीसिटी देना गोया राष्ट््रीय कर्तव्य है। क्या 903 लोगों की मौतें और चार हजार से अधिक लोगों का लापता हो जाना मामूली बात है? जबकि अभी संकट की दस्तक मात्र है।         

ज़लज़ला आया और आ के हो गया रुख़सत मगर
वक़्त  के रुख़  पे  तबाही की इबारत लिख गया।
     - शायर फ़राज़ हामिदी का यह शेर जोशीमठ से नेपाल तक की आपदा की पीड़ा को बाखूबी बयां करता है।
       मुझे याद आ रही है एक कहानी जो मैंने प्रायमरी स्कूल के दौरान पढ़ी थी। सिलेबस में या सिलेबस के बाहर, यह याद नहीं है। बहुत सोचा लेकिन उस कहानी के लेखक का नाम याद नहीं आ रहा है। सो, यदि किसी को लेखक का नाम पता हो तो मुझे जरूर बताने का कष्ट करे। उस कहानी का कथानक और शिल्प इतना प्रभावी था कि कहानी आज भी मुझे याद है। यह कहानी सन् 1935 में क्वेटा में आए भीषण भूकंप की चर्चा पर आधारित थी। क्वेटा पहले भारत का हिस्सा था लेकिन अब पाकिस्तान में है और बलूचिस्तान प्रांत की राजधानी है। कहानी का सारांश यह था कि कपड़ा बेचने वाला एक दूकानदार अपने दूकान में दूकानदारी कर रहा है। वह ग्राहकों को कपड़ा दिखाता है और उनसे क्वेटा में हुई जान-माल की हानि के बारे में प्रश्न करता जाता है। वह एक प्रश्न करता है कि कैसा कपड़ा चाहिए? तो उसका दूसरा प्रश्न होता है कि क्वेटा में कितने लोग मारे गए? फिर वह कपड़े की खूबियां बताता है और साथ में पूछता है कि वहां तो सब कुछ बर्बाद हो गया होगा? इसी प्रकार पह कपड़ा बेचते हुए वह अपने ग्राहकों से क्वेटा में आए भूकंप की भीषणता की चर्चा करता है, जानकारी लेता है और अपनी चिंता व्यक्त करता है। भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदा और मानवीय जीवन संबंधी विवशताओं के समीकरण पर यह अद्भुत कहानी थी। लेकिन आज स्थिति इससे दुखद हो गई है। आज भूकंप के खतरे बढ़ गए हैं लेकिन हमारे सरोकार प्रकृति को ले कर वर्तमानजीवी हो गए हैं। आज बाढ़ें भयावह रूप लेती जा रही हैं। लेकिन इस बारे में चिंता करने के बजाय कृति सेनन के ब्रालेट की चिंता में समय खपाना जागरूकता की निशानी बन गया है। एक पक्ष इसे भारतीय संस्कृति की तौहीन बता रहा है तो दूसरा पक्ष इसे स्त्री की आजादी से जोड़ कर इसकी पैरवी कर रहा है। सोशल मीडिया कृति सेनन और कंगना रनौत की कम और पूरे कपड़ों के साथ टांके गए पोस्टों से भारा पड़ा है। इक्का-दुक्का पोस्ट नेपाल के हादसे पर भी दिख जाती है गोया कुछ लोग स्वयं को जागरूक दिखाना चाहते हैं। अन्यथा इस तरह की आपदा की जड़ तक पहुंचने में भला किसको दिलचस्पी है? 
6 फरवरी 2023 को जब टर्की में विनाशकारी भूकंप आया था तब मुझे एक आश्चर्यजनक व्यवहार का सामना करना पड़ा था। भूकंप की खबर पढ़ने के बाद जब मैंने अपने परिचित से चर्चा की कि टर्की में कितना विनाशकारी भूकंप आया है तो पहले तो उन्होंने अनभिज्ञता प्रकट की जब कि भूकंप की ख़बरों से टीवी और मोबाईल अपडेट भरे हुए थे। फिर भी उन्हें पता नहीं था। खैर, मैंने उन्हें बताया कि भूकंप की तीव्रता 7.8 रिक्टर स्केल थी। लेकिन उन्होंने मेरी बात को अनसुना करते हुए पूछा कि टर्की तो मुस्लिम देश है न? मैं उनका प्रश्न सुन कर अवाक रह गई थी। भूकंप में मरने वाले मनुष्य थे, हिन्दू या मुस्लिम तो बाद की बात है। इसके बाद मुझे समझ में नहीं आया था कि मैं उस उच्च शिक्षित (?) व्यक्ति से टर्की के भूकंप के बारे में आगे क्या बात करूं? फिर भी मैंने खुद को तसल्ली दी और चर्चा को भूकंप पर केन्द्रित किया। तो इस पर वे लापरवाही से बोले कि हां, अभी महाराष्ट्र में भूकंप आया था लेकिन अपने यहां सागर में कोई ख़तरा नहीं है। मैंने पूछा था कि आप इतने दावे से कैसे कह सकते हैं कि यहां कभी भूकंप नहीं आएगा? तो उन्होंने उत्तर दिया कि यहां न तो कोई बड़ी नदी है और कोई बड़े पहाड़। उनके इस ज्ञान ने मुझे उन्हें याद दिलाने को मजबूर कर दिया कि हम जिस ठोस जमीन पर रह रहे हैं वह टेक्टोनिक प्लेट्स पर टिकी हुई है और ये प्लेट्स भू-केन्द्र के तरल पदार्थ पर तैर रही हैं। फिर मैंने उन्हें याद दिलाया कि जब-जब जबलपुर में भूकंप के झटके आए हैं तब-तब उसकी तरंगे हमारे सागर शहर की भूमि को भी मामूली स्तर पर हिला चुकी हैं।
भूकंप के जिस ज्ञान को हम अपनी छोटी कक्षाओं में अर्जित कर चुके हैं उन्हें बड़े हो कर कैसे भूलते जा रहे हैं? यह सोच कर आश्चर्य होता है। आज हमें सोने (गोल्ड) के भाव के उतार-चढ़ाव की चिंता रहती है लेकिन प्रकृति को अपने द्वारा पहुंचाए जा रहे नुकसान की चिंता नहीं रहती है। जबकि सोना हमें सुख दे सकता है पर जीवन नहीं। राजा मिडास की कहानी ने यही तो समझाया था हमें। जिसने राजा मिडास की कहानी सुनी होगी उसे याद होगा कि राजा मिडास ने भगवान से वरदान मांगा कि वह जिस चीज को छुए वह सोने की हो जाए। मिडास ने अपना महल, सिंहासन, पेड़-पौधे अब को छू-छू कर सोने का बना लिया। यहां तक कि जब उसने अपनी पत्नी, अपनी बेटी को छुआ तो वे भी सोने की मूर्ति में बदल गईं। फिर उसे जब भूख लगी और वह खाने बैठा तो हाथ लगाते ही भोजन सोने में बदल गया। पानी भी सोने में बदल गया। जब भूख-प्यास से प्राण निकलने की नौबत आ गई तब कहीं जा कर राजा मिडास को अपनी भूल का अहसास हुआ। लेकिन तब तक पहुत देर हो चुकी थी। जाने-अनजाने हम भी राजा मिडास की तरह प्रकृति को भूल कर लालच की ओर तेजी से बढ़ते जा रहे हैं। स्थिति यह है कि हम जिस डाल पर बैठे हैं उसी को जड़ से काटते जा रहे हैं। भूकंप की बढ़ती संख्या और बढ़ती तीव्रता उसी का दुष्परिणाम है जो हमने प्रकृति को क्षति पहुंचाई है। हमने पेड़ काटे, जंगल छोटे कर दिए, भूमि से उसकी नमी सोख ली, भूमि पर मिट्टी का ठहराव घटा दिया। बड़े-बड़े बांध बना कर स्थिर और ठोस जमीन को लहरों वाले तरल पानी से भर दिया। गगनचुंबी इमारतों के जंगल खड़े कर दिए, यह ठीक से जांचे बिना कि वहां की भूमिगत चट्टानें उन इमारतों का बोझ उठा सकती हैं या नहीं? नए सरकारी नियम हैं कि भूकंप सुरक्षित भवन बनाए जाएं लेकिन सच्चाई किसी से छिपी नहीं है कि इसका पूरी तरह से पालन बहुत कम होता है। जैसे नियम बनाया गया था कि नए भवनों पर रूफ वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम बनाया जाए लेकिन गोया हम मान कर चलते हैं कि नियम बस्तों में बंधे रहने के लिए होते हैं। टर्की तो एक विकसित देश है। वहां आधुनिक संसाधन अपनाए जाते हैं। फिर भी वहां की मल्टीस्टोरी इमारतें भूकंप की 7.8 की तीव्रता नहीं झेल सकीं थीं। तो हमारा क्या होगा जब हमें इस तीव्रता का भूकंप झेलना पड़ेगा?
तुर्की और सीरिया में आए विनाशकारी भूकंप से दोनों देशों के कई शहरों में भारी तबाही हुई थी। रिक्टर पैमाने पर भूकंप की तीव्रता 7.8 मापी गई और इससे हजारों लोगों के मारे गए थे। तुर्की दुनिया के सबसे सक्रिय भूकंप क्षेत्रों में से एक है। भारत की स्थिति भी उससे अलग नहीं है। चाहे भारत हो या नेपाल हो बड़े बांधों से पैदा होने वाले संकट को अनदेखा करना, ग्लेशियर्स के तेजी से पिघलने को अनदेखा करना ही हमें विनाश का आईना दिखा देगा। नेपाल में आया ‘‘मड फ्लड’’ अर्थात कीचड़ की बाढ़ के पीछे असली कारण ग्लेशियर्स पिघलने से अचानक जलस्तर बढ़ना था। ग्लेशिर्यस क्यों तेजी से पिघल रहे हैं? क्योंकि पृथ्वी का तापमान निरंतर बढ़ रहा है, क्योंकि इससे मौसम के पैटर्न में तेजी से बदलाव हो रहा है। दुख की बात ये है कि यह सब हमारे संज्ञान में है, फिर भी प्रकृति को चोट पहुंचाने से हम बाज नहीं आ रहे हैं। 
मां पहले प्यार से समझाती है। फिर भी बच्चा तोड़-फोड़ करने को उतारू रहता है तो मां विवश हो कर उस पर हाथ उठाती है ताकि वह सुधर जाए। भूकंप के रूप में धरती माता हमें बार-बार चेतावनी दे रही है कि विकास के नाम पर प्रकृति से खिलवाड़ करना बंद करो। लेकिन हम उनकी चेतावनी को लगातार अनसुना कर रहे हैं। अक्टूबर 2021 में उत्तराखंड के जोशीमठ शहर के कुछ घरों में पहली बार दरारें दिखाई दीं। एक साल बाद, 11 जनवरी तक, शहर के सभी नौ वार्डों में 723 घरों के फर्श, छत और दीवारों में बड़ी या छोटी दरारें दिखने लगीं। कई घरों में पोल उखड़ गए। जवाब में, शहर के भीतर कई परिवारों को अस्थायी रूप से सुरक्षित स्थानों पर ले जाया गया है। लेकिन बेहतर होता कि आपदा की आहटें पहले ही सुन ली गई होतीं।
वैज्ञानिकों ने हमेशा इस ओर ध्यान दिलाया और चेतावनी भी दी। प्रसिद्ध स्विस भूविज्ञानी अर्नोल्ड हेम और उनके सहयोगी ऑगस्टो गैस्टर ने 1936 में मध्य हिमालय की भूवैज्ञानिक संरचना पर पहला अभियान चलाया, तो उन्होंने अपना यात्रा वृतांत ‘‘द थ्रोन ऑफ द गॉड्स (1938)’’ और शोध कार्य ‘‘सेंट्रल हिमालय: जियोलॉजिकल द ऑब्जर्वेशन’’ रिकॉर्ड किया। स्विस अभियान 1936 (1939) ने विवर्तनिक दरारों, मुख्य केंद्रीय दोष (एमटीसी) की उपस्थिति की पहचान की, और चमोली गढ़वाल में हेलंग से तपोवन तक के क्षेत्र को भूगर्भीय रूप से संवेदनशील बताया। मध्य हिमालय के भूविज्ञान पर अनुसंधान और अध्ययन आगे बढ़े इसके बाद 1976 में ‘‘मिश्रा समिति’’ ने भी अध्ययन कर जोशीमठ को संवेदनशील घोषित कर इलाज के सुझाव दिए। सन 2022 में उत्तराखंड सरकार के आपदा प्रबंधन विभाग ने भी जोशीमठ पर मंडरा रहे खतरे की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित किया था। इन तमाम चेतावनियों के बाद भी जोशीमठ को बचाने की कोशिश नहीं की गई, बल्कि वहां बड़ी-बड़ी इमारतों का जंगल उगता चला गया। बढ़ती जनसंख्या के कारण जोशीमठ के गर्भ में उतरता रहा। आज जोशीमठ उसी दलदल पर असहनीय बोझ तले दबकर अलकनन्दा की ओर सरक रहा है।
6 फरवरी को टर्की में आए भूकंप में भी लगभग यही बात सामने आई थी कि वैज्ञानिकों ने पहले ही चेतावनी दी थी। बल्कि नीदरलैंड के शोधकर्ता वैज्ञानिक फ्रेंक होगरबीट्स ने 3 फरवरी 2023 को एक ट्वीट कर के लिखा था कि निकट भविष्य में, दक्षिण-मध्य तुर्की, जॉर्डन, सीरिया, लेबनान में 7.5 तीव्रता का भूकंप आएगा। अपने ट्वीट के साथ उन्होंने भूकंप का केंद्र दिखाते हुए एक नक्शा भी शेयर किया था। उनकी बात सही निकली। बल्कि उनकी चेतावनी से दशमलव तीन प्रतिशत अधिक का यानी 7.8 तीव्रता का भूकंप आया। 
यदि बात करें भारत की तो सितंबर 2019 में, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनएमडीए) ने एक भूकंप आपदा जोखिम सूचकांक (एड्री) रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसमें महानगरों और भूकंपीय क्षेत्र जोन चार और जोन पांच के शहरों सहित 50 शहरों पर विशेष रूप से ध्यान दिया गया था। सर्वेक्षण किए गए शहरों में से 30 शहर (दिल्ली सहित) मध्यम स्तर के जोखिम पर हैं और 13 (शिमला सहित अधिकतर हिमालयी शहर) उच्च जोखिम पर हैं। लेकिन साथ में यह भी कहा गया कि दिल्ली को भी एक बड़े जोखिम का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि अधिकांश शहर स्व-निर्मित है। बिना तकनीकी इनपुट के जो इसे उच्च तीव्रता वाले भूकंपों के प्रति संवेदनशील बनाता है।


