Wednesday, July 22, 2026

चर्चा प्लस | फुटबॉल की दुनिया सिखाती है कि मेहनत से भाग्य बदला जा सकता है | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस
फुटबॉल की दुनिया सिखाती है कि मेहनत से भाग्य बदला जा सकता है       
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह   
                                                               
  यदि यह कहा जाए के विश्व कप में खेलने वाला हर खिलाड़ी अरबों डॉलर का धनी है तो यह सुन कर किसी को भी आश्चर्य नहीं होगा। किन्तु यह जान कर अवश्य आश्चर्य होगा कि इनमें से कई प्रसिद्ध खिलाड़ी वे हैं जिनका बचपन भूख और गरीबी में कटा। इनके पास अपने जूते तक नहीं थे, फुटबॉल नहीं थी और तो और भरपेट खाना भी नहीं था। लेकिन वे अपनी मेहनत के दम पर आज फुटबॉल के साम्राज्य के मिलेनियर हैं। उनमें से कई अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा उन स्थानों के विकास में दान कर रहे हैं जहां उनका बचपन अभाव और गरीबी में बीता था।


    20 जुलाई 2026 का अर्थात इसी माह में फीफा वर्ल्ड कप 2026 का समापन हुआ। एक नए इतिहास के साथ। जिसमें 16 वर्ष बाद स्पेन ने वर्ल्ड कप जीत कर अर्जेंटीना की उम्मींदों पर पानी फेर दिया और उनके स्टार खिलाड़ी लियोनेल आंद्रेस मेसी के अंतिम वर्ल्डकप को पराजय का उपहार दे दिया। लेकिन खेल तो खेल होता है। कोई हारता है तो कोई जीतता है। अर्जेंटीना हारा और स्पेन जीता। किन्तु विश्व कप में शामिल लगभग हर टीम के लिए एक बात अपराजित रही कि उनमें कई खिलाड़ी ऐसे थे जिन्होंने अपने जीवन में भूख और अभाव झेला था पर मेहनत के बल पर वे अपनी किस्मत बदल सके। 
      विश्व फुटबॉल में कई महान खिलाड़ियों ने अत्यधिक गरीबी से उठकर खेल की दुनिया में सर्वाेच्च स्थान, प्रशंसकों का प्यार और अपार धन प्राप्त किया है। इन खिलाड़ियों ने फटे-पुराने कपड़े की बॉल बना कर अपने जीवन में फुटबॉल को स्थान देते हुए सोचा भी नहीं होगा कि एक दिन वे विश्व कप के सितारे बन कर चमकेंगे। फुटबॉल के वे महान खिलाड़ी जो अत्यंत गरीबी से उठकर आए उनमें सबसे पहला नाम आता है ‘‘द किंग ऑफ फुटबॉल’’ कहे जाने वाले ब्राजील के महान खिलाड़ी पेले का। उनका जन्म ट्रैस कोराकोस में हुआ था। उनका बचपन इतनी गरीबी में बीता कि वे जूते तक नहीं खरीद पाते थे और अक्सर मोजे में अखबार भरकर फुटबॉल खेलते थे। कई बार वह स्थिति आई जब उन्होंने उबले आलू के छिलके खा कर अपना पेट भरा। यह फुटबॉल के उनके कौशल का कमाल था कि गरीबी से निकलकर उन्होंने ब्राजील को तीन बार फीफा विश्व कप जिताया।
