बतकाव बिन्ना की
मताई के नांव को एक पेड़ लगाओ के नईं
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
कल हम तिगड्डा लौं गए के उते एक पैचान वारे मिल गए। उन्ने हमसे ने हमाओ हाल पूछो औ ने चाल पूछो, बस, छूटतई जेई पूछो के ‘‘आपने मताई के नांव को पेड़ लगाओ के नईं?’’
‘‘कोन की मताई के नांव को? हमने पूछी।
‘‘अरे अपनी मताई के नांव को।’’ उन्ने कई।
‘‘हमने तो पर की साल लगाओ रओ, आपने लगाओ के नईं?’’ हमने उनसे पूछी।
‘‘हमने पर की साल बी लगाओ रओ औ ई साल बी लगा आए। परों तो लगाओ आए।’’ बे उचकत भए बोले। संगे उन्ने हमसे जे सोई पूछ लई, ‘‘काए आपने हमाओ फेसबुक नईं देखो का? हमने पेड़ लगात की फोटुएं ऊमें डारी रईं। औ स्टेटस में सोई डारी रईं।’’
‘‘बा तो हम नें देख पाए, बाकी आप कै रए तो आपने पेड़ जरूर लगाओ हुइए।’’ हमने कई।
‘‘आपको सोई लगाओ चाइए। ईसे मताई की याद बनी रैहे।’’ बे आगे बोले।
‘‘हऔ, आप सई कै रए। बाकी अपने बाप-मताई, दादा-दादी, नाना-नानी औ उनके बी बाप-मताई, दादा-दादी, नाना-नानी ने पेड़ लगाओ रओ। मने हमाए पुरखा ने बी पेड़ लगाओ रओ जिनें अपन ओंरन ने काट डारो। अब जो जंगल कम पड़न लगे सो एक पेड़ मताई के नांव को लगाबे को डिरामा कर रए।’’ मोसे कै आई।
‘‘हाय रे, आप जो का कै रईं? हमने सो आज लौं एक डगरिया ने कटवाई, औ आप पेड़ कटवाबे को दोस हमपे मढ़ रईं। जे तो गल्त बात आए।’’ बे भिनकत भए बोले।
‘‘हमने अकेली आप की नईं कई। हमने तो सबकी कई जीमें कछू ने कछू जिम्मेवारी हमाई सोई आए।’’ हमने कई।
‘‘का मतलब?’’ उन्ने पूछी।
‘‘मतलब जे के आप ने बा कहनात सुनी हुईए के जो आप कतल करबे वारे खों कतल करते देख के बी हल्ला नईं मचा रए तो मनो आप सोई कतल में सामिल कहाए। सो अपन ओरन ने जगंल कटबे की खूब खबरें पढ़ीं। मनों मों से बोल ने फूटें। कभऊं खुल के बिरोध ने करी।’’ हमने कई।
‘‘सो अपन ओरें का कर सकत आएं? अपन ने तो खबई पढ़ी, अपनी आंखन से तो नईं देखो।’’ बे ढिठाई दिखात भए बोले।
‘‘सई कई के अपन ने अपनी सगी आंखन से तो नईं देखो। मनो अपन गांव, बस्ती, सहर खों तो बढ़त देख रए। जे जंगल की जमीन पे नईं फैल रए तो का चांद पे फैल रए?’’ हमने सोई कई।
‘‘अब जनसंख्या बढ़हे तो मकान तो लगहेंईं।’’ उन्ने कई।
‘‘जनसंख्या उत्ती नईं बढ़ी जित्ते की मकान बढ़ गए। काए से अब कोऊ बाप-मताई के संगे नईं रैत। सबखों अपने लगाने अलग मकान चाऊने। पैले का होत्तो के सबरे संगे रैत्ते। सो उतई पुस्तैनी मकान में चार तल्ला भले बना लए जात्ते मनों अलग रैबे की कोऊ ने सोचत्तो। अब तो सबखों अलग-अलग रैने औ सबखों अपनो अलग मकान चाऊने। काए सई कई के नईं।’’ हमने उनसे पूछी।
‘‘कै तो आप सई रई, पर जे सब तो चलन की बात आए। आजकाल जेई चलन चल रओ। का करो जा सकत आए?’’ बे मासूम बनत भए बोले।
‘‘ध्यान से सुनियो आप औ बुरऔ ने मानियो! का आए के बच्चा ऊंसईं बनत आएं जैसे मताई-बाप होत आएं। आप खों लेओ, आप उते बरिया चौक को अपनो पुरानो मकान छोर के नई बस्ती में रैबे खों चले आए। मताई-बाप खों उतई छोर आए। मने बा मकान बी आपको औ जे नओ मकान बी आपको। अब आप के लरका-बच्चा सोई जेई कर रए कोऊ नोएडा में घरे खरीद रओ तो कोऊ गुरुग्राम में तो कोऊ बैगलुरु में। मनों इते को मकान बी उने नई छोड़ने। उल्टे आजकाल सो जे चलन हो रओ के बे ओरें उते पइसा कमा के इते गांव-जंगल में अपनो फारम हाऊस खरीद के डार रए। जीमें उनको साल-दो साल में कभऊं-कभार आने। मनों एसेट्स के नांव पे जंगलई तो कटवाने उनें।’’ हमने कै डारी।