नेपाल की ओर से बह कर आने वाली नदियां हों या चीन से उतरने वालीं, भारत के लिए संकट पैदा करने में सक्षम है। नेपाल आपदा के बाद यह आशंका जताई भी गई थी कि कहीं चीने को अपने दो बंाधों ये यदि बंधान खोले तो और अधिक भयावह स्थिति का सामना करना पड़ेगा। इस गंभीर समाचार पर कितने लोगों ने ध्यान दिया? शायद गिनती के लोगों ने। अधिकांश का सरोकार तो ब्रालेट पहनी अभिनेत्री के विज्ञापन से था। उन्हें संस्कृति की चिंता थी जिसे उस विज्ञापन को अनदेखा कर के, उसे अप्रभावकारी साबित कर के भी संस्कृति के पक्ष में खड़ा हुआ जा सकता था। जबकि कोई भी संस्कृति तभी तक है जब तक उस संस्कृति के लोग सुरक्षित हैं और जीवित हैं। अतः पहली और प्रखर चिंता होनी चाहिए थी प्राकृतिक आपदा की, बालेट की नहीं। 
दरअसल हमने प्रकृति को निरंतर नुकसान पहुंचा कर उसे अशांत कर दिया है। हम भूगर्भीय हलचलों को रोक नहीं सकते, लेकिन ग्लेशिर्य के पिघलने की गति को कम कर सकते हैं। इस तरह प्रकृति को संरक्षित कर के नुकसान की तीव्रता को कम कर सकते हैं। बशर्तें हम समय रहते सचेत हो जाएं और प्रकृति द्वारा दी जा रही चेतावनियों पर ध्यान देना शुरू कर दें। यदि हमें किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा से बचना है तो हमें प्रकृति-मित्र बनना होगा। प्रकृति की चिंता करनी होगी।                                                        -----------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 02.09.2026 को प्रकाशित) 
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Wednesday, August 26, 2026

चर्चा प्लस | साहित्य में इतिहास को पिरोने में माहिर थे आचार्य चतुरसेन शास्त्री | सागर दिनकर


चर्चा प्लस
26 अगस्त, जन्मदिवस विशेष:

साहित्य में इतिहास को पिरोने में माहिर थे आचार्य चतुरसेन शास्त्री
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह 
      
‘‘वैशाली की नगर वधू’’ जैसा ऐतिहासिक उपन्यास लिखने वाले आचार्य चतुरसेन शास्त्री का नाम हिन्दी साहित्य के इतिहास में सुनहरे अक्षरों से दर्ज़ है किन्तु हिन्दी से दूर होती नवोदित पीढ़ी उनके नाम का भी स्मरण नहीं रख पा रही है। आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने उपन्यासों के अलावा उन्होंने विपुल मात्रा में कहानियाँ भी लिखी हैं, साथ ही गद्य-काव्य के अतिरिक्त धर्म, राजनीति, इतिहास, समाजशास्त्र, स्वास्थ्य और चिकित्सा जैसे विषयों पर महत्वपूर्ण लेखन किया। इसके साथ ही नाटक, एकांकी, आत्मकथा जैसी विधाओं में भी कलम चलाई। 26 अगस्त 1891 को जन्में आचार्य चतुरसेन शास्त्री के साहित्यिक योगदान को सदा याद रखा जाना चाहिए तभी हिन्दी साहित्य की वास्तविक वैचारिक समृद्धि से परिचित हो सकेंगे। 
 


आचार्य चतुरसेन शास्त्री का जन्म 26 अगस्त 1891 को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के चाँदोख ग्राम में हुआ था। बचपन में उनका नाम चतुर्भुज रखा गया। उनके पिता का नाम केवलराम वर्मा और माता का नाम नन्हीं देवी था। उनके पिता चाहते थे कि पुत्र चतुरसेन चिकित्सा के क्षेत्र में नाम कमाएं। सिंकदराबाद से आरंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद चतुरसेन शास्त्री ने जयपुर के संस्कृत कॉलेज से आयुर्वेद में आचार्य और संस्कृत में शास्त्री की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने अपने कार्य जीवन का आरंभ एक आयुर्वेदिक चिकित्सक के रूप में किया था और कुछ समय एक धर्मार्थ औषधालय में 25 रुपए मासिक वेतन पर नौकरी भी की। बाद में उनकी नियुक्ति डी.ए.वी कॉलेज, लाहौर में आयुर्वेद के प्राध्यापक के रूप में हो गई, लेकिन प्रबंधन से उनकी बन नहीं सकी और उन्होंने कुछ वर्षों बाद ही त्यागपत्र दे दिया। अब वह अजमेर चले गए जहाँ अपने ससुर के औषधालय में सहयोग करने लगे। मरीजों को देखने के साथ ही उनका साहित्य प्रेम घटने के बजाए बढ़ता गया। यूं भी वे किशोरावस्था से ही लेखन करने लगे थे। वस्तुतः शिक्षा समाप्त होने के बाद उन्होंने दिल्ली में आयुर्वेदिक चिकित्सक के रूप में अभ्यास शुरू किया, लेकिन वह सफल नहीं रहे और उन्हें दुकान बंद कर दी। आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो गई कि उनकी पत्नी के गहने तक गिर गए। गुजरात के लिए उन्होंने एक धर्मार्थ औषधालय में 25 रुपये प्रतिमाह वेतन पर काम किया। सन 1917 में वे डीएवी कॉलेज, लाहौर में आयुर्वेद के वरिष्ठ प्रोफेसर बने, लेकिन प्रबंधन के असहयोग के कारण उन्होंने छोड़ दिया और अजमेर चले गए।  अजमेर में दोस्तों के यहाँ रहते हुए उन्होंने लिखना शुरू कर दिया। बाद में दिल्ली में उन्होंने लंबे समय तक चिकित्सा कार्य (सन् 1936 से अभ्यास की) और विपुल मात्रा में ऐतिहासिक और वैज्ञानिक रचनाएँ लिखीं, जिससे उन्हें प्रसिद्धि मिली।

उनका निजी जीवन कई उतार-चढ़ाव से भरा रहा। एक के बाद एक तीन पत्नियों के असामयिक देहांत ने मन को आहत रखा था तो लेखन में यश पा सकने की पीड़ा से भी गुजरते रहे थे। चैथे विवाह के बाद उनके जीवन में पुनः कुछ स्थिरता आई और उन्होंने अपनी कृति ‘वैशाली की नगरवधू’ लिखकर पूरी की। यह कृति उनके लिए स्थायी यश कारण बनी। इसके साथ ही उनके एक नए लेखक रूप का उभार हुआ और वह एक उपन्यासकार के रूप में समादृत हुए।
ऐतिहासिक विषय-वस्तु के उनके उपन्यास अपनी श्रेणी में विशिष्ट स्थान रखते हैं।

आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा रचित ‘‘वैशाली की नगरवधू’’ हिंदी साहित्य का एक अत्यंत प्रसिद्ध और प्रामाणिक ऐतिहासिक उपन्यास है। इस उपन्यास की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं। यह उपन्यास ईसा पूर्व छठी शताब्दी के बौद्ध काल, मगध साम्राज्य और लिच्छवि गणराज्य (वैशाली) की पृष्ठभूमि पर आधारित है। इसमें प्राचीन भारत की राजनीति, संस्कृति और समाज का जीवंत चित्रण किया गया है। सशक्त एवं प्रधान चरित्र आम्रपाली (अम्बपाली) उपन्यास का मुख्य केंद्र बिंदु वैशाली की नगरवधू और लोक-सुंदरी आम्रपाली का चरित्र है। आम्रपाली केवल सौंदर्य की प्रतीक नहीं है, बल्कि वह स्वाभिमान, आत्मबल, और त्याग की साक्षात मूर्ति के रूप में उभरती है। इस उपन्यास में तत्कालीन समाज के आंतरिक संकट, वज्जि गणतंत्र के कानूनों तथा बिंबसार, अजातशत्रु जैसे राजाओं की महत्वाकांक्षाओं का यथार्थवादी वर्णन है। उपन्यास में बौद्ध धर्म और जैन धर्म के उदय, तथा भगवान बुद्ध व महावीर स्वामी के समाज-सुधार व समतामूलक विचारों के प्रभाव को बहुत सुंदरता से दर्शाया गया है। चतुरसेन शास्त्री ने ऐतिहासिक और पुराकालीन वातावरण को जीवंत करने के लिए संस्कृतनिष्ठ और तत्सम शब्दों से युक्त प्रभावी भाषा का प्रयोग किया है। जिससे कथानक का देशकाल जीवंत लगता है। वस्तुतः आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने ‘‘वैशाली की नगरवधू’’ उपन्यास केवल मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि एक गहरे सामाजिक और ऐतिहासिक संदेश के साथ लिखा था। लेखक ने स्वयं इस उपन्यास के बारे में कहा था, ‘‘मैं अब तक की अपनी सारी रचनाओं को रद्द करता हूँ, और वैशाली की नगरवधू को अपनी एकमात्र रचना घोषित करता हूँ।’’
चतुरसेन शास्त्री इस उपन्यास के माध्यम से भारत के प्राचीन इतिहास (विशेषकर ईसा पूर्व छठी शताब्दी के बौद्ध कालीन वैभव, वैशाली गणतंत्र और मगध साम्राज्य) को प्रामाणिकता के साथ पाठकों के सामने लाना चाहते थे। उपन्यास का सबसे बड़ा उद्देश्य यह भी था कि ‘‘नगरवधू’’ जैसी कुप्रथा के माध्यम से पुरुष प्रधान समाज में स्त्री के शोषण को तर्जनी दिखाई जा सके। आम्रपाली को उसकी इच्छा के विरुद्ध पूरे नगर की संपत्ति घोषित कर दिया जाता है। शास्त्री जी ने इस घटना के माध्यम से स्त्री अधिकारों और उनकी गरिमा का प्रश्न उठाया है। साथ ही उपन्यास में गणतंत्र के पतन की अवस्था को भी सामने रखा गया है। वैशाली एक महान और शक्तिशाली गणतंत्र था, लेकिन आंतरिक ईष्र्या, गुटबाजी और विलासिता के कारण उसका पतन हुआ। लेखक ने इसके माध्यम से यह संदेश दिया है कि यदि कोई समाज अंदर से कमजोर हो जाए, तो बाहरी ताकतें (जैसे मगध) उसका विनाश कर देती हैं। उपन्यास का अंत आम्रपाली द्वारा भगवान बुद्ध की शरण में जाने और बौद्ध भिक्षुणी बनने से होता है। इसके जरिए लेखक ने यह सिद्ध किया है कि सत्ता, रूप और वैभव क्षणभंगुर हैं, और अंतिम शांति केवल त्याग, अध्यात्म और करुणा से ही मिल सकती है।
यह उपन्यास एक सम्पूर्ण आख्यान की भांति है जिसमें तत्कालीन राजनीतिक पक्ष पर भी विस्तार से पक्ष रखा गया है। इसमें आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने प्राचीन भारत के दो सबसे शक्तिशाली राज्यों वैशाली (वज्जी संघ) और मगध साम्राज्य के बीच के गहरे राजनीतिक, सामाजिक और कूटनीतिक संघर्ष को बेहद सजीव रूप में प्रस्तुत किया है। यह संघर्ष केवल दो राजाओं का नहीं, बल्कि दो अलग-अलग शासन प्रणालियों का टकराव था। वैशाली आठ कुलों का एक संघ (वज्जी संघ) था, जहाँ गणतंत्र व्यवस्था थी। यहाँ निर्णय राजाओं की संस्था (संथागार) में लोकतांत्रिक तरीके से लिए जाते थे। वहीं मगध में साम्राज्यवादी राजतंत्र था, जहाँ सत्ता एक ही राजा (बिंबिसार और बाद में अजातशत्रु) के हाथ में केंद्रित थी। मगध का एकमात्र लक्ष्य साम, दाम, दंड, भेद से अपने साम्राज्य का विस्तार करना था। उपन्यास दिखाता है कि कोई भी लोकतंत्र तब तक नहीं हारता, जब तक वह अंदर से कमजोर न हो। वैशाली के लिच्छवि सरदार आपस में ही ईष्र्या, अहंकार और पारस्परिक कलह में लिप्त थे। वैशाली के गणतंत्र का एक क्रूर नियम था कि नगर की सबसे सुंदर स्त्री किसी एक पुरुष की पत्नी नहीं बन सकती, उसे ‘‘नगरवधू’’ (सार्वजनिक संपत्ति) बनना होगा। आम्रपाली को नगरवधू बनने के लिए बाध्य किया जाता है जिससे वैशाली के भीतर ही असंतोष व्याप्त हो जाता है। मगध के शासकों ने वैशाली की इसी आंतरिक कमजोरी का लाभ उठाया।

आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने अपने इस उपन्यास के द्वारा यह तथ्य रखा कि जब राष्ट्र की सुरक्षा पर आंतरिक राजनीति और अहंकार हावी हो जाते हैं, तो पूरे समाज को उसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती है।

आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने ‘‘वैशाली की नगरवधू’’ के अतिरिक्त ‘‘आत्मदाह’’, ‘‘बहते आँसू’’, ‘‘दो किनारे’’, ‘‘नरमेध’’, ‘‘अपराजिता’’, ‘‘बगुला के पंख’’, ‘‘मोती’’, ‘‘पूर्णाहुति’’, ‘‘रक्त की प्यास’’, ‘‘सोमनाथ’’, ‘‘आलमगीर’’, ‘‘वयंरक्षाम’’, ‘‘सह्याद्रि की चट्टानें’’ आदि उपन्यास लिखे। उन्होंने नाटक भी लिखे- राजसिंह, मेघनाथ, छत्रसाल, गांधारी, श्रीराम, अमर राठौर, उत्सर्ग, क्षमा। ‘‘मेरी आत्मकहानी’’ नाम से आत्मकथा लिखी।
‘‘रजकण’’ तथा ‘‘अक्षत’’उनके कहानी ससंग्रह हैं तथा निबंध संग्रह हैं- ‘‘अंतस्तल’’, ‘‘मेरी खाल की हाय’’, ‘‘तरलाग्नि’’। इनके अतिरिक्त उन्होंने बाल साहित्य, एकांकी तथा चिकित्सा से संबंणित पुस्तकें भी लिखीं। सन 1909 से 1948 के 40 वर्षों की अवधि में वह 84 छोटी-बड़ी पुस्तकें लिख चुके थे और पत्रिकाओं में सैकड़ों लेखों का प्रकाशन हो चुका था।
शास्त्री जी की कहानियाँ उत्कृष्ठ थीं। उनकी एक कहानी ‘‘खूनी’’ के ‘‘प्रताप’’ पत्रिका में प्रकाशित होने पर ‘‘प्रताप’’ के संपादक पं. माखनलाल चतुर्वेदी ने लिखा था, ‘‘खूनी को छाप कर प्रताप निहाल हो गया।’’
उनकी गद्यकाव्य रचनाएं प्रायः  ‘‘प्रताप’’ में प्रकाशित होती रहीं जिनमें ‘चित्तौड़ के किले में’’, ‘‘स्वदेश’’ व ‘‘अनूप शहर के घाट पर’’ आदि प्रमुख हैं। ‘‘अन्तस्तल’’ अचार्य शास्त्री का प्रसिद्ध गद्यकाव्य संग्रह है। यह हिन्दी में गद्य काव्य की प्रथम प्रकाशित पुस्तक मानी जाती है।

आचार्य चतुरसेन शास्त्री छायावाद युग के प्रमुख उपन्यासकार और कथाकार रहे। उनका मुख्य लेखन काल प्रेमचंद के समकालीन और उनके बाद का है, जिसमें हिंदी में ऐतिहासिक उपन्यास-लेखन की परंपरा को समृद्ध करने का श्रेय प्राप्त है। 2 फरवरी 1960 को उनका निधन हुआ। आचार्य चतुरसेन शास्त्री की कृतियां हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि हैं। इन कृतियों को पढ़े बिना इतिहासपरक साहित्य लेखन की बारीकियों को समझा नहीं जा सकता है। वे साहित्य में इतिहास को पिरोने में माहिर थे।       

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(दैनिक, सागर दिनकर में 26.08.2026 को प्रकाशित) 
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Wednesday, August 5, 2026

चर्चा प्लस | समय रहते समझना ही होगा ऊर्जा संरक्षण के महत्व और तरीकों को | सागर दिनकर

चर्चा प्लस
समय रहते समझना ही होगा ऊर्जा संरक्षण के महत्व और तरीकों को
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                
          जब लाईट चली जाती है तो हम झुंझला उठते हैं। यदि सरकार के द्वारा विद्युत कटौती की जाने लगती है तो हमारा क्रोध और बढ़ जाता है। डीजल-पेट्रोल के दाम बढ़ते हैं तो हम घबरा उठते हैं। लेकिन क्या हम ऊर्जा के इन स्रोतों की बचत के बारे में व्यक्तिगत स्तर पर कभी गंभीरता से विचार करते हैं? जीवाश्म ईंधन का उपयोग कम करने के लिए इलेक्ट्रिक गाड़ियां आ गईं लेकिन बिजली उत्पादन के लिए भी तो कोयला जैसा जीवाश्म ईंधन लगता है। यानी आगे चल कर हमें अपनाना होगा बिजली के पारंपरिक स्रोत का विकल्प। तो वह, अभी से क्यों नहीं? इस पर विचार करना जरूरी है।
   सन 2006 में भारत बुक सेंटर, लखनऊ से मेरी एक पुस्तक प्रकाशित हुई थी-‘‘सस्ता और सुरक्षित ऊर्जा स्रोतरू सौर तापीय ऊर्जा’’। इस पुस्तक के प्राक्कथन में मैंने लिखा था-‘‘वर्तमान समय ऊर्जा और उसके स्रोतों पर चिंतन करने का समय है। हम ऊर्जा संकट के जिस दौर से गुज़र रहे हैं, वह हमें अपने परंपरागत ऊर्जा स्रोतों पर पुनः दृष्टिपात करने का आग्रह कर रहा है। लकड़ी, कोयला, पनबिजली, गैस, खनिज तेल आदि हमारे परंपरागत ऊर्जा स्रोत मानव के द्वारा उस समय से काम में लाए जा रहे हैं जबसे इन स्रोतों की जानकारी मनुष्य को हुई। हजारों वर्षों से इन ऊर्जा स्रोतों के निरंतर काम में आने, जनसंख्या के दबाव बढ़ने तथा इन ऊर्जा स्रोतों की भावी उपलब्धता की गंभीरता की ओर स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं। परंपरागत ऊर्जा स्रोतों को न तो पुनर्जीवित किया जा सकता है और न पुनर्निर्मित किया जा सकता है। इनका भंडार समाप्त हो जाने पर हम ऊर्जाहीन हो जाएंगे। अतः समय रहते परंपरागत ऊर्जा स्रोतों के एक ऐसे विकल्प को अपना लेना आवश्यक है जो हमारी भावी आवश्यकताओं को सुचारू रूप से पूरा कर सके। वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत के रूप में जिन परंपरागत स्रोतों को अपनाया जा सकता है, वे हैं- 1.सौर ऊर्जा 2.पवन ऊर्जा 3.ज्वारीय ऊर्जा 4.भू-तापीय ऊर्जा। इन परंपरागत ऊर्जा स्रोतों में सौर ऊर्जा अथवा सौर तापीय ऊर्जा सबसे उत्तम ऊर्जा स्रोत है। यह सूर्य से प्राप्त होने वाली ऊर्जा है और इसीलिए इसकी उपलब्धता सतत एवं अक्षुण्ण है। सौर तापीय ऊर्जा सब जगह उपलब्ध हो सकती है। इसको उपयोग में लाना भी आसान है। सौर तापीय ऊर्जा के क्षेत्र में निरंतर अनुसंधान हो रहे हैं तथा यह भविष्य की विश्वसनीय ऊर्जा के रूप में स्वीकार की जा चुकी है। सुदूर ग्रामीण अंचलों के लिए भी सौर तापीय ऊर्जा के द्वारा ईंधन एवं विद्युत की आपूर्ति की जा सकती है जो अन्य किसी स्रोत से दीर्घकाल तक संभव नहीं है। इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए, मैंने सौर तापीय उर्जा के बारे में जैसे-जैसे अध्ययन किया, वैसे-वैसे मैंने इसे एक सशक्त विश्वसनीय और उपयोग में आसान ऊर्जा स्रोत के रूप में पाया। मुझे लगता है कि सौर तापीय ऊर्जा भारत जैसे विकासशील देश में समाज के प्रत्येक स्तर के नागरिकों द्वारा अपनाया जाना चाहिए। इससे देश की राष्ट्रीय आय के एक बड़े भाग की बचत हो सकेगी, जो परंपरागत ऊर्जा को आयात करने में व्यय हो जाती है। सौर तापीय ऊर्जा को अपना कर न केवल ईंधन अपितु विद्युत आपूर्ति से संबंधित संकटों से भी हम उबर सकेंगे। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सकेंगे।’’

