बतकाव बिन्ना की
ई किसां को पुरानो वर्जन सई, के नओ वर्जन?
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
चलो आज अपन ओरें एक नीतिकथा पे बिचार करें। अब आप ओरें जा गिचड़ ने करन लगियो के कोन की नीति पे? काए से के आजकाल राजनीति में नीति सो दिखात नईंया। बाकी अपन को का करने राजनीति से? अपन तो ठैरे मतदाता। अपन खों तो बस वोट देने रैत आए। आगे से अपन खों का लेबो-देबो के मैंगाई बढ़े, चाए मंदर में चढ़ाबे की चोरी होए, चाए लुगाइन के संगे, बच्चियन के संगे कछू होत रए, अपन खों का करने? जबे वोट देने रओ तो सो दे दओ रओ। ऊंसई बी सोचबे वारी बात आए के अपन कहाऊंत आएं ‘मतदाता’, सो, देबे वारे खों कभऊं देबे के बाद कछू मांगो नईं चाइए। अच्छो नईं मानों जात। ‘मतदान’ में दान कर दओ सो कर दओ। अब जोन खों दान दओ, का ओई से कछू मांगों थोड़ेई जा सकत आए। जे अपने संस्कार नोंईं। औ अपन ठैरे कछू ज्यादई संस्कारी। जेई से जोन खों वोट देके जिताऊत आएं ऊंसे जे लौं नईं पूछ पाऊत आएं के तुमने जो-जो करबे की कई रई बा करी काए नईं? जा पूछबे में सो ऐसई लगहे जैसे भिखारी खों भीख देबे के बाद ऊको ठेन करी जाए के तुमने भीख के बदले आसीसें काए ने दईं? नईं भैया! अपन ठैरे संस्कारी सो अपन ऐसो नईं पूछ सकत। अपन ठैरे संस्कारी। बाकी छोड़ो जे सब! हम सुनाबे जा हते एक ठो नीतिकथा, सो, बा सुनो औ गुनो!
का भओ के एक जंगल में एक शेर रैत्तो जो उते को राजा रओ। ऊके दरबार में एक कौवा, एक तेंदुआ औ एक लोमड़ी रैत्ती। शेर शिकार करत्तो औ अपनों भरपेट खा के, अफर के बाकी बा तीनों के लाने छोड़ देत्तो। तीनोंई शेर की भौतई चमचोंई करत्ते। काए से के उने पतो रओ के जबलौं शेर रार करत रैहे तबलौं फोकट को खाबे खों मिलत रैहे। उनें आड़ी के काड़ी ने टारने परहे।
एक दार का भओ के ऊ जंगल में कऊं से एक ऊंट आ गओ। ऊको देख के कौवा, तेंदुआ औ लोमड़ी की बांछें खिल गईं। उन्ने सोची के जो शेर ई ऊंट को शिकार कर ले, तो उन तीनों को बी चार-छै दिनां को इंतजाम हो जैहे। सो, बा तीनों जने ऊंट खों घेर-घार के शेर के पास लेवा गए।
“जो को आ? जो अपने इते को तो ने दिखा रओ?” शेर ने पूछी।
“को जाने कां से आ गओ?” कौवा ने कई।
“हमें तो लगत आए के जो दूसरो जंगल से इते जासूसी करबे खों आओ आए।” तेंदुआ ने कई।
’ईको तो मार के खा लओ चाइए।” चतुरा लोमड़ी ने तुरतईं कई।
बा तीनों की बतकाव सुन के ऊंट कंपन लगो। ऊने शेर के पांव पकर लए।
“महराज, हमाई जान बख्श दई जाए। हम तो आपकी सरण में जे लाने आए के आप हमें अपने इते जियन खान देहो। मालक, हम जो झूठ बोलें तो हमाए मों में कीरा परें। मालक, जो आप अपने सरण में आए भए को जो आप मार के खा जैहो तो आपकी भौतई बदनामी हुइए। सरण में आए भए खों मारो नईं जात आए, जा आप सोई जानत हो। बाकी आपकी मरजी।” कै के ऊंट शेर के पावन पे लोट गओ।
शेर ने सोची के ऊंट कै तो सई रओ आए। सो शेर ने ऊंट खों अपनी सरण में लेत भए अपनी सेवा में रख लओ। तीनों चमचों खों जा बात बुरई लगी, मनों ऊपर से उन्ने शेर के जैकारे लगाए