‘‘आप से तो कछू कैबो फजूल आए। आप से कओ आम, सो आप नींम की सुनान लगत आओ। हम जा रए।’’ बे बमकत भए बोले। काए से के हमें पता हती के उनके लरका औ बिटिया ने इते अपनों-अपनों फारम हाऊस खरीदो आए। अब आपई सोचो के जिनकी जिनगी नोएडा औ बैंगलुरु में कटनी होए, उनें इते जमीन दबा के बैठबे की का जरूरत? मनों नईं बा उनके लाने धरती मां को टुकड़ा नोईं, बा तो एसेट्स आए। भले ईके बदले कई एकड़ को जंगल कट गओ होए चाए खेती मिट गई होए।
‘‘अरे, आप बुरौ काए मान रए? हम तो जग की कै रए। आप हमाए कहे को पर्सनल ने लेओ। आप तो जे बताओ के पर की साल को आपको लगाओ गओ पेड़ कैसो आए?’’ हमने उनसे पूछी।
‘‘अच्छो हुइए।’’ बे बोले।
‘‘का मतलब के अच्छो हुइए? आप ऊको जा के देखत नइयां का?’’ महने पूछी।
‘‘अब लगा दओ रओ पेड़। सो अब बेर-बेर उते जा के को आ देख रओ? का जे नेता हरें अपनों लगाओ पेड़ देखबे खों जात आएं?’’ उन्ने उल्टे हमई से पूछ लई।
‘‘बे काए खों जैहें? का उने औ कोनऊं काम नइयां? औ फेर उनखों मताई के नांव को हर गांव-सहर में एक पेड़ लगाने होत आए, बे कां-कां जा के देखहें? मनों आप तो जा सकत हो।’’ हमने कई।
‘‘जेई तो बात आए के पेड़ लगा दओ। अब ऊको रोजीना को देख रओ।’’ बे बोले।
‘‘सई कई आपने। एक दिनां अपनी मताई खों याद कर लओ, ऊके नांव पे एक पेड़ लगा दओ, जीके लाने उते गड्डा पैले से खुदे मिलत आएं। ऊमें पेड़ लगाओ औ फोटू खेंचाई, फेर पानी डारो औ फोटू खेंचाई। फेर ऊ सबरी फोटुअन खों सोसल मीडिया पे डार दओ। कऊं पौंच लग गई तो अखबार में फोटू छपवा लई। हो गओ एक पेड़ मताई के नांव को। जै राम जी की।’’ हमने कई।
‘‘तो का? जेई से सब कर रए।’’ बे अपनो पल्ला झारत भए बोले।
‘‘फेर तो जे सई रैहे के ई दफा हमने पेड़ नईं लगाओ आए, सो कोऊ दिनां आप संगे चलियो औ पेड़ लगात भए हमाई फोटू खेंच दइयो। हम सोई उन फोटुअन खों सोसल मीडिया पे डार के पेड़न खों श्रद्धांजलि दे लेबी।’’ हमने उनसे कई।
‘‘हऔ जरूर! जब चलने हो हमें फोन कर लइयो। हम संगे चले चलबी। हम सोई एकाध पेड़ औ लगा देबी।’’ बे हुलसत भए बोले। उन्ने हमाई कई ‘श्रद्धांजलि’ पे कान ई ने दओ। बे हमाओ ब्यंग ने समझे।
बे तो ‘राम-राम’ कर के चले गए, मनों हम जेई सोचत रए के अपन ओरें इंसान हो के हाथी घांईं बनत जा रए जीके खाबे के दांत औ, दिखाबे के औ। हम तो बे गइया-बकरी से गए गुजरे होत जा रए जोन घास खों ऊपरे-ऊपरे से खाउत आएं, जड़ें छोरत जात आएं, ताके दूसरे दिनां फेर के उनको घास मिल सके। हम तो सब कछू जड़ई से खा जात आएं। कल के लाने बचाबे की कोन खों परी?
बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के आप ओरन में से जोन-जोन ने मताई के नांव को पेड़ लगाओ, बे पलट के अपनों लगाओ पेड़ देखबे गए के नईं? औ गए तो कित्ती बेर?
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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