तब से अब तक ऊर्जा के संबंध में स्थितियां बेहतर नहीं हुई हैं बल्कि और अधिक बिगड़ी हैं। आज फिर वही शब्द लिखने पड़ रहे हैं जो मैंने उस समय लिखे थे कि आमजन जीवन में सौर ऊर्जा को अपनाए जाने की जरूरत है।
कोयले की उपलब्धता पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं और कोयला बिजली उत्पादन में सबसे बड़ी भूमिका निभाता है। कोयले की उपलब्धता के भावी संकट को देखते हुए जर्मनी ने अपने देश में कोयला खनन का काम बंद कर चुका है। अन्य देश भी इस दिशा में अपनी योजनाएं बना रहे हैं। भारत जैसे विकासशील देश के लिए एकदम से कोयले का उपयोग बंद कर देना संभव नहीं है अतः उसने जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में सन् 2030 से 2050 तक का समय मांगा है। लेकिन क्या यह हमारे लिए सन 2030 तक संभव है? हम यदि रेलवे लाईन के पास पहुंच कर देखें तो कुछ ही देर में कोयले से भरी मालगाड़ी सामने से गुज़रती हुई दिखाई दे जाएगी। वह पचासों बोगियों में भरा हुआ कोयला कारखानों और विद्युत तापगृहों में पहुंच कर ऊर्जा उत्पादन का काम करता है। वर्षों से इस प्रकार कोयला खनन किया जा रहा है। हजारों वर्ष में तैयार यह कोयला जिस तेजी से और जिस बड़े पैमाने में हमने उपयोग में लाया है, उससे भूमि के नीचे मौजूद कोयले का भंडार अपना अस्तित्व खोता जा रहा है। कोयले का पुर्नउत्पादन इतनी तेजी से नहीं हो सकता है कि हम खोदते जाएं, कोयला निकालते जाएं और पृथ्वी हमें कोयला बना-बना कर देती जाए। यह हजारों वर्ष की प्राकृतिक प्रक्रिया से निर्मित होता है। इस बात को जानते हुए भी हमने यह अनदेखी की कि कोयला एक दिन पूरी तरह समाप्त हो सकता है। इसीलिए स्थिति इस गंभीरता तक आ पहुंची है कि कोयले का उपयोग बंद किए जाने का वैश्विक स्तर पर प्रयास आरम्भ करना पड़ रहा है।

हम दैनिक जीवन में विद्युत ऊर्जा का बेहद उपयोग करते हैं। अब तो ई-बाईक, ई-कार आदि के रूप में उपयोग बढ़ता जा रहा है। इस ‘ई’ का मतलब है इलेक्ट्रिक या बिजली। तो जब तक बिजली पारंपरिक स्रोतों पर निर्भर है और हमारे पारंपरिक स्रोत समाप्त नहीं हुए हैं तब तक हमें बिजली प्राप्त होती रहेगी। लेकिन उसके बाद? क्या हम अंधकारयुग में जीने को तैयार हैं? कदापि नहीं। इसकी कल्पना भी हम नहीं करना चाहते हैं। तो फिर क्यों न समय रहते ऊर्जा के अपने स्रोत को पारंपरिक से बदल कर वैकल्कि पर ‘‘स्विच’’ कर दिया जाए। यानी हम जीवाश्म ईंधन के बदले सौर ऊर्जा को स्रोत के रूप में पूरी तरह से अपना लें।

यूं तो देश में हर वर्ष राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण दिवस मनाया भी जाता है। यह ऊर्जा खपत के महत्व और हमारे दैनिक जीवन में इसके उपयोग और वैश्विक पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिति पर इसके प्रभाव का आकलन करने के लिए मनाया जाता है। भारत में राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण दिवस मनाने का उद्देश्य रहता है, लोगों को ऊर्जा के महत्व, ऊर्जा की बचत, और ऊर्जा संरक्षण के बारे में जागरुक किया जा सके। ऊर्जा संरक्षण का सही अर्थ है ऊर्जा के अनावश्यक उपयोग को कम करके कम ऊर्जा का उपयोग कर ऊर्जा की बचत की जाए। लेकिन यह दिवस भी अन्य दिवसों की भांति एक दिन का समारोह बन कर रह जाता है। 
   कुशलता से ऊर्जा का उपयोग भविष्य में उपयोग के लिए इसे बचाने के लिए बहुत आवश्यक है। यह सच है कि विद्युत जैसी ऊर्जा को बचा कर उसका भंडारण नहीं किया जा सकता है, लेकिन उसके उत्पादन में लगने वाले कोयला जैसे स्रोत बचाए जा सकते हैं और मंहगी बिजली के विरुद्ध सौर ऊर्जा को अपना कर अपने घरेलू बजट को भी सम्हाला जा सकता है।

यह सच है कि वर्तमान में हमारे देश में सौर उपकरण घर में लगवाने मंहगे पड़ते हैं किन्तु आरंभिक खर्च के बाद न्यूनतम खर्च उसे बैलेंस कर देता है। यदि इस दिशा में सरकार कारगर सब्सिडी लागू कर दे तो सौर ऊर्जा के घरेलू उपकरण हर नागरिक के लिए सस्ते और आसानी से उपलब्ध हो सकेंगे। इस दिशा में चीन ने हमारे देश के बाजार को आकर्षित करने में कसर नहीं छोड़ी है। ऑनलाईन बाजार में कम से कम कीमत में उसने ऐसे उत्पाद उतार दिए हैं जो दिन भर सौर ऊर्जा ग्रहण करते हैं और रात भर घर, लॉन, सड़क आदि को रोशन करते हैं। बेशक ये उपकरण बिना गारंटी के होते हैं किन्तु इनकी कम कीमत इनके ‘‘यूज एंड थ्रो’’ की क्वालिटी के आड़े नहीं आती है। यदि खाना पकाने के सोलर कुकर, चूल्हे और घरेलू बिजली के उपकरणों को सब्सिडी के साथ खुले बाजार में उपलब्ध कराया जाए तो इसे सभी लोग खरीदना पसंद करेंगे। इसका अनुमान बिजली बचाने वाले बल्बों, पंखों आदि की खरीदी के प्रति रुझान को देख कर लगाया जा सकता है। क्योंकि सुविधा पाने के साथ-साथ पैसे की बचत हर कोई करना चाहता है।  

यह भी सच है कि हमें ऊर्जा की बचत की आदत नहीं है। यह आदत हमें अपनानी होगी। कोई भी ऊर्जा की बचत इसकी गंभीरता से देखभाल करके कर सकता है। दैनिक उपयोग के बहुत से विद्युत उपकरणों को जैसे- बिना उपयोग के चलते हुए पंखों, बल्बों, एसी, हीटर आदि को बंद कर के विद्युत की बचत की जा सकती है। इस तरह ऊर्जा की बचत का तरीका ऊर्जा संरक्षण अभियान में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। जीवाश्म ईंधन, कच्चे तेल, कोयला, प्राकृतिक गैस आदि दैनिक जीवन में उपयोग के लिए पर्याप्त ऊर्जा उत्पन्न करते हैं लेकिन दिनों-दिन इनकी बढ़ती मांग प्राकृतिक संसाधनों के कम होने का भय पैदा करने लगा है। ऊर्जा संरक्षण ही केवल एक ऐसा रास्ता है जो ऊर्जा के गैर-नवीनीकृत साधनों के स्थान पर नवीनीकृत साधनों को प्रतिस्थापित करता है। ऊर्जा उपयोगकर्ताओं को ऊर्जा की कम खपत करने के साथ ही कुशल ऊर्जा संरक्षण के लिये जागरुक करने के उद्देश्य से विभिन्न देशों की सरकारों ने ऊर्जा और कार्बन के उपयोग पर कर लगा रखा है। उच्च ऊर्जा उपभोग पर कर ऊर्जा के प्रयोग को कम करने के साथ ही उपभोक्ताओं को एक सीमा के अन्दर ही ऊर्जा का प्रयोग करने के लिये प्रोत्साहित करता है। किन्तु इससे अधिक नागरिक हित का तरीका है सौर ऊर्जा को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना।

भवन निर्माण के समय थर्मल इंसुलेशन का प्रयोग हमारे देश में नहीं किया जाता है किन्तु इस दिशा में ऊर्जा के बचत वाले निर्माण को बढ़ावा दिया जा सकता है जिससे ठंड की ऋतु में ऊर्जा की बचत की जा सके। अन्यथा, ठंड के मौसम में हीटर, ब्लोअर आदि उपकरणों पर बड़े पैमाने पर ऊर्जा खर्च करनी पड़ती है। थर्मल पर्दें, स्मार्ट खिड़कियां इस दिशा में कारगर साबित हो रही हैं। ऊर्जा की एक बड़ी मात्रा को प्राकृतिक रोशनी और कॉम्पैक्ट फ्लोरोसेंट लैंप या सीएफएल से और अन्य साधनों के द्वारा ऊर्जा खपत कम की जा सकती है। साथ ही फ्लोरोसेंट बल्ब, रैखिक फ्लोरोसेंट, सौर स्मार्ट टॉर्च, स्काई लाइट, खिड़कियों से प्रकाश व्यवस्था और सौर लाइट का प्रयोग करके बचाया जा सकता है। जल संरक्षण भी बेहतर ऊर्जा संरक्षण का कार्य करता है। लोगों के द्वारा हर साल लगभग हजारों गैलन पानी बर्बाद किया जाता है जिसकी विभिन्न संरक्षण के साधनों जैसे- 6 जीपीएम या कम से कम प्रवाह वाले फव्वारों, बहुत कम फ्लश वाले शौचालय, नल जलवाहक, खाद शौचालयों का प्रयोग करके बचत की जा सकती है।

 राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण अभियान भारत में ऊर्जा संरक्षण की प्रक्रिया को सुविधाजनक बनाने के लिए विद्युत मंत्रालय द्वारा शुरू किया गया। भारत में पेट्रोलियम संरक्षण अनुसंधान एसोसिएशन वर्ष 1977 में भारत सरकार द्वारा भारतीय लोगों के बीच ऊर्जा संरक्षण और कुशलता को बढ़ावा देने के लिए स्थापित किया गया था। ये ऊर्जा का संरक्षण महान स्तर पर करने के लिये भारत सरकार द्वारा उठाया गया बहुत बड़ा कदम है। बेहतर ऊर्जा कुशलता और संरक्षण के लिए भारत सरकार ने एक अन्य संगठन ऊर्जा दक्षता ब्यूरों को भी 2001 में स्थापित किया गया।