        महान फुटबॉलर पेले का शुरुआती जीवन अत्यधिक गरीबी, कड़े संघर्ष और फुटबॉल के प्रति अटूट जुनून से भरा हुआ था। पेले का वास्तविक नाम था एडिसन अरंतस डो नैसिमेंटो। उनका यह नाम महान अमेरिकी आविष्कारक थॉमस एडिसन के नाम पर रखा गया था। पेले का ‘‘पेले’’ नाम पड़ने का भी एक दिलचस्प किस्सा है। बचपन में उनका निकनेम ‘‘डिको’’ था। उनके पसंदीदा खिलाड़ी स्थानीय क्लब के गोलकीपर थे जिनका नाम ‘‘बेले’’ था। बचपन में पेले इस नाम का सही उच्चारण नहीं कर पाते थे और अनजाने में उन्हें ‘‘पेले’’ बोलते थे। उनके दोस्तों ने उनका मजाक उड़ाने के लिए उन्हें ‘‘पेले’’ बुलाना शुरू कर दिया। शुरुआत में पेले को यह नाम बिल्कुल पसंद नहीं था और वे चिढ़ जाते थे, लेकिन बाद में यही नाम इतिहास बन गया।
पेले का जन्म 23 अक्टूबर 1940 को ब्राजील के मिनस गेरैस के एक छोटे से कस्बे ट्रैस कोराकोस में हुआ था। उनके पिता का नाम डोडिन्हो था, जो खुद एक स्थानीय फुटबॉल खिलाड़ी थे, लेकिन घुटने की गंभीर चोट के कारण उनका करियर खत्म हो गया था। उनकी माँ का नाम सेलेस्टे अरांटस था। उनकी माली हालत बहुत खराब थी। पेले का बचपन भयंकर गरीबी में बीता। उनका परिवार ब्राजील के बाऊ शहर में एक बेहद तंग झोपड़ी जैसे मकान में रहता था, जहां अकसर उनके पास खाने तक के पैसे नहीं होते थे। परिवार का हाथ बंटाने के लिए छोटी आयु में ही पेले चाय की दुकानों पर बर्तन धोने और रेलवे स्टेशन पर जूते पॉलिश करने का काम करना पड़ा। फिर भी फुटबॉल के प्रति उनका लगाव कम नहीं हुआ। फुटबॉल खेलने के लिए जूते होना जरूरी थे लेकिन पेले के पास इतने पैसे नहीं थे कि वे एक जोड़ी जूते खरीद सकें। उनके साथी लड़के जूते पहन कर फुटबॉल खेलते मगर पेले उनके साथ नंगे पैर ही खेला करते थे। इससे उनके पैरों में चोट लगती रहती थी। लेकिन वे चोटें फुटबॉल के प्रति उनके प्रेम को कम नहीं कर सके। फुटबॉल की असली बॉल खरीदना उनके लिए एक सपना था। इसलिए, वे फटे हुए पुराने मोजों के अंदर अखबार या फटे कपड़े ठूंसकर, उन्हें रस्सी से बांधकर फुटबॉल बनाते थे और गलियों में खेला करते थे। पेले ने गलियों में खेलते हुए ‘‘बाऊ: एथलेटिक क्लब’’ की जूनियर टीम में जगह बनाई। वहाँ उन्होंने अपनी जादुई ड्रिबलिंग से सबको हैरान कर दिया। जिससे ब्राजील के पूर्व राष्ट्रीय खिलाड़ी वाल्डेमार डी ब्रिटो ने पेले की छिपी हुई प्रतिभा को पहचाना। उन्होंने पेले को ट्रेनिंग दी और मात्र 15 वर्ष की उम्र में उन्हें ब्राजील के बड़े क्लब ‘‘सैंटोस एफसी’’ के ट्रायल के लिए ले गए। ब्रिटो ने सैंटोस के निदेशकों से कहा था कि ‘‘यह लड़का दुनिया का सबसे महान फुटबॉल खिलाड़ी बनेगा।’’
पेले ने अपनी मेहनत से अपने मेंटोर ब्रिटो की भविष्यवाणी को सच कर दिखाया। फिर उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और मात्र 17 साल की उम्र में 1958 के विश्व कप में ब्राजील को चैंपियन बनाकर साबित कर दिया कि मेहनत एक गरीब को भी दुनिया का बेताज बादशाह बना सकती है।