कछू दिनां गुजरे। एक दिनां शेर की तबीयत बिगर गई। हप्ता खांड़ लौन ने सुदरी। तीनों चमचे भूके मरन लगे। काए से उने तो शेर के करे शिकार में से खाबे की आदत रई। सो उन्ने शेर से कई के “मालक! आप तो शिकार कर नईं पा रए औ हम तीनों भूक से मरे जा रए। सो, अब ऊंट खों मार के खा लओ जाए, जेई उपाय बचो आए।”
“अरे, हम तो सोच रए हते के जा ऊंट तो हमाओ सरण वारो ठैरो, सो ऊको तो हम नईं मार सकत, मनों तुम तीनों खों मार के न खा लओ जाए?” शेर ने कई।
शेर की बात सुन के तीनों कंपन लगे। औ उते भाग खड़े भए। ईके बाद शेर उन तीनों चमचों से छुटकारो मिल गओ। फेर शेर औ ऊंट खुसी-खुसी रैन लगे।
सो, जा हती बा नीति कथा जोन में बताओ गओ के एक राजा खों चापलूसन के कए में नईं आओ चाइए।
अब तनक ज ईं किसां खों आज के हिसाब से सोची जाए तो किसां कैसी हुइए?
तो सुनियो अब ई किसां को नओ वर्जन......
नओ वर्जन में किसां ऐसी हुइए के शेर हतो राजा औ राजा खों चापलूसन की घनी जरूरत रैत आए। जो चापलूस चौबीस घंटा ऊकी जैकारे ने करें तो ऊको राजा होबे की फीलिंग ने आहे। सो शेर जू खों सोई अपने तीनों चमचा कौवा, तेंदुआ औ लोमड़ी भौतई पोसात्ते। बा उन्हई की सलाय पे चलत्तो। ऊको पतो रओ के ऊकी परजा तो कऊं नईं जा रई, चाए बा ऊको गरो मसकत रए, चार मार के खात रए। परजा सो लात-जूता खात बनीं रैहे औ जैकारे लगात रैहे। सो, बा राजा शेर शिकार करत्तो औ खुद खात्तो, संगें अपने तीनों चमचों खो खिलाउत्तो।
एक दिनां ऊके जंगल में कऊं से ऊंट आ गओ। कौवा बोलो के - “मालक जे दूसरो जंगल को जासूस आए इको मार के खा लओ जाए।”
“नईं मालक, जो जे दूसरो जंगल को मेम्बर आए तो ईको अपने राज में मेम्बरशिप दे दई जाए औ कछू अच्छो सो पद दे दओ जाए, ईंसे उते औ मेम्बर फूट के इते आ जाहें। ईसे आपको राज सबसे बड़ो राज कहा हे।” तेंदुआ बोलो। काए से के ऊके दिल में चल रई हती के जो शेर अपनों राज बड़ो कर लैहे तो कल को ऊके टपकबे पे ऊ जा बड़े राज को मालक बन जैहे।
“हऔ महराज! दोई अपनी-अपनी जांगा सई कै रए। मनो अबे जा ऊंट तनक दूबरो आए। अबे खाबे जोग ईमें कछू खास नइयां, सो, ईको अबे अपने राज में कछू पोर्टफोलियो दे के खान-पियन देओ। फेर जब जे मुटा जाहे, तब सोचबी के कोन दिनां काटने औ कोन दिनां खाने।” लोमड़ी ने सोई अपनो एक्सपर्ट कमेंट दओ। ऊंट ने सोई मोका ताक के अपने जंगलवारों खों खूब गरियाओ औ अपनी पार्टी मने अपनों जंगल बदल लओ।
सो ई तरां ऊंट खों नए जंगल में जांगा मिल गई। फेर चारो परजा के मूंड़ पे तबला बजाऊत भए खत रए, मुटियात रए। अबे लौं ने राजा शेर बिमार परो ने ऊंट के खाए जाबे की नोबत आई। सबरे अपनी सात पीढ़ी के लाने जोग मसकत जा रए।
बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के आज के टेम पे ई नीतिकथा मने किसां को पुरानो वर्जन सई, के नओ वर्जन?
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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