ऊर्जा संरक्षण दिवस वस्तुतः एक राष्ट्रीय जागरूकता अभियान दिवस है। लेकिन जैसा कि हमारी प्रवृत्ति है कि चाहे व्यक्तिगत स्तर पर हो या सरकारी स्तर पर, दिवस मनाने के बाद हम अपने सारे संकल्प भूल जाते हैं और सारी योजनाएं ठंडे-बस्ते में बांध देते हैं। लेकिन अब वह समय आ ही गया है कि हमें ऊर्जा की उपलब्धता एवं ऊर्जा स्रोतों के प्रति गंभीर होना होगा। हमें लापरवाही और अनदेखा करने की अपनी प्रवृत्ति को बदला होगा। हम अपनी आने वाली पीढ़ी को खाली कोयला खदानें और तेल के रिक्त कुए सौंपने के बजाए उन्हें सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, भू-तापीय ऊर्जा, सागरीय ऊर्जा के कभी न खाली होने वाले भंडार सौंप कर जाएं। विशेष रूप से सौर ऊर्जा का वह भंडार, जिससे दैनिक जीवन में भी सस्ती और सुगम ऊर्जा मिलती रहे।                                                
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(दैनिक, सागर दिनकर में 05.08.2026 को प्रकाशित)  
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Wednesday, July 29, 2026

चर्चा प्लस | प्रेमचंद की कहानियों में मौजूद है बुंदेलखंड का इतिहास और संस्कृति - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस  

प्रेमचंद की कहानियों में मौजूद है बुंदेलखंड का इतिहास और संस्कृति 

 - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

 

                                      

    प्रेमचंद ने भारतीय समाज की विशेषताओं और अन्तर्विरोधों को एक कुशल समाजशास्त्री की भांति गहराई से समझा। इसलिए उनके साहित्य में भारतीय समाज की वास्तविकता स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। स्त्रियों, दलितों सहित सभी शोषितों के प्रति प्रेमचंद ने अपनी लेखनी चलाई। प्रेमचंद मात्र एक कथाकार नहीं वरन् एक समाजशास्त्री भी थे। उनकी समाजशास्त्री दृष्टि सैद्धांतिक नहीं बल्कि व्यवहारिक थी। इसीलिए वे उस सच्चाई को भी देख लेते थे जो अकादमिक समाजशास्त्री देख नहीं पाते हैं। उन्होंने जहां एक ओर कर्ज में डूबे किसान की मनोदशा को परखा वहीं समाज के दोहरेपन की शिकार स्त्रियों की दशा का विश्लेषण किया। उन्होंने ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य की कहानियां भी लिखीं और उनके लिए प्रेमचंद ने बुंदेलखंड के कथानकों को चुना।


31 जुलाई 1880 को जन्मे प्रेमचंद को हिन्दी साहित्य का ‘कथा सम्राट’ कहा जाता है। प्रेमचंद ने ‘‘नवाबराय’’ के नाम से उर्दू में साहित्य सृजन किया। यह नवाबराय नाम उन्हें अपने चाचा से मिला था जो उनके बचपन में उन्हें लाड़-प्यार में ‘‘नवाबराय’’ कह कर पुकारा करते थे। किन्तु अंग्रेज सरकार के कारण उन्हें अपना लेखकीय नाम ‘‘नवाबराय’’ से बदलकर ‘‘प्रेमचंद’’ करना पड़ा। हुआ यह कि उनकी ’सोज़े वतन’ (1909, ज़माना प्रेस, कानपुर) कहानी-संग्रह की सभी प्रतियां तत्कालीन अंग्रेजी सरकार ने ज़ब्त कर लीं। उर्दू अखबार “ज़माना“ के संपादक मुंशी दयानरायण निगम ने उन्हें सलाह दी कि वे सरकार के कोपभाजन बनने से बचाने के लिए ‘‘नबावराय’’ के स्थान पर ’प्रेमचंद’ लिखने लगें। इसके बाद वे ‘‘प्रेमचंद’’ के नाम से लेखनकार्य करने लगे। 

प्रेमचंद ने भारतीय समाज की विशेषताओं और अन्तर्विरोधों को एक कुशल समाजशास्त्री की भांति गहराई से समझा। इसलिए उनके साहित्य में भारतीय समाज की वास्तविकता स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। स्त्रियों, दलितों सहित सभी शोषितों के प्रति प्रेमचंद ने अपनी लेखनी चलाई। प्रेमचंद मात्र एक कथाकार नहीं वरन् एक समाजशास्त्री भी थे। उनकी समाजशास्त्री दृष्टि सैद्धांतिक नहीं बल्कि व्यवहारिक थी। इसीलिए वे उस सच्चाई को भी देख लेते थे जो अकादमिक समाजशास्त्री देख नहीं पाते हैं। उन्होंने जहां एक ओर कर्ज में डूबे किसान की मनोदशा को परखा वहीं समाज के दोहरेपन की शिकार स्त्रियों की दशा का विश्लेषण किया। उन्होंने ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य की कहानियां भी लिखीं और उनके लिए प्रेमचंद ने बुंदेलखंड के कथानकों को चुना। बुंदेलखंड पर आधारित उनकी दो कहानियां हैं- -‘राजा हरदौल’ और ‘रानी सारंधा’।

‘राजा हरदौल’ बुंदेलखंड की लोकप्रिय कथा है। इस बहुचर्चित कथा का बुंदेलखड के सामाजिक जीवन में भी बहुत महत्व है। यह कथा ओरछा के राजा जुझार सिंह की अपने छोटे भाई हरदौल सिंह के प्रति प्रेम और संदेह की कथा है जिसने ओरछा के इतिहास को प्रभावित किया। जुझार सिंह मुगल शासक शाहजहां के समकालीन थे। वे साहसी थे, वीर थे किन्तु उनकी संदेही प्रवृत्ति उनके इन गुणों को लांछित कर गई। इस वास्तविक घटना का सारांश यह है कि जब जुझार सिंह अपने दक्षिण भारत के अभियान पर गए तब उनका छोटा भाई हरदौल अपनी भाभी रानी कुलीना के साथ राज्य सम्हाल रहा था। दोनों का रिश्ता माता-पुत्र जैसा था। किन्तु कुछ ईर्ष्यालुओं ने जुझार सिंह के वापस आते ही रानी और हरदौल के मध्य अनैतिक संबंधों की चर्चा कर के जुझाार सिंह को भ्रमित कर दिया। संदेही जुझार सिंह अपने भाई और अपनी पत्नी की पवित्रता को नहीं देख सका और उसने अपनी पत्नी रानी कुलीना को आदेश दिया कि वह अपनी पवित्रता सिद्ध करने के लिए हरदौर को विष खिला दे। रानी स्तब्ध रह गई। अपने पुत्र समान देवर को जहर देना उसके लिए कठिन था। तब हरदौल ने अपनी भाभी को समझाया की सम्मान से बड़ा जीवन नहीं होता है, वे विष मिला भोजन परोस दें। अंततः रानी के द्वारा विष मिले भोजन को खा कर हरदौल ने अपना बलिदान दे दिया। यह भी कथा है कि जुझार सिंह ने रानी द्वारा भोजन में विष न दे पाने के कारण रानी से ही विष मिला पान का बीड़ा बनवा कर हरदौल को खिला दिया था जिससे हरदौल की मृत्यु हो गई थी। ओरछा में लाला हरदौल की समाधि आज भी मौजूद है और यह परम्परा है कि बुंदेलखंड में विवाह का पहला कार्ड लाला हरदौल का नाम लिख कर उनकी समाधि पर पहुंचाया जाता है। मान्यता है कि ऐसा करने से लाला हरदौल वधूपक्ष के घर वधू के मामा के रूप में आते हैं और विवाह निर्विघ्न सम्पन्न होता है।   

प्रेमचंद ने पान में विष मिला कर देने की कथा को अपनी कहानी में पिरोया है। उन्होंने ‘राजा हरदौल’ कहानी इन पंक्तियों से आरम्भ की है, ‘‘बुंदेलखंड में ओरछा पुराना राज्य है। इसके राजा बुंदेले हैं। इन बुंदेलों ने पहाड़ों की घाटियों में अपना जीवन बिताया है।’’ 

वे बुंदेलों के चरित्र की विशेषताओं को सामने रखते हुए हरदौल की ओर से यह संवाद लिखते हैं कि ‘खबरदार, बुंदेलों की लाज रहे या न रहे; पर उनकी प्रतिष्ठा में बल न पड़ने पाए- यदि किसी ने औरों को यह कहने का अवसर दिया कि ओरछे वाले तलवार से न जीत सके तो धांधली कर बैठे, वह अपने को जाति का शत्रु समझे।’ वहीं जुझार सिंह युद्ध के लिए विदा लेते समय अपनी रानी से कहता है, ‘प्यारी, यह रोने का समय नहीं है। बुंदेलों की स्त्रियां ऐसे अवसर पर रोया नहीं करतीं।’ इसी कहानी में प्रेमचंद ने एक ऐसी स्त्री के मनोभावों को बड़े ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है जो अपने पुत्र, अपने भाई सरीखे देवर को विष देने के लिए विवश की जा रही है- ‘‘ रानी सोचने लगी, क्या हरदौल के प्राण लूं? निर्दोष, सच्चरित्र वीर हरदौल की जान से अपने सतीत्व की परीक्षा दूं? उस हरदौल के खून से अपना हाथ काला करूं जो मुझे बहन समझता है? यह पाप किसके सिर पड़ेगा? क्या एक निर्दोष का खून रंग न लाएगा? आह! अभागी कुलीना! तुझे आज अपने सतीत्व की परीक्षा देने की आवश्यकता पड़ी है और वह ऐसी कठिन? नहीं यह पाप मुझसे नहीं होगा। यदि राजा मुझे कुलटा समझते हैं, तो समझें, उन्हें मुझ पर संदेह है, तो हो। मुझसे यह पाप न होगा। राजा को ऐसा संदेह क्यों हुआ? क्या केवल थालों के बदल जाने से? नहीं, अवश्य कोई और बात है। आज हरदौल उन्हें जंगल में मिल गया। राजा ने उसकी कमर में तलवार देखी होगी। क्या आश्चर्य है, हरदौल से कोई अपमान भी हो गया हो। मेरा अपराध क्या है? मुझ पर इतना बड़ा दोष क्यों लगाया जाता है? केवल थालों के बदल जाने से? हे ईश्वर! मैं किससे अपना दुख कहूं? तू ही मेरा साक्षी है। जो चाहे सो हो, पर मुझसे यह पाप न होगा।’’

बुंदेलखंड पर आधारित दूसरी कहानी ‘रानी सारंधा’ बुंदेलखंड गौरव कहे जाने वाले महाराज छत्रसाल की मां रानी सारंधा की कथा है। रानी सारंधा ओरछा के राजा चम्पतराय की पत्नी थीं। चम्पतराय के संबंध में प्रेमचंद ने अपनी कहानी में लिखा है कि ‘राजा चम्पतराय बड़े प्रतिभाशाली पुरुष थे। सारी बुन्देला जाति उनके नाम पर जान देती थी और उनके प्रभुत्व को मानती थी। गद्दी पर बैठते ही उन्होंने मुगल बादशाहों को कर देना बन्द कर दिया और वे अपने बाहुबल से राज्य-विस्तार करने लगे। मुसलमानों की सेनाएं बार-बार उन पर हमले करती थीं पर हार कर लौट जाती थीं।’ 