     अर्जेंटीना के डिएगो माराडोना भी एक ऐसे ही खिलाड़ी हुए जिनका बचपन भीषण गरीबी में बीता। फुटबॉल इतिहास के सबसे जादुई खिलाड़ियों में से एक, माराडोना का जन्म अर्जेंटीना के ब्यूनस आयर्स के एक बहुत ही गरीब इलाके यानी स्लम बस्ती में हुआ था। वे अपने 8 भाई-बहनों में सबसे बड़े थे। उन्होंने पैसों की कमी से जूझते हुए अपना बचपन बिताया। उनके माता-पिता के पास इतना पैसा नहीं था कि वे मेराडोना को एक अच्छा फुटबॉल, जूते या जर्सी दिला पाते। किन्तु ये कमियां मेराडोना के मनोबल को तोड़ नहीं सकीं। उन्होंने अपने खेल कौशल को निरंतर चमकाया और अपनी असाधारण ड्रिबलिंग के बल पर दुनिया के सबसे महान खिलाड़ियों में अपनी जगह बनाई।
   पुर्तगाल के क्रिस्टियानो रोनाल्डो आज विश्व के महानतम खिलाड़ियों में गिने जाते हैं। उनका बचपन भी बेहद गरीबी में बीता। वे पुर्तगाल के मदीरा में एक छोटे से घर में पले-बढ़े, जहाँ आर्थिक तंगी इतनी थी कि उनकी माँ उनके जन्म से पहले गर्भपात तक करवा लेना चाहती थीं। उनके पिता माली का काम करते थे जिसमें उन्हें बहुत कम पैसे मिलते थे। उस पर उनके पिता को शराब पीने की लत थी जिससे उनके कमाए पैसों में से अधिकांश शराब की भेंट चढ़ जाते थे। शराब की लत के कारण घर की स्थिति काफी खराब थी। कई बार पूरे परिवार को आधापेट खा कर रह जाना पड़ता था। क्रिस्टियानो रोनाल्डो को फुटबॉल से प्यार था और वे सारी मुश्किलों से जूझते हुए फुटबॉल में अपने कौशल को चमकाते रहे। यह उनकी मेहनत ही थी जिसके दम पर उन्होंने पुर्तगाल के उच्चकोटि के खिलाड़ियों के बीच अपनी जगह बनाई और आज उनका नाम  दुनिया के सबसे सफल और अमीर खिलाड़ियों में गिना जाता हैं।
    स्पेन के लामिन यमाल का नाम इस समय हर फुटबॉल प्रेमी के दिल में है। हाल के वर्षों में वे विश्व फुटबॉल के सबसे बड़े स्टार के रूप में सामने आए। यमाल का बचपन भी अत्यंत गरीबी में बीता। उनका परिवार स्पेन के जिस इलाके में रहता था, वहाँ की आधी से अधिक आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करती थी और उनके पिता परिवार का पेट पालने के लिए कड़ा संघर्ष करते थे। उस समय वे लामिन यमाल को फुटबॉल खेलने पर झिड़का भी करते थे क्योंकि उन्हें लगता था कि खेलने से कुछ भी हासिल नहीं होगा। तब उन्हें क्या पता था कि एक दिन उनके बेटे की मेहनत उनके बेटे को फुटबॉल के आकाश का चमकता सितारा बना देगी और पैसों की बरसात करेगी। 
        ज्लाटन इब्राहिमोविच यूं तो स्विडिश फुटबॉलर के नाम से जाने जाते हैं किन्तु उनके माता-पिता बोस्निया और क्रोएशिया से आए अप्रवासी थे। ज्लाटन  का बचपन भूख और अभावों में गुजरा। वे माल्मो के एक ऐसे गरीब इलाके में पले-बढ़े जहां अपराध का बोलबाला था। वहां के बच्चे अपराध की दुनिया में कदम रख कर अपने सपने पूरा करने की कोशिश करते थे। ज्लाटन के पिता की आमदनी अच्छी नहीं थी। कई बार उनके परिवार को भूखा रहना पड़ता था। ऐसे विपरीत वातावरण में ज्लाटन ने हिम्मत नहीं हारी और अपने दम पर अपने व्यक्तित्व को सही राह दी। उन्होंने पहले ताइक्वांडो में ब्लैक बेल्ट हासिल किया लेकिन फुटबॉल के प्रति उनका प्रेम और समर्पण उनका करियर बना। विश्व कप में खेल कर उन्होंने साबित कर दिया कि यदि मेहनत और हौसला हो तो हालात बदले जा सकते हैं।