‘रानी सारंधा कहानी के आरम्भ में वे बुंदेलखंड उस रियासत का वर्णन करते हैं जहां रानी सारंधा का जन्म हुआ था। वे लिखते हैं-‘शताब्दियां व्यतीत हो गयीं बुंदेलखंड में कितने ही राज्यों का उदय और अस्त हुआ मुसलमान आए और बुंदेला राजा उठे और गिरे-कोई गांव कोई इलाका ऐसा न था जो इन दुरवस्थाओं से पीड़ित न हो मगर इस दुर्ग पर किसी शत्रु की विजय-पताका न लहरायी और इस गांव में किसी विद्रोह का भी पदार्पण न हुआ। यह उसका सौभाग्य था।’ यह कथा रानी सारंधा के जीवन के साथ ही बंुदेलखंड के परिवेश से परिचित कराती है। कहानी के आरंभ में ही वे लिखते हैं-‘‘ अंधेरी रात के सन्नाटे में धसान नदी चट्टानों से टकराती हुई ऐसी सुहावनी मालूम होती थी जैसे घुमुर-घुमुर करती हुई चक्कियां। नदी के दाहिने तट पर एक टीला है। उस पर एक पुराना दुर्ग बना हुआ है जिसको जंगली वृक्षों ने घेर रखा है। टीले के पूर्व की ओर छोटा-सा गांव है। यह गढ़ी और गाँव दोनों एक बुंदेला सरकार के कीर्ति-चिह्न हैं। शताब्दियां व्यतीत हो गयीं बुंदेलखंड में कितने ही राज्यों का उदय और अस्त हुआ मुसलमान आये और बुंदेला राजा उठे और गिरे-कोई गांव कोई इलाका ऐसा न था जो इन दुरवस्थाओं से पीड़ित न हो मगर इस दुर्ग पर किसी शत्रु की विजय-पताका न लहरायी और इस गाँव में किसी विद्रोह का भी पदार्पण न हुआ। यह उसका सौभाग्य था।’’ प्रेमचंद ने बुंदेलखंड की स्त्री के आत्मसम्मान को बखूबी परखा और फिर उसे इन शब्दों में व्यक्त किया-‘‘ वायुमण्डल में मेघराज की सेनाएँ उमड़ रही थीं। ओरछे के किले से बुन्देलों की एक काली घटा उठी और वेग के साथ चम्बल की तरफ चली। प्रत्येक सिपाही वीर-रस से झूम रहा था। सारंधा ने दोनों राजकुमारों को गले से लगा लिया और राजा को पान का बीड़ा दे कर कहा-बुन्देलों की लाज अब तुम्हारे हाथ है।’’

प्रेमचंद ने रानी सारंधा की श्रेष्ठता को स्थापित करते हुए इस तथ्य को अपनी कहानी में सुंदर ढंग से पिरोया है कि रानी सारंधा ने राजा चम्पतराय के मन में स्वाभिमान को पुनःजाग्रत किया। उन्होंने लिखा है-‘‘ सारंधा-ओरछे में मैं एक राजा की रानी थी। यहां मैं एक जागीरदार की चेरी हूं। ओरछे में वह थी जो अवध में कौशल्या थीं यहां मैं बादशाह के एक सेवक की स्त्री हूँ। जिस बादशाह के सामने आज आप आदर से सिर झुकाते हैं वह कल आपके नाम से कांपता था। रानी से चेरी हो कर भी प्रसन्नचित्त होना मेरे वश में नहीं है। आपने यह पद और ये विलास की सामग्रियां बड़े महंगे दामों मोल ली हैं।’’ चम्पतराय के नेत्रों पर से एक पर्दा-सा हट गया। वे अब तक सारंधा की आत्मिक उच्चता को न जानते थे। जैसे बे-मां-बाप का बालक मां की चर्चा सुन कर रोने लगता है उसी तरह ओरछे की याद से चम्पतराय की आंखें सजल हो गयीं। उन्होंने आदरयुक्त अनुराग के साथ सारंधा को हृदय से लगा लिया।’’

प्रेमचंद ने जहां अपनी कहानियों में दुखी, दलित, शोषित और दुर्बल चरित्रों को महत्व दिया, वहीं बुंदेलखंड के इतिहास के तथ्यों और चरित्रों को भी अपनी कहानियों में स्थान दिया। कथा सम्राट प्रेमचंद के कथा साहित्य में बुंदेलखंड के कथानकों का पाया जाना इस बात का द्योतक है कि वे बुंदेली संस्कृति, परम्पराओं एवं इसके गौरवशाली इतिहास से प्रभावित थे।                 -----------------------

(दैनिक, सागर दिनकर में 29.07.2026 को प्रकाशित)  

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Wednesday, July 22, 2026

चर्चा प्लस | फुटबॉल की दुनिया सिखाती है कि मेहनत से भाग्य बदला जा सकता है | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस
फुटबॉल की दुनिया सिखाती है कि मेहनत से भाग्य बदला जा सकता है       
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह   
                                                               
  यदि यह कहा जाए के विश्व कप में खेलने वाला हर खिलाड़ी अरबों डॉलर का धनी है तो यह सुन कर किसी को भी आश्चर्य नहीं होगा। किन्तु यह जान कर अवश्य आश्चर्य होगा कि इनमें से कई प्रसिद्ध खिलाड़ी वे हैं जिनका बचपन भूख और गरीबी में कटा। इनके पास अपने जूते तक नहीं थे, फुटबॉल नहीं थी और तो और भरपेट खाना भी नहीं था। लेकिन वे अपनी मेहनत के दम पर आज फुटबॉल के साम्राज्य के मिलेनियर हैं। उनमें से कई अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा उन स्थानों के विकास में दान कर रहे हैं जहां उनका बचपन अभाव और गरीबी में बीता था।