सेनेगल के सादियो माने भी एक ऐसे खिलाड़ी हैं जिन्होंने बचपन में अथाह गरीबी झेली और आगे चल कर एक महान फुटबॉलर के रूप में अपनी पहचान बनाई। सेनेगल के बाम्बली गांव के सादियो माने का बचपन बहुत ही गरीबी में बीता। उनके पास खेलने के लिए न तो फुटबॉल था और न जूते। उन्होंने गांव के मैदानों में नंगे पैर फुटबॉल खेलकर अपना सफर शुरू किया। आज वे विश्व के बेहतरीन विंगर्स में से एक हैं। उनकी विशेषता यह भी है कि वे जिस गांव से उठ कर उंचाइयों तक पहुंचे उस गांव के विकास के लिए और वहां और स्कूलों के निर्माण एवं व्यवस्था के लिए अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा दान में देते हैं।
      स्पेन की राष्ट्रीय फुटबॉल टीम में हाल के इतिहास में सबसे गरीब पृष्ठभूमि से आने वाले खिलाड़ी लामिन यमाल हैं। वे स्पेन के बार्सिलोना के पास स्थित रोकाफोंडा नामक इलाके में पले-बढ़े हैं, जिसे स्पेन के सबसे पिछड़े और गरीब पड़ोसों में से एक माना जाता है, जहाँ की लगभग आधी आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करती है। लामिन यमाल की माँ इक्वेटोरियल गिनी से और पिता मोरक्को से आए अप्रवासी थे। जब यमाल का जन्म हुआ, तब उनकी माँ की उम्र महज 16 वर्ष थी। उनके पिता सड़कों पर कचरा और सामान बीनने का काम करते थे ताकि परिवार को भोजन मिल सके। शुरुआती दिनों में उनका परिवार एक ऐसे कम्यूनल सेंटर (सामूहिक आवास) में रहता था जहां सबको मुफ्त भोजन दिया जाता था। बाद में वे कुछ समय दोस्तों के घरों में एक कमरा लेकर रहे। जब वे पहली बार बार्सिलोना की मशहूर एकेडमी ‘‘ला मासिया’’ पहुंचे, तो उनके पास खुद के स्पोर्ट जूते तक नहीं थे। वहाँ के कोच ने उन्हें पुराने जूते खरीद दिए जो उनके पैरों से बड़े साईज़ के थे। पर वे डटे रहे। अपनी असाधारण प्रतिभा के दम पर वे मात्र 15-16 साल की उम्र में स्टार बन गए। आज वे बार्सिलोना और स्पेन की टीम के सबसे मुख्य खिलाड़ियों में से एक हैं और उन्होंने अपनी कमाई से अपने माता-पिता और दादी के लिए आलीशान घर खरीद दिया है।
इन खिलाड़ियों की कहानी यह साबित करती है कि प्रतिभा और असीम मेहनत के आगे विपरीत परिस्थितियां और गरीबी भी हार मान लेती है। वहीं यह भी मानना होगा कि फुटबॉल ने ऐसी प्रतिभाओं को उड़ान भरने के लिए आकाश दिया। क्रिकेट या टेनिस की दुनिया में भले ही ऐसे उदाहण कम ही मिलते हों किन्तु फुटबॉल की दुनिया में यह बार-बार सिद्ध हुआ है कि मेहनत करने वाला अपनी ज़िन्दगी की दिशा मोड़ सकता है और भुखमरी से अपना सफर शुरू कर के भी उस सम्पन्नता तक पहुंच सकता है जहां वह दूसरों की भलाई के लिए दान करने में सक्षम हो सके।                                        -----------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 22.07.2026 को प्रकाशित) 
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