    20 जुलाई 2026 का अर्थात इसी माह में फीफा वर्ल्ड कप 2026 का समापन हुआ। एक नए इतिहास के साथ। जिसमें 16 वर्ष बाद स्पेन ने वर्ल्ड कप जीत कर अर्जेंटीना की उम्मींदों पर पानी फेर दिया और उनके स्टार खिलाड़ी लियोनेल आंद्रेस मेसी के अंतिम वर्ल्डकप को पराजय का उपहार दे दिया। लेकिन खेल तो खेल होता है। कोई हारता है तो कोई जीतता है। अर्जेंटीना हारा और स्पेन जीता। किन्तु विश्व कप में शामिल लगभग हर टीम के लिए एक बात अपराजित रही कि उनमें कई खिलाड़ी ऐसे थे जिन्होंने अपने जीवन में भूख और अभाव झेला था पर मेहनत के बल पर वे अपनी किस्मत बदल सके। 
      विश्व फुटबॉल में कई महान खिलाड़ियों ने अत्यधिक गरीबी से उठकर खेल की दुनिया में सर्वाेच्च स्थान, प्रशंसकों का प्यार और अपार धन प्राप्त किया है। इन खिलाड़ियों ने फटे-पुराने कपड़े की बॉल बना कर अपने जीवन में फुटबॉल को स्थान देते हुए सोचा भी नहीं होगा कि एक दिन वे विश्व कप के सितारे बन कर चमकेंगे। फुटबॉल के वे महान खिलाड़ी जो अत्यंत गरीबी से उठकर आए उनमें सबसे पहला नाम आता है ‘‘द किंग ऑफ फुटबॉल’’ कहे जाने वाले ब्राजील के महान खिलाड़ी पेले का। उनका जन्म ट्रैस कोराकोस में हुआ था। उनका बचपन इतनी गरीबी में बीता कि वे जूते तक नहीं खरीद पाते थे और अक्सर मोजे में अखबार भरकर फुटबॉल खेलते थे। कई बार वह स्थिति आई जब उन्होंने उबले आलू के छिलके खा कर अपना पेट भरा। यह फुटबॉल के उनके कौशल का कमाल था कि गरीबी से निकलकर उन्होंने ब्राजील को तीन बार फीफा विश्व कप जिताया।
        महान फुटबॉलर पेले का शुरुआती जीवन अत्यधिक गरीबी, कड़े संघर्ष और फुटबॉल के प्रति अटूट जुनून से भरा हुआ था। पेले का वास्तविक नाम था एडिसन अरंतस डो नैसिमेंटो। उनका यह नाम महान अमेरिकी आविष्कारक थॉमस एडिसन के नाम पर रखा गया था। पेले का ‘‘पेले’’ नाम पड़ने का भी एक दिलचस्प किस्सा है। बचपन में उनका निकनेम ‘‘डिको’’ था। उनके पसंदीदा खिलाड़ी स्थानीय क्लब के गोलकीपर थे जिनका नाम ‘‘बेले’’ था। बचपन में पेले इस नाम का सही उच्चारण नहीं कर पाते थे और अनजाने में उन्हें ‘‘पेले’’ बोलते थे। उनके दोस्तों ने उनका मजाक उड़ाने के लिए उन्हें ‘‘पेले’’ बुलाना शुरू कर दिया। शुरुआत में पेले को यह नाम बिल्कुल पसंद नहीं था और वे चिढ़ जाते थे, लेकिन बाद में यही नाम इतिहास बन गया।
पेले का जन्म 23 अक्टूबर 1940 को ब्राजील के मिनस गेरैस के एक छोटे से कस्बे ट्रैस कोराकोस में हुआ था। उनके पिता का नाम डोडिन्हो था, जो खुद एक स्थानीय फुटबॉल खिलाड़ी थे, लेकिन घुटने की गंभीर चोट के कारण उनका करियर खत्म हो गया था। उनकी माँ का नाम सेलेस्टे अरांटस था। उनकी माली हालत बहुत खराब थी। पेले का बचपन भयंकर गरीबी में बीता। उनका परिवार ब्राजील के बाऊ शहर में एक बेहद तंग झोपड़ी जैसे मकान में रहता था, जहां अकसर उनके पास खाने तक के पैसे नहीं होते थे। परिवार का हाथ बंटाने के लिए छोटी आयु में ही पेले चाय की दुकानों पर बर्तन धोने और रेलवे स्टेशन पर जूते पॉलिश करने का काम करना पड़ा। फिर भी फुटबॉल के प्रति उनका लगाव कम नहीं हुआ। फुटबॉल खेलने के लिए जूते होना जरूरी थे लेकिन पेले के पास इतने पैसे नहीं थे कि वे एक जोड़ी जूते खरीद सकें। उनके साथी लड़के जूते पहन कर फुटबॉल खेलते मगर पेले उनके साथ नंगे पैर ही खेला करते थे। इससे उनके पैरों में चोट लगती रहती थी। लेकिन वे चोटें फुटबॉल के प्रति उनके प्रेम को कम नहीं कर सके। फुटबॉल की असली बॉल खरीदना उनके लिए एक सपना था। इसलिए, वे फटे हुए पुराने मोजों के अंदर अखबार या फटे कपड़े ठूंसकर, उन्हें रस्सी से बांधकर फुटबॉल बनाते थे और गलियों में खेला करते थे। पेले ने गलियों में खेलते हुए ‘‘बाऊ: एथलेटिक क्लब’’ की जूनियर टीम में जगह बनाई। वहाँ उन्होंने अपनी जादुई ड्रिबलिंग से सबको हैरान कर दिया। जिससे ब्राजील के पूर्व राष्ट्रीय खिलाड़ी वाल्डेमार डी ब्रिटो ने पेले की छिपी हुई प्रतिभा को पहचाना। उन्होंने पेले को ट्रेनिंग दी और मात्र 15 वर्ष की उम्र में उन्हें ब्राजील के बड़े क्लब ‘‘सैंटोस एफसी’’ के ट्रायल के लिए ले गए। ब्रिटो ने सैंटोस के निदेशकों से कहा था कि ‘‘यह लड़का दुनिया का सबसे महान फुटबॉल खिलाड़ी बनेगा।’’
पेले ने अपनी मेहनत से अपने मेंटोर ब्रिटो की भविष्यवाणी को सच कर दिखाया। फिर उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और मात्र 17 साल की उम्र में 1958 के विश्व कप में ब्राजील को चैंपियन बनाकर साबित कर दिया कि मेहनत एक गरीब को भी दुनिया का बेताज बादशाह बना सकती है।
     अर्जेंटीना के डिएगो माराडोना भी एक ऐसे ही खिलाड़ी हुए जिनका बचपन भीषण गरीबी में बीता। फुटबॉल इतिहास के सबसे जादुई खिलाड़ियों में से एक, माराडोना का जन्म अर्जेंटीना के ब्यूनस आयर्स के एक बहुत ही गरीब इलाके यानी स्लम बस्ती में हुआ था। वे अपने 8 भाई-बहनों में सबसे बड़े थे। उन्होंने पैसों की कमी से जूझते हुए अपना बचपन बिताया। उनके माता-पिता के पास इतना पैसा नहीं था कि वे मेराडोना को एक अच्छा फुटबॉल, जूते या जर्सी दिला पाते। किन्तु ये कमियां मेराडोना के मनोबल को तोड़ नहीं सकीं। उन्होंने अपने खेल कौशल को निरंतर चमकाया और अपनी असाधारण ड्रिबलिंग के बल पर दुनिया के सबसे महान खिलाड़ियों में अपनी जगह बनाई।
   पुर्तगाल के क्रिस्टियानो रोनाल्डो आज विश्व के महानतम खिलाड़ियों में गिने जाते हैं। उनका बचपन भी बेहद गरीबी में बीता। वे पुर्तगाल के मदीरा में एक छोटे से घर में पले-बढ़े, जहाँ आर्थिक तंगी इतनी थी कि उनकी माँ उनके जन्म से पहले गर्भपात तक करवा लेना चाहती थीं। उनके पिता माली का काम करते थे जिसमें उन्हें बहुत कम पैसे मिलते थे। उस पर उनके पिता को शराब पीने की लत थी जिससे उनके कमाए पैसों में से अधिकांश शराब की भेंट चढ़ जाते थे। शराब की लत के कारण घर की स्थिति काफी खराब थी। कई बार पूरे परिवार को आधापेट खा कर रह जाना पड़ता था। क्रिस्टियानो रोनाल्डो को फुटबॉल से प्यार था और वे सारी मुश्किलों से जूझते हुए फुटबॉल में अपने कौशल को चमकाते रहे। यह उनकी मेहनत ही थी जिसके दम पर उन्होंने पुर्तगाल के उच्चकोटि के खिलाड़ियों के बीच अपनी जगह बनाई और आज उनका नाम  दुनिया के सबसे सफल और अमीर खिलाड़ियों में गिना जाता हैं।
    स्पेन के लामिन यमाल का नाम इस समय हर फुटबॉल प्रेमी के दिल में है। हाल के वर्षों में वे विश्व फुटबॉल के सबसे बड़े स्टार के रूप में सामने आए। यमाल का बचपन भी अत्यंत गरीबी में बीता। उनका परिवार स्पेन के जिस इलाके में रहता था, वहाँ की आधी से अधिक आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करती थी और उनके पिता परिवार का पेट पालने के लिए कड़ा संघर्ष करते थे। उस समय वे लामिन यमाल को फुटबॉल खेलने पर झिड़का भी करते थे क्योंकि उन्हें लगता था कि खेलने से कुछ भी हासिल नहीं होगा। तब उन्हें क्या पता था कि एक दिन उनके बेटे की मेहनत उनके बेटे को फुटबॉल के आकाश का चमकता सितारा बना देगी और पैसों की बरसात करेगी। 
        ज्लाटन इब्राहिमोविच यूं तो स्विडिश फुटबॉलर के नाम से जाने जाते हैं किन्तु उनके माता-पिता बोस्निया और क्रोएशिया से आए अप्रवासी थे। ज्लाटन  का बचपन भूख और अभावों में गुजरा। वे माल्मो के एक ऐसे गरीब इलाके में पले-बढ़े जहां अपराध का बोलबाला था। वहां के बच्चे अपराध की दुनिया में कदम रख कर अपने सपने पूरा करने की कोशिश करते थे। ज्लाटन के पिता की आमदनी अच्छी नहीं थी। कई बार उनके परिवार को भूखा रहना पड़ता था। ऐसे विपरीत वातावरण में ज्लाटन ने हिम्मत नहीं हारी और अपने दम पर अपने व्यक्तित्व को सही राह दी। उन्होंने पहले ताइक्वांडो में ब्लैक बेल्ट हासिल किया लेकिन फुटबॉल के प्रति उनका प्रेम और समर्पण उनका करियर बना। विश्व कप में खेल कर उन्होंने साबित कर दिया कि यदि मेहनत और हौसला हो तो हालात बदले जा सकते हैं।
सेनेगल के सादियो माने भी एक ऐसे खिलाड़ी हैं जिन्होंने बचपन में अथाह गरीबी झेली और आगे चल कर एक महान फुटबॉलर के रूप में अपनी पहचान बनाई। सेनेगल के बाम्बली गांव के सादियो माने का बचपन बहुत ही गरीबी में बीता। उनके पास खेलने के लिए न तो फुटबॉल था और न जूते। उन्होंने गांव के मैदानों में नंगे पैर फुटबॉल खेलकर अपना सफर शुरू किया। आज वे विश्व के बेहतरीन विंगर्स में से एक हैं। उनकी विशेषता यह भी है कि वे जिस गांव से उठ कर उंचाइयों तक पहुंचे उस गांव के विकास के लिए और वहां और स्कूलों के निर्माण एवं व्यवस्था के लिए अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा दान में देते हैं।
      स्पेन की राष्ट्रीय फुटबॉल टीम में हाल के इतिहास में सबसे गरीब पृष्ठभूमि से आने वाले खिलाड़ी लामिन यमाल हैं। वे स्पेन के बार्सिलोना के पास स्थित रोकाफोंडा नामक इलाके में पले-बढ़े हैं, जिसे स्पेन के सबसे पिछड़े और गरीब पड़ोसों में से एक माना जाता है, जहाँ की लगभग आधी आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करती है। लामिन यमाल की माँ इक्वेटोरियल गिनी से और पिता मोरक्को से आए अप्रवासी थे। जब यमाल का जन्म हुआ, तब उनकी माँ की उम्र महज 16 वर्ष थी। उनके पिता सड़कों पर कचरा और सामान बीनने का काम करते थे ताकि परिवार को भोजन मिल सके। शुरुआती दिनों में उनका परिवार एक ऐसे कम्यूनल सेंटर (सामूहिक आवास) में रहता था जहां सबको मुफ्त भोजन दिया जाता था। बाद में वे कुछ समय दोस्तों के घरों में एक कमरा लेकर रहे। जब वे पहली बार बार्सिलोना की मशहूर एकेडमी ‘‘ला मासिया’’ पहुंचे, तो उनके पास खुद के स्पोर्ट जूते तक नहीं थे। वहाँ के कोच ने उन्हें पुराने जूते खरीद दिए जो उनके पैरों से बड़े साईज़ के थे। पर वे डटे रहे। अपनी असाधारण प्रतिभा के दम पर वे मात्र 15-16 साल की उम्र में स्टार बन गए। आज वे बार्सिलोना और स्पेन की टीम के सबसे मुख्य खिलाड़ियों में से एक हैं और उन्होंने अपनी कमाई से अपने माता-पिता और दादी के लिए आलीशान घर खरीद दिया है।
इन खिलाड़ियों की कहानी यह साबित करती है कि प्रतिभा और असीम मेहनत के आगे विपरीत परिस्थितियां और गरीबी भी हार मान लेती है। वहीं यह भी मानना होगा कि फुटबॉल ने ऐसी प्रतिभाओं को उड़ान भरने के लिए आकाश दिया। क्रिकेट या टेनिस की दुनिया में भले ही ऐसे उदाहण कम ही मिलते हों किन्तु फुटबॉल की दुनिया में यह बार-बार सिद्ध हुआ है कि मेहनत करने वाला अपनी ज़िन्दगी की दिशा मोड़ सकता है और भुखमरी से अपना सफर शुरू कर के भी उस सम्पन्नता तक पहुंच सकता है जहां वह दूसरों की भलाई के लिए दान करने में सक्षम हो सके।                                        -----------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 22.07.2026 को प्रकाशित) 
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Thursday, June 25, 2026

चर्चा प्लस | हिन्दू मंदिरों में बढ़ता ‘‘वीआईपी दर्शन कल्चर’’ बनाम असली भक्त | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
हिन्दू मंदिरों में बढ़ता ‘‘वीआईपी दर्शन कल्चर’’ बनाम असली भक्त      
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह                                                                           
      विशेष रूप से उत्तर भारत में मंदिरों में ‘‘वीआईपी दर्शन कल्चर’’ अपने पांव पसारता जा रहा है। यदि आप राजनीतिक, प्रशासनिक रूप से या पैसों से पॉवरफुल हैं तो आपको उन मंदिरों में भी गर्भगृह तक जाने और देवप्रतिमा के निकट पहुंच कर दर्शन करने की सुविधा मिल जाएगी जहां आमजन के लिए प्रवेश निषेध है। क्या ईश्वर की निकटता पैसों और पॉवर से बंधी हुई है? हम श्रीमदभगवद्गीता पढ़ते हैं, आवश्यकता पड़ने पर उसकी शपथ भी लेते हैं, हम वेद, पुराण पढ़ते-सुनते हैं और प्रवचनों में उनके उद्धरण सुन कर स्वयं को धन्य अनुभव करते हैं। क्या कभी हमने ध्यान से पढ़ा है कि भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने किसे असली भक्त और अपना प्रिय बताया है? ‘‘ऋग्वेद’’ में किसे ईश्वर का प्रिय बताया गया है? या फिर क्या हमने कभी ध्यान दिया गया है कि ‘‘रामचरित मानस’’ में किसे असली भक्त कहा गया है? इन सबको समझे बिना यदि हम मंदिरों में ईश-दर्शन पर वीआईपी संस्कृति थोपते जाएंगे तो हम अपने धर्म का भी व्यवसायीकरण करते जाएंगे। जबकि धर्म आस्था है बाजार नहीं।  
यह तो सभी ने देखा होगा कि नवरात्रि अथवा विशेष हिन्दू पर्वों में ग्रामीण अथवा आर्थिकरूप से कमजोर तबके के लोग, चाहे वे स्त्री हो या पुरुष ईश्वर की आस्था से प्रेरित हो कर धर्म ध्वज उठाए पैदल निकल पड़ते हैं मंदिरों की ओर। कुछ लोग तो डामरीकृत अथवा सीसीरोड पर तपन की परवाह किए बिना लेट-लेट कर अपने घर से मंदिर तक की दूरी तय करते हैं। कांवरियों के बारे में तो सभी जानते हैं। जिस प्रकार श्रवण कुमार ने अपने माता-पिता को ईशस्थल के दर्शन कराने के लिए कांवर में उन्हें ढोया था ठीक वैसे ही एक पलड़े में आस्था और दूसरे पलड़े में ईश्वर के प्रति प्रेममय समर्पण रख कर कांवरियां निकल पड़ते हैं। इस प्रकार के समर्पित भक्तों को जिनके मन में श्रद्धा और भक्ति हिलोरें लेती रहती हैं क्या वीआईपी दर्शन मिलते हैं? उत्तर होगा ‘नहीं!’ क्योंकि ये विशुद्ध भक्त हैं, धनपति, पॉवरपति या प्रशासनपति नहीं। इन्हें गर्भगृह में प्रवेश करने की अनुमति कभी नहीं होती है। 

हर वर्ष नवरात्रि पर मैं अपनी आंखों से देखती हूं कि किस प्रकार वीआईपी कल्चर उन मंदिरों में भी प्रवेश पा चुका है जहां पहले हर प्रकार के भक्त को कदम रखने की अनुमति थी। पिछले वर्ष की नवरात्रि की घटना है, मैं रानगिर मंदिर दर्शन करने गई थी। रास्ते में मैंने अनेक ऐसे भक्त देखे जो माता का ध्वज पैदल जा रहे थे। उनमें कुछ ऐसे भी थे जो सड़क पर दंडवत लेट-लेट कर रस्ता तय कर रहे थे। आस्था का घोर समर्पित रूप जिसमें श्रद्धालु स्वयं को कष्ट पहुंचाता है ताकि देवी को प्रसन्न कर सके। देवी के दर्शन कर के उसकी कृपा पा सके। किन्तु मंदिर में पहुंच कर लंबी लाईन में लगने के बाद भी उसे वह निकट दर्शन नहीं मिलते हैं जो एक विधायक, मंत्री, कमिश्नर, कलेक्टर या किया धन सम्पन्न व्यक्ति को सुगमता से मिलते हैं। क्या कष्ट उठा कर पहुंचने वाले भक्त की भक्ति में कोई कमी है और शक्ति सम्पन्न भक्त की भक्ति विशिष्ट है? दोनों की भक्ति में कोई अंतर होता तो नहीं है लेकिन बना दिया जाता है। फिर भी यदि बारीकी से धर्म के पलड़े पर तौला जाए तो कष्ट उठा कर आने वाले भक्त का पलड़ा भारी ही रहेगा। फिर भी उसे मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश नहीं मिलेगा, जबकि एक वीआईपी को तत्काल मिल जाएगा। जब ईश्वर अपने भक्तों में भेद-भाव नहीं करता है तो हमारे मंदिरों में इस तरह के भेदभाव को बढ़ावा क्यों दिया जा रहा है?

इस बात का आशय यह नहीं है कि हर व्यक्ति को मंदरों के गर्भगृह में प्रवेश दिया जाए। यदि सुरक्षा कारणों से यह उचित नहीं है तो प्रवेश नहीं दिया जाना चाहिए। मंदिर के पुरोहित या पुजारी आदि को ही यह अनुमति मिलनी चाहिए। हर भक्त एक निश्चित दूरी से ईशप्रतिमा के दर्शन करे। लेकिन ‘‘हर भक्त’’। इस नियम को कोई वीआईपी भी न तोड़ सके, ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए। क्या यह उचित नहीं होगा? कि या तो हर भक्त को प्रवेश मिले अथवा किसी भी भक्त को प्रवेश न मिले। ईश्वर के दरबार में सभी एक समान महसूस कर सकें। यही धर्मोचित व्यवस्था कहलाएगी।  

ईश्वर का प्रिय भक्त कौन है और उसकी क्या विशेषता होनी चाहिए इस बारे में ‘‘श्रीमद्भगवद्गीता’’ में स्पष्ट उल्लेख है कि ईश्वर का सबसे प्रिय वह भक्त है जो निस्वार्थ, अहंकारहीन, सुख-दुःख में समान रहता है और निरंतर प्रभु के प्रति समर्पित होता है। ‘‘गीता’’ के 12वें अध्याय के 13वें और 14वें श्लोक में स्पष्ट कहा किया कि -
श्लोकःअद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुखः क्षमी।।
सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्याे मद्भक्तः स मे प्रियः।।
 - अर्थात जो व्यक्ति किसी भी जीव से द्वेषभाव नहीं रखता, सब प्राणियों का मित्र और दयालु है, ममता से युक्त, अहंकारहीन, सुख-दुःख में समान (शांत) रहने वाला और क्षमाशील है। जो योगी निरंतर संतुष्ट है, जिसने मन और इंद्रियों को वश में कर रखा है, जिसका मन और बुद्धि मुझमें अर्पित हैं, ऐसा भक्त मुझे अत्यंत प्रिय है।
इसी प्रकार गीता के 12वें अध्याय का 15वां श्लोक है कि 
‘‘रूयस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः।
हर्षामर्षभयोड्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः।।
- अर्थात जिससे किसी भी जीव को कष्ट नहीं होता, जो किसी जीव से स्वयं भी भयभीत नहीं होता, और जो हर्ष (अत्यधिक ख़ुशी), अमर्ष (ईर्ष्या/क्रोध), भय तथा उद्वेगों से मुक्त है, वह भक्त भी मुझे अत्यंत प्रिय है।
गीता के 12वें अध्याय का 16वां श्लोक इस संबंध में और अधिक महत्वपूर्ण है जिसमें स्पष्ट शब्दों में कहा गया है कि-
अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः।
सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः।।
- अर्थात जो भक्त सांसारिक कामनाओं से रहित, भीतर-बाहर से पवित्र, कार्य करने में कुशल, पक्षपातरहित, दुखों से मुक्त है और जिसने सभी आरंभों (कर्मों के फलों की चाहना) का त्याग कर दिया है, वह मुझे अत्यंत प्रिय है।
भगवद गीता के अलावा, अन्य हिंदू धर्मग्रंथों जैसे रामचरितमानस, श्रीमद्भागवत पुराण और ऋग्वेद में भी ईश्वर के प्रिय भक्त के गुणों और लक्षणों का बहुत ही सुंदर वर्णन किया गया है। ऋग्वेद में उन लोगों को ईश्वर का प्रिय बताया गया है जो सत्य मार्ग पर चलते हैं और ईश्वर की स्तुति करते हैं। देखिए ऋग्वेद, मंडल 1, सूक्त 31, श्लोक 6 -
सत्यं वदन्तं कवयः पृच्छन्ति 
नयन्ति धीराः सुकृताय लोकं।।
- अर्थात जो मनुष्य हमेशा सत्य का आचरण करता है, सत्य बोलता है, वही बुद्धिमान, श्रेष्ठ और ईश्वर का प्रिय है। ऐसे ही सच्चे ज्ञानी मनुष्य को ईश्वर उत्तम लोक तक ले जाते हैं।
पौराणिक कथाओं के अनुसार ईश्वर का सबसे प्रिय वह भक्त होता है जो निष्कपट, अहंकारहीन हो और सांसारिक दिखावे से दूर रहकर निष्काम भाव से प्रभु के प्रेम में लीन रहता है। इस संबंध में श्रीहरि और नारद मुनि की एक बहुत प्रसिद्ध पौराणिक कथा है। श्रीमद्भागवत पुराण इस ग्रंथ में भगवान श्रीकृष्ण प्रह्लाद के चरित्र के माध्यम से बताते हैं कि ईश्वर का प्रिय कौन है? (स्कंध 7, अध्याय 14)-
निर्ममा निरहङ्काराः समदुःखसुखाः सुहृदः।
निःसङ्गाः सर्वतो येषां मयि सन्निवेशितं मनः।।
- अर्थात जो ममता और अहंकार से रहित हैं, सुख-दुख में समान हैं, सब प्राणियों के सच्चे हितैषी (सुहृद) हैं, आसक्तिहीन हैं और जिनका मन पूरी तरह से मुझमें (परमात्मा में) लगा हुआ है, वे मुझे अत्यंत प्रिय हैं।

तुलसीदासकृत ‘‘रामचरितमानस’’ में प्रभु श्रीराम ने शबरी को बताते हुए ईश्वर के प्रिय के लक्षण स्पष्ट किए हैं। रामचरितमानस में यह प्रसंग बहुत प्रसिद्ध है। देखिए अरण्यकाण्ड, दोहा 35-36, रामचरित मानस -
निर्मल मन जन सो मोहि पावा। 
मोहि कपट छल छिद्र न भावा।।
करम बचन मन राउर चेरा। 
सोइ जनु मोर परम प्रिय नेरा।।
-अर्थात जिसका मन निष्कपट और निर्मल होता है, वही मुझे प्राप्त कर सकता है। मुझे छल-कपट और दूसरों में दोष (छिद्र) ढूँढना बिल्कुल पसंद नहीं है। जो मनुष्य कर्म, वचन और मन से मेरा (ईश्वर का) दास है, वही मेरा परम प्रिय है। 

संत रैदास की भक्ति मुख्य रूप से दास्य भाव और बिना शर्त समर्पण पर आधारित है। उनके अनुसार ईश्वर कण-कण में व्याप्त हैं और सच्ची भक्ति बाहरी दिखावे से नहीं, बल्कि शुद्ध मन और प्रेम से प्राप्त होती है। इसीलिए तो वे कहते हैं कि ‘‘मन चंगा तो कठौती में गंगा।’’ संत कबीर ने अपनी रचनाओं में ईश्वर भक्ति के नाम पर होने वाले आडंबरों, दिखावे और कर्मकांडों का घोर विरोध किया है। उनके अनुसार, ईश्वर सर्वव्यापी हैं और वे मंदिरों या मस्जिदों में नहीं, बल्कि सच्चे मन और प्रेम में बसते हैं। चाहे रैदास हों या कबीर यही कहते हैं कि ईश्वर की निकटता आडम्बरहीन रहने में है, आडम्बरों नहीं। 

दरअसल, मंदिरों में ‘‘वीआईपी दर्शन’’ एक ज्वलंत विषय है। ईश्वर के दरबार में सभी भक्तों को समान माना जाना चाहिए, लेकिन वीआईपी संस्कृति के तहत प्रभावशाली लोगों, राजनेताओं और अधिकारियों को विशेष सुविधाएँ मिलती हैं, जिससे आम जनता को घंटों लाइनों में इंतजार करना पड़ता है। मद्रास हाईकोर्ट ने एक सुनवाई के दौरान मौखिक रूप से टिप्पणी की थी कि भगवान के सामने सभी भक्त बराबर हैं। अदालतों का मानना है कि मंदिरों में विशेषाधिकार की बजाय समानता का भाव होना चाहिए। जहां वीआईपी कुछ ही मिनटों में दर्शन करके लौट जाते हैं, वहीं आम श्रद्धालुओं को कई घंटों तक लंबी और थका देने वाली कतारों में खड़ा रहना पड़ता है। वीआईपी आगमन के समय अक्सर आम कतारों को रोक दिया जाता है या सुरक्षाकर्मियों को आम जनता से धक्का-मुक्की करनी पड़ती है, जिससे भगदड़  का खतरा बढ़ जाता है। कई मंदिरों में वीआईपी और विशेष दर्शन के लिए अलग-अलग राशि तय कर दी गई है, जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि भक्ति भी अब एक व्यापार बन चुकी है। 
जबकि सिख धर्म में ऐसा नहीं है। अमृतसर का स्वर्ण मंदिर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहां किसी भी प्रकार का वीआईपी या प्राथमिकता पास नहीं होता। सभी को एक ही आम कतार से गुजरना पड़ता है। अन्य गुरु़द्वारे भी इसका पालन करते हैं। फिर हिन्दू मंदिरों में वीआईपी कल्चर की अपसंस्कृति को क्यों घुसपैंठ करने दिया जा रहा है? इससे हिन्दू धर्म को ही ठेस पहुंच रही है। वैसे विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि वीआईपी दर्शन जैसी कोई सुविधा देनी ही है तो वह वरिष्ठ नागरिकों, दिव्यांगों  और अतिआवश्यक संवैधानिक पदों तक ही सीमित रखना चाहिए। बहरहाल, इस ज्वलंत मुद्दे पर विचार किया जाना जरूरी है।                          -----------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 25.06.2026 को प्रकाशित)  
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